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मैं जो हिन्दी लिखता हूं उसे वे समझ नहीं पाते, और जो हिन्दी वह समझते हैं उसे मैं लिखना नहीं चाहता।

मेरी हिन्दी?

कुछएक मास पूर्व मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, “मेरी बेटी एक निजी कंपनी में कार्यरत है। कंपनी अपने कर्मियों के लिए हिन्दी में एक पत्रिका छापती है जिसके संपादन आदि का दायित्व बेटी को सोंपा गया है। मैंने उसे बताया कि आप ब्लॉग लिखा करते हैं और सलाह दी कि पत्रिका के लिए वह आपसे भी लेख लिखने का अनुरोध कर सकती है। अथवा आपके ब्लॉगों पर प्रस्तुत आलेखों में से चुनकर पत्रिका में शामिल करने की अनुमति ले सकती है। आप सहमत होंगे न?”

अपने सहमति जताते हुए मैंने उनसे कहा कि वे मेरे ब्लॉगों के पते अपनी बेटी को भेज दें और यह भी कह दें कि आवश्यकता अनुभव करने पर वह मुझसे सीधे संपर्क कर ले।

बात आई-गई-सी हो गई। एक लंबे अंतराल के बाद मुझे अनायास उक्त घटना का स्मरण हो आया। तब मैंने अपने उन मित्र से पूछा, “आपने एक बार कहा था कि आपकी बेटी अपनी पत्रिका के लिए मुझसे संपर्क कर सकती है। इस विषय पर मुझे उसके बाद कुछ सुनने को नहीं मिला; क्या हुआ? उसने इरादा बदल दिया क्या?”

उनका उत्तर था, “वह आपके आलेखों से संतुष्ट थी। आलेखों की विषयवस्तु, उनकी प्रस्तुति में तारतम्य, लेखन की भाषा-शैली आदि में उसे कोई कमी नजर नहीं आई। बस एक ही समस्या उसके सामने थी। उसके पाठकों की हिन्दी उस स्तर की नहीं थी कि वे आपके आलेख पढ़ सकें और उन्हें समझ सकें। या यों कहें कि उनके लिए आलेखों की भाषा क्लिष्ट थी। इसलिए इस बारे में आगे बढ़ना मेरी ’संपादक’ बेटी के लिए सार्थक नहीं हो पा रहा था।”

अंग्रेजी शब्दों के तुल्य हिन्दी शब्द

गूगल जालस्थल पर “हिन्दीअनुवादक” (hindianuvaadak) नाम से एक समूह है, समूह के सदस्य परस्पर भाषा एवं अनुवाद संबंधी विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इस समूह में लोग भाषा से संबंधित सवाल पूछते हैं, और सदस्यवृंद समाधान प्रदान करते हैं अथवा अपनी-अपनी राय व्यक्त करते हैं। मैं स्वयं अनुवादक नहीं हूं किंतु भाषाओं के बारे में जानने-समझने की उत्सुकता या जिज्ञासा रखता हूं। इसलिए मैं भी इस समूह का सदस्य हूं और समूह में उठाई गई बातों एवं शंकाओं पर यदा-कदा अपना भी मत व्यक्त कर लेता हूं।”

इधर कुछ दिनों से उपर्युक्त समूह में एक शब्द पर बहस चल रही है (या अब समाप्त हो चुकी हो!)। किसी अनुवादक ने पूछा “अंग्रेजी के अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ (adjustable) शब्द के लिए उपयुक्त हिन्दी शब्द क्या होना चाहिए? मेरे अपने मतानुसार समायोज्य अथवा समंजनीय ही सर्वाधिक उपयुक्त शब्द है। वैसे प्रश्नगत शब्द में निहित भाव को शायद अपने-अपने विविध तरीकों से लेखकगण व्यक्त कर सकते होंगे। मेरा भाषायी ज्ञान उस उत्कृष्ट श्रेणी का नहीं है, इसलिए सही विकल्प नहीं पेश कर सकता। उक्त समूह में भांति-भांति के मत मुझे पढ़ने को मिले हैं। मेरी दृष्टि में यह समीचीन होगा कि अपनी टिप्पणी पेश करने से पहले उनकी चर्चा संक्षेप में कर लूं।

समूह के कुछ जानकारों का मत था कि समायोज्य जैसा शब्द अधिकांश पाठकों के लिए सर्वथा अपरिचित होगा, अत: उचित होगा “अनुकूलनीय” या “परिवर्तनीय” को प्रयोग में लेना। अवश्य ही यह भी स्वीकारा जा रहा था कि इनमें वह भाव कदाचित निहित नहीं है जिसे हम इंगित करना चाहते हैं। किसी का कहना था कि “अनुकूलन के योग्य” क्यों न इस्तेमाल किया जाए। मैं समझता हूं कि इस पदबंध का अर्थ तो “अनुकूलनीय” में निहित है ही, अतः इतने लंबे की जरूरत नहीं।

एक मत यह भी व्यक्त किया गया है कि क्यों न मराठी मूल का शब्द “बदलानुकारी” को प्रयोग में लिया जाए। मैं व्यक्तिगत तौर पर इस शब्द से परिचित नहीं हूं। अनुवाद कार्य में लगे लोग हो सकता है इससे सुपरिचित हों, परंतु मुझे शंका है कि मेरी तरह अधिकांश पाठकजन इस शब्द से उसी प्रकार अनभिज्ञ होंगे जैसे मैं हूं।

अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ के लिए “सामंजस्य योग्य” शब्द भी सुझाया गया है। मेरा अनुमान है जो व्यक्ति “सामंजस्य” अर्थ जानता होगा वह समायोज्य या समंजनीय का भी अर्थ जानता होगा। अन्यथा भी वह इनके अर्थों का अनुमान लगा सकेगा ऐसा मेरा सोचना है।

दो विचार जो संबंधित बहस में पढ़ने को मिले और जिन्हें मैंने रोचक पाया वे हैं (1) “समायोज्य जैसे शब्द हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए भी एक सरदर्द ही हैं।”  और (2)  “समायोज्य जैसे दुरुह शब्दों का इस्तेमाल करें तो उनके बाद ब्रेकेट में उनका मतलब भी लिख दें।” मतलब समझाया तो जाए लेकिन किस भाषा में और कितने विस्तार से जैसा शब्दकोषों में होता है?

और यह मत भी पढ़ने को मिला कि आजकल लोग अ(ड्‍)जस्ट (adjust) बखूबी समझने लगे हैं। तो क्या इसे ही प्रयोग में ले लिया जाए? शायद हां!

एक वाकया

मुद्दे पर कुछ और कहूं इससे पहले एक वाकये का जिक्र करता हूं। वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने में दृष्टांत अक्सर उपयोगी सिद्ध होते हैं। जब मैं विश्वविद्यालय में भौतिकी (फिज़िक्स) विषय पढ़ाता था तो “इलेक्ट्रॉनिकी” में विशेषज्ञता अर्जित कर रहे एम.एससी. (स्नातकोत्तर) के छात्र “क्वांटम यांत्रिकी” (क्वांटम मिकैनिक्स) में रुचि नहीं लेते थे। उनकी अरुचि के बारे में पूछे जाने पर उनका उत्तर होता था, “सर, इलेक्ट्रॉनिक्स स्पेशलाइज़ेशन लेकर जब हम टेक्निकल नौकरी में जायेंगे तो ये क्वांटन मिकैनिक्स हमारी क्या काम आएगी?” तब मेरे पास कोई संतोषप्रद उत्तर नहीं होता था। मैं जानता था तकनीकी पेशे में इस विषय का ज्ञान शायद ही प्रोन्नति (प्रमोशन) पाने या वेतन बढ़ोत्तरी में मददगार हो सकता है। तो वे क्यों क्वांटम भौतिकी/मिकैनिक्स पढ़ें?

घटता शब्द-भंडार 

दरअसल इस प्रकार का उपयोगिता संबंधी प्रश्न अनेक मौकों पर पूछा जा सकता है। मैंने ” समायोज्य ” से जुड़े जिस बहस का जिक्र किया है उससे भी इस सवाल का नाता है। यह कहना कि हिन्दी माध्यम के छात्रों के लिए तक यह शब्द दुरूह है यह दर्शाता है कि उन छात्रों – जो भी वे हों – ने कभी नये-नये शब्द सीखने का प्रयास नहीं होगा, फलतः इस शब्द से उनका सामना कभी पड़ा नहीं होगा और सहज-स्वाभाविक तरीके से यह उनके शब्द-भंडार में शामिल नहीं हो सका होगा। उन्होंने हर किसी के मुख से इस शब्द के बदले अ(ड्‍)जस्ट और उससे व्युत्पन्न शब्दों का ही प्रयोग सुना होगा। परिणाम – समायोज्य अपरिचित शब्द बन गया, अ(ड्‍)जस्टेब्ल्‍ परिचित।

यहां यह प्रश्न उठता है कि स्वयं को “हिन्दीभाषी” कहने वाले अपना हिन्दी शब्द-भंडार क्यों नहीं बढ़ाते? उत्तर साफ है। मेरे भौतिकी छात्रों की तरह आम हिन्दीभाषी कहेगा, “हिन्दी के शब्दों को सीखने से क्या मिलेगा? उसके बदले अंग्रेजी सीखने पर मेहनत करेंगे तो हमें फायदा होगा। हमारा काम तो चल ही जाता है। जहां जरूरत हो अंग्रेजी शब्दों से ही काम चल जाता है। फिर हिन्दी सीखने की जरूरत कहां?”

याद रहे कोई भी व्यक्ति शब्द-भंडार लेकर पैदा नहीं होता है। वह विभिन्न मौकों पर और पत्र-पत्रिकाओं-पुस्तकों के विभिन्न स्रोतों से शब्द सीखता है। और यदि स्रोत विकृत हो जाएं, किसी का शब्दभंडार बढ़ाने में मददगार न रह जाएं, या व्यक्ति इन स्रोतों में रुचि ही न ले, तो परिणाम यही होगा: समायोज्य जैसे शब्द अपरिचित लगेंगे। हिन्दी उसी दिशा में बढ़ रही है।

हिन्दी – उनकी बनाम मेरी

मैं इसे हिन्दी की अवनति कहूं या उन्नति कि आज के अनेक पढ़े-लिखे लोग उस हिन्दी को पढ़-समझ नहीं सकते जो मैंने अपने छात्र जीवन में पढ़ी है, जिस हिन्दी में भारतेन्दु के नाटक लिखे गये हैं, जिसमें जयशंकर प्रसाद का पद्य साहित्य है, जिसमें रामचन्द्र शुक्ल के लेख हैं, इत्यादि। आज के लोग कैसी हिन्दी बोल रहे हैं, पढ़ रहे हैं, और लिख रहे हैं इसकी बानगी यह है:

 “नेशनल महिला प्लेयर की आपत्तिजनक फोटो एफबी पर वायरल, ट्रेनर गिरफ्तार” (jagran.com, 19/05/2017)

इसे मैं हिन्दी कहूं या कुछ और समझ में नहीं आता है। अवश्य ही यह वह भाषा नहीं जिससे मैं बचपन से परिचित रहा हूं। जब हम ऐसी नयी हिन्दी बोलेंगे और सुनेंगे तो हिन्दी के कई शब्द “अन्फ़ैमिलिअर” हो ही जायेंगे।

मेरी कमजोरी है कि मैं ऐसी हिन्दी न लिखता हूं और न लिखना ही चाहता हूं, भले ही इसे लिखना संभव हो और मुझसे अपेक्षित हो। – योगेन्द्र जोशी

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मेट्रोहिंदी

इस चिट्ठे की पिछली पोस्ट (22 जून) में हिंदी-अंगरेजी की एक मिश्रित भाषा की चर्चा आंरभ की गई है, जिसे मैं मेट्रोहिंदी कहता हूं । यह हमारे महानगरों में निरंतर विस्तार एवं लोकप्रियता पा रही भाषा है, जिसमें अंगरेजी के मिश्रण की मर्यादा क्या हो इस सवाल का कोई महत्त्व ही नहीं है । हिंदी में अंगरेजी का मिश्रण वक्ता की सुविधा और उसके हिंदी-अंगरेजी ज्ञान पर निर्भर करता है । इस वर्णसंकर भाषा को मैं नितांत नूतन भाषा के रूप में देखता हूं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी से मिलती-जुलती होने के बावजूद उर्दू अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है । कौन हैं जो मेट्रोहिंदी उपयोग में ले रहे हैं इसका उत्तर देने से पहले किस तरह के बोल हमें टेलीविजन चैनलों या अन्य अनेक मंचों पर अक्सर सुनने को मिलते हैं इनके दृष्टांत प्रस्तुत करता हूं:

(1) चिड़ियाघर में मां बेटे सेः “ये टाइगर नहीं, लेपर्ड है । डौन्च्यू रेमेंबर कि टाइगर के डार्क स्ट्राइप्स होती हैं, न कि डार्क स्पॉट्स ।”
(2) दो पर्यटकों के बीच संवादः “एक्सक्यूज मी, इस कैमरे से मेरा स्नैपशॉट ले देंगे?” … “या, श्युअर ।” … “थैंक्यू इंडीड ।”
(3) टीवी विज्ञापनः “… ये क्रीम रखे आपकी स्किन सॉफ्ट, स्मूथ, और फेअर ।”
(4) सिने-अभिनेताः “फिल्म में परफॉर्म करना चैलेंजिंग एंड एंजॉयेबल् टास्क था । मुझे एक रेबेलियन का रोल प्ले करना था जो … ।”
(5) नृत्य प्रतिस्पर्धा निर्णायकः “एक्सेलेंट परफॉर्मेन्स! आप दोनों के डांस मूवमेंट्स का सिंक्रोनाइजेशन काबिलेतारीफ था ।”
(6) ओलंपिक टीम प्रबंधकः “… इंडिया की परफॉर्मेन्स अच्छी रहेगी । वेटलिफ्टिंग, रैसलिंग, एंड बॉक्सिंग में हमारे प्लेयर्स जरूर मेडल जीतेंगे ।”
(7) समाचार वाचकः “… पीएम ने कहा कि हम अपने नेबरिंग कंट्रीज के साथ कॉर्डियल रिलेशन्स चाहते हैं । इसके लिए डिप्लोमैटिक लेवल पर जरूरी स्टेप्स लिए जा रहे हैं ।”
(8) टीवी समाचारः “… हाइवे पर पिल्ग्रिम्स से भरी बस का सीरियस एक्सिडेंट हो गया है । पंद्रह पैसें जर्स के डेथ की ऑफिशियल रिपोर्ट मिली है । सीरियस्ली इंज्यर्ड को पास के हॉस्पिटल्स में एड्मिट कराया गया है; शेष को फर्स्ट एड के बाद छोड़ दिया गया है ।”

मेट्रोहिंदीः अंगरेजी मोह से जन्मी भाषा

मेट्रोहिंदी ऐसी भाषा है जिसे आम हिंदीभाषी नहीं समझ सकता है, क्योंकि इसमें अंगरेजी के तमाम ऐसे शब्द शामिल रहते हैं जिनका ज्ञान उसे हो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है । उसकी बातें आम हिंदीभाषी समझ भी पा रहा है या नहीं इस बात से मेट्रोहिंदी बोलने वाले को कोई सरोकार नहीं रहता है । उसके अपने वर्ग के लोग बातें समझ ले रहे होंगे यही पर्याप्त माना जाता है ।

वास्तव में यह उन लोगों की भाषा है जिन्हें प्राथमिक दर्जे की हिंदी आती है और जिनका अंगरेजी ज्ञान हिंदी की तुलना में बेहतर होता है । अपनी हिंदी को अधिक समृद्ध करने का विचार उन लोगों के मन में उपजता ही नहीं । हिंदी का उनकी शब्दसंग्रह या तो अपर्याप्त होती है या अभ्यास के अभाव के कारण उसके मुख से सही मौके पर सही शब्द निकल ही नहीं पाते हैं । इसके विपरीत अंगरेजी आधारित शिक्षा एवं व्यावसायिक कारणों से वह अंगरेजी के निरंतर अभ्यास का आदी होता है । भले ही वह धाराप्रवाह अंगरेजी न बोल पाता हो, अंगरेजी के शब्दों का मौके-बेमौके उसके मुख से निकलना थमता नहीं है ।

“गरीब की लुगाई सबकी भौजाई”

हिंदी के मामले में “गरीब की लुगाई सबकी भौजाई” की लोकोक्ति सटीक बैठती है । अपने समाज में ऐसे लोगों की अच्छीखासी संख्या है जिनका अंगरेजी के प्रति लगाव अद्वितीय है । उनकी धारणा है कि हिंदी में अंगरेजी के शब्दों को जहां-तहां ठूंस देना किसी भी हाल में अनुचित नहीं है । खुद हिंदी के तथाकथित पक्षधर भी यह कहते देखे जाते हैं कि ऐसा करने से हिंदी समृद्ध होती है । किंतु जब बात अंगरेजी की होती है तो ये ही लोग उसकी शुद्धता के प्रति सचेत रहते हैं । क्या मजाल कि हिंदी का एक शब्द भी भूल से उनकी अंगरेजी में सुनने को मिल जाए । आप किसी को यों बोलते हुए कभी – जी हां कभी भी, सपने में ही सही – सुन सकते हैं:
“द पीएम सेड, ‘वी वुड लाइक टु हैव मैत्रीपूर्ण संबंध विद अवर पड़ोसी कंट्रीज ।’”

अपने देश में अंगरेजी महज एक ‘और’ भाषा नहीं है, जैसे दुनिया की तमाम भाषाएं होती हैं । अंगरेजी को तो देश की प्रगति एवं उन्नति का मंत्र और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार समझा जाता है । इसलिए देशज भाषाओं में पूरे गर्व के साथ इसका ‘तड़का लगाने’ की एक प्रथा अपने समाज में चल चुकी है । इसी ‘तड़के’ का फल है अपनी मेट्रोहिंदी ।

मेट्रोहिंदी के उपयोक्ता यानी ‘यूजर्स’

हिंदीभाषी क्षेत्र में कौन उर्दू बोलता है और कौन नहीं यह कह पाना कठिन है । उर्दूभाषी होने का दावा करने वाले भी मीरजा गालिब की उर्दू समझ ही लेंगे जरूरी नहीं है । अरबी-फारसी के अल्फाज कुछ ज्यादा ही हों और ‘जहां का नूर’ न कहकर ‘नूर-ए-जहां’ जैसे पदबंध इस्तेमाल हों तो उर्दू हो गयी । ठीक इसी प्रकार हिंदी में अंगरेजी ठूंसते जाइए, ‘एंड’, ‘इवन’, ‘ऑलरेडी’ जैसे अव्ययों का मुक्त हृदय से प्रयोग करिए तो हो गयी मेट्रोहिंदी । मोटे तौर पर कहूं तो ये लोग मेट्रोहिंदी बोलते हैं:

(1) ‘इंग्लिश-स्कूलों’ में शिक्षित – विद्यालयों जिनकी शिक्षा ‘इंग्लिश-मीडिया’ विद्यालयों में होती है, जहां अंगरेजी सीखने और उसीका शब्दसंग्रह बढ़ाने पर पूरा जोर रहता है । छात्रों के मन में यह भावना बिठा दी जाती है कि कामचलाऊ हिंदी पर्याप्त है ।

(2) अंगरेजी के व्यावसायिक प्रयोग वाले – अपने देश में लगभग सभी व्यावसायिक कार्य अंगरेजी में ही संपन्न होते हैं । इस कार्य के दौरान कर्मचारी अंगरेजी का ही अभ्यास पाते हैं । यही अंगरेजी उनके परस्पर बातचीत में घुस जाती है । वैज्ञानिक, चिकित्सक, अर्थशास्त्री, कानूनविद्, आदि सभी इस वर्ग में आते हैं ।

(3) अंगरेजी से प्रतिष्ठा के इच्छुक – अपने समाज में अंगरेजी प्रतिष्ठा की निशानी है । जिसे अंगरेजी आती है वह अंगरेजी शब्दों के माध्यम से अपना रुतबा कायम करना जरूरी समझता है । आम धारणा है कि अंगरेजी बोलने वाले को तवज्जू दी जाती है ।

(4) भाषाई हीनभावना से ग्रस्त – यही प्रतिष्ठा है जो अंगरेजी कम या नहीं जानने वालों की हीन भावना के रूप में दिखाई देती है । वे अपना अंगरेजी ज्ञान सुधारने की कोशिश के साथ-साथ मौके-बेमौके हिंदी में अंगरेजी ठूंसना जरूरी समझने लगते हैं । – योगेन्द्र जोशी

बीते कल (4 अक्टूबर) की पोस्ट के आगे ।
[उक्त पोस्ट में ‘दैनिक भास्कर’ के एक समाचार, जिसमें प्रजेंट (मौजूदा, वर्तमान), चिल्ड्रन्स (बच्चे), हैबिट (आदत), क्वैश्चन (सवाल, प्रश्न), आंसर (उत्तर, जवाब), वॉल (दीवाल), आदि जैसे ढेरों अंग्रेजी शब्द अनावश्यक रूप में ‘यूज’ किए गये हैं, को संदर्भ में लेते हुए हिंदी की दुर्दशा पर कुछ टिप्पणियां की गई हैं । उसी चर्चा का शेष आगे प्रस्तुत है ।]

3.
यह देश का दुर्भाग्य है कि विभिन्न विषयों के हमारे विशेषज्ञ भाषाई दृष्टि से आम जनता से कटे हुए हैं । तात्पर्य यह है वे अपने विषय की बातें आम जनता के समक्ष उनकी भाषा में नहीं प्रस्तुत कर सकते हैं । वे यह बात भूल जाते हैं व्यावसायिक एवं अन्य कारणों से वे जैसी दक्षता अंग्रेजी में स्वयं हासिल कर चुकते हैं वैसी आम जनता के लिए संभव नहीं है । ये विशेषज्ञ यह नहीं सोच पाते हैं कि अच्छी अंग्रेजी सीखने के यह अर्थ कदापि नहीं हो सकते कि आप अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को नजरअंदाज कर दें और उसे निरादर भाव से देखें । ऐसा बेहूदा रवैया, जिसे मैं व्यक्तिगत तौर पर बेशर्मी भरा मानता हूं, दुनिया के अन्य प्रमुख देशों में देखने को नहीं मिलता है । वस्तुतः किसी गैर-अंग्रेजीभाषी देश, यथा चीन, जापान, कोरिया, फ्रांस, रूस अथवा ऐसे ही कोई अन्य देश, में एक विशेषज्ञ आम आदमी के साथ विचारों का आदान-प्रदान उसकी भाषा में बखूबी कर लेता है, और ऐसा न कर पाना अपना एक गंभीर दोष मानता है । वस्तुतः ऐसे सभी जनों को अंग्रेजी के अलावा अपनी भाषा पर भी पर्याप्त अधिकार होना चाहिए और ऐसा न कर पाने पर शर्मिंदगी अनुभव करनी चाहिए । मैं इन विशेषज्ञों से साहित्यिक स्तर की उच्च कोटि की भाषाई सामर्थ्य की अपेक्षा नहीं करता, किंतु ‘आदत’ की जगह ‘हैबिट’, ‘परिवार’ के स्थान पर ‘फैमिली’, और ‘दीवाल’ के बदले ‘वॉल’, इत्यादि, जब उनके मुख से सुनता हूं तब माथा पटकने का मन होता है मेरा । इतनी अधिक भाषाई अक्षमता, अपनी ही मातृभाषा में ?

4.
उपर्युक्त भाषाई अक्षमता के लिए विशेषज्ञों को एकबारगी माफ किया जा सकता है, परंतु जब ऐसी कमी समाचार माध्यमों और उनसे जुड़े पत्रकारों में दिखाई देती है, तो मैं विचलित हुए बिना नहीं रह पाता । मैं नहीं समझ पाता कि ये लोग हिंदी में पत्रकारिता कर रहे होते हैं या वर्णसंकर भाषा ‘हिंग्लिश’ में । यदि कोई व्यक्ति दावा करे कि वह अमुक भाषा में पत्रकारिता करता है तो उसे उस भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना ही चाहिए । वस्तुतः पत्रकारों के बीच एकाधिक भाषा जानना आम बात होती है । उनमें तो यह काबिलियत होनी ही चाहिए कि जहां जिस भाषा की जरूरत हुई उस भाषा को पर्याप्त शुद्धता के साथ प्रयोग में ले सकें । क्या हमारे पत्रकार किसी चीनी या जापानी अखबार के लिए ऐसी पत्रकारिता कर सकते हैं जिसमें अंग्रेजी शब्द ठुंसे पड़े हों ? ऐसा करने की छूट भारतीय भाषाओं वाले ही ले सकते हैं । यह तो इस देश की बदकिस्मती है कि अंग्रेजी हमारे पढ़े-लिखे लोगों, विशेषतः शहरी जनों, के ऊपर बुरी तरह हावी है, इतना कि हिंदी को कुरूप बना डालने में कहीं कोई हिचक नहीं रह गयी है । वार्ताकारों/संपादकों का यह कर्तव्य बनता है कि वे किसी व्यक्ति के वक्तव्य के अंग्रेजी शब्दों के स्थान पर तुल्य हिंदी शब्द प्रयोग में लें । समाचार तो मूल रूप से विश्व की किसी भी भाषा में हो सकता है; उसे अपनी-अपनी भाषाओं में प्रस्तुत करना समाचारदाताओं का काम है । साफ-सुथरी भाषा बोलना-लिखना स्वयं में एक शिष्टाचार है

5.
जब अखबारों के ये हाल हों तब टेलीविजन चैनलों के हाल तो बुरे होने ही हैं । टीवी चैनलों पर आजकल प्रस्तुत समाचार तथा अन्य कार्यक्रमों में तो अंग्रेजी इस कदर ठुंसी रहती है कि इन चैनलों को मैं हिंग्लिश चैनल कहना पसंद करता हूं । धार्मिक प्रकरणों के मामले में स्थिति कुछ बेहतर रहती है, लेकिन वहां संस्कृतनिष्ठ हिंदी दिखाई देती है । निजी चैनलों की तुलना में ‘दूरदर्शन’ में अवश्य कुछ भाषाई साफ-सुथरापन रहता है । निजी चैनलों पर शायद ही कोई प्रस्तुति देखने को मिले, जिसमें पूरे-पूरे वाक्य अंग्रेजी में न बोले जा रहे हों । अधिकांश प्रस्तुतियों के नाम अंग्रेजी के रहते हैं और देवनागरी लिपि तो उनके लिए जैसे अछूत बन चुकी है; सब रोमन में ! उन्हें देखकर तो कोई भी विदेशी यही सोचेगा कि शुद्ध हिंदी में अभिव्यक्ति संभव नहीं है ।

6.
अंग्रेजी शब्दों के अतिशय प्रयोग के पक्ष में एक तर्क मैं लोगों के मुख से सुनता आ रहा हूं । तर्क है कि ऐसा करने से हमारी भाषा हिंदी अधिक संपन्न एवं समृद्ध बनती है । क्या वास्तव में ऐसा है ? उत्तर अंशतः हां है पर पूरा नहीं । यह बात सही है कि नई आवश्यकताओं के अनुरूप नये-नये शब्द हर भाषा की शब्दसंपदा में जोड़ने पड़ते हैं । ऐसी आवश्यकता का अनुभव विज्ञान, चिकित्सा, अर्थतंत्र आदि के क्षेत्रों में कार्यरत लोग करते रहते हैं । तब आवश्यकता की पूर्ति के लिए या तो नये शब्द भाषा के नियमों के अनुसार रचे जाते हैं, या अन्य भाषाओं से ‘उधार’ ले लिए जाते हैं । अंग्रेजी में ऐसा होता आया है यह मैं अपने विज्ञान-विषयक अध्ययन के आधार पर जानता हूं । मैं ‘उधार’ की परंपरा का विरोधी नहीं हूं, परंतु यह गंभीर शंका मुझे बनी हुई है कि जिस लापरवाही और विचारहीनता के साथ अंग्रेजी शब्द हिंदी में ठूंसे जा रहे हैं वह भाषा को समृद्ध करने वाला नहीं है । समझदार आदमी उन शब्दों को उधार लेगा जिनकी सचमुच में जरूरत हो । लेकिन मेरे हिंदीभाषी मित्र क्या कर रहे हैं ? यही न कि हिंदी के शब्दों को अंग्रेजी शब्दों से विस्थापित कर रहे हैं ? क्या ‘परिवार’ के बदले ‘फैमिली’ और ‘इस्तेमाल करना’ के बदले ‘यूज करना’ किस जरूरत के अनुकूल है ? वास्तव में हम हिंदीभाषी अपनी भाषाई क्षमता खोते जा रहे हैं और अपनी अक्षमता को छिपाने हेतु खोखले तर्क पेश करते हैं । आज हालात यह हैं कि हमारे युवक-युवतियां तथा किशोर-किशोरियां रोजमर्रा के हिंदी शब्दों को भूलते जा रहे । वे हिंदी में गिनतियां नहीं सुना सकते, रंगों के नाम, साप्ताहिक दिनों के नाम नहीं ले सकते । उन्हें साल के बारह महीनों और छः ऋतुओं के नाम मालूम नहीं । अंग्रेजी स्कूलों के बच्चे तो ‘आंख-कान’, ‘कुत्ता-बिल्ली’ के लिए ‘आई-नोज’, ‘डॉग-कैट’ कहने के आदी हो चुके हैं । तो क्या हिंदी को समृद्ध करने का यही सही तरीका है ? सोचिए ।

प्रस्तुत प्रसंग के संदर्भ में ऐसे और भी सवाल उठाये जा सकते हैं । कोई सुने तो उन्हें, सोचे तो उनके बारे में । – योगेन्द  जोशी

खुद को हिंदी अखबार होने का दावा करने वाले एक समाचारपत्र में कैसी हिंदी छपती है इसकी एक बानगी प्रस्तुत है ।
मैं बीच-बीच के अंशों को ‘इलिप्सिसों – ellipses’ के प्रयोग के साथ लिख रहा हूं । पूरा विवरण आप अधोलिखित वेबसाइट पते पर देख सकते हैं:-
http://www.bhaskar.com/2009/09/30/090930015246_lifestyle.html

हां तो आगे देखिए उक्त खबर के चुने कुछ शब्द/वाक्यांश:-

“बच्चों में झूठ बोलने की हैबिट को दूर करें [शीर्षक]
“Bhaskar News Wednesday, September 30, 2009 01:45 [IST]
“प्रजेंट टाइम में अधिकांश पेरेंट्स अपने चिल्ड्रन्स के झूठ बोलने की हैबिट से परेशान हैं। … सीखी हुई हैबिट है, जिस पर पेरेंट्स … इसे रोका या चैंज किया … साइकेट्रिस्ट डॉ. राकेश खंडेलवाल का। उन्होंने इस हैबिट को दूर करने के कुछ टिप्स बताए, जो पेरेंट्स के लिए मददगार साबित हो सकते हंै।
“1. बच्चों से ऐसे क्वैश्चन नहीं करना चाहिए, जिनके आंसर में झूठ बोलना … बच्चे को कलर का पैकेट दिलवाने के बाद … वह वॉल को चारों ओर … से रंग-बिरंगी कर देता है। उस टाइम … उसे कहें कि आज और कलर्स यूज करने की इजाजत नहीं है।
“2. … फैमिली आगे बढ़कर … नहीं करना चाहिए।
“3. … बच्चे फ्रैंड्स के सामने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने और इमेज सुधारने … उनके रिलेशन में सभी ऑफिसर रैंक पर हैं। उनके कपड़े बहुत चीफ हैं। इसके लिए बच्चे को अकेले में कॉन्फिडेंस से समझाएं। उसे कहें कि उसकी ऑरिजनलिटी को दिखावे से ज्यादा पसंद किया जाएगा।
“4. पेरेंट्स की ओर से बच्चों के बिहेव पर टफ और सख्त नियंत्रण या बहुत ही फ्री एन्वायरमेंट बच्चे को झूठ बोलने को मोटिव करता है। इनके बीच का माहौल उपयुक्त रहेगा।
“5. … झूठा होने का लेबल नहीं लगाएं।
“6. बच्चे से फ्रैंडली रिश्ता बनाएं। …
“7. फ्री स्ट्रेस के माहौल …बच्चों में टफ और मुश्किल बात को कहने के सोशल कौशल का अभाव …”

जरा ग़ौर से देखें कि अंगरेजी के शब्दों की कितनी भरमार है इस पाठ्यांश में :-
प्रजेंट (मौजूदा, वर्तमान), टाइम (समय), पेरेंट्स (माता-पिता, मां-बाप), चिल्ड्रन्स (बच्चे), हैबिट (आदत), चैंज (बदलाव, तबदीली, परिवर्तन), साइकेट्रिस्ट (मनःचिकित्सक), टिप्स (गुर, नुस्ख़े), क्वैश्चन (सवाल, प्रश्न), आंसर (उत्तर, जवाब), कलर (रंग), पैकेट (डिब्बा), वॉल (दीवाल), यूज (प्रयोग, इस्तेमाल), फैमिली (परिवार), फ्रैंड्स(दोस्तों, मित्रों), इमेज (छबि), रिलेशन (संबंध, रिश्ते), ऑफिसर (अधिकारी), रैंक (स्तर या पद), चीफ (मुख्य; प्रसंगानुसार ‍‘चीप’ यानी ‘सस्ता’ शब्द रहा होगा), कॉन्फिडेंस (विश्वास, भरोसा), ऑरिजनलिटी (मौलिकता), बिहेव (व्यवहार, वर्ताव), टफ (सख्त, कठोर), फ्री (मुक्त, बेरोकटोक), एन्वायरमेंट (वातावरण, माहौल; पर्यावरण नहीं), मोटिव (प्रोत्साहन, प्रेरणा), लेबल (चिप्पी), स्ट्रेस (दबाव), और सोशल (सामाजिक) । (३१ शब्द)

इनमें से कुछ शब्द ऐसे हैं जो लंबे अर्से से हिंदीभाषी प्रयोग में ले रहे हैं और जिनसे आम आदमी भी सुपरिचित है, जैसे
टाइम, ऑफिसर, रैंक, फ्री, और लेबल ।
इन्हें हिंदी के प्रचलित शब्द मान लेना कदाचित्‌ व्यावहारिक लगता है । मुझे इसमें कुछ खास आपत्तिजनक नहीं लगता, पर उक्त समाचार में जिस प्रकार अंधाधुन्द अंग्रेजी के शब्द अमर्यादित तौर पर प्रयुक्त हुए हैं, और इसी प्रकार ‘हिंदी’ समाचार माध्यमों पर अक्सर जो देखने को मिलता है, उन्हें लेकर मेरे मस्तिष्क में कई विचार उठते रहे हैं:

1.
हिंदी बोलते समय, और अब तो हिंदी लिखने में भी, अपने देश के पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी शब्दों को जैसे बेरोकटोक इस्तेमाल करते हैं वह मुझे हिंदी के साथ किया जाने वाला एक भद्दा मजाक लगता है । क्या अंग्रेजी का किंचित् ज्ञान होने का यह अर्थ है कि हम जब चाहें, जहां चाहें, जितना चाहें, अंग्रेजी शब्द प्रयोग में लें ? क्या इस प्रकार का रवैया हम अंग्रेजी बोलते-लिखते समय भी अपनाते हैं ? क्या अपनी अंग्रेजी की शुद्धता के प्रति हम अत्यधिक सचेत नहीं रहते ? भूल से भी हम हिंदी या अन्य भाषाओं के शब्द अपनी अंग्रेजी में बोलते हैं कभी? क्या कोई कभी “डॉक्टर, आइ एम फ़ीलिंग सरदर्द” कहते हुए सुना जायेगा, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी में “डॉक्टर, मुझे हेडेक्‌ हो रहा है” । भले ही हमें एक-दो सेकंड रुकना पड़ जाये उपयुक्त अंग्रेजी शब्द की तलाश में, लेकिन हिंदी शब्द अंग्रेजी में मिलाने से बचते रहेंगे ।

2.
एक कहावत है: “सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है” । यह उक्ति हम हिंदीभाषियों पर भाषाई संदर्भ में पूर्णतः लागू होती है । हम कुछ अंग्रेजी सीख जाते हैं तो सोचने लगते हैं कि इस देश का हर दूसरा व्यक्ति भी हमारे बराबर की अंग्रेजी तो जानता ही है । इसलिये अंग्रेजी शब्दों के धड़्ल्ले से प्रयोग में हमें कहीं कोई ख़राबी नहीं दिखती । परंतु ऊपर लिखी सूची में कई शब्द ऐसे हैं जिनके बारे में राह चलते किसी पूछें तो वह अनभिज्ञता जताएगा । मेरा अनुमान है कि ये शब्द:
प्रजेंट, कॉन्फिडेंस, ऑरिजनलिटी, बिहेव, एन्वायरमेंट, मोटिव, स्ट्रेस, वॉल, यूज
बहुतों को नहीं मलूम होंगे । लेकिन स्कूल-कालेजों, दफ़्तरों आदि में अंग्रेजी में काम करने वाले भूल जाते हैं कि आम आदमी का इन शब्दों से परिचय हो इसकी संभावना कम ही है । दुर्भाग्य से हम सोचते हैं कि दूसरे को पर्याप्त अंग्रेजी नहीं आती है तो यह उसकी गलती है । इतनी भी अंग्रेजी नहीं सीख सका वह ! क्या उदार विचार है यह ! हर हिंदुस्तानी को अंग्रेजी आनी ही चाहिए, अव्वल दर्जे की । अगर यह रवैया अन्य प्रमुख देशों के बाशिंदों में नहीं दिखाई देता है तो वे हमसे पिछड़े हैं । यहां पर मैं बता दूं कि इन शब्दों:
allien (एलिअन), crucial (क्रूश्‌ल्‌), interpret (इंटप्रेट), miniature (मिनिअचर), native (नेतिव), prejudice (प्रेजुडिस)
और ऐसे ही अनेकों शब्दों से मैं सुपरिचित ही नहीं हूं बल्कि मैं इन्हें लेखन-वाचन में बखूबी इस्तेमाल कर सकता हूं । ऐसा मेरे साथ व्यावसायिक कारणों से हुआ है – विश्वविद्यालय में अध्ययन, अध्यापन एवं शोध कार्यों के कारण । पर ये मेरी जबान पर तब भी आयें जब मैं आम आदमी से बात करूं तो उसे उचित नहीं कहूंगा । इन शब्दों तथा इन जैसे शब्दों को मैं लोगों के मुख से सुनता रहता हूं और यह महसूस करता हूं कि ऐसा होना नहीं चाहिए, किंतु ऐसा हो रहा है और आगे भी होगा ।

शेष भाग आगामी कल (5 अक्टूबर) की पोस्ट में देखें । – योगेन्द्र जोशी