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कनाडा प्रवास, Canada residence, कनाडा की भाषाएं, Languages in Canada, कनाडा में फ़्रांसीसी भाषा, French language in Canada, क्यूबेक में फ़्रेंच, French in Quebec

“आज ख्रिस्तीय नववर्ष, 2017, के आरंभ का पहला दिन है। आधुनिक काल में इसे एवं इसकी पूर्वसंध्या को विश्व में प्रायः सर्वत्र एक पर्व के तौर पर हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर देश-विदेश के सभी नागरिकों को मेरी शुभाकांक्षाएं।”

अधिकांश भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं। उद्येश्य यह समझाना है कि कनाडा तक में अंग्रेजी उतनी नहीं चलती है जितनी लोग सोचते होंगे। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है।

पहले एक छायाचित्र, नियागरा जलप्रपात (कनाडा) का –

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कनाडा: संक्षिप्त परिचय

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान मैं एवं मेरी पत्नी उत्तरी अमेरिकी द्वीप के देश कनाडा (Canada) के एक छोटे शहर लंडन (London) में अपने बेटे-बहू के पास लगभग 45-50 दिन के लिए प्रवास पर रहे। यहां यह बता दूं कि अंग्रेजों ने कनाडा के कई शहरों, राजमार्गों, नदियों आदि के नाम ब्रिटेन में प्रचलित नामों पर ही रखा। लंडन नाम इंग्लैंड के लंडन के नाम की नकल है। दिलचस्प यह भी है कि इस शहर में एक छोटी-सी नदी बहती है जिसका नाम भी इंग्लैंड के टेम्स (Thames) नदी के नाम पर ही है।

कनाडा प्रमुखतया अंग्रेजों का उपनिवेश हुआ करता था। क्यूबेक (Quebec) नाम से ज्ञात उसके पूर्वी समुद्रतटीय  प्रदेश और उसके आसपास का अपेक्षया छोटा इलाका कभी फ़्रांसीसी (फ़्रेंच) उपनिवेश हुआ करता था। किंतु उसे अंग्रेजी ने 1770 के दशक के युद्ध में फ़्रांसीसी सरकार से जीत लिया था।

कनाडा को जुलाई 1, 1967, में ब्रितानी राज से पूर्ण स्वायत्तता मिल गयी थी, लेकिन  संप्रभु राष्ट्र का दर्जा ब्रिटेन ने नहीं दिया। इस तारीख को कनाडावासी स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाते हैं। सन्  1982 में  कनाडा ऐक्ट (Canada Act) के पारित होने के बाद वह देश औपचारिक रूप से एक संप्रभु राष्ट्र बन गया।

नाडा की कुल आबादी करीब 3.6 करोड़ है और क्षेत्रफल करीब 91 लाख वर्ग किमी। उसकी तुलना में भारत की अनुमानित आबादी इस समय 130+ करोड़ है, यानी कनाडा से लगभग 36 गुना अधिक। किंतु भारत का क्षेत्रफल उसकी अपेक्षा केवल एक-तिहाई है। इस प्रकार कनाडा में प्रति व्यक्ति भूमि की उपलब्धता भारत की अपेक्षा करीब दस गुना – जी हां दस गुना – अधिक है। यह बात भी ज्ञातव्य है कि उस देश का अधिकांश भाग, विशेषतः पूर्व से पश्चिम तक का उत्तरी क्षेत्र, मानव जीवन-यापन के अनुकूल नहीं है। इसलिए कनाडा में लोग अमेरिका से लगे सीमावर्ती दक्षिणी क्षेत्र में ही वसे हैं।

कनाडा – आधिकारिक भाषाएं

कनाडा में राजकाज की दो आधिकारिक भाषाएं (Official Languages) हैं: अंग्रेजी (English) और फ़्रांसीसी (French)। फ़्रांसीसी बोलने वाले करीब 85 लाख है, अर्थात्‍ कुल जनसंख्या का लगभग एक-चौथाई। इनमें से 82 लाख के करीब अकेले क्यूबेक (Quebec) प्रांत में हैं; शेष करीब 3 लाख छोटे प्रांतों, न्यू ब्रुंसविक (New Brunswick) (2 लाख 34 हजार), मनिटोबा (Manitoba) (47.6 हजार), तथा नोवा स्कोटिया (Nova Scotia) (34.5 हजार) में रहते हैं। क्यूबेक प्रांत की अपनी आधिकारिक भाषा केवल फ़्रांसीसी है। उक्त अन्य की फ़्रांसीसी के साथ अंग्रेजी भी है।

कनाडा के अन्य प्रांतों की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी है। मैं जिस शहर लंडन (London, Canada) में रहा वह कनाडा के ऑंटारिओ (Ontario) प्रांत में है। कनाडा का सबसे बड़ा शहर टोरंटो (Toronto) है (आबादी करीब 60 लाख), जिसका  फ़्रांसीसी उच्चारण टोरानो है, इसी प्रांत में है। लंडन शहर इस शहर से 191 किमी की दूरी पर है।

ऑंटारिओ एवं क्यूबेक में फ़्रांसीसी भाषा

कनाडा की राजधानी ओटवा (Ottawa) है जो इसी नाम की नदी के दक्षिणी किनारे पर बसा है (आबादी करीब 13 लाख)। ऑंटारिओ एवं क्यूबेक प्रांतों की विभाजक सीमा रेखा भी यही नदी है। नदी के दूसरी ओर बसा है फ़्रेंचभाषी क्यूबेक प्रांत का गैटनो (gatineau) शहर। स्पष्ट है कि क्यूबेक की सन्निकटता के कारण राजधानी ओटवा में फ़्रेंचभाषा का प्रचलन काफी हद तक होना स्वाभाविक है। दरअसल प्रांत ऑंटारिओ के क्यूबेक से लगे होने के कारण उसके सीमावर्ती क्षेत्र में अंग्रेजी के साथ फ़्रेंचभाषा का भी कुछ हद तक प्रचलन देखने को मिलता है।

कनाडा का शहर टोरंटो या टोरानो भी क्यूबेक प्रांत के निकट है और उससे कुछ दूरी पर लंडन शहर है (आबादी 5 लाख) । वहां भी यदाकदा फ़्रेंच का प्रयोग देखने को मिल जाता है। एक बार मैं लंडन के ह्यूरॉन सड़क पर टहल रहा था तो मेरी नजर एक चैपल (Chapel) पर पड़ी जिसके परिसर में प्रदर्शित सूचनापट्ट पर केवल फ़्रांसीसी में लिखा है। देखें प्रस्तुत छायाचित्र (फोटो)।

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मेरा अनुमान है कि चित्र में दिख रहा धार्मिक स्थल चैपल लंडन में रह रहे मुख्यतः फ़्रेंचभाषियों के लिए स्थापित है। इस पर अंकित जानकारी में अंग्रेजी कहीं नहीं है। लंडन शहर प्रमुखतया अंग्रेजीभाषी है, फिर भी वहां कुछ लोग फ़्रेंच को तवज्जो देते हैं।

चूंकि कनाडा की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी के साथ फ़्रांसीसी भी है अतः सरकारी कामकाज दोनों में होता है। प्रांतों की इनमें से एक अपनी भाषा है और उनका कार्य उसी भाषा में होता है। क्यूबेक में केवल फ़्रांसीसी चलती है यह मैं अगले दो लेखों में स्पष्ट करूंगा। यहां मैं इतना बता दूं कि वहां उपलब्ध उपभोक्ता सामग्री पर प्रायः दोनों भाषाओं में जानकारी छपी रहती है। भारत से आयातित कई उत्पादों पर मैंने अंग्रेजी के साथ फ़्रांसीसी में भी जानकारी छपी देखी है। ये ही उत्पाद जब भारत के भीतर उपभोग के लिए उपलब्ध होती हैं तो उन पर न क्षेत्रीय भाषा में और न ही राजभाषा हिन्दी में जानकारी दी जाती है।

भारत – अपनी भाषाएं तिरस्कृत

उक्त बात दर्शाती है कि इस देश में देशज भाषाओं को कोई अहमियत नहीं मिलती है। देश में अंग्रेजी जानने वाले 10-11% से अधिक नही होंगे, फिर भी उपभोक्ता को केवल अंग्रेजी में जानकारी देना इस देश के लोगों की हीनभावना या गुलाम मानसिकता अथवा सामाजिक असमानता बनाए रखने के विचार का द्योतक है ऐसा मेरा सोचना है।

मैं अगले दो आलेखों में क्यूबेक के मोंट्रियाल (आबादी 38-39 लाख के बीच) एवं क्यूबेक (आबादी 8 लाख) शहरों में फ़्रेंच के बोलबाले की चर्चा करूंगा।

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मुझे ई-मेल के माध्यम से एक सूचना मिली जिसमें इकनॉमिक टाइम्ज़ में छपे समाचार से संबंधित अधोलिखित लिंक (कड़ी?) प्राप्त हुआ। समाचार इस आलेख के शीर्षक से संबंधित है।

http://economictimes.indiatimes.com/news/politics-and-nation/pm-narendra-modi-asks-ministries-to-create-websites-in-regional-languages/articleshow/55364400.cms?prtpage=1

अंग्रेजी में छपे इस समाचार को पढ़ने के बाद मेरे मन में यह विचार उठा कि क्यों न इसका हिन्दी में यथासंभव सही अनुवाद कर डालूं और अपने चिट्ठे में शामिल करूं।

मैं व्यावसायिक अनुवादक नहीं हूं। अंग्रेजी से हिन्दी में लंबा-चौड़ा अनुवाद करने का प्रयास मैंने कभी किया भी नहीं। अपनी निजी जरूरत के अनुसार कभी-कभी कुछएक वाक्यों या छोटे-मोटे अनुच्छेद का अनुवाद अवश्य कर लिया करता था। उक्त अंग्रेजी समाचार देख मैंने सोचा कि इस बार पूरे समाचार के ही अनुवाद का प्रयास किया जाये। मेरे लिए यह एक प्रयोग तो था, और साथ में अपने पाठकों से समाचार को हिन्दी में साझा करने का अतिरिक्त संतोष! सो आगे प्रस्तुत है उक्त समाचार का अनुवाद। ध्यान दें कि ब्रैकेटों (कोष्ठकों) में मेरे स्वयं के जोड़े गये शब्द हैं। -योगेन्द्र जोशी

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंत्रालयों को क्षेत्रीय भाषाओं में वेबसाइटें बनाने के निर्देश दिए हैं

प्रधानमंन्त्री नरेन्द्र मोदी ने सभी मंत्रालयों को निर्देश दिये हैं कि वे अपनी वेबसाइटों (जालस्थलों?) को आधिकारिक मान्यताप्राप्त समस्त क्षेत्रीय भाषाओं में पेश करें।

“प्रधानमंन्त्री जी चाहते हैं कि केन्द्र सरकार की वेबसाइटें केवल अंग्रेजी एवं हिन्दी में उपलब्ध न हों .. वे बहुभाषीय हों क्योंकि देश भर की जनता जानकारी के लिए [उन पर खोजती है]। यह अब प्राथमिकता का कार्य है।” एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी ने ईटी [इकनॉमिक टाइम्ज़] को बताया।

यह उन मंत्रालयों के लिए वृहत्काय चुनौती होगी जो अभी अपनी वेबसाइटों को पूर्णतः द्विभाषी बनाने में संघर्ष कर रही हैं। इस समय केवल प्रधानमंत्री कार्यालय की वेबसाइट क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है। यह अंग्रेजी एवं हिन्दी के अलावा आठ क्षेत्रीय भाषाओं में उपलब्ध है, जब कि पत्र सूचना कार्यालय अंग्रेजी, हिन्दी तथा उर्दू के अतिरिक्त 12 क्षेत्रीय भाषों में प्रेस प्रकाशनी (press release) पेश करती है।

नोदी [जी] के मन की बात कार्यक्रम के सभी 23 आधिकारिक मान्यताप्राप्त भारतीय भाषाओं में उपलब्ध कराये जाने के बाद यह नया निदेश प्राप्त हुआ है।

उपर्युक्त अधिकारी ने कहा, “प्र.मं की दृष्टि है कि लोगों को अंकीय/डिजिटल सामग्री तक पहुंच उनकी अपनी भाषा में हो।” इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना मंत्रालय को यह कार्य सोंपा गया है, जिसने अपने आरएंडडी [अनुसंधान एवं विकास] तथा सीडैक [उन्नत कंप्यूटन विकास केन्द्र] में विभाजित किया है।

एमईआईटी [इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय] के अधिकारी ने कहा कि एक दर्जन क्षेत्रीय भाषाओं को वांछित परिधि में लाने से पहले प्रथम लक्ष्य केन्द सरकार की 50 वेबसाइटों को अगली अप्रैल तक द्विभाषी – अंग्रेजी एवं हिन्दी में – बनाना है।

अधिकारी ने कहा कि आइटी (सूचना प्रौद्योगिकी) मंत्रालय मशीन अनुवाद पर आधारित प्रौद्योगिकी के माध्यम से सक्षमता प्रदायक ढांचा बनाएगा, जिससे मंत्रालय अपनी सामग्री को विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं मे स्वयं अनुवाद कर सकें। हम कई मूल्यांकनकर्ताओं को [अनुवाद] भेजेंगे – ये वे लोग होंगे जो सुयोग्य हों और उन्हें सरसरी निगाह से देखने और शीघ्र अनुवाद करने की क्षमता हो। मत्रालय वहां से ग्रहण करें।

अधिकारी ने बताया कि सीडैक के अलावा अन्य संस्थाओं, जैसे आईआईटी मद्रास एवं जादवपुर विश्वविद्यालय, को परियोजना में शामिल किया जायेगा, जिन्होंने मशीन अनुवाद में कार्य किया है और कुछ बौद्धिक संपदा अर्जित की है

अधिकारी ने यह भी जोड़ा कि सरकारी योजना क्षेत्रीय भाषाओं में आधिकारिक वेबसाइट बनाने में मशीन अनुवाद को मानव हस्तक्षेप के मिलाएगी। ऐसा इसलिए कि मशीन अनुवाद की परिशुद्धता लगभग 70% मात्र होती है।

“अतः एक व्यक्ति – संपादक के माफ़िक – मशीन अनुवाद के प्रारूप पर नजर डाले और उसे परिशुद्धता के साथ परिवर्तित करे। यानी पहला प्रारूप मशीन अनुवाद का होगा और मनुष्य उस पर चौकसी रखे।” अधिकारी ने कहा।

राज्यों को हिदायत दी गयी है कि वे अपनी वेबसाइटों को क्षेत्रीय भाषाओं में बनायें। “राज्यों को दी जाने वाली कुछ सेवाओं के लिए हम अतिरिक्त स्थानीय भाषा पर विचार कर सकते हैं, जो संबंधित राज्य की जरूरत पूरी करता हो।” अधिकारी ने कहा।

समाप्त

नमस्ते से “गुड मॉर्निंग” तक की यात्रा
समाज में अंग्रेजी औr अंग्रेजियत के आकर्षण के वाकये का चित्रण।

जिंदगी बस यही है

मुझे मौजूदा मोहल्ले में रहते हुए करीब 30 साल बीत चुके हैं। शुरुआती दो वर्षों के बाद से अपने निजी मकान में रह रहा हूं। मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। मैंने इन भाइयों के माता-पिता को देखा है। मैं उनकी पीढ़ी को पहली पीढ़ी संबोधित कर रहा हूं और तदनुसार उक्त भाइयों को दूसरी पीढ़ी के कहूंगा। अब वे माता-पिता इस संसार में नहीं रहे। सुना है कि इस मोहल्ले की भूमि कभी इनकी एवं इनके पट्टीदारों की हुआ करती थी। कालोनाइज़र को जमीन बेचने पर मिले पैसे का समुचित उपयोग ये लोग शायद नहीं कर पाये होंगे। इसलिए इनकी माली हालत सामान्य या उससे बदतर रही है ऐसा मेरा सोचना है। ये पांचों भाई मोहल्ले के पास ही लगने वाली फल-सब्जी-सट्टी में थोक अथवा फुटकर कारोबार करके परिवार का पालन-पोषण करते आये हैं।

अब दूसरी पीढ़ी के इन भाइयों की उम्र साठ के आसपास उसके…

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हिन्दी दिवस, २०१६

आज हिन्दी दिवस है, १४ सितंबर। सन् १९५० से आज तक ६६ वर्षों से हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, एक ही ढर्रे से। कहीं वन-डे प्रोग्राम (यानी एकल-दिवसीय कार्यक्रम), तो कहीं वन-वीक प्रोग्राम (साप्ताहिक कार्यक्रम), और कहीं वन-फ़ोर्टनाइट प्रोग्राम (पाक्षिक कार्यक्रम)। दिवस मनाने का वही बासी पड़ चुका तरीका। उन लोगों के भाषण होंगे जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर हिन्दी से कोई लेना-देना नहीं, किंतु जिनके सामने हिन्दी के बाबत कुछ कहने की विवशता आ जाती है। हिन्दी आम जन की भाषा है, देश की संपर्क भाषा है, राष्ट्रीय एकता की निशानी है इत्यादि जुमले वक्ताओं के मुख से प्रायः निसृत होते हैं। हमें हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, आधिकारिक कार्य हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में होना चाहिए, इत्यादि सलाह साल-दर-साल दी जाती है। जिन्हें यह सब करना है वे अंगरेजी को यथावत अपनी जगह बनाये रखे हैं।

कथनी एक और कथनी कुछ और। पता नहीं आगामी कितनी दशाब्दियों- शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहेगा।

भाषणबाजी के अलावा हिन्दी दिवस मनाने के और भी तरीके प्रचलन में हैं। संस्थाएं निबंध-लेखन, वाद-विवाद, कर्मियों के लिए हिंदी-टंकण आदि की प्रतिस्पर्धाएं भी आयोजित करती हैं और विजेताओं को पुरस्कृत करती हैं। वर्ष में एक बार सितंबर में यह सब ठीक वैसे ही होता है जैसे पावस ऋतु का आना और जाना। सितंबर की समाप्ति होते-होते आकाश से बादल छंट जाते हैं और उसी के साथ तिरोहित होता है हिन्दी के प्रति जागृत अल्पकालिक उत्साह।

जरूरी है क्या हिन्दी दिवस

इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता को मैं आज तक नहीं समझ सका। पता नहीं कितने देशों में तत्सदृश भाषा दिवस मनाये जाते हैं।  देश यथावत चल रहा है। अंगरेजी की अहमियत बढ़ रही है घट नहीं रही। जो कार्य अंगरेजी में होता आया है वह आज भी वैसे ही चल रहा है। हिन्दी एवं अन्य भाषाएं आम बोलचाल तक सीमित होती जा रही हैं। और वे अंगरेजी के साथ खिचड़ी बनती जा रही हैं। अब हालत यह हो रही है कि कई लोगों की हिन्दी बिना अंगरेजी के समझना मुश्किल है। हिन्दी का अंगरेजीकरण बदस्तूर चल रहा है।

तब क्या है इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता? किसको हिन्दी के प्रति प्रेरित किया जाना है? जिस देश के लोग खुद मान चुके हैं कि अंगरेजी के बिना देश नहीं चल सकता, प्रगति नहीं कर सकता, सुख-समृद्धि की कुंजी तो अंगरेजी है, इत्यादि उन्हें हिन्दी दिवस की क्या जरूरत?

कभी-कभी हिन्दी को लेकर बहुत कुछ लिख जाने का मन होता है मेरा। जोश चढ़ता है लेकिन उसके स्थायित्व की कमी रहती है और लेखन का तारतम्य अक्सर टूट जाता है। लेख की प्रगति स्वयं की दृष्टि में संतोषप्रद नही रह जाती है। फिर भी हाल में अपने अल्पकालिक कनाडा प्रवास के अंगरेजी बनाम फ़्रांसीसी संबंधी अनुभव को पाठकों से साझा करने का विचार है। उस विषय पर दो-तीन लेख लिखने हैं, किंतु आज नहीं। आज तो अपने अनुभवों को लेकर एक दो टिप्पणियां काफ़ी होगा।

मैं उपदेशात्मक या निर्देशात्मक लेख नहीं लिखता। इस ब्लॉग में हो या मेरे दूसरे ब्लॉगों में अथवा अन्यत्र, मेरा लेखन यथासंभव तथ्यों के उद्घाटन पर केंद्रित रहता है। उनसे जिसको जो निष्कर्ष निकालना हो वह निकाले। क्या करने योग्य है क्या नहीं यह सुधी जन स्वयं सोचें।

एक अनुभव यह भी

शुरुआत मैं कुछ समय पहले अपने अनुभव में आए एक वाकये के उल्लेख के साथ कर रहा हूं। घटना हिन्दी से जुड़ी है और हिन्दी क्षेत्र के लोगों का उसके प्रति क्या रवैया है इसकी एक झलक प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं तो रोजमर्रा के जीवन में हम सभी के साथ प्रायः होती रहती हैं, किंतु उन पर सामान्यतः ध्यान नहीं दिया जाता है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के कारण मेरी यह “खराब” आदत बन चुकी है कि मैं घटनाओं को गौर से देखता हूं। अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के कार्य में यह तो करना ही पड़ता था, अन्य स्थलों पर भी आदत से मजबूर रहता हूं। घटना का विवरण कुछ यों है –

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में अवस्थित भारतीय स्टेट बैंक शाखा के अहाते में पासबुक प्रिंट (मुद्रित) करने की एक आटोमैटिक (स्वचालित) मशीन लगी है। ( मैं बीएचयू में ही भौतिकी-शिक्षक था।) उस दिन मैं अपनी और अपने परिवारी जनों के पासबुक लेकर बैंक पहुंचा था। उन पासबुकों पर कोई तीन-एक साल से प्रिंटिग (मुद्रण) नहीं हुई थी, क्योंकि घर पर ही इंटरनेट से बैंक-खातों की जानकारी मिल जाया करती है। किंतु मौका देख विचार आया कि पासबुकें प्रिंट कर ली जाएं। मैं मशीन के पास लगी पंक्ति में शामिल हो गया। अपनी बारी आने पर मैंने पाया कि मेरी अकेली एक पासबुक प्रिंट होने में ही पर्याप्त समय लग रहा है। चूंकि बैंक के ग्राहकसेवा का समय समाप्त हो चला था, अतः उस स्थान की भीड़ छंटने लगी थी। सदाशयता के नाते मैं पंक्ति से बाहर निकल आया यह सोचकर कि जब अन्य जनों का कार्य पूरा हो जाएगा तब फुरसत से अपना कार्य पूरा कर लूंगा।

वह स्वचालित मशीन प्रिंटिंग आरंभ करने से पहले प्रक्रिया संबंधी संदेश ध्वनित रूप में (न कि पर्दे पर लिखित रूप में) प्रदान करती है। उसके पहले ग्राहक को पर्दे पर संदेश मिलता है हिन्दी अथवा अंगरेजी का विकल्प चुनने के बारे में। उपस्थित जन क्या विकल्प चुनते हैं इस पर मैं गौर कर रहा था। मैंने पाया कि हर कोई अंगरेजी का ही विकल्प चुन रहा था। सार्वजनिक स्थल पर यदि ऐसा कुछ घटित हो रहा हो जो मुझे अप्रिय लगे तो मैं टिप्पणी किए बिना प्रायः नहीं रह पाता हूं। मित्र-परिचित मेरे इस स्वभाव को “गंदी आदत” कहते हैं। उक्त अवसर पर सभी को सुनाते हुए मेरे मुंह से निकला, “आप लोग आम तौर पर हिन्दी बोलते हैं, तब यहां पर हिन्दी क्यों नहीं चुन रहे हैं?”

मेरी टिप्पणी सुनना उनके लिए नितांत अप्रत्याशित था। वे प्रश्नभरी निगाह से मेरी ओर देखने लगे। फिर उनमें से एक उच्चशिक्षित एवं संभ्रांत-से लग रहे नौजवान (मेरे अनुमान से बीएचयू में शिक्षक/शोधकर्ता) ने कहा, “हमारी सरकारी व्यवस्था ही ऐसी हो चुकी है कि सर्वत्र अंगरेजी का बोलबाला है। अब तो आदत ही हो चली है अंगरेजी की। तब हिन्दी का प्रयोग न करें तो क्या फर्क पड़ता है?” और उसके बाद देखा कि उन्होंने अंगरेजी का ही विकल्प चुना।

वहां मौजूद अधिकांशतः सभी चुप रहे। कुछ मेरी ओर मुस्कराते हुए देखने लगे, गोया कि मैंने कोई अजीब-सी या बेतुकी बात कही हो। फिर एक अधेड़ – जो हावभाव से बीएचयू के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लग रहे थे – की प्रतिक्रिया आई, “अंगरेजी तो सारी दुनिया में चल रही है। तब उसे छोड़ हिन्दी में कार्य करने का क्या फायदा?”

मैंने पहले व्यक्ति को यह समझाने की कोशिश की कि वस्तुस्थिति को बदलने का प्रयास तो हम में से प्रत्येक को ही करना चाहिए, अन्यथा अंगरेजी के वर्चस्व वाली स्थिति यथावत बनी रहेगी। दूसरे व्यक्ति को मैंने यह जताने का प्रयास किया कि दुनिया के अधिकांश देशों में अंगरेजी का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में उतना नहीं होता जितना अपने देश में। वहां अंगरेजी के बिना भी लोग अपना कार्य बखूबी करते हैं। उन्हें अपनी गलतफहमी छोड़नी चाहिए।

अंगरेजी की वैश्विकता का भ्रम

यह घटना दो बातों की ओर संकेत करती हैः (1) पहला यह कि देशवासियों में यह गंभीर भ्रम व्याप्त है कि विश्व में सर्वत्र अंगरेजी में ही कार्य होता है, और (2) दूसरा यह कि जब केंद्र एवं राज्य सरकारें ही अंगरेजी में कार्य करती हैं, उसी को महत्व दे रही हैं, तो आम आदमी क्यों हिन्दी अपनाए ? यह दूसरी बात अधिक गंभीर है, क्योंकि किसी के भ्रम का निवारण करना संभव है, किंतु प्रशासनिक जडत्व दूर करना असंभव-सा है।

ऊपर जिन दो बातों का उल्लेख मैंने किया है वे उक्त अकेली घटना पर आधारित नहीं हैं। अपने विश्वविद्यालयीय जीवन में तथा अन्य मौकों पर लोगों के साथ बातचीत में मुझे उक्त बातों का अनुभव होता रहा है। लोग अपनी धारणा के पक्ष में तर्क-कुतर्क पेश करते हुए भी पाया है।

लोगबाग शायद अब तक यह भूल गये होंगे कि जब चीन के बीजिंग शहर में ओलंपिक खेल आयोजित (2008) हुए थे तो वहां पहली बार सड़कों, क्रीड़ागनों, होटलों तथा अन्य भवनों के नामपट्ट आदि अंगरेजी में भी लिखे गये थे। उसके पहले अंगरेजी में नामपट्ट कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दिखाई देते थे। यह भी याद करें कि कई जगह तो चीनी से अंगरेजी में किए गए अनुवाद हास्यास्पद हो चले थे।

अभी हाल में मेरे एक निकट संबंधी जर्मनी किसी सम्मेलन में गये थे। उन्होंने बताया कि भारतीयों की आम धारणा के विपरीत उन्हें वहां भाषाई समस्या का सामना करना पड़ा, खास तौर पर छोटे-मोटे होटल-रेस्तरां में। ऐसा ही अनुभव मुझे कोई 30 साल पहले पेरिस में हुआ था। जिन लोगों को चीन, जापान, ब्राजील में प्रवास का अनुभव है वे जानते हैं कि वहां अंगरेजी से काम नहीं चलता। यह भी याद करें कि बोफोर्स घोटाले के आरोपी “ओताविओ क्वात्रोची” को अर्जेंटिना देश से सी.बी.आई. प्रत्यर्पण इसलिए नहीं करा पाई कि स्पेनी भाषा में लिखित मामले से संबंद्ध दस्तावेजों का अंगरेजी में अनुवाद कराने में उसको (सी.बी.आई. को) मुश्किल आ रही थी।

उक्त बातों से क्या निष्कर्ष निकलता है?

यही न कि अंगरेजी की विश्व-व्यापकता को लेकर भारतीयों में भ्रम व्याप्त है जिसके चलते वे अंगरेजी को हर स्थल पर हर अवसर पर वरीयता देते हैं। किंतु इस भ्रम से उनको मुक्त करना अतिकठिन असंभव-सा कार्य है, क्योंकि यह भ्रम बरकरार रहे ऐसा प्रयास करने वाले लोग देश में अधिक हैं उनकी तुलना में जो इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि हिन्दी के कई पक्षधर स्वयं इसी भ्रम में जी रहे हैं और हिन्दी की बात वे भावनावश करते हैं। अंगरेजी की व्यापकता की बात मिथ्या है इसकी बात वे नहीं करते।

मैकॉले की शिक्षा नीति

वे क्या कारण हैं कि अंगरेजी भारतीय भाषाओं के ऊपर अजेय वर्चस्व पा सकी है और वह यहां के जनमानस पर जादुई तरीके से राज करती आ रही है? जो कारण मेरी समझ में आते हैं उनमें प्रमुख है अंगरेजी हुकूमत की वह नीति जिसे लोग “मैकॉले की शिक्षा नीति” के नाम से जानते हैं। करीब पौने दो सौ साल पहले की उस नीति का सार मैकॉले के अधोलिखित कथन में निहित हैः

“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” – T.B. Macaulay, in support of his Education Policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.

हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे करोड़ों जनों के बीच दुभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि से अंग्रेज हों।” (हिन्दी अनुवाद मेरा)

ब्रिटिश हुकूमत की वह नीति कैसे सफल हुई और उसके चलते कैसे एक सशक्त प्रशासनिक बिरादरी ने इस देश में जड़ें जमाई इसकी चर्चा मैं अगले आलेख में करूंगा।  आपको यह स्वीकरना होगा कि विलायत के शासकों ने इसी जमात की मदद से इस देश पर राज किया था। यही वह तबका था जो स्वयं को अंग्रजों के निकट और आम लोगों से अलग रहने/दिखने का शौक रखता था और आज भी रखता है। इस देश का “इंडियाकरण” इसी सामाजिक वर्ग का अघोषित उद्येश्य रहा है ऐसी मेरी प्रबल धारणा है। और भी बहुत कुछ रहा है। … अभी के लिए लगभग पौने-उन्नीस सौ शब्दों का यह आलेख पर्याप्त है। – योगेन्द्र जोशी

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दिव्यांग

आपने पहले कभी –  यों कहें कि दो-तीन साल पह्ले तक – दिव्यांग शब्द सुना था? शायद नहीं सुना होगा। हो सकता है आपकी जानकारी में किसी व्यक्ति का नाम दिव्यांग हो। मैंने भी कुछ समय पहले तक इसे नहीं सुना था । संस्कृत के अपने न्यूनाधिक ज्ञान के कारण इस शब्द को अपरिचित नहीं कहूंगा। परन्तु जिस अर्थ में यह अब प्रचलन में आ गया है वह मेरे लिए नया है। नये अर्थ में इस शब्द से मेरा परिचय दो-ढाई साल पहले हुआ जब देश के प्रधानमंत्री मोदी जी का वाराणसी आगमन हुआ।

दरअसल 2014 की जनवरी माह की 22 तारीख को प्रधानमंत्री मोदी जी हमारे शहर वाराणसी (उनका संसदीय क्षेत्र) आए थे । यहां उन्होंने शारीरिक अथवा मानसिक रूप से असामान्य (अलौकिक नहीं) सामर्थ्य वाले लोगों के बीच उपयोगी उपकरणों/साधनों का वितरण किया। उसी सिलसिले में उन्होंने संबंधित व्यक्तियों के लिए दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया। पहले ऐसे व्यक्तियों के लिए विकलांग शब्द का प्रयोग किया जाता था। किंतु मोदीजी द्वारा सुझाये इस नये शब्द को समाचार माध्यमों ने सोत्साह स्वीकार कर लिया।  आरंभ में मैंने देखा कि दिव्यांग के साथ-साथ विकलांग शब्द का प्रयोग भी समान रूप से हो रहा था, पर अब तो यही शब्द प्रचलन में आ गया है ऐसा लगता है। सरकारी दस्तावेजों में शायद यही मानक बन चुका है। मेरा अनुमान है कि शिक्षा और नौकरी-पेशे से जुड़ी संस्थाओं ने अब तक अपने फ़ॉर्मों में वांछित बदलाव कर लिया होगा।

अंगरेजी का हैंडिकैप्ड अर्थात् विकलांग

कोई व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक तौर पर सामान्य न होकर न्यूनाधिक अक्षम है इस बात को दर्शाने के लिए अंगरेजी में हैंडिकैप्ड (handicapped) शब्द प्रयोग में लिया जाता है। यह शब्द कब और कैसे व्यवहार में आया इस बाबत अंतर्जाल पर विविध स्रोतों से जानकारी उपलब्ध हो सकती है, उदाहरणार्थ snopes.com पर। यह शब्द प्रथमतः खेलों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ था। समय के साथ इसने नये अर्थ ग्रहण किए और आज यह शारीरिक/मानसिक लाभहीनता (disadvantage) की स्थिति के द्योतक के तौर पर प्रयुक्त होता है। कुछ लोग इसके लिए अंगरेजी में physically/mentally disabled शब्द प्रयोग में लेना पसंद करते हैं। अन्य़ लोग differently able का प्रयोग अधिक उचित समझते हैं।

हैंडीकैप्ड शब्द वस्तुस्थिति का समुचित द्योतक है और अभी तक प्रयोग में लिया जाता रहा है, फिर भी आजकल कईयों को यह अपमानजनक या अप्रिय लगने लगा है। तदनुसार अंगरेजी में वैकल्पिक शब्द व्यवहार में लिए जाने लगे हैं। मोदीजी की नजर में ठीक उसी तरह विकलांग शब्द अनुचित लगने लगा होगा, जिसके कारण उन्होंने नये शब्द “दिव्यांग” का प्रयोग अपने वाराणसी संबोधन में किया था। उनको लगता होगा कि हैंडीकैप्ड को दिव्यांग कहना सम्मान-द्योतक है। समाचार-पत्रों ने मोदी जी के इस भाषायी योगदान की जानकारी आम जन को दी, किसी ने निष्पक्ष भाव से तो किसी ने आपत्ति उठाते हुए। (उदाहरण के तौर पर देखें इकनॉमिक_टाइम्ज़ और द_न्यूज़_माइन्यूट।)

मैं नहीं जानता कि यह नया शब्द दिव्यांग उनके अपने दिमाग की उपज है या भाषाविदों ने उनको इसके प्रयोग की सलाह दी थी। अगर शब्दरचना उनकी अपनी है तो क्या किसी भाषाविद्‍ ने किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की होगी? और यदि भाषाविदों ने ही इसे सुझाया हो तो ऐसा क्या सोच के किया होगा?

अनुपयुक्त शब्द दिव्यांग

मुझे इस पर संदेह नहीं कि यह शब्द सुन्दर, कर्णप्रिय और सम्मान-द्योतक है, परंतु जिस मुद्दे की बात की जा रही है उसके संदर्भ में अर्थपूर्ण नहीं लगता है। इससे वह अर्थ नहीं ध्वनित होते हैं जो शारीरिक अक्षमता को दर्शाता हो। मैं क्यों इस शब्द पर आपत्ति उठा रहा हूं इसे समझने के लिए संस्कृत के “दिव्” क्रियाधातु एवं “दिव्य” शब्द पर गौर करना होगा।  यहां पर मैं संस्कृत के शिव वामन आप्टे द्वारा रचित सुविख्यात संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश के पृष्ठ 446-7 एवं हिन्दी के एक शब्दकोश के पृष्ठ 521 की प्रतियां प्रस्तुत कर रहा हूं।

ध्यान दें कि दिव् क्रियाधातु कई अर्थों में प्रयुक्त होती है, किंतु इससे व्युत्पन्न विशेषण दिव्य में इसका अर्थ स्पष्टतः चमकना या उज्ज्वल होना है। तदनुसार इस विशेषण शब्द के अर्थ हैं दैवी, स्वर्गीय, अलौकिक, उज्ज्वल, मनोहर, सुन्दर इत्यादि। कुल मिलाकर दिव्य उस विशिष्ठता को व्यक्त करता है जिसकी केवल कामना की जा सकती है, ऐसी विशिष्ठता जो देवताओं को उपलब्ध है, और जो सामान्यतः मनुष्य के लिए अप्राप्य है।  यह उस दोष का संकेतक नहीं हो सकता है जिससे मनुष्य मुक्त रहना चाहेगा, परंतु जिसका सामना उसे दुर्भाग्य से करना पड़ सकता है। गौर करें कि हिन्दी के शब्दकोश में भी कमोबेश यही बातें उल्लिखित हैं।

अपनी बात आगे बढ़ाऊं इससे पहले यह उल्लेख कर दूं कि दिव्यचक्षु शब्द अंधता से ग्रस्त (अंधे) व्यक्ति के लिए अवश्य इस्तेमाल होता है। परंतु ऐसा करने के खास कारण हैं ऐसा मेरा मानना है। इस तथ्य से सभी परिचित होंगे कि अंधे व्यक्तियों की अन्य ज्ञानेन्द्रियां सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं। कभी-कभी उनकी विशिष्ठ क्षमता को इंगित करने हेतु हम कहते हैं कि उनके पास छठी इंद्रिय है। मैंने उनके लिए प्रज्ञाचक्षु का प्रयोग भी सुना है।

परंतु अन्य प्रकार के शारीरिक/मानसिक दोषों से ग्रस्त जनों के मामले में उक्त प्रकार की बात लागू नहीं होती।

गंभीरता से सोचने पर यही निष्कर्ष निकाला जायेगा कि दिव्यांग उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होना चाहिए जिसका अंग अलौकिक हो, दैवी प्रकार का हो, जिसे पाने की कामना हर कोई करना चाहेगा। उक्त अर्थ के मद्देनजर दिव्यांग किसी का नाम रखा जा सकता है। दिव्यांगना तो अप्सरा के लिए प्रयुक्त भी होता है, और सभी जानते हैं कि अप्सराओं के सौन्दर्य की हम कैसी कल्पना करते हैं।

विकलांग के बदले दिव्यांग का प्रयोग सम्मानसूचक है महज इस कारण से उसके असली अर्थ को भुला देना चाहिए क्या? असल में विकलांग अंगरेजी के physically/mentally disabled का करीब-करीब समानार्थी है। जैसा पहले कहा गया है अंगरेजी में differently able भी प्रयुक्त होता है। उसी की तर्ज पर “भिन्नतः सक्षम” या उसी प्रकार के अन्य शब्द का प्रयोग किया जा सकता है। किंतु दिव्यांग का प्रयोग उसके अर्थ का अनर्थ करना ही समझा जायेगा।

मोदी जी का भाषायी योगदान

मोदी जी देश के 14वें प्रधानमंत्री हैं। उनकी कार्यशैली अपने पूर्ववर्ती 13 प्रधानमंत्रियों की तुलना में काफी भिन्न है। वे कई मानों में “फ़र्स्ट” होंगे। उनमें से एक है उनका भाषायी योगदान करना। नये-नये नारे गढ़ना, नये संयुक्ताक्षर सुझाना, पदबंधों की अपने तरीके से पुनर्व्याख्या करना, आदि उनकी खासियत है। मैं नहीं समझता कि किसी और प्र,मं. ने ऐसी महारत पायी हो या ऐसा करने का विचार उन्हें सूझा भी हो। इस दिशा में उनके “योगदान” का संक्षिप्त उल्लेख यहां पर करना समीचीन होगा:

(1) दिव्यांग तथा ब्रेन गेन – उपर्युक्त दिव्यांग शब्द के अतिरिक्त कितने और शब्दों का योगदान उन्होंने किया मुझे नही मालूम। मुझे वनइंडिया समाचार माध्यम पर उनके द्वारा दिया गया पद-बंध “ब्रेन गेन” (Brain Gain) देखने को मिला जो “ब्रेन ड्रेन” (Brain Drain) के ठीक उलट अर्थ वाली प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सुझाया। अर्थात्‍ बौद्धिक कौशल वालों का विदेश गमन न हो, विपरीत उसके वे देश में ही टिकें और बाहर से लौट आवें। यह शब्द अर्थ तो रखता है, किंतु किसी ने कभी प्रयोग में लिया हो ऐसा लगता नहीं।

(2) नये नारे – मोदी जी ने नये-नये नारे गढ़ने में भी अपना कौशल दिखाया है। कुछ दृष्टांत ये हैं:

Make in India,  Skill India,  Digital India,  Start up India  

मोदी जी ने जब अपने पद की शपथ ली तो राजभाषा हिन्दी का प्रयोग बढ़े उत्साह से किया। यहां तक कि कई विदेशी मेहमानों के साथ दुभाषिये के माध्यम से वार्तालाप किया था। विदेशों में भी प्रायः हिन्दी में बोले। कालान्तर में उनका उत्साह ठंडा पड़ गया। उनका सुप्त अंगरेजी प्रेम अब जग चुका है। उनके नारे अब अंगरेजी में ही अधिक सुनने को मिलते हैं।

(3) नये सूत्र – मोदी जी ने राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में भी कुछ सूत्र सुझाए हैं, जैसे

Desire +Stability = Resolution

Resolution + Hard Work = Success

Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow

जिसे संक्षेप में वे IT+IT=IT लिखते हैं।

(4) पदबंधों का संक्षिप्तीकरण – योजनाओं में निवेश के संदर्भ में PPP (Private, Public Partnership) को मोदी जी ने PPPP (People, Private, Public Partnership) में बदलकर आम आदमी के निवेश के समावेशन तक पहुंचा दिया। इसी प्रकार 3Ss (तीन S) = Skill, Scale, Speed अथवा Samaveshak, Sarvadeshak, Sarvasparshi की परिभाषा दे डाली। इसी प्रकार Pro People Good Governance के लिए संक्षेप P2G2 और Economy, Environment, Energy, Empathy and Equity के लिए  5Es (पांच E) भी उन्हीं के सुझाए हैं। ऐसे ही अन्य संक्षिप्ताक्षर भी मीडिया में खोजे जा सक्ते हैं। इन सबके अर्थों को मोदी जी ही ठीक-से समझते होंगे।

मोदी जी के ऐसे तमाम प्रयास लोगों को लुभा सकते हैं, मिथ्या दिलाशा दे सकते हैं, अथवा महज प्रमुदित कर सकते हैं। किंतु इनसे कोई जमीनी कार्य भी सिद्ध हो सकता है इसमें मुझे संदेह है।

जिस “दिव्यांग” शब्द से मैंने अपनी बातें प्रस्तुत की है वह प्रसंगोचित नहीं है यह में लेख-समापन पर दुबारा कहना चाहूंगा। योगेन्द्र जोशी

महाराष्ट्र में गणेशोत्सव का बड़ा ही महत्व है। वहां यह उसी उत्साह के साथ मनाया जाता है जिस उत्साह से कोलकाता में दुर्गापूजा मनाई जाती है। समय के साथ यह उत्सव भी व्यापकता पा रहा है। मेरे शहर वाराणसी में भी कई गल्ली-मोहल्लों में इस अवसर पर गणेश-प्रतिमाएं स्थापित करके पूजा-अर्चना कार्यक्रम होने लगे हैं। पहले उनके बारे में सुनने को भी नहीं मिलता था।

Ganeshotsav-Shivsena

विगत गणेश-पूजन के अवसर पर मैं मुम्बई महानगर में था। मेरा प्रवास पश्चिम भांडुप इलाके में था। उसे मौके पर मेरी नजर वहां के स्थानीय रेलवे स्टेशन के प्रवेश-मार्ग पर एक राजनैतिक दल के द्वारा स्थापित होर्डिंग पर पड़ी जिसमें जन-साधारण के प्रति बधाई/शुभकामना संदेश प्रस्तुत था। उस होर्डिंग का एक हिस्सा चित्र में प्रस्तुत है। उसमें श्रीगणेश को संबोधित यह श्लोक शामिल है:

वक्रतुंड महाकाय सुर्यकोटि समप्रभः ।

निर्विघ्नमः कुर मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

इस श्लोक में गणेशजी को विभिन्न विशेषणों से संबोधित किया गया है, किंतु उनमें कुछ की वर्तनी त्रुटिपूर्ण है। सुर्यकोटि के बदले कोटिसूर्य होना चाहिए। कोटिसूर्य समप्रभः सामासिक शब्द है, अतः उसमें कोई रिक्ति नहीं होनी चाहिए। इसके अतिरिक्त संबोधनात्मक होने के कारण विसर्ग भी नहीं हो सकते। सही है कोटिसूर्यसमप्रभ (करोड़ों सूर्यों के समान प्रभा वाला)। इसी प्रकार निर्विघ्नमः के स्थान पर सही निर्विघ्नं, और कुर के बदले कुरु होना चहिए। अतः शुद्ध श्लोक इस प्रकार होगा:

वक्रतुंड महाकाय कोटिसूर्यसमप्रभ ।

निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥

(हे वक्रतुण्ड, हे महाकाय, हे कोटिसूर्यसमप्रभ, हे देव, सभी कार्यों में मुझे सर्वदा निर्विघ्न करें । निर्विघ्न = कोई विघ्न न हो जिसे ।) [निर्विघ्न बहुब्रीहि समास होना चाहिए; एक स्थल पर मैंने इसे अव्ययीभाव भी देखा है।]

त्योहारों एवं जन्मदिनों जैसे विशिष्ट अवसरों पर बधाई तथा शुभकामना संदेशों में संस्कृत शब्दों, पदबंधों अथवा श्लोकों का अक्सर प्रयोग किया जाता है । लेकिन कहीं उन्हें त्रुटिपूर्ण तरीके से तो नहीं लिखा जा रहा है इस बात के प्रति कम ही लोग सचेत रहते हैं । मेरा अनुमान है कि त्रुटियां बहुधा उस स्रोत पर भी रहती हैं जहां से उन श्लोकों आदि को उद्धृत किया जाता है । त्रुटिया होना स्वाभाविक है। जब कथन दो-चार जनों के बीच सीमित हो तो त्रुटियां कम खलती हैं, परंतु जब उनको व्यापक स्तर पर प्रकाशित किया जा रहा हो, या सार्वजनिक किया जाता हो, जिन्हें अनेकों जन पढ़ रहे हों तो त्रुटि अधिक खलती है। मैं समझता हूं कि ऐसे अवसरों पर विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए।

एक बार मुझे मंगलकामना संदेश प्राप्त हुआ जिसे किसी चित्र में देवी-स्तुति के तौर पर प्रस्तुत किया गया था। उसमें यह श्लोक मुद्रित था:

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके

शरण्ये त्रयंबके गौरी नारायणी नमोःस्तुते ।

इस श्लोक की वर्तनी में विद्यमान कुछएक त्रुटियों को इंगित कर रहा हूं:

(1)    संस्कृत में किसी पद के अंतर्गत वर्णमाला के पांच व्यंजन वर्गों (कवर्ग, चवर्ग, … पवर्ग) के पूर्व अनुस्वार के प्रयोग की परंपरा नहीं है। उसके बदले वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे पञ्चम न कि पंचम। अन्यत्र अनुस्वार प्रयुक्त होता है।

(2)    ध्यान दें कि सही शब्द त्र्यम्बक है न कि त्रयंबक । त्र्यम्बक शिव के लिए प्रयुक्त होता है और त्र्यम्बका पार्वती के लिए जिसका संबोधन त्र्यम्बके होता है ।

(3) सर्व मंगल मांगल्ये सामासिक पद का संबोधन रूप है । समास-जनित पद का निरूपण उसके घटकों को पृथक-पृथक लिखकर नहीं किया जा सकता है । अतः सर्वमंगलमांगल्ये लिखना सही है । यही सर्वार्थसाधिके के लिए भी मान्य है ।

(4) नमोःस्तुते सही नही है । यह वस्तुतः तीन पदों का समुच्चय है – नमः अस्तु ते । श्लोक में नमः अस्तु अनिवार्यतः संधि किए जाने पर नमोऽस्तु लिखा जाएगा जब कि ते पृथक लिखा रहेगा ।

(5) गौरी, नारायणी भी देवी के नाम हैं, किन्तु शिवे आदि की भांति ये भी संबोधन के तौर पर प्रयुक्त हैं। तदनुसार इन्हें गौरि, नारायणि लिखा जाना चाहिए।

इस प्रकार सही श्लोक यों लिखा जा सकता है:

सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके ।

शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते ।।

संस्कृत में संधि के अधीन लुप्त हुए को अवग्रह (‍ऽ) से दर्शाने की प्रथा है। (नमः+अस्तु = नमोऽस्तु) 

हाल में दीपावली के अवसर पर श्लोक रूप में अधोलिखित एक मंगलकामना संदेश मिला:

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसंपदा ।

शत्रुबुद्धि विनाशाय दीप: ज्योति नमोस्तुते ॥

मेरी समझ में इसमें भी कुछ त्रुटियां हैं ।

  1. मुझे लगता है कि कल्याणं आदि पदों की तरह धनसंपदा भी द्वितीय विभक्ति में होना चाहिए: एकवचन मानें तो धनसंपदाम् बहुवचन मानें तो धनसंपदा:
  2. शत्रुबुद्धि विनाशाय सामासिक होने के कारण रिक्ति बिना शत्रुबुद्धिविनाशाय होना चाहिए ।
  3. इसी प्रकार दीप: ज्योति को दीपस्य ज्योतिः या समास होने पर दीपज्योति: लिखा जाना चाहिए । दीपस्य ज्योति: करने पर नियमानुसार छन्द नहीं रह जाता है, अतः दीपज्योति: ही ठीक है। (ज्योतिष् नपुंसकलिंग है और इसका संबोधन ज्योति: है।)
  4. जैसा पहले कहा जा चुका है नमोस्तुते के बदले सही नमोऽस्तु ते है ।

इस प्रकार सही श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

शुभं करोति कल्याणं आरोग्यं धनसम्पदा ।

शत्रुबुद्धिविनाशाय दीपज्योतिः नमऽस्तु ते ॥

कुछ दिनों पूर्व मुझे अपने समाचारपत्र में निम्नलिखित श्लोक पढ़ने को मिला:

कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिम्‍यजन्त अिह देवताः ।

श्रिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

इस श्लोक में भी वर्तनी की अशुद्धियां हैं। पता नहीं इह के स्थान पर अिह कैसे छ्प गया। सिद्धिम्‍यजन्त: इह संधि नियमों के अनुसार सिद्धिं यजन्त इह लिखा जायेगा न कि सिद्धिम्‍यजन्त इह । संस्कृत में क्षिप्रं (शीघ्र, जल्दी ही) शब्द होता है और शायद श्रिप्रं कोई शब्द नहीं होता है । अतः श्लोक यह होना चाहिए:

कांक्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः ।

क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ॥

(कर्मों की सिद्धि की कामना करते हुए एवं देवताओं का यजन करते हुए इस मनुष्य लोक में शीघ्र ही कर्म से सिद्धि मिलती है।)

ऐसी त्रुटियां अक्सर देखने को मिल जाती हैं । मैंने कुछ विज्ञापनों में शत् शत् प्रणाम मुद्रित पाया है, जब कि सही शब्द शत (अकारांत) है न कि शत् (हलंत) ।

इसी प्रकार कहीं-कहीं आर्शिवाद लिखा मिलता है आशीर्वाद के स्थान पर ।

और ऐसे ही कई लोग शृंगार (श्‍+ऋ+अनुस्वार) के स्थान पर त्रुटिपूर्ण श्रृंगार (श्‍+र्+ऋ+अनुस्वार) लिखते हैं ।

दीपावली के मौके पर मैंने अखबार में छपे एक विज्ञापन में मंगलभवः शुभकामना संदेश लिखा देखा । यह न तो व्याकरण की दृष्टि से सही है और न इसका सही-सही अर्थ निकल पाता है । कदाचित् इसे मङ्गलं भवतु/भवेत्/भूयात् होना चाहिए । कोई कदाचित मङ्गल: भव भी सोच सकता है । किंतु वह वांछित अर्थ नहीं देता ।

मंगलभव

यों तो पर्याप्त सावधानी के बावजूद त्रुटियां हो ही जाती हैं । लेकिन विशेष उद्धरणों, प्रचलित वाक्यों अथवा नारों में इनका होना कुछ हद तक खलता है ।

मेरी उपर्युक्त समीक्षा पूर्णतः त्रुटिहीन हो ऐसा मैं दावा नहीं करना चाहूंगा, क्योंकि मेरा संस्कृत का ज्ञान उच्चस्तरीय नहीं । अपने सीमित ज्ञान के आधार पर ही मेरी टिप्पणियां हैं ।– योगेन्द्र जोशी

हिन्दी प्रेमियों के लिए समाचार। (9 सितंबर 2015)

स्रोत (Sourse) –  https://news.google.com/news/story?ncl=http://bhasha.ptinews.com/news/1304019_bhasha&hl=hi&geo=IN

अब हिन्दी सोशल साइट ‘मूषक’ पर किजिए दिल खोलकर बातें

Live हिन्दुस्तान – ‎17 घंटे पहले‎
भोपाल। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ एवं उनके साथियों ने आज यहां टिवटर की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला मूषक सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश किया है। हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट मूषक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां टिवटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ …

हिन्दी भाषी लोगों के लिए हिन्दी में आएगी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’

एनडीटीवी खबर – ‎17 घंटे पहले‎
भोपाल: दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ व उनके साथियों ने मंगलवार को भोपाल में ‘ट्विटर’ की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला ‘मूषक’ सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश की है। यह साइट अभी ऑनलाइन नहीं हुई है, कहा जा रहा है कि 10 सितंबर को इसे जारी किया जाएगा। हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां ट्विटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, …

..अब आया हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’

Bhasha-PTI – ‎18 घंटे पहले‎
भोपाल, आठ सितंबर :भाषा: दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड़ एवं उनके साथियों ने आज यहां ‘ट्विटर’ की तर्ज पर पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला ‘मूषक’ सोशल नेटवर्किंग साइट देशवासियों और हिन्दी प्रेमियों के लिए पेश किया है। हिन्दी सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ के मुख्य कार्यपालन अधिकारी :सीईओ: अनुराग गौड़ ने बताया कि जहां ट्विटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में …

विश्‍व हिंदी सम्मेलन: टि्वटर की तर्ज पर हिन्दी में आया ‘मूषक’

Nai Dunia – ‎4 घंटे पहले‎
भोपाल(मध्‍यप्रदेश)। टि्वटर की तर्ज पर अब लोग हिन्दी भाषा की सोशल नेटवर्किंग साइट ‘मूषक’ का उपयोग कर सकेंगे। सोशल मीडिया में हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए इसे शुरू किया गया है। पुणे शहर से संचालित इस साइट में कई ऐसे फीचर हैं, जो टि्वटर से बेहतर हैं। अभी तक मूषक पर 10 हजार से अधिक अकाउंट बन चुके हैं। विश्व हिन्दी सम्मेलन में मूषक का एक बूथ लगाया जाएगा,जिसमें इसके बारे में लोगों को बताया जाएगा। यह जानकारी मंगलवार को मूषक के सीईओ अनुराग गौड़ व तकनीकी प्रमुख अमित सिंह ने संवाददातओं को दी। गौड़ ने बताया कि सोशल मीडिया में हिन्दी लगभग गायब है। इसको देखते हुए उन्होंने मूषक …

“मूषक”-हिन्दीभाषियों के लिए सोशल नेटवर्किग साइट

khaskhabar.com हिन्दी – ‎16 घंटे पहले‎
भोपाल। दसवें विश्व हिन्दी सम्मेलन में शिरकत करने आए पुणे के अनुराग गौड व उनके साथियों ने मंगलवार को भोपाल में पूरी तरह हिन्दी में काम करने वाला मूषक सोशल नेटवर्किग साइट देशवासियों और हिन्दीप्रेमियों के लिए पेश किया है। हिन्दी सोशल नेटवर्किग साइट मूषक के मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) अनुराग गौड ने बताया कि जहां टि्वटर पर शब्दों की समय सीमा 140 शब्द हैं, वहीं हमने मूषक पर इसे 500 रखा है। कम्प्यूटर अथवा स्मार्टफोन पर हिन्दी टाइप करना रोमन लिपि पर आधारित है, इसलिए लोग हिन्दी लिखने से कतराते हैं। उन्होंने कहा कि आज के डिजिटल युग में बदलती तकनीक के साथ हिन्दी को …