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हिन्दी दिवस, २०१६

आज हिन्दी दिवस है, १४ सितंबर। सन् १९५० से आज तक ६६ वर्षों से हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, एक ही ढर्रे से। कहीं वन-डे प्रोग्राम (यानी एकल-दिवसीय कार्यक्रम), तो कहीं वन-वीक प्रोग्राम (साप्ताहिक कार्यक्रम), और कहीं वन-फ़ोर्टनाइट प्रोग्राम (पाक्षिक कार्यक्रम)। दिवस मनाने का वही बासी पड़ चुका तरीका। उन लोगों के भाषण होंगे जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर हिन्दी से कोई लेना-देना नहीं, किंतु जिनके सामने हिन्दी के बाबत कुछ कहने की विवशता आ जाती है। हिन्दी आम जन की भाषा है, देश की संपर्क भाषा है, राष्ट्रीय एकता की निशानी है इत्यादि जुमले वक्ताओं के मुख से प्रायः निसृत होते हैं। हमें हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, आधिकारिक कार्य हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में होना चाहिए, इत्यादि सलाह साल-दर-साल दी जाती है। जिन्हें यह सब करना है वे अंगरेजी को यथावत अपनी जगह बनाये रखे हैं।

कथनी एक और कथनी कुछ और। पता नहीं आगामी कितनी दशाब्दियों- शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहेगा।

भाषणबाजी के अलावा हिन्दी दिवस मनाने के और भी तरीके प्रचलन में हैं। संस्थाएं निबंध-लेखन, वाद-विवाद, कर्मियों के लिए हिंदी-टंकण आदि की प्रतिस्पर्धाएं भी आयोजित करती हैं और विजेताओं को पुरस्कृत करती हैं। वर्ष में एक बार सितंबर में यह सब ठीक वैसे ही होता है जैसे पावस ऋतु का आना और जाना। सितंबर की समाप्ति होते-होते आकाश से बादल छंट जाते हैं और उसी के साथ तिरोहित होता है हिन्दी के प्रति जागृत अल्पकालिक उत्साह।

जरूरी है क्या हिन्दी दिवस

इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता को मैं आज तक नहीं समझ सका। पता नहीं कितने देशों में तत्सदृश भाषा दिवस मनाये जाते हैं।  देश यथावत चल रहा है। अंगरेजी की अहमियत बढ़ रही है घट नहीं रही। जो कार्य अंगरेजी में होता आया है वह आज भी वैसे ही चल रहा है। हिन्दी एवं अन्य भाषाएं आम बोलचाल तक सीमित होती जा रही हैं। और वे अंगरेजी के साथ खिचड़ी बनती जा रही हैं। अब हालत यह हो रही है कि कई लोगों की हिन्दी बिना अंगरेजी के समझना मुश्किल है। हिन्दी का अंगरेजीकरण बदस्तूर चल रहा है।

तब क्या है इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता? किसको हिन्दी के प्रति प्रेरित किया जाना है? जिस देश के लोग खुद मान चुके हैं कि अंगरेजी के बिना देश नहीं चल सकता, प्रगति नहीं कर सकता, सुख-समृद्धि की कुंजी तो अंगरेजी है, इत्यादि उन्हें हिन्दी दिवस की क्या जरूरत?

कभी-कभी हिन्दी को लेकर बहुत कुछ लिख जाने का मन होता है मेरा। जोश चढ़ता है लेकिन उसके स्थायित्व की कमी रहती है और लेखन का तारतम्य अक्सर टूट जाता है। लेख की प्रगति स्वयं की दृष्टि में संतोषप्रद नही रह जाती है। फिर भी हाल में अपने अल्पकालिक कनाडा प्रवास के अंगरेजी बनाम फ़्रांसीसी संबंधी अनुभव को पाठकों से साझा करने का विचार है। उस विषय पर दो-तीन लेख लिखने हैं, किंतु आज नहीं। आज तो अपने अनुभवों को लेकर एक दो टिप्पणियां काफ़ी होगा।

मैं उपदेशात्मक या निर्देशात्मक लेख नहीं लिखता। इस ब्लॉग में हो या मेरे दूसरे ब्लॉगों में अथवा अन्यत्र, मेरा लेखन यथासंभव तथ्यों के उद्घाटन पर केंद्रित रहता है। उनसे जिसको जो निष्कर्ष निकालना हो वह निकाले। क्या करने योग्य है क्या नहीं यह सुधी जन स्वयं सोचें।

एक अनुभव यह भी

शुरुआत मैं कुछ समय पहले अपने अनुभव में आए एक वाकये के उल्लेख के साथ कर रहा हूं। घटना हिन्दी से जुड़ी है और हिन्दी क्षेत्र के लोगों का उसके प्रति क्या रवैया है इसकी एक झलक प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं तो रोजमर्रा के जीवन में हम सभी के साथ प्रायः होती रहती हैं, किंतु उन पर सामान्यतः ध्यान नहीं दिया जाता है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के कारण मेरी यह “खराब” आदत बन चुकी है कि मैं घटनाओं को गौर से देखता हूं। अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के कार्य में यह तो करना ही पड़ता था, अन्य स्थलों पर भी आदत से मजबूर रहता हूं। घटना का विवरण कुछ यों है –

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में अवस्थित भारतीय स्टेट बैंक शाखा के अहाते में पासबुक प्रिंट (मुद्रित) करने की एक आटोमैटिक (स्वचालित) मशीन लगी है। ( मैं बीएचयू में ही भौतिकी-शिक्षक था।) उस दिन मैं अपनी और अपने परिवारी जनों के पासबुक लेकर बैंक पहुंचा था। उन पासबुकों पर कोई तीन-एक साल से प्रिंटिग (मुद्रण) नहीं हुई थी, क्योंकि घर पर ही इंटरनेट से बैंक-खातों की जानकारी मिल जाया करती है। किंतु मौका देख विचार आया कि पासबुकें प्रिंट कर ली जाएं। मैं मशीन के पास लगी पंक्ति में शामिल हो गया। अपनी बारी आने पर मैंने पाया कि मेरी अकेली एक पासबुक प्रिंट होने में ही पर्याप्त समय लग रहा है। चूंकि बैंक के ग्राहकसेवा का समय समाप्त हो चला था, अतः उस स्थान की भीड़ छंटने लगी थी। सदाशयता के नाते मैं पंक्ति से बाहर निकल आया यह सोचकर कि जब अन्य जनों का कार्य पूरा हो जाएगा तब फुरसत से अपना कार्य पूरा कर लूंगा।

वह स्वचालित मशीन प्रिंटिंग आरंभ करने से पहले प्रक्रिया संबंधी संदेश ध्वनित रूप में (न कि पर्दे पर लिखित रूप में) प्रदान करती है। उसके पहले ग्राहक को पर्दे पर संदेश मिलता है हिन्दी अथवा अंगरेजी का विकल्प चुनने के बारे में। उपस्थित जन क्या विकल्प चुनते हैं इस पर मैं गौर कर रहा था। मैंने पाया कि हर कोई अंगरेजी का ही विकल्प चुन रहा था। सार्वजनिक स्थल पर यदि ऐसा कुछ घटित हो रहा हो जो मुझे अप्रिय लगे तो मैं टिप्पणी किए बिना प्रायः नहीं रह पाता हूं। मित्र-परिचित मेरे इस स्वभाव को “गंदी आदत” कहते हैं। उक्त अवसर पर सभी को सुनाते हुए मेरे मुंह से निकला, “आप लोग आम तौर पर हिन्दी बोलते हैं, तब यहां पर हिन्दी क्यों नहीं चुन रहे हैं?”

मेरी टिप्पणी सुनना उनके लिए नितांत अप्रत्याशित था। वे प्रश्नभरी निगाह से मेरी ओर देखने लगे। फिर उनमें से एक उच्चशिक्षित एवं संभ्रांत-से लग रहे नौजवान (मेरे अनुमान से बीएचयू में शिक्षक/शोधकर्ता) ने कहा, “हमारी सरकारी व्यवस्था ही ऐसी हो चुकी है कि सर्वत्र अंगरेजी का बोलबाला है। अब तो आदत ही हो चली है अंगरेजी की। तब हिन्दी का प्रयोग न करें तो क्या फर्क पड़ता है?” और उसके बाद देखा कि उन्होंने अंगरेजी का ही विकल्प चुना।

वहां मौजूद अधिकांशतः सभी चुप रहे। कुछ मेरी ओर मुस्कराते हुए देखने लगे, गोया कि मैंने कोई अजीब-सी या बेतुकी बात कही हो। फिर एक अधेड़ – जो हावभाव से बीएचयू के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लग रहे थे – की प्रतिक्रिया आई, “अंगरेजी तो सारी दुनिया में चल रही है। तब उसे छोड़ हिन्दी में कार्य करने का क्या फायदा?”

मैंने पहले व्यक्ति को यह समझाने की कोशिश की कि वस्तुस्थिति को बदलने का प्रयास तो हम में से प्रत्येक को ही करना चाहिए, अन्यथा अंगरेजी के वर्चस्व वाली स्थिति यथावत बनी रहेगी। दूसरे व्यक्ति को मैंने यह जताने का प्रयास किया कि दुनिया के अधिकांश देशों में अंगरेजी का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में उतना नहीं होता जितना अपने देश में। वहां अंगरेजी के बिना भी लोग अपना कार्य बखूबी करते हैं। उन्हें अपनी गलतफहमी छोड़नी चाहिए।

अंगरेजी की वैश्विकता का भ्रम

यह घटना दो बातों की ओर संकेत करती हैः (1) पहला यह कि देशवासियों में यह गंभीर भ्रम व्याप्त है कि विश्व में सर्वत्र अंगरेजी में ही कार्य होता है, और (2) दूसरा यह कि जब केंद्र एवं राज्य सरकारें ही अंगरेजी में कार्य करती हैं, उसी को महत्व दे रही हैं, तो आम आदमी क्यों हिन्दी अपनाए ? यह दूसरी बात अधिक गंभीर है, क्योंकि किसी के भ्रम का निवारण करना संभव है, किंतु प्रशासनिक जडत्व दूर करना असंभव-सा है।

ऊपर जिन दो बातों का उल्लेख मैंने किया है वे उक्त अकेली घटना पर आधारित नहीं हैं। अपने विश्वविद्यालयीय जीवन में तथा अन्य मौकों पर लोगों के साथ बातचीत में मुझे उक्त बातों का अनुभव होता रहा है। लोग अपनी धारणा के पक्ष में तर्क-कुतर्क पेश करते हुए भी पाया है।

लोगबाग शायद अब तक यह भूल गये होंगे कि जब चीन के बीजिंग शहर में ओलंपिक खेल आयोजित (2008) हुए थे तो वहां पहली बार सड़कों, क्रीड़ागनों, होटलों तथा अन्य भवनों के नामपट्ट आदि अंगरेजी में भी लिखे गये थे। उसके पहले अंगरेजी में नामपट्ट कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दिखाई देते थे। यह भी याद करें कि कई जगह तो चीनी से अंगरेजी में किए गए अनुवाद हास्यास्पद हो चले थे।

अभी हाल में मेरे एक निकट संबंधी जर्मनी किसी सम्मेलन में गये थे। उन्होंने बताया कि भारतीयों की आम धारणा के विपरीत उन्हें वहां भाषाई समस्या का सामना करना पड़ा, खास तौर पर छोटे-मोटे होटल-रेस्तरां में। ऐसा ही अनुभव मुझे कोई 30 साल पहले पेरिस में हुआ था। जिन लोगों को चीन, जापान, ब्राजील में प्रवास का अनुभव है वे जानते हैं कि वहां अंगरेजी से काम नहीं चलता। यह भी याद करें कि बोफोर्स घोटाले के आरोपी “ओताविओ क्वात्रोची” को अर्जेंटिना देश से सी.बी.आई. प्रत्यर्पण इसलिए नहीं करा पाई कि स्पेनी भाषा में लिखित मामले से संबंद्ध दस्तावेजों का अंगरेजी में अनुवाद कराने में उसको (सी.बी.आई. को) मुश्किल आ रही थी।

उक्त बातों से क्या निष्कर्ष निकलता है?

यही न कि अंगरेजी की विश्व-व्यापकता को लेकर भारतीयों में भ्रम व्याप्त है जिसके चलते वे अंगरेजी को हर स्थल पर हर अवसर पर वरीयता देते हैं। किंतु इस भ्रम से उनको मुक्त करना अतिकठिन असंभव-सा कार्य है, क्योंकि यह भ्रम बरकरार रहे ऐसा प्रयास करने वाले लोग देश में अधिक हैं उनकी तुलना में जो इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि हिन्दी के कई पक्षधर स्वयं इसी भ्रम में जी रहे हैं और हिन्दी की बात वे भावनावश करते हैं। अंगरेजी की व्यापकता की बात मिथ्या है इसकी बात वे नहीं करते।

मैकॉले की शिक्षा नीति

वे क्या कारण हैं कि अंगरेजी भारतीय भाषाओं के ऊपर अजेय वर्चस्व पा सकी है और वह यहां के जनमानस पर जादुई तरीके से राज करती आ रही है? जो कारण मेरी समझ में आते हैं उनमें प्रमुख है अंगरेजी हुकूमत की वह नीति जिसे लोग “मैकॉले की शिक्षा नीति” के नाम से जानते हैं। करीब पौने दो सौ साल पहले की उस नीति का सार मैकॉले के अधोलिखित कथन में निहित हैः

“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” – T.B. Macaulay, in support of his Education Policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.

हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे करोड़ों जनों के बीच दुभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि से अंग्रेज हों।” (हिन्दी अनुवाद मेरा)

ब्रिटिश हुकूमत की वह नीति कैसे सफल हुई और उसके चलते कैसे एक सशक्त प्रशासनिक बिरादरी ने इस देश में जड़ें जमाई इसकी चर्चा मैं अगले आलेख में करूंगा।  आपको यह स्वीकरना होगा कि विलायत के शासकों ने इसी जमात की मदद से इस देश पर राज किया था। यही वह तबका था जो स्वयं को अंग्रजों के निकट और आम लोगों से अलग रहने/दिखने का शौक रखता था और आज भी रखता है। इस देश का “इंडियाकरण” इसी सामाजिक वर्ग का अघोषित उद्येश्य रहा है ऐसी मेरी प्रबल धारणा है। और भी बहुत कुछ रहा है। … अभी के लिए लगभग पौने-उन्नीस सौ शब्दों का यह आलेख पर्याप्त है। – योगेन्द्र जोशी

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दिव्यांग

आपने पहले कभी –  यों कहें कि दो-तीन साल पह्ले तक – दिव्यांग शब्द सुना था? शायद नहीं सुना होगा। हो सकता है आपकी जानकारी में किसी व्यक्ति का नाम दिव्यांग हो। मैंने भी कुछ समय पहले तक इसे नहीं सुना था । संस्कृत के अपने न्यूनाधिक ज्ञान के कारण इस शब्द को अपरिचित नहीं कहूंगा। परन्तु जिस अर्थ में यह अब प्रचलन में आ गया है वह मेरे लिए नया है। नये अर्थ में इस शब्द से मेरा परिचय दो-ढाई साल पहले हुआ जब देश के प्रधानमंत्री मोदी जी का वाराणसी आगमन हुआ।

दरअसल 2014 की जनवरी माह की 22 तारीख को प्रधानमंत्री मोदी जी हमारे शहर वाराणसी (उनका संसदीय क्षेत्र) आए थे । यहां उन्होंने शारीरिक अथवा मानसिक रूप से असामान्य (अलौकिक नहीं) सामर्थ्य वाले लोगों के बीच उपयोगी उपकरणों/साधनों का वितरण किया। उसी सिलसिले में उन्होंने संबंधित व्यक्तियों के लिए दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया। पहले ऐसे व्यक्तियों के लिए विकलांग शब्द का प्रयोग किया जाता था। किंतु मोदीजी द्वारा सुझाये इस नये शब्द को समाचार माध्यमों ने सोत्साह स्वीकार कर लिया।  आरंभ में मैंने देखा कि दिव्यांग के साथ-साथ विकलांग शब्द का प्रयोग भी समान रूप से हो रहा था, पर अब तो यही शब्द प्रचलन में आ गया है ऐसा लगता है। सरकारी दस्तावेजों में शायद यही मानक बन चुका है। मेरा अनुमान है कि शिक्षा और नौकरी-पेशे से जुड़ी संस्थाओं ने अब तक अपने फ़ॉर्मों में वांछित बदलाव कर लिया होगा।

अंगरेजी का हैंडिकैप्ड अर्थात् विकलांग

कोई व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक तौर पर सामान्य न होकर न्यूनाधिक अक्षम है इस बात को दर्शाने के लिए अंगरेजी में हैंडिकैप्ड (handicapped) शब्द प्रयोग में लिया जाता है। यह शब्द कब और कैसे व्यवहार में आया इस बाबत अंतर्जाल पर विविध स्रोतों से जानकारी उपलब्ध हो सकती है, उदाहरणार्थ snopes.com पर। यह शब्द प्रथमतः खेलों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ था। समय के साथ इसने नये अर्थ ग्रहण किए और आज यह शारीरिक/मानसिक लाभहीनता (disadvantage) की स्थिति के द्योतक के तौर पर प्रयुक्त होता है। कुछ लोग इसके लिए अंगरेजी में physically/mentally disabled शब्द प्रयोग में लेना पसंद करते हैं। अन्य़ लोग differently able का प्रयोग अधिक उचित समझते हैं।

हैंडीकैप्ड शब्द वस्तुस्थिति का समुचित द्योतक है और अभी तक प्रयोग में लिया जाता रहा है, फिर भी आजकल कईयों को यह अपमानजनक या अप्रिय लगने लगा है। तदनुसार अंगरेजी में वैकल्पिक शब्द व्यवहार में लिए जाने लगे हैं। मोदीजी की नजर में ठीक उसी तरह विकलांग शब्द अनुचित लगने लगा होगा, जिसके कारण उन्होंने नये शब्द “दिव्यांग” का प्रयोग अपने वाराणसी संबोधन में किया था। उनको लगता होगा कि हैंडीकैप्ड को दिव्यांग कहना सम्मान-द्योतक है। समाचार-पत्रों ने मोदी जी के इस भाषायी योगदान की जानकारी आम जन को दी, किसी ने निष्पक्ष भाव से तो किसी ने आपत्ति उठाते हुए। (उदाहरण के तौर पर देखें इकनॉमिक_टाइम्ज़ और द_न्यूज़_माइन्यूट।)

मैं नहीं जानता कि यह नया शब्द दिव्यांग उनके अपने दिमाग की उपज है या भाषाविदों ने उनको इसके प्रयोग की सलाह दी थी। अगर शब्दरचना उनकी अपनी है तो क्या किसी भाषाविद्‍ ने किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की होगी? और यदि भाषाविदों ने ही इसे सुझाया हो तो ऐसा क्या सोच के किया होगा?

अनुपयुक्त शब्द दिव्यांग

मुझे इस पर संदेह नहीं कि यह शब्द सुन्दर, कर्णप्रिय और सम्मान-द्योतक है, परंतु जिस मुद्दे की बात की जा रही है उसके संदर्भ में अर्थपूर्ण नहीं लगता है। इससे वह अर्थ नहीं ध्वनित होते हैं जो शारीरिक अक्षमता को दर्शाता हो। मैं क्यों इस शब्द पर आपत्ति उठा रहा हूं इसे समझने के लिए संस्कृत के “दिव्” क्रियाधातु एवं “दिव्य” शब्द पर गौर करना होगा।  यहां पर मैं संस्कृत के शिव वामन आप्टे द्वारा रचित सुविख्यात संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश के पृष्ठ 446-7 एवं हिन्दी के एक शब्दकोश के पृष्ठ 521 की प्रतियां प्रस्तुत कर रहा हूं।

ध्यान दें कि दिव् क्रियाधातु कई अर्थों में प्रयुक्त होती है, किंतु इससे व्युत्पन्न विशेषण दिव्य में इसका अर्थ स्पष्टतः चमकना या उज्ज्वल होना है। तदनुसार इस विशेषण शब्द के अर्थ हैं दैवी, स्वर्गीय, अलौकिक, उज्ज्वल, मनोहर, सुन्दर इत्यादि। कुल मिलाकर दिव्य उस विशिष्ठता को व्यक्त करता है जिसकी केवल कामना की जा सकती है, ऐसी विशिष्ठता जो देवताओं को उपलब्ध है, और जो सामान्यतः मनुष्य के लिए अप्राप्य है।  यह उस दोष का संकेतक नहीं हो सकता है जिससे मनुष्य मुक्त रहना चाहेगा, परंतु जिसका सामना उसे दुर्भाग्य से करना पड़ सकता है। गौर करें कि हिन्दी के शब्दकोश में भी कमोबेश यही बातें उल्लिखित हैं।

अपनी बात आगे बढ़ाऊं इससे पहले यह उल्लेख कर दूं कि दिव्यचक्षु शब्द अंधता से ग्रस्त (अंधे) व्यक्ति के लिए अवश्य इस्तेमाल होता है। परंतु ऐसा करने के खास कारण हैं ऐसा मेरा मानना है। इस तथ्य से सभी परिचित होंगे कि अंधे व्यक्तियों की अन्य ज्ञानेन्द्रियां सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं। कभी-कभी उनकी विशिष्ठ क्षमता को इंगित करने हेतु हम कहते हैं कि उनके पास छठी इंद्रिय है। मैंने उनके लिए प्रज्ञाचक्षु का प्रयोग भी सुना है।

परंतु अन्य प्रकार के शारीरिक/मानसिक दोषों से ग्रस्त जनों के मामले में उक्त प्रकार की बात लागू नहीं होती।

गंभीरता से सोचने पर यही निष्कर्ष निकाला जायेगा कि दिव्यांग उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होना चाहिए जिसका अंग अलौकिक हो, दैवी प्रकार का हो, जिसे पाने की कामना हर कोई करना चाहेगा। उक्त अर्थ के मद्देनजर दिव्यांग किसी का नाम रखा जा सकता है। दिव्यांगना तो अप्सरा के लिए प्रयुक्त भी होता है, और सभी जानते हैं कि अप्सराओं के सौन्दर्य की हम कैसी कल्पना करते हैं।

विकलांग के बदले दिव्यांग का प्रयोग सम्मानसूचक है महज इस कारण से उसके असली अर्थ को भुला देना चाहिए क्या? असल में विकलांग अंगरेजी के physically/mentally disabled का करीब-करीब समानार्थी है। जैसा पहले कहा गया है अंगरेजी में differently able भी प्रयुक्त होता है। उसी की तर्ज पर “भिन्नतः सक्षम” या उसी प्रकार के अन्य शब्द का प्रयोग किया जा सकता है। किंतु दिव्यांग का प्रयोग उसके अर्थ का अनर्थ करना ही समझा जायेगा।

मोदी जी का भाषायी योगदान

मोदी जी देश के 14वें प्रधानमंत्री हैं। उनकी कार्यशैली अपने पूर्ववर्ती 13 प्रधानमंत्रियों की तुलना में काफी भिन्न है। वे कई मानों में “फ़र्स्ट” होंगे। उनमें से एक है उनका भाषायी योगदान करना। नये-नये नारे गढ़ना, नये संयुक्ताक्षर सुझाना, पदबंधों की अपने तरीके से पुनर्व्याख्या करना, आदि उनकी खासियत है। मैं नहीं समझता कि किसी और प्र,मं. ने ऐसी महारत पायी हो या ऐसा करने का विचार उन्हें सूझा भी हो। इस दिशा में उनके “योगदान” का संक्षिप्त उल्लेख यहां पर करना समीचीन होगा:

(1) दिव्यांग तथा ब्रेन गेन – उपर्युक्त दिव्यांग शब्द के अतिरिक्त कितने और शब्दों का योगदान उन्होंने किया मुझे नही मालूम। मुझे वनइंडिया समाचार माध्यम पर उनके द्वारा दिया गया पद-बंध “ब्रेन गेन” (Brain Gain) देखने को मिला जो “ब्रेन ड्रेन” (Brain Drain) के ठीक उलट अर्थ वाली प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सुझाया। अर्थात्‍ बौद्धिक कौशल वालों का विदेश गमन न हो, विपरीत उसके वे देश में ही टिकें और बाहर से लौट आवें। यह शब्द अर्थ तो रखता है, किंतु किसी ने कभी प्रयोग में लिया हो ऐसा लगता नहीं।

(2) नये नारे – मोदी जी ने नये-नये नारे गढ़ने में भी अपना कौशल दिखाया है। कुछ दृष्टांत ये हैं:

Make in India,  Skill India,  Digital India,  Start up India  

मोदी जी ने जब अपने पद की शपथ ली तो राजभाषा हिन्दी का प्रयोग बढ़े उत्साह से किया। यहां तक कि कई विदेशी मेहमानों के साथ दुभाषिये के माध्यम से वार्तालाप किया था। विदेशों में भी प्रायः हिन्दी में बोले। कालान्तर में उनका उत्साह ठंडा पड़ गया। उनका सुप्त अंगरेजी प्रेम अब जग चुका है। उनके नारे अब अंगरेजी में ही अधिक सुनने को मिलते हैं।

(3) नये सूत्र – मोदी जी ने राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में भी कुछ सूत्र सुझाए हैं, जैसे

Desire +Stability = Resolution

Resolution + Hard Work = Success

Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow

जिसे संक्षेप में वे IT+IT=IT लिखते हैं।

(4) पदबंधों का संक्षिप्तीकरण – योजनाओं में निवेश के संदर्भ में PPP (Private, Public Partnership) को मोदी जी ने PPPP (People, Private, Public Partnership) में बदलकर आम आदमी के निवेश के समावेशन तक पहुंचा दिया। इसी प्रकार 3Ss (तीन S) = Skill, Scale, Speed अथवा Samaveshak, Sarvadeshak, Sarvasparshi की परिभाषा दे डाली। इसी प्रकार Pro People Good Governance के लिए संक्षेप P2G2 और Economy, Environment, Energy, Empathy and Equity के लिए  5Es (पांच E) भी उन्हीं के सुझाए हैं। ऐसे ही अन्य संक्षिप्ताक्षर भी मीडिया में खोजे जा सक्ते हैं। इन सबके अर्थों को मोदी जी ही ठीक-से समझते होंगे।

मोदी जी के ऐसे तमाम प्रयास लोगों को लुभा सकते हैं, मिथ्या दिलाशा दे सकते हैं, अथवा महज प्रमुदित कर सकते हैं। किंतु इनसे कोई जमीनी कार्य भी सिद्ध हो सकता है इसमें मुझे संदेह है।

जिस “दिव्यांग” शब्द से मैंने अपनी बातें प्रस्तुत की है वह प्रसंगोचित नहीं है यह में लेख-समापन पर दुबारा कहना चाहूंगा। योगेन्द्र जोशी

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव का बड़ा ही महत्व है। वहां यह उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है जिस उत्साह से कोलकाता में दुर्गापूजा मनाई जाती है। समय के साथ यह उत्सव भी व्यापकता पा रहा है। मेरे शहर वाराणसी में भी कई गल्ली-मोहल्लों में इस अवसर पर गणेश-प्रतिमाएं स्थापित करके पूजा-अर्चना कार्यक्रम होने लगे हैं। पहले उनके बारे में सुनने को भी नहीं मिलता था।

Ganeshotsav-Shivsena

विगत गणेश-पूजन के अवसर पर मैं मुम्बई महानगर में था। मेरा प्रवास पश्चिम भांडुप इलाके में था। उसे मौके पर मेरी नजर वहां के स्थानीय रेलवे स्टेशन के प्रवेश-मार्ग पर एक राजनैतिक दल के द्वारा स्थापित होर्डिंग पर पड़ी जिसमें जन-साधारण के प्रति बधाई/शुभकामना संदेश प्रस्तुत था। उस होर्डिंग का एक हिस्सा चित्र में प्रस्तुत है। उसमें श्रीगणेश को संबोधित यह श्लोक शामिल है:

वक्रतुंड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभः ।

निर्विघ्नमः कुर मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

इस श्लोक में गणेशजी को विभिन्न विशेषणों से संबोधित किया गया है, किंतु उनमें कुछ की वर्तनी त्रुटिपूर्ण है। सुर्यकोटि के बदले कोटिसूर्य होना चाहिए। कोटिसूर्य समप्रभः सामासिक शब्द है, अतः उसमें कोई रिक्ति नहीं होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त संबोधनात्मक होने के कारण विसर्ग भी नहीं हो सकते। सही है कोटिसूर्यसमप्रभ (करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाला)। इसी प्रकार निर्विघ्नमः के स्थान पर सही निर्विघ्नं, और कुर के बदले कुरु होना चहिए। अतः शुद्ध श्लोक इस प्रकार होगा:

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

(हे वक्रतुण्ड, हे महाकाय, हे कोटिसूर्यसमप्रभ, हे देव, सभी कार्यों में मुझे सर्वदा निर्विघ्न करें । निर्विघ्न = कोई विघ्न न हो जिसे ।) [निर्विघ्न बहुब्रीहि समास होना चाहिए; एक स्थल पर मैंने इसे अव्ययीभाव भी देखा है।]

त्योहारों एवं जन्मदिनों जैसे विशिष्ट अवसरों पर बधाई तथा शुभकामना संदेशों में संस्कृत शब्दों, पदबंधों अथवा श्लोकों का अक्सर प्रयोग किया जाता है । लेकिन कहीं उन्हें त्रुटिपूर्ण तरीके से तो नहीं लिखा जा रहा है इस बात के प्रति कम ही लोग सचेत रहते हैं । मेरा अनुमान है कि त्रुटियां बहुधा उस स्रोत पर भी रहती हैं जहां से उन श्लोकों आदि को उद्धृत किया जाता है । त्रुटिया होना स्वाभाविक है। जब कथन दो-चार जनों के बीच सीमित हो तो त्रुटियां कम खलती हैं, परंतु जब उनको व्यापक स्तर पर प्रकाशित किया जा रहा हो, या सार्वजनिक किया जाता हो, जिन्हें अनेकों जन पढ़ रहे हों तो त्रुटि अधिक खलती है। मैं समझता हूं कि ऐसे अवसरों पर विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए।

एक बार मुझे मंगलकामना संदेश प्राप्त हुआ जिसे किसी चित्र में देवी-स्तुति के तौर पर प्रस्तुत किया गया था। उसमें यह श्लोक मुद्रित था:

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणी नमोःस्तुते ।

इस श्लोक की वर्तनी में विद्यमान कुछएक त्रुटियों को इंगित कर रहा हूं:

(1)    संस्कृत में किसी पद के अंतर्गत वर्णमाला के पांच व्यंजन वर्गों (कवर्ग, चवर्ग, … पवर्ग) के पूर्व अनुस्वार के प्रयोग की परंपरा नहीं है। उसके बदले वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे पञ्चम न कि पंचम। अन्यत्र अनुस्वार प्रयुक्त होता है।

(2)    ध्यान दें कि सही शब्द त्र्यम्बक है न कि त्रयंबक । त्र्यम्बक शिव के लिए प्रयुक्त होता है और त्र्यम्बका पार्वती के लिए जिसका संबोधन त्र्यम्बके होता है ।

(3) सर्व मंगल मांगल्ये सामासिक पद का संबोधन रूप है । समास-जनित पद का निरूपण उसके घटकों को पृथक-पृथक लिखकर नहीं किया जा सकता है । अतः सर्वमंगलमांगल्ये लिखना सही है । यही सर्वार्थसाधिके के लिए भी मान्य है ।

(4) नमोःस्तुते सही नही है । यह वस्तुतः तीन पदों का समुच्चय है – नमः अस्तु ते । श्लोक में नमः अस्तु अनिवार्यतः संधि किए जाने पर नमोऽस्तु लिखा जाएगा जब कि ते पृथक लिखा रहेगा ।

(5) गौरी, नारायणी भी देवी के नाम हैं, किन्तु शिवे आदि की भांति ये भी संबोधन के तौर पर प्रयुक्त हैं। तदनुसार इन्हें गौरि, नारायणि लिखा जाना चाहिए।

इस प्रकार सही श्लोक यों लिखा जा सकता है:

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।।

संस्कृत में संधि के अधीन लुप्त हुए को अवग्रह (‍ऽ) से दर्शाने की प्रथा है। (नमः+अस्तु = नमोऽस्तु) 

हाल में दीपावली के अवसर पर श्लोक रूप में अधोलिखित एक मंगलकामना संदेश मिला:

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा ।

शत्रुबुद्धि विनाशाय दीप: ज्योति नमोस्तुते ॥

मेरी समझ में इसमें भी कुछ त्रुटियां हैं ।

  1. मुझे लगता है कि कल्याणं आदि पदों की तरह धनसंपदा भी द्वितीय विभक्ति में होना चाहिए: एकवचन मानें तो धनसंपदाम् बहुवचन मानें तो धनसंपदा:
  2. शत्रुबुद्धि विनाशाय सामासिक होने के कारण रिक्ति बिना शत्रुबुद्धिविनाशाय होना चाहिए ।
  3. इसी प्रकार दीप: ज्योति को दीपस्य ज्योतिः या समास होने पर दीपज्योति: लिखा जाना चाहिए । दीपस्य ज्योति: करने पर नियमानुसार छन्द नहीं रह जाता है, अतः दीपज्योति: ही ठीक है। (ज्योतिष् नपुंसकलिंग है और इसका संबोधन ज्योति: है।)
  4. जैसा पहले कहा जा चुका है नमोस्तुते के बदले सही नमोऽस्तु ते है ।

इस प्रकार सही श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा ।

शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिः नमऽस्तु ते ॥

कुछ दिनों पूर्व मुझे अपने समाचारपत्र में निम्नलिखित श्लोक पढ़ने को मिला:

कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिम्‍यजन्त अिह देवताः ।

श्रिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

इस श्लोक में भी वर्तनी की अशुद्धियां हैं। पता नहीं इह के स्थान पर अिह कैसे छ्प गया। सिद्धिम्‍यजन्त: इह संधि नियमों के अनुसार सिद्धिं यजन्त इह लिखा जायेगा न कि सिद्धिम्‍यजन्त इह । संस्कृत में क्षिप्रं (शीघ्र, जल्दी ही) शब्द होता है और शायद श्रिप्रं कोई शब्द नहीं होता है । अतः श्लोक यह होना चाहिए:

कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।

क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

(कर्मों की सिद्धि की कामना करते हुए एवं देवताओं का यजन करते हुए इस मनुष्य लोक में शीघ्र ही कर्म से सिद्धि मिलती है।)

ऐसी त्रुटियां अक्सर देखने को मिल जाती हैं । मैंने कुछ विज्ञापनों में शत् शत् प्रणाम मुद्रित पाया है, जब कि सही शब्द शत (अकारांत) है न कि शत् (हलंत) ।

इसी प्रकार कहीं-कहीं आर्शिवाद लिखा मिलता है आशीर्वाद के स्थान पर ।

और ऐसे ही कई लोग शृंगार (श्‍+ऋ+अनुस्वार) के स्थान पर त्रुटिपूर्ण श्रृंगार (श्‍+र्+ऋ+अनुस्वार) लिखते हैं ।

दीपावली के मौके पर मैंने अखबार में छपे एक विज्ञापन में मंगलभवः शुभकामना संदेश लिखा देखा । यह न तो व्याकरण की दृष्टि से सही है और न इसका सही-सही अर्थ निकल पाता है । कदाचित् इसे मङ्गलं भवतु/भवेत्/भूयात् होना चाहिए । कोई कदाचित मङ्गल: भव भी सोच सकता है । किंतु वह वांछित अर्थ नहीं देता ।

मंगलभव

यों तो पर्याप्त सावधानी के बावजूद त्रुटियां हो ही जाती हैं । लेकिन विशेष उद्धरणों, प्रचलित वाक्यों अथवा नारों में इनका होना कुछ हद तक खलता है ।

मेरी उपर्युक्त समीक्षा पूर्णतः त्रुटिहीन हो ऐसा मैं दावा नहीं करना चाहूंगा, क्योंकि मेरा संस्कृत का ज्ञान उच्चस्तरीय नहीं । अपने सीमित ज्ञान के आधार पर ही मेरी टिप्पणियां हैं ।– योगेन्द्र जोशी

हिन्दी प्रेमियों के लिए समाचार। (9 सितंबर 2015)

स्रोत (Sourse) –  https://news.google.com/news/story?ncl=http://bhasha.ptinews.com/news/1304019_bhasha&hl=hi&geo=IN

अब हिन्दी सोशल साइट ‘मूषक’ पर किजिए दिल खोलकर बातें

Live हिन्दुस्तान – ‎17 घंटे पहले‎
भोपाल। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ एवं उनके साथियों ने आज यहां टिवटर की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला मूषक सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश किया है। हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट मूषक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां टिवटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ …

हिन्दी भाषी लोगों के लिए हिन्दी में आएगी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’

एनडीटीवी खबर – ‎17 घंटे पहले‎
भोपाल: दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ व उनके साथियों ने मंगलवार को भोपाल में ‘ट्विटर’ की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला ‘मूषक’ सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश की है। यह साइट अभी ऑनलाइन नहीं हुई है, कहा जा रहा है कि 10 सितंबर को इसे जारी किया जाएगा। हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां ट्विटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, …

..अब आया हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’

Bhasha-PTI – ‎18 घंटे पहले‎
भोपाल, आठ सितंबर :भाषा: दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ एवं उनके साथियों ने आज यहां ‘ट्विटर’ की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला ‘मूषक’ सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश किया है। हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी :सीईओ: अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां ट्विटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में …

विश्‍व हिंदी सम्मेलन: टि्वटर की तर्ज पर हिन्दी में आया ‘मूषक’

Nai Dunia – ‎4 घंटे पहले‎
भोपाल(मध्‍यप्रदेश)। टि्वटर की तर्ज पर अब लोग हिन्दी भाषा की सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ का उपयोग कर सकेंगे। सोशल मीडिया में हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए इसे शुरू किया गया है। पुणे शहर से संचालित इस साइट में कई ऐसे फीचर हैं, जो टि्वटर से बेहतर हैं। अभी तक मूषक पर 10 हजार से अधिक अकाउंट बन चुके हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलन में मूषक का एक बूथ लगाया जाएगा,जिसमें इसके बारे में लोगों को बताया जाएगा। यह जानकारी मंगलवार को मूषक के सीईओ अनुराग गौड़ व तकनीकी प्रमुख अमित सिंह ने संवाददातओं को दी। गौड़ ने बताया कि सोशल मीडिया में हिन्दी लगभग गायब है। इसको देखते हुए उन्होंने मूषक …

“मूषक”-हिन्दीभाषियों के लिए सोशल नेटवर्किग साइट

khaskhabar.com हिन्दी – ‎16 घंटे पहले‎
भोपाल। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड व उनके साथियों ने मंगलवार को भोपाल में पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला मूषक सोशल नेटवर्किग साइट देशवासियों और हिन्दीप्रेमियों के लिए पेश किया है। हिन्दी सोशल नेटवर्किग साइट मूषक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अनुराग गौड ने बताया कि जहां टि्वटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ हिन्दी को …

एक प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास मैं अरसे से करता आ रहा हूं कि किसी भाषा में अन्य भाषाओं, विशेषतः विदेशी भाषाओं, के शब्द किस सीमा तक ठूंसे जाने चाहिए और किन परिस्थितियों में । क्या इतर भाषाओं के शब्दों का प्रयोग इस सीमा तक किया जाना चाहिए कि उनसे अपनी भाषा के प्रचलित शब्द विस्थापित होने लगें ? क्या इस तथ्य को भूला देना चाहिए कि जब कोई शब्द लोगों की जुबान पर छा जाए तो उसके तुल्य अन्य शब्द अपरिचित-से लगने लगेंगे ? क्या समय के साथ वे आम भाषा से गायब नहीं हो जाएंगे ? जो लोग अपनी मातृभाषा तथा अन्य सीखी गई भाषाओं की शब्द-संपदा में रुचि रखते हैं उनकी बात छोड़ दें । वे तो उन शब्दों का भी प्रयोग बखूबी कर सकते हैं जिन्हें अन्य जन समझ ही न पाएं । मैं हिन्दी के संदर्भ में बात कर रहा हूं । ऐसे अवसरों पर लोग अक्सर कहते हैं “जनाब, कठिन संस्कृत शब्द मत इस्तेमाल कीजिए ।” (भले ही वह संस्कृत मूल का शब्द ही न हो ।)

अंगेरजी को लेकर हम भारतीय हीनभावना से ग्रस्त हैं । अगर कोई संभ्रांत व्यक्ति लोगों के बीच अंगरेजी का उपयुक्त शब्द बोल पाने में असमर्थ हो तो वह स्वयं को हीन समझने लगता है और सोचता है “काश कि मेरी अंगरेजी भी इनके जैसी प्रभावी होती ।” इसके विपरीत स्वयं को हिन्दीभाषी कहने वाला कोई व्यक्ति साफसुथरी हिन्दी (मेरा मतलब है जिसमें हिन्दी प्रचलित शब्द हों और अंगरेजी शब्दों का अनावश्यक प्रयोग न हो) न बोल सके तो वह अपनी कमजोर हिन्दी के लिए शर्मिदा नहीं होगा, बल्कि तर्क-कुतर्कों का सहारा लेकर अपनी कमजोर हिन्दी को उचित ठहराएगा । इतना ही नहीं वह बातचीत में ऐसे अंगरेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करेगा जिनका अर्थ अधिसंख्य लोग न समझ पाते हों । वह इसकी परवाह नहीं करेगा कि दूसरों की अंगरेजी अच्छी हो यह आवश्यक नहीं । वह सोचेगा, भले ही मुख से न कहे, कि लोगों को इतनी भी अंगरेजी नही आती । हिन्दी न आए तो चलेगा, अंगरेजी तो आनी ही चाहिए । वाह !

अधिकांश पढ़ेलिखे, प्रमुखतया शहरी, हिन्दीभाषियों के मुख से अब ऐसी भाषा सुनने को मिलती है जिसे मैं हिन्दी मानने को तैयार नहीं । यह एक ऐसी वर्णसंकर भाषा या मिश्रभाषा है जिसे अंगरेजी जानने लेकिन हिन्दी न जानने वाला स्वाभाविक तौर पर नहीं समझ पाएगा । किंतु उसे वह व्यक्ति भी नहीं समझ सकता जो हिन्दी का तो प्रकांड विद्वान हो पर जिसने अंगरेजी न सीखी हो । इस भाषा को मैंने अन्यत्र मैट्रोहिन्दी नाम दिया है । बोलचाल की हिन्दी तो विकृत हो ही चुकी है, किंतु अब लगता है कि अंगरेजी शब्द साहित्यिक लेखन में भी स्थान पाने लगे हैं । अवश्य ही लेखकों का एक वर्ग कालांतर में तैयार हो जाएगा जो इस ‘नवशैली’ का पक्षधर होगा । आगे कुछ कहने से पहले मैं एक दृष्टांत पेश करता हूं जिसने मुझे अपने ब्लाग (चिट्ठे) में यह सब लिखने को प्रेरित किया है ।

‘साहित्यशिल्पी’ नाम की एक ‘ई-पत्रिका’ से मुझे उसमें शामिल रचनाएं बीच-बीच में ई-मेल से प्राप्त होती रहती हंै । उसकी हालिया एक रचना का ई-पता यानी ‘यूआरएल’ ये हैः

http://www.sahityashilpi.com/2015/07/igo-story-sumantyagi.html

उक्त रचना एक कहानी है जिसका शीर्षक है ‘ईगो’ । यह अंगरेजी शब्द है जिसका अर्थ है ‘अहम्’ जिसे ठीक-ठीक कितने लोग समझते होंगे यह मैं कह नहीं सकता । इस रचना में हिन्दी के सुप्रचलित शब्दों के बदले अंगरेजी के शब्दों का प्रयोग मुझे ‘जमा’ नहीं, इसीलिए टिप्पणी कर रहा हूं । प्रथमतः यह स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई साहित्यिक समीक्षक या समालोचक नहीं हूं बल्कि एक वैज्ञानिक हूं । मैं किसी भी भाषा के सुप्रतिष्ठित शब्दों के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग का विरोधी हूं । इसीलिए तद्विषयक अपनी बात कह रहा हूं ।

उक्त कहानी के शुरुआती परिच्छेद में अंगरेजी शब्द नहीं दिखे मुझे, किंतु “मिस्टर शर्मा” और “मिसेज शर्मा” का उल्लेख हुआ है । आजकल औपचारिक संबोधन के समय कई लोग मिस्टर, मिसेज, मिज आदि का प्रयोग करने लगे हैं । क्या हिन्दी के तुल्य शब्दों का प्रयोग कठिन है ? अथवा हम इस भावना से ग्रस्त रहते हैं कि अंगरेज जो हमें दे गए हैं उसे वरीयता दी जानी चाहिए ? अस्तु । मैं कहानी के पाठ से चुने गए उन वाक्यों/वाक्यांशों/पदबंधों को उद्धृत कर रहा हूं जिनमें विद्यमान अंगरेजी शब्द मुझे अनावश्यक या अटपटे लगते हैं:

“तेरे हेल्प करने से” … “और बैकग्राउंड में” … “मम्मी का म्यूजिक जारी” … “अपनी फैमिली को” … “शर्मा फैमिली को”  … “दोनों काफी टाइम चैटरबॉक्स बनी रहती” …”पर्सनल बातें शेयर करती” … “वो स्टडी से रिलेटेड हों या फैमिली से” … “कुछ भी स्पेशल हो” … “दोनों का चैट ऑप्सन हमेशा ऑन रहता” … “ननद-भाभी न हों बेस्ट फ्रेंड्स हों” … “अपनी जॉब के लिए” … “अपनी स्टडी कंपलीट करने” … “जिंदगी में कोई टिवस्ट न हो” … “ऋचा और टीना की लाइफ रील लाइफ न होकर रियल लाइफ थी” … “फोन डिसकनेक्ट कर दिया” … “पूरी फैमिली को दहेज के लिए ब्लेम कर दिया” … “जिसका परपज” … “एक नॉर्मल बात” … “फ्रेंडशिप का कोई महत्व नहीं” … “एक लविंग और केयरिंग फ्रेंड की तरह” … “हमारा रिलेशन स्पेशल हो” … “उनको इग्नोर करने” … “जरा भी अंडरस्टैंडिंग नहीं थी” … “इतनी ही थी उनकी फ्रेंडशिप” … “सॉरी कह चुकी थी” … “फ्रेंडशिप की खुशबू” … “ऋचा स्टडी कंप्लीट करके” … “काम में बिजी रखती” …”जितनी भी ड्यूटीज होती” … “मैसेज किये थे” … “आई मिस यू” … “उसके ईगो ने” … “मेरा ईगो था” … “ऐसा ईगो जाये भाड़ में जो एक फ्रेंड को फ्रेंड से दूर कर दे” … “दिल से सॉरी ,प्लीज मुझे माफ कर दो” … “बोली,´कम´।” … “कोई ईगो प्रॉब्लम नहीं” … 

          उपरिलिखित अनुच्छेद में जो अंगरेजी शब्द मौजूद हैं उनमें से एक या दो को छोड़कर शायद ही कोई हो जिसके लिए सुपरिचित एवं आम तौर पर प्रचलित हिन्दी का तुल्य शब्द न हो । उदाहरणार्थ परिवार, दोस्त/मित्र, दोस्ती/मित्रता, सामान्य/आम, विशेष/खास, एवं समस्या आदि हिन्दी शब्दों के बदले क्रमशः फैमिली, फ्रैंड, फैंडशिप, नॉर्मल, स्पेशल एवं प्रॉब्लम आदि का प्रयोग क्यों किया गया है ? क्या हिन्दीभाषी लोगों की अभिव्यक्ति की विधा से हिन्दी के सदा से प्रचलित शब्द गायब होते जा रहे हैं ? क्या हम “फोन डिसकनेक्ट कर दिया” के बदले “फोन काट दिया”, “फोन रख दिया”, या “फोन बंद कर दिया”जैसे वाक्य प्रयोग में नहीं ले सकते ? थोड़ा प्रयास करने पर उक्त अनुच्छेद के अन्य अंगरेजी शब्दों/पदबंधों/वाक्यांशों के लिए भी तुल्य हिन्दी मिल सकती है ।

आज के अंगरेजी-शिक्षित शहरी हिन्दीभाषियों के बोलचाल एवं लेखन (अभी लेखन कम प्रभावित है) में हिन्दी के बदले अंगरेजी शब्दों की भरमार पर विचार करता हूं तो मुझे अधोलिखित संभावनाएं नजर आती हैं:

(1) पहली संभावना तो यह है कि व्यक्ति हिन्दीमय परिवेश में न रहता आया हो और उसके कारण उसकी हिन्दी-शब्दसंपदा अपर्याप्त हो । हिन्दी-भाषी क्षेत्रों के लेखकों (और उनमें प्रसंगगत कहानी की लेखिका शामिल हैं) पर यह बात लागू नहीं होती होगी ऐसा मेरा अनुमान है ।

(2) दूसरी संभावना है असावधानी अथवा एक प्रकार का उपेक्षाभाव जिसके तहत व्यक्ति इस बात की चिंता न करे कि उसकी अंगरेजी-मिश्रित भाषा दूसरों के समझ में आएगी या नहीं और दूसरे उसे पसंद करेंगे या नहीं । भारतीय समाज में ऐसी लापरवाही मौके-बेमौके देखने को मिलती है, जैसे सड़क पर थूक देना, जहां-तहां वाहन खड़ा कर देना, शादी-ब्याह के मौकों पर सड़कों पर जाम लगा देना, धार्मिक कार्यक्रमों पर लाउडस्पीकरों का बेजा प्रयोग करना, इत्यादि । भाषा को विकृत करने में भी यही उपेक्षाभाव दिखता है।

(3) हमारे देश में व्यावसायिक, वाणिज्यिक एवं शासकीय क्षेत्रों में अंगरेजी छाई हुई है । इसी अंगरेजीमय वातावरण में सभी रह रहे हैं । लोगों को चाहे-अनचाहे अंगरेजी शब्दों का सामना पग-पग पर करना पड़ता है । ऐसे माहौल में कई जनों की स्थिति वैसी हो जाती है जैसी वाराणसी के हिन्दीभाषी मल्लाहों और रिक्शा वालों की, जिनकी जबान पर विदेशी एवं अहिन्दी क्षेत्रों के पर्यटकों के संपर्क के कारण अंगरेजी तथा अन्य भाषाओं के शब्द तैरने लगते हैं । ऐसे माहौल में जिसे अंगरेजी ज्ञान न हो उसे भी अंगरेजी के शब्द स्वाभाविक-परिचित लगने लगते हैं । मुझे यह देखकर खेद होता है कि बोलचाल में लोगों के मुख से अब अंगरेजी शब्द सहज रूप से निकलते हैं न कि हिन्दी के । फिर भी लेखन के समय सोच-समझकर उपयुक्त या वैकल्पिक शब्द चुने जा सकते हैं बशर्ते कि लेखक दिलचस्पी ले ।

(4) कुछ लोगों के मुख से मुझे यह तर्क भी सुनने को मिलता है कि भाषाओं को लेकर संकीर्णता नहीं बरती जानी चाहिए, बल्कि पूरी उदारता के साथ अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहणकर अपनी भाषा को अधिक समर्थ एवं व्यवहार्य बनाना चाहिए । ठीक है, परंतु सवाल उठता है कौन-से शब्द एवं किस भाषा से ? क्या अंगरेजी ही अकेली वह भाषा है जिससे शब्द उधार लेने चाहिए ? और क्या शब्दों का आयात उन शब्दों को विस्थापित करने के लिए किया जाए जिन्हें आज तक सभी जन रोजमर्रा की जिन्दगी में इस्तेमाल करते आए हैं ? क्या यह जरूरी है कि हम एक-दो-तीन के बदले वन-ट्वू-थ्री बोलें ? क्या लाल-पीला-हरा के स्थान पर  रेड-येलो-ग्रीन कहना जरूरी है ? क्या मां-बाप, पति-पत्नी न कहकर पेरेंट्स, हजबैंड-वाइफ कहना उचित है ? क्या हम बच्चों को आंख-नाक-कान भुलाकर आई-नोज-इअर ही सिखाएं ? ऐसे अनेकों शब्द हैं जिन्हें हम भुलाने पर तुले हैं । आज कई बच्चे अड़सठ-उनहत्तर, कत्थई, यकृत जैसे शब्दों के अर्थ नहीं बता सकते हैं । जाहिर है कि आज के प्रचलित शब्द कल अनजाने लगने लगेंगे ।

          हिन्दी को अधिक समर्थ बनाने के नाम पर अंगरेजी के शब्दों को अनेक हिन्दीभाषी बोलचाल में अंधाधुंध तरीके से इस्तेमाल करते आ रहे हैं । वे क्या देशज भाषाओ के शब्दों को भी उतनी ही उदारता से स्वीकार कर रहे हैं ? क्या भारत में प्रचलित अंगरेजी में हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के शब्दों को प्रयोग में लेने का प्रयास कभी किसी ने किया है ? हिन्दीभाषी आदमी “प्लीज मुझे अपनी हिन्दी ग्रामर बुक देना ।” के सदृश वाक्य धड़ल्ले से बोल देता है, परंतु क्या “कृपया गिव मी योअर हिन्दी व्याकरण पुस्तक ।” जैसा वाक्य बोलने की हिम्मत कर सकता है ? हरगिज नहीं । हम भारतीय अंगरेजी की शुद्धता बरकरार रखने के प्रति बेहद सचेत रहते हैं, किंतु अपनी भाषाओं को वर्णसंकरित या विकृत करने में तनिक भी नहीं हिचकते ।

अंगरेजों ने अपनी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द स्वीकार  किए हैं, किंतु अमर्यादित तरीके से नहीं कि वे अपने चिरपरिचित शब्दों को भुला बैठें । इस देश पर करीब 200 वर्ष शासक रूप से रहे किंतु उन्होंने अंगरेजी को हिन्दीमय नहीं कर दिया । कुछ चुने हुए शब्दों की बानगी देखिए:

Avatar (अवतार), Bungalow (बंगला) Cheetah (चीता), Chutney (चटनी), Dacoit (डाकू), Guru (गुरु), Jungle (जंगल), Khaki (खाकी), Loot (लूट), Mantra (मंत्र), Moksha (मोक्ष), Nirvana (निर्वाण), Pundit (पंडित), Pyjamas (पैजामा), Raita (रायता), Roti (रोटी), Thug (ठग), Typhoon (तूफ़ान), Yoga (योग)

इनमें अधिकांश शब्द वे हैं जिनके सटीक तुल्य शब्द अंगरेजी में रहे ही नहीं । मोक्ष, रोटी ऐसे ही शब्द हैं । सोचिए हम जैसे बट, एंड, आलरेडी प्रयोग में लेते हैं वैसे ही क्या वे किंतु, परंतु, और का प्रयोग करते हैं । नहीं न ? क्योंकि ऐसा करने की जरूरत उन्हें न्हीं रही । हमें भी जरूरत नहीं, पर आदत जब बिगड़ चुकी हो तो इलाज कहां है ?

शायद ही कोई देश होगा जिसके लोग रोजमर्रा के सामान्य शब्दों को अंगरेजी शब्दों से विस्थापित करने पर तुले हों ।

हिन्दी को समृद्ध बनाने की वकालत करने वालों से मेरा सवाल है कि क्या अंगरेजी में पारिवारिक रिश्तों को स्पष्टतः संबोधित करने के लिए शब्द हैं ? नहीं न । क्या चाचा, मामा आदि की अभिव्यक्ति के मामले में अंगरेजी कंगाल नहीं है ? क्या हमने हिन्दी के इन शब्दों को अंगरेजी में इस्तेमाल करके उसे समृद्ध किया है ? हिम्मत ही कहां हम भारतीयों में ! मैं नहीं जानता कि मामा-मौसा के संबोधनों को अंगरेजी में कैसे स्पष्ट किया जाता है । “मेरे मामाजी कल मौसाजी के घर जाएंगे ।”को अंगरेजी में कैसे कहा जाएगा ? सीधे के बजाय घुमाफिरा के कहना पडेगा ।

मेरा सवाल यह है कि हम भारतीय हीनग्रंथि से इतना ग्रस्त क्यों हैं कि हिन्दी में अंगरेजी ठूंसकर गर्वान्वित होते हैं और अंगरेजी बोलते  वक्त भूले-से भी कोई हिन्दी शब्द मुंह से निकल पड़े तो शर्मिंदगी महसूस करते हैं ? – योगेन्द्र जोशी

दृष्टांत अंगरेजी  का – स्पाई कैमरा की प्रयोग-विधि

मैंने हाल ही में एक सस्ते किस्म का “स्पाई कैमरा” शौकिया खरीदा, “ई-शॉपिंग” के माध्यम से । आजकल बाजार में चीन के बने सस्ते – और मेरी राय में घटिया दर्जे के – इलेक्ट्रिॉनिक उत्पाद बहुतायत में मिल जाते हैं । अपने देश में तो ये भी नहीं बन पाते हैं, भले ही हम प्रथम प्रयास में ही स्वनिर्मित यान मंगल ग्रह पर उतारने में सक्षम हों । उक्त कैमरे के साथ प्रयोगविधि संबंधी एक पन्ने पर छपी जो पाठ्यसामग्री यानी निर्देश-पुस्तिका मिली उसकी प्रति यहां प्रस्तुत है| यह द्विभाषी है, अंगरेजी एवं चीनी भाषा में मुद्रित । अंगरेजी स्पष्टतः विदेशियों के लिए होगी जो चीनी भाषा नहीं जानते हैं, और चीनी मैडरिन खुद चीनियों के लिए ।

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समझ से परे अंगरेजी

जब मैंने उपर्युक्त निर्देश-पुस्तिका पढ़ने की कोशिश की तो पाया कि इसमें दी गई पाठ्यसामग्री अपनी समझ से परे है । शब्द अंगरेजी के हैं परंतु उनसे सार्थक वाक्य बन पा रहे हैं ऐसा मुझे लगता नहीं । अवश्य ही वर्तनी की त्रुटियां भी कहीं-कहीं दिखाई देती हैं । सही वाक्य-विन्यास एवं अर्थपूर्ण शब्दों के चयन के अभाव में वर्तनी की खास अहमियत नहीं रह जाती है । हो सकता है कि अनुभवी व्यक्ति पाठ का सही-सही अर्थ खोजने में समर्थ हों, किंतु मुझे ऐसा कर पाने में कठिनाई हो रही थी । यह बात अलग है कि अंततः उक्त स्पाई कैमरा की कार्य-प्रणाली तुक्के, सहज बुद्धि और अनुभव के आधार पर मैं खोज निकालने में सफल हो गया ।

अंगरेजी की उक्त पाठ्यसामग्री ने एक सवाल जरूर मेरे सामने खड़ा किया । क्या वजह रही होगी कि कैमरा बनाने वाली कंपनी ढंग की निर्देश-पुस्तिका तैयार नहीं कर पाई । अवश्य ही कंपनी एक छोटी एवं सामान्य संस्था होगी जिसका कारोबार कुटीर उद्योग के माफिक होगा । लेकिन क्या उसकी पहुंच अंगरेजी जानने वाले एवं सीधी-सरल अंगरेजी में उक्त युक्ति के बारे में लिख सकने में समर्थ किसी व्यक्ति तक नहीं रही होगी ? अपने देश भारत में तो आपको अंगरेजी के विशेषज्ञ भले ही आसानी से न मिलें, किंतु संबंधित युक्ति की कार्यप्रणाली का कामचलाऊ लेखाजोखा तो लिख सकने वाले मिल ही जाते । कदाचित ऐसा हुआ होगा कि जिस चीनी व्यक्ति ने उक्त पाठ तैयार किया हो उसे अपनी अंगरेजी ठीक लगी हो, और उसे शंका ही न हुई हो वह ठीक से नहीं समझा पाया है । यह भी हो सकता है कि अंगरेजी में ठीक-ठाक लिख सकने वाले बिना फीस लिए मिले ही न हों, और संस्था उत्पाद सस्ता बना रहे इस विचार से अधिक खर्च करने को तैयार न हों ।

उपर्युक्त निर्देश पुस्तिका देख मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि चीन में लोगों का अंगरेजी ज्ञान उतना अच्छा नहीं होता जितना अपने देशवासी सोचते हैं । मैं उच्चाध्ययन के सिलसिले में इंग्लैंड में रह चुका हूं तथा अमेरिका, फ्रांस, इटली जा चुका हूं, जहां मेरे अनुभव में यही आया है कि चीन के लोग विविध विषयों का ज्ञान तो अच्छा रख सकते हैं, किंतु उन्हें अंगरेजी में अपनी बात ठीक-से प्रस्तुत करने में कठिनाई होती है । दरअसल यूरोप के देशों और अंगरेजों के पराधीन रह चुके देशों को छोड़ दें तो हम यही पाऐंगे कि वहां के अधिकांश निवासियों को अंगरेजी में असुविधा ही होती है । यह बात चीन, जापान, कोरिया पर बखूबी लागू होती है । हम मीडिया में इन देशों के राजनयिकों, मीडिया-कर्मियों, एवं विषय-विशेषज्ञों को देखकर यह निष्कर्ष निकाल बैठते हैं कि वहां की आम जनता को अंगरेजी आती है और वे उसे रोजमर्रा के जीवन में सफलतापूर्वक इस्तेमाल भी करते हैं ।

अंगरेजी उतनी नहीं प्रचलित जितनी बताई जाती है

मुझे अपने एक मित्र की प्रासंगिक बात याद आती है । सिंगापुर की बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत उनके पुत्र को एक बार कारोबार के सिलसिले में बीजिंग जाना था । तब उन्होंने बताया था कि उनके पुत्र को यह चिंता थी कि किस प्रकार वह अपने चीनी व्यवसायी को अपने उत्पाद के बारे में प्रभावी ढंग से बता पायेगा, क्योंकि उनसे स्तरीय अंगरेजी की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, यानी वे पर्याप्त अंगरेजी जानते ही हों यह आवश्यक नहीं है । अपने देश के अंगरेजी पक्षधरों को इस बात पर विश्वास ही नहीं होगा कि चीन के कारोबरी अवश्यमेव अंगरेजी जानें यह जरूरी नहीं ।

जैसा मैंने आरंभ में कहा अपने देश में चीनी माल धड़ल्ले से बिक रहा है । वहां से आने वाले माल में रोजमर्रा की छोटीमोटी उपभोक्ता वस्तुएं प्रमुख हैं और उनमें एक है कैंची । कुछएक दिन पहले मैंने एक कैंची खरीदी थी, उसी की पैकिंग की आगे-पीछे की तस्वीर यहां प्रस्तुत है:

गौर से देखिए कि इस पर अंकित जानकारी मुख्यतः चीनी मैंडरिन में है, कहीं-कहीं अंगरेजी में भी है । मेरा अनुमान है कि इस उत्पाद की पैकिंग अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए न होकर चीन के घरेलू उपभोक्ताओं के लिए होगा, और अपने देश भारत में वह “गलती” से पहुचा होगा । सवाल पूछा जा सकता है कि कैंची चीनी देशवासियों के लिए हो या विदेशियों के लिए, पैकिंग पर तत्संबंधित जानकारी क्या अंगरेजी में ही नहीं होनी चाहिए थी ?

Scissor fromChina B

भारतीय मानसिकता

उक्त सवाल इसलिए कि अंगरेजी की वकालत करने वाले अपने देशवासी यही तो कहते हैं कि सारी दुनिया में अंगरेजी ही तो चलती है ।

क्या हम अपने यहां कल्पना कर सकते हैं कि किसी उपभोक्ता सामग्री के साथ अंकित पाठ केवल भारतीय भाषा में हो ? नहीं ! बिस्कुट का पैकेट हो या नमक का, डिटर्जेंट की पैकिंग हो या कैंची की, उस पर जानकारी अंगरेजी में ही होगी, विदेशियों के लिए नहीं बल्कि अपने ही देशवासियों के लिए जिनमें अंगरेजी पढ़लिख सकने वाले 10-15 फीसदी से अधिक नहीं होंगे । लेकिन परवाह किसे उन लोगों की जो अंगरेजी नहीं जानते ?

अंत में मैं बाजार में उपलब्ध बूंदी के एक पैकेट का चित्र प्रस्तुत कर रहा हूं।

इस पैकेट पर अंकित पाठ मुख्यतः अंगरेजी में है, लेकिन गौर करें कि एक स्थल पर थोड़ी जानकारी अरबी में भी मुद्रित है । लगता है कि यह निर्यात के विचार के मुद्रित है । अपने यहां के व्यवसायी अरबी में जानकारी दे सकते हैं, किंतु भारतीय भाषाओं में नहीं । मैं आज तक नहीं समझ पाया कि उन्हें देशज भाषाओं से इतना परहेज क्यों है ?

इस विषय पर अन्य कई दृष्टांत मेरे विचार में आ रहे हैं । उनकी चर्चा अगले आलेख में । – योगेन्द्र जोशी

Bundi Packet & Arabic

राजभाषा हिन्दी चर्चा में है, कारण मोदी सरकार द्वारा विभागों को दिए गए निर्देश कि वे राजकीय कार्य प्रमुखतया हिन्दी में करें । हिन्दी भारतीय संघ की संविधान-सम्मत राजभाषा है, यानी राजकाज की भाषा । लेकिन संविधान की बात-बात पर दुहाई देने वाले हमारे अधिकांश राजनेता चाहते हैं कि राजकाज मुख्यतः अंगरेजी में ही होते रहना चाहिए और वह भी भविष्य में सदैव के लिए । मैं समझ नहीं पाता कि जब हिन्दी का प्रयोग होना ही नहीं चाहिए, या मात्र खानापूर्ति भर के लिए हो, तब हिन्दी को राजभाषा बनाए रखने का तुक ही क्या है ? लेकिन इस प्रश्न पर विचार करने की जरूरत भी ये नेता महसूस नहीं करते ।

हिन्दी का विरोध उस समय भी हुआ था जब इसे राजभाषा के खिताब से नवाजा जा रहा था । उस काल में अंततोगत्वा संविधान-निर्माण में लगे नेतावृंद सहमत हो ही गये, हिन्दी के साथ सीमित समय के लिए अंगरेजी भी बनाए रखने की शर्त के साथ । वह सीमित समय विगत 63-64 सालों के बाद भी घटने के बजाय अनंतकाल की ओर बढ़ता जा रहा है । पिछली शताब्दी के पचास-साठ के दशकों में विरोध के सर्वाधिक जोरशोर के स्वर तमिल राजनेताओं ने उठाए थे । और आज भी उनका वह विरोध लगभग जैसा का तैसा बरकरार है । उन्होंने शायद कसम खा रखी है कि हिन्दी को लेकर हम न अभी तक बदले हैं और न ही आगे बदलेंगे ।

हिन्दी का जैसा विरोध पचास-साठ के दशक में था वैसा कदाचित अब नहीं रहा । हिन्दी के प्रति तमिलभाषियों का रवैया काफी-कुछ बदल रहा है, भले ही राजनैतिक कारणों से नेताओं का रवैया खास न बदला हो । यों भी इतना जबरदस्त विरोध किसी और राज्य में न तब था और न अब है । वस्तुतः यह तथाकथित तमिल स्वाभिमान से जुड़ा है, ऐसा स्वाभिमान जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । सवाल उठता है कि इस स्वाभिमान को अंगरेजी से कोई खतरा क्यों नहीं होता । मैंने अनुभव किया है कि तमिलनाडु के ही पड़ोसी राज्य केरल में स्थिति आरंभ से ही बहुत कुछ भिन्न रही है, पचास-साठ के दशक में और आज भी ।

इस संबंध में मुझे 1973 की दक्षिण भारत की यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में मेरा नया-नया व्यावसायिक प्रवेश हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । उस काल में बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । दूसरे शहरों से आरंभ होने वाली यात्राओं का आरक्षण आप आज की तरह आसानी से नहीं करा सकते थे । तब रेलवे विभाग इस कार्य को तार (टेलीग्राम) द्वारा संपन्न किया करता था, जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । हां, आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में कम ही होती थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । रेलगाड़ियों के इंतिजार में प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर लेटे अथवा सोते हुए समय गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है । तभी वहां मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । कुछ काल की चुप्पी के पश्चात नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि रेल-यात्राओं के दौरान जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रहते और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । अपने देश के अभिजात वर्ग में पाश्चात्य समाजों की भांति ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन में लोग अब इस मामले में अभिजात बनते जा रहे हैं । अस्तु ।

उन सज्जन से मेरी बातचीत का सिलसिला अंगरेजी में आंरभ हुआ । जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में बताया तो वे अंगरेजी से हिंदी पर उतर आये । इधर हिन्दी तो चलती नहीं होगी अपनी इस धारणा को उनके समक्ष रखते हुए मैंने उनकी हिन्दी पर आश्चर्य व्यक्त किया । लगे हाथ उनकी यात्रा संबंधी अन्य बातें भी उनसे जाननी चाहीं ।

उन्होंने मुझे बताया कि वे केरला के रहने वाले हैं और अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकले हैं । बातचीत से पता चला कि उन्हें कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । उनका कहना था कि इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से बात नहीं कर सकते ।

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनको बताया कि मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उसका थोड़ा अनुभव भी हुआ है । मैंने उनके सामने आशंका जताई कि ऐसा विरोध केरला में भी होता होगा ।

उनका उत्तर नहीं में था । उनका कहना था कि केरला के लोग व्यावहारिक सोच रखते हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं और देश के बाहर भी जाते हैं । वे जानते हंै कि हिन्दी से परहेज करके उन्हें कोई लाभ नहीं होने का ।

मेरा दक्षिण भारत जाना कई बार हो चुका है । हिन्दी को लेकर हर बार मुझे पहले से बेहतर अनुभव हुए हैं । चेन्नई में आज भी हिन्दी अधिक नहीं चलती है, लेकिन उसी राज्य के रामेश्वरम एवं कन्याकुमारी में आपको कोई परेशानी नहीं होती । केरला में हिन्दी के प्रति लोगों का झुकाव है यह बात मुझे एक बार वहां के दो शिक्षकों ने बताई थी जिसका उल्लेख मैंने अपनी अन्य पोस्ट में किया है । इसका मतलब यह नहीं कि वहां हर कोई हिन्दी जानता हो । किसी भाषा का अभ्यास एवं प्रयेाग के पर्याप्त अवसर होने चाहिए जो आम आदमी को नहीं होते । लेकिन विरोध जैसी कोई चीज वहां सामान्यतः नहीं है । – योगेन्द्र जोशी