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यह वैश्वीकरण का युग है। इस युग में भोज्य पदार्थ और आम जीवन में प्रयुक्त उपभोक्ता सामग्रियां किसी एक स्थान पर उत्पादित होती हैं और किसी दूसरे स्थान पर उपलब्ध हो जाती हैं। स्थानीयता का भाव न वस्तुओं के उत्पादन में रह गया है और न ही उनके उपभोग या उपयोग में रह गया है। बातें इससे भी आगे निकलकर समुदायों के बीच की दूरी का समाप्तप्राय हो जाना तक पहुंच चुकी हैं। भौगोलिक, सांस्कृतिक अथवा भाषाई भिन्नता के कारण विविध समुदायों के बीच एक प्रकार की जो संपर्कहीनता पहले देखने को मिलती थी वह तिरोहित होते जा रही है। अब ‘मुख्यधारा में आने’ जैसी बातें सुनने को मिलती हैं। सांस्कृतिक एव एवं भाषाई अतिक्रमण सामान्य बात हो चुकी है। ऐसी स्थिति में क्या मातृभाषा के अर्थ भी बदल नहीं गये होंगे?

मातृभाषा को लेकर मेरे मन में कुछ शंकाएं है। क्या आज के युग में मातृभाषा का अर्थ वही रह गया है जो सदियों से चला आ रहा था? यह सवाल मेरे मन में तब उठा जब में अपनी मातृभाषा, अपने बच्चों की मातृभाषा और अपने पोतों की मातृभाषा क्या है इस पर विचार करता हूं। इसके लिए मैं अपने बचपन से लेकर अभी तक के अनुभवों को पाठकों के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं।

मेरी मातृभाषा

मेरा जन्म १९४८ में आज के उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के कुमाऊं अंचल के एक सुदूर गांव में हुआ था। हमारे घरों में कुमाउंनी बोली बोली जाती थी जिसे हिन्दी की बोलियों या उपभाषाऑ (दायलेक्ट) में से एक माना जाता है। हिन्दी से तात्पर्य है मानक हिन्दी यानी ‘खड़ी बोली’। उपभाषा होने के बावजूद कुमाउंनी हिन्दीभाषियों की समझ में कमोबेश आ जायेगी ऐसा कदाचित नहीं है। दरअसल इस बोली में ह्रस्व ध्वनियों का प्रयोग अत्यधिक होता है। हम लोग भी ‘मैं’ के लिए ‘मैं’ ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इस सर्वनाम में ‘ऐ’ की ध्वनि दीर्घ न होकर ह्रस्व होती है, अर्थात् वह सामान्य से काफी छोटे अंतराल तक के लिए उच्चारित होती है। इसी प्रकार ‘पानी’ के लिए यही शब्द प्रयुक्त होता है। हमारे इलाके में इसका उच्चारण ‘पाणि” किया जाता है जिसमें ‘आ’ ध्वनि तो है किंतु बहुत संक्षिप्त काल के लिए। कुमाउंनी का कोई मानक स्वरूप नहीं है। नेपाल सीमा के पास (चंपावत आदि में) ‘पानि’ बोलने वाले मिलेगें। हम ‘मैं’ (ह्रस्व ध्वनि) बोलते है लेकिन रानीखेत के आसपास ‘मिं’ सुनने को मिलता है। यह भी बता दूं इस बोली के कई शब्द हिन्दी के नहीं हैं। इससे भी बोली समझने में अड़चन पैदा होती है।

अस्तु, मैं कुमाउंनी बोली के बारे में अधिक नही कहने जा रहा हूं। इतना बताने का उद्येश्य यही है कि मैं जहां जन्मा था वहां परिवार एवं गांव में और संबंधित परिवेश में कुमाउंनी का ही चलन था। अधिकांश लोगों का हिन्दी से कोई सरोकार नहीं था। नौकरी-पेशे की खातिर जो बाहर निकल जाते उनका कार्य हिन्दी से ही चलता था। लेकिन वे भी जब गांव आते थे कुमाउंनी में ही वार्तालाप होता था।

पांच वर्ष की आयु तक मेरा ज्ञान कुमाउंनी तक ही सीमित था। किंतु जब प्राथमिक विद्यालय (पाठशाला) जाना शुरू हुआ तो पढ़ाई-लिखाई सब हिन्दी में ही चला और वहीं से हिन्दीभाषा अपनी भाषा बन गयी। उसके बाद की शिक्षा के लिए उस पर्वतीय क्षेत्र से बाहर निकला तो कुमाउंनी बोली छूट गयी और हिन्दी ही अपनी रोजमर्रा की भाषा बन गयी। किंतु यह बोली भूल गया ऐसा हुआ नहीं। गांव आना-जाना चलता रहा और पिताश्री एवं भाइयों के साथ रहते हुए कुमाउंनी चलती रही। अब मैं बाल्यावस्था की अपनी बोली को मातृभाषा मानूं या बाद में हिन्दी, जिसका प्रयोग अवश्य ही अधिकांशतः होने लगा। इस प्रश्न की सार्थकता समझने के लिए एक दृष्टांत पेश है। मुझे बनारस में एक पड़ोसी महिला (कदाचित् निरक्षर) का स्मरण हो आता है जो हिन्दी ठीक-से नहीं बोल पाती थीं और अपनी देहाती बोली (कदाचित् भोजपुरी) में ही बातें करती थीं। उनकी मातृभाषा क्या थी? क्या वह हिन्दी जिसे वे बोल नहीं सकती थीं?

मेरी पत्नी कुमाउंनी बोलती हैं यद्यपि उनका जन्म, परवरिश एवं शिक्षा-दीक्षा आदि कानपुर में ही हुई। लेकिन पारंपरिक कुमाउंनी गांव से आईं अपनी मां से उन्होंने कुमाउंनी बोली शौकिया सीखी। हम दोनों घर में खड़ीबोली एवं कुमाउंनी दोनों बोलते हैं। किंतु व्यावसायिक (विश्वविद्यालय में भौतिकी शिक्षण के) स्तर पर अंग्रेजी ही मेरी भाषा रही। मुझे लगता है कि मेरी कोई वास्तविक अथवा स्पष्टतया परिभाषित मातृभाषा नहीं है। मेरा चिंतन-मनन कुमाउंनी, हिन्दी तथा अंग्रेजी, तीनों में, चलता है, मौके-मौके के अनुसार। पता नहीं औरों के साथ ऐसा होता है या नहीं।

अगली पीढ़ियों की मातृभाषा

मेरे दोनो बच्चे बनारस में ही जन्मे तथा पलेबढे और शिक्षित हुए, अधिकांशतः अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में। किंतु जो परिवेश उनको मिला वह अंग्रेजीमय न होकर हिन्दी का रहा। इसलिए हिन्दी उनके लिए सहज रही। व्यावसायिक स्तर पर उनको भी अंततः अंग्रेजी अपनानी पड़ी और अब उसी को सर्वाधिक प्रयोग में लेना पड़ता है। कुमाउंनी परिवेश के अभाव में वे इस बोली को सीख नहीं पाए भले ही हम घर में कुआउंनी में बोलते थे। वे बोली को समझ तो लेते हैं लेकिन ठीक-से बोल नहीं सकते। कहना यही होगा कि उनकी मातृभाषा हिन्दी है जो उन्हें बनारस के परिवेश से मिला।

अब मैं अपने पोतों की स्थिति बताता हूं। छोटा साल भर का है इसलिए उसको लेकर कुछ नहीं कहता, लेकिन बड़ा छः साल का हैं। वह अपने माता-पिता (मेरे ज्येष्ठ पुत्र एवं बहू) के साथ बेंगलूरु के 4-5 हजार फ्लैटों वाले विस्तृत परिसर के एक फ्लैट में रहता है। इस परिसर में मध्य-वर्ग एवं उच्च-मध्य वर्ग के नौकरी-पेशे वाले युवा या अधेड़ अवस्था के लोग रहते हैं। इनमें अधिकतर उत्तर भारतीय हैं जो अलग-अलग प्रांतों से आते है। जैसा मेरे देखने में आया इनकी संपर्क भाषा प्रायः अंग्रेजी-मिश्रित हिन्दी अर्थात् हिंग्लिश रहती है। हमें विगत मार्च-अप्रैल-मई – तीन माह – कोरोना-लॉकडाउन के कारण वही रुकना पड़ा। स्कूल-कालेज सब बंद पड़े थे। वहां के निवासियों को परिसर में सीमित रह जाना पड़ा। वह समय था जब परिसर-वासियों को निकट से देखने को अवसर मिला था।

जैसा मैंने कहा वयस्क जन प्रायः हिन्दी (दरअसल हिंग्लिश) में बात कर लेते थे। अंग्रेजी की तुलना में वे हिन्दी को वरीयता दे रहे थे। जो हिन्दी नहीं जानते थे उनके लिए अंग्रेजी का विकल्प था। अपने देश में व्यावसायिक स्तर पर अंग्रेजी का ही चलन है इसलिए अंग्रेजी तो प्रायः सभी समझ-बोल सकते हैं। देश में अंग्रेजी का आकर्षण बढ़ता जा रहा हैं क्योंकि धनोपार्जन के बेहतर रास्तों के द्वार अंग्रेजी ही खोलती है। अतः संपन्न लोगों के बच्चे अंग्रेजी-आध्यम के विद्यालयों में पढ़ते है। मां-बाप भी परिवार में बच्चों की अंग्रेजी मजबूत करने के लिए अक्सर उनके साथ इसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इससे बच्चे माँ-बाप की ‘घोषित’ अथवा तथाकथित मातृभाषा से दूर होते चले जाते हैं। परिणाम क्या होता है बताता हूं। उस परिसर में मैंने वयसा १०-१२ वर्ष तक के बच्चों को आपस में अंग्रेजी में ही बात करते पाया। हमने अपने पोते को भी उसी रंग में रंगे जाते देखा था। हिन्दी वह समझ लेता है लेकिन अच्छा नहीं बोल पाता है। हमने उसे बता दिया था कि हम उससे अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे। इतना ही नहीं, अपने बेटे-बहू को भी सलाह दी कि वे उसे हिन्दी भी सिखाते चलें। हमारा कहना था कि आंग्लमय माहौल में अंग्रेजी तो वह सीख ही लेगा। वे भी हाँ-हाँ कहते-कहते अंग्रेजी पर ही उतर जाते थे।

ऐसे में मेरे मन में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक था कि उसकी मातृभाषा क्या मानी जाये? यह प्रश्न परिसर के कमोबेश सभी बच्चों पर लागू होती है। जिन ‘हिन्दीभाषियों’ के परिवार में हिन्दी की पुस्तकें, पत्रिकाएं, और समाचारपत्र तक देखने कोन न मिलें और जहां उक्त सभी चीजें केवल या कमोबेश अंग्रेजी में मिलें उनकी “हिन्दी हमारी मातृभाषा” का दावा कितन स्वीकार्य होगा?

बतौर शिक्षा के माध्यम के अंग्रेजी चलेगी

सरकार ने नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा को बतौर शिक्षा का माध्यम बनाने की बात कही है। लेकिन बताया जा रहा है कि अभिभावकों को अपनी पसंद का माध्यम चुनने की तथाकथित लोकतांत्रिक स्वतंत्रता भी इस शिक्षा नीति में बनी रहेगी। नई शिक्षा नीति में तमाम नये विचार शामिल किए गये हैं ऐसा दावा किया जा रहा है ताकि बच्चों के व्यक्तित्व का समग्र विकास हो सके और शिक्षा उनको बोझ न लगे। किंतु मातृभाषा की अहमियत केवल शिक्षा नीति के ब्योरे तक सीमित रहेगी; हकीकत पुराने ढर्रे पर ही रहेगी। जैसा मैंने ऊपर कहा है ऐसे अनेक परिसर मिलेंगे जिनमें बच्चों की मातृभाषा अंग्रेजी बन चुकी है। वैसे भी माता-पिताओं की मातृभाषा में एकरूपता न होने के कारण इन बच्चों के शिक्षण का माध्यम क्या होवे यह प्रश्न उठेगा ही।

देश की स्वतंत्रता के ७० वर्षों में अंग्रेजी तेजी से आगे बढ़ती गई है। अतः अब उससे छुटकारा पाने की संभावना नहीं के बराबर है। यानी शिक्षा का माध्यम अधिकांश स्तरीय विद्यालयों में अंग्रेजी ही रहेगी। – योगेन्द्र जोशी

 

आज हिन्दी दिवस है, हिन्दी का राजभाषा के रूप में जन्म का दिन इस अवसर पर हिन्दी प्रेमियों तथा हिन्दी प्रयोक्ताओं के प्रति शुभेच्छाएं। हिन्दी की दशा सुधरे यही कामना की जा सकती है।

इस दिवस पर कहीं एक-दिनी कार्यक्रम होते हैं तो कहीं हिन्दी के नाम पर पखवाड़ा मनाया जाता है। इन अवसरों पर हिन्दी को लेकर अनेक प्रभावी और मन को आल्हादित-उत्साहित करने वाली बातें बोली जाती हैं, सुझाई जाती हैं। इन मौकों पर आयोजकों, वक्ताओं से लेकर श्रोताओं तक को देखकर लगता है अगले दिन से सभी हिन्दी की सेवा में जुट जाएंगे। आयोजनों की समाप्ति होते-होते स्थिति श्मशान वैराग्य वाली हो जाती है, अर्थात्‍ सब कुछ भुला यथास्थिति को सहजता से स्वीकार करते हुए अपने-अपने कार्य में जुट जाने की शाश्वत परंपरा में लौट आना।

इस तथ्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि जैसे किसी व्यक्ति के “बर्थडे” (जन्मदिन) मनाने भर से वह व्यक्ति न तो दीर्घायु हो जाता है, न ही उसे स्वास्थलाभ होता है, और न ही किसी क्षेत्र में सफलता मिलती है, इत्यादि, उसी प्रकार हिन्दी दिवस मनाने मात्र से हिन्दी की दशा नहीं बदल सकती है, क्योंकि अगले ही दिन से हर कोई अपनी जीवनचर्या पूर्ववत् बिताने लगता है।

मैं कई जनों के मुख से अक्सर सुनता हूं और संचार माध्यमों पर सुनता-पढ़ता हूं कि हिन्दी विश्व में फैल रही है, उसकी ओर लोग आकर्षित हो रहे हैं, उसे अपना रहे हैं। किंतु दो बातें स्पष्टता से नहीं कही जाती हैं:

(१) पहली यह कि हिन्दी केवल बोलचाल में ही देखने को मिल रही है, यानी लोगबाग लिखित रूप में अंग्रेजी विकल्प ही सामान्यतः चुनते हैं, और

(२) दूसरी यह कि जो हिन्दी बोली-समझी जाती है वह उसका प्रायः विकृत रूप ही होता है जिसमें अंग्रेजी के शब्दों की इतनी भरमार रहती है कि उसे अंग्रेजी के पर्याप्त ज्ञान के अभाव में समझना मुश्किल है।

कई जन यह शिकायत करते हैं कि हिन्दी में या तो शब्दों का अकाल है या उपलब्ध शब्द सरल नहीं हैं। उनका कहना होता है कि हिन्दी के शब्दसंग्रह को वृहत्तर बनाने के लिए नए शब्दों की रचना की जानी चाहिए अथवा उन्हें अन्य भाषाओं (अन्य से तात्पर्य है अंग्रेजी) से आयातित करना चाहिए। मेरी समझ में नहीं आता है कि उनका “सरल” शब्द से क्या मतलब होता है? क्या सरल की कोई परिभाषा है? अभी तक मेरी यही धारणा रही है कि जिन शब्दों को कोई व्यक्ति रोजमर्रा सुनते आ रहा हो, प्रयोग में लेते आ रहा हो, और सुनने-पढ़ने पर आत्मसात करने को तैयार रहता हो, वह उसके लिए सरल हो जाते हैं

उपर्युक्त प्रश्न मेरे सामने तब उठा जब मुझे सरकारी संस्था “वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग” से जुड़ा समाचार पढ़ने को मिला। दैनिक जागरण में छपे समाचार की प्रति प्रस्तुत है। समाचार के अनुसार आयोग “नए-नए शब्दों को गढ़ने और पहले से प्रचलित हिंदी शब्दों के लिए सरल शब्द तैयार करने के काम में जुटा है।”

आयोग जब सरल शब्द की बात करता है तो वह उसके किस पहलू की ओर संकेत करता है? उच्चारण की दृष्टि से सरल, या वर्तनी की दृष्टि से? याद रखें कि हिन्दी कमोबेश ध्वन्यात्मक (phonetic) है (संस्कृत पूर्णतः ध्वन्यात्मक है)। इसलिए वर्तनी को सरल बनाने का अर्थ है ध्वनि को सरल बनाना। और इस दृष्टि से हिन्दी के अनेक शब्द मूल संस्कृत शब्दों से सरल हैं ही। वस्तुतः तत्सम शब्दों के बदले तद्‍भव शब्द भी अनेक मौकों पर प्रयुक्त होते आए हैं। उदाहरणतः

आलस (आलस्य), आँसू (अश्रु), रीछ (ऋक्ष), कपूत (कुपुत्र), काठ (काष्ठ), चमार (चर्मकार), चैत (चैत्र), दूब (दूर्वा), दूध (दुiग्ध), धुआँ (धूम्र)

ऐसे तद्‍भव शब्द हैं जो हिन्दीभाषी प्रयोग में लेते आए हैं और जिनके तत्सम रूप (कोष्ठक में लिखित) शायद केवल शुद्धतावादी लेखक इस्तेमाल करते होंगे। हिन्दी के तद्‍भव शब्दों की सूची बहुत लंबी होगी ऐसा मेरा अनुमान है।

ऐसे शब्द हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी के हिस्से हैं। किंतु अयोग के समक्ष समस्या इसके आगे विशेषज्ञता स्तर के शब्दों की रचना करने और उनके यथासंभव सरलीकरण की है। बात उन शब्दों की हो रही है जो भाषा में तो हों किंतु प्रचलन में न हों अतः लोगों के लिए पूर्णतः अपरिचित हों। अथवा वांचित अर्थ व्यक्त करने वाले शब्द उपलब्ध ही न हों। पहले मामले में उनके सरलीकरण की और दूसरे मामले में शब्द की नये सिरे से रचना की बात उठती है। यहां पर याद दिला दूं कि हमारे हिन्दी शब्दों का स्रोत संस्कृत है न कि लैटिन एवं ग्रीक जो अंग्रेजी के लिए स्रोत रहे हैं और आज भी हैं। अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ले सकते हैं, परंतु उनकी स्थिति भी हिन्दी से भिन्न नहीं है और वे भी मुख्यतः संस्कृत पर ही निर्भर हैं। हिन्दी पर अरबी-फारसी का काफी प्रभाव रहा है। लेकिन जिन शब्दों की तलाश आयोग को है वे कदाचित् इन भाषाओं में उपलब्ध नहीं है। यदि कोई शब्द हों भी तो वे भारतीयों के लिए अपरिचित-से होंगे। जब संस्कृत के शब्द ही कठिन लगते हों तो इन भाषाओं से उनका परिचय तो और भी कम है।

ले दे के बात अंग्रेजी के शब्दों को ही हिन्दी में स्वीकारने पर आ जाती है, क्योंकि अंग्रेजी स्कूल-कालेजों की पढ़ाई और व्यावसायिक एवं प्रशासनिक क्षेत्रों में अंग्रेजी के वर्चस्व के चलते हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाएं महत्व खोती जा रही हैं। आज स्थिति क्या है इसका अंदाजा आप मेरे एक अनुभव से लगा सकते हैं –

एक बार मैं एक दुकान (अपने हिन्दीभाषी शहर वाराणसी का) पर गया हुआ था। मेरी मौजूदगी में ९-१० साल के एक स्कूली बच्चे ने कोई सामान खरीदा जिसकी कीमत दूकानदार ने “अड़तीस” (३८) रुपये बताई। लड़के के हावभाव से लग गया कि वह समझ नहीं पा रहा था कि अड़तीस कितना होता है। तब दूकानदार ने उसे बताया कि कीमत “थर्टि-एट” रुपए है। लड़का संतुष्ट होकर चला गया। मेरा मानना है कि ऐसी स्थिति अंग्रेजी माध्यम की स्कूली शिक्षा का परिणाम है। इस “अड़तीस” का भला क्या सरलीकरण हो सकता है?

जब आप पीढ़ियों से प्रचलित रोजमर्रा के हिन्दी शब्दों को ही भूलते जा रहे हों तो फिर विशेषज्ञता स्तर के शब्दों को न समझ पाएंगे और न ही उन्हें सीखने को उत्साहित या प्रेरित होंगे। तब क्या नये-नये शब्दों की रचना का प्रयास सार्थक हो पाएगा?

संस्कृत पर आधारित शब्द-रचना के आयोग के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं। रचे या सुझाए गये शब्द कितने सरल और जनसामान्य के लिए कितने स्वीकार्य रहे हैं इसे समझने के लिए एक-दो उदाहरण पर्याप्त हैं। वर्षों पहले “कंप्यूटर” के लिए आयोग ने “संगणक” गढ़ा था। लेकिन यह शब्द चल नहीं पाया और अब सर्वत्र “कंप्यूटर” शब्द ही इस्तेमाल होता है। इसी प्रकार “ऑपरेटिंग सिस्टम” (operating system)  के लिए “प्रचालन तंत्र” सुझाया गया। वह भी असफल रहा। आयोग के शब्दकोश में “एंजिनिअरिंग” के लिए “अभियांत्रिकी” एवं “एंजिनिअर” के लिए “अभियंता उपलब्ध हैं, किंतु ये भी “शुद्ध” हिन्दी में प्रस्तुत दस्तावेजों तक ही सीमित रह गए हैं। आयोग के ऐसे शब्दों की सूची लंबी देखने को मिल सकती है।

आयोग सार्थक पारिभाषिक शब्दों की रचना भले ही कर ले किंतु यह सुनिश्चित नहीं कर सकता है कि जनसामान्य में उनकी स्वीकार्यता होगी। शब्दों के अर्थ समझना और उन्हें प्रयोग में लेने का कार्य वही कर सकता है जो भाषा में दिलचस्पी रखते हों और अपनी भाषायी सामर्थ्य बढ़ाने का प्रयास करते हों। हिन्दी का दुर्भाग्य यह है कि स्वयं हिन्दीभाषियों को अपनी हिन्दी में मात्र इतनी ही रुचि दिखती है कि वे रोजमर्रा की सामान्य वार्तालाप में भाग ले सकें, वह भी अंग्रेजी के घालमेल के साथ। जहां कहीं भी वे अटकते हैं वे धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्द इस्तेमाल कर लेते हैं इस बात की चिंता किए बिना कि श्रोता अर्थ समझ पाएगा या नहीं। कहने का मतलब यह है कि आयोग की पारिभाषिक शब्दावली अधिकांश जनों के लिए माने नहीं रखती है।

इस विषय पर एक और बात विचारणीय है जिसकी चर्चा मैं एक उदाहरण के साथ करने जा रहा हूं। मेरा अनुभव यह है कि किन्ही दो भाषाओं के दो “समानार्थी” समझे जाने वाले शब्द वस्तुतः अलग-अलग प्रसंगों में एकसमान अर्थ नहीं रखते। दूसरे शब्दों में प्रायः हर शब्द के अकाधिक अर्थ भाषाओं में देखने को मिलते हैं जो सदैव समानार्थी या तुल्य नहीं होते। भाषाविद्‍ उक्त तथ्य को स्वीकारते होंगे।

मैंने अंग्रेजी के “सर्वाइबल्” (survival)” शब्द के लिए हिन्दी तुल्य शब्द दो स्रोतों पर खोजे।

(१) एक है आई.आई.टी, मुम्बई, के भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी केन्द्र (http://www.cfilt.iitb.ac.in/) द्वारा विकसित शब्दकोश, और

(२) दूसरा है अंतरजाल पर प्राप्य शब्दकोश (http://shabdkosh.com/)

मेरा मकसद था जीवविज्ञान के विकासवाद के सिद्धांत “survival of the fittest” की अवधारणा में प्रयुक्त “सर्वाइबल्” के लिए उपयुक्त हिन्दी शब्द खोजना।

पहले स्रोत पर केवल २ शब्द दिखे:

१. अवशेष, एवं २. उत्तरजीविता

जब कि दूसरे पर कुल ७ नजर आए:

१. अवशेष, २. अतिजीवन, ३. उत्तर-जीवन, ४. उत्तरजीविता, ५. जीवित रहना, ६. प्रथा, ७. बची हुई वस्तु या रीति 

जीवधारियों के संदर्भ में मुझे “अवशेष” सार्थक नहीं लगता। “उत्तरजीविता” का अर्थ प्रसंगानुसार ठीक कहा जाएगा ऐसा सोचता हूं। दूसरे शब्दकोश के अन्य शब्द मैं अस्वीकार करता हूं।

अब मेरा सवाल है कि “उत्तरजीविता” शब्द में निहित भाव क्या हैं या क्या हो सकते हैं यह कितने हिन्दीभाषी बता सकते हैं? यह ऐसा शब्द है जिसे शायद ही कभी किसी ने सुना होगा, भले ही भूले-भटके किसी ने बोला हो। जो लोग संस्कृत में थोड़ी-बहुत रुचि रखते हैं वे अर्थ खोज सकते हैं। अर्थ समझना उस व्यक्ति के लिए संभव होगा जो “उत्तर” एवं “जिविता” के माने समझ सकता है। जितना संस्कृत-ज्ञान मुझे है उसके अनुसार “जीविता” जीवित रहने की प्रक्रिया बताता है, और “उत्तर” प्रसंग के अनुसार “बाद में” के माने व्यक्त करता है। यहां इतना बता दूं कि “उत्तर” के अन्य भिन्न माने भी होते हैं: जैसे दिशाओं में से एक; “जवाब” के अर्थ में; “अधिक” के अर्थ में जैसे “पादोत्तरपञ्चवादनम्” (एक-चौथाई अधिक पांच बजे) में।

लेकिन एक औसत हिन्दीभाषी उक्त शब्द के न तो अर्थ लगा सकता है और न ही उसे प्रयोग में ले सकता है। ऐसी ही स्थिति अन्य पारिभाषिक शब्दों के साथ भी देखने को मिल सकती है।

संक्षेप मे यही कह सकता हूं कि चूंकि देश में सर्वत्र अंग्रेजी हावी है और हिन्दी के (कदाचित् अन्य देशज भाषाओं के भी) शब्द अंग्रेजी से विस्थापित होते जा रहे हैं अतः सरल शब्दों की रचना से कुछ खास हासिल होना नहीं है। – योगेन्द्र जोशी

 

क्या होती है मातृभाषा?

एक प्रश्न है जो मुझे काफी समय से उलझाए हुए है। प्रश्न है कि मातृभाषा की क्या कोई स्पष्ट परिभाषा आज के युग में दी जा सकती है? यह सवाल मेरे मन में तब उठा जब शिक्षण संबंधी कई अध्ययनों ने सुझाया है कि बच्चों की पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए।

 यह प्रश्न मेरे दिमाग में उठा कैसे यह स्पष्ट करता हूं: एक समय था जब अलग-अलग भाषाभाषी समुदाय भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में रहते थे। वे समुदाय इतना अधिक परस्पर मिश्रित नहीं होते थे कि किसी को भी सुबह-शाम दूसरे समुदाय की भाषा से वास्ता पड़ता हो। कुछएक शब्द एक भाषायी समुदाय से दूसरे समुदाय की भाषा में यदा-कदा चले जाते थे, किंतु इतना अधिक मिश्रण नही हो पाता था कि संबंधित भाषा पूरी तरह विकृत हो जाए। पैदा होने के बाद लंबे अर्से तक किसी भी बच्चे का सान्निध्य एवं संपर्क कमोबेश अपने समुदाय तक ही सीमित रहता था, जब तक कि वह बाहरी समुदायों के बीच नहीं पहुंच जाता था। ऐसी स्थिति में ऐसे बच्चे की भाषा उसके अपने समुदाय की भाषा ही होती थी, उसी का प्रयोग वह दैनंदिनी कार्यों में करता था। उसको हम निस्संदेह उसकी मातृभाषा अथवा पैतृक भाषा मान सकते हैं।

इस आलेख में हिन्दी से मेरा तात्पर्य “खड़ी बोली” से जिसे आप हिन्दी का मानक कह सकते हैं। अन्यथा अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी भी सर्वत्र एक जैसी नहीं बोली जाती है। स्थानीयता का कुछ असर रहता जरूर है।

लेकिन आज स्थिति एकदम भिन्न है। कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति मूलतः बांग्लाभाषी है, बांग्लाभाषी क्षेत्र में रहता आया है, और घर के सदस्यों के साथ एवं परिवेश के लोगों के साथ बंगाली में वार्तालाप करता है। वह व्यक्ति नौकरी-पेशे में बेंगलूरु या मैसूरु पहुंच जाता है, जहां उसके संतान जन्म लेती है। कल्पना कीजिए कि वहां उसे मुख्यतः कन्नडभाषियों के बीच रहना पड़ता है, लेकिन अड़ोस-पड़ोस में हिन्दीभाषियों की संख्या भी पर्याप्त है, जो या तो मूलतः हिन्दीभाषी हैं या अलग-अलग प्रांतों से आए लोग हैं जो परस्पर हिन्दी या अंग्रेजी में संपर्क साधते हैं। बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती दौर में मां-बाप उससे बंगाली में ही बातें करते हैं। परंतु यह पर्याप्त नहीं। शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था के विकास की प्रक्रिया पेचीदी होती है और यह बात बच्चे के भाषायी ज्ञान पर भी लागू होता है। प्रायः सभी कुछ अस्थाई होता है किंतु जिन वस्तुओं एवं क्रियाओं को बच्चा बारबार देखता-सुनता है और जिन्हें अभ्यास में लेने लगता है वे मस्तिष्क में स्थायित्व ग्रहण करने लगती हैं।

अब देखिए जैसे-जैसे बच्चा साल-छ:माह का और उससे बड़ा होने लगता है, परिवार से मिलने वाले पड़ोसी उससे अपने-अपने तरीके से बातें करते हैं कोई कन्नड में तो कोई हिन्दी में अथवा अंग्रेजी में। संबंधित शब्द एवं ध्वनियां भी उसकी भाषा में जुड़ने लगते हैं। परिवेश बदलता जाता है और बच्चा क्रेश में जाने लगता है। वहां संभव है कि एकाधिक भाषाओं के संपर्क आ जाए और फिर आरंभिक पाठशाला में जाने लगे जहां कदाचित्‍ अंग्रेजी से उसका वास्ता सर्वाधिक पड़े। आजकल अपने देश में अंग्रेजी पर ही पूरा जोर है, अतः बच्चे के साथ मां-बाप भी अंग्रेजी में अधिक बोलने लगते हैं ताकि उसकी अंग्रेजी मजबूत हो सके। इस प्रकार की पेचीदी परिस्थिति में उसके मातृभाषा का स्वरूप भला क्या होगा?

निजी अनुभव

मैं अपनी बात को आगे प्रस्तुत कुछ दृष्टांतो के माध्यम से स्पष्ट करता हूं। स्पष्ट कर दूं कि ये दृष्टांत काल्पनिक नहीं हैं अपितु मेरे अनुभव में आई बातें हैं।

(१)     मेरा जन्म उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के एक गांव में तब हुआ था जब देश स्वतंत्र होने जा रहा था (१९४७)। तब हम बच्चों (और कई वयस्कों की भी) दुनिया गांव एवं उसके पास के क्षेत्र तक सीमित थी। टेलीफोन, बिजली, रेलगाड़ी आदि शब्द सुने तो जरूर थे पर ये होते क्या हैं इसका कोई अनुभव नहीं था। गांव कुमाऊं क्षेत्र में था और वहां कुमाउंनी बोली जाती थी, जिसे आप हिन्दी की बोली या उपभाषा कह सकते हैं। आम हिन्दीभाषी को कुमाउंनी ठीक से समझ में आ जाती होगी इसमें मुझे संदेह है। एक बानगी पेश है: “मैंलि आज रात्तै क्योल खाछ।” जिसका हिन्दी रूपान्तर है: “मैंने आज प्रातः केला खाया (था)।” (रात्तै = रात के अंत का समय)। कुमाउंनी में सहायक क्रिया “होना” के लिए “हुंण” है जिसके रूप अक्सर छ से आरंभ होते हैं। जब हम बच्चे ५-६ वर्ष की उम्र में पाठशाला जाने लगे तो पढ़ाई के माध्यम एवं पुस्तकें हिन्दी में थीं। आरंभ में सही हिन्दी बोलने में थोड़ा दिक्कत तो हुई होगी, लेकिन किताबें पढ़ने/समझने में कोई परेशानी नहीं हुई। परंतु घर और बाहर कुमाउंनी ही में हम बोलते थे। तब क्या थी हमारी मातृभाषा? उपभाषा के तौर पर कुमाउंनी और भाषा के तौर पर हिन्दी। निश्चित ही हमारा अंग्रेजी एवं अन्य किसी भाषा से कोई संपर्क नहीं था।  अंग्रेजी से संपर्क तो कक्षा ६ से आरंभ हुआ और उसका प्रभाव हमारी हिन्दी/कुमाउंनी पर नहीं के बराबर था।

(२)     मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। ये लोग उस जमीन के मालिकों में से एक हुआ करते थे जिसमें हमारी कालोनी बसी है। ये और इनकी संतानें फल-सब्जियां बेचने का धंधा करती हैं या उनमें से कुछएक ऑटो-ट्राली आदि चलाते हैं। माली हालत निम्नवर्ग के अनुरूप है। तीस साल पहले जब मैंने इस कालोनी में मकान बनवाया तब इनके पिता जीवित थे। वे निरक्षर थे और शायद ये सभी भाई भी निरक्षर हैं। तीसरी पीढ़ी के युवा भी अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं। शायद कुछ ने हाई-स्कूल या इंटर तक की पढ़ाई की है। शैक्षिक स्तर सभी का अतिसामन्य प्रतीत होता है। इस पीढ़ी की कुछ संतानें (चौथी पीढ़ी) किशोरावस्था में चल रही हैं और सरकारी विद्यालयों को छोड़कर निजी अंग्रेजी-माध्यम स्कूलों में पढ़ती हैं। ये बच्चे “अंकल, गुड मॉर्निंग” की भाषा बोलने लगे हैं और “हैप्पी बर्थडे सेलिब्रेट” करते हैं। मैंने पाया है कि उनकी शब्द संपदा में अब अंग्रेजी घुस चुकी है। फिर भी यही कहूंगा कि हिन्दी (या कहिए भोजपुरी) अभी इनकी मातृभाषा है, क्योंकि घरों में अंग्रेजी बोल सकने वाले सदस्य हैं नहीं। किंतु उसके बाद की पीढ़ी अवश्य ही यथासंभव अंग्रेजी पर जोर डालेगी और मातृभाषा प्रभावित होने लगेगी।

(३)     अब बात करता हूं बड़े शहर में रह रहे कुमाउंनी मूल के ऐसे परिवार की जहां मुझे ६०-७० वर्षीय जन मिल गए और जिनसे मैं कुमाउंनी में बात कर सका। चूंकि इन जनों की अगली पीढ़ी शहरो में ही पैदा हुई, पली-बढ़ी और पढ़ी-लिखी, अतः वे कुमाउंनी समझ तो सकते हैं परंतु बोल नहीं सकते। उस परिवार में मुझे चारएक साल का ऐसा बच्चा दिखा जो हिन्दी नहीं बोल सकता था भले ही समझ लेता था। उससे सभी अंग्रेजी में ही बात कर रहे थे। मुझे लगा कि उसकी हिन्दी के प्रति कोई भी व्यक्ति चिंतित नहीं था। फलतः एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही थी जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी बन चुकी थी, माता-पिता की मातृभाषा हिन्दी होने के बावजूद। रही-सही कमी अंग्रेजी-माध्यम का स्कूल पूरा कर रहा था। सवाल है कि किसी बच्चे की मातृभाषा मां-बाप की भाषा ही होगी ऐसा मानना तर्कसंगत होगा क्या?

(४)     मैं जब मूलतः हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय शहरी परिवार में जाता हूं, मैंने पाया है कि वहां हिन्दी बोली तो जाती है, परंतु तिरस्कृत भी बनी रहती है। हिन्दी उन परिवारों के लिए मजबूरी कही जा सकती है, क्योंकि निचले सामाजिक तबके के लोगों और घर-परिवार के सद्स्यों तथा मित्र-परिचितों के साथ हिन्दी में ही संपर्क साधना पड़ता है। अन्यथा उनके यहां हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं-पुस्तकें बमुश्किल देखने को मिलती है। उस माहौल में बच्चे की अक्षर-ज्ञान की आरंभिक पुस्तकें भी अंग्रेजी में ही मिलती हैं जो उसे “ए फ़ॉर ऐपल, बी फ़ॉर बनाना, सी फ़ॉर कैट, …” सिखाती हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे की मातृभाषा क्या हिन्दी रह सकती है? क्या वह एक खिचड़ी भाषा नहीं होगी जिसमें अंग्रेजी अधिक, हिन्दी कम हो?

गायब हो रहे हैं हिन्दी शब्द

एक बार मैं एक दुकान पर खड़ा था। १०-११ साल के एक बच्चे ने कोई सामान खरीदा और उसका दाम पूछा। दुकानदार ने जब “अड़तीस रुपये” कहा तो वह समझ नहीं सका। तब उसे “थर्टीएट” बताया गया। टीवी चैनलों पर शायद ही कोई साफ-सुथरी हिन्दी में समाचार देता होगा। “… में एक बिल्डिंग कोलैप्स हो गई है। मलवे से दो लोगों की डेड बॉडी निकाली गईं हैं। चार लोग इन्ज्यर्ड बताए गए हैं। …” समाचार का ऐसा ही पाठ सुनने को मिलता है। विज्ञापनों की भाषा कुछ यों होती है: “… बनाए आपकी स्किन फेअर एंड मुलायम …।” सुपरिचित बाबा रामदेव स्वदेशी के हिमायती  होने की दावा करते हैं। उनके खुद के विज्ञापनो में आप पाएंगे कि वे मधु/शह्द के बदले हनी, नारियल तेल के बदले कोकोनट ऑयल जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। उनके उत्पादों पर लिखित जानकारी भी शायद ही कभी मुख्यतया हिन्दी में देखने को मिलती है।

यह ठीक है कि हर भाषा की शब्द-संपदा में अन्य भाषाओं के कुछएक शब्द भी अक्सर शामिल हो जाते हैं। लेकिन हिन्दी में तो वे शब्द भी अंग्रेजी शब्दों से विस्थापित होते जा रहे हैं जो सदा से ही आम लोगों के मुख में रहते थे। क्या यह सच नहीं है कि अब हिन्दी की गिनतियां, साप्ताहिक दिनों के नाम, फल-फूलों, पशु-पक्षिओं, शारीरिक अंगों, आम बिमारियों, आदि के नाम आम बोलचाल में कम सुनने को मिल रहे हैं, विशेषतः शहरी नवयुवाओं, किशोरों एवं बच्चों के मुख से? ऐसी दशा में किसी बच्चे की विकसित हो रही भाषा क्या असल हिन्दी हो सकती है, भले ही उसके मां-बाप मूलतः हिन्दीभाषी हों? वह जो सीखेगा उसे मैं हिन्दी नहीं मान सकता। भाषा के मूल शब्द गायब होते जाएं और व्याकरणीय ढांचा भर रह जाए तो भी आप उसे हिन्दी कहें तो कहते रहें। यह सार्वलौकिक (कॉज़्मोपॉलिटन) महानगरों की विशेष समस्या है।

अंत में इस तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान फिर से खींचता हूं कि आज के युग में जन्म के बाद से ही बच्चे को भाषा की दृष्टि से खिचड़ी परिवेश मिलने लगा है, विशेषतः महानगरों में। जब तक उसके मस्तिष्क में भाषा का स्वरूप स्थायित्व पाए तब तक उस पर एकाधिक कारकों का प्रभाव पड़ने लगता है। चूंकि महानगरों में अब अंग्रेजी माध्यम विद्यालय ही लोगों की प्राथमिकता बन चुके हैं, अतः वहां का महौल घर से अलग रहता है। अड़ोस-पड़ोस का परिवेश कुछ रहता है और तथा टीवी चैनल कुछ और ही परोसते हैं। ये सभी बच्चे की भाषा को प्रभावित करते हैं। (मैंने समाचार पढ़ा था कि कर्नाटक में सरकारी विद्यालयों का माध्यम अब अंग्रेजी होगी। उत्तर प्रदेश के कुछ सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम रहेगा। कुछ राज्यों में प्राथमिक दर्जे से अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है।) ऐसे में संभव है कि कोई खिचड़ी भाषा मातृभाषा के तौर पर विकसित हो। – योगेन्द्र जोशी

प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

 

पहले कुछ तस्वीरें:

कनाडा प्रवास

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर मुझे जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था। उसके बाद क्यूबेक प्रांत के शहर मॉंट्रियाल में प्राप्त अनुभवों पर आधारित सचित्र लेख २४ फ़रवरी को पोस्ट की थी। 

तीन लेखों की अपनी लेखमाला में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि अंग्रेजी की वैश्विक व्यापकता को लेकर भारतीयों में जो भ्रम व्याप्त है वह वास्तविकता से परे है। अब इस तीसरे लेख में क्यूबेक प्रान्त के उसी नाम से विख्यात दूसरे बड़े शहर क्यूबेक में फ़्रांसीसी भाषा को लेकर मेरे देखने में जो आया उसका संक्षिप्त विवरण तस्वीरों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है।

आगे बढ़ने से पहले दूसरे लेख की कुछ बातों का पुनरुल्लेख कर रहा हूं:

कनाडा की कुल आबादी (करीब 3.6 करोड़) का लगभग 25% फ़्रेंचभाषी यानी फ़्रांसीसीभाषी है। प्रायः सभी फ़्रांसीसी-भाषी राजकाज की आधिकारिक भाषा फ़ेंच वाले क्यूबेक प्रांत में रहते हैं – लगभग 82 लाख अकेले क्यूबेक (Quebec) प्रांत में और शेष करीब 3 लाख अति छोटे प्रांतों (न्यू ब्रुंसविक New Brunswick, मनिटोबा Manitoba, नोवा स्कोटिया Nova Scotia में, और छिटपुट तौर पर अन्यत्र रहते हैं। शेष कनाडा में अंग्रेजी प्रचलन में है। राष्ट्र के स्तर पर कनाडा की राजकाज की आधिकारिक भाषाएं अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं।

क्यूबेक प्रांत का सबसे बड़ा शहर मॉंट्रियाल (Montreal, आबादी करीब 38 लाख) है। उपर्युक्त दूसरा लेख उसी शहर के अनुभव पर आधारित था, जहां मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ एक पर्यटक के तौर पर गया था। क्यूबेक दूसरा बड़ा शहर है जहां हम पर्यटन के लिए गये थे। सन् 1608 में फ़्रांसीसियों के द्वारा बसाया गया यह शहर कनाडा के सबसे पुराने शहरों में से एक है। ध्यान दें कि यूरोप के लोगों (अंग्रेज एवं फ़्रांसीसी) ने कनाडा में 16वीं शताब्दी के 5वें दशक में बसना आरंभ किया था। इस समय शहर की आबादी करीब ८ लाख आंकी जाती है। यही शहर क्यूबेक प्रांत की राजधानी भी है। शहर पुराने किस्म का है इसलिए इसका अपना अलग ही आकर्षण है। यहां के आकर्षणों में महत्वपूर्ण है एक किला। मेरे मौजूदा लेख का विषय पर्यटक स्थलों का वर्णन करना नहीं है। मैं तो वहां के भाषाई अनुभव की बात करना चाहता हूं।

क्यूबेक प्रांत में फ़्रांसीसी मूल के लोग ही प्रमुखतया रहते हैं। वे आज भी अपनी भाषा फ़्रांसीसी पर गर्व करते हैं। वे हम भारतीयों की तरह नहीं हैं जो अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार एवं विरोध करते हैं।

1. गांधी प्रतिमा

क्यूबेक शहर में फ़्रांसीसी भाषा की अंग्रेजी के सापेक्ष क्या स्थिति है इसे कुछ उदाहरणों के माध्यम से पाठकों के समक्ष रखता हूं। सबसे पहला उदाहरण मैं महात्मा गांधी की प्रतिमा का लेता हूं जो शहर के एक पुराने एवं भीतरी भाग की सड़क के किनारे एक पार्क पर लगी है। महात्मा गांधी पिछली शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेताओं में अनन्य गिने जाते हैं और प्रायः सभी देशों में अनेक लोग उनके नाम तथा अहिंसा-उपदेश से परिचित हैं। विश्व के अनेक शहरों में उनकी प्रतिमाएं देखने को मिल जाती हैं। क्यूबेक में लगी उनकी प्रतिमा की तस्वीर यहां प्रस्तुत है:

ध्यान दें कि प्रतिमा पर गांधी जी के बारे में उत्कीर्ण जानकारी केवल फ़्रांसीसी मे है। कनाडा की आधिकारिक भाषाएं भले ही अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं परंतु क्यूबेक प्रांत में अंग्रेजी को खास तवज्जू नहीं मिलती है। इसलिए गांधी-प्रतिमा पर अंग्रेजी में कुछ भी अंकित नहीं है। क्या भारत में ऐसा हो सकता है?

2. खरीद-फ़रोख्त की रसीद

मॉंट्रियाल एवं क्यूबेक में हमने खाने-पीने की वस्तुओं आदि की जो खरीदारी की उनकी रसीदें भी हमें फ़्रांसीसी में ही मिलीं, न कि अंग्रेजी में। देखें पांच रसीदों की छायाप्रतियों की तस्वीर:

अंग्रेजी सर्वत्र चलती है की बात करने वालों को अपने कथन पर किंचित विचार करना चाहिए। अवश्य ही दुकानों आदि पर आम बोलचाल के लिए हमने अंग्रेजी का ही प्रयोग किया (फ़्रांसीसी तो आती नहीं) और हमारा काम चल गया। किंतु हमने महसूस किया कि संबंधित दुकानदारों की अंग्रेजी सामान्य एवं कामचलाऊ ही रहती है। पर्यटकों के साथ संवाद-संपर्क के लिए उन्हें अंग्रेजी की जरूरत होती है, अन्यथा उनका कार्य फ़्रांसीसी से बखूबी चलता है।

यहां यह भी बता दूं कि क्यूबेक प्रांत में और उसके आसपास के शहरों, यथा ओटवा और टोरंटो (टुरानो), में भी उपभोक्ता सामानों पर आवश्यक जानकारी/निर्देश फ़्रांसीसी एवं अंग्रेजी, दोनों, में उपलब्ध रहती है। यह जानना दिलचस्प है कि भारत से आयातित सामान पर भी फ़्रांसीसी में अंकित जानकारी देखने को मिल जाती है। भारतीय उद्यमी वही जानकारी अपने देशवासियों को उनकी भाषा में नहीं देते। अपनी भाषाओं के प्रति हमारा रवैया कैसा है यह हम जानते हैं।

3. “जानें क्यूबेक” (Découvrir Québec)

क्यूबेक शहर में घूमते-फिरते मेरी नजर पड़ी एक सूचना-पट पर जो विशुद्ध फ़्रांसीसी में है। मैं पढ़ तो सकता नहीं किंतु यह समझ में आ गया कि उस पर अंग्रेजी का “डिस्कवर क्यूबेक” फ़्रांसीसी में (Découvrir Québec) लिखा गया है। उस सूचना-पट पर शहर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों का विवरण उल्लिखित था। पर्यटक उसे समझ पायें या नहीं इसकी वहां फ़्रांसीसी मूल के लोगों को परवाह नहीं। वे अपनी भाषा को सम्मान देने में विश्वास करते हैं।

4. पुरातत्व स्थल

क्यूबेक शहर की स्थापना सैम्युअल द शाम्प्लाँ (Samuel de Champlain) नामक फ़्रांसीसी नागरिक द्वारा 1608  की गई थी। शाम्प्लाँ अपने आप में बहुत कुछ था – सिपाही, मानचित्रकार, खोजकर्ता, भूगोलविद्‍, एवं राजनयिक आदि। उस समय फ़्रांसीसियों ने क्यूबेक प्रांत के उस क्षेत्र को “न्यू फ़्रांस” नाम से अपना उपनिवेश बनाया था। बाद में अंग्रेजों ने 1760 के युद्ध में उसे फ़्रांसीसियों से अपने आधिपत्य ले लिया था। आज भी शाम्प्लाँ को नगर संस्थापक के नाम पर याद किया जाता है। वहां पर उसके निवास-स्थल को स्मारक के रूप में जाना जाता है। उसी की जानकारी मुझे एक गली (सड़क) पर सूचना पट पर देखने को मिली फ़्रांसीसी भाषा में न कि अंग्रजी में।

 5. राष्ट्रसंघ कार्यालय

और आगे बढ़ने पर क्यूबेक में राष्ट्रसंघ (यू.एन.ओ.) की संस्था “यूनेस्को” (UNESCO) के कार्यालय का नामपट नजर आया। उसके बाबत कोई उल्लेखनीय बात नहीं। मेरे लिए बस यह देखना ही काफी था कि नामपट पर फ़्रांसीसी भाषा में लिखा है “PARC DE L’UNESCO” अर्थात् UNESCO Centre; यहां भी अंग्रेजी नहीं। (स्मरण रहे कि यूनेस्को की छः आधिकारिक भाषाएं हैं: अंग्रेजी, अरबी, चीनी, फ़्रांसीसी, रूसी एवं स्पेनी|)

 6. उत्सव स्थल

जब हम क्यूबेक में भ्रमण कर रहे थे वहां एक स्थल पर विज्ञान उत्सव (Science Festival)  के आयोजन की तैयारी चल रही थी । उसके लिए मंच और दर्शकों के बैठने के लिए स्थान तैयार किए जा रहे थे। आयोजन की तिथियां दो-तीन दिन बाद की थीं और हमें दूसरे ही दिन लौटना था। अतः हम आयोजन नहीं देख सकते थे। मेरी रुचि आयोजन में थी भी नहीं; मेरी दिलचस्पी तो उस स्थल पर उत्सव-संबंधी जो जानकारी लिखी गई थी उसकी भाषा में थी। उस स्थान की जो तस्वीर मैंने खींची वह प्रस्तुत है:

मंच के शीर्ष पर बांई ओर लिखा था “Scéne Fibe” और दाईं ओर “FÉSTIVAL D’ÉTÉ DE QUÉBEC”। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आयोजन की कार्यवाही फ़्रांसीसी भाषा में संपन्न हुई होगी न कि अंग्रेजी में।

7. कार पार्किंग स्थल

क्यूबेक में राह चलते मेरी नजर पड़ी एक पार्किंग स्थल पर। दरअसल वह चारों ओर से “प्लास्टिक सीट” द्वारा घिरा हुआ अस्थाई पार्किंग स्थल था, जैसा कि उस पर फ़्रांसीसी भाषा में लिखित “stationnement temporaire” से स्पष्ट था। अपेक्षया छोटे अक्षरों मे बहुत कुछ आवश्यक जानकारी भी थी जिसे समझने की मुझे न तो आवश्यकता थी और न ही मैं समझ सकता था।

8. बस प्रदर्शन पट

मैं यहां दुबारा यह कहना चाहता हूं कि क्यूबेक में सभी स्थानीय कार्य फ़्रांसीसी भाषा में ही संपन्न होते हैं। हमने शहर के एक स्थान से दूसरे स्थान तक नगरीय बस-सेवा के माध्यम से आवागमन किया। यात्रियों के लिए बस-मार्ग का नाम, अगले बस-स्टॉप का नाम, आदि की जानकारी फ़्रांसीसी में बस के भीतर लगे एलेक्ट्रॉनिक सूचना-पट पर प्रदर्शित होते हुए मैंने पाया।

9. सैंट लॉरेंस नदी फ़ेरी सेवा

क्यूबेक शहर सैंट लॉरेंस (St. Lawrence) नदी के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर बसा है। यह नदी कनाडा की तीसरी सबसे बड़ी नदी है (लंबाई लगभग 3,000 कि.मी.) और इस शहर में इसका पाट करीब 3 कि.मी. है। नदी पर दूर-दूर पर पुल बने हैं किंतु नदी किनारे बने क्यूबेक-किले के सामने से नदी के दूसरे किनारे की बस्ती पर पहुंचने के लिए फ़ेरी (वृहन्नौका) की सेवा उपलब्ध है। इस सेवा का उपयोग पर्यटकों को नदी से शहर का नजारा पाने के लिए भी किया जाता है। हमने भी फ़ेरी-सेवा का लाभ उठाया। फ़ेरी के प्रवेश-द्वार पर प्रदर्शित जानकारी की तस्वीर प्रस्तुत है यह बताने के लिए कि यहां भी अंग्रेजी में सूचना प्रदर्शित नहीं थी।

अंत में

इन चित्रों को प्रस्तुत करने का मेरा मकसद सीधा-सा है कि अंग्रेजी सर्वत्र चलती है हम भारतीयों की यह धारणा तथ्यों पर आधारित नहीं है। मुझे यह जानकारी है कि चीन, जापान, कोरिया के बड़े बहुतारांकित (मल्टीस्टार्ड) होटलों-रेस्तराओं को छोड़ दें तो छोटी-मोटी जगहों पर पर्यटकों के सामने विचार-संप्रेषण की समस्या खड़ी हो जाती है। उन जगहों का मुझे व्यक्तिगत अनुभव नहीं है। किंतु कोई 30-32 साल पहले पेरिस भ्रमण के समय ऐसी दिक्कत मुझे भी हुई। अपने अन्य ब्लॉग में मैंने तब के अपने अनुभव को कहानी के रूप में लिखा है। बाद में पता चला कि वहां अंग्रेजी जानने वाले कम नहीं, परंतु फ़्रांसीसी छोड़ अंग्रेजी में वार्तालाप करना उनको पसद नहीं। फ़्रांसीसियों का अंग्रेजी विरोध तो ऐतिहासिक है। हम भारतीयों का रवैया ठीक उल्टा है। अपने अंग्रेजी-लगाव के औचित्य के लिए हम किसी भी तर्क-कुतर्क को पेश करने में नहीं हिचकते। – योगेन्द्र जोशी

प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

 

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान मुझे अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था। तीन लेखों की अपनी लेखमाला में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि अंगरेजी की वैश्विक व्यापकता को लेकर भारतीयों में जो भ्रांति व्याप्त है वह वास्तविक जानकारी पर आधारित नहीं है। इस दूसरे लेख में मॉंट्रियाल शहर में फ़्रांसीसी भाषा को लेकर मेरे देखने में जो कुछ आया उसका संक्षिप्त विवरण कुछ तस्वीरों के माध्यम से मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

कनाडा की कुल आबादी (करीब 3.6 करोड़) का लगभग 25% फ़्रेंच यानी फ़्रांसीसी भाषाभाषी है। प्रायः सभी फ़्रांसीसी-भाषी राजकाज की आधिकारिक भाषा फ़ेंच वाले क्यूबेक प्रांत में रहते हैं – लगभग 82 लाख अकेले क्यूबेक (Quebec) प्रांत में और शेष करीब 3 लाख अति छोटे प्रांतों (न्यू ब्रुंसविक New Brunswick, मनिटोबा Manitoba, नोवा स्कोटिया Nova Scotia में, और छिटपुट तौर पर अन्यत्र रहते हैं। शेष कनाडा में अंग्रेजी प्रचलन में है। राष्ट्र के स्तर पर कनाडा की राजकाज की आधिकारिक भाषाएं अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं।

क्यूबेक प्रांत का सबसे बड़ा शहर मॉंट्रियाल (Montreal, आबादी करीब 38 लाख) है। यह ऑंटारियो प्रांत के टोरंटो (Toronto, आबादी करीब 56 लाख) शहर के बाद कनाडा का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। एक पर्यटक के तौर पर मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मॉंट्रियाल गया। पर्यटन की दृष्टि से वहां बहुत कुछ दर्शनीय उपलब्ध है। उस सब का ब्योरा प्रस्तुत करना मेरा मकसद नहीं है। पर्यटन के दौरान दर्शनीय स्थानों पर घुमते-फिरते फ़्रांसीसी भाषा को लेकर वहां जो कुछ मुझे देखने को मिला उस को मैंने अपने स्मृति-पटल एवं कैमरा में संचित करने का प्रयास किया। हर बात चित्रों में अंकित नहीं की जा सकती थी, फिर भी बहुत कुछ ऐसा अवश्य था जिसके माध्यम से पाठकों तक यह जानकारी पहुंचाई जा सकती है कि प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी देश होते हुए भी कनाडा के उस क्षेत्र में फ़्रांसीसी का ही बोलबाला है।

खरीद-फ़रोख्त की रसीद

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मॉंट्रियाल में हमने एक स्थान पर “मेट्रो” नामक “फ़ूडमार्ट” से कुछ फल आदि भोज्य सामग्री खरीदी थीं। अन्य स्थल पर “सबवे” नाम के रेस्तरां में भोजन भी किया था। अन्यत्र पॉपकॉर्न का आस्वादन भी किया था। इन स्थानों पर मिले खरीद-फरोख्त की रसीदों की तस्वीर बानगी के तौर पर मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। (चित्र में क्यूबेक की दो रसीदों की तस्वीरें भी शामिल हैं।) ध्यान दें कि ये रसीदें फ़्रेंच भाषा में हैं। इनमें क्या लिखा है यह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि कहां क्या खरीदा होगा वह ठीक-ठीक अब याद नहीं है। इन रसीदों का उल्लेख यह बताने के लिए मैं कर रहा हूं कि हमारे देश की भांति क्यूबेक प्रांत में रसीदें अंग्रेजी में नहीं मिलती हैं। राज्य की भाषा फ़्रांसीसी होने का मतलब है लेनदेन की लिखापढ़ी भी फ़्रांसीसी में किया जाना। अपने देश में तो सर्वत्र अंग्रेजी में ही रसीदों का प्रचलन है!

मेट्रो स्टेशन

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हम लोगों ने शहर के भीतर एक स्थान से दूसरे तक जाने के लिए “मेट्रो ट्रेन” की सेवा का भी लाभ लिया। मॉन्ट्रियाल के भूमिगत एक स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा के समय वहां पर दीवाल पर प्रदर्शित विज्ञापन अथवा जानकारी पर मेरी दृष्टि पड़ी तो मैंने उसकी तस्वीर कैमरे में कैद कर ली। यहां प्रस्तुत चित्र उसी छायाचित्र की प्रति है। इस प्रकार के प्रदर्शन-पट (डिस्प्ले-बोर्ड) शहर के अन्य स्थलों पर भी देखने मिल जाते हैं। और ये सभी फ़्रांसीसी भाषा में ही रहते हैं; शायद ही कहीं अंग्रेजी में मिलते हों। प्रस्तुत चित्र के बांये ऊपरी कोने पर उस टिकट (या टोकन जैसा कि उसे वहां कहा जाता है) की प्रति को भी मैंने प्रदर्शित किया है जिसको साथ लेकर मैंने आवागमन किया। यह टोकन भी पूरी तरह फ़्रांसीसी में ही है।

मॉन्ट्रियाल ओलम्पिक स्टेडियम टावर

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आज से चालीस वर्ष पूर्व सन्‍ 1976 में मॉन्ट्रियाल में ओलम्पिक खेल आयोजित हुए थे। उस समय वहां क्रीड़ांगनों (स्टेडियमों) और अन्य भवनों का निर्माण किया गया था। उनमें से प्रमुख था “मॉंट्रियाल स्टेडियम टावर” जो स्वयं में 165 मीटर ऊंचा एक तिरछा स्तंभ है जिसके शीर्ष पर शहर का नजारा देखने के लिए चारों ओर चलने-फिरने का स्थान प्राप्य है। साथ में एक रेस्तरां एवं स्मारक-वस्तुओं/उपहारों की दुकान भी है। वहां पहुंचने के लिए लिफ़्ट की व्यवस्था है। हम लोग भी टावर के शीर्ष पर गये थे। वह टावर उस काल की अनूठी भवन-संरचना के लिए विख्यात हुआ था। इस संदर्भ में वहां बड़े-से बोर्ड पर “गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स” द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र की प्रदर्शित छायाप्रति मेरी नजर में आई जिसे में यहां प्रस्तुत किया है।

वहां प्रदर्शित बोर्ड पर उल्लिखित जानकारी पूर्ण्तया फ़्रेंच भाषा में है। बोर्ड के निचले भाग में दायीं ओर गिनीस-रेकॉर्ड के प्रमाणपत्र की प्रति भी अंकित है जो अंग्रेजी में है, कदाचित इसलिए कि प्रमाणपत्र अंग्रेजी में ही दिए जाते होंगे। चित्र के निचले भाग में बांयी तरफ़ “इनसेट” में एक रंगीन तस्वीर भी शामिल। यह उसी टावर की तस्वीर है। ध्यान दें कि इस टावर के आधार/तले से लगभग सटी-हुई एक अंडाकार भवन-संरचना भी देखने को मिल रही है। 1976 के ओलंपिक खेलों के समय इसके भीतर साइकिल दौड़ के लिए “साइकिल-ट्रैक” (वेलोड्रोम velodrome) बनाया गया था। 1992 में इसे जैविक संग्रहालय के तौर पर इस्तेमाल में ले लिया गया। इस गुंबदाकार भवन के बाहर नाम-पट पर लिखित है “Biodome de Montreal” फ़्रांसीसी में।

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वनस्पति उद्यान, मॉंट्रियाल

मेरी समझ में मॉंट्रियाल का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटक एवं दर्शनीय स्थान है वहां का वनस्पति उद्यान (Botanical Garden of Montreal, फ़्रांसीसी में Jardin Botanique de Montreal)। उद्यान के प्रवेश-द्वार के बाहर तीन सूचना-पटों पर फ़्रेंच भाषा में लिखित संकेत देखने को मिलते हैं। उनके आंशिक तस्वीरों को यहां एक साथ प्रस्तुत किया गया है। सूचना-पटों पर क्या लिखा है इसका अनुमान लगाया जा सकता था, किंतु अंग्रेजी में न होने के कारण वे हमारे लिए स्पष्ट नहीं थे।

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प्रवेश-द्वार पर एक सूचना-पट भी प्रदर्शित है जिससे पता चलता है कि इस उद्यान की व्यवस्था मॉंट्रियाल विश्वविद्यालय (Universite de Mntreal) के प्रशासनिक/शैक्षिक नियंत्रण में है। वस्तुतः यह विश्वविद्यालय के “वनस्पति-विज्ञान शोध संस्थान” (Institute de researche en biologie vegetale) का हिस्सा है। ध्यान दें कि फ़्रांसीसी और अंग्रेजी के कई शब्द मिलते-जुलते हैं, इसलिए प्रदर्शित सूचनाएं थोड़ा-बहुत समझ में आ जाती हैं। किंतु विश्वविद्यालय का विभाग होने के बावजूद विविध जानकारियां अंग्रेजी में लिखित नहीं देखने को मिलीं यह मेरे विचार में ध्यानाकर्षक तो है ही हम भारतीयों के लिए विचारणीय भी है। ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय का शिक्षण-माध्यम प्रमुखतया फ़्रांसीसी ही है होगी, भले ही साथ-साथ अंग्रेजी का भी व्यवहार होता हो।

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इस उद्यान का नक्शा भी प्रवेश-द्वार पर देखने को मिलता है लेकिन वह फ़्रांसीसी न जानने वाले के लिए समझ से परे ही कहा जायेगा।

उद्यान का अंतरंग

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उद्यान के अंदर प्रवेश करने पर स्थान-स्थान पर प्रचलित संकेतों और फ़्रांसीसी में लिखित संदेशों के माध्यम से यह बताया गया है कि कहां क्या है और किस ओर प्रवेश-मार्ग और किस ओर निकास-मार्ग हैं।

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उद्यान के भीतर प्रदर्शित सूचना-पटों में से एक की तस्वीर यहां उदाहरण-स्वरूप प्रस्तुत है। मेरे अनुमान में फ़्रांसेसी में लिखित सूचना शायद यह संदेश देती है कि उद्यान के टिकट से प्राप्त धन प्रकृति-संरक्षण में लगाया जाता है।

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एक अन्य सूचना-पट पर लिखित जानकारी से यह प्रतीत होता है कि उद्यान के एक अंग “चीनी उद्यान” (Le jardin de Chine) का इस समय (2015-17) restoration कार्य चल रहा। अतः उद्यान के इस हिस्से का हम दर्शन हम नहीं कर सके।

निष्कर्ष

इस आलेख में शामिल गिने-चुनी तस्वीरों के माध्यम से मैंने पाठकों के समक्ष यह तथ्य रखने का प्रयास किया है कि क्यूबेक में तमाम स्थानों पर केवल फ़्रांसीसी में लिखित जानकारी प्रदर्शित की हुई मिलती है। इसका अर्थ यह है कि अंग्रेजी के प्रति जैसा आकर्षण एवं उत्साह हम भारतीयों में देखने को मिलता है वैसा अन्य बहुत-से देशों में देखने को नहीं मिलता है। अंग्रेजी की गुलामी उन देशों की खासियत है जो अंग्रेजी शासन के अधीन रहे और जहां अंग्रेजी की जड़ें इतनी गहरी बैठ गयीं कि अंग्रेजों से मुक्ति के बाद भी अंग्रेजी से मुक्ति लोगों को नहीं मिली। और अब इस भाषाई गुलामी से मुक्ति के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।

अगले आलेख में मेरा प्रयास क्यूबेक शहर में प्राप्त भाषा संबधी अनुभवों का उल्लेख करने का है। क्यूबेक अपने ही नाम वाले प्रांत का दूसरा बड़ा शहर और पर्यटक स्थल है। – योगेन्द्र जोशी

और कुछ तस्वीरें-

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मुझे ई-मेल के माध्यम से एक सूचना मिली जिसमें इकनॉमिक टाइम्ज़ में छपे समाचार से संबंधित अधोलिखित लिंक (कड़ी?) प्राप्त हुआ। समाचार इस आलेख के शीर्षक से संबंधित है।

http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/pm-narendra-modi-asks-ministries-to-create-websites-in-regional-languages/articleshow/55364400.cms?prtpage=1

अंग्रेजी में छपे इस समाचार को पढ़ने के बाद मेरे मन में यह विचार उठा कि क्यों न इसका हिन्दी में यथासंभव सही अनुवाद कर डालूं और अपने चिट्ठे में शामिल करूं।

मैं व्यावसायिक अनुवादक नहीं हूं। अंग्रेजी से हिन्दी में लंबा-चौड़ा अनुवाद करने का प्रयास मैंने कभी किया भी नहीं। अपनी निजी जरूरत के अनुसार कभी-कभी कुछएक वाक्यों या छोटे-मोटे अनुच्छेद का अनुवाद अवश्य कर लिया करता था। उक्त अंग्रेजी समाचार देख मैंने सोचा कि इस बार पूरे समाचार के ही अनुवाद का प्रयास किया जाये। मेरे लिए यह एक प्रयोग तो था, और साथ में अपने पाठकों से समाचार को हिन्दी में साझा करने का अतिरिक्त संतोष! सो आगे प्रस्तुत है उक्त समाचार का अनुवाद। ध्यान दें कि ब्रैकेटों (कोष्ठकों) में मेरे स्वयं के जोड़े गये शब्द हैं। -योगेन्द्र जोशी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंत्रालयों को क्षेत्रीय भाषाओं में वेबसाइटें बनाने के निर्देश दिए हैं

प्रधानमंन्त्री नरेन्द्र मोदी ने सभी मंत्रालयों को निर्देश दिये हैं कि वे अपनी वेबसाइटों (जालस्थलों?) को आधिकारिक मान्यताप्राप्त समस्त क्षेत्रीय भाषाओं में पेश करें।

“प्रधानमंन्त्री जी चाहते हैं कि केन्द्र सरकार की वेबसाइटें केवल अंग्रेजी एवं हिन्दी में उपलब्ध न हों .. वे बहुभाषीय हों क्योंकि देश भर की जनता जानकारी के लिए [उन पर खोजती है]। यह अब प्राथमिकता का कार्य है।” एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने ईटी [इकनॉमिक टाइम्ज़] को बताया।

यह उन मंत्रालयों के लिए वृहत्काय चुनौती होगी जो अभी अपनी वेबसाइटों को पूर्णतः द्विभाषी बनाने में संघर्ष कर रही हैं। इस समय केवल प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है। यह अंग्रेजी एवं हिन्दी के अलावा आठ क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है, जब कि पत्र सूचना कार्यालय अंग्रेजी, हिन्दी तथा उर्दू के अतिरिक्त 12 क्षेत्रीय भाषों में प्रेस प्रकाशनी (press release) पेश करती है।

नोदी [जी] के मन की बात कार्यक्रम के सभी 23 आधिकारिक मान्यताप्राप्त भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराये जाने के बाद यह नया निदेश प्राप्त हुआ है।

उपर्युक्त अधिकारी ने कहा, “प्र.मं की दृष्टि है कि लोगों को अंकीय/डिजिटल सामग्री तक पहुंच उनकी अपनी भाषा में हो।” इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना मंत्रालय को यह कार्य सोंपा गया है, जिसने अपने आरएंडडी [अनुसंधान एवं विकास] तथा सीडैक [उन्नत कंप्यूटन विकास केन्द्र] में विभाजित किया है।

एमईआईटी [इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय] के अधिकारी ने कहा कि एक दर्जन क्षेत्रीय भाषाओं को वांछित परिधि में लाने से पहले प्रथम लक्ष्य केन्द सरकार की 50 वेबसाइटों को अगली अप्रैल तक द्विभाषी – अंग्रेजी एवं हिन्दी में – बनाना है।

अधिकारी ने कहा कि आइटी (सूचना प्रौद्योगिकी) मंत्रालय मशीन अनुवाद पर आधारित प्रौद्योगिकी के माध्यम से सक्षमता प्रदायक ढांचा बनाएगा, जिससे मंत्रालय अपनी सामग्री को विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं मे स्वयं अनुवाद कर सकें। हम कई मूल्यांकनकर्ताओं को [अनुवाद] भेजेंगे – ये वे लोग होंगे जो सुयोग्य हों और उन्हें सरसरी निगाह से देखने और शीघ्र अनुवाद करने की क्षमता हो। मत्रालय वहां से ग्रहण करें।

अधिकारी ने बताया कि सीडैक के अलावा अन्य संस्थाओं, जैसे आईआईटी मद्रास एवं जादवपुर विश्वविद्यालय, को परियोजना में शामिल किया जायेगा, जिन्होंने मशीन अनुवाद में कार्य किया है और कुछ बौद्धिक संपदा अर्जित की है

अधिकारी ने यह भी जोड़ा कि सरकारी योजना क्षेत्रीय भाषाओं में आधिकारिक वेबसाइट बनाने में मशीन अनुवाद को मानव हस्तक्षेप के मिलाएगी। ऐसा इसलिए कि मशीन अनुवाद की परिशुद्धता लगभग 70% मात्र होती है।

“अतः एक व्यक्ति – संपादक के माफ़िक – मशीन अनुवाद के प्रारूप पर नजर डाले और उसे परिशुद्धता के साथ परिवर्तित करे। यानी पहला प्रारूप मशीन अनुवाद का होगा और मनुष्य उस पर चौकसी रखे।” अधिकारी ने कहा।

राज्यों को हिदायत दी गयी है कि वे अपनी वेबसाइटों को क्षेत्रीय भाषाओं में बनायें। “राज्यों को दी जाने वाली कुछ सेवाओं के लिए हम अतिरिक्त स्थानीय भाषा पर विचार कर सकते हैं, जो संबंधित राज्य की जरूरत पूरी करता हो।” अधिकारी ने कहा।

समाप्त

हिन्दी दिवस, २०१६

आज हिन्दी दिवस है, १४ सितंबर। सन् १९५० से आज तक ६६ वर्षों से हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, एक ही ढर्रे से। कहीं वन-डे प्रोग्राम (यानी एकल-दिवसीय कार्यक्रम), तो कहीं वन-वीक प्रोग्राम (साप्ताहिक कार्यक्रम), और कहीं वन-फ़ोर्टनाइट प्रोग्राम (पाक्षिक कार्यक्रम)। दिवस मनाने का वही बासी पड़ चुका तरीका। उन लोगों के भाषण होंगे जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर हिन्दी से कोई लेना-देना नहीं, किंतु जिनके सामने हिन्दी के बाबत कुछ कहने की विवशता आ जाती है। हिन्दी आम जन की भाषा है, देश की संपर्क भाषा है, राष्ट्रीय एकता की निशानी है इत्यादि जुमले वक्ताओं के मुख से प्रायः निसृत होते हैं। हमें हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, आधिकारिक कार्य हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में होना चाहिए, इत्यादि सलाह साल-दर-साल दी जाती है। जिन्हें यह सब करना है वे अंगरेजी को यथावत अपनी जगह बनाये रखे हैं।

कथनी एक और कथनी कुछ और। पता नहीं आगामी कितनी दशाब्दियों- शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहेगा।

भाषणबाजी के अलावा हिन्दी दिवस मनाने के और भी तरीके प्रचलन में हैं। संस्थाएं निबंध-लेखन, वाद-विवाद, कर्मियों के लिए हिंदी-टंकण आदि की प्रतिस्पर्धाएं भी आयोजित करती हैं और विजेताओं को पुरस्कृत करती हैं। वर्ष में एक बार सितंबर में यह सब ठीक वैसे ही होता है जैसे पावस ऋतु का आना और जाना। सितंबर की समाप्ति होते-होते आकाश से बादल छंट जाते हैं और उसी के साथ तिरोहित होता है हिन्दी के प्रति जागृत अल्पकालिक उत्साह।

जरूरी है क्या हिन्दी दिवस

इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता को मैं आज तक नहीं समझ सका। पता नहीं कितने देशों में तत्सदृश भाषा दिवस मनाये जाते हैं।  देश यथावत चल रहा है। अंगरेजी की अहमियत बढ़ रही है घट नहीं रही। जो कार्य अंगरेजी में होता आया है वह आज भी वैसे ही चल रहा है। हिन्दी एवं अन्य भाषाएं आम बोलचाल तक सीमित होती जा रही हैं। और वे अंगरेजी के साथ खिचड़ी बनती जा रही हैं। अब हालत यह हो रही है कि कई लोगों की हिन्दी बिना अंगरेजी के समझना मुश्किल है। हिन्दी का अंगरेजीकरण बदस्तूर चल रहा है।

तब क्या है इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता? किसको हिन्दी के प्रति प्रेरित किया जाना है? जिस देश के लोग खुद मान चुके हैं कि अंगरेजी के बिना देश नहीं चल सकता, प्रगति नहीं कर सकता, सुख-समृद्धि की कुंजी तो अंगरेजी है, इत्यादि उन्हें हिन्दी दिवस की क्या जरूरत?

कभी-कभी हिन्दी को लेकर बहुत कुछ लिख जाने का मन होता है मेरा। जोश चढ़ता है लेकिन उसके स्थायित्व की कमी रहती है और लेखन का तारतम्य अक्सर टूट जाता है। लेख की प्रगति स्वयं की दृष्टि में संतोषप्रद नही रह जाती है। फिर भी हाल में अपने अल्पकालिक कनाडा प्रवास के अंगरेजी बनाम फ़्रांसीसी संबंधी अनुभव को पाठकों से साझा करने का विचार है। उस विषय पर दो-तीन लेख लिखने हैं, किंतु आज नहीं। आज तो अपने अनुभवों को लेकर एक दो टिप्पणियां काफ़ी होगा।

मैं उपदेशात्मक या निर्देशात्मक लेख नहीं लिखता। इस ब्लॉग में हो या मेरे दूसरे ब्लॉगों में अथवा अन्यत्र, मेरा लेखन यथासंभव तथ्यों के उद्घाटन पर केंद्रित रहता है। उनसे जिसको जो निष्कर्ष निकालना हो वह निकाले। क्या करने योग्य है क्या नहीं यह सुधी जन स्वयं सोचें।

एक अनुभव यह भी

शुरुआत मैं कुछ समय पहले अपने अनुभव में आए एक वाकये के उल्लेख के साथ कर रहा हूं। घटना हिन्दी से जुड़ी है और हिन्दी क्षेत्र के लोगों का उसके प्रति क्या रवैया है इसकी एक झलक प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं तो रोजमर्रा के जीवन में हम सभी के साथ प्रायः होती रहती हैं, किंतु उन पर सामान्यतः ध्यान नहीं दिया जाता है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के कारण मेरी यह “खराब” आदत बन चुकी है कि मैं घटनाओं को गौर से देखता हूं। अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के कार्य में यह तो करना ही पड़ता था, अन्य स्थलों पर भी आदत से मजबूर रहता हूं। घटना का विवरण कुछ यों है –

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में अवस्थित भारतीय स्टेट बैंक शाखा के अहाते में पासबुक प्रिंट (मुद्रित) करने की एक आटोमैटिक (स्वचालित) मशीन लगी है। ( मैं बीएचयू में ही भौतिकी-शिक्षक था।) उस दिन मैं अपनी और अपने परिवारी जनों के पासबुक लेकर बैंक पहुंचा था। उन पासबुकों पर कोई तीन-एक साल से प्रिंटिग (मुद्रण) नहीं हुई थी, क्योंकि घर पर ही इंटरनेट से बैंक-खातों की जानकारी मिल जाया करती है। किंतु मौका देख विचार आया कि पासबुकें प्रिंट कर ली जाएं। मैं मशीन के पास लगी पंक्ति में शामिल हो गया। अपनी बारी आने पर मैंने पाया कि मेरी अकेली एक पासबुक प्रिंट होने में ही पर्याप्त समय लग रहा है। चूंकि बैंक के ग्राहकसेवा का समय समाप्त हो चला था, अतः उस स्थान की भीड़ छंटने लगी थी। सदाशयता के नाते मैं पंक्ति से बाहर निकल आया यह सोचकर कि जब अन्य जनों का कार्य पूरा हो जाएगा तब फुरसत से अपना कार्य पूरा कर लूंगा।

वह स्वचालित मशीन प्रिंटिंग आरंभ करने से पहले प्रक्रिया संबंधी संदेश ध्वनित रूप में (न कि पर्दे पर लिखित रूप में) प्रदान करती है। उसके पहले ग्राहक को पर्दे पर संदेश मिलता है हिन्दी अथवा अंगरेजी का विकल्प चुनने के बारे में। उपस्थित जन क्या विकल्प चुनते हैं इस पर मैं गौर कर रहा था। मैंने पाया कि हर कोई अंगरेजी का ही विकल्प चुन रहा था। सार्वजनिक स्थल पर यदि ऐसा कुछ घटित हो रहा हो जो मुझे अप्रिय लगे तो मैं टिप्पणी किए बिना प्रायः नहीं रह पाता हूं। मित्र-परिचित मेरे इस स्वभाव को “गंदी आदत” कहते हैं। उक्त अवसर पर सभी को सुनाते हुए मेरे मुंह से निकला, “आप लोग आम तौर पर हिन्दी बोलते हैं, तब यहां पर हिन्दी क्यों नहीं चुन रहे हैं?”

मेरी टिप्पणी सुनना उनके लिए नितांत अप्रत्याशित था। वे प्रश्नभरी निगाह से मेरी ओर देखने लगे। फिर उनमें से एक उच्चशिक्षित एवं संभ्रांत-से लग रहे नौजवान (मेरे अनुमान से बीएचयू में शिक्षक/शोधकर्ता) ने कहा, “हमारी सरकारी व्यवस्था ही ऐसी हो चुकी है कि सर्वत्र अंगरेजी का बोलबाला है। अब तो आदत ही हो चली है अंगरेजी की। तब हिन्दी का प्रयोग न करें तो क्या फर्क पड़ता है?” और उसके बाद देखा कि उन्होंने अंगरेजी का ही विकल्प चुना।

वहां मौजूद अधिकांशतः सभी चुप रहे। कुछ मेरी ओर मुस्कराते हुए देखने लगे, गोया कि मैंने कोई अजीब-सी या बेतुकी बात कही हो। फिर एक अधेड़ – जो हावभाव से बीएचयू के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लग रहे थे – की प्रतिक्रिया आई, “अंगरेजी तो सारी दुनिया में चल रही है। तब उसे छोड़ हिन्दी में कार्य करने का क्या फायदा?”

मैंने पहले व्यक्ति को यह समझाने की कोशिश की कि वस्तुस्थिति को बदलने का प्रयास तो हम में से प्रत्येक को ही करना चाहिए, अन्यथा अंगरेजी के वर्चस्व वाली स्थिति यथावत बनी रहेगी। दूसरे व्यक्ति को मैंने यह जताने का प्रयास किया कि दुनिया के अधिकांश देशों में अंगरेजी का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में उतना नहीं होता जितना अपने देश में। वहां अंगरेजी के बिना भी लोग अपना कार्य बखूबी करते हैं। उन्हें अपनी गलतफहमी छोड़नी चाहिए।

अंगरेजी की वैश्विकता का भ्रम

यह घटना दो बातों की ओर संकेत करती हैः (1) पहला यह कि देशवासियों में यह गंभीर भ्रम व्याप्त है कि विश्व में सर्वत्र अंगरेजी में ही कार्य होता है, और (2) दूसरा यह कि जब केंद्र एवं राज्य सरकारें ही अंगरेजी में कार्य करती हैं, उसी को महत्व दे रही हैं, तो आम आदमी क्यों हिन्दी अपनाए ? यह दूसरी बात अधिक गंभीर है, क्योंकि किसी के भ्रम का निवारण करना संभव है, किंतु प्रशासनिक जडत्व दूर करना असंभव-सा है।

ऊपर जिन दो बातों का उल्लेख मैंने किया है वे उक्त अकेली घटना पर आधारित नहीं हैं। अपने विश्वविद्यालयीय जीवन में तथा अन्य मौकों पर लोगों के साथ बातचीत में मुझे उक्त बातों का अनुभव होता रहा है। लोग अपनी धारणा के पक्ष में तर्क-कुतर्क पेश करते हुए भी पाया है।

लोगबाग शायद अब तक यह भूल गये होंगे कि जब चीन के बीजिंग शहर में ओलंपिक खेल आयोजित (2008) हुए थे तो वहां पहली बार सड़कों, क्रीड़ागनों, होटलों तथा अन्य भवनों के नामपट्ट आदि अंगरेजी में भी लिखे गये थे। उसके पहले अंगरेजी में नामपट्ट कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दिखाई देते थे। यह भी याद करें कि कई जगह तो चीनी से अंगरेजी में किए गए अनुवाद हास्यास्पद हो चले थे।

अभी हाल में मेरे एक निकट संबंधी जर्मनी किसी सम्मेलन में गये थे। उन्होंने बताया कि भारतीयों की आम धारणा के विपरीत उन्हें वहां भाषाई समस्या का सामना करना पड़ा, खास तौर पर छोटे-मोटे होटल-रेस्तरां में। ऐसा ही अनुभव मुझे कोई 30 साल पहले पेरिस में हुआ था। जिन लोगों को चीन, जापान, ब्राजील में प्रवास का अनुभव है वे जानते हैं कि वहां अंगरेजी से काम नहीं चलता। यह भी याद करें कि बोफोर्स घोटाले के आरोपी “ओताविओ क्वात्रोची” को अर्जेंटिना देश से सी.बी.आई. प्रत्यर्पण इसलिए नहीं करा पाई कि स्पेनी भाषा में लिखित मामले से संबंद्ध दस्तावेजों का अंगरेजी में अनुवाद कराने में उसको (सी.बी.आई. को) मुश्किल आ रही थी।

उक्त बातों से क्या निष्कर्ष निकलता है?

यही न कि अंगरेजी की विश्व-व्यापकता को लेकर भारतीयों में भ्रम व्याप्त है जिसके चलते वे अंगरेजी को हर स्थल पर हर अवसर पर वरीयता देते हैं। किंतु इस भ्रम से उनको मुक्त करना अतिकठिन असंभव-सा कार्य है, क्योंकि यह भ्रम बरकरार रहे ऐसा प्रयास करने वाले लोग देश में अधिक हैं उनकी तुलना में जो इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि हिन्दी के कई पक्षधर स्वयं इसी भ्रम में जी रहे हैं और हिन्दी की बात वे भावनावश करते हैं। अंगरेजी की व्यापकता की बात मिथ्या है इसकी बात वे नहीं करते।

मैकॉले की शिक्षा नीति

वे क्या कारण हैं कि अंगरेजी भारतीय भाषाओं के ऊपर अजेय वर्चस्व पा सकी है और वह यहां के जनमानस पर जादुई तरीके से राज करती आ रही है? जो कारण मेरी समझ में आते हैं उनमें प्रमुख है अंगरेजी हुकूमत की वह नीति जिसे लोग “मैकॉले की शिक्षा नीति” के नाम से जानते हैं। करीब पौने दो सौ साल पहले की उस नीति का सार मैकॉले के अधोलिखित कथन में निहित हैः

“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” – T.B. Macaulay, in support of his Education Policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.

हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे करोड़ों जनों के बीच दुभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि से अंग्रेज हों।” (हिन्दी अनुवाद मेरा)

ब्रिटिश हुकूमत की वह नीति कैसे सफल हुई और उसके चलते कैसे एक सशक्त प्रशासनिक बिरादरी ने इस देश में जड़ें जमाई इसकी चर्चा मैं अगले आलेख में करूंगा।  आपको यह स्वीकरना होगा कि विलायत के शासकों ने इसी जमात की मदद से इस देश पर राज किया था। यही वह तबका था जो स्वयं को अंग्रजों के निकट और आम लोगों से अलग रहने/दिखने का शौक रखता था और आज भी रखता है। इस देश का “इंडियाकरण” इसी सामाजिक वर्ग का अघोषित उद्येश्य रहा है ऐसी मेरी प्रबल धारणा है। और भी बहुत कुछ रहा है। … अभी के लिए लगभग पौने-उन्नीस सौ शब्दों का यह आलेख पर्याप्त है। – योगेन्द्र जोशी

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दिव्यांग

आपने पहले कभी –  यों कहें कि दो-तीन साल पह्ले तक – दिव्यांग शब्द सुना था? शायद नहीं सुना होगा। हो सकता है आपकी जानकारी में किसी व्यक्ति का नाम दिव्यांग हो। मैंने भी कुछ समय पहले तक इसे नहीं सुना था । संस्कृत के अपने न्यूनाधिक ज्ञान के कारण इस शब्द को अपरिचित नहीं कहूंगा। परन्तु जिस अर्थ में यह अब प्रचलन में आ गया है वह मेरे लिए नया है। नये अर्थ में इस शब्द से मेरा परिचय दो-ढाई साल पहले हुआ जब देश के प्रधानमंत्री मोदी जी का वाराणसी आगमन हुआ।

दरअसल 2014 की जनवरी माह की 22 तारीख को प्रधानमंत्री मोदी जी हमारे शहर वाराणसी (उनका संसदीय क्षेत्र) आए थे । यहां उन्होंने शारीरिक अथवा मानसिक रूप से असामान्य (अलौकिक नहीं) सामर्थ्य वाले लोगों के बीच उपयोगी उपकरणों/साधनों का वितरण किया। उसी सिलसिले में उन्होंने संबंधित व्यक्तियों के लिए दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया। पहले ऐसे व्यक्तियों के लिए विकलांग शब्द का प्रयोग किया जाता था। किंतु मोदीजी द्वारा सुझाये इस नये शब्द को समाचार माध्यमों ने सोत्साह स्वीकार कर लिया।  आरंभ में मैंने देखा कि दिव्यांग के साथ-साथ विकलांग शब्द का प्रयोग भी समान रूप से हो रहा था, पर अब तो यही शब्द प्रचलन में आ गया है ऐसा लगता है। सरकारी दस्तावेजों में शायद यही मानक बन चुका है। मेरा अनुमान है कि शिक्षा और नौकरी-पेशे से जुड़ी संस्थाओं ने अब तक अपने फ़ॉर्मों में वांछित बदलाव कर लिया होगा।

अंगरेजी का हैंडिकैप्ड अर्थात् विकलांग

कोई व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक तौर पर सामान्य न होकर न्यूनाधिक अक्षम है इस बात को दर्शाने के लिए अंगरेजी में हैंडिकैप्ड (handicapped) शब्द प्रयोग में लिया जाता है। यह शब्द कब और कैसे व्यवहार में आया इस बाबत अंतर्जाल पर विविध स्रोतों से जानकारी उपलब्ध हो सकती है, उदाहरणार्थ snopes.com पर। यह शब्द प्रथमतः खेलों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ था। समय के साथ इसने नये अर्थ ग्रहण किए और आज यह शारीरिक/मानसिक लाभहीनता (disadvantage) की स्थिति के द्योतक के तौर पर प्रयुक्त होता है। कुछ लोग इसके लिए अंगरेजी में physically/mentally disabled शब्द प्रयोग में लेना पसंद करते हैं। अन्य़ लोग differently able का प्रयोग अधिक उचित समझते हैं।

हैंडीकैप्ड शब्द वस्तुस्थिति का समुचित द्योतक है और अभी तक प्रयोग में लिया जाता रहा है, फिर भी आजकल कईयों को यह अपमानजनक या अप्रिय लगने लगा है। तदनुसार अंगरेजी में वैकल्पिक शब्द व्यवहार में लिए जाने लगे हैं। मोदीजी की नजर में ठीक उसी तरह विकलांग शब्द अनुचित लगने लगा होगा, जिसके कारण उन्होंने नये शब्द “दिव्यांग” का प्रयोग अपने वाराणसी संबोधन में किया था। उनको लगता होगा कि हैंडीकैप्ड को दिव्यांग कहना सम्मान-द्योतक है। समाचार-पत्रों ने मोदी जी के इस भाषायी योगदान की जानकारी आम जन को दी, किसी ने निष्पक्ष भाव से तो किसी ने आपत्ति उठाते हुए। (उदाहरण के तौर पर देखें इकनॉमिक_टाइम्ज़ और द_न्यूज़_माइन्यूट।)

मैं नहीं जानता कि यह नया शब्द दिव्यांग उनके अपने दिमाग की उपज है या भाषाविदों ने उनको इसके प्रयोग की सलाह दी थी। अगर शब्दरचना उनकी अपनी है तो क्या किसी भाषाविद्‍ ने किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की होगी? और यदि भाषाविदों ने ही इसे सुझाया हो तो ऐसा क्या सोच के किया होगा?

अनुपयुक्त शब्द दिव्यांग

मुझे इस पर संदेह नहीं कि यह शब्द सुन्दर, कर्णप्रिय और सम्मान-द्योतक है, परंतु जिस मुद्दे की बात की जा रही है उसके संदर्भ में अर्थपूर्ण नहीं लगता है। इससे वह अर्थ नहीं ध्वनित होते हैं जो शारीरिक अक्षमता को दर्शाता हो। मैं क्यों इस शब्द पर आपत्ति उठा रहा हूं इसे समझने के लिए संस्कृत के “दिव्” क्रियाधातु एवं “दिव्य” शब्द पर गौर करना होगा।  यहां पर मैं संस्कृत के शिव वामन आप्टे द्वारा रचित सुविख्यात संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश के पृष्ठ 446-7 एवं हिन्दी के एक शब्दकोश के पृष्ठ 521 की प्रतियां प्रस्तुत कर रहा हूं।

ध्यान दें कि दिव् क्रियाधातु कई अर्थों में प्रयुक्त होती है, किंतु इससे व्युत्पन्न विशेषण दिव्य में इसका अर्थ स्पष्टतः चमकना या उज्ज्वल होना है। तदनुसार इस विशेषण शब्द के अर्थ हैं दैवी, स्वर्गीय, अलौकिक, उज्ज्वल, मनोहर, सुन्दर इत्यादि। कुल मिलाकर दिव्य उस विशिष्ठता को व्यक्त करता है जिसकी केवल कामना की जा सकती है, ऐसी विशिष्ठता जो देवताओं को उपलब्ध है, और जो सामान्यतः मनुष्य के लिए अप्राप्य है।  यह उस दोष का संकेतक नहीं हो सकता है जिससे मनुष्य मुक्त रहना चाहेगा, परंतु जिसका सामना उसे दुर्भाग्य से करना पड़ सकता है। गौर करें कि हिन्दी के शब्दकोश में भी कमोबेश यही बातें उल्लिखित हैं।

अपनी बात आगे बढ़ाऊं इससे पहले यह उल्लेख कर दूं कि दिव्यचक्षु शब्द अंधता से ग्रस्त (अंधे) व्यक्ति के लिए अवश्य इस्तेमाल होता है। परंतु ऐसा करने के खास कारण हैं ऐसा मेरा मानना है। इस तथ्य से सभी परिचित होंगे कि अंधे व्यक्तियों की अन्य ज्ञानेन्द्रियां सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं। कभी-कभी उनकी विशिष्ठ क्षमता को इंगित करने हेतु हम कहते हैं कि उनके पास छठी इंद्रिय है। मैंने उनके लिए प्रज्ञाचक्षु का प्रयोग भी सुना है।

परंतु अन्य प्रकार के शारीरिक/मानसिक दोषों से ग्रस्त जनों के मामले में उक्त प्रकार की बात लागू नहीं होती।

गंभीरता से सोचने पर यही निष्कर्ष निकाला जायेगा कि दिव्यांग उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होना चाहिए जिसका अंग अलौकिक हो, दैवी प्रकार का हो, जिसे पाने की कामना हर कोई करना चाहेगा। उक्त अर्थ के मद्देनजर दिव्यांग किसी का नाम रखा जा सकता है। दिव्यांगना तो अप्सरा के लिए प्रयुक्त भी होता है, और सभी जानते हैं कि अप्सराओं के सौन्दर्य की हम कैसी कल्पना करते हैं।

विकलांग के बदले दिव्यांग का प्रयोग सम्मानसूचक है महज इस कारण से उसके असली अर्थ को भुला देना चाहिए क्या? असल में विकलांग अंगरेजी के physically/mentally disabled का करीब-करीब समानार्थी है। जैसा पहले कहा गया है अंगरेजी में differently able भी प्रयुक्त होता है। उसी की तर्ज पर “भिन्नतः सक्षम” या उसी प्रकार के अन्य शब्द का प्रयोग किया जा सकता है। किंतु दिव्यांग का प्रयोग उसके अर्थ का अनर्थ करना ही समझा जायेगा।

मोदी जी का भाषायी योगदान

मोदी जी देश के 14वें प्रधानमंत्री हैं। उनकी कार्यशैली अपने पूर्ववर्ती 13 प्रधानमंत्रियों की तुलना में काफी भिन्न है। वे कई मानों में “फ़र्स्ट” होंगे। उनमें से एक है उनका भाषायी योगदान करना। नये-नये नारे गढ़ना, नये संयुक्ताक्षर सुझाना, पदबंधों की अपने तरीके से पुनर्व्याख्या करना, आदि उनकी खासियत है। मैं नहीं समझता कि किसी और प्र,मं. ने ऐसी महारत पायी हो या ऐसा करने का विचार उन्हें सूझा भी हो। इस दिशा में उनके “योगदान” का संक्षिप्त उल्लेख यहां पर करना समीचीन होगा:

(1) दिव्यांग तथा ब्रेन गेन – उपर्युक्त दिव्यांग शब्द के अतिरिक्त कितने और शब्दों का योगदान उन्होंने किया मुझे नही मालूम। मुझे वनइंडिया समाचार माध्यम पर उनके द्वारा दिया गया पद-बंध “ब्रेन गेन” (Brain Gain) देखने को मिला जो “ब्रेन ड्रेन” (Brain Drain) के ठीक उलट अर्थ वाली प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सुझाया। अर्थात्‍ बौद्धिक कौशल वालों का विदेश गमन न हो, विपरीत उसके वे देश में ही टिकें और बाहर से लौट आवें। यह शब्द अर्थ तो रखता है, किंतु किसी ने कभी प्रयोग में लिया हो ऐसा लगता नहीं।

(2) नये नारे – मोदी जी ने नये-नये नारे गढ़ने में भी अपना कौशल दिखाया है। कुछ दृष्टांत ये हैं:

Make in India,  Skill India,  Digital India,  Start up India  

मोदी जी ने जब अपने पद की शपथ ली तो राजभाषा हिन्दी का प्रयोग बढ़े उत्साह से किया। यहां तक कि कई विदेशी मेहमानों के साथ दुभाषिये के माध्यम से वार्तालाप किया था। विदेशों में भी प्रायः हिन्दी में बोले। कालान्तर में उनका उत्साह ठंडा पड़ गया। उनका सुप्त अंगरेजी प्रेम अब जग चुका है। उनके नारे अब अंगरेजी में ही अधिक सुनने को मिलते हैं।

(3) नये सूत्र – मोदी जी ने राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में भी कुछ सूत्र सुझाए हैं, जैसे

Desire +Stability = Resolution

Resolution + Hard Work = Success

Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow

जिसे संक्षेप में वे IT+IT=IT लिखते हैं।

(4) पदबंधों का संक्षिप्तीकरण – योजनाओं में निवेश के संदर्भ में PPP (Private, Public Partnership) को मोदी जी ने PPPP (People, Private, Public Partnership) में बदलकर आम आदमी के निवेश के समावेशन तक पहुंचा दिया। इसी प्रकार 3Ss (तीन S) = Skill, Scale, Speed अथवा Samaveshak, Sarvadeshak, Sarvasparshi की परिभाषा दे डाली। इसी प्रकार Pro People Good Governance के लिए संक्षेप P2G2 और Economy, Environment, Energy, Empathy and Equity के लिए  5Es (पांच E) भी उन्हीं के सुझाए हैं। ऐसे ही अन्य संक्षिप्ताक्षर भी मीडिया में खोजे जा सक्ते हैं। इन सबके अर्थों को मोदी जी ही ठीक-से समझते होंगे।

मोदी जी के ऐसे तमाम प्रयास लोगों को लुभा सकते हैं, मिथ्या दिलाशा दे सकते हैं, अथवा महज प्रमुदित कर सकते हैं। किंतु इनसे कोई जमीनी कार्य भी सिद्ध हो सकता है इसमें मुझे संदेह है।

जिस “दिव्यांग” शब्द से मैंने अपनी बातें प्रस्तुत की है वह प्रसंगोचित नहीं है यह में लेख-समापन पर दुबारा कहना चाहूंगा। योगेन्द्र जोशी

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव का बड़ा ही महत्व है। वहां यह उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है जिस उत्साह से कोलकाता में दुर्गापूजा मनाई जाती है। समय के साथ यह उत्सव भी व्यापकता पा रहा है। मेरे शहर वाराणसी में भी कई गल्ली-मोहल्लों में इस अवसर पर गणेश-प्रतिमाएं स्थापित करके पूजा-अर्चना कार्यक्रम होने लगे हैं। पहले उनके बारे में सुनने को भी नहीं मिलता था।

Ganeshotsav-Shivsena

विगत गणेश-पूजन के अवसर पर मैं मुम्बई महानगर में था। मेरा प्रवास पश्चिम भांडुप इलाके में था। उसे मौके पर मेरी नजर वहां के स्थानीय रेलवे स्टेशन के प्रवेश-मार्ग पर एक राजनैतिक दल के द्वारा स्थापित होर्डिंग पर पड़ी जिसमें जन-साधारण के प्रति बधाई/शुभकामना संदेश प्रस्तुत था। उस होर्डिंग का एक हिस्सा चित्र में प्रस्तुत है। उसमें श्रीगणेश को संबोधित यह श्लोक शामिल है:

वक्रतुंड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभः ।

निर्विघ्नमः कुर मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

इस श्लोक में गणेशजी को विभिन्न विशेषणों से संबोधित किया गया है, किंतु उनमें कुछ की वर्तनी त्रुटिपूर्ण है। सुर्यकोटि के बदले कोटिसूर्य होना चाहिए। कोटिसूर्य समप्रभः सामासिक शब्द है, अतः उसमें कोई रिक्ति नहीं होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त संबोधनात्मक होने के कारण विसर्ग भी नहीं हो सकते। सही है कोटिसूर्यसमप्रभ (करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाला)। इसी प्रकार निर्विघ्नमः के स्थान पर सही निर्विघ्नं, और कुर के बदले कुरु होना चहिए। अतः शुद्ध श्लोक इस प्रकार होगा:

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

(हे वक्रतुण्ड, हे महाकाय, हे कोटिसूर्यसमप्रभ, हे देव, सभी कार्यों में मुझे सर्वदा निर्विघ्न करें । निर्विघ्न = कोई विघ्न न हो जिसे ।) [निर्विघ्न बहुब्रीहि समास होना चाहिए; एक स्थल पर मैंने इसे अव्ययीभाव भी देखा है।] के

[भूल सुधार – टाइप करने में एक गलती — वक्रतुंड के स्थान पर वक्रतुण्ड होना  चाहिए ।]

त्योहारों एवं जन्मदिनों जैसे विशिष्ट अवसरों पर बधाई तथा शुभकामना संदेशों में संस्कृत शब्दों, पदबंधों अथवा श्लोकों का अक्सर प्रयोग किया जाता है । लेकिन कहीं उन्हें त्रुटिपूर्ण तरीके से तो नहीं लिखा जा रहा है इस बात के प्रति कम ही लोग सचेत रहते हैं । मेरा अनुमान है कि त्रुटियां बहुधा उस स्रोत पर भी रहती हैं जहां से उन श्लोकों आदि को उद्धृत किया जाता है । त्रुटिया होना स्वाभाविक है। जब कथन दो-चार जनों के बीच सीमित हो तो त्रुटियां कम खलती हैं, परंतु जब उनको व्यापक स्तर पर प्रकाशित किया जा रहा हो, या सार्वजनिक किया जाता हो, जिन्हें अनेकों जन पढ़ रहे हों तो त्रुटि अधिक खलती है। मैं समझता हूं कि ऐसे अवसरों पर विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए।

एक बार मुझे मंगलकामना संदेश प्राप्त हुआ जिसे किसी चित्र में देवी-स्तुति के तौर पर प्रस्तुत किया गया था। उसमें यह श्लोक मुद्रित था:

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणी नमोःस्तुते ।

इस श्लोक की वर्तनी में विद्यमान कुछएक त्रुटियों को इंगित कर रहा हूं:

(1)    संस्कृत में किसी पद के अंतर्गत वर्णमाला के पांच व्यंजन वर्गों (कवर्ग, चवर्ग, … पवर्ग) के पूर्व अनुस्वार के प्रयोग की परंपरा नहीं है। उसके बदले वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे पञ्चम न कि पंचम। अन्यत्र अनुस्वार प्रयुक्त होता है।

(2)    ध्यान दें कि सही शब्द त्र्यम्बक है न कि त्रयंबक । त्र्यम्बक शिव के लिए प्रयुक्त होता है और त्र्यम्बका पार्वती के लिए जिसका संबोधन त्र्यम्बके होता है ।

(3) सर्व मंगल मांगल्ये सामासिक पद का संबोधन रूप है । समास-जनित पद का निरूपण उसके घटकों को पृथक-पृथक लिखकर नहीं किया जा सकता है । अतः सर्वमंगलमांगल्ये लिखना सही है । यही सर्वार्थसाधिके के लिए भी मान्य है ।

(4) नमोःस्तुते सही नही है । यह वस्तुतः तीन पदों का समुच्चय है – नमः अस्तु ते । श्लोक में नमः अस्तु अनिवार्यतः संधि किए जाने पर नमोऽस्तु लिखा जाएगा जब कि ते पृथक लिखा रहेगा ।

(5) गौरी, नारायणी भी देवी के नाम हैं, किन्तु शिवे आदि की भांति ये भी संबोधन के तौर पर प्रयुक्त हैं। तदनुसार इन्हें गौरि, नारायणि लिखा जाना चाहिए।

इस प्रकार सही श्लोक यों लिखा जा सकता है:

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।।

[भूल सुधार – टाइप करने में एक गलती — त्र्यंबके के स्थान पर त्र्यम्बके  होना  चाहिए ।]

संस्कृत में संधि के अधीन लुप्त हुए को अवग्रह (‍ऽ) से दर्शाने की प्रथा है। (नमः+अस्तु = नमोऽस्तु) 

हाल में दीपावली के अवसर पर श्लोक रूप में अधोलिखित एक मंगलकामना संदेश मिला:

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा ।

शत्रुबुद्धि विनाशाय दीप: ज्योति नमोस्तुते ॥

मेरी समझ में इसमें भी कुछ त्रुटियां हैं ।

  1. मुझे लगता है कि कल्याणं आदि पदों की तरह धनसंपदा भी द्वितीय विभक्ति में होना चाहिए: एकवचन मानें तो धनसंपदाम् बहुवचन मानें तो धनसंपदा:
  2. शत्रुबुद्धि विनाशाय सामासिक होने के कारण रिक्ति बिना शत्रुबुद्धिविनाशाय होना चाहिए ।
  3. इसी प्रकार दीप: ज्योति को दीपस्य ज्योतिः या समास होने पर दीपज्योति: लिखा जाना चाहिए । दीपस्य ज्योति: करने पर नियमानुसार छन्द नहीं रह जाता है, अतः दीपज्योति: ही ठीक है। (ज्योतिष् नपुंसकलिंग है और इसका संबोधन ज्योति: है।)
  4. जैसा पहले कहा जा चुका है नमोस्तुते के बदले सही नमोऽस्तु ते है ।

इस प्रकार सही श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा ।

शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिः नमऽस्तु ते ॥

[भूल सुधार – टाइप करने में एक गलती — नमऽस्तु  के स्थान पर नमोऽस्तु ते  होना  चाहिए ।]

कुछ दिनों पूर्व मुझे अपने समाचारपत्र में निम्नलिखित श्लोक पढ़ने को मिला:

कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिम्‍यजन्त अिह देवताः ।

श्रिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

इस श्लोक में भी वर्तनी की अशुद्धियां हैं। पता नहीं इह के स्थान पर अिह कैसे छ्प गया। सिद्धिम्‍यजन्त: इह संधि नियमों के अनुसार सिद्धिं यजन्त इह लिखा जायेगा न कि सिद्धिम्‍यजन्त इह । संस्कृत में क्षिप्रं (शीघ्र, जल्दी ही) शब्द होता है और शायद श्रिप्रं कोई शब्द नहीं होता है । अतः श्लोक यह होना चाहिए:

कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।

क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

(कर्मों की सिद्धि की कामना करते हुए एवं देवताओं का यजन करते हुए इस मनुष्य लोक में शीघ्र ही कर्म से सिद्धि मिलती है।)

ऐसी त्रुटियां अक्सर देखने को मिल जाती हैं । मैंने कुछ विज्ञापनों में शत् शत् प्रणाम मुद्रित पाया है, जब कि सही शब्द शत (अकारांत) है न कि शत् (हलंत) ।

इसी प्रकार कहीं-कहीं आर्शिवाद लिखा मिलता है आशीर्वाद के स्थान पर ।

और ऐसे ही कई लोग शृंगार (श्‍+ऋ+अनुस्वार) के स्थान पर त्रुटिपूर्ण श्रृंगार (श्‍+र्+ऋ+अनुस्वार) लिखते हैं ।

दीपावली के मौके पर मैंने अखबार में छपे एक विज्ञापन में मंगलभवः शुभकामना संदेश लिखा देखा । यह न तो व्याकरण की दृष्टि से सही है और न इसका सही-सही अर्थ निकल पाता है । कदाचित् इसे मङ्गलं भवतु/भवेत्/भूयात् होना चाहिए । कोई कदाचित मङ्गल: भव भी सोच सकता है । किंतु वह वांछित अर्थ नहीं देता ।

मंगलभव

यों तो पर्याप्त सावधानी के बावजूद त्रुटियां हो ही जाती हैं । लेकिन विशेष उद्धरणों, प्रचलित वाक्यों अथवा नारों में इनका होना कुछ हद तक खलता है ।

मेरी उपर्युक्त समीक्षा पूर्णतः त्रुटिहीन हो ऐसा मैं दावा नहीं करना चाहूंगा, क्योंकि मेरा संस्कृत का ज्ञान उच्चस्तरीय नहीं । अपने सीमित ज्ञान के आधार पर ही मेरी टिप्पणियां हैं ।– योगेन्द्र जोशी

राजभाषा हिन्दी चर्चा में है, कारण मोदी सरकार द्वारा विभागों को दिए गए निर्देश कि वे राजकीय कार्य प्रमुखतया हिन्दी में करें । हिन्दी भारतीय संघ की संविधान-सम्मत राजभाषा है, यानी राजकाज की भाषा । लेकिन संविधान की बात-बात पर दुहाई देने वाले हमारे अधिकांश राजनेता चाहते हैं कि राजकाज मुख्यतः अंगरेजी में ही होते रहना चाहिए और वह भी भविष्य में सदैव के लिए । मैं समझ नहीं पाता कि जब हिन्दी का प्रयोग होना ही नहीं चाहिए, या मात्र खानापूर्ति भर के लिए हो, तब हिन्दी को राजभाषा बनाए रखने का तुक ही क्या है ? लेकिन इस प्रश्न पर विचार करने की जरूरत भी ये नेता महसूस नहीं करते ।

हिन्दी का विरोध उस समय भी हुआ था जब इसे राजभाषा के खिताब से नवाजा जा रहा था । उस काल में अंततोगत्वा संविधान-निर्माण में लगे नेतावृंद सहमत हो ही गये, हिन्दी के साथ सीमित समय के लिए अंगरेजी भी बनाए रखने की शर्त के साथ । वह सीमित समय विगत 63-64 सालों के बाद भी घटने के बजाय अनंतकाल की ओर बढ़ता जा रहा है । पिछली शताब्दी के पचास-साठ के दशकों में विरोध के सर्वाधिक जोरशोर के स्वर तमिल राजनेताओं ने उठाए थे । और आज भी उनका वह विरोध लगभग जैसा का तैसा बरकरार है । उन्होंने शायद कसम खा रखी है कि हिन्दी को लेकर हम न अभी तक बदले हैं और न ही आगे बदलेंगे ।

हिन्दी का जैसा विरोध पचास-साठ के दशक में था वैसा कदाचित अब नहीं रहा । हिन्दी के प्रति तमिलभाषियों का रवैया काफी-कुछ बदल रहा है, भले ही राजनैतिक कारणों से नेताओं का रवैया खास न बदला हो । यों भी इतना जबरदस्त विरोध किसी और राज्य में न तब था और न अब है । वस्तुतः यह तथाकथित तमिल स्वाभिमान से जुड़ा है, ऐसा स्वाभिमान जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । सवाल उठता है कि इस स्वाभिमान को अंगरेजी से कोई खतरा क्यों नहीं होता । मैंने अनुभव किया है कि तमिलनाडु के ही पड़ोसी राज्य केरल में स्थिति आरंभ से ही बहुत कुछ भिन्न रही है, पचास-साठ के दशक में और आज भी ।

इस संबंध में मुझे 1973 की दक्षिण भारत की यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में मेरा नया-नया व्यावसायिक प्रवेश हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । उस काल में बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । दूसरे शहरों से आरंभ होने वाली यात्राओं का आरक्षण आप आज की तरह आसानी से नहीं करा सकते थे । तब रेलवे विभाग इस कार्य को तार (टेलीग्राम) द्वारा संपन्न किया करता था, जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । हां, आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में कम ही होती थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । रेलगाड़ियों के इंतिजार में प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर लेटे अथवा सोते हुए समय गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है । तभी वहां मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । कुछ काल की चुप्पी के पश्चात नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि रेल-यात्राओं के दौरान जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रहते और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । अपने देश के अभिजात वर्ग में पाश्चात्य समाजों की भांति ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन में लोग अब इस मामले में अभिजात बनते जा रहे हैं । अस्तु ।

उन सज्जन से मेरी बातचीत का सिलसिला अंगरेजी में आंरभ हुआ । जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में बताया तो वे अंगरेजी से हिंदी पर उतर आये । इधर हिन्दी तो चलती नहीं होगी अपनी इस धारणा को उनके समक्ष रखते हुए मैंने उनकी हिन्दी पर आश्चर्य व्यक्त किया । लगे हाथ उनकी यात्रा संबंधी अन्य बातें भी उनसे जाननी चाहीं ।

उन्होंने मुझे बताया कि वे केरला के रहने वाले हैं और अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकले हैं । बातचीत से पता चला कि उन्हें कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । उनका कहना था कि इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से बात नहीं कर सकते ।

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनको बताया कि मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उसका थोड़ा अनुभव भी हुआ है । मैंने उनके सामने आशंका जताई कि ऐसा विरोध केरला में भी होता होगा ।

उनका उत्तर नहीं में था । उनका कहना था कि केरला के लोग व्यावहारिक सोच रखते हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं और देश के बाहर भी जाते हैं । वे जानते हंै कि हिन्दी से परहेज करके उन्हें कोई लाभ नहीं होने का ।

मेरा दक्षिण भारत जाना कई बार हो चुका है । हिन्दी को लेकर हर बार मुझे पहले से बेहतर अनुभव हुए हैं । चेन्नई में आज भी हिन्दी अधिक नहीं चलती है, लेकिन उसी राज्य के रामेश्वरम एवं कन्याकुमारी में आपको कोई परेशानी नहीं होती । केरला में हिन्दी के प्रति लोगों का झुकाव है यह बात मुझे एक बार वहां के दो शिक्षकों ने बताई थी जिसका उल्लेख मैंने अपनी अन्य पोस्ट में किया है । इसका मतलब यह नहीं कि वहां हर कोई हिन्दी जानता हो । किसी भाषा का अभ्यास एवं प्रयेाग के पर्याप्त अवसर होने चाहिए जो आम आदमी को नहीं होते । लेकिन विरोध जैसी कोई चीज वहां सामान्यतः नहीं है । – योगेन्द्र जोशी