विश्व की व्यावसायिक भाषाओं में भारतीय भाषाओं का नाम नहीं !!

Posted सितम्बर 18, 2011 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: अंग्रेजी, भारत, भाषा, राजनीति, राजभाषा, हिन्दी, India, language, politics

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मुझे अपने ‘भारत महान्’ की बात समझ में नहीं आती है । महान् तो कह दिया लेकिन किस तारीफ में ? भ्रष्टाचार में अव्वल होने पर ? राजनैतिक बेहयाई पर ? लोगों की संवेदनहीनता पर ? उनकी स्वार्थपरता पर ?या फिर समाज में व्याप्त कुंठा अथवा हीन भावना पर, जिसके तहत हर विदेशी चीज को इस देश ने श्रेष्ठतर मानने और उन्हें अपनाने का व्रत पाल रखा है , जिसका नतीजा भारतीय भाषाओं के हालात के तौर हम देखते हैं ।

चार-छः दिन पहले मुझे एक ई-मेल के माध्यम से इस ऐसी वेबसाइट का पता मिला,
(http://media.bloomberg.com/bb/avfile/roQIgEa4jm3w)
इसमें उन देशों की सूची दी गयी है जहां अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाएं भी व्यावसायिक कार्यों में प्रयुक्त होती है । उस पर आधारित इस जानकारी पर गौर करें:

व्यावसायिक भाषाएं

अरबी (Arabic) 25 करीब करोड़ (23)
इतालवी (Italian) करीब 6 करोड़ (4)
कोरियाई (Korean) करीब 7 करोड़ (1)
चीनी मैंडरिन (Chinese Mandarin) 100 करोड़ से अधिक (1)
जर्मन (German) 12-13 करोड़ (6)
जापानी (Japanese) 12-13 करोड़ (1)
तुर्की (Turkish) 6-7 करोड़ (1)
पुर्तगाली (Portuguese) करीब 20 करोड़ (8)
फ्रांसीसी (French) 12-13 करोड़ (27)
रूसी (Russian) 25-26 करोड़ (4)
स्पेनी (Spanish) करीब 40 करोड़ (20)

नोटः- संबंधित भाषा के नाम के आगे उसे बोलने/समझने वालों की अनुमानित संख्या दी गयी है । पंक्ति के अंत के कोष्ठकों में उन देशों की संख्या है जहां भाषा को आधिकारिक होने का दर्जा प्राप्त है ।

अंग्रेजी

इस बात पर ध्यान दें कि विश्व में उन लोगों की संख्या 40 करोड़ के लगभग आंकी जाती है जिनकी प्रथम भाषा अंग्रेजी है । किसी-किसी वेबसाइट पर इसे करीब 50 करोड़ भी बताया गया है, जिसमें हिंदुस्तान के 9-10 करोड़ ‘अंग्रेजीभाषी’शामिल हैं ।

मैंने तत्संबंधित जानकारी विकीपीडिआ, एवं नेशनमास्टर, और विस्टावाइड वेबसाइटों से जुटाई ।  यों अंतरजाल पर तमाम अन्य साइटें मिल जाएंगी । हिंदुस्तान से जुड़ी जानकारी मुझे अविश्वसनीय लगती है । निःसंदेह इस देश में अंग्रेजी समझने और कुछ हद तक पढ़-लिख सकने वाले काफी हैं, लेकिन फिर भी वह संख्या 10 करोड़ पहुंचती होगी इसमें शंका है । दुनिया में अन्य स्थानों पर भी अंग्रेजी जानने वाले हैं, परंतु उनकी संख्या का भरोसेमंद आंकड़ा मुझे खोजे नहीं मिला । अधिकांश देशों में यह संख्या काफी कम है, जैसे चीन, जापान एवं कोरिया । वैसे सच बात यह है कि उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, तथा ब्रितानी उपनिवेश रह चुके विश्व के देशों को छोड़कर अन्यत्र अंग्रेजी जानने वाले आपको बहुत कम मिलेंगे । कुल मिलाकर अंग्रेजी चीनी मैंडरिन से पर्याप्त पीछे है । यह बात अलग है कि हिंदुस्तानियों में यह भ्रम व्याप्त है कि अंग्रेजी तो सर्वत्र बखूबी चलती है । कौन समझाये उन्हें ? कौन तोड़े लोगों के भ्रम को ।

भारतीयों, बेहतर होगा इंडियनों कहना, को यह समझना चाहिए कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय केवल इस अर्थ में है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कारोबार में प्रायः अंग्रेजी इस्तेमाल होती है, जैसे हवाई यात्राओं की व्यवस्था में, आयात-निर्यात के कार्य में, और वैश्विक महत्ता के मुद्दों की जानकारी लेने-देने आदि में । परंतु अंग्रेजी के अंतरराष्ट्रीय होने का अर्थ यह हरगिज नहीं कि दुनिया के देशों के आंतरिक कामकाज में भी अंग्रेजी ही चलती है । आपने कभी गौर किया है कि जापानी शेयर-मार्केट के प्रदर्शन-पट्टों पर जापानी दिखती है, न कि अंग्रेजी । आपके लिए वहां के आम रेस्तरां में चाय-नास्ते का आर्डर देना भी कठिन हो सकता है, रोजमर्रा का आम निबटाना तो दूर की बात । तथ्य यह है कि चीन, जापान, ब्राजील, अर्जेन्टिना में समस्त आंतरिक व्यावसायिक गतिविधियां अपनी-अपनी भाषाओं में होता है । लेकिन इन बातों को इंडियनों को कौन समझाए ?

चीनी मेंडरिन

चीनी मैंडरिन राजधानी बीजिंग शहर के आसपास की चीनी भाषा पर आधारित और सरलीकृत है, जिसमें आधिकारिक कार्य संपन्न होते हैं । यह कम ही लोग जानते होंगे कि चीन में सर्वत्र चीनी भाषा एक जैसी नहीं बोली जाती है, लेकिन लिपि और लिखित चिह्न के अर्थ सर्वत्र एक होने से दस्तावेज सर्वत्र सरलता से पढ़े-समझे जा सकते हैं । अगर भारत में सर्वत्र देवनागरी स्वीकारी जाती, तो हिंदी के दस्तावेज पढ़ पाना और कुछ हद तक उन्हें समझ पाना अधिकतर लोगों के लिए संभव होता, कदाचित्‌ दक्षिण भारतीयों को छोड़कर । राजनैतिक कारणों से ऐसा किया नहीं गया ।

गौर करें कि किसी भी भारतीय भाषा का नाम ऊपर दी गयी सूची में नहीं है, राजभाषा का खिताब पाई हिंदी भी नहीं, जब कि यहां की कई भारतीय भाषाओं के जानने वालों की संख्या कोरियाई, तुर्की तथा अन्य भाषाओं के ज्ञाताओं से अधिक है । हिंदी जानने वालों की संख्या 50 करोड़ से अधिक आंकी जाती है, क्योंकि हिंदीभाषी क्षेत्रों की जनसंख्या ही स्वयं में बहुत है । जहां तक बोलने-समझने वालों की बात है, अन्य भारतीयों एवं पाकिस्तानियों को मिलाकर यह संख्या 65 करोड़ को पार कर जाती है । दुनिया की सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषाओं में दूसरे, तीसरे अथवा चौथे क्रम (इस संदर्भ में मतैक्य नहीं लगता) पर होने के बावजूद भी इस भाषा को व्यावसायिक क्षेत्र में दस्तावेजी स्तर पर कोई अहमियत नहीं मिली है । मौखिक कारोबार इस देश में हिंदी बोलकर बहुत होता है; बिना उसके कइयों का काम ही न चले । किंतु व्यवसायीगण दस्तावेजी स्तर पर अंग्रेजी पर ही उतरते हैं । अजीब हाल हैं देश के कि बोलें हिंदी लिखें अंग्रेजी !

चीन की हालिया आर्थिक प्रगति और वैश्विक राजनीति में उसकी बढ़ती अहमियत के चलते मैंडरिन का महत्व तेजी से बढ़ रहा है । चंद रोज पहले अंतरजाल के एक लेख में मुझे डेविड ग्रैडल (David Graddol) नामक विशेषज्ञ का यह कथन पढ़ने को मिलाः
“… other languages such as Spanish, Arabic, Hindi/Urdu and Chinese are growing faster than English. The populations who use these languages are younger and have greater potential for economic expansion…”

हिंदी की दशा

‘हमारी राजभाषा’ ‘हमारी राजभाषा’ रटने में हमारी सरकारें पीछे नहीं रहती हैं, और १४ सितंबर के दिन उसके प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग पर बहुत-सी बातें कही जाती हैं । (जुबानी जमाखर्च में वे भी नहीं चूकते जिनके मन में विरोध रहता है ।) परंतु व्यावसायिक कार्य में वही सरकारें किसी न किसी बहाने अंग्रेजी का ही दामन थामे रहती हैं । जब सरकारें ही राजभाषा से विरत रहें, तो निजी संस्थाओं से क्या उम्मीद करें । यह हाल तब है जब कि देश का आम आदमी अंग्रेजी न जानता है, न समझता है, सार्थक अभिव्यक्ति तो बहुतों के वश की बात ही नहीं । महज रोमन लिपि से परिचित होना और उसके कुछ शब्द सीख लेना अंग्रेजी जानना नहीं होता है ।

लगता है कि इंडियनों ने अपनी भाषाओं से परहेज की कसम खा रखी है । इसके विपरीत अन्य प्रमुख देशों में अपनी भाषाओं के प्रति लगाव घट नहीं रहा है । जानकारों का मानना है कि भविष्य में चीनी मैंडरिन अंग्रेजी के साथ-साथ, अथवा उसके विकल्प स्वरूप, विश्व की व्यावसायिक भाषा बनने जा रही है । दरअसल मैंडरिन को आगे बढ़ाने में चीन प्रयत्नशील है । इस समय अमेरिका में सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा वही है । दो साल पहले मुझे यह देखकर थोड़ा अचरज हुआ कि अमेरिका के सिलिकॉन वैली के कुछ प्राथमिक विद्यालयों में मैंडरिन भी द्वितीय भाषा के तौर पर पढ़ाई जाती है । उस क्षेत्र में चीनी एवं कोरियाई लिपि में सूचनापट्ट देखने को मिल जाएंगे ।

संभव है कि डेविड ग्रैडल का उपर्युक्त कथन सही साबित हो जाये। फिलहाल हिंदी की दशा बदलेगी ऐसा लगता नहीं । उम्मीद जगाने वाली खबरें कम ही सुनने को मिलती हैं । 10 तारीख के अपने अखबार में मुझे यह खबर दिखी:

इसे देखते हुए क्या लगता है आपको ? – योगेन्द्र जोशी

हिंदी दिवस (14 सितंबर) – कल एक पुरानी पोथी की तरह कपड़े में लपेटकर …

Posted सितम्बर 14, 2011 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: अंग्रेजी, इंग्लिश, इन्डिया, भारत, राजभाषा, हिन्दी, English, Hindi, India

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आज (14 सितंबर) हिंदी दिवस है । इस अवसर पर प्रथमतः देशवासियों, विशेषतः हिंदीप्रेमियों, के प्रति शुभेच्छा संदेश देना चाहता हूं ।

असल में आज हिंदी का जन्मदिन है बतौर राजभाषा के । अन्यथ हिंदी भाषा तो सदियों से अस्तित्व में है । आज के दिन 61 साल पहले उसे राजभाषा होने का गौरव मिलाए और इसी अर्थ उसका जन्मदिन है । उसे वैधानिक सम्मान तो मिला, किंतु ‘इंडियन’ प्रशासनिक तंत्र से वह सम्मान नहीं मिला जो राजभाषा घोषित होने पर मिलना चाहिए था । यह कमोबेश वहीं की वहीं है । और रोजमर्रा के जीवन में उसका जितना भी प्रयोग देखने को मिल रहा है, वह राजभाषा के नाते कम है और जनभाषा होने के कारण अधिक है ।
आज हिंदी का सही माने में जन्मदिन है । जैसे जन्मदिन पर उत्सव का माहौल रहता है, संबंधित व्यक्ति को शुभकामनाएं दी जाती हैं, उसके दीर्घायुष्य की कामना की जाती है, इत्यादि, उसी भांति आज हिंदी का गुणगान किया जाता है, उसके पक्ष में बहुत कुछ कहा जाता हैं । उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है अगले जन्मदिन तक । जैसे जन्मदिन रोज नहीं मनाया जाता है, उसी प्रकार हिंदी की बात रोज नहीं की जाती है । उसकी शेष चिंता अगले हिंदी दिवस तक भुला दी जाती है । लोग रोज की तरह ‘जन्मदिन’ मनाकर सामान्य जीवनचर्या पर लौट आते हैं ।

आज के बुद्धिजीवियों के द्वारा वार्तापत्रों/पत्रिकाओं में हिंदी को लेकर भांति-भांति के उद्गार व्यक्त किए जाते हैं । मेरे पास प्रातःकाल हिंदी के दो दैनिक समाचारपत्र आते हैं, दैनिक हिन्दुस्तान एवं अमर उजाला । मैंने हिंदी से संबंधित उनमें क्या छपा है, इसे देखना/खोजना आरंभ किया । आज के हिन्दुस्तान समाचारपत्र के संपादकीय पृष्ठ पर छपे एक व्यंगलेख ने मेरा ध्यान सर्वाधिक खींचा । उसमें लिखा थाः

“… आज पूज रहे हैं, दिवस मना रहे हैं । कल एक पुरानी पोथी की तरह कपड़े में लपेटकर ऊंचे पर रख देंगे । …”

यह वाक्य कटु वास्तविकता का बखान करता है, जैसा में पहले ही कह चुका हूं । इसी पर आधारित मैंने इस लेख का भी शीर्षक चुना है ।

इसी पृष्ठ पर 75 साल पहले के समाचार का भी जिक्र देखने को मिला, जिसमें तत्कालीन राजकीय निर्णय का उल्लेख थाः “… सिक्कों पर केवल अंग्रेजी (रोमन) एवं उर्दू (अरबी) लिपि ही रहेंगी ।…” अर्थात् देवनागरी लिपि की तब कोई मान्यता ही नहीं थी ।

उक्त समाचारपत्र के अन्य पृष्ठ पर “हिंदी के आईने में कैसी दिखती है हमारी युवा पीढ़ी” नाम का एक लेख भी पढ़ने को मिला । इसमें महाविद्यालय/विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों का हिंदी संबंधी ज्ञान की चर्चा की गयी है । ‘किडनी’ जैसे अंग्रेजी शब्दों, ‘पानी-पानी होना’ जैसे मुहावरों, ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी’ जैसे लेखकों आदि के बारे में छात्रों से जानकारी ली गयी थी । कइयों के उत्तर भाषाई स्थिति की भयावहता का दर्शन कराते हैं । उनका ज्ञान नैराश्यजनक है ।

इस समाचारपत्र में एक स्थान पर सिनेमा एवं टीवी क्षेत्र की कुछ हस्तियों के हिंदी संबंधी विचारों का भी उल्लेख किया गया है । देखिए क्या कहा उन लोगों ने
“आवाम से बात हिंदी में होगी” – महमूद फारूकी
“मैं ख्वाब देखूं तो हिंदी में, मैं ख्याल यदि सोचूं तो हिंदी में” – कैलाश खेर
“हिंदी को प्राथमिक और अंग्रेजी को गौण बनाकर चलें” – रिजवान सिद्दीकी
“मैं उसकी काउंसिलिंग करना चाहूंगा जो कहता है हिंदी में करियर नहीं” – खुराफाती नितिन
“हिंदी बढ़ा देती है आपकी पहुंच” – अद्वैत काला
“बिना हिंदी सीखे नहीं चला काम” – कैटरीना कैफ
“हिंदी ने ही मुझे बनाया” – शाहरूख खान
“टीवी में हिंदीभाषियों के लिए मौके ही मौके” – साक्षी तंवर
“हिंदी तरक्की की भाषा है” – प्रकाश झा
“मेरे सपनों की भाषा है हिंदी” – आशुतोष राणा
“अनुवाद से लेकर अभिनय, सबमें हिंदी ने दिया सहारा” – सुशांत सिंह


इन लोगों के उद्गार उनकी वास्तविक सोच का ज्ञान कराती हैं, या ये महज औपचारिकता में बोले गये शब्द हैं यह जान पाना मेरे लिए संभव नहीं । कम ही विश्वास होता है कि वे सब सच बोल रहे होंगे । फिर भी आशुतोष राणा एवं एक-दो अन्य जनों के बारे में सच होगा यह मानता हूं ।

मेरे दूसरे समाचारपत्र अमर उजाला में काफी कम पाठ्य सामग्री मुझे पढ़ने को मिली । उसमें कही गयी एक बात अवश्य आशाप्रद और जमीनी वास्तविकता से जुड़ी लगती है मुझे । लेखक ने श्री अन्ना के हालिया आंदोलन का जिक्र करते हुए इस बात को रेखाकिंत किया है कि अंग्रेजी की जितनी भी वकालत ‘इंडियन’ बुद्धिजीवी करें, हकीकत यह है कि आम आदमी को वांछित संदेश तभी पहुंचता है जब बात जनसामान्य की जुबान में कही जाती है । हिंदी ऐसी सर्वाधिक बोली/समझी जाने वाली जुबान है । यह वह भाषा है जो देश के अधिकांश क्षेत्रों में समझी जाती है । अन्य स्थानों पर भी समझने वाले मिल जाएंगे और उनकी संख्या बढ़ रही है । गैरहिंदीभाषी क्षेत्रों के कई लोग हिंदी कुछ हद तक इसलिए भी समझ लेते हैं कि उनकी अपनी भाषा का हिंदी से काफी हद तक साम्य है, भले ही वे बोल न सकें ।  आसाम, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र ऐसे ही क्षेत्र हैं । अंग्रेजी के संबोधनों और लेखों के पाठक आम आदमी नहीं होते हैं, अतः बातें सीमित दायरे में और आम आदमी की पहुंच से बाहर रह जाती हैं । अन्ना जी का अंग्रेजी ज्ञान नहीं के बराबर है, फिर भी मराठी पुट के साथ हिंदी में कही गयी उनकी बातें जनमानस तकपहुंच सकीं । इस तथ्य को हमारे राजनेता बखूबी जानते हैं । तभी तो वे चुनावी भाषण हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में देते हैं, शायद ही कभी अंग्रेजी में । (एक सवालः अन्ना के बदले अण्णा क्यों नहीं लिखते हिंदी पत्रकार ? मराठी में तो उसकी वर्तनी यही है !)

अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर हिंदी के राजभाषा बनाए जाने और 1950 की 14 सितंबर की तारीख पर उसके सांविधानिक मान्यता पाने के बारे में भी संक्षिप्त लेख छपा है । अन्य लेख में नौकरशाही पर उनकी अंग्रेजी-भक्ति पर कटाक्ष भी है । श्री मणिशंकर अय्यर का दृष्टांत देते हुए उनकी अंग्रेजीपरस्त सोच की चर्चा की है । दरअसल इस देश की नौकरशाही ही है जो हिंदी को दस्तावेजी भाषा बनने में अड़ंगा लगाती आ रही है । निराशा तो इस बात को देखकर होती है कि जो युवक हिंदी माध्यम से प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति पाते हैं वे भी हीन भावना से ग्रस्त होकर शनैःशनैः अंग्रेजियत के रंग में रंग जाते हैं । वे क्या कभी स्वयं को एवं देशवासियों को इस भ्रम से मुक्ति दिला पाएंगे कि विश्व में सर्वत्र अंग्रेजी ही चलती है । इस देश में जैसा अंग्रेजी-मोह देखने को मिलता है वैसा किसी भी प्रमुख देश में देखने को नहीं मिलता है । भ्रमित नौकरशाही को अंग्रेजी की व्यापकता के अज्ञान से मुक्ति मिले यही मेरी प्रार्थना है ।

मुझे दो-चार दिन पहले एक ई-मेल से इंटरनेट लिंक मिला था, जो एक लेख पर मुझे ले गया जिसमें अंग्रेजी से इतर विश्व की उन भाषाओं का जिक्र है जिन्हें व्यावसायिक कार्य में लिया जाता है । भारतीय भाषाओं में से कोई भी दी गयी सूची में शामिल नहीं है । इस बारे दो-चार शब्द लिखने का मेरा विचार था, लेकिन अब उस पर अगले लेख में ही कुछ बोलूंगा । -योगेन्द्र जोशी

 

अतानु या अतनु? – रोमन लिपि और नामोच्चारण की समस्या

Posted मई 11, 2011 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: अंग्रेजी, भाषा, भाषाविज्ञान, हिन्दी, English, Hindi, language, linguistics, phonetics

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बीते मार्च माह की 26 तारीख अहमदाबाद अवस्थित आई.आई.एम. (इंडियन इंस्टिट्यूट आफ् मैनेजमेंट, भारतीय प्रबंधन संस्थान) में दीक्षांत समारोह था । मुझे भी उस समारोह में बतौर अतिथि के उपस्थित होने का अवसर मिला था । उस आयोजन में देश के माननीय प्रधानमंत्री, डा. मनमोहन सिंह, एवं गुजरात राज्य के माननीय मुख्यमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी, भी मौजूद थे और दोनों ने छात्र, शिक्षक एवं अतिथि समुदाय को संबोधित किया । जहां श्री मोदी ने अपने विचार अलिखित, स्वतःस्फूर्त एवं दमदार तरीके से पेश किये, वहीं डा. सिंह का संबोधन लिखित, महज औपचारिक, एवं नितांत निष्प्रेरक था । डा. सिंह के संबोधन के प्रति निराशाजनक प्रतिक्रिया मैंने कुछएक छात्रों के मुख से सुनीं ।

अस्तु, इस स्थल पर मेरा इरादा उस आयोजन की व्यवस्था, संबोधनों-उद्बोधनों आदि के बारे में चर्चा करने का नहीं है । नामोच्चारण की एक समस्या जो मैंने वहां देखी वह मेरे प्रस्तुत आलेख का विषय है । समारोह के दौरान जब छात्रों को अर्जित उपाधियां प्रदान की जा रही थीं, तब उनके नाम कितने सही उच्चारित हो रहे थे यह ठीक-ठीक बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है । मैं एक-एककर पुकारे जा रहे नामों को बहुत ध्यान से सुन भी नहीं रहा था । किंतु एक नाम, जिसने अनायास मेरा ध्यान खींचा वह था अतानु। असल नाम अतनुया अतनूहै, जो बंगाली समुदाय में पर्याप्त प्रचलित है, दोनों एकार्थी हैं, और मेरी समझ से इनका अर्थ तनुहीन’, ‘बिना देह का’, ‘अशरीरीअथवा अमूर्तहोना चाहिए । वस्तुतः संस्कृत में तनुस्’ (नपुंसक लिंग) तथा तनू’ (स्त्रीलिंग, दीर्घ ऊ की मात्रा) दोनों हैं । प्रचलित भाषाओं में तनुस्को तनु की भांति प्रयोग में लिया जाएगा । किसी पुरुष का नाम ह्रस्व उ के साथ लिखा जाना पारंपरानुरूप है ।

वस्तुतः उस छात्र का नामअतनु राय’ (या रॉय) था । उससे मेरा परिचय पहले ही हो चुका था, अपने बेटे के माध्यम से । संयोग से यह नाम मेरे लिए सुपरिचित था । कोई तीन दशक पहले ठीक इसी नाम का एक छात्र मेरे विश्वविद्यालय के चिकित्सा संस्थान में डाक्टरेटउपाधि के लिए अध्ययनरत हुआ करता था । मेरे पड़ोस में रहने के कारण उससे हमारा अच्छाखासा परिचय था । तब तक यह नाम मेरे लिए पूर्णतः नया और कभी--सुना-हुआ था । उक्त दीक्षांत के अवसर पर संयोग से ठीक उसी नाम-जातिनाम के एक और छात्र से मेरा संक्षिप्त परिचय हो गया था । दीक्षांत आयोजन के पश्चात् मैंने उससे पूछा कि उसका नाम क्या सही पुकारा गया था । तब उसने बताया कि नाम तो अतनु ही है । इस नाम में की विशिष्ट बंगाली ध्वनि निहित है, किंतु अन्य भाषाभाषी अतनुके अनुरूप ही पुकारेंगे ।

उस अवसर पर मेरे जेहन में यह सवाल उठा कि उक्त नाम का सही उच्चरण न कर पाने का क्या कारण रहा होगा । संस्था से जुड़े किसी व्यक्ति से उत्तर पाने की कोशिश मेरे लिए संभव नहीं थी । मैंने स्वयं संभव तार्किक उत्तर सोचने का प्रयास किया । जो मैं समझ पाया वह यों हैः हमारे देश में भले ही घोषित राजभाषा हिंदी हो, लगभग सभी कामकाज अंग्रेजी में ही होते हैं, खास तौर पर शिक्षण संस्थाओं में इस्तेमाल होने वाली वाली छात्र-छात्राओं की सूची तैयार करने में । आईआईएम जैसी संस्था में तो अंग्रेजी से इतर कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो सकता है । रोमन लिपि की एक गंभीर कमी यह है कि इसमें लिखित किसी नाम का सही-सही उच्चारण क्या होगा यह कह पाना कठिन होता है । वस्तुतः हर उस लिपि के साथ ऐसी समस्या होती है, जो ध्वनिमूलक नहीं होती है । अंग्रेजों के यहां नामों की भरमार नहीं है । उस समाज में व्यक्तियों के नाम घूमफिर के वही-वही रहते हैं, अतः वहां के बाशिंदों के नामों की वर्तनी और उनके उच्चारण लोगों को कमोबेश मालूम रहते हैं ।

किंतु हमारे यहां, विशेषतः हिंदू समाज में नामों की विविधता उल्लेखनीय है । हाल के वर्षों में तो एक नया चलन देखने को मिल रहा है, जिसके अनुसार बच्चों के नाम खोज-खोजकर ऐसे चुने जाने लगे हैं जो नितांत नये हों, कभी सुने न गये हों, और जिस नाम का दूसरा व्यक्ति ढूढ़ने पर भी न मिले । अपनी देशज लिपियों में इन्हें लिखने और उसके अनुसार उच्चारित करने में कोई परेशानी नहीं होती है । किंतु रोमन में व्यक्त किये जाने पर इन नामों को सही-सही पुकारना कठिन होता है, विशेषतः जब वे कभी पहले सुने ही न गये हों । अपने देश के कामकाज में रोमन लिपि को ऐसे नहीं ढाला गया है कि हमारी अलग-अलग ध्वनियों को स्पष्टतः भिन्न रोमन लेटर/लेटर्ससे व्यक्त किया जा सके । आप अंग्रेजी `a’ को देखकर निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि वह की ध्वनि व्यक्त करता है या की । कुछ ऐसा ही `i’ के मामले में भी है । वस्तुतः ऐसे अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनके उच्चारण में संदिग्धता का सामना करना पड़ सकता है । क्या आप ऋतुएवं रितुको रोमन में स्पष्टतः भिन्न वर्तनी से व्यक्त कर सकते हैं ? रोमन में बुद्ध (बुद्धा?) एवं बुड्ढा में फर्क कर पाना कठिन है । इस प्रकार के अनेकों उदाहरण देखने को मिल जाएंगे । अवश्य ही विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग का संभव है, किंतु आम लेखन में उनका प्रयोग कोई नहीं करता है, और न ही उनका प्रयोग सुविधाजनक होता है ।

लेकिन भारतीय जनमानस अंग्रेजी एवं उसकी लिपि रोमन (या लैटिन) के समक्ष इस कदर नतमस्तक है कि उसे वे अमृत तुल्य, जीवनरक्षक, तथा अपरिहार्य लगते हैं । उसके लिए भारतीय लिपियों का ध्वन्यात्मक होना कोई महत्त्व नहीं रखता है । अब तो सर्वत्र अंग्रेजी एवं रोमन का ही बोलबाला नजर आता है । हिंदी आम बोलचाल तक सीमित है - वह भी अंग्रेजी शब्दों की भरमार के साथ - और वह दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकी है । अतः पढ़े-लिखे भारतीयों - बेहतर होगा इंडियनों कहना - का एक वर्ग ऐसा उभर चुका है जिसका हिंदी एवं देवनागरी का ज्ञान अत्यल्प है और अपने अज्ञान पर उसे खेद नहीं बल्कि गर्व का अनुभव होता है । यह वर्ग देशज साहित्य से परहेज रखता है; वह आम तौर पर भारतीय लिपियों में निबद्ध समाचारपत्रों-पत्रिकाओं को नहीं पढ़ता है; उसके पुस्तकसंग्रह में शायद ही कोई देशी भाषा की पुस्तक देखने को मिले । इस वर्ग के लोगों का देशी भाषाओं के शब्दों पर आधारित नामों का ज्ञान अपर्याप्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी । मैं समझता हूं कि आई.आई.एम. जैसी संस्थाओं में बहुत कम लोग होंगे जो आजकल प्रचलन में लिए जा रहे अपारंपरिक एवं असामान्य नामों का ठीक-ठीक उच्चारण करने में समर्थ होंगे

मैंने ‘अतनु रॉयका उदाहरण पेश किया है । उस दीक्षांत समारोह से संबद्ध दीक्षीत छात्रों की सूची में मुझे ऐसे नाम लिखे हुए मिले जिनका उच्चारण क्या होगा यह मैं तय नहीं कर सका । कुछएक यों हैं:Ashtha Agarwalla (आस्था/अष्ठ अगरवाल्ला/अगरवाल/…), Aarthy Sridhar (आरती/आर्ती/आरथी/… श्रीधर/स्रीधर), Astha Modi (आस्था/अष्ठा मोदी), Anil Meena (अनिल मीणा/मीना), Mansi Chilalia (मानसी/मांसी चिललिया/चिलालिआ), Pritika Padhi (प्रीतिका पाढी/पाधी), V. M. Avinass Kumar (वी. एम. अविनाश/अविनास्स कुमार), Maneka Bhogale (मेनका/मनेका भोगले/भोगाले) हाल में मुझे अपने परिचितों के बच्चों के ये अपरिचित से नाम सुनने को मिलेः अरविंदाक्षाएवं आयुषी। पहला नाम रोमन में सही-सही कैसे लिखा जाना चाहिए Arvindaksha या Aravindaksha ? और दूसरे नाम की उचित वर्तनी क्या होनी चाहिए Ayushi या Ayushee ? जिसने इन नामों को पहले कभी सुना न हो और जिसे संस्कृत का थोड़ा-बहुत ज्ञान न हो उसके लिए इनका सही उच्चारण संभवतः कठिन हो । लेकिन देवनागरी में लिखे होने पर यह समस्या नहीं रहती है, भले ही इन सार्थक नामों के अर्थ मालूम न हों । (अरविंदाक्ष = अरविंद + अक्ष; उससे स्त्रीलिंग में अरविंदाक्षा, कमल के समान नयन वाली । आयुषी संस्कृत के नपुंसक शब्द आयुस्’ = आयु से बना हुआ प्रतीत होता है स्त्रीत्व का बोध कराने के लिए । मैं कह नहीं सकता कि संस्कृतज्ञ इसे स्वीकार्य शब्द मानेंगे कि नहीं; आयुष्मान्, आयुष्मती अवश्य प्रचलित हैं ।)योगेन्द्र जोशी

अपने छात्रों की अंग्रेजी के नमूने ऐसे भी होते हैं!

Posted फ़रवरी 24, 2011 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: अंग्रेजी, भारत, भाषा, राजभाषा, हिन्दी, English, Hindi, language

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अपना एक पुराना शौक रहा है कि कहीं कोई दिलचस्प बात नजर आ गयी तो उसकी जानकारी को सहेजकर रख लूं । इस मामले में अखबार की कटिंग सहेजना सबसे आसान रहा है । अन्यथा संबंधित दस्तावेज की फोटोकापी करके काम चलाना विकल्प रहा है । इधर जब से स्कैनर और इलेक्ट्रानिक कैमरा जैसे साधन बटोर लिया हूं, दस्तावेजों की अंकीय (डिजिटल) कापी बनाकर कंप्यूटर पर सहेजना सुविधाजनक हो गया है ।

दो-तीन रोज पहले जब मैंने आलमारी में संजोये कागजपत्रों को उलटा-पुलटा तो कुछएक जीरॉक्स कागजात मिले । गौर से देखा तो पाया कि वे परीक्षार्थियों की उत्तर-पुस्तकाओं के कुछ चुने हुए अंशों की फोटोकापी हैं । याद आया कि उनमें से कुछ के उत्तरों से मैं इतना भावविभोर हुआ कि उनकी आंशिक प्रति बना ली । मेरे लिए यह बात अधिक दिलचस्प नहीं थी कि सवालों के उनमें प्रस्तुत उत्तर कितने सही या गलत रहे । मुझे तो उत्तरों के अंग्रेजी पाठ कहीं ज्यादा दिलचस्प लगे जो मेरी समझ से मीलों दूर थे । नमूने प्रस्तुत हैं, देखिए:

ये नमूने अंदाजन 15-16 साल पहले के होंगे । घटना की तारीखें ठीक-से अब याद नहीं, और वह बहुत माने भी नहीं रखती हैं । तब किसी समय मैंने अपने विश्वविद्यालय की बी.एससी. कक्षा के भौतिकी (फिजिक्स) के एक प्रश्नपत्र की उत्तर-पुस्तिकाओं का मूल्यांकन किया होगा इतना जरूर कह सकता हूं । उनमें से कुछ पुस्तिकाओं में प्रश्नों के उत्तरों को देखकर मेरा माथा जरूर ठनका होगा और मैंने कुछएक के कतिपय अंशों की फोटोकापी कर ली होगी ।

अलग-अलग पुस्तिकाओं के दिये गये मात्र दो-तीन पंक्तियों में क्या लिखा है यह समझने के लिए आपको भौतिकी का अध्येता होने अथवा ‘न्यूक्लियर फ्यूजन’, ‘जेनर डायोड’, ‘एक्स-रेज’ आदि से सुपरिचित होने की आवश्यकता नहीं है । आपको तो अपने अंग्रेजी के सीमित-असीमित ज्ञान के आधार पर यह देखना है कि जो लिखा है उसमें कुछ अर्थ आप ढूढ़ पा रहे हैं कि नहीं । मेरी तरह आपको भी हार माननी पड़ेगी ।

मेरे कुछ छात्रों की अंग्रेजी इसी स्तर की रही है । मेरे अनुमान से उनकी संख्या कम से कम 10% तो रही ही होगी । मैंने इस बारे में कभी सर्वेक्षण तो नहीं किया किंतु प्रयोगशाला में विषय संबंधी प्रश्नोत्तरों को सुनकर और अंग्रेजी को लेकर उनकी असहजता देखकर मुझे ऐसा ही लगा है । कुछ ने तो खुलकर कबूला भी है कि उन्हें अंग्रेजी से परेशानी होती है । निःसंदेह छात्रों में कुछएक की अंग्रेजी ठीक-ठाक भी मैंने पाई है । परंतु जिसे मैं उत्तम दर्जे की कहूं ऐसी अंग्रेजी केवल अपवाद रूप में ही मैंने देखी है, भले ही कई छात्र अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से पढ़कर क्यों न आए हों । दरअसल अब अंग्रेजी की स्कूली शिक्षा में व्याकरण पर जोर काफी कम रहता है, और नतीजन भाषा के इस पक्ष की मजबूती अपर्याप्त रहती है । जिन छात्रों का नमूना प्रस्तुत है उनका दुर्भाग्य यह रहा है कि वे कमजोर, गरीब, तथा अपेक्षया कम शिक्षित परिवारों से आते हैं, और अंग्रेजी भाषा की उनकी शैक्षिक नींव बहुत कमजोर रहती है । आरंभिक शिक्षा क्षेत्रीय भाषा-माध्यम से होने के कारण, अंग्रेजी सुधारने के अपर्याप्त संसाधनों/प्रयासों के कारण जब उन्हें स्नातक कक्षा में अनायास अंग्रेजी माध्यम से पठन-लेखन करना पड़ता है तो परेशानी शुरू हो जाती है । अंग्रेजी पुस्तकों को कुछ हद तक वे भले ही पढ़-समझ लें, अपनी जानकारी को अभिव्यक्त करने की उनकी क्षमता औसत से कहीं नीचे रहती है

मैंने इंटरनेट से जानकारी लेनी चाही कि अपने ‘महान्’ देश में कितने लोग ‘इंग्लिश स्पीकर्स’ हैं, तो विकीपीडिया ने 12% का आंकड़ा प्रदान किया । अन्य वेबसाइटों पर भी कुछ इसी प्रकार का आंकड़ा देखने को मिला । (उदाहरण के लिए यहां देखें ।) ध्यान दें यह आंकड़ा ‘स्पीकर्स’ यानी अंग्रेजी बोल सकने वालों की तादात का है । मतलब यह है कि हर 10-12 जनों में से एक व्यक्ति अंग्रेजी बोल सकता है । मुझे नहीं लगता है कि यह आंकड़ा सही है । पता नहीं किस आधार पर यह जानकारी प्रस्तुत की गयी है । इस विषय में मेरे अपने तर्क हैं ।

भारत में अंग्रेजी जनभाषा नहीं हैइसे लोग घर-परिवार में, अड़ोस-पड़ोस से, अथवा दोस्तों-परिचितों आदि से नहीं सीखते हैं । आम तौर पर बच्चे अंग्रेजी का ज्ञान स्कूलों की औपचारिक पढ़ाई से पाते हैं । वे रोमन लिपि में लिखना और अंग्रेजी में लिखित पाठ पढ़ना तो सीख जाते हैं, किंतु उनके अंग्रेजी में बोल पाने पर कोई जोर नहीं रहता है । उनकी लेखन क्षमता का मूल्यांकन अवश्य होता है । (कदाचित् तथाकथित अंग्रेजी स्कूलों में बहुत कुछ होता होगा, लेकिन तब भी स्कूलों से बाहर तो स्थानीय भाषा ही बच्चे सीखते हैं ।)

किसी भाषा के सीखने की चार स्पष्टतः भिन्न किंतु घनिष्ट तौर पर संबद्ध 4 चरण होते हैं: समझना (to understand), पढ़ना (to read), लिखना (to write), और बोलना (to speak) । औपचारिक पढ़ाई के माध्यम तथा पुस्तक-पत्रिकाओं से सीखी भाषा के मामले में ये चार चरण मेरे मत में इसी क्रम में कठिन से कठिनतर होते हैं । निरक्षर लोगों के मामले में पढ़ने और लिखने की बात नहीं की जा सकती है । उनकी भाषा अपने परिवेश से सीखी हुई होती है और सामान्यतः वह प्रचलित एवं जनभाषा होती है, या इतर भाषाभाषियों के संपर्क से सीखी गयी होती है । मेरी इस चर्चा के केंद्र में निरक्षर लोगों से अलग महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में पढ़ने-लिखने वाले छात्र हैं । उनके मामले में पढ़ पाना तथा उसे समझ पाना सबसे पहले होता है, और उसी के आधार पर वे आगे बढ़ पाते हैं । उसी के बाद वे लिखने-बोलने की बात सोच सकते हैं । पर्याप्त भाषा ज्ञान एवं अभ्यास के अभाव में उनके लिए लिख पाना आसान नहीं होता, और बोल पाना तो सर्वाधिक कठिन होता है, क्योंकि स्वतःस्फूर्त विचारों को बिना रुकावट के प्रवाह के साथ व्यक्त कर पाने के लिए पर्याप्त अभ्यास चाहिए, जो कम ही लोगों के लिए संभव होता है । लिख पाना अपेक्षया सरल होता है, क्योंकि उसके लिए प्रवाह की गति तेज एवं अबाधित हो यह आवश्यक नहीं । आपके पास रुक-रुककर और सोच-सोचकर लिखने का अवसर होता है, आवश्यकतानुसार विराम लेते हुए । यदि आप बोल सकते हैं तब लिख पाने में कठिनाई का सवाल ही नहीं उठता है

अगर यह माना जाए कि इस देश के 10-12% लोग अंग्रेजी बोल पाते हैं, जैसा विकीपीडिया जैसी जालस्थलों पर प्राप्य जानकारी बताती है, तो अवश्य ही इससे अधिक लोग अंग्रेजी लिख सकने में समर्थ होंगे । किंतु स्नातक (ग्रैजुएशन) कक्षा के छात्रों के साथ के अपने अनुभवों से मुझे नहीं लगता है कि देश में इतने अधिक लोग अंग्रेजी लिख पाते होंगे । महानगरीय जीवन जी रहे और कार्यालयों में अंग्रेजी में तैयार दस्तावेजों पर सिर खपा रहे लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि अंग्रेजी में लिख पाने वाला जनसमुदाय वाकई विशाल है । किंतु व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह शंका जरूर है कि रोजमर्रा के दस्तूरी कामकाज से हटकर किसी मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से बोल पाना तो दूर कुछ लिख पाना भी अंग्रेजी जानने का दावा करने वाले अधिकतर लोगों के लिए शायद ही संभव हो । ऊपर दिये गये नमूने जैसी अंग्रेजी शायद अधिसंख्य लोगों की न हो, किंतु संतोषप्रद तथा स्तरीय लेखन-क्षमता बहुत कम लोगों के पास होगी देश में उनकी संख्या बमुश्किल 5-6 करोड़ भी शायद ही हो । – योगेन्द्र जोशी

कतिपय परिभाषाएं (भाग 2): सप्ताह, सप्ताहांत, दिवस-नाम, ग्रह, एवं छायाग्रह

Posted जनवरी 1, 2011 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: भाषा, राजभाषा, हिन्दी, Hindi, language

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विगत 24 ता. (दिसंबर 2010) की ब्लॉग प्रविष्टि में शतक, शताब्दी, एवं सहस्राब्दि की परिभाषाओं पर मैंने अपना मत व्यक्त किया था । उसी क्रम में मैं सप्ताह, साप्ताहिक दिनों के नाम और उनसे संबद्ध ग्रहों एवं छायाग्रहों की चर्चा करने जा रहा हूं । इनकी बात करने से पूर्व अंग्रेजी में बहु-प्रचलित ‘द टीन्ज’ का उल्लेख कर लेना भी मुझे समीचीन लगता है, जिसे पिछली पोस्ट में शामिल किया जा सकता था ।

‘द टीन्ज’

अंग्रेजी में टीन्ज (teens) जममदेद्ध शब्द का भी बहुत महत्त्व है । यह मानव जीवन के उस काल को व्यक्त करता है जब व्यक्ति अवयस्कता से वयस्कता की ओर बढ़ता है । टीन्ज वस्तुतः 13 से 19 तक के अंतराल को इंगित करता है । इस समूह के इस नाम का आधार है इनमें ‘टीन्’ का विद्यमान् होना – थर्टीन्, फॉर्टीन्, … नाइन्टीन् (thirteen, fourteen, … nineteen) । किशोरों और उनसे कुछ अधिक अवस्था वालों के बारे में बात करते समय अंग्रेजी में इस शब्द का प्रयोग बहुतायत से होता है । इस वय के जनों को अंग्रेजी में टीनेजर पुकारा जाता है । किसी शताब्दी से संबंधित वर्षों के लिए भी यह प्रयुक्त हो सकता है । ‘ड्यूरिंग द टीन्ज आफ् द लास्ट सेंचुरी’ जैसे वक्तव्य संभव हैं । हिंदी में इसका समानार्थी शब्द कदाचित् नहीं है । शताब्द के संदर्भ में दूसरे दशक (11-20) से काम चल सकता है । उम्र के संदर्भ में टीन्ज के आरंभिक वर्षों के लिए किशोरावस्था (11 से 15 वर्ष) प्रयुक्त हो सकता है । उम्र के अलग-अलग पड़ाव दर्शाने के लिए अन्य शब्द भी हिंदी तथा अंग्रेजी में मिलते हैं, जैसे शैशवावस्था (infancy), बाल्यावस्था (childhood), युवावस्था (youth),प्रौढ़ावस्था (middle age), वृद्धावस्था (old age) मुझे इन शब्दों की स्पष्ट एवं असंदिग्ध व्याख्या देखने को अभी नहीं मिली है ।

सप्ताह, साप्ताहिक दिवस नाम

परिभाषा से सात दिनों के समाहार को एक सप्ताह कहा जाता है । जैसे एक वर्ष को महीनों और फिर तारीखों में बांटा गया है, वैसे ही सप्ताहों में भी बांटा जाता है । जैसे महीने के दिनों (तारीखों) को क्रमबद्ध संख्यात्मक नामों से जाना जाता है, वैसे ही सप्ताह के दिनों को ग्रहों से संबद्ध नामों से पुकारा जाता है (रवि, सोम/चंद्र, मंगल/भानु, बुध, गुरु/वृहस्पति, शुक्र, शनि; अंग्रेजी में Sun, Mon, Tues, Wednes, Thurs, Fri, Satur) । ये सभी सही मानों में ग्रह नहीं है । चंद्र पृथ्वी का उपग्रह कहलाता है, जब कि रवि अर्थात् सूर्य एक नक्षत्र या तारा (star) है और शेष उसके उपग्रह । कदाचित् सप्ताह की अवधारणा तब मानव विचार में आई होगी जब सभी ग्रहों का ज्ञान उसे नहीं हो पाया होगा । अन्यथा सप्ताह में दिवसों की संख्या अधिक होती, क्योंकि ग्रह तो और भी हैं । (सूर्य से निकटता के अनुसार क्रमशः बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगल, वृहस्पति, शनि, यूरेनस (वरुण), नेपच्यून (अरुण?), प्लूटो (यम) – जिसे अब ग्रह नहीं माना जा रहा है; Mercury, Venus, Earth, Mars, Jupiter, Saturn, Uranus, Neptune, Pluto)

जब ग्रहों की बात की जा रही हो तो छायाग्रहों का जिक्र करना समीचीन होगा । भारतीय ज्योतिष में नवग्रहों का उल्लेख मिलता है । (ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार ग्रह हमारे जीवन की दशा-दिशा निर्धारित करते हैं । एक उक्ति भी हैः जामाता दशमो ग्रहः) सात ग्रह तो वही हैं जिनके नाम साप्ताहिक दिनों से संबद्ध हैं । दो अन्य ग्रह हैं राहु एवं केतु । ये दोनों वास्तव में भौतिक पदार्थ से बने आकाशीय पिंड नहीं हैं । ये तो असल में अमूर्त ज्यामितीय वस्तुएं मात्र हैं मैंने कभी यह सुना या पढ़ा था कि इन्हें छायाग्रह के नाम से भी जाना जाता है, किंतु इस नाम के प्रति में आश्वस्त नहीं हूं । वास्तव में ये सूर्य के परितः चक्रमण करती पृथ्वी की कक्षा या परिपथ के तल के साथ चंद्रमा के पृथ्वी के सापेक्ष परिपथ के अनुच्छेद ‘बिंदु’ हैं । मौलिक स्तर पर इन दोनों में कोई अंतर नहीं है । किसी एक को राहु तथा दूसरे को केतु माना जा सकता है । इनमें जो पृथ्वी से सूर्य की ओर हो वह सूर्यग्रहण का कारण और जो विपरीत दिशा में हो वह चंद्रग्रहण के लिए जिम्मेदार होता है, यदि वे कभी सूर्य-पृथ्वी को मिलाने वाली रेखा के संयोग से पर्याप्त निकट आ जाएं । राहु एवं केतु पृथ्वी के सापेक्ष सदैव विपरीत दिशाओं की राशियों में स्थित रहते हैं, जैसा हर जन्मकुंडली (horoscope) में देखने को मिलता है ।

कार्यदिवस, सप्ताहांत

मास के दिनों की संख्या असमान रखी गयी है, किंतु सप्ताह के दिन सुनिश्चित और केवल 7 हैं । मास एवं सप्ताह, दोंनों ही का अपना-अपना महत्त्व है । जिन क्षेत्रों में प्रतिदिन कामकाज नहीं होता है, जैसे सरकारी दफ्तरों में, वहां साप्ताहिक अवकाश का चलन है । शायद यह परंपरा सारे विश्व में अपनाई जाने लगी है । पाश्चात्य देशों में प्रायः सप्ताह के पांच दिन (सोम से शुक्र तक) कार्य होता है और इन्हें साप्ताहिक कार्यदिवस (week days) के नाम से जाना जाता है । उन देशों में बचे हुए दो दिन, शनि एवं रवि, आराम करने या बाहर घूमने-फिरने के रूप में देखा जाता है । इन्हें सप्ताहांत (weekend) की संज्ञा दी गयी है ।

साप्ताहिक कार्यदिवसों एवं सप्ताहांत की उपर्युक्त परिभाषा पूर्णतः स्थापित नहीं है । हमारे देश में आज भी कई क्षेत्रों में छः कार्यदिवसों वाली पुरानी परंपरा यथावत् चल रही है । इन क्षेत्रों के लिए सप्ताहांत का मतलब केवल रविवार से रह जाता है । सप्ताह का प्रथम दिन रविवार और अंतिम शनिवार मानने की परंपरा चली आ रही है । द्विदिवसीय सप्ताहांत की ऊपर दी गयी परिभाषा तर्कपूर्ण नहीं लगती है, कारण कि इसका शनिवार  तो बीत रहे सप्ताह का अंतिम दिन होता है, जब कि रविवार आने वाले सप्ताह का पहला दिन । इस प्रकार वे मिलकर एक ही सप्ताह का अंत नहीं कहे जा सकते हैं ।

अगली पोस्ट में ग्रिगॉरियन कलेंडर मास से इतर अपने देश में प्रचलित सौरमास एवं चांद्रमास की चर्चा की जाएगी । – योगेन्द्र जोशी

कतिपय परिभाषाएं (भाग 1): सहस्राब्द, शताब्द, दशाब्द, दशक आदि

Posted दिसम्बर 23, 2010 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: भाषाविज्ञान, राजभाषा, हिन्दी, Hindi, Hindi Literature

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अपने ईमेल के माध्यम से इंटरनेट पर चल पड़ी एक बहस मुझे कुछ दिनों पहले देखने-पढ़ने मिली । मुद्दा था क्या साठ का दशक और छठा (छठां, छठवां) दशक एक ही चीज हैं? किस अंतराल को छठा दशक कहा जाएगा? इत्यादि । इस विषय पर संबंधित जनों के मध्य मुझे मतैक्य का अभाव दिखा । मुझे लगा कि बहस को अधिक व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखते हुए उस पर किंचित् विचार किया जाना चाहिए । उसी बहस से प्रेरित होकर, अपने पास उपलब्ध शब्दकोशों, अन्य सामग्री और इंटरनेट का सहारा लेकर मैंने इन शब्दों के अर्थ स्थापित करने की कोशिश की । उसी की चर्चा आगे कर रहा हूं ।

शतक, शताब्द, सेंचुरी (century)

इस विषय पर अपने विचारों का आरंभ मैं शतक एवं शताब्द से करता हूं । परिभाषा के अनुसार शतक का अर्थ है ‘सौ का समाहार या समूह’ । अंग्रेजी में इसका समानार्थी है सेंचुरी । गिनती करने योग्य किस मूर्त/अमूर्त वस्तु की बात की जा रही उसका उल्लेख शतक शब्द के साथ किया जाना चाहिए, जैसे क्रिकेट के ‘रनों का शतक’ और ऐतिहासिक महत्त्व के सौ वर्षों के अंतराल के लिए ‘वर्षों का शतक’ । इनके लिए अंग्रेजी में हम क्रमशः ‘सेंचुरी आफ् रन्ज’ एवं ‘सेंचुरी आफ् इयर्ज’ प्रयोग में लेते हैं । अंग्रेजी में अक्सर सेंचुरी मात्र कहना पर्याप्त होता है प्रसंग के आधार पर । इस प्रकार ‘फलां खिलाड़ी ने सेंचुरी बनाई’ और ‘21वीं सेंचुरी में एशियाई देशों का वर्चस्व रहेगा’ कहने भर से स्पष्ट हो जाता है कि बात रनों की है या वर्षों की ।

मेरी जानकारी में संस्कृत एवं हिंदी में शतक का प्रयोग क्रिकेट के रनों की संख्या के संदर्भ में तो आम तौर पर होता ही है, किंतु सौ वर्षों को व्यक्त करने के लिए इसका इस्तेमाल मैंने कम ही देखा है, यद्यपि ऐसा किया जा सकता है । इन भाषाओं में वर्ष शब्द का उल्लेख अधिकांशतः स्पष्ट रहता है । संस्कृत में प्रायः अब्द (= वर्ष) प्रयुक्त होता है । तदनुसार शताब्द = (शत+अब्द) सौ वर्षों के अंतराल को इंगित करना है । संस्कृत में सामासिक शब्द शताब्द का वैकल्पिक रूप शताब्दी भी है । हिंदी में कदाचित् शताब्दी ही लोगों के द्वारा प्रयोग में अधिक लिया जाता है ।

संस्कृत में शताब्द या शताब्दी के लिए शतवर्ष अथवा वर्षशत भी विकल्पतः उपलब्ध हैं, किंतु इन्हें हिंदी में मैंने नहीं देखा-सुना है । हिंदी में फारसी मूल के सदी शब्द, जो वस्तुतः सैकड़े को इंगित करता है, का इस्तेमाल भी आम प्रचलन में है ।

जैसा पहले कहा गया है संस्कृत-हिंदी में शताब्दी एवं अंग्रेजी में सेंचुरी सौ वर्षों के समूह को व्यक्त करता है । सैद्धांतिक दृष्टि से इस सौ वर्ष के अंतराल का आंरभ किसी भी वर्ष से आरंभ हो सकता है, जैसे 1934 से 2033 तक (दोनों) शामिल । किंतु ऐसा प्रयोग लगभग नहीं के बराबर दिखता है; कदाचित् इसकी आवश्यकता कम रहती है । ये शब्द अधिकतर मौकों पर विशिष्ट अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, जैसे ईसवी सन् 1901 से 2000 तक । इस प्रकार के प्रयोग में पूरे काल को 20वीं शताब्दी, सदी अथवा सेंचुरी के नाम से पुकारा जाता है । याद रहे कि आम बोलचाल में गिनतियां 1 से प्रारंभ की जाती है और सैकड़ा (100) तक पहुंचने पर 100 पूरे हो जाते हैं । शताब्दी का इस प्रकार परिभाषित किया जाना स्वाभाविक एवं आम समझ के अनुरूप लगता है ।

आजकल कुछ लोग शताब्दी को शून्य से गिनना अधिक उपयुक्त मानते हैं । उनके अनुसार 20वीं सदी को 1900 से 1999 तक गिना जाना चाहिए । कंप्यूटर विज्ञानियों की दृष्टि में इसे तर्कसंगत कहा जाएगा, क्योंकि वे गिनतियां 0 से आंरभ करते हैं (वर्ष yy00 से yy99) । लेकिन सदी/शताब्दी की पारंपरिक परिभाषा पहले वाली ही है । संप्रति हम 21वीं (सन् 2001 से 2100) में चल रहे हैं ।

दशक, दशाब्द, डेकेड (decade)

अब मैं दशक शब्द पर आता हूं, जो मेरी चर्चा के केंद्र में है । दशक, जिसे अंग्रेजी में डेकेड कहा जाता है, मूलतः दहाई की संख्या को व्यक्त करता है । किंतु व्यवहार में यह ऐतिहासिक या राजनैतिक घटनाओं के संदर्भ में शताब्द या सेंचुरी की भांति विशिष्ट अर्थ में स्थापित हो चुका है । यह 10 वर्षों के अंतराल को दर्शाता है, जो सामान्यतः किसी भी वर्ष से आरंभ हो सकता है, यथा सन् 1998 से 2007 (दोनों सम्मिलित) । ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट करना आवश्यक होगा कि वक्ता/लेखक का तात्पर्य किस अंतराल से है । मैंने हिंदी लेखों या संभाषणों में दशाब्द/दशाब्दी का प्रयोग शताब्द/शताब्दी की तरह नहीं देखा-सुना है । कदाचित् इसके स्थान पर दशक ही अधिक लोकप्रिय हो चुका है । जब हम छठे-सातवें दशक अथवा साठ-सत्तर के दशक आदि की बात करते हैं तो समय का अंतराल स्वयं परिभाषित हो जाता है । परंतु पाठकों/श्रोताओं की शंका यह हो सकती है कि संबंधित दशक का आरंभ किस वर्ष से माना जाए । इस शंका का समाधान खोजने के लिए मैं इनके सदृश अंग्रेजी के शब्दों की चर्चा का सहारा ले रहा हूं ।

अंग्रेजी में ट्वेंटीज्, थर्टीज्, … नाइंटीज् (twenties, thirties, … nineties) का प्रयोग आम प्रचलन में है । परिभाषा के अनुसार (जैसा शब्दकोशों में देखने को मिलता है) सिक्स्टीज् का अर्थ है वे संख्याएं जिनमें सिक्स्टी यानी साठ (60) मौजूद है, या दूसरे शब्दों में वे जो सिक्स्टी में शून्य से लेकर नौ तक के अंक जोड़ने से प्राप्त होते हैं । ये हैं सिक्स्टी से लेकर सिक्स्टी-नाइन तक, अर्थात् साठ से लेकर उनहत्तर तक । संयोग से इस पद्धति के अनुसार बीस के नीचे के दशक के लिए उपयुक्त शब्द उपलब्ध नहीं है ।

संख्याओं को व्यक्त करने की जो दशमलव प्रणाली हिंदी-संस्कृत में प्रचलित है मूल रूप से वही अंग्रेजी में भी प्रयुक्त होती है । इसलिए अंग्रेजी में दशकों का जैसे नामकरण किया गया है ठीक उसी के तुल्य हिंदी में भी होना चाहिए । तदनुसार मैं समझता हूं कि सिक्स्टीज् को साठ का दशक कहा जाना चाहिए, अर्थात् वे संख्याएं जो साठ में 0 से लेकर 9 तक जोड़ने से मिलती हैं । दूसरे शब्दों में साठ से लेकर उनहत्तर तक के काल को साठ का दशक कहा जाना चाहिए । इसी प्रकार बीस, तीस, आदि के दशक भी परिभाषित होंगे । वस्तुतः देखा जाए तो अंग्रेजी के सिक्स्टी-वन, सिक्स्टी-टू, सिक्स्टी-थ्री … में जो भाव व्यक्त होते हैं वही हिंदी के इकसठ, बासठ, तिरसठ … में भी निहित हैं । वस्तुतः ये संख्याएं एक-साठ, दो-साठ, तीन-साठ … के ही विकारग्रस्त उच्चारण वाले यानी अपभ्रंश शब्द हैं । इन संख्याओं में साठ की ध्वनि सठ के रूप में देखने को मिलती है ।

निष्कर्ष यह है कि हिंदी का साठ का दशक अंग्रेजी का सिक्स्टीज् है और साठ से लेकर उनहत्तर के अंतराल को इंगित करता है ।

यह सुझाया जा सकता है कि उनसठ (59) के सठ को अहमियत देते हुए उनसठ से अढ़सठ तक के अंतराल को साठ का दशक माना जाना चाहिए । ऐसा करना समीचीन नहीं होगा । ध्यान दें कि उपरिपरिभाषित साठ के दशक का अंतिम सदस्य उनहत्तर है, जो उच्चारण और निहितार्थ के अनुसार साठ के कम और सत्तर के अधिक निकट प्रतीत होता है । इसका कारण है संख्या 69 के लिए संस्कृत में स्वीकृत नाम एकोनसप्तति = एक+ऊन+सप्तति है, जिसमें ऊन का अर्थ है कम या घटाकर और सप्तति माने सत्तर । एकोनसप्तति = एक-कम-सत्तर । एकोनसप्तति का ऊनसप्तति होते हुए अपभ्रंश बन गया उनहत्तर । संस्कृत का इसे दोष कहें या विशिष्टता कि इस भाषा में उन्नीस, उनतीस … को बड़े तर्कसंगत तरीके से लिखा तो जाता है 19, 29, …, अंक 9 के प्रयोग के साथ, ठीक वैसा ही जैसे 11, 12, …21, 22, … आदि, किंतु बोला जाता है एक-कम-बीस, एक-कम-तीस … के अनुरूप । इन प्रश्नगत संख्याओं को नवदश (या नौदस), नवबीस (या नौबीस) … जैसे संबोधनों से पुकारा जा सकता है । ऐसा क्यों नहीं हुआ इसका कारण खोजना ऐतिहासिक शोध का विषय है ।

एक और बात ज्ञातव्य है । संस्कृत में 10 से 19 तक की संख्याएं क्रमशः दश, एकादश, द्वादश, … अष्टादश, एकोनविंशति लिखे जाते हैं । (एकोनविंशति को सिद्धांततः नवदश लिखा जा सकता है, पर लिखा नहीं जाता!) । स्पष्ट है कि ये सम्मिलित रूप से दश का दशक परिभाषित करते हैं । मैं समझता हूं कि हिंदी के ग्यारह, बारह, … इनके ही अपभ्रंश है । दश के विकृत रूप दह (मराठी में दहा) के आधार पर चौदह और चतुर्दश के बीच का संबंध काफी साफ नजर आता है ।

अब छठे या सातवें दशक का क्या अर्थ समझा जाए इसकी चर्चा । जैसा पहले कहा गया है पारंपरिक तौर पर 1 से 100 तक का अंतराल एक शतक बनाता है । इसे दशकों में तर्कसंगत तरीके से बांटने का मतलब होगा कि 1 से लेकर 10 तक के अंतराल को पहला दशक, 11 से 20 तक दूसरा दशक आदि परिभाषित करना । तदनुसार छठा दशक 51 से 60 तक और सातवां 61 से 70 तक के अंतराल को व्यक्त करेंगे ।

इस विमर्श से स्पष्ट है कि सातवां दशक (61 से 70) और साठ का दशक (60 से 69) लगभग समान हैं किंतु ये पर्याय  नहीं हैं । आवश्यक नहीं है कि यह बारीक अंतर सदैव बहुत माने रखे ।

सहस्राब्द (millennium)

दशक एवं शताब्द की तर्ज पर सहस्राब्द की परिभाषा भी प्रचलन में है । एक हजार वर्ष के काल को सहस्राब्द कहा जाता है । जब पहले-दूसरे सहस्राब्द की बात होती है तो विशिष्ट अर्थ ग्रहण कर लेते हैं । सन् 1 से सन् 1000 तक का कालखंड पहला सहस्राब्द । इस समय बीते 2001 से आरंभ हुई तीसरी सहस्राब्दी चल रही है ।

अगली पोस्ट में सप्ताह, साप्ताहिक दिवस, ग्रह, छायाग्रह आदि की चर्चा की जायेगी । – योगेन्द्र जोशी

क्या है ‘possibilianism’\ उदाहरण शब्द रचना का और अंग्रेजी के कतिपय नवीनतम शब्द

Posted नवम्बर 29, 2010 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: अंग्रेजी, इंग्लिश, भाषा, English, language

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कुछएक हफ्तों पहले मैंने ‘न्यू साइंटिस्ट’ नामक ब्रितानी विज्ञान पत्रिका में एक लेख पढ़ा । विख्यात न्यूरोसाइंटिस्ट डेविड ईगलमैन (David Eagleman) के इस लेख का शीर्षक था “Beyond God and atheism: Why I am a possibilian”, जिसमें उन्होंने एक नितांत नया शब्द गढ़ा है अपनी दार्शनिक मान्यता को स्पष्ट करने के लिए । (देखें न्यू साइंटिस्ट, 27 सितंबर, 2010, इंटरनेट संस्करण)

अभी शब्दकोष में उनुपलब्ध इस शब्द को सही परिप्रेक्ष में समझने के लिए मानव समाजों में व्याप्त दार्शनिक मान्यताओं की विविधता पर विचार करने की आवश्यकता होगी । आज की दुनिया में कुछ लोग अनीश्वरवादी हैं, जो यह मानते हैं कि यह संसार विशुद्ध रूप से इंद्रियगम्य भौतिक मूल का है, जिसका ईश्वर जैसा कोई स्रष्टा नहीं है (atheism) । यह अपने आप में ‘स्वयंभू’ है । बौद्ध धर्म भी अनीश्वरवाद पर टिका है, किंतु उसमें कर्मवाद है, कर्म ही प्राणियों के जन्ममरण के चक्र का कारण माना गया है । हिंदू समाज में द्वैतवाद और अद्वैतवाद के दर्शनों का जिक्र मिलता है, जो परमात्मा की अवधारणा पर केंद्रित हैं । पाश्चात्य ख्रिस्तीय मतावलंबी ईश्वर को एक सृष्टिकर्ता के रूप में देखते हैं और सृष्टिवाद के पक्षधर हैं (theism)। इसी प्रकार के कई दार्शनिक मत प्रचलन में हैं । सभी मतों में वैचारिक सुदृढ़ता है, ‘ऐसा ही है, वैसा नहीं है’ के असंदिग्ध अपने-अपने मत । यहां मेरा मकसद दार्शनिक मतों की चर्चा करना नहीं है, बल्कि उस पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना है जिसमें एक नया शब्द गढ़ा गया ।

डेविड ईगलमैन ने अपने लेख में यह भावना व्यक्त की है कि मनुष्य बहुत कुछ नहीं जानता है । सृष्टि के जिस रहस्य को जान लेने का दावा चिंतकों ने किया है उसे अंतिम रूप से संशय से परे सुस्थापित मानकर चलना नितांत अवैज्ञानिक समझा जाना चाहिए । एक सुलझे हुए वैज्ञानिक के नाते उनका मानना है कि ईश्वर नहीं ही है यह दावा करना उचित नहीं होगा । ईश्वर है ही इसे भी प्रमाणित कोई नहीं कर सका है । अतः ईश्वर के अस्तित्व के बारे में फिलहाल केवल संभावना की बात करना ही उचित होगा, और अपने इस लचीले दार्शनिक विचार को उन्होंने ‘possibilianism‘ नाम दिया है, जिसे उन्होंने possibility शब्द से गढ़ा है । हिंदी में इसे संभावनावाद कहना उचित होगा । इस दर्शन के पक्षधर को possibilian कहा गया है । चूंकि अभी तक ऐसे लचीले दर्शन की व्याख्या एवं उसका प्रचार नहीं हुआ था, अतः यह शब्द पहले अस्तित्व में नहीं आ सका । अस्तु, इस समय

possibilianism = संभावनावाद; ईश्वर के अस्तित्व के बारे में शायद हो और शायद न हो की मिश्रित मान्यता रखना ।

यह शब्द मुश्किल से डेड़-दो वर्ष पुराना है और इसे अभी अंग्रेजी शब्दकोशों में प्रवेश पाना है । हो सकता है किसी ‘वेब डिक्शनरी’ में यह शामिल हो । इंटरनेट खोज में यह शब्द मुझे अधिकांशतः इगलमैन के लेखों/व्याख्यानों एवं एक पुस्तक, Sum: Forty Tales from the Afterlives,  के संदर्भ में ही मिला । विकीपीडिया (http://en.wikipedia.org/wiki/Possibilianism) पर भी कुछ ऐसा ही दिखता है । दिलचस्प यह है कि इस शब्द को लेकर एक वेब साइट भी मेरे नजर में आयी है । (http://www.possibilian.com/)

उपर्युल्लिखित शब्द का परिचय पाने के बाद मुझे जिज्ञासा हुई कि इसी प्रकार हाल में अन्य नये शब्द भी अंग्रेजी में जगह पा रहे हैं क्या ? मेरी दृष्टि में एक वेब साइट (http://www.learn-english-today.com/) आई जिसमें हालिया नये शब्दों की सूची दी गयी थी । इनमें से अधिकांश को आगे सूचीबद्ध किया जा रहा है । ध्यान दें कि जिन शब्दों को मैं अपनी पहुंच के शब्दकोशों में नहीं पा सका उन्हें तारांकित किया गया है । इन शब्दों की रचना पारंपरिक व्याकरण के नियमों के अनुसार की गयी हो ऐसा नहीं है । ये आवश्यकता एवं सुविधा पर आधारित हैं ।

Affluenza = affluence + influenza = अकूत धन-दौलत के लिए अतिश्रम, अंधाधुंध खर्च, कर्ज, बरबादी, तनाव, चिंता, आदि लक्षण वाला सामाजिक रोग

Agritourism = कृषि-फार्मों की सैर एवं उसमें भागीदारी पर आधारित पर्यटन उद्योग

Alcopop = फलों के रस और अल्कोहल के मिश्रण से बना पेयAudiophile =  उच्च गुणवत्ता वाले ध्वनि संसाधनों को संग्रह करने वाला व्यक्ति

Baggravation* = bag + aggravation = हवाई अड्डे पर ‘बैगेज’ को लेकर होने वाली चिंता-असुविधा

Burkini or Burquini* = Burqa + bikini = बुर्का एवं बिकिनी के मेल से बना तैराकी-पोषाक

Buzzword = विशिष्ट व्यावसायिक परिवेश और व्यक्ति समूह के बीच प्रचलित नया शब्द

Captcha = Completely Automated Public Turing Test To Tell Computers and Humans Apart टेड़े-मेढ़े अक्षरों से बना शब्द जिसके द्वारा मानव एवं मशीन में भेद किया जा सके ।

Carjacking = Car + hijacking = कार-अपहरण का कृत्य

Daycation* = Day + vacation = दिन भर बाहर धूमते-फिरते रात्रि घर लौटकर छुट्टी मनाने का तरीका

Decruitment* =  कर्मचारियों की छुट्टी करके कंपनी का कार्मिक आकार घटाना

Docusoap = Documetary + soap (opera) = वृत्तचित्र यानी डॉक्युमेंटरी की तर्ज पर टेलीविजन ‘रियलिटी’ कार्यक्रम

Dramedy* = Drama + comedy = ड्रामा एवं हास्य का मिश्रित चलचित्र

Earworm* = वह धुन जो कानों में निरंतर सुनाई देती है

E-cruitment* = आधुनिक इलेक्ट्रानिक माध्यमों द्वारा आवेदन, चयन एवं नियुक्ति

Emoticon = Emotion + icon = कंप्यूटर संदेशों में प्रयुक्त प्रतिमा-चिह्न

E-stalk* = इंटरनेट खोज माध्यम से किसी का पीछा करना

Fashionista = आधुनिकतम फैशन अपनाने वाला

Flame war = ई-संदेशों द्वारा आरोप-प्रत्यारोपों का वाग्युद्ध

Flash mob = त्वरित गति से जनसमूह का एकत्र होना, घटना को अंजाम देना, और फिर वहां से तुरंत हट जाना

Flexitarian* = Flexible + vegitarian = शाकाहारी जो कभीकभार मांसभक्षण स्वीकार लेता हो

Freemale* = अकेले एवं स्वतंत्र रहना पसंद करने वाली महिला

Flightmare* = Flight + nightmare = हवाई यात्रा का दुःस्वप्नात्मक अनुभव

Funkinetics* = ऊर्जामूलक हवाई कलाबाजी पर आधारित ससंगीत व्यायाम

Gastropub = जिस ‘पब’ में अल्कोहल पेयों के अतिरिक्त स्वादिष्ट व्यंजन भी परोसे जाते हों

Gastrosexuals* = नई पीढ़ी के वे पुरुष जो अपने यौन-मित्रों को अपनी पाककला द्वारा प्रभावित करते हों

Greycation* = Grey + vacation = दादा-दादी/नाना-नानी के साथ कम खर्चे में छुट्टी बिताना

Guesstimate = तर्क एवं तुक्के की खिचड़ी पर आधारित अनुमान

Hoody or hoodie = सिर ढकने वाले ‘हुड’ वाला वस्त्र या उसे धारण करने वाला

Infomania* = अनेक बार प्राप्त संदेशों को जांचने एवं उन्हें भेजने की लत

Infotainment = सूचना और मनोरंजन के मिश्रण की ‘ऑनलाइन’ सेवा

Jumbrella* = खुले स्थान पर प्रयोजनीय वृहदाकार छत्र

Mailbomb* = ई-मेल संदेशों की बौछार द्वारा किसी कंप्यूटर के कार्य में विघ्न डालना

Meritocracy = बौद्धिक क्षमता की श्रेष्ठता पर आधारित शासन प्रणाली

Mocktail* = कॉकटेल सदृश अल्कोहल-मुक्त पेय

Netiquette = Network + etiquette = इंटरनेट प्रयोग संबंधी आचार संहिता

Netizen = internet + citizen = सामान्य से अधिक समय इंटरनेट पर बिताने वाला

Nonliner* = इंटरनेट का प्रयोग (लगभग) नहीं के बराबर करने वाला

Notspot* = स्थान जहां इंटरनेट नहीं हो या मंदगति का हो

Noughties = ट्वेंटीज, थर्टीज, फॉर्टीज, आदि की तर्ज पर 2000-2009 का दशक नाम

Offshorable* = कार्य जो दूसरे देश में सस्ते में कराया जा सके

Oversharing* = इंटरनेट पर वैयक्तिक जानकारी अनावश्यक तौर पर प्रदान करना

Screenager* =  कंप्यूटर पर अत्यधिक समय बिताने वाला किशोर/युवक

Sitcom = Situation + comedy = रोजमर्रा के हास्यप्रद स्थिति पर आधारित ड्रामा/टीवी कार्यक्रम

Slumdog* = शहरी झोपड़पट्टी में रहने वाला समाज के निम्नतम पायदान का व्यक्ति

Snail mail =  इलेट्रानिक संदेशों की तुलना में धीमी गति की पारंपरिक डाक

Spinnish* = चिकित्सकों, राजनेताओं, संस्था-प्रवक्ताओं आदि द्वारा लोगों को प्रभावित करते हुए सूचना देने में प्रयुक्त सम्मोहक भाषा

Staycation* = Stay + vacation = घर में आराम फरमाते छुट्टियां बिताना

Tombstoning* = अति ऊंचे स्थल, जैसे पहाड़ की चोटी, से खतरनाक गोता लगाना

Trekkie = टीवी धारावाहिक ‘स्टार ट्रेक’ का शौकीन

Tweet* = माइक्रोब्लॉगिंग Twitter के माध्यम से संदेश भेजना

Upskill = कर्मचारी को नये प्रकार के कौशल सिखाना

Videophile* = वीडियो देखने/बनाने का शौकीन व्यक्ति

Viral marketing* = ‘वाइरस’ की तरह फैलने वाले मित्रों-परिचितों को भेजे गये ई-पत्रों के माध्यम से बाजार बढ़ाना

Web rage* = इंटरनेट प्रयोग में हो रही दिक्कतों के कारण होने वाली हताशा

Webinar = इंटरनेट माध्यम से संपन्न सेमिनार का इलेक्ट्रानिक संस्करण

Wordle* = शब्दसूची जिसमें शब्दों का आकार पाठ में उनकी आवृत्ति के अनुपात में दिखाया जाता है

- योगेन्द्र

संयुक्त राष्ट्र संघ के आधिकारिक भाषा दिवस, हिंदी दिवस एवं राजभाषा हिंदी

Posted सितम्बर 14, 2010 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: भारत, भाषा, राजभाषा, हिन्दी, English, Hindi, India, language

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राष्ट्र संघ आधिकारिक भाषा दिवस

इसी वर्ष (2010) संयुक्त राष्ट्र संघ (UNO) ने अपनी 6 आधिकारिक भाषाओं (official languages) के नाम पर ‘दिवस’ घोषित किये हैं । (देखें http://www.un.org/apps/news/story.asp?NewsID=34469&Cr=multilingual&Cr1=) ये दिवस इस प्रकार हैं:

1. अरबी भाषा दिवस Arabic Language Day (दिसम्बर 18 December) | सन्1973 की इसी तिथि पर अरबी भाषा को संयुक्त राष्ट्र संघ की छःठी आधिकारिक भाषा (Official Language) की मान्यता दी गयी थी ।
2. चीनी भाषा दिवस Chinese Language Day (अप्रैल 20 April) । चीनी चांद्रमास के अनुसार यह दिन चीन में ‘अन्न दिवस’ (Day of Grain) के तौर पर मनाया जाता है ।
3. अंग्रेजी भाषा दिवस English Language Day (अप्रैल 23 April) | यह दिन प्रसिद्ध अंग्रेजी नाट्यकार विलियम शेक्सपियर (William Shakespeare) के जन्मदिन के तौर जाना जाता है ।
4. फ़ांसीसी भाषा दिवस French Language Day (मार्च 20 March) | संयोग से यह दिन फ़्रांसीसी-प्रेमियों और फ़ांसीसी भाषा का मानवीय मूल्यों के संवर्धन में योगदान के नाम पर बने उनके संगठन ‘ला फ़्रांकोफ़ोनी’ (La Francophonie) का स्थापना दिवस है ।
5. रूसी भाषा दिवस Russian Language Day (जून 6 June) । यह दिन अलेक्ज़ांडर पुश्किन (Aleksander Pushkin), जिन्हें रूसी साहित्य के जनक के तौर पर देखा जाता है, का जन्मदिन है ।
6. स्पेनी भाषा दिवस Spanish Language Day (अक्टूबर 12 October) । यह स्पेन का राष्ट्रीय दिवस तथा स्पेनी भाषा-संस्कृति मानने वाली अन्यत्र वसी बिरादरी (Hispaniards) के दिवस के तौर पर जाना जाता है ।

संघ के महासचिव ने पहली बार मनाये गये ‘अंग्रेजी दिवस’ – 23 मार्च – के अवसर पर शेक्सपियर के शब्दों, `a feast of languages’ (भाषाओं का भोज, विविध भाषाओं की दावत), को उद्धरित करते हुए इन दिवसों की अहमियत को रेखांकित किया था । बहुभाषाभाषी इस विश्व में सभी भाषाओं को सम्मान मिले, और संघ के कार्यों में उक्त सभी भाषाएं समान रूप से प्रयुक्त हों यह संघ का प्रयास रहेगा ऐसी भावना इन दिवसों से जुड़ी है ।
अंग्रेजी के संदर्भ में मुझे एक वेबसाइट पर यह भी पढ़ने को मिला हैः “13 अक्टूबर 1362 में इंग्लैंड के ‘चांसलर’ ने पार्लियामेंट का उद्घाटन पहली बार अंग्रेजी भाषा में किया । सभा के उसी सत्र में विधि-नियमों और विधिक कार्यों के लिए सभा-सदस्यों को अंग्रेजी के प्रयोग की अनुमति दी गई । इस दिन को ‘अंग्रेजी भाषा दिवस’ (English Language Day) माना जाता है ।” लेकिन राष्ट्र संघ का घोषित अंग्रेजी दिवस इससे भिन्न है । (देखें http://www.englishproject.org/index.php?option=com_content&view=article&id=592&Itemid=472)

दिवसों की भरमार

पिछले कुछ दशकों से दिवसों का चलन बढ़ गया है । मानव समाज की हर समस्या की ओर ध्यानाकर्षण के लिए नये-नये दिवस घोषित किये जा रहे हैं । उपर्युक्त दिवस उसी फैशन की नई बानगी हैं । अब देखिए इसी माह (सितंबर) के उन दिवसों की सूची जिनकी जानकारी मुझे मिल सकी है:
(अंतर० = अंतरराष्ट्रीय; Intl. = International)

8 Intl. Literacy Day अंतर० साक्षरता दिवस
11 World First Aid Day विश्व प्राथमिक चिकित्सा दिवस
14 Intl. Cross-Cultural Day अंतर० मिश्रसंस्कृति दिवस
15 Intl. Day of Democracy अंतर० लोकतंत्रता दिवस
3rd Tuesday Intl. Day of Peace अंतर० शांति दिवस
16 Intl. Day for Ozone Preservation अंतर० ओजोन संरक्षण दिवस
20 Intl. Car Free Day अंतर० कारमुक्त दिवस
21 World Alzheimer’s Day अंतर० अल्जाइमर दिवस
21 Intl. Day of Peace अंतर० शान्ति दिवस
23 World Deaf Day विश्व बधिर दिवस
27 World Tourism Day विश्व पर्यटन दिवस
28 World Heart Day विश्व हृदय दिवस
28 World Rabies Day विश्व रेबीज़ दिवस

अस्तु, ये हैं विश्व दिवस । राष्ट्रीय स्तर के दिवस, जो भी हों, अतिरिक्त हैं । इसी माह 5 तारीख ‘शिक्षक दिवस’ मनाया जा चुका है । 14 तारीख हिंदी दिवस है ही । इसी वर्ष कुछ पर्यावरणविदों और उत्साही नागरिकों ने ‘हिमालय दिवस’ भी मनाया है, 9 तारीख, हिमालय क्षेत्र के बिगड़ते पर्यावरण के प्रति सरकार एवं आम जनों का ध्यान आकर्षित करने के उद्येश्य से । अब भविष्य में यह भी मनाया जाएगा । (http://www.thaindian.com/newsportal/enviornment/environmentalists-observe-himalaya-day_100425964.html)

दिवसों की अहमियत

हमारे देश में त्यौहारों-पर्वों के रूप में अनगिनत ‘दिवस’ मनाने की परंपरा चली आ रही है । इनका उद्येश्य समझ में आता हैः जीवन के प्रतिदिन के कार्यव्यापार से हटकर मनोरंजन एवं सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्कों का प्रयोजन इनमें निहित रहता है । ईद-दीवाली, बीहू-बैशाखी एवं अन्य धार्मिक पर्व इस श्रेणी में आते हैं । अपने यहां दिवंगत महापुरुषों के जन्मदिनों की भी भरमार है, जैसे बुद्ध, गांधी, नेहरु, अंबेडकर जयंतियां । बीते वर्षों में गुजरते समय के साथ नये-नये दिवस इस श्रेणी में जुड़ते चले गये हैं । कुछ दिवसों पर कार्यालयिक छुट्टी होती है, तो कुछ पर विविध आयोजन । मदर्स डे, फ्रेंड्ज डे, वैलंटाइन डे, न्यू इयर्स डे जैसे दिन भी हाल के वर्षों में दिवसों की सूची में जुड़ चुके हैं । इन पर अवकाश भले ही न हो, लोगों का जोश देखने योग्य होता है । इन सब का महत्त्व व्यक्तियों अथवा समुदाय-विशेषों के लिए ही अधिक है ।
हाल के वर्षों में सामाजिक सरोकारों तथा पर्यावरण से संबद्ध दिवस सूची में और जुड़ चुके हैं, जो अधिकतर वैश्विक स्तर के हैं । ये ही वे दिवस हैं जो जाति, धर्म, क्षेत्र से परे राष्ट्रीय अथवा अंताराष्ट्रीय अहमियत रखते हैं । शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण आदि से जुड़े दिवस अपना अलग महत्त्व रखते हैं, जैसे अंताराष्ट्रीय ‘पृथ्वी दिवस’ (22 अप्रैल), ‘पर्यावरण दिवस’ (5 जून), ‘जनसंख्या दिवस’ (11 जुलाई), ‘भ्रष्टाचार निवारण दिवस’ (9 दिसंबर), आदि । मुझे शंका है कि इनमें से कइयों का अखबारों में जिक्र तक नहीं होता है । ये वे दिवस हैं, जब रस्मअदायगी से आगे बढ़कर कुछ कर गुजरने का संकल्प नागरिकों को लेना होता है । ये दिन हैं जब मुद्दों पर संजीदा हुआ जाना चाहिए । अगर ऐसा नहीं होता है तो फिजूल है उस दिवस का मनाया जाना । हिंदी दिवस ऐसा ही एक दिवस है ।

हिंदी दिवसः खो चुकी अहमियत

“… राजभाषा समिति की बैठक में हिंदी की जगह अंग्रेजी की उपस्थिति पर न केवल हंगामा हुआ, बल्कि भाजपा सदस्यों ने तो अंग्रेजी दस्तावेज को फाड़ कर और बैठक का बहिष्कार कर विरोध भी दर्ज कराया। गृहमंत्री तो बैठक में आए ही नहीं। … बैठक उस समय हंगामे में डूब गई जब कुछ दस्तावेज हिंदी के बजाय अंग्रेजी में पेश किए गए। … सदस्यों ने याद दिलाया कि राजभाषा अधिनियिम की धारा 3 [3] के तहत हिंदी में दस्तावेज होना जरूरी है, अधिकारी ने जवाब दिया कि यह उनके मंत्रालय पर लागू नहीं होता। … समिति के अध्यक्ष होने के बावजूद गृहमंत्री पी. चिदंबरम बैठक में आए ही नहीं। पिछले साल बैठक में वह आए थे तो उन्होंने भाषण अंग्रेजी में दिया था।” (स्रोत: http://in.jagran.yahoo.com/news/national/politics/5_2_6709123.html)

समाचार यहां भी पढ़ सकते हैं: http://epaper.amarujala.com/svww_index.php

उक्त समाचार साफ दिखलाता है कि बतौर राजभाषा के हिंदी के प्रति देश की नौकरशाही का क्या रवैया है । अंग्रेजी के वर्चस्व को कैसे बनाये रखा जाए और उसके लिए क्या-क्या बहाने रचे जाएं इसे आप उनसे सीख सकते हैं । निर्लज्ज अधिकारियों का ढीठपन देखिए, कहते हैं: “राजभाषा अधिनियम की धारा 3(3) उनके मंत्रालय पर लागू नहीं होती है, गोया कि उनका मंत्रालय अपवाद है और संविधान ने कुछ मंत्रालयों को राजभाषा न इस्तेमाल करने की छूट दे रखी है ।” अवश्य ही सुप्रीम कोर्ट (उच्चतम न्यायालय?) एक हास्यास्पद अपवाद है, जिसके लिए केवल अंग्रेजी ही मान्य है! दुर्भाग्य से देश का प्रबंधन जनसंख्या के शीर्ष पर बैठी 10% से कम जिस अभिजात वर्ग के हाथ में है उसे यह हरगिज बर्दास्त नहीं है कि भारतीय भाषाओं के ऊपर अंग्रेजी का वर्चस्व घटे । इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिए वे हर मुमकिन कोशिश करने को तैयार हैं । अगर वे ऐसा न करें तो अंग्रेजी के कारण जिस लाभ की स्थिति में वे हैं वह नहीं रहेगी । कोई भी चालाक व्यक्ति और व्यक्ति-समूह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी नहीं मार सकता ।

मुझ जैसे लोगों के लिए यह एक पीड़ादायक तथ्य है कि अपना देश हिंदुस्तान एक बुरी तरह विभाजित समाज है । यहां एक नहीं कई विभाजक कारक हैं: जाति, धर्म, क्षेत्र, आर्थिक संपन्नता तो हैं ही, उन सब के ऊपर है अंग्रेजी – अंग्रेजी जिसने एक ही राष्ट्र को ‘इंडिया और भारत’ में बांट रखा है । पूरी प्रशासनिक व्यवस्था इंडिया के हाथ में है, जो अंग्रेजी के वर्चस्व का घोर पक्षधर है ।

निस्संदेह हिंदी आम बोलचाल की भाषा है; दिल्ली के सचिवालय के गलियारों में भी यही बोली जाती है । आगे भी बोली जाएगी, भले ही ऐसा उसके वर्णसंकर अवतार ‘हिंग्लिश’ के रूप में हो । बोलचाल में वह विस्तार भी पा रही है, और देश के कोने-कोने में पहुंच भी रही है । किंतु उसके आगे बढ़कर वह दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकती है । इसीलिए वह असल राजभाषा नहीं बन सकती, भले ही राजभाषा का ‘खिताब’ इसे मिला हो ! … कभी भी नहीं ।
तब फिर हिंदी दिवस की अहमियत क्या है? किसे याद दिलाने के लिए है यह दिवस ?

अंत में

राजभाषा संसदीय समिति का अध्यक्ष केंद्र सरकार के गृहमंत्री हुआ करते हैं – पदेन । अपने गृहमंत्री हिंदी नहीं जानते हैं – शायद बिल्कुल नहीं जानते हैं, और न ही जानने की इच्छा रखते हैं । यों तो सरकार चलाने वाले शीर्ष स्तर के राजनेता और प्रशासनिक अधिकारियों को हिंदी में कोई दिलचस्पी नहीं रहती है, भले ही वे हिंदीभाषी क्षेत्र के ही क्यों न हों, भले ही उनकी घोषित मातृभाषा हिंदी ही क्यों न हो । उन्हें हिंदी से अघोषित परहेज दृ सख्त लहजे में कहूं तो विरोध – रहता ही रहता है । फिर भी हिंदी दिवस जैसे मौके पर वे हिंदी में बोलने की रस्मअदायगी करते ही हैं । किंतु तमिलनाडु के राजनेता (आम आदमी उतना नहीं!) हिंदी से कतराते जरूर हैं । परहेज रखना शायद उनकी राजनीतिक विवशता है । दरअसल तथाकथित ‘द्रविड़’ पार्टियों के जन्म एवं उत्थान का आधार ही हिंदी विरोध रहा है । उन्हें यह विरोध बरकरार रखना है । इस हालत में कांग्रेस जैसी पार्टियां यह साहस नहीं दिखा सकती हैं कि वे हिंदी के पक्ष में नजर आवें । हिंदी के प्रति असली या नकली विरोध उन्हें भी दिखाना ही होता है । इस कारण से हिंदी का ‘मूक’ विरोध करना अपने गृहमंत्री की मजबूरी है । मैंने अभी तक कोई ‘तमिल’ राजनेता नहीं देखा है, जिसने कभी भी दो शब्द हिंदी में बोले हों । - योगेन्द्र जोशी

हिंदी दिवस: शुभकामना

Posted सितम्बर 14, 2010 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: Uncategorized

हिंदी दिवस, 14 सितंबर, के अवसर पर

हिंदी प्रेमियों के प्रति

अभिनंदन, अभिवादन एवं मंगलकामना

- योगेन्द्र जोशी

Posted सितम्बर 5, 2010 by योगेन्द्र जोशी
श्रेणी: इंग्लिश, इन्डिया, क्रिओल, भारत, भाषा, हिंग्लिश, हिन्दी, Creole, English, Hindi, India

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PIDGIN (पिजिन), CREOLE   (क्रिओल) एवं Hinglish (हिंग्लिश)

PIDGIN –  A simple form of a language with elements taken from the local languages used for communication between people not sharing a common language. Origin: Chinese alteration for business.
CREOLE1 a person of mixed European and Black descent. 2 a descendent of European settlers in the Caribbians  or Central or South America. 3 a descendent of French settlers in the south of US. 4 a language formed with the combination of a European Language and an African Language.


पिजिन
‘पिजिन’ एवं ‘क्रिओल’ की ये परिभाषाएं कॉम्पैक्ट ऑक्सफर्ड रेफरेंस डिक्शनरी (Compact Oxford Reference Dictionary) से ली गयी हैं । अंतरजाल पर खोजने पर आपको इन शब्दों की व्याख्या अलग-अलग प्रकार से मिलेगी, लेकिन सभी का सार एक ही रहता है । देखने-पढ़ने के लिए संदर्भों की संख्या की कोई कमी नहीं हैं । मैंने निम्नलिखित को अधिक ध्यान से देखा था:

http://privatewww.essex.ac.uk/~patrickp/Courses/CreolesIntro.html

http://humanities.uchicago.edu/faculty/mufwene/pidginCreoleLanguage.html

http://logos.uoregon.edu/explore/socioling/pidgin.html

पिजिन (Pidgin) वस्तुतः एक मिश्रित बोली है । इसे भाषा कहना उचित नहीं होगा । जब ऐसे व्यक्ति-समूह परस्पर मिलते हैं जो एक-दूसरे की भाषा/बोली न जानते हों, किंतु उन्हें परस्पर व्यावसायिक/व्यापारिक संबंध स्थापित करने हों, तब कामचलाऊ बोली का जन्म होता है । दो या अधिक भाषाओं के शब्दों की खिचड़ी बोली जिससे परस्पर का कार्यव्यापार चल जाए वह पिजिन कहलाती है । बताया जाता है कि ‘पिजिन’ शब्द अंग्रेजी शब्द बिजनेस (business) का चीनी भाषा में रूपांतर है । शब्द की व्युत्पत्ति का खास इतिहास नहीं है । कहा जाता है कि पिजिन शब्द 1807 से प्रचलन में है ।

पिजिन बोलियों के इतिहास का यूरोपियों द्वारा अमेरिकी द्वीपों में उपनिवेश स्थापित करने से घनिष्ठ संबंध रहा है । स्थानीय जनसमुदायों के साथ काम भर का संपर्क स्थापित करने अथवा उनकी श्रमशक्ति का उपयोग करने के लिए ऐसी टूटी-फूटी बोली का प्रचलन हुआ । इतना ही नहीं, कई क्षेत्रों में कृषि एवं अन्य कार्यों के लिए वे लोग अपने साथ अफ्रिकी ‘गुलामों’ को भी ले गये । उनके साथ संवाद के लिए भी ऐसी बोली प्रचलन में आई । इन अवसरों पर ‘सभ्य’ कहे जाने वाले और समुन्नत भाषाओं के धनी यूरोपियों की उन श्रमिकों या ‘गुलामों’ की अपेक्षया अविकसित भाषा सीखने में स्वाभाविक तौर पर कोई दिलचस्पी नहीं रही होगी । दूसरी तरफ श्रमिकों/‘गुलामों’ में भी इतनी क्षमता कदाचित् नहीं रही होगी कि वे ‘मालिकों’ की भाषा को सरलता से अपना लें । दोनों प्रकार के समुदायों का परस्पर संपर्क केवल जरूरी कार्यव्यापार तक सीमित था जिसके लिए पिजिन से काम लेना पर्याप्त था । श्रमिक/‘गुलाम’ जब स्वयं ही अलग-अलग क्षेत्रों के मूल बाशिंदे होते थे, तब वे भी आपस में पिजिन का सहारा लेते थ और उस बोली में दो से अधिक भाषाओं/बोलियों के शब्द शामिल हो जाते थे । इन मिश्रित बोलियों को संबंधित भाषाओं के नाम से पुकारा जाने लगा, यथा पापुआ न्यू गिनी पिजिन जर्मन (Papua New Guinea Pidgin German ), कैमरून पिजिन इंग्लिश (English based Cameroon Pidgin) आदि ।

पिजिन बोली का कोई सुनिश्चित व्याकारणीय स्वरूप नहीं रहता । इसकी शब्दसंपदा बेहद कम और कामचलाऊ रहती है, जिसमें संबंधित भाषाओं के शब्द रहते हैं । आम तौर यूरोनीय भाषा के शब्द अधिक रहते हैं जब कि उनका उच्चारण, वाक्य में क्रम, आदि स्थानीय बोली पर अधिक आधारित रहते हैं । प्रमुख भाषा को उपरिस्तरीय (Superstrate) एवं गौण को अधोस्तरीय (Substrate) कहा जाता है । पिजिन का एक उदाहरण (उपर्युक्त किसी जालस्थल से लिया गया कैमरून पिजिन इंग्लिश) देखिए:
dis smol swain i bin go fo maket (दिस स्मोल स्वैन इ बिन गो फो माकेट) = this little pig went to market
पिजिन एवं क्रिओल (आगे देखें) का अध्ययन अपने देश में शायद नहीं होता है, किंतु यूरोप एवं अमेरिका के कुछ शिक्षण संस्थाओं के भाषा विभागों में इनके बारे में पढ़ाया जाता है (जैसे एसेक्स वि0वि0, ब्रिटेन, एवं शिकागो वि0वि0, अमेरिका) ।

क्रिओल
पिजिन की भांति क्रिओल भी एक मिश्रित या वर्णसंकर (Hybrid) बोली है । यों समझा जा सकता है कि जब पिजिन समय के साथ परिष्कृत होकर स्थायित्व धारण कर लेती है तो वही क्रिओल कहलाने लगती है । यह माना जाता है कि अफ्रिकी, अमेरिकी देशों के अपेक्षया पिछड़े जनसमुदायों की भाषा पर यूरोपीय भाषाओं के अत्यधिक प्रभाव से क्रिओलों का जन्म हुआ है । आरंभ में वे जनसमुदाय अपनी मूल भाषा का ही प्रयोग करते रहे, किंतु व्यापारिक/व्यावसायिक संपर्क के कारण पिजिन का प्रयोग भी साथ-साथ चलता रहा । कालांतर में आने वाली पीढ़ियां पिजिन के आदी होते चले गये । इस प्रक्रिया के फलस्वरूप ऐसी भाषा व्यवहार में आई जिसने एक स्पष्ट व्याकरणीय ढांचा इख्तियार कर लिया और जिसका एक अच्छा-खासा शब्दसंग्रह भी तैयार हो गया । संबंधित मूल भाषाओं के नामों पर आधारित क्रिओल संबोधन से यह भाषा पुकारी जाने लगी ओर उन लोगों की आम भाषा ही बन गयी ।

विषय के जानकारों के अनुसार क्रिओलों की शब्दसंपदा मुख्यतः बाहरी (यूरोपीय) भाषा पर आधारित रहती है जब कि वाक्यविन्यास स्थानीय भाषा पर । स्थानीयता शब्दों के स्वरूप एवं अर्थ को प्रभावित करती है । अंग्रेजी-आधारित जमैकी पिजिन में शब्द रचना का एक दृष्टांत देखें: हैन-मिगल् = हथेली (Han-migl = hand+middle = palm) ।
पापुआ न्यू गिनी में अंग्रेजी और स्थानीय भाषा से प्राप्त टोक पिसिन (Toke Pisin = Talk Pidgin?) नाम की क्रिओल राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है और देश की ‘असेम्बली’ और रेडियो प्रसारण में प्रयुक्त होती है । इसका एक वाक्य यह है:

“Sapos yu kaikai planti pinat, bai yu kamap strong olsem phantom.”
(सापोस यू काइकाइ प्लान्टी पीनाट, बाइ यू कमअप स्ट्रॉंग ओल्सम फैंटम ।)
“If you eat plenty of peanuts, you will come up strong like the phantom.”

अमेरिका में लूसियाना क्रिओल प्रचलन में है, जो फ्रांसीसी एवं अफ्रिकन भाषाओं पर आधारित है । अन्य कुछ क्रिओल भाषाएं ये हैं: Haitian, Mauritian, and Seychellois (French based); Jamaican, Guyanese, and Hawaiian Creole  (English based); Cape Verdian Criolou (Portuguese based) and Papiamentu in the Netherlands Antilles (Portuguese based, Spanish influenced) |

हिंग्लिश
इस आलेख में मेरा मुख्य उद्येश्य है हिंग्लिश पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करना । पिजिन एवं क्रिओल की संक्षिप्त परिचयात्मक चर्चा के पीछे प्रयोजन यह रहा है कि इनके सापेक्ष हिंग्लिश को तौला जा सके । मेरे विचार में स्वतंत्र इंडिया दैट इज भारत (ह्विच इट इज नॉट!) की एक बड़ी, किंतु नकारात्मक, उपलब्धि रही है हिंग्लिश की प्रतिष्ठापना । हिंग्लिश हिंदी एवं अंग्रेजी के घालमेल से बनी एक वर्णसंकर भाषा है, जिसके बीज तो अंग्रेजी राज में पड़ चुके थे, लेकिन जिसका विकास एवं अधिकाधिक प्रयोग स्वतंत्रता के बाद ही हुआ ।

मैं यह निश्चित नहीं कर पा रहा हूं कि हिंग्लिश को पिजिन कहा जाए या क्रिओल । पिजिनों/क्रिओलों के प्रचलन में आने की जिन परिस्थितियों की बात कही गयी है वे अवश्य ही हिंग्लिश पर लागू नहीं होती हैं । अंग्रेजी राज से पहले से जो भी भाषाएं इस भूभाग में प्रचलित रही हैं वे उच्च दर्जे की रही हैं और अभिव्यक्ति के स्तर पर वे यूरोपीय भाषाओं से कमतर नहीं मानी जा सकती हैं । यहां के लोग आवश्यकतानुसार अंग्रेजी तथा अन्य भाषाएं सीखने में समर्थ थे और उन्होंने उन्हें सीखा भी । फिरंगियों के समय में ऐसी परिस्थितियां नहीं थीं कि किसी पिजिन/क्रिओल की जरूरत रही हो । उनका राज यही के लोग चला रहे थे, जो अंग्रेजी के साथ एक (मातृभाषा) या अधिक भाषाएं बोल/लिख सकते थे । तब फिर हिंग्लिश की जरूरत क्यों पड़ी ? अंग्रेजी शासन चलाने में योगदान दे रहे वे लोग इतने सक्षम रहे कि वे इन भाषाओं को साफ-सुथरे रूप में प्रयोग में ले सकते थे । तो फिर हिंग्लिश तथा उसी तर्ज पर ‘बांग्लिश’, ‘कन्नलिश’, ‘गुजलिश’ जैसी वर्णसंकर भाषाओं का प्रचलन तेजी से क्यों बढ़ा ?
हिंग्लिश की बात तो मैंने कर दी पर यह स्पष्ट नहीं किया कि यह आखिर है क्या ? यह आज के हिंदुस्तान के शहरी पढ़े-लिखे लोगों के बीच पूर्णतः प्रचलित हो चुकी एक भाषा है जिसका व्याकरणीय ढांचा तो हिंदी का है, किंतु शब्दसंग्रह कमोबेश अंग्रेजी का है । यह उन लोगों की देन है जो चमड़ी के रंग से तो हिंदुस्तानी हैं, लेकिन जो दिल से अंग्रेज बन चुके हैं । ये वे लोग हैं जो भारतीय भाषाओं को केवल मजबूरी में ही प्रयोग में लेना चाहते हैं, जिन्हें मूल/मातृ- भाषा की शब्दसंपदा समृद्ध करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, और जिनके मुख से मौके पर हिंदी का उचित शब्द नहीं निकल सकता है । हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों को जहां तबियत हुई वहां ठूंस देने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती है । उन्हें इस बात पर कोई कोफ्त अथवा लज्जा अनुभव नहीं होती कि वे अपनी ‘तथाकथित’ मातृभाषा में भी ठीक से नहीं बोल सकते, विचारों को व्यक्त नहीं कर सकते । वे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करते हैं कि जिससे वे बात कर रहे हैं उसके भेजे में उनकी यह नयी भाषा घुस भी पा रही कि नहीं । हिंदीभाषियों का बृहत्तर जनसमुदाय उनकी भाषा वस्तुतः नहीं समझ सकता । हिंग्लिश में व्यक्त इस कथन पर गौर करें:

“चीफ़-मिनिस्टर ने नैक्सलाइट्स को डायलॉग के लिए इंवाइट किया है । लेकिन नैक्सलाइट्स अन्कंडिशनल मीटिंग के लिए तैयार नहीं हैं । उनका कहना है कि सरकार कांबिग आपरेशन बंद करे और उन्हें सेफ पैसेज दे तो वे निगोशिएशन टेबल पर आ सकते हैं ।”

इस कथन को सड़क पर का आम आदमी (man on the street) क्या वास्तव में समझ सकता है ? उसे मालूम है कि कांबिग क्या होती है और निगोशिएशन किसे कहते हैं, आदि ? जरा सोचें ।

इस देश में अंग्रेजीपरस्त एक ऐसा वर्ग उभरा है जिस पर ‘सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है’ की कहावत चरितार्थ होती है । निःसंदेह उसके पास अंग्रेजी शब्दों का अपार शब्दभंडार है, किंतु आम हिंदुस्तानी का हाथ तो अंग्रेजी में तंग ही है न । क्या कोई सोचेगा कि क्यों उसे अंग्रेजी के लिए मजबूर किया जाए, क्यों नहीं अंग्रेजीपरस्त ही अपनी हिंदी बेहतर कर लेते हैं, उस बेचारे की खातिर ? खैर, यह सब होने से रहा ।

हिंग्लिश को इंडिया की उदीयमान, तेजी से जड़ें जमाती, और लोकप्रिय होती जा रही क्रिओल भाषा के तौर पर देखा जाना चाहिए । जहां के लोग अब भारत नाम भूलते जा रहे हों और देश को इंडिया बनाने का ख्वाब देख रहे हों, वहां साफ-सुथरी हिंदी के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता है । दुर्भाग्य से वहां अंग्रेजी भी नहीं चल सकती है, क्योंकि अधिसंख्य जन उसमें बातचीत नहीं कर सकते हैं । ऐसे में हिंग्लिश क्रिओल ही उपयुक्त विकल्प रह जाता है ।

अस्तु, मैं इस पक्ष का हूं कि हिंग्लिश – एक प्रकार की क्रिओल – को अब मान्यता दे देनी चाहिए । यह अभिजात वर्ग के मुंह पर कब्जा कर चुकी है; अब यह दिन-ब-दिन मजबूत होने जा रही है । आखिर सोचिए उर्दू और हिंदी में अंतर ही कितना है ? जब उर्दू को अलग भाषा का दर्जा मिला हुआ है, तो ठीक उसी तरह – जी हां उसी तरह – हिंग्लिश को मान्यता क्यों न दी जाए ? हिंदी से जितनी दूर उर्दू है उससे कम दूर हिंग्लिश नहीं है ! – योगेन्द्र जोशी


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