Home

अपने देश की खासियत है यहां उन लोगोंं की परवाह नहीं की जाती जिनको अंग्रेजी नहीं आती। धारणा यही है कि उनको भी अंग्रेजी सीखनी चाहिए। भारतीय भाषाओं की तब जरूरत क्या रह जाती है। अपना हालिया अनुभव प्रस्तुत है लघुकथा रूप में।

जिंदगी बस यही है

अपना देश भारत, जिसे इंडिया कहना देशवासियों को पसंद है, एक विचित्र देश है विरोधाभासों तथा विडंबनाओं से भरा। भाषा के क्षेत्र में विरोधाभास साफ-साफ झलकता है। एक तरफ भारतीय भाषाओं को सम्मान देने और उन्हें अधिकाधिक अपनाने की बात कही जाती है, दूसरी ओर अंग्रेजी के प्रति अप्रतिम लगाव कोई छोड़ने को तैयार नहीं। इस बात की परवाह कोई नहीं करता कि उसकी अंग्रेजी दूसरों को परेशानी में डाल सकता है। भाषा से जुड़े कल के अपने अनुभव को मैं यहां कथा रूप में प्रस्तुत कर रहा हूं।

मैं कल अपने बैंक की निकट की शाखा में गया। मैं बचत-खाता-पटल (काउंटर) पर पहुंचा। मुझे इंटरनेट के माध्यम से किए गए लेन-देन के असफल होने के कारण के बारे में जानना था। तत्संबंधित असफलता का संदेश मेरे मोबाइल फोन पर प्राप्त हुआ था किंतु उस असफलता का कारण स्पष्ट नहीं था। मैं बैंककर्मी द्वारा पहले से ही किये जा रहे…

View original post 485 और  शब्द

Advertisements

आज हिन्दी दिवस है, हिन्दी का राजभाषा के रूप में जन्म का दिन इस अवसर पर हिन्दी प्रेमियों तथा हिन्दी प्रयोक्ताओं के प्रति शुभेच्छाएं। हिन्दी की दशा सुधरे यही कामना की जा सकती है।

इस दिवस पर कहीं एक-दिनी कार्यक्रम होते हैं तो कहीं हिन्दी के नाम पर पखवाड़ा मनाया जाता है। इन अवसरों पर हिन्दी को लेकर अनेक प्रभावी और मन को आल्हादित-उत्साहित करने वाली बातें बोली जाती हैं, सुझाई जाती हैं। इन मौकों पर आयोजकों, वक्ताओं से लेकर श्रोताओं तक को देखकर लगता है अगले दिन से सभी हिन्दी की सेवा में जुट जाएंगे। आयोजनों की समाप्ति होते-होते स्थिति श्मशान वैराग्य वाली हो जाती है, अर्थात्‍ सब कुछ भुला यथास्थिति को सहजता से स्वीकार करते हुए अपने-अपने कार्य में जुट जाने की शाश्वत परंपरा में लौट आना।

इस तथ्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि जैसे किसी व्यक्ति के “बर्थडे” (जन्मदिन) मनाने भर से वह व्यक्ति न तो दीर्घायु हो जाता है, न ही उसे स्वास्थलाभ होता है, और न ही किसी क्षेत्र में सफलता मिलती है, इत्यादि, उसी प्रकार हिन्दी दिवस मनाने मात्र से हिन्दी की दशा नहीं बदल सकती है, क्योंकि अगले ही दिन से हर कोई अपनी जीवनचर्या पूर्ववत् बिताने लगता है।

मैं कई जनों के मुख से अक्सर सुनता हूं और संचार माध्यमों पर सुनता-पढ़ता हूं कि हिन्दी विश्व में फैल रही है, उसकी ओर लोग आकर्षित हो रहे हैं, उसे अपना रहे हैं। किंतु दो बातें स्पष्टता से नहीं कही जाती हैं:

(१) पहली यह कि हिन्दी केवल बोलचाल में ही देखने को मिल रही है, यानी लोगबाग लिखित रूप में अंग्रेजी विकल्प ही सामान्यतः चुनते हैं, और

(२) दूसरी यह कि जो हिन्दी बोली-समझी जाती है वह उसका प्रायः विकृत रूप ही होता है जिसमें अंग्रेजी के शब्दों की इतनी भरमार रहती है कि उसे अंग्रेजी के पर्याप्त ज्ञान के अभाव में समझना मुश्किल है।

कई जन यह शिकायत करते हैं कि हिन्दी में या तो शब्दों का अकाल है या उपलब्ध शब्द सरल नहीं हैं। उनका कहना होता है कि हिन्दी के शब्दसंग्रह को वृहत्तर बनाने के लिए नए शब्दों की रचना की जानी चाहिए अथवा उन्हें अन्य भाषाओं (अन्य से तात्पर्य है अंग्रेजी) से आयातित करना चाहिए। मेरी समझ में नहीं आता है कि उनका “सरल” शब्द से क्या मतलब होता है? क्या सरल की कोई परिभाषा है? अभी तक मेरी यही धारणा रही है कि जिन शब्दों को कोई व्यक्ति रोजमर्रा सुनते आ रहा हो, प्रयोग में लेते आ रहा हो, और सुनने-पढ़ने पर आत्मसात करने को तैयार रहता हो, वह उसके लिए सरल हो जाते हैं

उपर्युक्त प्रश्न मेरे सामने तब उठा जब मुझे सरकारी संस्था “वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग” से जुड़ा समाचार पढ़ने को मिला। दैनिक जागरण में छपे समाचार की प्रति प्रस्तुत है। समाचार के अनुसार आयोग “नए-नए शब्दों को गढ़ने और पहले से प्रचलित हिंदी शब्दों के लिए सरल शब्द तैयार करने के काम में जुटा है।”

आयोग जब सरल शब्द की बात करता है तो वह उसके किस पहलू की ओर संकेत करता है? उच्चारण की दृष्टि से सरल, या वर्तनी की दृष्टि से? याद रखें कि हिन्दी कमोबेश ध्वन्यात्मक (phonetic) है (संस्कृत पूर्णतः ध्वन्यात्मक है)। इसलिए वर्तनी को सरल बनाने का अर्थ है ध्वनि को सरल बनाना। और इस दृष्टि से हिन्दी के अनेक शब्द मूल संस्कृत शब्दों से सरल हैं ही। वस्तुतः तत्सम शब्दों के बदले तद्‍भव शब्द भी अनेक मौकों पर प्रयुक्त होते आए हैं। उदाहरणतः

आलस (आलस्य), आँसू (अश्रु), रीछ (ऋक्ष), कपूत (कुपुत्र), काठ (काष्ठ), चमार (चर्मकार), चैत (चैत्र), दूब (दूर्वा), दूध (दुiग्ध), धुआँ (धूम्र)

ऐसे तद्‍भव शब्द हैं जो हिन्दीभाषी प्रयोग में लेते आए हैं और जिनके तत्सम रूप (कोष्ठक में लिखित) शायद केवल शुद्धतावादी लेखक इस्तेमाल करते होंगे। हिन्दी के तद्‍भव शब्दों की सूची बहुत लंबी होगी ऐसा मेरा अनुमान है।

ऐसे शब्द हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी के हिस्से हैं। किंतु अयोग के समक्ष समस्या इसके आगे विशेषज्ञता स्तर के शब्दों की रचना करने और उनके यथासंभव सरलीकरण की है। बात उन शब्दों की हो रही है जो भाषा में तो हों किंतु प्रचलन में न हों अतः लोगों के लिए पूर्णतः अपरिचित हों। अथवा वांचित अर्थ व्यक्त करने वाले शब्द उपलब्ध ही न हों। पहले मामले में उनके सरलीकरण की और दूसरे मामले में शब्द की नये सिरे से रचना की बात उठती है। यहां पर याद दिला दूं कि हमारे हिन्दी शब्दों का स्रोत संस्कृत है न कि लैटिन एवं ग्रीक जो अंग्रेजी के लिए स्रोत रहे हैं और आज भी हैं। अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ले सकते हैं, परंतु उनकी स्थिति भी हिन्दी से भिन्न नहीं है और वे भी मुख्यतः संस्कृत पर ही निर्भर हैं। हिन्दी पर अरबी-फारसी का काफी प्रभाव रहा है। लेकिन जिन शब्दों की तलाश आयोग को है वे कदाचित् इन भाषाओं में उपलब्ध नहीं है। यदि कोई शब्द हों भी तो वे भारतीयों के लिए अपरिचित-से होंगे। जब संस्कृत के शब्द ही कठिन लगते हों तो इन भाषाओं से उनका परिचय तो और भी कम है।

ले दे के बात अंग्रेजी के शब्दों को ही हिन्दी में स्वीकारने पर आ जाती है, क्योंकि अंग्रेजी स्कूल-कालेजों की पढ़ाई और व्यावसायिक एवं प्रशासनिक क्षेत्रों में अंग्रेजी के वर्चस्व के चलते हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाएं महत्व खोती जा रही हैं। आज स्थिति क्या है इसका अंदाजा आप मेरे एक अनुभव से लगा सकते हैं –

एक बार मैं एक दुकान (अपने हिन्दीभाषी शहर वाराणसी का) पर गया हुआ था। मेरी मौजूदगी में ९-१० साल के एक स्कूली बच्चे ने कोई सामान खरीदा जिसकी कीमत दूकानदार ने “अड़तीस” (३८) रुपये बताई। लड़के के हावभाव से लग गया कि वह समझ नहीं पा रहा था कि अड़तीस कितना होता है। तब दूकानदार ने उसे बताया कि कीमत “थर्टि-एट” रुपए है। लड़का संतुष्ट होकर चला गया। मेरा मानना है कि ऐसी स्थिति अंग्रेजी माध्यम की स्कूली शिक्षा का परिणाम है। इस “अड़तीस” का भला क्या सरलीकरण हो सकता है?

जब आप पीढ़ियों से प्रचलित रोजमर्रा के हिन्दी शब्दों को ही भूलते जा रहे हों तो फिर विशेषज्ञता स्तर के शब्दों को न समझ पाएंगे और न ही उन्हें सीखने को उत्साहित या प्रेरित होंगे। तब क्या नये-नये शब्दों की रचना का प्रयास सार्थक हो पाएगा?

संस्कृत पर आधारित शब्द-रचना के आयोग के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं। रचे या सुझाए गये शब्द कितने सरल और जनसामान्य के लिए कितने स्वीकार्य रहे हैं इसे समझने के लिए एक-दो उदाहरण पर्याप्त हैं। वर्षों पहले “कंप्यूटर” के लिए आयोग ने “संगणक” गढ़ा था। लेकिन यह शब्द चल नहीं पाया और अब सर्वत्र “कंप्यूटर” शब्द ही इस्तेमाल होता है। इसी प्रकार “ऑपरेटिंग सिस्टम” (operating system)  के लिए “प्रचालन तंत्र” सुझाया गया। वह भी असफल रहा। आयोग के शब्दकोश में “एंजिनिअरिंग” के लिए “अभियांत्रिकी” एवं “एंजिनिअर” के लिए “अभियंता उपलब्ध हैं, किंतु ये भी “शुद्ध” हिन्दी में प्रस्तुत दस्तावेजों तक ही सीमित रह गए हैं। आयोग के ऐसे शब्दों की सूची लंबी देखने को मिल सकती है।

आयोग सार्थक पारिभाषिक शब्दों की रचना भले ही कर ले किंतु यह सुनिश्चित नहीं कर सकता है कि जनसामान्य में उनकी स्वीकार्यता होगी। शब्दों के अर्थ समझना और उन्हें प्रयोग में लेने का कार्य वही कर सकता है जो भाषा में दिलचस्पी रखते हों और अपनी भाषायी सामर्थ्य बढ़ाने का प्रयास करते हों। हिन्दी का दुर्भाग्य यह है कि स्वयं हिन्दीभाषियों को अपनी हिन्दी में मात्र इतनी ही रुचि दिखती है कि वे रोजमर्रा की सामान्य वार्तालाप में भाग ले सकें, वह भी अंग्रेजी के घालमेल के साथ। जहां कहीं भी वे अटकते हैं वे धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्द इस्तेमाल कर लेते हैं इस बात की चिंता किए बिना कि श्रोता अर्थ समझ पाएगा या नहीं। कहने का मतलब यह है कि आयोग की पारिभाषिक शब्दावली अधिकांश जनों के लिए माने नहीं रखती है।

इस विषय पर एक और बात विचारणीय है जिसकी चर्चा मैं एक उदाहरण के साथ करने जा रहा हूं। मेरा अनुभव यह है कि किन्ही दो भाषाओं के दो “समानार्थी” समझे जाने वाले शब्द वस्तुतः अलग-अलग प्रसंगों में एकसमान अर्थ नहीं रखते। दूसरे शब्दों में प्रायः हर शब्द के अकाधिक अर्थ भाषाओं में देखने को मिलते हैं जो सदैव समानार्थी या तुल्य नहीं होते। भाषाविद्‍ उक्त तथ्य को स्वीकारते होंगे।

मैंने अंग्रेजी के “सर्वाइबल्” (survival)” शब्द के लिए हिन्दी तुल्य शब्द दो स्रोतों पर खोजे।

(१) एक है आई.आई.टी, मुम्बई, के भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी केन्द्र (http://www.cfilt.iitb.ac.in/) द्वारा विकसित शब्दकोश, और

(२) दूसरा है अंतरजाल पर प्राप्य शब्दकोश (http://shabdkosh.com/)

मेरा मकसद था जीवविज्ञान के विकासवाद के सिद्धांत “survival of the fittest” की अवधारणा में प्रयुक्त “सर्वाइबल्” के लिए उपयुक्त हिन्दी शब्द खोजना।

पहले स्रोत पर केवल २ शब्द दिखे:

१. अवशेष, एवं २. उत्तरजीविता

जब कि दूसरे पर कुल ७ नजर आए:

१. अवशेष, २. अतिजीवन, ३. उत्तर-जीवन, ४. उत्तरजीविता, ५. जीवित रहना, ६. प्रथा, ७. बची हुई वस्तु या रीति 

जीवधारियों के संदर्भ में मुझे “अवशेष” सार्थक नहीं लगता। “उत्तरजीविता” का अर्थ प्रसंगानुसार ठीक कहा जाएगा ऐसा सोचता हूं। दूसरे शब्दकोश के अन्य शब्द मैं अस्वीकार करता हूं।

अब मेरा सवाल है कि “उत्तरजीविता” शब्द में निहित भाव क्या हैं या क्या हो सकते हैं यह कितने हिन्दीभाषी बता सकते हैं? यह ऐसा शब्द है जिसे शायद ही कभी किसी ने सुना होगा, भले ही भूले-भटके किसी ने बोला हो। जो लोग संस्कृत में थोड़ी-बहुत रुचि रखते हैं वे अर्थ खोज सकते हैं। अर्थ समझना उस व्यक्ति के लिए संभव होगा जो “उत्तर” एवं “जिविता” के माने समझ सकता है। जितना संस्कृत-ज्ञान मुझे है उसके अनुसार “जीविता” जीवित रहने की प्रक्रिया बताता है, और “उत्तर” प्रसंग के अनुसार “बाद में” के माने व्यक्त करता है। यहां इतना बता दूं कि “उत्तर” के अन्य भिन्न माने भी होते हैं: जैसे दिशाओं में से एक; “जवाब” के अर्थ में; “अधिक” के अर्थ में जैसे “पादोत्तरपञ्चवादनम्” (एक-चौथाई अधिक पांच बजे) में।

लेकिन एक औसत हिन्दीभाषी उक्त शब्द के न तो अर्थ लगा सकता है और न ही उसे प्रयोग में ले सकता है। ऐसी ही स्थिति अन्य पारिभाषिक शब्दों के साथ भी देखने को मिल सकती है।

संक्षेप मे यही कह सकता हूं कि चूंकि देश में सर्वत्र अंग्रेजी हावी है और हिन्दी के (कदाचित् अन्य देशज भाषाओं के भी) शब्द अंग्रेजी से विस्थापित होते जा रहे हैं अतः सरल शब्दों की रचना से कुछ खास हासिल होना नहीं है। – योगेन्द्र जोशी

 

क्या होती है मातृभाषा?

एक प्रश्न है जो मुझे काफी समय से उलझाए हुए है। प्रश्न है कि मातृभाषा की क्या कोई स्पष्ट परिभाषा आज के युग में दी जा सकती है? यह सवाल मेरे मन में तब उठा जब शिक्षण संबंधी कई अध्ययनों ने सुझाया है कि बच्चों की पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए।

 यह प्रश्न मेरे दिमाग में उठा कैसे यह स्पष्ट करता हूं: एक समय था जब अलग-अलग भाषाभाषी समुदाय भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में रहते थे। वे समुदाय इतना अधिक परस्पर मिश्रित नहीं होते थे कि किसी को भी सुबह-शाम दूसरे समुदाय की भाषा से वास्ता पड़ता हो। कुछएक शब्द एक भाषायी समुदाय से दूसरे समुदाय की भाषा में यदा-कदा चले जाते थे, किंतु इतना अधिक मिश्रण नही हो पाता था कि संबंधित भाषा पूरी तरह विकृत हो जाए। पैदा होने के बाद लंबे अर्से तक किसी भी बच्चे का सान्निध्य एवं संपर्क कमोबेश अपने समुदाय तक ही सीमित रहता था, जब तक कि वह बाहरी समुदायों के बीच नहीं पहुंच जाता था। ऐसी स्थिति में ऐसे बच्चे की भाषा उसके अपने समुदाय की भाषा ही होती थी, उसी का प्रयोग वह दैनंदिनी कार्यों में करता था। उसको हम निस्संदेह उसकी मातृभाषा अथवा पैतृक भाषा मान सकते हैं।

इस आलेख में हिन्दी से मेरा तात्पर्य “खड़ी बोली” से जिसे आप हिन्दी का मानक कह सकते हैं। अन्यथा अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी भी सर्वत्र एक जैसी नहीं बोली जाती है। स्थानीयता का कुछ असर रहता जरूर है।

लेकिन आज स्थिति एकदम भिन्न है। कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति मूलतः बांग्लाभाषी है, बांग्लाभाषी क्षेत्र में रहता आया है, और घर के सदस्यों के साथ एवं परिवेश के लोगों के साथ बंगाली में वार्तालाप करता है। वह व्यक्ति नौकरी-पेशे में बेंगलूरु या मैसूरु पहुंच जाता है, जहां उसके संतान जन्म लेती है। कल्पना कीजिए कि वहां उसे मुख्यतः कन्नडभाषियों के बीच रहना पड़ता है, लेकिन अड़ोस-पड़ोस में हिन्दीभाषियों की संख्या भी पर्याप्त है, जो या तो मूलतः हिन्दीभाषी हैं या अलग-अलग प्रांतों से आए लोग हैं जो परस्पर हिन्दी या अंग्रेजी में संपर्क साधते हैं। बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती दौर में मां-बाप उससे बंगाली में ही बातें करते हैं। परंतु यह पर्याप्त नहीं। शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था के विकास की प्रक्रिया पेचीदी होती है और यह बात बच्चे के भाषायी ज्ञान पर भी लागू होता है। प्रायः सभी कुछ अस्थाई होता है किंतु जिन वस्तुओं एवं क्रियाओं को बच्चा बारबार देखता-सुनता है और जिन्हें अभ्यास में लेने लगता है वे मस्तिष्क में स्थायित्व ग्रहण करने लगती हैं।

अब देखिए जैसे-जैसे बच्चा साल-छ:माह का और उससे बड़ा होने लगता है, परिवार से मिलने वाले पड़ोसी उससे अपने-अपने तरीके से बातें करते हैं कोई कन्नड में तो कोई हिन्दी में अथवा अंग्रेजी में। संबंधित शब्द एवं ध्वनियां भी उसकी भाषा में जुड़ने लगते हैं। परिवेश बदलता जाता है और बच्चा क्रेश में जाने लगता है। वहां संभव है कि एकाधिक भाषाओं के संपर्क आ जाए और फिर आरंभिक पाठशाला में जाने लगे जहां कदाचित्‍ अंग्रेजी से उसका वास्ता सर्वाधिक पड़े। आजकल अपने देश में अंग्रेजी पर ही पूरा जोर है, अतः बच्चे के साथ मां-बाप भी अंग्रेजी में अधिक बोलने लगते हैं ताकि उसकी अंग्रेजी मजबूत हो सके। इस प्रकार की पेचीदी परिस्थिति में उसके मातृभाषा का स्वरूप भला क्या होगा?

निजी अनुभव

मैं अपनी बात को आगे प्रस्तुत कुछ दृष्टांतो के माध्यम से स्पष्ट करता हूं। स्पष्ट कर दूं कि ये दृष्टांत काल्पनिक नहीं हैं अपितु मेरे अनुभव में आई बातें हैं।

(१)     मेरा जन्म उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के एक गांव में तब हुआ था जब देश स्वतंत्र होने जा रहा था (१९४७)। तब हम बच्चों (और कई वयस्कों की भी) दुनिया गांव एवं उसके पास के क्षेत्र तक सीमित थी। टेलीफोन, बिजली, रेलगाड़ी आदि शब्द सुने तो जरूर थे पर ये होते क्या हैं इसका कोई अनुभव नहीं था। गांव कुमाऊं क्षेत्र में था और वहां कुमाउंनी बोली जाती थी, जिसे आप हिन्दी की बोली या उपभाषा कह सकते हैं। आम हिन्दीभाषी को कुमाउंनी ठीक से समझ में आ जाती होगी इसमें मुझे संदेह है। एक बानगी पेश है: “मैंलि आज रात्तै क्योल खाछ।” जिसका हिन्दी रूपान्तर है: “मैंने आज प्रातः केला खाया (था)।” (रात्तै = रात के अंत का समय)। कुमाउंनी में सहायक क्रिया “होना” के लिए “हुंण” है जिसके रूप अक्सर छ से आरंभ होते हैं। जब हम बच्चे ५-६ वर्ष की उम्र में पाठशाला जाने लगे तो पढ़ाई के माध्यम एवं पुस्तकें हिन्दी में थीं। आरंभ में सही हिन्दी बोलने में थोड़ा दिक्कत तो हुई होगी, लेकिन किताबें पढ़ने/समझने में कोई परेशानी नहीं हुई। परंतु घर और बाहर कुमाउंनी ही में हम बोलते थे। तब क्या थी हमारी मातृभाषा? उपभाषा के तौर पर कुमाउंनी और भाषा के तौर पर हिन्दी। निश्चित ही हमारा अंग्रेजी एवं अन्य किसी भाषा से कोई संपर्क नहीं था।  अंग्रेजी से संपर्क तो कक्षा ६ से आरंभ हुआ और उसका प्रभाव हमारी हिन्दी/कुमाउंनी पर नहीं के बराबर था।

(२)     मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। ये लोग उस जमीन के मालिकों में से एक हुआ करते थे जिसमें हमारी कालोनी बसी है। ये और इनकी संतानें फल-सब्जियां बेचने का धंधा करती हैं या उनमें से कुछएक ऑटो-ट्राली आदि चलाते हैं। माली हालत निम्नवर्ग के अनुरूप है। तीस साल पहले जब मैंने इस कालोनी में मकान बनवाया तब इनके पिता जीवित थे। वे निरक्षर थे और शायद ये सभी भाई भी निरक्षर हैं। तीसरी पीढ़ी के युवा भी अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं। शायद कुछ ने हाई-स्कूल या इंटर तक की पढ़ाई की है। शैक्षिक स्तर सभी का अतिसामन्य प्रतीत होता है। इस पीढ़ी की कुछ संतानें (चौथी पीढ़ी) किशोरावस्था में चल रही हैं और सरकारी विद्यालयों को छोड़कर निजी अंग्रेजी-माध्यम स्कूलों में पढ़ती हैं। ये बच्चे “अंकल, गुड मॉर्निंग” की भाषा बोलने लगे हैं और “हैप्पी बर्थडे सेलिब्रेट” करते हैं। मैंने पाया है कि उनकी शब्द संपदा में अब अंग्रेजी घुस चुकी है। फिर भी यही कहूंगा कि हिन्दी (या कहिए भोजपुरी) अभी इनकी मातृभाषा है, क्योंकि घरों में अंग्रेजी बोल सकने वाले सदस्य हैं नहीं। किंतु उसके बाद की पीढ़ी अवश्य ही यथासंभव अंग्रेजी पर जोर डालेगी और मातृभाषा प्रभावित होने लगेगी।

(३)     अब बात करता हूं बड़े शहर में रह रहे कुमाउंनी मूल के ऐसे परिवार की जहां मुझे ६०-७० वर्षीय जन मिल गए और जिनसे मैं कुमाउंनी में बात कर सका। चूंकि इन जनों की अगली पीढ़ी शहरो में ही पैदा हुई, पली-बढ़ी और पढ़ी-लिखी, अतः वे कुमाउंनी समझ तो सकते हैं परंतु बोल नहीं सकते। उस परिवार में मुझे चारएक साल का ऐसा बच्चा दिखा जो हिन्दी नहीं बोल सकता था भले ही समझ लेता था। उससे सभी अंग्रेजी में ही बात कर रहे थे। मुझे लगा कि उसकी हिन्दी के प्रति कोई भी व्यक्ति चिंतित नहीं था। फलतः एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही थी जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी बन चुकी थी, माता-पिता की मातृभाषा हिन्दी होने के बावजूद। रही-सही कमी अंग्रेजी-माध्यम का स्कूल पूरा कर रहा था। सवाल है कि किसी बच्चे की मातृभाषा मां-बाप की भाषा ही होगी ऐसा मानना तर्कसंगत होगा क्या?

(४)     मैं जब मूलतः हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय शहरी परिवार में जाता हूं, मैंने पाया है कि वहां हिन्दी बोली तो जाती है, परंतु तिरस्कृत भी बनी रहती है। हिन्दी उन परिवारों के लिए मजबूरी कही जा सकती है, क्योंकि निचले सामाजिक तबके के लोगों और घर-परिवार के सद्स्यों तथा मित्र-परिचितों के साथ हिन्दी में ही संपर्क साधना पड़ता है। अन्यथा उनके यहां हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं-पुस्तकें बमुश्किल देखने को मिलती है। उस माहौल में बच्चे की अक्षर-ज्ञान की आरंभिक पुस्तकें भी अंग्रेजी में ही मिलती हैं जो उसे “ए फ़ॉर ऐपल, बी फ़ॉर बनाना, सी फ़ॉर कैट, …” सिखाती हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे की मातृभाषा क्या हिन्दी रह सकती है? क्या वह एक खिचड़ी भाषा नहीं होगी जिसमें अंग्रेजी अधिक, हिन्दी कम हो?

गायब हो रहे हैं हिन्दी शब्द

एक बार मैं एक दुकान पर खड़ा था। १०-११ साल के एक बच्चे ने कोई सामान खरीदा और उसका दाम पूछा। दुकानदार ने जब “अड़तीस रुपये” कहा तो वह समझ नहीं सका। तब उसे “थर्टीएट” बताया गया। टीवी चैनलों पर शायद ही कोई साफ-सुथरी हिन्दी में समाचार देता होगा। “… में एक बिल्डिंग कोलैप्स हो गई है। मलवे से दो लोगों की डेड बॉडी निकाली गईं हैं। चार लोग इन्ज्यर्ड बताए गए हैं। …” समाचार का ऐसा ही पाठ सुनने को मिलता है। विज्ञापनों की भाषा कुछ यों होती है: “… बनाए आपकी स्किन फेअर एंड मुलायम …।” सुपरिचित बाबा रामदेव स्वदेशी के हिमायती  होने की दावा करते हैं। उनके खुद के विज्ञापनो में आप पाएंगे कि वे मधु/शह्द के बदले हनी, नारियल तेल के बदले कोकोनट ऑयल जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। उनके उत्पादों पर लिखित जानकारी भी शायद ही कभी मुख्यतया हिन्दी में देखने को मिलती है।

यह ठीक है कि हर भाषा की शब्द-संपदा में अन्य भाषाओं के कुछएक शब्द भी अक्सर शामिल हो जाते हैं। लेकिन हिन्दी में तो वे शब्द भी अंग्रेजी शब्दों से विस्थापित होते जा रहे हैं जो सदा से ही आम लोगों के मुख में रहते थे। क्या यह सच नहीं है कि अब हिन्दी की गिनतियां, साप्ताहिक दिनों के नाम, फल-फूलों, पशु-पक्षिओं, शारीरिक अंगों, आम बिमारियों, आदि के नाम आम बोलचाल में कम सुनने को मिल रहे हैं, विशेषतः शहरी नवयुवाओं, किशोरों एवं बच्चों के मुख से? ऐसी दशा में किसी बच्चे की विकसित हो रही भाषा क्या असल हिन्दी हो सकती है, भले ही उसके मां-बाप मूलतः हिन्दीभाषी हों? वह जो सीखेगा उसे मैं हिन्दी नहीं मान सकता। भाषा के मूल शब्द गायब होते जाएं और व्याकरणीय ढांचा भर रह जाए तो भी आप उसे हिन्दी कहें तो कहते रहें। यह सार्वलौकिक (कॉज़्मोपॉलिटन) महानगरों की विशेष समस्या है।

अंत में इस तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान फिर से खींचता हूं कि आज के युग में जन्म के बाद से ही बच्चे को भाषा की दृष्टि से खिचड़ी परिवेश मिलने लगा है, विशेषतः महानगरों में। जब तक उसके मस्तिष्क में भाषा का स्वरूप स्थायित्व पाए तब तक उस पर एकाधिक कारकों का प्रभाव पड़ने लगता है। चूंकि महानगरों में अब अंग्रेजी माध्यम विद्यालय ही लोगों की प्राथमिकता बन चुके हैं, अतः वहां का महौल घर से अलग रहता है। अड़ोस-पड़ोस का परिवेश कुछ रहता है और तथा टीवी चैनल कुछ और ही परोसते हैं। ये सभी बच्चे की भाषा को प्रभावित करते हैं। (मैंने समाचार पढ़ा था कि कर्नाटक में सरकारी विद्यालयों का माध्यम अब अंग्रेजी होगी। उत्तर प्रदेश के कुछ सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम रहेगा। कुछ राज्यों में प्राथमिक दर्जे से अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है।) ऐसे में संभव है कि कोई खिचड़ी भाषा मातृभाषा के तौर पर विकसित हो। – योगेन्द्र जोशी

मुझे, तुझे, हम सब को चाहिए सुरक्षा,

सुरक्षा मुहैया कराना सरकार का काम।

मेरी, तेरी, हमारी कोई जिम्मेवारी नहीं,

सुरक्षा करना-कराना सरकार का काम।

हम घर खुला छोड़ दें चल दें कहीं भी

चोरी न हो, उसे रोकना सरकार का काम।

कान में फोन लगाए रेल-पटरी पार करें

तब हमें चेताना-बचाना सरकार का काम

नदी-सागर के बीच सेल्फी लेने लगें हम

अनहोनी से बचाना भी सरकार का काम

उड़ा नियमों की धज्जी वाहन चलाएं हम,

फिर कहें हादसे रोकना सरकार का काम।

सड़कपै बेखौफ वाहन चलाएं लगाएं जाम,

जाम से निजात दिलाना सरकार का काम।

बात-बात पै गुस्से से नुकसान पहुंचाएं हम

उसका मुआवजा भरना सरकार का काम।

सड़क पर कचरा बिखेरें ये हमारी मरजी,

सड़क साफ रहे यह तो सरकार का काम।

पान खाएं पीक थूकें जहां-तहां सड़क पर

सड़क की धुलाई करना सरकार का काम

किस-किस की छूट मिले कहना है मुश्किल

मनमरजी से जीने दे यही सरकार का काम

गैरजिम्मेवारी से जीना हमारा अधिकार है

सुरक्षा का इंतजाम तो है सरकार का काम।

हम आज़ाद हैं करें कुछ भी मरजी हमारी

हमारी आज़ादी न छेड़ना सरकार का काम।

सुरक्षित रहें हम यह सदा रहती है चाहत

सुरक्षा का जिम्मा अकेले सरकार का काम।

– योगेन्द्र जोशी

मैं जो हिन्दी लिखता हूं उसे वे समझ नहीं पाते, और जो हिन्दी वह समझते हैं उसे मैं लिखना नहीं चाहता।

मेरी हिन्दी?

कुछएक मास पूर्व मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, “मेरी बेटी एक निजी कंपनी में कार्यरत है। कंपनी अपने कर्मियों के लिए हिन्दी में एक पत्रिका छापती है जिसके संपादन आदि का दायित्व बेटी को सोंपा गया है। मैंने उसे बताया कि आप ब्लॉग लिखा करते हैं और सलाह दी कि पत्रिका के लिए वह आपसे भी लेख लिखने का अनुरोध कर सकती है। अथवा आपके ब्लॉगों पर प्रस्तुत आलेखों में से चुनकर पत्रिका में शामिल करने की अनुमति ले सकती है। आप सहमत होंगे न?”

अपने सहमति जताते हुए मैंने उनसे कहा कि वे मेरे ब्लॉगों के पते अपनी बेटी को भेज दें और यह भी कह दें कि आवश्यकता अनुभव करने पर वह मुझसे सीधे संपर्क कर ले।

बात आई-गई-सी हो गई। एक लंबे अंतराल के बाद मुझे अनायास उक्त घटना का स्मरण हो आया। तब मैंने अपने उन मित्र से पूछा, “आपने एक बार कहा था कि आपकी बेटी अपनी पत्रिका के लिए मुझसे संपर्क कर सकती है। इस विषय पर मुझे उसके बाद कुछ सुनने को नहीं मिला; क्या हुआ? उसने इरादा बदल दिया क्या?”

उनका उत्तर था, “वह आपके आलेखों से संतुष्ट थी। आलेखों की विषयवस्तु, उनकी प्रस्तुति में तारतम्य, लेखन की भाषा-शैली आदि में उसे कोई कमी नजर नहीं आई। बस एक ही समस्या उसके सामने थी। उसके पाठकों की हिन्दी उस स्तर की नहीं थी कि वे आपके आलेख पढ़ सकें और उन्हें समझ सकें। या यों कहें कि उनके लिए आलेखों की भाषा क्लिष्ट थी। इसलिए इस बारे में आगे बढ़ना मेरी ’संपादक’ बेटी के लिए सार्थक नहीं हो पा रहा था।”

अंग्रेजी शब्दों के तुल्य हिन्दी शब्द

गूगल जालस्थल पर “हिन्दीअनुवादक” (hindianuvaadak) नाम से एक समूह है, समूह के सदस्य परस्पर भाषा एवं अनुवाद संबंधी विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इस समूह में लोग भाषा से संबंधित सवाल पूछते हैं, और सदस्यवृंद समाधान प्रदान करते हैं अथवा अपनी-अपनी राय व्यक्त करते हैं। मैं स्वयं अनुवादक नहीं हूं किंतु भाषाओं के बारे में जानने-समझने की उत्सुकता या जिज्ञासा रखता हूं। इसलिए मैं भी इस समूह का सदस्य हूं और समूह में उठाई गई बातों एवं शंकाओं पर यदा-कदा अपना भी मत व्यक्त कर लेता हूं।”

इधर कुछ दिनों से उपर्युक्त समूह में एक शब्द पर बहस चल रही है (या अब समाप्त हो चुकी हो!)। किसी अनुवादक ने पूछा “अंग्रेजी के अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ (adjustable) शब्द के लिए उपयुक्त हिन्दी शब्द क्या होना चाहिए? मेरे अपने मतानुसार समायोज्य अथवा समंजनीय ही सर्वाधिक उपयुक्त शब्द है। वैसे प्रश्नगत शब्द में निहित भाव को शायद अपने-अपने विविध तरीकों से लेखकगण व्यक्त कर सकते होंगे। मेरा भाषायी ज्ञान उस उत्कृष्ट श्रेणी का नहीं है, इसलिए सही विकल्प नहीं पेश कर सकता। उक्त समूह में भांति-भांति के मत मुझे पढ़ने को मिले हैं। मेरी दृष्टि में यह समीचीन होगा कि अपनी टिप्पणी पेश करने से पहले उनकी चर्चा संक्षेप में कर लूं।

समूह के कुछ जानकारों का मत था कि समायोज्य जैसा शब्द अधिकांश पाठकों के लिए सर्वथा अपरिचित होगा, अत: उचित होगा “अनुकूलनीय” या “परिवर्तनीय” को प्रयोग में लेना। अवश्य ही यह भी स्वीकारा जा रहा था कि इनमें वह भाव कदाचित निहित नहीं है जिसे हम इंगित करना चाहते हैं। किसी का कहना था कि “अनुकूलन के योग्य” क्यों न इस्तेमाल किया जाए। मैं समझता हूं कि इस पदबंध का अर्थ तो “अनुकूलनीय” में निहित है ही, अतः इतने लंबे की जरूरत नहीं।

एक मत यह भी व्यक्त किया गया है कि क्यों न मराठी मूल का शब्द “बदलानुकारी” को प्रयोग में लिया जाए। मैं व्यक्तिगत तौर पर इस शब्द से परिचित नहीं हूं। अनुवाद कार्य में लगे लोग हो सकता है इससे सुपरिचित हों, परंतु मुझे शंका है कि मेरी तरह अधिकांश पाठकजन इस शब्द से उसी प्रकार अनभिज्ञ होंगे जैसे मैं हूं।

अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ के लिए “सामंजस्य योग्य” शब्द भी सुझाया गया है। मेरा अनुमान है जो व्यक्ति “सामंजस्य” अर्थ जानता होगा वह समायोज्य या समंजनीय का भी अर्थ जानता होगा। अन्यथा भी वह इनके अर्थों का अनुमान लगा सकेगा ऐसा मेरा सोचना है।

दो विचार जो संबंधित बहस में पढ़ने को मिले और जिन्हें मैंने रोचक पाया वे हैं (1) “समायोज्य जैसे शब्द हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए भी एक सरदर्द ही हैं।”  और (2)  “समायोज्य जैसे दुरुह शब्दों का इस्तेमाल करें तो उनके बाद ब्रेकेट में उनका मतलब भी लिख दें।” मतलब समझाया तो जाए लेकिन किस भाषा में और कितने विस्तार से जैसा शब्दकोषों में होता है?

और यह मत भी पढ़ने को मिला कि आजकल लोग अ(ड्‍)जस्ट (adjust) बखूबी समझने लगे हैं। तो क्या इसे ही प्रयोग में ले लिया जाए? शायद हां!

एक वाकया

मुद्दे पर कुछ और कहूं इससे पहले एक वाकये का जिक्र करता हूं। वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने में दृष्टांत अक्सर उपयोगी सिद्ध होते हैं। जब मैं विश्वविद्यालय में भौतिकी (फिज़िक्स) विषय पढ़ाता था तो “इलेक्ट्रॉनिकी” में विशेषज्ञता अर्जित कर रहे एम.एससी. (स्नातकोत्तर) के छात्र “क्वांटम यांत्रिकी” (क्वांटम मिकैनिक्स) में रुचि नहीं लेते थे। उनकी अरुचि के बारे में पूछे जाने पर उनका उत्तर होता था, “सर, इलेक्ट्रॉनिक्स स्पेशलाइज़ेशन लेकर जब हम टेक्निकल नौकरी में जायेंगे तो ये क्वांटन मिकैनिक्स हमारी क्या काम आएगी?” तब मेरे पास कोई संतोषप्रद उत्तर नहीं होता था। मैं जानता था तकनीकी पेशे में इस विषय का ज्ञान शायद ही प्रोन्नति (प्रमोशन) पाने या वेतन बढ़ोत्तरी में मददगार हो सकता है। तो वे क्यों क्वांटम भौतिकी/मिकैनिक्स पढ़ें?

घटता शब्द-भंडार 

दरअसल इस प्रकार का उपयोगिता संबंधी प्रश्न अनेक मौकों पर पूछा जा सकता है। मैंने ” समायोज्य ” से जुड़े जिस बहस का जिक्र किया है उससे भी इस सवाल का नाता है। यह कहना कि हिन्दी माध्यम के छात्रों के लिए तक यह शब्द दुरूह है यह दर्शाता है कि उन छात्रों – जो भी वे हों – ने कभी नये-नये शब्द सीखने का प्रयास नहीं होगा, फलतः इस शब्द से उनका सामना कभी पड़ा नहीं होगा और सहज-स्वाभाविक तरीके से यह उनके शब्द-भंडार में शामिल नहीं हो सका होगा। उन्होंने हर किसी के मुख से इस शब्द के बदले अ(ड्‍)जस्ट और उससे व्युत्पन्न शब्दों का ही प्रयोग सुना होगा। परिणाम – समायोज्य अपरिचित शब्द बन गया, अ(ड्‍)जस्टेब्ल्‍ परिचित।

यहां यह प्रश्न उठता है कि स्वयं को “हिन्दीभाषी” कहने वाले अपना हिन्दी शब्द-भंडार क्यों नहीं बढ़ाते? उत्तर साफ है। मेरे भौतिकी छात्रों की तरह आम हिन्दीभाषी कहेगा, “हिन्दी के शब्दों को सीखने से क्या मिलेगा? उसके बदले अंग्रेजी सीखने पर मेहनत करेंगे तो हमें फायदा होगा। हमारा काम तो चल ही जाता है। जहां जरूरत हो अंग्रेजी शब्दों से ही काम चल जाता है। फिर हिन्दी सीखने की जरूरत कहां?”

याद रहे कोई भी व्यक्ति शब्द-भंडार लेकर पैदा नहीं होता है। वह विभिन्न मौकों पर और पत्र-पत्रिकाओं-पुस्तकों के विभिन्न स्रोतों से शब्द सीखता है। और यदि स्रोत विकृत हो जाएं, किसी का शब्दभंडार बढ़ाने में मददगार न रह जाएं, या व्यक्ति इन स्रोतों में रुचि ही न ले, तो परिणाम यही होगा: समायोज्य जैसे शब्द अपरिचित लगेंगे। हिन्दी उसी दिशा में बढ़ रही है।

हिन्दी – उनकी बनाम मेरी

मैं इसे हिन्दी की अवनति कहूं या उन्नति कि आज के अनेक पढ़े-लिखे लोग उस हिन्दी को पढ़-समझ नहीं सकते जो मैंने अपने छात्र जीवन में पढ़ी है, जिस हिन्दी में भारतेन्दु के नाटक लिखे गये हैं, जिसमें जयशंकर प्रसाद का पद्य साहित्य है, जिसमें रामचन्द्र शुक्ल के लेख हैं, इत्यादि। आज के लोग कैसी हिन्दी बोल रहे हैं, पढ़ रहे हैं, और लिख रहे हैं इसकी बानगी यह है:

 “नेशनल महिला प्लेयर की आपत्तिजनक फोटो एफबी पर वायरल, ट्रेनर गिरफ्तार” (jagran.com, 19/05/2017)

इसे मैं हिन्दी कहूं या कुछ और समझ में नहीं आता है। अवश्य ही यह वह भाषा नहीं जिससे मैं बचपन से परिचित रहा हूं। जब हम ऐसी नयी हिन्दी बोलेंगे और सुनेंगे तो हिन्दी के कई शब्द “अन्फ़ैमिलिअर” हो ही जायेंगे।

मेरी कमजोरी है कि मैं ऐसी हिन्दी न लिखता हूं और न लिखना ही चाहता हूं, भले ही इसे लिखना संभव हो और मुझसे अपेक्षित हो। – योगेन्द्र जोशी

प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

 

पहले कुछ तस्वीरें:

कनाडा प्रवास

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर मुझे जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था। उसके बाद क्यूबेक प्रांत के शहर मॉंट्रियाल में प्राप्त अनुभवों पर आधारित सचित्र लेख २४ फ़रवरी को पोस्ट की थी। 

तीन लेखों की अपनी लेखमाला में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि अंग्रेजी की वैश्विक व्यापकता को लेकर भारतीयों में जो भ्रम व्याप्त है वह वास्तविकता से परे है। अब इस तीसरे लेख में क्यूबेक प्रान्त के उसी नाम से विख्यात दूसरे बड़े शहर क्यूबेक में फ़्रांसीसी भाषा को लेकर मेरे देखने में जो आया उसका संक्षिप्त विवरण तस्वीरों के माध्यम से प्रस्तुत किया जा रहा है।

आगे बढ़ने से पहले दूसरे लेख की कुछ बातों का पुनरुल्लेख कर रहा हूं:

कनाडा की कुल आबादी (करीब 3.6 करोड़) का लगभग 25% फ़्रेंचभाषी यानी फ़्रांसीसीभाषी है। प्रायः सभी फ़्रांसीसी-भाषी राजकाज की आधिकारिक भाषा फ़ेंच वाले क्यूबेक प्रांत में रहते हैं – लगभग 82 लाख अकेले क्यूबेक (Quebec) प्रांत में और शेष करीब 3 लाख अति छोटे प्रांतों (न्यू ब्रुंसविक New Brunswick, मनिटोबा Manitoba, नोवा स्कोटिया Nova Scotia में, और छिटपुट तौर पर अन्यत्र रहते हैं। शेष कनाडा में अंग्रेजी प्रचलन में है। राष्ट्र के स्तर पर कनाडा की राजकाज की आधिकारिक भाषाएं अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं।

क्यूबेक प्रांत का सबसे बड़ा शहर मॉंट्रियाल (Montreal, आबादी करीब 38 लाख) है। उपर्युक्त दूसरा लेख उसी शहर के अनुभव पर आधारित था, जहां मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ एक पर्यटक के तौर पर गया था। क्यूबेक दूसरा बड़ा शहर है जहां हम पर्यटन के लिए गये थे। सन् 1608 में फ़्रांसीसियों के द्वारा बसाया गया यह शहर कनाडा के सबसे पुराने शहरों में से एक है। ध्यान दें कि यूरोप के लोगों (अंग्रेज एवं फ़्रांसीसी) ने कनाडा में 16वीं शताब्दी के 5वें दशक में बसना आरंभ किया था। इस समय शहर की आबादी करीब ८ लाख आंकी जाती है। यही शहर क्यूबेक प्रांत की राजधानी भी है। शहर पुराने किस्म का है इसलिए इसका अपना अलग ही आकर्षण है। यहां के आकर्षणों में महत्वपूर्ण है एक किला। मेरे मौजूदा लेख का विषय पर्यटक स्थलों का वर्णन करना नहीं है। मैं तो वहां के भाषाई अनुभव की बात करना चाहता हूं।

क्यूबेक प्रांत में फ़्रांसीसी मूल के लोग ही प्रमुखतया रहते हैं। वे आज भी अपनी भाषा फ़्रांसीसी पर गर्व करते हैं। वे हम भारतीयों की तरह नहीं हैं जो अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार एवं विरोध करते हैं।

1. गांधी प्रतिमा

क्यूबेक शहर में फ़्रांसीसी भाषा की अंग्रेजी के सापेक्ष क्या स्थिति है इसे कुछ उदाहरणों के माध्यम से पाठकों के समक्ष रखता हूं। सबसे पहला उदाहरण मैं महात्मा गांधी की प्रतिमा का लेता हूं जो शहर के एक पुराने एवं भीतरी भाग की सड़क के किनारे एक पार्क पर लगी है। महात्मा गांधी पिछली शताब्दी के अंतरराष्ट्रीय स्तर के नेताओं में अनन्य गिने जाते हैं और प्रायः सभी देशों में अनेक लोग उनके नाम तथा अहिंसा-उपदेश से परिचित हैं। विश्व के अनेक शहरों में उनकी प्रतिमाएं देखने को मिल जाती हैं। क्यूबेक में लगी उनकी प्रतिमा की तस्वीर यहां प्रस्तुत है:

ध्यान दें कि प्रतिमा पर गांधी जी के बारे में उत्कीर्ण जानकारी केवल फ़्रांसीसी मे है। कनाडा की आधिकारिक भाषाएं भले ही अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं परंतु क्यूबेक प्रांत में अंग्रेजी को खास तवज्जू नहीं मिलती है। इसलिए गांधी-प्रतिमा पर अंग्रेजी में कुछ भी अंकित नहीं है। क्या भारत में ऐसा हो सकता है?

2. खरीद-फ़रोख्त की रसीद

मॉंट्रियाल एवं क्यूबेक में हमने खाने-पीने की वस्तुओं आदि की जो खरीदारी की उनकी रसीदें भी हमें फ़्रांसीसी में ही मिलीं, न कि अंग्रेजी में। देखें पांच रसीदों की छायाप्रतियों की तस्वीर:

अंग्रेजी सर्वत्र चलती है की बात करने वालों को अपने कथन पर किंचित विचार करना चाहिए। अवश्य ही दुकानों आदि पर आम बोलचाल के लिए हमने अंग्रेजी का ही प्रयोग किया (फ़्रांसीसी तो आती नहीं) और हमारा काम चल गया। किंतु हमने महसूस किया कि संबंधित दुकानदारों की अंग्रेजी सामान्य एवं कामचलाऊ ही रहती है। पर्यटकों के साथ संवाद-संपर्क के लिए उन्हें अंग्रेजी की जरूरत होती है, अन्यथा उनका कार्य फ़्रांसीसी से बखूबी चलता है।

यहां यह भी बता दूं कि क्यूबेक प्रांत में और उसके आसपास के शहरों, यथा ओटवा और टोरंटो (टुरानो), में भी उपभोक्ता सामानों पर आवश्यक जानकारी/निर्देश फ़्रांसीसी एवं अंग्रेजी, दोनों, में उपलब्ध रहती है। यह जानना दिलचस्प है कि भारत से आयातित सामान पर भी फ़्रांसीसी में अंकित जानकारी देखने को मिल जाती है। भारतीय उद्यमी वही जानकारी अपने देशवासियों को उनकी भाषा में नहीं देते। अपनी भाषाओं के प्रति हमारा रवैया कैसा है यह हम जानते हैं।

3. “जानें क्यूबेक” (Découvrir Québec)

क्यूबेक शहर में घूमते-फिरते मेरी नजर पड़ी एक सूचना-पट पर जो विशुद्ध फ़्रांसीसी में है। मैं पढ़ तो सकता नहीं किंतु यह समझ में आ गया कि उस पर अंग्रेजी का “डिस्कवर क्यूबेक” फ़्रांसीसी में (Découvrir Québec) लिखा गया है। उस सूचना-पट पर शहर के प्रमुख दर्शनीय स्थलों का विवरण उल्लिखित था। पर्यटक उसे समझ पायें या नहीं इसकी वहां फ़्रांसीसी मूल के लोगों को परवाह नहीं। वे अपनी भाषा को सम्मान देने में विश्वास करते हैं।

4. पुरातत्व स्थल

क्यूबेक शहर की स्थापना सैम्युअल द शाम्प्लाँ (Samuel de Champlain) नामक फ़्रांसीसी नागरिक द्वारा 1608  की गई थी। शाम्प्लाँ अपने आप में बहुत कुछ था – सिपाही, मानचित्रकार, खोजकर्ता, भूगोलविद्‍, एवं राजनयिक आदि। उस समय फ़्रांसीसियों ने क्यूबेक प्रांत के उस क्षेत्र को “न्यू फ़्रांस” नाम से अपना उपनिवेश बनाया था। बाद में अंग्रेजों ने 1760 के युद्ध में उसे फ़्रांसीसियों से अपने आधिपत्य ले लिया था। आज भी शाम्प्लाँ को नगर संस्थापक के नाम पर याद किया जाता है। वहां पर उसके निवास-स्थल को स्मारक के रूप में जाना जाता है। उसी की जानकारी मुझे एक गली (सड़क) पर सूचना पट पर देखने को मिली फ़्रांसीसी भाषा में न कि अंग्रजी में।

 5. राष्ट्रसंघ कार्यालय

और आगे बढ़ने पर क्यूबेक में राष्ट्रसंघ (यू.एन.ओ.) की संस्था “यूनेस्को” (UNESCO) के कार्यालय का नामपट नजर आया। उसके बाबत कोई उल्लेखनीय बात नहीं। मेरे लिए बस यह देखना ही काफी था कि नामपट पर फ़्रांसीसी भाषा में लिखा है “PARC DE L’UNESCO” अर्थात् UNESCO Centre; यहां भी अंग्रेजी नहीं। (स्मरण रहे कि यूनेस्को की छः आधिकारिक भाषाएं हैं: अंग्रेजी, अरबी, चीनी, फ़्रांसीसी, रूसी एवं स्पेनी|)

 6. उत्सव स्थल

जब हम क्यूबेक में भ्रमण कर रहे थे वहां एक स्थल पर विज्ञान उत्सव (Science Festival)  के आयोजन की तैयारी चल रही थी । उसके लिए मंच और दर्शकों के बैठने के लिए स्थान तैयार किए जा रहे थे। आयोजन की तिथियां दो-तीन दिन बाद की थीं और हमें दूसरे ही दिन लौटना था। अतः हम आयोजन नहीं देख सकते थे। मेरी रुचि आयोजन में थी भी नहीं; मेरी दिलचस्पी तो उस स्थल पर उत्सव-संबंधी जो जानकारी लिखी गई थी उसकी भाषा में थी। उस स्थान की जो तस्वीर मैंने खींची वह प्रस्तुत है:

मंच के शीर्ष पर बांई ओर लिखा था “Scéne Fibe” और दाईं ओर “FÉSTIVAL D’ÉTÉ DE QUÉBEC”। यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आयोजन की कार्यवाही फ़्रांसीसी भाषा में संपन्न हुई होगी न कि अंग्रेजी में।

7. कार पार्किंग स्थल

क्यूबेक में राह चलते मेरी नजर पड़ी एक पार्किंग स्थल पर। दरअसल वह चारों ओर से “प्लास्टिक सीट” द्वारा घिरा हुआ अस्थाई पार्किंग स्थल था, जैसा कि उस पर फ़्रांसीसी भाषा में लिखित “stationnement temporaire” से स्पष्ट था। अपेक्षया छोटे अक्षरों मे बहुत कुछ आवश्यक जानकारी भी थी जिसे समझने की मुझे न तो आवश्यकता थी और न ही मैं समझ सकता था।

8. बस प्रदर्शन पट

मैं यहां दुबारा यह कहना चाहता हूं कि क्यूबेक में सभी स्थानीय कार्य फ़्रांसीसी भाषा में ही संपन्न होते हैं। हमने शहर के एक स्थान से दूसरे स्थान तक नगरीय बस-सेवा के माध्यम से आवागमन किया। यात्रियों के लिए बस-मार्ग का नाम, अगले बस-स्टॉप का नाम, आदि की जानकारी फ़्रांसीसी में बस के भीतर लगे एलेक्ट्रॉनिक सूचना-पट पर प्रदर्शित होते हुए मैंने पाया।

9. सैंट लॉरेंस नदी फ़ेरी सेवा

क्यूबेक शहर सैंट लॉरेंस (St. Lawrence) नदी के उत्तर-पश्चिमी किनारे पर बसा है। यह नदी कनाडा की तीसरी सबसे बड़ी नदी है (लंबाई लगभग 3,000 कि.मी.) और इस शहर में इसका पाट करीब 3 कि.मी. है। नदी पर दूर-दूर पर पुल बने हैं किंतु नदी किनारे बने क्यूबेक-किले के सामने से नदी के दूसरे किनारे की बस्ती पर पहुंचने के लिए फ़ेरी (वृहन्नौका) की सेवा उपलब्ध है। इस सेवा का उपयोग पर्यटकों को नदी से शहर का नजारा पाने के लिए भी किया जाता है। हमने भी फ़ेरी-सेवा का लाभ उठाया। फ़ेरी के प्रवेश-द्वार पर प्रदर्शित जानकारी की तस्वीर प्रस्तुत है यह बताने के लिए कि यहां भी अंग्रेजी में सूचना प्रदर्शित नहीं थी।

अंत में

इन चित्रों को प्रस्तुत करने का मेरा मकसद सीधा-सा है कि अंग्रेजी सर्वत्र चलती है हम भारतीयों की यह धारणा तथ्यों पर आधारित नहीं है। मुझे यह जानकारी है कि चीन, जापान, कोरिया के बड़े बहुतारांकित (मल्टीस्टार्ड) होटलों-रेस्तराओं को छोड़ दें तो छोटी-मोटी जगहों पर पर्यटकों के सामने विचार-संप्रेषण की समस्या खड़ी हो जाती है। उन जगहों का मुझे व्यक्तिगत अनुभव नहीं है। किंतु कोई 30-32 साल पहले पेरिस भ्रमण के समय ऐसी दिक्कत मुझे भी हुई। अपने अन्य ब्लॉग में मैंने तब के अपने अनुभव को कहानी के रूप में लिखा है। बाद में पता चला कि वहां अंग्रेजी जानने वाले कम नहीं, परंतु फ़्रांसीसी छोड़ अंग्रेजी में वार्तालाप करना उनको पसद नहीं। फ़्रांसीसियों का अंग्रेजी विरोध तो ऐतिहासिक है। हम भारतीयों का रवैया ठीक उल्टा है। अपने अंग्रेजी-लगाव के औचित्य के लिए हम किसी भी तर्क-कुतर्क को पेश करने में नहीं हिचकते। – योगेन्द्र जोशी

प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

 

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान मुझे अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था। तीन लेखों की अपनी लेखमाला में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि अंगरेजी की वैश्विक व्यापकता को लेकर भारतीयों में जो भ्रांति व्याप्त है वह वास्तविक जानकारी पर आधारित नहीं है। इस दूसरे लेख में मॉंट्रियाल शहर में फ़्रांसीसी भाषा को लेकर मेरे देखने में जो कुछ आया उसका संक्षिप्त विवरण कुछ तस्वीरों के माध्यम से मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

कनाडा की कुल आबादी (करीब 3.6 करोड़) का लगभग 25% फ़्रेंच यानी फ़्रांसीसी भाषाभाषी है। प्रायः सभी फ़्रांसीसी-भाषी राजकाज की आधिकारिक भाषा फ़ेंच वाले क्यूबेक प्रांत में रहते हैं – लगभग 82 लाख अकेले क्यूबेक (Quebec) प्रांत में और शेष करीब 3 लाख अति छोटे प्रांतों (न्यू ब्रुंसविक New Brunswick, मनिटोबा Manitoba, नोवा स्कोटिया Nova Scotia में, और छिटपुट तौर पर अन्यत्र रहते हैं। शेष कनाडा में अंग्रेजी प्रचलन में है। राष्ट्र के स्तर पर कनाडा की राजकाज की आधिकारिक भाषाएं अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं।

क्यूबेक प्रांत का सबसे बड़ा शहर मॉंट्रियाल (Montreal, आबादी करीब 38 लाख) है। यह ऑंटारियो प्रांत के टोरंटो (Toronto, आबादी करीब 56 लाख) शहर के बाद कनाडा का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। एक पर्यटक के तौर पर मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मॉंट्रियाल गया। पर्यटन की दृष्टि से वहां बहुत कुछ दर्शनीय उपलब्ध है। उस सब का ब्योरा प्रस्तुत करना मेरा मकसद नहीं है। पर्यटन के दौरान दर्शनीय स्थानों पर घुमते-फिरते फ़्रांसीसी भाषा को लेकर वहां जो कुछ मुझे देखने को मिला उस को मैंने अपने स्मृति-पटल एवं कैमरा में संचित करने का प्रयास किया। हर बात चित्रों में अंकित नहीं की जा सकती थी, फिर भी बहुत कुछ ऐसा अवश्य था जिसके माध्यम से पाठकों तक यह जानकारी पहुंचाई जा सकती है कि प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी देश होते हुए भी कनाडा के उस क्षेत्र में फ़्रांसीसी का ही बोलबाला है।

खरीद-फ़रोख्त की रसीद

1-quebec-montral-receipts

मॉंट्रियाल में हमने एक स्थान पर “मेट्रो” नामक “फ़ूडमार्ट” से कुछ फल आदि भोज्य सामग्री खरीदी थीं। अन्य स्थल पर “सबवे” नाम के रेस्तरां में भोजन भी किया था। अन्यत्र पॉपकॉर्न का आस्वादन भी किया था। इन स्थानों पर मिले खरीद-फरोख्त की रसीदों की तस्वीर बानगी के तौर पर मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। (चित्र में क्यूबेक की दो रसीदों की तस्वीरें भी शामिल हैं।) ध्यान दें कि ये रसीदें फ़्रेंच भाषा में हैं। इनमें क्या लिखा है यह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि कहां क्या खरीदा होगा वह ठीक-ठीक अब याद नहीं है। इन रसीदों का उल्लेख यह बताने के लिए मैं कर रहा हूं कि हमारे देश की भांति क्यूबेक प्रांत में रसीदें अंग्रेजी में नहीं मिलती हैं। राज्य की भाषा फ़्रांसीसी होने का मतलब है लेनदेन की लिखापढ़ी भी फ़्रांसीसी में किया जाना। अपने देश में तो सर्वत्र अंग्रेजी में ही रसीदों का प्रचलन है!

मेट्रो स्टेशन

2-montreal-metro-station-and-ticket

हम लोगों ने शहर के भीतर एक स्थान से दूसरे तक जाने के लिए “मेट्रो ट्रेन” की सेवा का भी लाभ लिया। मॉन्ट्रियाल के भूमिगत एक स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा के समय वहां पर दीवाल पर प्रदर्शित विज्ञापन अथवा जानकारी पर मेरी दृष्टि पड़ी तो मैंने उसकी तस्वीर कैमरे में कैद कर ली। यहां प्रस्तुत चित्र उसी छायाचित्र की प्रति है। इस प्रकार के प्रदर्शन-पट (डिस्प्ले-बोर्ड) शहर के अन्य स्थलों पर भी देखने मिल जाते हैं। और ये सभी फ़्रांसीसी भाषा में ही रहते हैं; शायद ही कहीं अंग्रेजी में मिलते हों। प्रस्तुत चित्र के बांये ऊपरी कोने पर उस टिकट (या टोकन जैसा कि उसे वहां कहा जाता है) की प्रति को भी मैंने प्रदर्शित किया है जिसको साथ लेकर मैंने आवागमन किया। यह टोकन भी पूरी तरह फ़्रांसीसी में ही है।

मॉन्ट्रियाल ओलम्पिक स्टेडियम टावर

3-montreal-tower-guiness-record

आज से चालीस वर्ष पूर्व सन्‍ 1976 में मॉन्ट्रियाल में ओलम्पिक खेल आयोजित हुए थे। उस समय वहां क्रीड़ांगनों (स्टेडियमों) और अन्य भवनों का निर्माण किया गया था। उनमें से प्रमुख था “मॉंट्रियाल स्टेडियम टावर” जो स्वयं में 165 मीटर ऊंचा एक तिरछा स्तंभ है जिसके शीर्ष पर शहर का नजारा देखने के लिए चारों ओर चलने-फिरने का स्थान प्राप्य है। साथ में एक रेस्तरां एवं स्मारक-वस्तुओं/उपहारों की दुकान भी है। वहां पहुंचने के लिए लिफ़्ट की व्यवस्था है। हम लोग भी टावर के शीर्ष पर गये थे। वह टावर उस काल की अनूठी भवन-संरचना के लिए विख्यात हुआ था। इस संदर्भ में वहां बड़े-से बोर्ड पर “गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स” द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र की प्रदर्शित छायाप्रति मेरी नजर में आई जिसे में यहां प्रस्तुत किया है।

वहां प्रदर्शित बोर्ड पर उल्लिखित जानकारी पूर्ण्तया फ़्रेंच भाषा में है। बोर्ड के निचले भाग में दायीं ओर गिनीस-रेकॉर्ड के प्रमाणपत्र की प्रति भी अंकित है जो अंग्रेजी में है, कदाचित इसलिए कि प्रमाणपत्र अंग्रेजी में ही दिए जाते होंगे। चित्र के निचले भाग में बांयी तरफ़ “इनसेट” में एक रंगीन तस्वीर भी शामिल। यह उसी टावर की तस्वीर है। ध्यान दें कि इस टावर के आधार/तले से लगभग सटी-हुई एक अंडाकार भवन-संरचना भी देखने को मिल रही है। 1976 के ओलंपिक खेलों के समय इसके भीतर साइकिल दौड़ के लिए “साइकिल-ट्रैक” (वेलोड्रोम velodrome) बनाया गया था। 1992 में इसे जैविक संग्रहालय के तौर पर इस्तेमाल में ले लिया गया। इस गुंबदाकार भवन के बाहर नाम-पट पर लिखित है “Biodome de Montreal” फ़्रांसीसी में।

4-montreal-biodome

वनस्पति उद्यान, मॉंट्रियाल

मेरी समझ में मॉंट्रियाल का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटक एवं दर्शनीय स्थान है वहां का वनस्पति उद्यान (Botanical Garden of Montreal, फ़्रांसीसी में Jardin Botanique de Montreal)। उद्यान के प्रवेश-द्वार के बाहर तीन सूचना-पटों पर फ़्रेंच भाषा में लिखित संकेत देखने को मिलते हैं। उनके आंशिक तस्वीरों को यहां एक साथ प्रस्तुत किया गया है। सूचना-पटों पर क्या लिखा है इसका अनुमान लगाया जा सकता था, किंतु अंग्रेजी में न होने के कारण वे हमारे लिए स्पष्ट नहीं थे।

5-montrreal-garden-display-boards-mixed

7-montreal-jardin-garden-university-name

प्रवेश-द्वार पर एक सूचना-पट भी प्रदर्शित है जिससे पता चलता है कि इस उद्यान की व्यवस्था मॉंट्रियाल विश्वविद्यालय (Universite de Mntreal) के प्रशासनिक/शैक्षिक नियंत्रण में है। वस्तुतः यह विश्वविद्यालय के “वनस्पति-विज्ञान शोध संस्थान” (Institute de researche en biologie vegetale) का हिस्सा है। ध्यान दें कि फ़्रांसीसी और अंग्रेजी के कई शब्द मिलते-जुलते हैं, इसलिए प्रदर्शित सूचनाएं थोड़ा-बहुत समझ में आ जाती हैं। किंतु विश्वविद्यालय का विभाग होने के बावजूद विविध जानकारियां अंग्रेजी में लिखित नहीं देखने को मिलीं यह मेरे विचार में ध्यानाकर्षक तो है ही हम भारतीयों के लिए विचारणीय भी है। ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय का शिक्षण-माध्यम प्रमुखतया फ़्रांसीसी ही है होगी, भले ही साथ-साथ अंग्रेजी का भी व्यवहार होता हो।

6-montreal-arboretum-botanical-garden

इस उद्यान का नक्शा भी प्रवेश-द्वार पर देखने को मिलता है लेकिन वह फ़्रांसीसी न जानने वाले के लिए समझ से परे ही कहा जायेगा।

उद्यान का अंतरंग

8-montreal-garden-inside-entry-sign

उद्यान के अंदर प्रवेश करने पर स्थान-स्थान पर प्रचलित संकेतों और फ़्रांसीसी में लिखित संदेशों के माध्यम से यह बताया गया है कि कहां क्या है और किस ओर प्रवेश-मार्ग और किस ओर निकास-मार्ग हैं।

9-montreal-friends-of-garden

उद्यान के भीतर प्रदर्शित सूचना-पटों में से एक की तस्वीर यहां उदाहरण-स्वरूप प्रस्तुत है। मेरे अनुमान में फ़्रांसेसी में लिखित सूचना शायद यह संदेश देती है कि उद्यान के टिकट से प्राप्त धन प्रकृति-संरक्षण में लगाया जाता है।

10-montreal-chinese-garden-restoration-work

एक अन्य सूचना-पट पर लिखित जानकारी से यह प्रतीत होता है कि उद्यान के एक अंग “चीनी उद्यान” (Le jardin de Chine) का इस समय (2015-17) restoration कार्य चल रहा। अतः उद्यान के इस हिस्से का हम दर्शन हम नहीं कर सके।

निष्कर्ष

इस आलेख में शामिल गिने-चुनी तस्वीरों के माध्यम से मैंने पाठकों के समक्ष यह तथ्य रखने का प्रयास किया है कि क्यूबेक में तमाम स्थानों पर केवल फ़्रांसीसी में लिखित जानकारी प्रदर्शित की हुई मिलती है। इसका अर्थ यह है कि अंग्रेजी के प्रति जैसा आकर्षण एवं उत्साह हम भारतीयों में देखने को मिलता है वैसा अन्य बहुत-से देशों में देखने को नहीं मिलता है। अंग्रेजी की गुलामी उन देशों की खासियत है जो अंग्रेजी शासन के अधीन रहे और जहां अंग्रेजी की जड़ें इतनी गहरी बैठ गयीं कि अंग्रेजों से मुक्ति के बाद भी अंग्रेजी से मुक्ति लोगों को नहीं मिली। और अब इस भाषाई गुलामी से मुक्ति के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।

अगले आलेख में मेरा प्रयास क्यूबेक शहर में प्राप्त भाषा संबधी अनुभवों का उल्लेख करने का है। क्यूबेक अपने ही नाम वाले प्रांत का दूसरा बड़ा शहर और पर्यटक स्थल है। – योगेन्द्र जोशी

और कुछ तस्वीरें-

montreal-garden-bonsai

montreal-garden-cactii

montreal-garden-orchid

montreal-olympic-stadium-main