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मैं जो हिन्दी लिखता हूं उसे वे समझ नहीं पाते, और जो हिन्दी वह समझते हैं उसे मैं लिखना नहीं चाहता।

मेरी हिन्दी?

कुछएक मास पूर्व मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, “मेरी बेटी एक निजी कंपनी में कार्यरत है। कंपनी अपने कर्मियों के लिए हिन्दी में एक पत्रिका छापती है जिसके संपादन आदि का दायित्व बेटी को सोंपा गया है। मैंने उसे बताया कि आप ब्लॉग लिखा करते हैं और सलाह दी कि पत्रिका के लिए वह आपसे भी लेख लिखने का अनुरोध कर सकती है। अथवा आपके ब्लॉगों पर प्रस्तुत आलेखों में से चुनकर पत्रिका में शामिल करने की अनुमति ले सकती है। आप सहमत होंगे न?”

अपने सहमति जताते हुए मैंने उनसे कहा कि वे मेरे ब्लॉगों के पते अपनी बेटी को भेज दें और यह भी कह दें कि आवश्यकता अनुभव करने पर वह मुझसे सीधे संपर्क कर ले।

बात आई-गई-सी हो गई। एक लंबे अंतराल के बाद मुझे अनायास उक्त घटना का स्मरण हो आया। तब मैंने अपने उन मित्र से पूछा, “आपने एक बार कहा था कि आपकी बेटी अपनी पत्रिका के लिए मुझसे संपर्क कर सकती है। इस विषय पर मुझे उसके बाद कुछ सुनने को नहीं मिला; क्या हुआ? उसने इरादा बदल दिया क्या?”

उनका उत्तर था, “वह आपके आलेखों से संतुष्ट थी। आलेखों की विषयवस्तु, उनकी प्रस्तुति में तारतम्य, लेखन की भाषा-शैली आदि में उसे कोई कमी नजर नहीं आई। बस एक ही समस्या उसके सामने थी। उसके पाठकों की हिन्दी उस स्तर की नहीं थी कि वे आपके आलेख पढ़ सकें और उन्हें समझ सकें। या यों कहें कि उनके लिए आलेखों की भाषा क्लिष्ट थी। इसलिए इस बारे में आगे बढ़ना मेरी ’संपादक’ बेटी के लिए सार्थक नहीं हो पा रहा था।”

अंग्रेजी शब्दों के तुल्य हिन्दी शब्द

गूगल जालस्थल पर “हिन्दीअनुवादक” (hindianuvaadak) नाम से एक समूह है, समूह के सदस्य परस्पर भाषा एवं अनुवाद संबंधी विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इस समूह में लोग भाषा से संबंधित सवाल पूछते हैं, और सदस्यवृंद समाधान प्रदान करते हैं अथवा अपनी-अपनी राय व्यक्त करते हैं। मैं स्वयं अनुवादक नहीं हूं किंतु भाषाओं के बारे में जानने-समझने की उत्सुकता या जिज्ञासा रखता हूं। इसलिए मैं भी इस समूह का सदस्य हूं और समूह में उठाई गई बातों एवं शंकाओं पर यदा-कदा अपना भी मत व्यक्त कर लेता हूं।”

इधर कुछ दिनों से उपर्युक्त समूह में एक शब्द पर बहस चल रही है (या अब समाप्त हो चुकी हो!)। किसी अनुवादक ने पूछा “अंग्रेजी के अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ (adjustable) शब्द के लिए उपयुक्त हिन्दी शब्द क्या होना चाहिए? मेरे अपने मतानुसार समायोज्य अथवा समंजनीय ही सर्वाधिक उपयुक्त शब्द है। वैसे प्रश्नगत शब्द में निहित भाव को शायद अपने-अपने विविध तरीकों से लेखकगण व्यक्त कर सकते होंगे। मेरा भाषायी ज्ञान उस उत्कृष्ट श्रेणी का नहीं है, इसलिए सही विकल्प नहीं पेश कर सकता। उक्त समूह में भांति-भांति के मत मुझे पढ़ने को मिले हैं। मेरी दृष्टि में यह समीचीन होगा कि अपनी टिप्पणी पेश करने से पहले उनकी चर्चा संक्षेप में कर लूं।

समूह के कुछ जानकारों का मत था कि समायोज्य जैसा शब्द अधिकांश पाठकों के लिए सर्वथा अपरिचित होगा, अत: उचित होगा “अनुकूलनीय” या “परिवर्तनीय” को प्रयोग में लेना। अवश्य ही यह भी स्वीकारा जा रहा था कि इनमें वह भाव कदाचित निहित नहीं है जिसे हम इंगित करना चाहते हैं। किसी का कहना था कि “अनुकूलन के योग्य” क्यों न इस्तेमाल किया जाए। मैं समझता हूं कि इस पदबंध का अर्थ तो “अनुकूलनीय” में निहित है ही, अतः इतने लंबे की जरूरत नहीं।

एक मत यह भी व्यक्त किया गया है कि क्यों न मराठी मूल का शब्द “बदलानुकारी” को प्रयोग में लिया जाए। मैं व्यक्तिगत तौर पर इस शब्द से परिचित नहीं हूं। अनुवाद कार्य में लगे लोग हो सकता है इससे सुपरिचित हों, परंतु मुझे शंका है कि मेरी तरह अधिकांश पाठकजन इस शब्द से उसी प्रकार अनभिज्ञ होंगे जैसे मैं हूं।

अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ के लिए “सामंजस्य योग्य” शब्द भी सुझाया गया है। मेरा अनुमान है जो व्यक्ति “सामंजस्य” अर्थ जानता होगा वह समायोज्य या समंजनीय का भी अर्थ जानता होगा। अन्यथा भी वह इनके अर्थों का अनुमान लगा सकेगा ऐसा मेरा सोचना है।

दो विचार जो संबंधित बहस में पढ़ने को मिले और जिन्हें मैंने रोचक पाया वे हैं (1) “समायोज्य जैसे शब्द हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए भी एक सरदर्द ही हैं।”  और (2)  “समायोज्य जैसे दुरुह शब्दों का इस्तेमाल करें तो उनके बाद ब्रेकेट में उनका मतलब भी लिख दें।” मतलब समझाया तो जाए लेकिन किस भाषा में और कितने विस्तार से जैसा शब्दकोषों में होता है?

और यह मत भी पढ़ने को मिला कि आजकल लोग अ(ड्‍)जस्ट (adjust) बखूबी समझने लगे हैं। तो क्या इसे ही प्रयोग में ले लिया जाए? शायद हां!

एक वाकया

मुद्दे पर कुछ और कहूं इससे पहले एक वाकये का जिक्र करता हूं। वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने में दृष्टांत अक्सर उपयोगी सिद्ध होते हैं। जब मैं विश्वविद्यालय में भौतिकी (फिज़िक्स) विषय पढ़ाता था तो “इलेक्ट्रॉनिकी” में विशेषज्ञता अर्जित कर रहे एम.एससी. (स्नातकोत्तर) के छात्र “क्वांटम यांत्रिकी” (क्वांटम मिकैनिक्स) में रुचि नहीं लेते थे। उनकी अरुचि के बारे में पूछे जाने पर उनका उत्तर होता था, “सर, इलेक्ट्रॉनिक्स स्पेशलाइज़ेशन लेकर जब हम टेक्निकल नौकरी में जायेंगे तो ये क्वांटन मिकैनिक्स हमारी क्या काम आएगी?” तब मेरे पास कोई संतोषप्रद उत्तर नहीं होता था। मैं जानता था तकनीकी पेशे में इस विषय का ज्ञान शायद ही प्रोन्नति (प्रमोशन) पाने या वेतन बढ़ोत्तरी में मददगार हो सकता है। तो वे क्यों क्वांटम भौतिकी/मिकैनिक्स पढ़ें?

घटता शब्द-भंडार 

दरअसल इस प्रकार का उपयोगिता संबंधी प्रश्न अनेक मौकों पर पूछा जा सकता है। मैंने ” समायोज्य ” से जुड़े जिस बहस का जिक्र किया है उससे भी इस सवाल का नाता है। यह कहना कि हिन्दी माध्यम के छात्रों के लिए तक यह शब्द दुरूह है यह दर्शाता है कि उन छात्रों – जो भी वे हों – ने कभी नये-नये शब्द सीखने का प्रयास नहीं होगा, फलतः इस शब्द से उनका सामना कभी पड़ा नहीं होगा और सहज-स्वाभाविक तरीके से यह उनके शब्द-भंडार में शामिल नहीं हो सका होगा। उन्होंने हर किसी के मुख से इस शब्द के बदले अ(ड्‍)जस्ट और उससे व्युत्पन्न शब्दों का ही प्रयोग सुना होगा। परिणाम – समायोज्य अपरिचित शब्द बन गया, अ(ड्‍)जस्टेब्ल्‍ परिचित।

यहां यह प्रश्न उठता है कि स्वयं को “हिन्दीभाषी” कहने वाले अपना हिन्दी शब्द-भंडार क्यों नहीं बढ़ाते? उत्तर साफ है। मेरे भौतिकी छात्रों की तरह आम हिन्दीभाषी कहेगा, “हिन्दी के शब्दों को सीखने से क्या मिलेगा? उसके बदले अंग्रेजी सीखने पर मेहनत करेंगे तो हमें फायदा होगा। हमारा काम तो चल ही जाता है। जहां जरूरत हो अंग्रेजी शब्दों से ही काम चल जाता है। फिर हिन्दी सीखने की जरूरत कहां?”

याद रहे कोई भी व्यक्ति शब्द-भंडार लेकर पैदा नहीं होता है। वह विभिन्न मौकों पर और पत्र-पत्रिकाओं-पुस्तकों के विभिन्न स्रोतों से शब्द सीखता है। और यदि स्रोत विकृत हो जाएं, किसी का शब्दभंडार बढ़ाने में मददगार न रह जाएं, या व्यक्ति इन स्रोतों में रुचि ही न ले, तो परिणाम यही होगा: समायोज्य जैसे शब्द अपरिचित लगेंगे। हिन्दी उसी दिशा में बढ़ रही है।

हिन्दी – उनकी बनाम मेरी

मैं इसे हिन्दी की अवनति कहूं या उन्नति कि आज के अनेक पढ़े-लिखे लोग उस हिन्दी को पढ़-समझ नहीं सकते जो मैंने अपने छात्र जीवन में पढ़ी है, जिस हिन्दी में भारतेन्दु के नाटक लिखे गये हैं, जिसमें जयशंकर प्रसाद का पद्य साहित्य है, जिसमें रामचन्द्र शुक्ल के लेख हैं, इत्यादि। आज के लोग कैसी हिन्दी बोल रहे हैं, पढ़ रहे हैं, और लिख रहे हैं इसकी बानगी यह है:

 “नेशनल महिला प्लेयर की आपत्तिजनक फोटो एफबी पर वायरल, ट्रेनर गिरफ्तार” (jagran.com, 19/05/2017)

इसे मैं हिन्दी कहूं या कुछ और समझ में नहीं आता है। अवश्य ही यह वह भाषा नहीं जिससे मैं बचपन से परिचित रहा हूं। जब हम ऐसी नयी हिन्दी बोलेंगे और सुनेंगे तो हिन्दी के कई शब्द “अन्फ़ैमिलिअर” हो ही जायेंगे।

मेरी कमजोरी है कि मैं ऐसी हिन्दी न लिखता हूं और न लिखना ही चाहता हूं, भले ही इसे लिखना संभव हो और मुझसे अपेक्षित हो। – योगेन्द्र जोशी

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प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

 

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान मुझे अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था। तीन लेखों की अपनी लेखमाला में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि अंगरेजी की वैश्विक व्यापकता को लेकर भारतीयों में जो भ्रांति व्याप्त है वह वास्तविक जानकारी पर आधारित नहीं है। इस दूसरे लेख में मॉंट्रियाल शहर में फ़्रांसीसी भाषा को लेकर मेरे देखने में जो कुछ आया उसका संक्षिप्त विवरण कुछ तस्वीरों के माध्यम से मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

कनाडा की कुल आबादी (करीब 3.6 करोड़) का लगभग 25% फ़्रेंच यानी फ़्रांसीसी भाषाभाषी है। प्रायः सभी फ़्रांसीसी-भाषी राजकाज की आधिकारिक भाषा फ़ेंच वाले क्यूबेक प्रांत में रहते हैं – लगभग 82 लाख अकेले क्यूबेक (Quebec) प्रांत में और शेष करीब 3 लाख अति छोटे प्रांतों (न्यू ब्रुंसविक New Brunswick, मनिटोबा Manitoba, नोवा स्कोटिया Nova Scotia में, और छिटपुट तौर पर अन्यत्र रहते हैं। शेष कनाडा में अंग्रेजी प्रचलन में है। राष्ट्र के स्तर पर कनाडा की राजकाज की आधिकारिक भाषाएं अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं।

क्यूबेक प्रांत का सबसे बड़ा शहर मॉंट्रियाल (Montreal, आबादी करीब 38 लाख) है। यह ऑंटारियो प्रांत के टोरंटो (Toronto, आबादी करीब 56 लाख) शहर के बाद कनाडा का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। एक पर्यटक के तौर पर मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मॉंट्रियाल गया। पर्यटन की दृष्टि से वहां बहुत कुछ दर्शनीय उपलब्ध है। उस सब का ब्योरा प्रस्तुत करना मेरा मकसद नहीं है। पर्यटन के दौरान दर्शनीय स्थानों पर घुमते-फिरते फ़्रांसीसी भाषा को लेकर वहां जो कुछ मुझे देखने को मिला उस को मैंने अपने स्मृति-पटल एवं कैमरा में संचित करने का प्रयास किया। हर बात चित्रों में अंकित नहीं की जा सकती थी, फिर भी बहुत कुछ ऐसा अवश्य था जिसके माध्यम से पाठकों तक यह जानकारी पहुंचाई जा सकती है कि प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी देश होते हुए भी कनाडा के उस क्षेत्र में फ़्रांसीसी का ही बोलबाला है।

खरीद-फ़रोख्त की रसीद

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मॉंट्रियाल में हमने एक स्थान पर “मेट्रो” नामक “फ़ूडमार्ट” से कुछ फल आदि भोज्य सामग्री खरीदी थीं। अन्य स्थल पर “सबवे” नाम के रेस्तरां में भोजन भी किया था। अन्यत्र पॉपकॉर्न का आस्वादन भी किया था। इन स्थानों पर मिले खरीद-फरोख्त की रसीदों की तस्वीर बानगी के तौर पर मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। (चित्र में क्यूबेक की दो रसीदों की तस्वीरें भी शामिल हैं।) ध्यान दें कि ये रसीदें फ़्रेंच भाषा में हैं। इनमें क्या लिखा है यह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि कहां क्या खरीदा होगा वह ठीक-ठीक अब याद नहीं है। इन रसीदों का उल्लेख यह बताने के लिए मैं कर रहा हूं कि हमारे देश की भांति क्यूबेक प्रांत में रसीदें अंग्रेजी में नहीं मिलती हैं। राज्य की भाषा फ़्रांसीसी होने का मतलब है लेनदेन की लिखापढ़ी भी फ़्रांसीसी में किया जाना। अपने देश में तो सर्वत्र अंग्रेजी में ही रसीदों का प्रचलन है!

मेट्रो स्टेशन

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हम लोगों ने शहर के भीतर एक स्थान से दूसरे तक जाने के लिए “मेट्रो ट्रेन” की सेवा का भी लाभ लिया। मॉन्ट्रियाल के भूमिगत एक स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा के समय वहां पर दीवाल पर प्रदर्शित विज्ञापन अथवा जानकारी पर मेरी दृष्टि पड़ी तो मैंने उसकी तस्वीर कैमरे में कैद कर ली। यहां प्रस्तुत चित्र उसी छायाचित्र की प्रति है। इस प्रकार के प्रदर्शन-पट (डिस्प्ले-बोर्ड) शहर के अन्य स्थलों पर भी देखने मिल जाते हैं। और ये सभी फ़्रांसीसी भाषा में ही रहते हैं; शायद ही कहीं अंग्रेजी में मिलते हों। प्रस्तुत चित्र के बांये ऊपरी कोने पर उस टिकट (या टोकन जैसा कि उसे वहां कहा जाता है) की प्रति को भी मैंने प्रदर्शित किया है जिसको साथ लेकर मैंने आवागमन किया। यह टोकन भी पूरी तरह फ़्रांसीसी में ही है।

मॉन्ट्रियाल ओलम्पिक स्टेडियम टावर

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आज से चालीस वर्ष पूर्व सन्‍ 1976 में मॉन्ट्रियाल में ओलम्पिक खेल आयोजित हुए थे। उस समय वहां क्रीड़ांगनों (स्टेडियमों) और अन्य भवनों का निर्माण किया गया था। उनमें से प्रमुख था “मॉंट्रियाल स्टेडियम टावर” जो स्वयं में 165 मीटर ऊंचा एक तिरछा स्तंभ है जिसके शीर्ष पर शहर का नजारा देखने के लिए चारों ओर चलने-फिरने का स्थान प्राप्य है। साथ में एक रेस्तरां एवं स्मारक-वस्तुओं/उपहारों की दुकान भी है। वहां पहुंचने के लिए लिफ़्ट की व्यवस्था है। हम लोग भी टावर के शीर्ष पर गये थे। वह टावर उस काल की अनूठी भवन-संरचना के लिए विख्यात हुआ था। इस संदर्भ में वहां बड़े-से बोर्ड पर “गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स” द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र की प्रदर्शित छायाप्रति मेरी नजर में आई जिसे में यहां प्रस्तुत किया है।

वहां प्रदर्शित बोर्ड पर उल्लिखित जानकारी पूर्ण्तया फ़्रेंच भाषा में है। बोर्ड के निचले भाग में दायीं ओर गिनीस-रेकॉर्ड के प्रमाणपत्र की प्रति भी अंकित है जो अंग्रेजी में है, कदाचित इसलिए कि प्रमाणपत्र अंग्रेजी में ही दिए जाते होंगे। चित्र के निचले भाग में बांयी तरफ़ “इनसेट” में एक रंगीन तस्वीर भी शामिल। यह उसी टावर की तस्वीर है। ध्यान दें कि इस टावर के आधार/तले से लगभग सटी-हुई एक अंडाकार भवन-संरचना भी देखने को मिल रही है। 1976 के ओलंपिक खेलों के समय इसके भीतर साइकिल दौड़ के लिए “साइकिल-ट्रैक” (वेलोड्रोम velodrome) बनाया गया था। 1992 में इसे जैविक संग्रहालय के तौर पर इस्तेमाल में ले लिया गया। इस गुंबदाकार भवन के बाहर नाम-पट पर लिखित है “Biodome de Montreal” फ़्रांसीसी में।

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वनस्पति उद्यान, मॉंट्रियाल

मेरी समझ में मॉंट्रियाल का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटक एवं दर्शनीय स्थान है वहां का वनस्पति उद्यान (Botanical Garden of Montreal, फ़्रांसीसी में Jardin Botanique de Montreal)। उद्यान के प्रवेश-द्वार के बाहर तीन सूचना-पटों पर फ़्रेंच भाषा में लिखित संकेत देखने को मिलते हैं। उनके आंशिक तस्वीरों को यहां एक साथ प्रस्तुत किया गया है। सूचना-पटों पर क्या लिखा है इसका अनुमान लगाया जा सकता था, किंतु अंग्रेजी में न होने के कारण वे हमारे लिए स्पष्ट नहीं थे।

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प्रवेश-द्वार पर एक सूचना-पट भी प्रदर्शित है जिससे पता चलता है कि इस उद्यान की व्यवस्था मॉंट्रियाल विश्वविद्यालय (Universite de Mntreal) के प्रशासनिक/शैक्षिक नियंत्रण में है। वस्तुतः यह विश्वविद्यालय के “वनस्पति-विज्ञान शोध संस्थान” (Institute de researche en biologie vegetale) का हिस्सा है। ध्यान दें कि फ़्रांसीसी और अंग्रेजी के कई शब्द मिलते-जुलते हैं, इसलिए प्रदर्शित सूचनाएं थोड़ा-बहुत समझ में आ जाती हैं। किंतु विश्वविद्यालय का विभाग होने के बावजूद विविध जानकारियां अंग्रेजी में लिखित नहीं देखने को मिलीं यह मेरे विचार में ध्यानाकर्षक तो है ही हम भारतीयों के लिए विचारणीय भी है। ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय का शिक्षण-माध्यम प्रमुखतया फ़्रांसीसी ही है होगी, भले ही साथ-साथ अंग्रेजी का भी व्यवहार होता हो।

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इस उद्यान का नक्शा भी प्रवेश-द्वार पर देखने को मिलता है लेकिन वह फ़्रांसीसी न जानने वाले के लिए समझ से परे ही कहा जायेगा।

उद्यान का अंतरंग

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उद्यान के अंदर प्रवेश करने पर स्थान-स्थान पर प्रचलित संकेतों और फ़्रांसीसी में लिखित संदेशों के माध्यम से यह बताया गया है कि कहां क्या है और किस ओर प्रवेश-मार्ग और किस ओर निकास-मार्ग हैं।

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उद्यान के भीतर प्रदर्शित सूचना-पटों में से एक की तस्वीर यहां उदाहरण-स्वरूप प्रस्तुत है। मेरे अनुमान में फ़्रांसेसी में लिखित सूचना शायद यह संदेश देती है कि उद्यान के टिकट से प्राप्त धन प्रकृति-संरक्षण में लगाया जाता है।

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एक अन्य सूचना-पट पर लिखित जानकारी से यह प्रतीत होता है कि उद्यान के एक अंग “चीनी उद्यान” (Le jardin de Chine) का इस समय (2015-17) restoration कार्य चल रहा। अतः उद्यान के इस हिस्से का हम दर्शन हम नहीं कर सके।

निष्कर्ष

इस आलेख में शामिल गिने-चुनी तस्वीरों के माध्यम से मैंने पाठकों के समक्ष यह तथ्य रखने का प्रयास किया है कि क्यूबेक में तमाम स्थानों पर केवल फ़्रांसीसी में लिखित जानकारी प्रदर्शित की हुई मिलती है। इसका अर्थ यह है कि अंग्रेजी के प्रति जैसा आकर्षण एवं उत्साह हम भारतीयों में देखने को मिलता है वैसा अन्य बहुत-से देशों में देखने को नहीं मिलता है। अंग्रेजी की गुलामी उन देशों की खासियत है जो अंग्रेजी शासन के अधीन रहे और जहां अंग्रेजी की जड़ें इतनी गहरी बैठ गयीं कि अंग्रेजों से मुक्ति के बाद भी अंग्रेजी से मुक्ति लोगों को नहीं मिली। और अब इस भाषाई गुलामी से मुक्ति के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।

अगले आलेख में मेरा प्रयास क्यूबेक शहर में प्राप्त भाषा संबधी अनुभवों का उल्लेख करने का है। क्यूबेक अपने ही नाम वाले प्रांत का दूसरा बड़ा शहर और पर्यटक स्थल है। – योगेन्द्र जोशी

और कुछ तस्वीरें-

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नमस्ते से “गुड मॉर्निंग” तक की यात्रा
समाज में अंग्रेजी औr अंग्रेजियत के आकर्षण के वाकये का चित्रण।

जिंदगी बस यही है

मुझे मौजूदा मोहल्ले में रहते हुए करीब 30 साल बीत चुके हैं। शुरुआती दो वर्षों के बाद से अपने निजी मकान में रह रहा हूं। मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। मैंने इन भाइयों के माता-पिता को देखा है। मैं उनकी पीढ़ी को पहली पीढ़ी संबोधित कर रहा हूं और तदनुसार उक्त भाइयों को दूसरी पीढ़ी के कहूंगा। अब वे माता-पिता इस संसार में नहीं रहे। सुना है कि इस मोहल्ले की भूमि कभी इनकी एवं इनके पट्टीदारों की हुआ करती थी। कालोनाइज़र को जमीन बेचने पर मिले पैसे का समुचित उपयोग ये लोग शायद नहीं कर पाये होंगे। इसलिए इनकी माली हालत सामान्य या उससे बदतर रही है ऐसा मेरा सोचना है। ये पांचों भाई मोहल्ले के पास ही लगने वाली फल-सब्जी-सट्टी में थोक अथवा फुटकर कारोबार करके परिवार का पालन-पोषण करते आये हैं।

अब दूसरी पीढ़ी के इन भाइयों की उम्र साठ के आसपास उसके…

View original post 653 और  शब्द

आज (21 फरवरी) मातृभाषा दिवस है । उन सभी जनों को इस दिवस की बधाई जिन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव हो, जो उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, और जो उसे यथासंभव व्यवहार में लाते हैं । उन शेष जनों के प्रति बधाई का कोई अर्थ नहीं हैं जो किसी भारतीय भाषा को अपनी मातृभाषा घोषित करते हैं, लेकिन उसी से परहेज भी रखते हैं, उसे पिछड़ेपन की निशानी मानते हैं ।

अपना भारत ऐसा देश है जहां अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं, और जहां के लोगों की क्षेत्रीय विविधता के अनुरूप अपनी-अपनी मातृभाषाएं हैं । विडंबना यह है कि अधिकांश भारतीय अंग्रेजी के सापेक्ष अपनी घोषित मातृभाषा को दोयम दर्जे का मानते हैं । वे समझते हैं कि उनकी मातृभाषा सामान्य रोजमर्रा की बोलचाल से आगे किसी काम की नहीं । वे समझते हैं कि किसी गहन अथवा विशेषज्ञता स्तर की अभिव्यक्ति उनकी मातृभाषा में संभव नहीं । अतः वे अंग्रेजी का ही प्रयोग अधिकाधिक करते हैं । अंग्रेजी उनके जबान पर इस कदर चड़ी रहती है कि उनकी बोलचाल में अंग्रेजी के शब्दों की भरमार रहती है । लेखन में वे अंग्रेजी को वरीयता देते हैं, या यों कहें कि वे अपनी तथाकथित मातृभाषा में लिख तक नहीं सकते हैं । अध्ययन-पठन के प्रयोजन हेतु भी वे अंग्रेजी ही इस्तेमाल में लाते हैं । उनके घरों में आपको अंगरेजी पत्र-पत्रिकाएं एवं पुस्तकें ही देखने को मिलेंगी । उनके बच्चे जन्म के बाद से ही अंगरेजी की घुट्टी पीने लगते हैं । घर और बाहर वे जो बोलते हैं वह उनकी तथाकथित मातृभाषा न होती है, बल्कि उस भाषा का अंगरेजी के साथ मिश्रण रहता है ।

उन लोगों को देखकर मेरे समझ में नहीं आता है कि उनकी असल मातृभाषा क्या मानी जाए ? मैं यहां पर जो टिप्पणियां करने जा रहा हूं वे दरअसल देश की अन्य भाषाओं के संदर्भ में भी लागू होती हैं । एक स्पष्ट उदाहरण के तौर पर मैं अपनी बातें हिंदी को संदर्भ में लेकर  कह रहा हूं, जिसे मैं अपनी मातृभाषा मानता हूं । मैं सर्वप्रथम यह सवाल पूछता हूं कि आप उस भाषा को क्या कहेंगे जिसमें अंगरेजी के शब्दों की बहुलता इतनी हो कि उसे अंगरेजी का पर्याप्त ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति समझ ही न सके । प्रश्न का उत्तर और कठिन हो जाता है जब उस भाषा में अंगरेजी शब्दों के अलावा अंगरेजी के पदबंध तथा वाक्यांश और कभी-कभी पूरे वाक्य भी प्रयुक्त रहते हों । सामान्य हिंदीभाषी उनके कथनों को कैसे समझ सकेगा यह प्रश्न मेरे मन में प्रायः उठता है । हिंदी को अपनी मातृभाषा बताने वाले अनेक शहरी आपको मिल जाएंगे जो उक्त प्रकार की भाषा आपसी बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं, घर पर, कार्यस्थल पर, वस्तुतः सर्वत्र, अपने बच्चों के साथ भी ।

आज के शहरी, विशेषकर महानगरीय, परिवेश में लोगों की बोलचाल से हिंदी के वे तमाम शब्द गायब हो चुके हैं जो सदियों से प्रयुक्त होते रहे हैं । अवश्य ही साहित्यिक रचनाओं में ऐसा देखने को सामान्यतः नहीं मिलेगा । लेकिन सवाल साहित्यकारों की मातृभाषा का नहीं है । (भारत में ऐसे साहित्यकारों की संख्या कम नहीं होगी जो अपनी घेषित मातृभाषा में लिखने के बजाय अंगरेजी में रचना करते हैं और तर्क देते हैं कि वे अंगरेजी में अपने भाव बेहतर व्यक्त कर सकते हैं ।) बात साहित्यकारों से परे के लोगों की हो रही है जिनके लिए भाषा रोजमर्रा की अभिव्यक्ति के लिए होती है, व्यवसाय अथवा कार्यालय में संपर्क के लिए, बाजार में खरीद-फरोख्त के लिए, पारिवारिक सदस्यों, मित्रों, पड़ोसियों से वार्तालाप के लिए, इत्यादि । इन सभी मौकों पर कौन-सी भाषा प्रयोग में लेते हैं शहरी लोग ? वही जिसका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूं । मैं उस भाषा को हिंदी हरगिज नहीं मान सकता । वह न हिंदी है और न ही अंगरेजी, वह तो दोनों का नियमहीन मिश्रण है, जिसमें स्वेच्छया, नितांत उन्मुक्तता के साथ, हिंदी एवं अंगरेजी ठूंस दी जाती है । यह आज की भाषा है उन शहरी लोगों की जो दावा करते हैं कि उनकी मातृभाषा हिंदी है जिसे वे ठीक-से बोल तक नहीं सकते हैं । तब उनकी मातृभाषा क्या मानी जानी चाहिए ?

मेरा यह सवाल हिंदी को अपनी मातृभाषा कहने वालों के संदर्भ में था । अब में दूसरी बात पर आता हूं, मातृभाषा दिवस की अवधारणा के औचित्य पर ?

आज दुनिया में दिवसों को मनाने की परंपरा चल पड़ी है । दिवस तो सदियों से मनाये जाते रहे हैं त्योहारों के रूप में या उत्सवों के तौर पर, अथवा किसी और तरीके से । जन्मदिन या त्योहार रोज-रोज नहीं मनाए जा सकते हैं, अतः उनके लिए तार्किक आधार पर दिन-विशेष चुनना अर्थयुक्त कहा जाएगा । किंतु कई अन्य प्रयोजनों के लिए किसी दिन को मुकर्रर करना मेरे समझ से परे है । मैं “वैलेंटाइन डे” का उदाहरण लेता हूं । प्रेमी-प्रमिका अपने प्यार का इजहार एक विशेष दिन ही करें यह विचार क्या बेवकूफी भरा नहीं है ? (मेरी जानकरी में वैलेंटाइन डे दो प्रेमियों के मध्य प्रेमाभिव्यक्ति के लिए ही नियत है; पता नहीं कि मैं सही हूं या गलत ।) क्या वजह है कि प्रेम की अभिव्यक्ति एक ही दिन एक ही शैली में सभी मनाने बैठ जाएं ? और वह भी सर्वत्र विज्ञापित करते हुए । प्रेम की अभिव्यक्ति दुनिया को बताके करने की क्या जरूरत है ? यह तो नितांत निजी मामला माना जाना चाहिए दो जनों के बीच का और वह पूर्णतः मूक भी हो सकता है । उसमें भौतिक उपहारों की अहमियत उतनी नहीं जितनी भावनाओं की । प्रेमाभिव्यक्ति कभी भी कहीं भी की जा सकती है, उसमें औपचारिकता ठूंसना मेरी समझ से परे है । फिर भी लोग उसे औपचारिक तरीके से मनाते हैं वैलेंटाइन डे के तौर पर । क्या साल के शेष 364 दिन हम उसे भूल जाएं । इसी प्रकार की बात मैं “फादर्स डे”, “मदर्स डे”, “फ़्रेंड्स डे” आदि के बारे में भी सोचता हूं । इन रिश्तों को किसी एक दिन औपचारिक तरीके से मनाने का औचित्य मेरी समझ से परे है । ये रिश्ते साल के 365 दिन, चौबीसों घंटे, माने रखते हैं । जब जिस रूप में आवश्यकता पड़े उन्हें निभाया जाना चाहिए । किसी एक दिन उन्हें याद करने की बात बेमानी लगती है । फिर भी लोग इन दिवसों को मनाते हैं, जैसे कि उन्हें निभाने की बात अगले 364 दिनों के बाद ही की जानी चाहिए ।

और कुछ ऐसा ही मैं मातृभाषा विदस के बारे में भी सोचता हूं ।

कहा जाता है कि विश्व की सांस्कृतिक विविधता बचाए रखने के उद्येश्य से राष्ट्रसंघ ने 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस घोषित किया है । किंतु क्या “ग्लोबलाइजेशन” के इस युग में सांस्कृतिक संक्रमण और तदनुसार भाषाओं का विद्रूपण अथवा विलोपन रुक सकता है ? अपने देश में अंगरेजी के प्रभाव से जिस प्रकार हिंदी एवं अन्य भाषाएं प्रदूषित हो रही हैं, और जिस प्रकार उस प्रदूषण को लोग समय की आवश्यकता के तौर पर उचित ठहराते हैं, उससे यही लगता है कि इस “दिवस” का लोगों के लिए कोई महत्व नहीं हैं । इस दिन पत्र-पत्रिकाओं में दो-चार लेख अगले दिन भुला दिए जाने के लिए अवश्य लोग देख लेते होंगे, लेकिन अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देने के लिए वे प्रेरित होते होंगे ऐसा मुझे लगता नहीं । अंगरेजी को गले लगाने के लिए जिस तरह भारतीय दौड़ रहे हैं, उससे यही लगता है कि भारतीय भाषाएं मातृभाषा के तौर पर उन्हीं तक सिमट जाएंगी जो दुर्भग्य से अंगरेजी न सीख पा रहे हों । – योगेन्द्र जोशी

भारतीय (बेहतर होगा इंडियंस कहना ) अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार क्यों करते हैं? इस सवाल का सर्वस्वीकार्य उत्तर शायद ही कोई दे सकता हो; हां अपनी-अपनी सोच के अनुसार लोग तमाम संभावनाओं की चर्चा कर सकते हैं । इस विषय में मेरे अपने कुछ विचार हैं किंतु उनका उल्लेख मैं इस आलेख में नहीं कर रहा हूं । इस समय मैं एक हालिया (7 मार्च) लेख की चर्चा करना चाहता हूं जो मुझे इकॉनॉमिस्ट-डाट-कॉम पर पढ़ने को मिला था । उसमें उल्लिखित कुछ बातें में यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। उसमें कही गई जो बात मुझे खास लगी वह है “प्रायः सभी समाजों में लोग अपनी भाषाओं से अत्यंत लगाव रखते हैं। हिंदी एक अपवाद है।”  अंग्रेजी में लिखित इस लेख का शीर्षक है “The keenest Wikipedians(क्लिक करें) ।

10 लाख से अधिक विकीपीडिया लेख

लेख के अनुसार ‘विकीपीडिया’ विभिन्न भाषाओं में लिखित लेखों का भंडार बन चुका हैं, जिसमें उपलब्ध कई लेख अत्यंत उपयोगी पाए जाते हैं, पर सभी नहीं । विश्व की पांच भाषाओं में 10 लाख से भी अधिक लेख छप चुके हैं । ये भाषाएं हैं: अंग्रेजी (English), जर्मन (German), फ्रांसीसी (French), इतालवी (Italian), एवं डच (Dutch) ।

लेख में बताया गया है कि यूरोप के नेदरलैंड राष्ट्र के 100 प्रतिशत डचभाषी छात्र अंग्रेजी भी पढ़ते हैं, और प्रायः हर नागरिक फर्राटे से अंग्रेजी बोल सकता है । ऐसा क्यों है कि अंग्रेजी जानने के बावजूद डच भाषा में इतने अधिक लेख छपते हैं, जब कि उस देश की जनसंख्या मात्र लगभग 1.7 करोड़ है ? लेखक के अनुसार इसका कारण मात्र यह है कि अन्य भाषाओं की अच्छीखासी जानकारी रखने के बावजूद लोग अपनी भाषाओं से अत्यंत लगाव रखते हैं और उसे ही इस्तेमाल करने की इच्छा रखते हैं ।
अपनी उस भाषा को जिसे लोग छोड़ने की नहीं सोचते उसे लेखक ने “अंडरवेयर लैंग्वेज” (Underwear Language) की संज्ञा दी है ।

1 से 10 लाख तक के लेख

अन्य भाषाओं, जिनके 1 लाख से अधिक लेख विकीपीडिया पर उपलब्ध हैं, में रूसी, अरबी एवं चीनी शामिल हैं । किंतु दिलचस्प तो यह है कि ऐसी भी कुछ भाषाएं हैं जो किसी देश की भाषा के रूप में स्थापित नहीं हैं, फिर भी उनमें छपे लेख 1 लाख से कम नहीं हैं, क्योंकि उन्हें बोलने वाले लोग है और वे उनका भरपूर प्रयोग करने का इरादा रखते हैं । इनमें शामिल हैं स्पेन में प्रचलित गैलिशियन (Galician), बास्क (Basque) तथा कैटलैन (Catalan) भाषाएं । ये स्पेन के उन बाशिंदों की भाषाएं हैं जो स्पेनी बोल सकते हैं और उसे इस्तेमाल भी करते हैं, फिर भी अपनी भाषाओं को प्रयोग में लेना पसंद करते हैं । लेख के अनुसार उक्त तथ्य इस बात का संकेत देता है कि लोग अपनी भाषाओं के प्रति विशेष लगाव रखते हैं ।

परंतु इससे अधिक चकित करने वाली बात तो यह है कि एस्परांटो (Esperanto, यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित आम शब्दों पर आधारित एक कृत्रिम भाषा) में करीब 176,800 लेख विकीपीढिया में मिलते हैं । इसी प्रकार वोलापुक (Volapuk, एक अन्य कृत्रिम भाषा, जो लैटिन क्रियाओं को प्रयोग में लेते हुए मुख्यतः अंग्रेजी एवं कुछ सीमा तक जर्मन एवं फ्रांसीसी पर आधारित है) में 119,091 लेखों के छपे होने की बात कही गई है । यह भी जानकारी दी गई है कि इसके बोलने वाले कुछ गिने-चुने लोग ही हैं । फिर भी इतनी बड़ी संख्या में लेखों पर ताज्जुब ता होता ही है । ऐसा प्रतीत होता है कि किसी ने ‘ऑटोट्रांसलेशन’ के जरिये अन्य भाषाओं के लेख वोलापुक में डाल दिए हों ।

दिलचस्प यह है कि विकीपीढिया पर वोलापुक के लेखों की संख्या हिंदी में उपलब्ध लेखों से अधिक है । ऑटोट्रांसलेशन के माध्यम से तो हिंदी में भी लेख छप सकते हैं । फिर किसी ने ऐसा प्रयास क्यों नहीं किया होगा ?

हिंदी को लेकर लेखक की टिप्पणी सीधी-सी है: हिंदी कदाचित् ‘भाषाई लगाव के सिद्धांत’ का एक अपवाद है । अर्थात् हिंदीभाषी स्वयं अपनी भाषा से लगाव नहीं रखते और अंगरेजी लेखों का ही अध्ययन करते हैं । जब आपकी अपनी भाषा में रुचि ही न हो तो उसमें लेख लिखने की जहमत क्या उठाएंगे? यह स्थिति तब है जब हिंदी में लिखित रचनाओं की कोई कमी नहीं और इसके बोलने वाले लोगों की संख्या दशियों करोड़ों में है – किसी भी यूरोपीय भाषा के बोलने वालों से अधिक ।

1 लाख से कम लेख

लेखक ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि अलेमानिक (Alemannic) पीडमोंटीज (Piedmontese) जावानीज (Javanese) में भी लेखों की संख्या (क्रमशः 13,708, 59,303, तथा 43,122) निराशाप्रद है, जब की इनके भाषाभाषियों की संख्या करोड़ों में है । स्पष्ट है कि संबंधित लोग उन अन्य भाषाओं में लेख पढ़ते हैं जिन्हें वे जानते हैं ।

आगे यह भी जानकारी दी गई है कि हावजू (Zhosa) में मात्र 146 लेख ही उपलब्ध हैं । इस भाषा के जानने वालों की संख्या करीब 80 लाख बताई गई है और यह भी कि नेल्सन मंडेला की मातृभाषा है । अपनी भाषाओं के प्रति उदासीनता काफी व्यापक है, और यह उसका एक उदाहरण है ।

विकीपीडिया लेखों के भाषाई आधार पर विभाजन के अध्ययन में एक भाषा हेरेरो (Herero, कुछ अफ्रिकी देशों में बोली जाने वाली भाषाओं में से एक) का भी जिक्र है, जिसमें एक भी लेख शामिल नहीं है, यद्यपि उसका होमपेज बना हुआ है

भाषाई गहराई

लेखक ने भाषाई गहराई (Depth of Language) को भी परिभाषित किया है । अध्ययनकर्ता के अनुसार अहमियत केवल इस बात की नहीं होती है कि कितने लेख अमुक भाषा में लिखित पाए जाते हैं । यह बात भी अहमियत रखती है कि उन लेखों को कितना संपादित किया जाता है, जो लोगों की सक्रिय दिलचस्पी का द्योतक हैं । भाषाई गहराई को दोनों (संख्या एवं गहराई) के अनुपात के तौर पर परिभाषित किया गया है । उम्मीद के अनुरूप 42 लाख लेखों के साथ अंगरेजी अन्य भाषाओं के बहुत आगे पाई गई है । रोचक तथ्य यह भी है कम लेखों के बावजूद हिब्रू, अरबी, फारसी, तथा तुर्की इस गहराई के मामले में जर्मन एवं इतालवी के आगे हैं । हिंदी कहां पर है इसका जिक्र नहीं किया गया है । चीनी भाषा की चर्चा भी कहीं नहीं दिखी ।

बहरहाल इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य पर अपने देशवासियों को विचार करना चाहिए कि जिस भाषा को राजभाषा का तमगा पहनाया गया है और जो अनेकों जनों की मातृभाषा है, उसी के बोलने वाले उसे इतनी हिकारत की निगाह से क्यों देखते हैं । क्या यह हमारी मानसिक ग़ुलामी का द्योतक है, यानी कि देश राजनैतिक तौर पर तो आज़ाद हो गया लेकिन दिमागी तौर पर नहीं । हाल में संघ लोकसेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में अंगरेजी का कद बढ़ाने और देशी भाषाओं को हासिये पर डालने का निर्णय इसी मानसिकता का संकेतक है । (फ़िलहाल वह निर्णय टल गया है ।) – योगेन्द्र जोशी

इस चिट्ठे की पिछली दो प्रविष्टियों, 22 जून तथा 3 जुलाई, में मैंने हिंदी एवं अंगरेजी के अमर्यादित मिश्रण से उत्पन्न ‘क्रिओल’ सदृश भाषा का जिक्र किया था जो तेजी से शहरी पढ़ेलिखे नागरिकों, विशेषतः छात्रों-युवाओं, के बोलचाल की आम भाषा बन रही है । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । मेरी नजर में यह तेजी से फैल रही है और ‘शिक्षित’ हिंदीभाषी भारतीय समाज में अपनी जड़ें जमा रही है । यहां मैं उन क्षेत्रों का किंचित् विस्तार से उल्लेख कर रहा हूं जहां इसका प्रयोग सामान्य बात बनती जा रही है ।

मेट्रोहिंदी का प्रयोग
मेट्रोहिंदी अभी लेखन की भाषा नहीं है । अंगरेजी शिक्षित महानगर-निवासी व्यक्ति बोलचाल में तो इसका इस्तेमाल बेझिझक करता है, किंतु लिखते समय पर्याप्त कोशिश करता है कि उसकी भाषा यथासंभव पारंपरिक हिंदी या हिंदुस्तानी पर आधारित हो । अर्थात् उसमें प्रचलित हिंदी लफ्जों का प्रयोग हो और व्याकरणीय शुद्धता कमोबेश बनी रहे । परंतु हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं का मेट्रोहिंदी से परहेज घटता जा रहा है । फलस्वरूप अब ऐसे लेख भी पढ़ने को मिलने लगे हैं जो हिंदी में लिखित नहीं माने जा सकते । उन्हें हिंदी का कोई भी विद्वान नहीं समझ सकता जब तक कि उसने अंगरेजी का भी पर्याप्त ज्ञान अर्जित न कर लिया हो । दैनिक वार्तापत्र ‘अमर उजाला’ के एक लेख का छोटा हिस्सा उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है:

इस उदाहरण का “ड्रेसेज में ज्यादा कट्स, सिलुएट्स व फ्रील यूज ना करें” वाक्य किस हद तक हिंदी है यह आप खुद ही तय करें ।

मेट्रोहिंदी के लक्षण
मेरी नजर में मेट्रोहिंदी की खासियतें क्या हैं इनकी संक्षिप्त चर्चा मैं आगे कर रहा हूं । इस विषय की समीक्षा अभी मैंने गहराई से नहीं की है । चलते-चलाते मुझे जो सूझ पाया है वही मैं कहने जा रहा हूं ।

(1) मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के कौन-से और कितने शब्द इस्तेमाल होने चाहिए इसका कोई नियम नहीं है ।
(2) इसमें अंगरेजी पदबंध (फ्रेज) भी धड़ल्ले से प्रयोग में लिए जा सकते हैं ।
(3) अंगरेजी के शब्दों के साथ ‘करना’, ‘सकना’, ‘होना’ के प्रयोग से इच्छित क्रियापद बनाए जाते हैं ।
(4) अंगरेजी के संयोजकों (कनेक्टिव) एवं क्रियाविशेषणों (एड्वर्व) के इस्तेमाल में कोई रोक नहीं रहती ।
(5) मेट्रोहिंदी की लिपि में भी लचीलापन देखने को मिल रहा है । आम तौर पर आप आप देवनागरी में लिखते हैं, किंतु चाहें तो सुविधानुसार रोमन लिपि भी यहां-वहां प्रयोग में ले सकते हैं ।

बानगी
नीचे के उदाहरण पर गौर करें:

प्रदर्शित पदबंध/वाक्यांश अपने हिंदी अखबार से चुने हैं मैंने । इसे हिंदी कहें या अंगरेजी ? दूसरा उदाहरण एक विज्ञापन का है:

साफ जाहिर है कि इनमें क्या कहा गया है इसे समझने के लिए हिंदी तथा अंगरेजी, दोनों, की जानकारी पाठक को होनी चाहिए । अंगरेजी न जानने वालों के समझ से परे हैं यह मेट्रोहिंदी ।

अगली पोस्ट में उपर्युक्त ‘खासियतों’ पर तनिक और प्रकाश डालते हुए हिंदी के उज्ज्वल/अंधकारमय भविष्य पर मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

हिंदी दिवस, 14 सितंबर, के अवसर पर

हिंदी प्रेमियों के प्रति

अभिनंदन, अभिवादन एवं मंगलकामना

– योगेन्द्र जोशी