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राजभाषा हिन्दी चर्चा में है, कारण मोदी सरकार द्वारा विभागों को दिए गए निर्देश कि वे राजकीय कार्य प्रमुखतया हिन्दी में करें । हिन्दी भारतीय संघ की संविधान-सम्मत राजभाषा है, यानी राजकाज की भाषा । लेकिन संविधान की बात-बात पर दुहाई देने वाले हमारे अधिकांश राजनेता चाहते हैं कि राजकाज मुख्यतः अंगरेजी में ही होते रहना चाहिए और वह भी भविष्य में सदैव के लिए । मैं समझ नहीं पाता कि जब हिन्दी का प्रयोग होना ही नहीं चाहिए, या मात्र खानापूर्ति भर के लिए हो, तब हिन्दी को राजभाषा बनाए रखने का तुक ही क्या है ? लेकिन इस प्रश्न पर विचार करने की जरूरत भी ये नेता महसूस नहीं करते ।

हिन्दी का विरोध उस समय भी हुआ था जब इसे राजभाषा के खिताब से नवाजा जा रहा था । उस काल में अंततोगत्वा संविधान-निर्माण में लगे नेतावृंद सहमत हो ही गये, हिन्दी के साथ सीमित समय के लिए अंगरेजी भी बनाए रखने की शर्त के साथ । वह सीमित समय विगत 63-64 सालों के बाद भी घटने के बजाय अनंतकाल की ओर बढ़ता जा रहा है । पिछली शताब्दी के पचास-साठ के दशकों में विरोध के सर्वाधिक जोरशोर के स्वर तमिल राजनेताओं ने उठाए थे । और आज भी उनका वह विरोध लगभग जैसा का तैसा बरकरार है । उन्होंने शायद कसम खा रखी है कि हिन्दी को लेकर हम न अभी तक बदले हैं और न ही आगे बदलेंगे ।

हिन्दी का जैसा विरोध पचास-साठ के दशक में था वैसा कदाचित अब नहीं रहा । हिन्दी के प्रति तमिलभाषियों का रवैया काफी-कुछ बदल रहा है, भले ही राजनैतिक कारणों से नेताओं का रवैया खास न बदला हो । यों भी इतना जबरदस्त विरोध किसी और राज्य में न तब था और न अब है । वस्तुतः यह तथाकथित तमिल स्वाभिमान से जुड़ा है, ऐसा स्वाभिमान जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । सवाल उठता है कि इस स्वाभिमान को अंगरेजी से कोई खतरा क्यों नहीं होता । मैंने अनुभव किया है कि तमिलनाडु के ही पड़ोसी राज्य केरल में स्थिति आरंभ से ही बहुत कुछ भिन्न रही है, पचास-साठ के दशक में और आज भी ।

इस संबंध में मुझे 1973 की दक्षिण भारत की यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में मेरा नया-नया व्यावसायिक प्रवेश हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । उस काल में बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । दूसरे शहरों से आरंभ होने वाली यात्राओं का आरक्षण आप आज की तरह आसानी से नहीं करा सकते थे । तब रेलवे विभाग इस कार्य को तार (टेलीग्राम) द्वारा संपन्न किया करता था, जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । हां, आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में कम ही होती थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । रेलगाड़ियों के इंतिजार में प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर लेटे अथवा सोते हुए समय गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है । तभी वहां मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । कुछ काल की चुप्पी के पश्चात नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि रेल-यात्राओं के दौरान जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रहते और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । अपने देश के अभिजात वर्ग में पाश्चात्य समाजों की भांति ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन में लोग अब इस मामले में अभिजात बनते जा रहे हैं । अस्तु ।

उन सज्जन से मेरी बातचीत का सिलसिला अंगरेजी में आंरभ हुआ । जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में बताया तो वे अंगरेजी से हिंदी पर उतर आये । इधर हिन्दी तो चलती नहीं होगी अपनी इस धारणा को उनके समक्ष रखते हुए मैंने उनकी हिन्दी पर आश्चर्य व्यक्त किया । लगे हाथ उनकी यात्रा संबंधी अन्य बातें भी उनसे जाननी चाहीं ।

उन्होंने मुझे बताया कि वे केरला के रहने वाले हैं और अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकले हैं । बातचीत से पता चला कि उन्हें कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । उनका कहना था कि इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से बात नहीं कर सकते ।

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनको बताया कि मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उसका थोड़ा अनुभव भी हुआ है । मैंने उनके सामने आशंका जताई कि ऐसा विरोध केरला में भी होता होगा ।

उनका उत्तर नहीं में था । उनका कहना था कि केरला के लोग व्यावहारिक सोच रखते हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं और देश के बाहर भी जाते हैं । वे जानते हंै कि हिन्दी से परहेज करके उन्हें कोई लाभ नहीं होने का ।

मेरा दक्षिण भारत जाना कई बार हो चुका है । हिन्दी को लेकर हर बार मुझे पहले से बेहतर अनुभव हुए हैं । चेन्नई में आज भी हिन्दी अधिक नहीं चलती है, लेकिन उसी राज्य के रामेश्वरम एवं कन्याकुमारी में आपको कोई परेशानी नहीं होती । केरला में हिन्दी के प्रति लोगों का झुकाव है यह बात मुझे एक बार वहां के दो शिक्षकों ने बताई थी जिसका उल्लेख मैंने अपनी अन्य पोस्ट में किया है । इसका मतलब यह नहीं कि वहां हर कोई हिन्दी जानता हो । किसी भाषा का अभ्यास एवं प्रयेाग के पर्याप्त अवसर होने चाहिए जो आम आदमी को नहीं होते । लेकिन विरोध जैसी कोई चीज वहां सामान्यतः नहीं है । – योगेन्द्र जोशी

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आज 14 सितंबर यानी ‘हिन्दी दिवस’ है, इंडिया दैट इज भारत की घोषित राजभाषा को ‘याद’ करने का दिन । यह वही दिन है जब 62 वर्ष पहले हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया ।

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इस देश के संविधान-निर्माताओं के मन में हिन्दी राजभाषा घोषित करने का उत्साह क्योंकर जागा? क्या इसलिए कि ‘अपनी देशज भाषा’ ही स्वाभिमान रखने वाले देश के राजकाज की भाषा होनी चाहिए ? मुझे अपना यह मत व्यक्त करने में संकोच नहीं होता है कि अपने संविधान-निर्माताओं में दूरदृष्टि का अभाव रहा होगा । मैं ऐसा इस आधार पर कहता हूं कि आज राजनैतिक दृष्टि से और राजभाषा की दृष्टि से देश के जो हालात हैं उनकी कल्पना उन्होंने नहीं की । उन्होंने संविधान लिखने में और राजभाषा घोषित करने में आदर्शों को ध्यान में रखा, न कि जमीनी हकीकत को । वे यह कल्पना नहीं कर सके कि भावी राजनेता किस हद तक सत्तालोलुप होंगे और अपने हितों को सही-गलत तरीकों से साधने में लगे रहेंगे । वे यह भी समझ पाये कि भावी जनप्रतिनिधि ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाकर समाज के विभिन्न समुदायों को वोट-बैंकों में विभाजित कर देंगे ।

मैं संविधान की कमियों की चर्चा नहीं करना चाहता, लेकिन यह अवश्य कहूंगा कि हिन्दी को राजभाषा घोषित करने में संविधान-निर्माता उतावले जरूर रहे । वे इस बात को क्यों नहीं समझ सके कि देश में अंगरेजी का वर्चस्व घटने वाला नहीं, और वह देशज भाषाओं के ऊपर राज करती रहेगी ? वे क्यों नहीं समझ सके कि शासन में महती भूमिका निभाने वाला प्रशासनिक वर्ग हिंदी को कभी बतौर राजकाज की भाषा के पनपने नहीं देगा ? और यह भी कि वह वर्ग समाज में यह भ्रांति फैलाएगा कि अंगरेजी के बिना हम शेष विश्व की तुलना में पिछड़ते ही चले जाएंगे ?

हिंदी के राजभाषा घोषित होने के बाद शुरुआती दौर में अवश्य कुछ हलचल रही, किंतु समय के साथ उसे प्रयोग में लेने का उत्साह ठंडा पड़ गया । तथ्य तो यह है कि एक दशक बीतते-बीतते यह व्यवस्था कर ली गई कि अंगरेजी ही राजकाज में चलती रहे ।

आज स्थिति यह है कि स्वयं केंद्र सरकार हिंदी में धेले भर का कार्य नहीं करती । बस, अंगरेजी में संपन्न मूल कार्य का हिंदी अनुवाद कभी-कभी देखने को मिल जाता है । न तो राज्यों के साथ हिंदी में पत्राचार होता है, न ही व्यावसायिक संस्थाओं के साथ । ऐसी राजभाषा किस काम की जिसे इस्तेमाल ही नहीं किया जाना है ? आप कहेंगे कि शनैः-शनैः प्रगति हो रही है, और भविष्य में हिंदी व्यावहारिक अर्थ में राजभाषा हो ही जाएगी । जो प्रगति बीते 62 सालों में हुई है उसे देखकर तो कह पाना मुश्किल कि कितनी सदियां अभी और लगेंगी ।

इस बात पर गौर करना निहायत जरूरी है कि किसी भी भाषा का महत्त्व तभी बढ़ता है जब वह व्यावसायिक कार्यक्षेत्र में प्रयुक्त होती है । याद रखें कि अंगरेजी अंतरराष्ट्रीय इसलिए नहीं बनी कि वह कुछ देशों की राजकाज की भाषा रही है, बल्कि इसलिए कि संयोग से व्यापारिक कार्यों में वह अपनी गहरी पैठ बना सकी । आम आदमी को केंद्र सरकार के साथ पत्राचार या कामधंधे की उतनी बात नहीं करनी पड़ती है जितनी व्यावसायिक संस्थाओं से । अपने देश की स्थिति क्या है आज ? सर्वत्र अंगरेजी छाई हुई है । देखिए हकीकत:

1.     बाजार में समस्त उपभोक्ता सामग्रियों के बारे में मुद्रित जानकारी अंगरेजी में ही मिलती है । रोजमर्रा के प्रयोग की चीजों, यथा साबुन, टूथपेस्ट, बिस्कुट, तेल आदि के पैकेट पर अंगरेजी में ही लिखा मिलता है ।

2.     अस्पतालों में रोगी की जांच की रिपोर्ट अंगरेजी में ही रहेगी और डाक्टर दवा का ब्योरा अंगरेजी में ही लिखेगा, मरीज के समझ आवे या न, परवाह नहीं ।

3.     सरकारी बैंकों के नोटिस-बोर्डों पर हिन्दी में कार्य करने की बात लिखी होती है, लेकिन कामकाज अंगरेजी में ही होता है ।

4.     स्तरीय स्कूल-कालेजों – अधिकांशतः निजी एवं अंगरेजी माध्यम – में प्रायः पूरा कार्य अंगरेजी में ही होता है । जिस संस्था में हिन्दी में कार्य होता है उसे दोयम दर्जे का माना जाता है, और वहां गरीबी के कारण या अन्य मजबूरी के कारण ही बच्चे पढ़ते हैं । इन घटिया सरकारी स्कूलों के कई छात्रों को तो ठीक-से पढ़ना-लिखना तक नहीं हो आता !

5.     सरकारी संस्थाओं की वेबसाइटें अंगरेजी में ही तैयार होती आ रही हैं । अवश्य ही कुछ वेबसाइटें हिंदी का विकल्प भी दिखाती हैं, लेकिन वे बेमन से तैयार की गईं प्रतीत होती हैं । घूमफिर कर आपको अंगरेजी पर ही लौटना पड़ता है ।

6.     आयकर विभाग के पैन कार्डों तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों के एटीएम/क्रैडिट कार्डों जैसे आम जन के दस्तावेजों में राजभाषा कहलाने के बावजूद हिन्दी इस्तेमाल नहीं होती ।

7.     हिन्दीभाषी क्षेत्रों के बड़े शहरों के दुकानों एवं निजी संस्थानों के नामपट्ट अंगरेजी में ही प्रायः देखने को मिलते हैं; हिंदी में तो इक्का-दुक्का अपवाद स्वरूप रहते हैं । लगता है कि होटलों, मॉलों एवं बहुमंजिली इमारतों के नाम हिन्दी में लिखना वर्जित है ।

8.     नौकरी-पेशे में अंगरेजी आज भी बहुधा घोषित एवं कभी-कभार अघोषित तौर पर अनिवार्य बनी हुई है ।

9.     विश्व के सभी प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्षों/शीर्ष-राजनेताओं को पारस्परिक या सामूहिक बैठकों में अपनी भाषा के माध्यम से विचार रखते देखा जाता है । क्या इस देश के नुमाइंदे ऐसा करते हैं ? पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेई अवश्य अपवाद रहे हैं ।

इस प्रकार के तमाम उदाहरण खोजे जा सकते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि वास्तविकता में अंगरेजी ही देश पर राज कर रही है, और आगे भी करती रहेगी । ‘क्यों ऐसा है’ का तार्किक कारण कोई नहीं दे सकता है । कुतर्कों के जाल में प्रश्नकर्ता को फंसाने की कोशिशें सभी करते हैं ।

दरअसल देशवासियों के लिए अंगरेजी एक उपयोगी भाषा ही नहीं है यह सामाजिक प्रतिष्ठा और उन्नति का द्योतक भी है । यह धारणा सर्वत्र घर कर चुकी है कि अन्य कोई भाषा सीखी जाए या नहीं, अंगरेजी अवश्य सीखी जानी चाहिए । अंगरेजी माध्यम विद्यालयों का माहौल तो छात्रों को यही संदेश देता है । अंगरेजी की श्रेष्ठता एवं देशज भाषाओं की हीनता की भावना तो देश के नौनिहालों के दिमाग में उनकी शिक्षा के साथ ही बिठा दी जाती है ।

मेरे देखने में तो यही आ रहा है कि हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाएं महज बोलने की भाषाएं बनती जा रही हैं । लिखित रूप में वे पत्र-पत्रिकाओं एवं कतिपय साहित्यिक कृतियों तक सिमट रही हैं । रोजमर्रा के आम जीवन का दस्तावेजी कामकाज तो अंगरेजी में ही चल रहा है । कहने का अर्थ है कि सहायक राजभाषा होने के बावजूद अंगरेजी ही देश की असली राजभाषा बनी हुई है ।

मुझे हिन्दी दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं दिखता । हिन्दी को लेकर हर वर्ष वही रटी-रटाई बातें कही जाती हैं । मंचों से कही जाने वाली ऊंची-ऊंची बातों का असर श्रोताओं पर नहीं पड़ता है, और भी वक्ता इस पर मनन नहीं करता है कि कही गयी बातों को तो वह स्वयं ही अमल में नहीं लाता । गंभीर चिंतन वाले लोग भाषणबाजी नहीं करते बल्कि धरातल पर कुछ ठोस करने का प्रयास करते हैं । सरकारी तंत्र में कितने जन हैं ऐसे ? – योगेन्द्र जोशी

राष्ट्र संघ आधिकारिक भाषा दिवस

इसी वर्ष (2010) संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने अपनी 6 आधिकारिक भाषाओं (official languages) के नाम पर ‘दिवस’ घोषित किये हैं । (देखें http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=34469&Cr=multilingual&Cr1=) ये दिवस इस प्रकार हैं:

1. अरबी भाषा दिवस Arabic Language Day (दिसम्बर 18 December) | सन्1973 की इसी तिथि पर अरबी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ की छःठी आधिकारिक भाषा (Official Language) की मान्यता दी गयी थी ।
2. चीनी भाषा दिवस Chinese Language Day (अप्रैल 20 April) । चीनी चांद्रमास के अनुसार यह दिन चीन में ‘अन्न दिवस’ (Day of Grain) के तौर पर मनाया जाता है ।
3. अंग्रेजी भाषा दिवस English Language Day (अप्रैल 23 April) | यह दिन प्रसिद्ध अंग्रेजी नाट्यकार विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare) के जन्मदिन के तौर जाना जाता है ।
4. फ़ांसीसी भाषा दिवस French Language Day (मार्च 20 March) | संयोग से यह दिन फ़्रांसीसी-प्रेमियों और फ़ांसीसी भाषा का मानवीय मूल्यों के संवर्धन में योगदान के नाम पर बने उनके संगठन ‘ला फ़्रांकोफ़ोनी’ (La Francophonie) का स्थापना दिवस है ।
5. रूसी भाषा दिवस Russian Language Day (जून 6 June) । यह दिन अलेक्ज़ांडर पुश्किन (Aleksander Pushkin), जिन्हें रूसी साहित्य के जनक के तौर पर देखा जाता है, का जन्मदिन है ।
6. स्पेनी भाषा दिवस Spanish Language Day (अक्टूबर 12 October) । यह स्पेन का राष्ट्रीय दिवस तथा स्पेनी भाषा-संस्कृति मानने वाली अन्यत्र वसी बिरादरी (Hispaniards) के दिवस के तौर पर जाना जाता है ।

संघ के महासचिव ने पहली बार मनाये गये ‘अंग्रेजी दिवस’ – 23 मार्च – के अवसर पर शेक्सपियर के शब्दों, `a feast of languages’ (भाषाओं का भोज, विविध भाषाओं की दावत), को उद्धरित करते हुए इन दिवसों की अहमियत को रेखांकित किया था । बहुभाषाभाषी इस विश्व में सभी भाषाओं को सम्मान मिले, और संघ के कार्यों में उक्त सभी भाषाएं समान रूप से प्रयुक्त हों यह संघ का प्रयास रहेगा ऐसी भावना इन दिवसों से जुड़ी है ।
अंग्रेजी के संदर्भ में मुझे एक वेबसाइट पर यह भी पढ़ने को मिला हैः “13 अक्टूबर 1362 में इंग्लैंड के ‘चांसलर’ ने पार्लियामेंट का उद्घाटन पहली बार अंग्रेजी भाषा में किया । सभा के उसी सत्र में विधि-नियमों और विधिक कार्यों के लिए सभा-सदस्यों को अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति दी गई । इस दिन को ‘अंग्रेजी भाषा दिवस’ (English Language Day) माना जाता है ।” लेकिन राष्ट्र संघ का घोषित अंग्रेजी दिवस इससे भिन्न है । (देखें http://www.englishproject.org/index.php?option=com_content&view=article&id=592&Itemid=472)

दिवसों की भरमार

पिछले कुछ दशकों से दिवसों का चलन बढ़ गया है । मानव समाज की हर समस्या की ओर ध्यानाकर्षण के लिए नये-नये दिवस घोषित किये जा रहे हैं । उपर्युक्त दिवस उसी फैशन की नई बानगी हैं । अब देखिए इसी माह (सितंबर) के उन दिवसों की सूची जिनकी जानकारी मुझे मिल सकी है:
(अंतर० = अंतरराष्ट्रीय; Intl. = International)

8 Intl. Literacy Day अंतर० साक्षरता दिवस
11 World First Aid Day विश्व प्राथमिक चिकित्सा दिवस
14 Intl. Cross-Cultural Day अंतर० मिश्रसंस्कृति दिवस
15 Intl. Day of Democracy अंतर० लोकतंत्रता दिवस
3rd Tuesday Intl. Day of Peace अंतर० शांति दिवस
16 Intl. Day for Ozone Preservation अंतर० ओजोन संरक्षण दिवस
20 Intl. Car Free Day अंतर० कारमुक्त दिवस
21 World Alzheimer’s Day अंतर० अल्जाइमर दिवस
21 Intl. Day of Peace अंतर० शान्ति दिवस
23 World Deaf Day विश्व बधिर दिवस
27 World Tourism Day विश्व पर्यटन दिवस
28 World Heart Day विश्व हृदय दिवस
28 World Rabies Day विश्व रेबीज़ दिवस

अस्तु, ये हैं विश्व दिवस । राष्ट्रीय स्तर के दिवस, जो भी हों, अतिरिक्त हैं । इसी माह 5 तारीख ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जा चुका है । 14 तारीख हिंदी दिवस है ही । इसी वर्ष कुछ पर्यावरणविदों और उत्साही नागरिकों ने ‘हिमालय दिवस’ भी मनाया है, 9 तारीख, हिमालय क्षेत्र के बिगड़ते पर्यावरण के प्रति सरकार एवं आम जनों का ध्यान आकर्षित करने के उद्येश्य से । अब भविष्य में यह भी मनाया जाएगा । (http://www.thaindian.com/newsportal/enviornment/environmentalists-observe-himalaya-day_100425964.html)

दिवसों की अहमियत

हमारे देश में त्यौहारों-पर्वों के रूप में अनगिनत ‘दिवस’ मनाने की परंपरा चली आ रही है । इनका उद्येश्य समझ में आता हैः जीवन के प्रतिदिन के कार्यव्यापार से हटकर मनोरंजन एवं सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्कों का प्रयोजन इनमें निहित रहता है । ईद-दीवाली, बीहू-बैशाखी एवं अन्य धार्मिक पर्व इस श्रेणी में आते हैं । अपने यहां दिवंगत महापुरुषों के जन्मदिनों की भी भरमार है, जैसे बुद्ध, गांधी, नेहरु, अंबेडकर जयंतियां । बीते वर्षों में गुजरते समय के साथ नये-नये दिवस इस श्रेणी में जुड़ते चले गये हैं । कुछ दिवसों पर कार्यालयिक छुट्टी होती है, तो कुछ पर विविध आयोजन । मदर्स डे, फ्रेंड्ज डे, वैलंटाइन डे, न्यू इयर्स डे जैसे दिन भी हाल के वर्षों में दिवसों की सूची में जुड़ चुके हैं । इन पर अवकाश भले ही न हो, लोगों का जोश देखने योग्य होता है । इन सब का महत्त्व व्यक्तियों अथवा समुदाय-विशेषों के लिए ही अधिक है ।
हाल के वर्षों में सामाजिक सरोकारों तथा पर्यावरण से संबद्ध दिवस सूची में और जुड़ चुके हैं, जो अधिकतर वैश्विक स्तर के हैं । ये ही वे दिवस हैं जो जाति, धर्म, क्षेत्र से परे राष्ट्रीय अथवा अंताराष्ट्रीय अहमियत रखते हैं । शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि से जुड़े दिवस अपना अलग महत्त्व रखते हैं, जैसे अंताराष्ट्रीय ‘पृथ्वी दिवस’ (22 अप्रैल), ‘पर्यावरण दिवस’ (5 जून), ‘जनसंख्या दिवस’ (11 जुलाई), ‘भ्रष्टाचार निवारण दिवस’ (9 दिसंबर), आदि । मुझे शंका है कि इनमें से कइयों का अखबारों में जिक्र तक नहीं होता है । ये वे दिवस हैं, जब रस्मअदायगी से आगे बढ़कर कुछ कर गुजरने का संकल्प नागरिकों को लेना होता है । ये दिन हैं जब मुद्दों पर संजीदा हुआ जाना चाहिए । अगर ऐसा नहीं होता है तो फिजूल है उस दिवस का मनाया जाना । हिंदी दिवस ऐसा ही एक दिवस है ।

हिंदी दिवसः खो चुकी अहमियत

“… राजभाषा समिति की बैठक में हिंदी की जगह अंग्रेजी की उपस्थिति पर न केवल हंगामा हुआ, बल्कि भाजपा सदस्यों ने तो अंग्रेजी दस्तावेज को फाड़ कर और बैठक का बहिष्कार कर विरोध भी दर्ज कराया। गृहमंत्री तो बैठक में आए ही नहीं। … बैठक उस समय हंगामे में डूब गई जब कुछ दस्तावेज हिंदी के बजाय अंग्रेजी में पेश किए गए। … सदस्यों ने याद दिलाया कि राजभाषा अधिनियिम की धारा 3 [3] के तहत हिंदी में दस्तावेज होना जरूरी है, अधिकारी ने जवाब दिया कि यह उनके मंत्रालय पर लागू नहीं होता। … समिति के अध्यक्ष होने के बावजूद गृहमंत्री पी. चिदंबरम बैठक में आए ही नहीं। पिछले साल बैठक में वह आए थे तो उन्होंने भाषण अंग्रेजी में दिया था।” (स्रोत: http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6709123.html)

समाचार यहां भी पढ़ सकते हैं: http://epaper.amarujala.com/svww_index.php

उक्त समाचार साफ दिखलाता है कि बतौर राजभाषा के हिंदी के प्रति देश की नौकरशाही का क्या रवैया है । अंग्रेजी के वर्चस्व को कैसे बनाये रखा जाए और उसके लिए क्या-क्या बहाने रचे जाएं इसे आप उनसे सीख सकते हैं । निर्लज्ज अधिकारियों का ढीठपन देखिए, कहते हैं: “राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) उनके मंत्रालय पर लागू नहीं होती है, गोया कि उनका मंत्रालय अपवाद है और संविधान ने कुछ मंत्रालयों को राजभाषा न इस्तेमाल करने की छूट दे रखी है ।” अवश्य ही सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय?) एक हास्यास्पद अपवाद है, जिसके लिए केवल अंग्रेजी ही मान्य है! दुर्भाग्य से देश का प्रबंधन जनसंख्या के शीर्ष पर बैठी 10% से कम जिस अभिजात वर्ग के हाथ में है उसे यह हरगिज बर्दास्त नहीं है कि भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी का वर्चस्व घटे । इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिए वे हर मुमकिन कोशिश करने को तैयार हैं । अगर वे ऐसा न करें तो अंग्रेजी के कारण जिस लाभ की स्थिति में वे हैं वह नहीं रहेगी । कोई भी चालाक व्यक्ति और व्यक्ति-समूह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकता ।

मुझ जैसे लोगों के लिए यह एक पीड़ादायक तथ्य है कि अपना देश हिंदुस्तान एक बुरी तरह विभाजित समाज है । यहां एक नहीं कई विभाजक कारक हैं: जाति, धर्म, क्षेत्र, आर्थिक संपन्नता तो हैं ही, उन सब के ऊपर है अंग्रेजी – अंग्रेजी जिसने एक ही राष्ट्र को ‘इंडिया और भारत’ में बांट रखा है । पूरी प्रशासनिक व्यवस्था इंडिया के हाथ में है, जो अंग्रेजी के वर्चस्व का घोर पक्षधर है ।

निस्संदेह हिंदी आम बोलचाल की भाषा है; दिल्ली के सचिवालय के गलियारों में भी यही बोली जाती है । आगे भी बोली जाएगी, भले ही ऐसा उसके वर्णसंकर अवतार ‘हिंग्लिश’ के रूप में हो । बोलचाल में वह विस्तार भी पा रही है, और देश के कोने-कोने में पहुंच भी रही है । किंतु उसके आगे बढ़कर वह दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकती है । इसीलिए वह असल राजभाषा नहीं बन सकती, भले ही राजभाषा का ‘खिताब’ इसे मिला हो ! … कभी भी नहीं ।
तब फिर हिंदी दिवस की अहमियत क्या है? किसे याद दिलाने के लिए है यह दिवस ?

अंत में

राजभाषा संसदीय समिति का अध्यक्ष केंद्र सरकार के गृहमंत्री हुआ करते हैं – पदेन । अपने गृहमंत्री हिंदी नहीं जानते हैं – शायद बिल्कुल नहीं जानते हैं, और न ही जानने की इच्छा रखते हैं । यों तो सरकार चलाने वाले शीर्ष स्तर के राजनेता और प्रशासनिक अधिकारियों को हिंदी में कोई दिलचस्पी नहीं रहती है, भले ही वे हिंदीभाषी क्षेत्र के ही क्यों न हों, भले ही उनकी घोषित मातृभाषा हिंदी ही क्यों न हो । उन्हें हिंदी से अघोषित परहेज दृ सख्त लहजे में कहूं तो विरोध – रहता ही रहता है । फिर भी हिंदी दिवस जैसे मौके पर वे हिंदी में बोलने की रस्मअदायगी करते ही हैं । किंतु तमिलनाडु के राजनेता (आम आदमी उतना नहीं!) हिंदी से कतराते जरूर हैं । परहेज रखना शायद उनकी राजनीतिक विवशता है । दरअसल तथाकथित ‘द्रविड़’ पार्टियों के जन्म एवं उत्थान का आधार ही हिंदी विरोध रहा है । उन्हें यह विरोध बरकरार रखना है । इस हालत में कांग्रेस जैसी पार्टियां यह साहस नहीं दिखा सकती हैं कि वे हिंदी के पक्ष में नजर आवें । हिंदी के प्रति असली या नकली विरोध उन्हें भी दिखाना ही होता है । इस कारण से हिंदी का ‘मूक’ विरोध करना अपने गृहमंत्री की मजबूरी है । मैंने अभी तक कोई ‘तमिल’ राजनेता नहीं देखा है, जिसने कभी भी दो शब्द हिंदी में बोले हों । – योगेन्द्र जोशी

आज हिंदी दिवस है, 14 सितंबर ।

सर्वप्रथम मैं हिंदी-प्रमियों के प्रति अपनी शुभकामना व्यक्त करता हूं कि उनका भारतीय भाषाओं के प्रति लगाव बना रहे और यह भी कि वे अपने भाषाई प्रयासों में सफल होवें ।

तारीख के हिसाब से कोई 60 साल पहले आज ही के दिन देश में सर्वाधिक बोली/समझी जाने वाली भाषा हिंदी को राजभाषा की उपाधि दी गयी थी । रस्मअदायगी के तौर पर इस दिन उच्चपदस्थ लोग, चाहे वे राजनीति में हों या प्रशासन में अथवा अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में, यह कहते हुए सुने जाएंगे कि हमें राजभाषा हिन्दी अपनानी चाहिए । किसको अपनानी चाहिए हिंदी और किस क्षेत्र में और किस रूप में यह वह स्पष्ट नहीं कहते हैं । ऐसा लगता है कि वे आम आदमी को नसीहत देना चाहते हैं कि वह हिंदी को यथासंभव अधिकाधिक इस्तेमाल में ले । लेकिन वे स्वयं इसके इस्तेमाल की जिम्मेदारी से मुक्त रहना चाहते हैं और अंगरेजी के सापेक्ष वस्तुस्थिति को यथावत् बनाये रखने के पक्षधर हैं ।

हिंदी के राजभाषा बनाए जाने के औचित्य पर मुझे सदा ही शंका रही है । सैद्धांतिक तौर पर हिंदी के पक्ष में आरंभ में जो तर्क दिये गये थे वे निराधार तथा असत्य थे यह मैं नहीं कहता । किंतु तथ्यात्मक तर्क ही पर्याप्त नहीं माने जा सकते हैं । वास्तविकता के धरातल पर वे तर्क स्वीकार किये जा रहे हैं या नहीं, हामी भर लेने के बावजूद उनके अनुरूप कार्य हो रहा है कि नहीं, नीति-निर्धारण और कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार लोग रुचि लेते हैं या नहीं जैसी बातें अधिक महत्त्व रखते हैं । अपनी बात मैं यूं स्पष्ट करता हूं: आप सिगरेट के किसी लती को सलाह दें कि उसका धूम्रपान करना नुकसानदेह है और वह आपकी बात मानते हुए कहे कि ‘लेकिन मैं फिर भी सिगरेट पीना नहीं छोड़ सकता’ तो आप क्या करेंगे ? आप कहेंगे कि कोई न कोई रास्ता तो खोजा ही जाना चाहिए । एक व्यक्ति को रास्ते पर लाने के लिए तरह-तरह के नुस्खे अपनाये जा सकते हैं, समझाया-बुझाया जा सकता है, जोर-जबरदस्ती की जा सकती है, डराया-धमकाया जा सकता है, इत्यादि, और अंततः सफलता मिल भी सकती है । किंतु ऐसा कोई रास्ता समूचे देश के लिए संभव नहीं है । किसी दिशा में अग्रसर होने की सन्मति यदि लोगों में आ जाये तो ठीक, अन्यथा सब भगवान् भरोसे । राजभाषा हिंदी के मामले में स्थिति कुछ ऐसी ही है ।

यदि अपने देशवासी किसी न किसी बहाने अंगरेजी का प्रयोग यथावत् बनाये रखना चाहें तो फिर इस राजभाषा का अर्थ ही क्या है ? जब मैं अपने देश की तुलना विश्व के अन्य प्रमुख देशों से करता हूं तो पाता हूं कि अपना देश है ही विचित्र, सबसे अजूबा, विरोधाभासों और विसंगतियों से परिपूर्ण । यह विचित्रता सर्वत्र व्याप्त है, किंतु यहा पर इसका उल्लेख अपनी देसी भाषाओं के संदर्भ में ही कर रहा हूं । हम यह मानते है कि हमारी भाषाएं सुसंपन्न हैं, किंतु उन्हें लिखित रूप में प्रयोग में न लेकर केवल बोले जाने तक सीमित रखना चाहते हैं । क्यों ? इसका संतोषप्रद उत्तर किसी के पास नहीं, कदाचित् एक प्रकार का जड़त्व हमें घेरे हुए है कि सार्थक परिवर्तन करने को हम उत्सुक और प्रयत्नशील नहीं हैं, न ऐसा होना चाहते हैं ।

इसमें दो राय नहीं है कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में प्रायः सर्वत्र हिंदी अथवा अन्य क्षेत्रीय भाषाएं ही बोली जाती हैं, चाहे बाजार में खरीद-फरोख्त का काम हो या पड़ोसी के हालचाल पूछने का या फोन पर किसी नाते-रिस्तेदार से बात करने का । यहां तक कि अंगरेजी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे भी स्कूल आते-जाते परस्पर अपनी देसी भाषा में ही बोलते दिखते हैं । कार्यालयों में अधिकांशतः सभी स्थानीय भाषा में ही सामान्य वार्तालाप करते हुए पाये जायेंगे । अपवादों को छोड़ दें । राजनीतिक क्षेत्र में तो जनता के सामने बातें क्षेत्रीय भाषाओं में ही रखी जाती हैं । किंतु जैसे ही कहीं कोई औपचारिक बात हो, हम तुरंत ही अंगरेजी में उतर आते हैं । अपनी बात स्थानीय भाषा में कहेंगे जरूर, किंतु उसी को जब लिखित रूप में व्यक्त करना हो तो अंगरेजी हमारी प्राथमिकता बन जाती है । तब हिंदी या अन्य देसी भाषा का प्रयोग समाज के निम्नतम वर्ग या अंगरेजी न पढ़े-लिखे लोगों तक रह जाता है । जिसको थोड़ी भी अंगरेजी आती है वह अपनी भाषाओं में लिखकर कुछ कहने को तैयार नहीं । चाहे रेलयात्रा का आरक्षण हो या बैंकों में कारोबार करने का या अपने ही क्षेत्र का पता चिट्ठी पर लिखने का, सर्वत्र अंगरेजी ही देखने को मिलेती है, कुछ अपवादों को छोड़कर ।

निःसंदेह बोलचाल में हिंदी का प्रयोग देश भर में बढ़ा है । देश के किसी कोने में जाइये रिक्शा-ऑटों वालों से, चाय वालों से, सामान्य दर्जे के होटल वालों से हिंदी में बात करना अधिक सुविधाजनक सिद्ध होता है ऐसा मैंने देशाटन में अनुभव किया है । किंतु इतना सब कुछ होते हुए भी लिखित रूप में हिंदी शायद ही कहीं दिखाई देती है सभी सार्थक जानकारी अंगरेजी में ही लिखित आपको मिलेगी भले ही जनसामान्य के उस जानकारी का हिंदी अथवा क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध होना अधिक लाभप्रद क्यों न हो । मैं उदाहरण पेश करता हूं । मेरी बातें मुख्यतः हिंदीभाषी क्षेत्रों पर लागू होती हैं ।

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(मई 17, 2009 की पोस्ट के आगे) अपने देश की संघीय ‘राजभाषा’ हिंदी एवं विभिन्न प्रदेशों की अपनी-अपनी ‘राज्यभाषाओं’ से संबंधित निर्णय संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 में सम्मिलित किये गये हैं । राजभाषा नीति के अनुसार

“संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है । संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप है । {संविधान का अनुच्छेद 343(1)}”

स्वतंत्रता के समय तक देश तथा राज्यों का राजकाज अंगरेजी में चल रहा था । अंगरेजी से मुक्त होकर ‘राजभाषा’ एवं ‘राज्यभाषाओं’ को रातोंरात व्यवहार में ले पाना व्यावहारिक नहीं हो सकता था इस बात को समझ पाना कठिन नहीं है । इसी के मद्देनजर आरंभ में यह निर्णय लिया गया था कि संविधान के लागू होने के 15 वर्षों तक, यानी 26 जनवरी 1965 तक, शासकीय कार्य हिंदी और अंग्रेजी, दोनों, में चलेंगे, और उस अंतराल में प्रयास किये जायेंगे कि हिंदी का प्रसार तथा व्यवहार तेजी से हो, ताकि पूरे देश में राजकीय कार्यों में वह इस्तेमाल होने लगे और अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त हो जावे । इस बात पर भी जोर दिया गया था कि अहिंदीभाषी राज्यों की दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए राज्यों की भाषाएं भी आवश्यकतानुसार प्रयोग में ली जावें ।

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पिछले कुछ समय से मैं एक प्रश्न का ‘संतोषप्रद’ उत्तर (महज उत्तर नही, संतोषप्रद उत्तर!) पाने की चेष्टा कर रहा हूं । हमारे संविधान निर्माताओं ने हिंदी को देश की राजभाषा घोषित किया । क्या सोचकर किया इसे तो ठीक-ठीक वही समझते रहे होंगे । आज हम इसलिए-उसलिए कहते हुए तब के सोचे गये कारणों की व्याख्या अवश्य कर सकते हैं । परंतु क्या कारणों को समझ लेना ही पर्याप्त है ? हममें से अधिकांश जन यही कहेंगे कि हिंदी को राजभाषा तो होना ही चाहिए था, और इसलिए वह राजभाषा मानी भी गयी । परंतु क्या वह वास्तव में राजभाषा बन सकी है या राजभाषा उसके लिए एक अर्थहीन उपाधि बनकर रह गयी है ? क्या वह बतौर राजभाषा प्रयुक्त हो रही है ? मैं स्वयं से पूछता हूं कि क्या संविधान द्वारा हिंदी को ‘दी गई’ राजभाषा की उपाधि सार्थक है

मुझे उक्त प्रश्न का उत्तर नकारात्मक मिलता है । राजभाषा होने के क्या मतलब हैं, और हकीकत में जो होना चाहिए वह किस हद तक हो रहा है, इन बातों की समीक्षा की जानी चाहिए । आज हिंदी को राजभाषा घोषित हुए साठ वर्ष होने को हैं । आप कहेंगे साठ वर्ष बहुत नहीं होते हैं किसी राष्ट्र के जीवन में । लेकिन यह भी सच है कि इतना लंबा अंतराल कुछ कम भी नहीं होता है । बात यूं समझिएः पदयात्रा पर निकला व्यक्ति दिन भर में औसतन 20-25 किलोमीटर चल सकता है । 20-25 नहीं तो 15-20 कि.मी. ही सही, या थोड़ा और कम की सोचें तो 12-15 कि.मी. तो चलना ही चाहिए । हम उससे 9 दिन में हजार-पांचसौ कि.मी. की पदयात्रा की अपेक्षा नहीं कर सकते । लेकिन सौ-डेड़सौ की उम्मीद करना तो गैरवाजिब नहीं होगा न ? यदि ‘नौ दिन चले अढाई कोस’ वाली बात घटित हो रही हो, तो क्या संतोष किया जा सकता है ? अपनी राजभाषा का हाल कुछ ऐसा ही है । सो कैसे इसे स्पष्ट करने का विचार है मेरा इस और आगामी पोस्टों में ।

अपने अध्ययन तथा चिंतन (मेरा विश्वास है कि मैं कुतर्क नहीं कर रहा हूं) की बात करने से पहले में संविधान द्वारा राजभाषा घोषणा संबंधी कुछ शब्दों की चर्चा करना चाहता हूं । देश के संविधान में हिंदी को ‘संघ की राजभाषा’ घोषित किया गया है । संविधान सभा की बैठक सन् 1949 में 12 से 14 सितंबर तक चली थी, जिसमें संविधान को मौलिक तथा अंतिम रूप दे दिया गया और कालांतर में वह 26 जनवरी, 1950, से प्रभावी भी हो गया । उस बैठक के अंतिम दिन (14 सितंबर) काफी जद्दोजेहद के बाद संघ की भाषा के रूप में हिंदी को बहुमत से स्वीकार कर लिया गया । हिंदी को उस दिन मिली ‘राजभाषा’ की उपाधि और तत्पश्चात् अगले वर्ष (1950) की उसी तारीख से बतौर केंद्र सरकार के राजकाज की भाषा के रूप में हिंदी के प्रयोग के आरंभ की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर का दिन ‘हिंदी दिवस’ के रूप में मनाया भी जाता है । दिवस मनाने का यह सिलसिला तब से चला आ रहा है, कुछ हद तक साल दर साल घटते उत्साह के साथ और विशुद्ध औपचारिकता की भावना से !

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