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यह वैश्वीकरण का युग है। इस युग में भोज्य पदार्थ और आम जीवन में प्रयुक्त उपभोक्ता सामग्रियां किसी एक स्थान पर उत्पादित होती हैं और किसी दूसरे स्थान पर उपलब्ध हो जाती हैं। स्थानीयता का भाव न वस्तुओं के उत्पादन में रह गया है और न ही उनके उपभोग या उपयोग में रह गया है। बातें इससे भी आगे निकलकर समुदायों के बीच की दूरी का समाप्तप्राय हो जाना तक पहुंच चुकी हैं। भौगोलिक, सांस्कृतिक अथवा भाषाई भिन्नता के कारण विविध समुदायों के बीच एक प्रकार की जो संपर्कहीनता पहले देखने को मिलती थी वह तिरोहित होते जा रही है। अब ‘मुख्यधारा में आने’ जैसी बातें सुनने को मिलती हैं। सांस्कृतिक एव एवं भाषाई अतिक्रमण सामान्य बात हो चुकी है। ऐसी स्थिति में क्या मातृभाषा के अर्थ भी बदल नहीं गये होंगे?

मातृभाषा को लेकर मेरे मन में कुछ शंकाएं है। क्या आज के युग में मातृभाषा का अर्थ वही रह गया है जो सदियों से चला आ रहा था? यह सवाल मेरे मन में तब उठा जब में अपनी मातृभाषा, अपने बच्चों की मातृभाषा और अपने पोतों की मातृभाषा क्या है इस पर विचार करता हूं। इसके लिए मैं अपने बचपन से लेकर अभी तक के अनुभवों को पाठकों के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं।

मेरी मातृभाषा

मेरा जन्म १९४८ में आज के उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के कुमाऊं अंचल के एक सुदूर गांव में हुआ था। हमारे घरों में कुमाउंनी बोली बोली जाती थी जिसे हिन्दी की बोलियों या उपभाषाऑ (दायलेक्ट) में से एक माना जाता है। हिन्दी से तात्पर्य है मानक हिन्दी यानी ‘खड़ी बोली’। उपभाषा होने के बावजूद कुमाउंनी हिन्दीभाषियों की समझ में कमोबेश आ जायेगी ऐसा कदाचित नहीं है। दरअसल इस बोली में ह्रस्व ध्वनियों का प्रयोग अत्यधिक होता है। हम लोग भी ‘मैं’ के लिए ‘मैं’ ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इस सर्वनाम में ‘ऐ’ की ध्वनि दीर्घ न होकर ह्रस्व होती है, अर्थात् वह सामान्य से काफी छोटे अंतराल तक के लिए उच्चारित होती है। इसी प्रकार ‘पानी’ के लिए यही शब्द प्रयुक्त होता है। हमारे इलाके में इसका उच्चारण ‘पाणि” किया जाता है जिसमें ‘आ’ ध्वनि तो है किंतु बहुत संक्षिप्त काल के लिए। कुमाउंनी का कोई मानक स्वरूप नहीं है। नेपाल सीमा के पास (चंपावत आदि में) ‘पानि’ बोलने वाले मिलेगें। हम ‘मैं’ (ह्रस्व ध्वनि) बोलते है लेकिन रानीखेत के आसपास ‘मिं’ सुनने को मिलता है। यह भी बता दूं इस बोली के कई शब्द हिन्दी के नहीं हैं। इससे भी बोली समझने में अड़चन पैदा होती है।

अस्तु, मैं कुमाउंनी बोली के बारे में अधिक नही कहने जा रहा हूं। इतना बताने का उद्येश्य यही है कि मैं जहां जन्मा था वहां परिवार एवं गांव में और संबंधित परिवेश में कुमाउंनी का ही चलन था। अधिकांश लोगों का हिन्दी से कोई सरोकार नहीं था। नौकरी-पेशे की खातिर जो बाहर निकल जाते उनका कार्य हिन्दी से ही चलता था। लेकिन वे भी जब गांव आते थे कुमाउंनी में ही वार्तालाप होता था।

पांच वर्ष की आयु तक मेरा ज्ञान कुमाउंनी तक ही सीमित था। किंतु जब प्राथमिक विद्यालय (पाठशाला) जाना शुरू हुआ तो पढ़ाई-लिखाई सब हिन्दी में ही चला और वहीं से हिन्दीभाषा अपनी भाषा बन गयी। उसके बाद की शिक्षा के लिए उस पर्वतीय क्षेत्र से बाहर निकला तो कुमाउंनी बोली छूट गयी और हिन्दी ही अपनी रोजमर्रा की भाषा बन गयी। किंतु यह बोली भूल गया ऐसा हुआ नहीं। गांव आना-जाना चलता रहा और पिताश्री एवं भाइयों के साथ रहते हुए कुमाउंनी चलती रही। अब मैं बाल्यावस्था की अपनी बोली को मातृभाषा मानूं या बाद में हिन्दी, जिसका प्रयोग अवश्य ही अधिकांशतः होने लगा। इस प्रश्न की सार्थकता समझने के लिए एक दृष्टांत पेश है। मुझे बनारस में एक पड़ोसी महिला (कदाचित् निरक्षर) का स्मरण हो आता है जो हिन्दी ठीक-से नहीं बोल पाती थीं और अपनी देहाती बोली (कदाचित् भोजपुरी) में ही बातें करती थीं। उनकी मातृभाषा क्या थी? क्या वह हिन्दी जिसे वे बोल नहीं सकती थीं?

मेरी पत्नी कुमाउंनी बोलती हैं यद्यपि उनका जन्म, परवरिश एवं शिक्षा-दीक्षा आदि कानपुर में ही हुई। लेकिन पारंपरिक कुमाउंनी गांव से आईं अपनी मां से उन्होंने कुमाउंनी बोली शौकिया सीखी। हम दोनों घर में खड़ीबोली एवं कुमाउंनी दोनों बोलते हैं। किंतु व्यावसायिक (विश्वविद्यालय में भौतिकी शिक्षण के) स्तर पर अंग्रेजी ही मेरी भाषा रही। मुझे लगता है कि मेरी कोई वास्तविक अथवा स्पष्टतया परिभाषित मातृभाषा नहीं है। मेरा चिंतन-मनन कुमाउंनी, हिन्दी तथा अंग्रेजी, तीनों में, चलता है, मौके-मौके के अनुसार। पता नहीं औरों के साथ ऐसा होता है या नहीं।

अगली पीढ़ियों की मातृभाषा

मेरे दोनो बच्चे बनारस में ही जन्मे तथा पलेबढे और शिक्षित हुए, अधिकांशतः अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में। किंतु जो परिवेश उनको मिला वह अंग्रेजीमय न होकर हिन्दी का रहा। इसलिए हिन्दी उनके लिए सहज रही। व्यावसायिक स्तर पर उनको भी अंततः अंग्रेजी अपनानी पड़ी और अब उसी को सर्वाधिक प्रयोग में लेना पड़ता है। कुमाउंनी परिवेश के अभाव में वे इस बोली को सीख नहीं पाए भले ही हम घर में कुआउंनी में बोलते थे। वे बोली को समझ तो लेते हैं लेकिन ठीक-से बोल नहीं सकते। कहना यही होगा कि उनकी मातृभाषा हिन्दी है जो उन्हें बनारस के परिवेश से मिला।

अब मैं अपने पोतों की स्थिति बताता हूं। छोटा साल भर का है इसलिए उसको लेकर कुछ नहीं कहता, लेकिन बड़ा छः साल का हैं। वह अपने माता-पिता (मेरे ज्येष्ठ पुत्र एवं बहू) के साथ बेंगलूरु के 4-5 हजार फ्लैटों वाले विस्तृत परिसर के एक फ्लैट में रहता है। इस परिसर में मध्य-वर्ग एवं उच्च-मध्य वर्ग के नौकरी-पेशे वाले युवा या अधेड़ अवस्था के लोग रहते हैं। इनमें अधिकतर उत्तर भारतीय हैं जो अलग-अलग प्रांतों से आते है। जैसा मेरे देखने में आया इनकी संपर्क भाषा प्रायः अंग्रेजी-मिश्रित हिन्दी अर्थात् हिंग्लिश रहती है। हमें विगत मार्च-अप्रैल-मई – तीन माह – कोरोना-लॉकडाउन के कारण वही रुकना पड़ा। स्कूल-कालेज सब बंद पड़े थे। वहां के निवासियों को परिसर में सीमित रह जाना पड़ा। वह समय था जब परिसर-वासियों को निकट से देखने को अवसर मिला था।

जैसा मैंने कहा वयस्क जन प्रायः हिन्दी (दरअसल हिंग्लिश) में बात कर लेते थे। अंग्रेजी की तुलना में वे हिन्दी को वरीयता दे रहे थे। जो हिन्दी नहीं जानते थे उनके लिए अंग्रेजी का विकल्प था। अपने देश में व्यावसायिक स्तर पर अंग्रेजी का ही चलन है इसलिए अंग्रेजी तो प्रायः सभी समझ-बोल सकते हैं। देश में अंग्रेजी का आकर्षण बढ़ता जा रहा हैं क्योंकि धनोपार्जन के बेहतर रास्तों के द्वार अंग्रेजी ही खोलती है। अतः संपन्न लोगों के बच्चे अंग्रेजी-आध्यम के विद्यालयों में पढ़ते है। मां-बाप भी परिवार में बच्चों की अंग्रेजी मजबूत करने के लिए अक्सर उनके साथ इसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इससे बच्चे माँ-बाप की ‘घोषित’ अथवा तथाकथित मातृभाषा से दूर होते चले जाते हैं। परिणाम क्या होता है बताता हूं। उस परिसर में मैंने वयसा १०-१२ वर्ष तक के बच्चों को आपस में अंग्रेजी में ही बात करते पाया। हमने अपने पोते को भी उसी रंग में रंगे जाते देखा था। हिन्दी वह समझ लेता है लेकिन अच्छा नहीं बोल पाता है। हमने उसे बता दिया था कि हम उससे अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे। इतना ही नहीं, अपने बेटे-बहू को भी सलाह दी कि वे उसे हिन्दी भी सिखाते चलें। हमारा कहना था कि आंग्लमय माहौल में अंग्रेजी तो वह सीख ही लेगा। वे भी हाँ-हाँ कहते-कहते अंग्रेजी पर ही उतर जाते थे।

ऐसे में मेरे मन में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक था कि उसकी मातृभाषा क्या मानी जाये? यह प्रश्न परिसर के कमोबेश सभी बच्चों पर लागू होती है। जिन ‘हिन्दीभाषियों’ के परिवार में हिन्दी की पुस्तकें, पत्रिकाएं, और समाचारपत्र तक देखने कोन न मिलें और जहां उक्त सभी चीजें केवल या कमोबेश अंग्रेजी में मिलें उनकी “हिन्दी हमारी मातृभाषा” का दावा कितन स्वीकार्य होगा?

बतौर शिक्षा के माध्यम के अंग्रेजी चलेगी

सरकार ने नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा को बतौर शिक्षा का माध्यम बनाने की बात कही है। लेकिन बताया जा रहा है कि अभिभावकों को अपनी पसंद का माध्यम चुनने की तथाकथित लोकतांत्रिक स्वतंत्रता भी इस शिक्षा नीति में बनी रहेगी। नई शिक्षा नीति में तमाम नये विचार शामिल किए गये हैं ऐसा दावा किया जा रहा है ताकि बच्चों के व्यक्तित्व का समग्र विकास हो सके और शिक्षा उनको बोझ न लगे। किंतु मातृभाषा की अहमियत केवल शिक्षा नीति के ब्योरे तक सीमित रहेगी; हकीकत पुराने ढर्रे पर ही रहेगी। जैसा मैंने ऊपर कहा है ऐसे अनेक परिसर मिलेंगे जिनमें बच्चों की मातृभाषा अंग्रेजी बन चुकी है। वैसे भी माता-पिताओं की मातृभाषा में एकरूपता न होने के कारण इन बच्चों के शिक्षण का माध्यम क्या होवे यह प्रश्न उठेगा ही।

देश की स्वतंत्रता के ७० वर्षों में अंग्रेजी तेजी से आगे बढ़ती गई है। अतः अब उससे छुटकारा पाने की संभावना नहीं के बराबर है। यानी शिक्षा का माध्यम अधिकांश स्तरीय विद्यालयों में अंग्रेजी ही रहेगी। – योगेन्द्र जोशी

 

आज हिन्दी दिवस है, हिन्दी का राजभाषा के रूप में जन्म का दिन इस अवसर पर हिन्दी प्रेमियों तथा हिन्दी प्रयोक्ताओं के प्रति शुभेच्छाएं। हिन्दी की दशा सुधरे यही कामना की जा सकती है।

इस दिवस पर कहीं एक-दिनी कार्यक्रम होते हैं तो कहीं हिन्दी के नाम पर पखवाड़ा मनाया जाता है। इन अवसरों पर हिन्दी को लेकर अनेक प्रभावी और मन को आल्हादित-उत्साहित करने वाली बातें बोली जाती हैं, सुझाई जाती हैं। इन मौकों पर आयोजकों, वक्ताओं से लेकर श्रोताओं तक को देखकर लगता है अगले दिन से सभी हिन्दी की सेवा में जुट जाएंगे। आयोजनों की समाप्ति होते-होते स्थिति श्मशान वैराग्य वाली हो जाती है, अर्थात्‍ सब कुछ भुला यथास्थिति को सहजता से स्वीकार करते हुए अपने-अपने कार्य में जुट जाने की शाश्वत परंपरा में लौट आना।

इस तथ्य को स्वीकार किया जाना चाहिए कि जैसे किसी व्यक्ति के “बर्थडे” (जन्मदिन) मनाने भर से वह व्यक्ति न तो दीर्घायु हो जाता है, न ही उसे स्वास्थलाभ होता है, और न ही किसी क्षेत्र में सफलता मिलती है, इत्यादि, उसी प्रकार हिन्दी दिवस मनाने मात्र से हिन्दी की दशा नहीं बदल सकती है, क्योंकि अगले ही दिन से हर कोई अपनी जीवनचर्या पूर्ववत् बिताने लगता है।

मैं कई जनों के मुख से अक्सर सुनता हूं और संचार माध्यमों पर सुनता-पढ़ता हूं कि हिन्दी विश्व में फैल रही है, उसकी ओर लोग आकर्षित हो रहे हैं, उसे अपना रहे हैं। किंतु दो बातें स्पष्टता से नहीं कही जाती हैं:

(१) पहली यह कि हिन्दी केवल बोलचाल में ही देखने को मिल रही है, यानी लोगबाग लिखित रूप में अंग्रेजी विकल्प ही सामान्यतः चुनते हैं, और

(२) दूसरी यह कि जो हिन्दी बोली-समझी जाती है वह उसका प्रायः विकृत रूप ही होता है जिसमें अंग्रेजी के शब्दों की इतनी भरमार रहती है कि उसे अंग्रेजी के पर्याप्त ज्ञान के अभाव में समझना मुश्किल है।

कई जन यह शिकायत करते हैं कि हिन्दी में या तो शब्दों का अकाल है या उपलब्ध शब्द सरल नहीं हैं। उनका कहना होता है कि हिन्दी के शब्दसंग्रह को वृहत्तर बनाने के लिए नए शब्दों की रचना की जानी चाहिए अथवा उन्हें अन्य भाषाओं (अन्य से तात्पर्य है अंग्रेजी) से आयातित करना चाहिए। मेरी समझ में नहीं आता है कि उनका “सरल” शब्द से क्या मतलब होता है? क्या सरल की कोई परिभाषा है? अभी तक मेरी यही धारणा रही है कि जिन शब्दों को कोई व्यक्ति रोजमर्रा सुनते आ रहा हो, प्रयोग में लेते आ रहा हो, और सुनने-पढ़ने पर आत्मसात करने को तैयार रहता हो, वह उसके लिए सरल हो जाते हैं

उपर्युक्त प्रश्न मेरे सामने तब उठा जब मुझे सरकारी संस्था “वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग” से जुड़ा समाचार पढ़ने को मिला। दैनिक जागरण में छपे समाचार की प्रति प्रस्तुत है। समाचार के अनुसार आयोग “नए-नए शब्दों को गढ़ने और पहले से प्रचलित हिंदी शब्दों के लिए सरल शब्द तैयार करने के काम में जुटा है।”

आयोग जब सरल शब्द की बात करता है तो वह उसके किस पहलू की ओर संकेत करता है? उच्चारण की दृष्टि से सरल, या वर्तनी की दृष्टि से? याद रखें कि हिन्दी कमोबेश ध्वन्यात्मक (phonetic) है (संस्कृत पूर्णतः ध्वन्यात्मक है)। इसलिए वर्तनी को सरल बनाने का अर्थ है ध्वनि को सरल बनाना। और इस दृष्टि से हिन्दी के अनेक शब्द मूल संस्कृत शब्दों से सरल हैं ही। वस्तुतः तत्सम शब्दों के बदले तद्‍भव शब्द भी अनेक मौकों पर प्रयुक्त होते आए हैं। उदाहरणतः

आलस (आलस्य), आँसू (अश्रु), रीछ (ऋक्ष), कपूत (कुपुत्र), काठ (काष्ठ), चमार (चर्मकार), चैत (चैत्र), दूब (दूर्वा), दूध (दुiग्ध), धुआँ (धूम्र)

ऐसे तद्‍भव शब्द हैं जो हिन्दीभाषी प्रयोग में लेते आए हैं और जिनके तत्सम रूप (कोष्ठक में लिखित) शायद केवल शुद्धतावादी लेखक इस्तेमाल करते होंगे। हिन्दी के तद्‍भव शब्दों की सूची बहुत लंबी होगी ऐसा मेरा अनुमान है।

ऐसे शब्द हमारी रोजमर्रा की जिन्दगी के हिस्से हैं। किंतु अयोग के समक्ष समस्या इसके आगे विशेषज्ञता स्तर के शब्दों की रचना करने और उनके यथासंभव सरलीकरण की है। बात उन शब्दों की हो रही है जो भाषा में तो हों किंतु प्रचलन में न हों अतः लोगों के लिए पूर्णतः अपरिचित हों। अथवा वांचित अर्थ व्यक्त करने वाले शब्द उपलब्ध ही न हों। पहले मामले में उनके सरलीकरण की और दूसरे मामले में शब्द की नये सिरे से रचना की बात उठती है। यहां पर याद दिला दूं कि हमारे हिन्दी शब्दों का स्रोत संस्कृत है न कि लैटिन एवं ग्रीक जो अंग्रेजी के लिए स्रोत रहे हैं और आज भी हैं। अन्य भारतीय भाषाओं से शब्द ले सकते हैं, परंतु उनकी स्थिति भी हिन्दी से भिन्न नहीं है और वे भी मुख्यतः संस्कृत पर ही निर्भर हैं। हिन्दी पर अरबी-फारसी का काफी प्रभाव रहा है। लेकिन जिन शब्दों की तलाश आयोग को है वे कदाचित् इन भाषाओं में उपलब्ध नहीं है। यदि कोई शब्द हों भी तो वे भारतीयों के लिए अपरिचित-से होंगे। जब संस्कृत के शब्द ही कठिन लगते हों तो इन भाषाओं से उनका परिचय तो और भी कम है।

ले दे के बात अंग्रेजी के शब्दों को ही हिन्दी में स्वीकारने पर आ जाती है, क्योंकि अंग्रेजी स्कूल-कालेजों की पढ़ाई और व्यावसायिक एवं प्रशासनिक क्षेत्रों में अंग्रेजी के वर्चस्व के चलते हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाएं महत्व खोती जा रही हैं। आज स्थिति क्या है इसका अंदाजा आप मेरे एक अनुभव से लगा सकते हैं –

एक बार मैं एक दुकान (अपने हिन्दीभाषी शहर वाराणसी का) पर गया हुआ था। मेरी मौजूदगी में ९-१० साल के एक स्कूली बच्चे ने कोई सामान खरीदा जिसकी कीमत दूकानदार ने “अड़तीस” (३८) रुपये बताई। लड़के के हावभाव से लग गया कि वह समझ नहीं पा रहा था कि अड़तीस कितना होता है। तब दूकानदार ने उसे बताया कि कीमत “थर्टि-एट” रुपए है। लड़का संतुष्ट होकर चला गया। मेरा मानना है कि ऐसी स्थिति अंग्रेजी माध्यम की स्कूली शिक्षा का परिणाम है। इस “अड़तीस” का भला क्या सरलीकरण हो सकता है?

जब आप पीढ़ियों से प्रचलित रोजमर्रा के हिन्दी शब्दों को ही भूलते जा रहे हों तो फिर विशेषज्ञता स्तर के शब्दों को न समझ पाएंगे और न ही उन्हें सीखने को उत्साहित या प्रेरित होंगे। तब क्या नये-नये शब्दों की रचना का प्रयास सार्थक हो पाएगा?

संस्कृत पर आधारित शब्द-रचना के आयोग के प्रयास लंबे समय से चल रहे हैं। रचे या सुझाए गये शब्द कितने सरल और जनसामान्य के लिए कितने स्वीकार्य रहे हैं इसे समझने के लिए एक-दो उदाहरण पर्याप्त हैं। वर्षों पहले “कंप्यूटर” के लिए आयोग ने “संगणक” गढ़ा था। लेकिन यह शब्द चल नहीं पाया और अब सर्वत्र “कंप्यूटर” शब्द ही इस्तेमाल होता है। इसी प्रकार “ऑपरेटिंग सिस्टम” (operating system)  के लिए “प्रचालन तंत्र” सुझाया गया। वह भी असफल रहा। आयोग के शब्दकोश में “एंजिनिअरिंग” के लिए “अभियांत्रिकी” एवं “एंजिनिअर” के लिए “अभियंता उपलब्ध हैं, किंतु ये भी “शुद्ध” हिन्दी में प्रस्तुत दस्तावेजों तक ही सीमित रह गए हैं। आयोग के ऐसे शब्दों की सूची लंबी देखने को मिल सकती है।

आयोग सार्थक पारिभाषिक शब्दों की रचना भले ही कर ले किंतु यह सुनिश्चित नहीं कर सकता है कि जनसामान्य में उनकी स्वीकार्यता होगी। शब्दों के अर्थ समझना और उन्हें प्रयोग में लेने का कार्य वही कर सकता है जो भाषा में दिलचस्पी रखते हों और अपनी भाषायी सामर्थ्य बढ़ाने का प्रयास करते हों। हिन्दी का दुर्भाग्य यह है कि स्वयं हिन्दीभाषियों को अपनी हिन्दी में मात्र इतनी ही रुचि दिखती है कि वे रोजमर्रा की सामान्य वार्तालाप में भाग ले सकें, वह भी अंग्रेजी के घालमेल के साथ। जहां कहीं भी वे अटकते हैं वे धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्द इस्तेमाल कर लेते हैं इस बात की चिंता किए बिना कि श्रोता अर्थ समझ पाएगा या नहीं। कहने का मतलब यह है कि आयोग की पारिभाषिक शब्दावली अधिकांश जनों के लिए माने नहीं रखती है।

इस विषय पर एक और बात विचारणीय है जिसकी चर्चा मैं एक उदाहरण के साथ करने जा रहा हूं। मेरा अनुभव यह है कि किन्ही दो भाषाओं के दो “समानार्थी” समझे जाने वाले शब्द वस्तुतः अलग-अलग प्रसंगों में एकसमान अर्थ नहीं रखते। दूसरे शब्दों में प्रायः हर शब्द के अकाधिक अर्थ भाषाओं में देखने को मिलते हैं जो सदैव समानार्थी या तुल्य नहीं होते। भाषाविद्‍ उक्त तथ्य को स्वीकारते होंगे।

मैंने अंग्रेजी के “सर्वाइबल्” (survival)” शब्द के लिए हिन्दी तुल्य शब्द दो स्रोतों पर खोजे।

(१) एक है आई.आई.टी, मुम्बई, के भारतीय भाषा प्रौद्योगिकी केन्द्र (http://www.cfilt.iitb.ac.in/) द्वारा विकसित शब्दकोश, और

(२) दूसरा है अंतरजाल पर प्राप्य शब्दकोश (http://shabdkosh.com/)

मेरा मकसद था जीवविज्ञान के विकासवाद के सिद्धांत “survival of the fittest” की अवधारणा में प्रयुक्त “सर्वाइबल्” के लिए उपयुक्त हिन्दी शब्द खोजना।

पहले स्रोत पर केवल २ शब्द दिखे:

१. अवशेष, एवं २. उत्तरजीविता

जब कि दूसरे पर कुल ७ नजर आए:

१. अवशेष, २. अतिजीवन, ३. उत्तर-जीवन, ४. उत्तरजीविता, ५. जीवित रहना, ६. प्रथा, ७. बची हुई वस्तु या रीति 

जीवधारियों के संदर्भ में मुझे “अवशेष” सार्थक नहीं लगता। “उत्तरजीविता” का अर्थ प्रसंगानुसार ठीक कहा जाएगा ऐसा सोचता हूं। दूसरे शब्दकोश के अन्य शब्द मैं अस्वीकार करता हूं।

अब मेरा सवाल है कि “उत्तरजीविता” शब्द में निहित भाव क्या हैं या क्या हो सकते हैं यह कितने हिन्दीभाषी बता सकते हैं? यह ऐसा शब्द है जिसे शायद ही कभी किसी ने सुना होगा, भले ही भूले-भटके किसी ने बोला हो। जो लोग संस्कृत में थोड़ी-बहुत रुचि रखते हैं वे अर्थ खोज सकते हैं। अर्थ समझना उस व्यक्ति के लिए संभव होगा जो “उत्तर” एवं “जिविता” के माने समझ सकता है। जितना संस्कृत-ज्ञान मुझे है उसके अनुसार “जीविता” जीवित रहने की प्रक्रिया बताता है, और “उत्तर” प्रसंग के अनुसार “बाद में” के माने व्यक्त करता है। यहां इतना बता दूं कि “उत्तर” के अन्य भिन्न माने भी होते हैं: जैसे दिशाओं में से एक; “जवाब” के अर्थ में; “अधिक” के अर्थ में जैसे “पादोत्तरपञ्चवादनम्” (एक-चौथाई अधिक पांच बजे) में।

लेकिन एक औसत हिन्दीभाषी उक्त शब्द के न तो अर्थ लगा सकता है और न ही उसे प्रयोग में ले सकता है। ऐसी ही स्थिति अन्य पारिभाषिक शब्दों के साथ भी देखने को मिल सकती है।

संक्षेप मे यही कह सकता हूं कि चूंकि देश में सर्वत्र अंग्रेजी हावी है और हिन्दी के (कदाचित् अन्य देशज भाषाओं के भी) शब्द अंग्रेजी से विस्थापित होते जा रहे हैं अतः सरल शब्दों की रचना से कुछ खास हासिल होना नहीं है। – योगेन्द्र जोशी