आज (21 फरवरी) मातृभाषा दिवस है । उन सभी जनों को इस दिवस की बधाई जिन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव हो, जो उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, और जो उसे यथासंभव व्यवहार में लाते हैं । उन शेष जनों के प्रति बधाई का कोई अर्थ नहीं हैं जो किसी भारतीय भाषा को अपनी मातृभाषा घोषित करते हैं, लेकिन उसी से परहेज भी रखते हैं, उसे पिछड़ेपन की निशानी मानते हैं ।

अपना भारत ऐसा देश है जहां अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं, और जहां के लोगों की क्षेत्रीय विविधता के अनुरूप अपनी-अपनी मातृभाषाएं हैं । विडंबना यह है कि अधिकांश भारतीय अंग्रेजी के सापेक्ष अपनी घोषित मातृभाषा को दोयम दर्जे का मानते हैं । वे समझते हैं कि उनकी मातृभाषा सामान्य रोजमर्रा की बोलचाल से आगे किसी काम की नहीं । वे समझते हैं कि किसी गहन अथवा विशेषज्ञता स्तर की अभिव्यक्ति उनकी मातृभाषा में संभव नहीं । अतः वे अंग्रेजी का ही प्रयोग अधिकाधिक करते हैं । अंग्रेजी उनके जबान पर इस कदर चड़ी रहती है कि उनकी बोलचाल में अंग्रेजी के शब्दों की भरमार रहती है । लेखन में वे अंग्रेजी को वरीयता देते हैं, या यों कहें कि वे अपनी तथाकथित मातृभाषा में लिख तक नहीं सकते हैं । अध्ययन-पठन के प्रयोजन हेतु भी वे अंग्रेजी ही इस्तेमाल में लाते हैं । उनके घरों में आपको अंगरेजी पत्र-पत्रिकाएं एवं पुस्तकें ही देखने को मिलेंगी । उनके बच्चे जन्म के बाद से ही अंगरेजी की घुट्टी पीने लगते हैं । घर और बाहर वे जो बोलते हैं वह उनकी तथाकथित मातृभाषा न होती है, बल्कि उस भाषा का अंगरेजी के साथ मिश्रण रहता है ।

उन लोगों को देखकर मेरे समझ में नहीं आता है कि उनकी असल मातृभाषा क्या मानी जाए ? मैं यहां पर जो टिप्पणियां करने जा रहा हूं वे दरअसल देश की अन्य भाषाओं के संदर्भ में भी लागू होती हैं । एक स्पष्ट उदाहरण के तौर पर मैं अपनी बातें हिंदी को संदर्भ में लेकर  कह रहा हूं, जिसे मैं अपनी मातृभाषा मानता हूं । मैं सर्वप्रथम यह सवाल पूछता हूं कि आप उस भाषा को क्या कहेंगे जिसमें अंगरेजी के शब्दों की बहुलता इतनी हो कि उसे अंगरेजी का पर्याप्त ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति समझ ही न सके । प्रश्न का उत्तर और कठिन हो जाता है जब उस भाषा में अंगरेजी शब्दों के अलावा अंगरेजी के पदबंध तथा वाक्यांश और कभी-कभी पूरे वाक्य भी प्रयुक्त रहते हों । सामान्य हिंदीभाषी उनके कथनों को कैसे समझ सकेगा यह प्रश्न मेरे मन में प्रायः उठता है । हिंदी को अपनी मातृभाषा बताने वाले अनेक शहरी आपको मिल जाएंगे जो उक्त प्रकार की भाषा आपसी बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं, घर पर, कार्यस्थल पर, वस्तुतः सर्वत्र, अपने बच्चों के साथ भी ।

आज के शहरी, विशेषकर महानगरीय, परिवेश में लोगों की बोलचाल से हिंदी के वे तमाम शब्द गायब हो चुके हैं जो सदियों से प्रयुक्त होते रहे हैं । अवश्य ही साहित्यिक रचनाओं में ऐसा देखने को सामान्यतः नहीं मिलेगा । लेकिन सवाल साहित्यकारों की मातृभाषा का नहीं है । (भारत में ऐसे साहित्यकारों की संख्या कम नहीं होगी जो अपनी घेषित मातृभाषा में लिखने के बजाय अंगरेजी में रचना करते हैं और तर्क देते हैं कि वे अंगरेजी में अपने भाव बेहतर व्यक्त कर सकते हैं ।) बात साहित्यकारों से परे के लोगों की हो रही है जिनके लिए भाषा रोजमर्रा की अभिव्यक्ति के लिए होती है, व्यवसाय अथवा कार्यालय में संपर्क के लिए, बाजार में खरीद-फरोख्त के लिए, पारिवारिक सदस्यों, मित्रों, पड़ोसियों से वार्तालाप के लिए, इत्यादि । इन सभी मौकों पर कौन-सी भाषा प्रयोग में लेते हैं शहरी लोग ? वही जिसका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूं । मैं उस भाषा को हिंदी हरगिज नहीं मान सकता । वह न हिंदी है और न ही अंगरेजी, वह तो दोनों का नियमहीन मिश्रण है, जिसमें स्वेच्छया, नितांत उन्मुक्तता के साथ, हिंदी एवं अंगरेजी ठूंस दी जाती है । यह आज की भाषा है उन शहरी लोगों की जो दावा करते हैं कि उनकी मातृभाषा हिंदी है जिसे वे ठीक-से बोल तक नहीं सकते हैं । तब उनकी मातृभाषा क्या मानी जानी चाहिए ?

मेरा यह सवाल हिंदी को अपनी मातृभाषा कहने वालों के संदर्भ में था । अब में दूसरी बात पर आता हूं, मातृभाषा दिवस की अवधारणा के औचित्य पर ?

आज दुनिया में दिवसों को मनाने की परंपरा चल पड़ी है । दिवस तो सदियों से मनाये जाते रहे हैं त्योहारों के रूप में या उत्सवों के तौर पर, अथवा किसी और तरीके से । जन्मदिन या त्योहार रोज-रोज नहीं मनाए जा सकते हैं, अतः उनके लिए तार्किक आधार पर दिन-विशेष चुनना अर्थयुक्त कहा जाएगा । किंतु कई अन्य प्रयोजनों के लिए किसी दिन को मुकर्रर करना मेरे समझ से परे है । मैं “वैलेंटाइन डे” का उदाहरण लेता हूं । प्रेमी-प्रमिका अपने प्यार का इजहार एक विशेष दिन ही करें यह विचार क्या बेवकूफी भरा नहीं है ? (मेरी जानकरी में वैलेंटाइन डे दो प्रेमियों के मध्य प्रेमाभिव्यक्ति के लिए ही नियत है; पता नहीं कि मैं सही हूं या गलत ।) क्या वजह है कि प्रेम की अभिव्यक्ति एक ही दिन एक ही शैली में सभी मनाने बैठ जाएं ? और वह भी सर्वत्र विज्ञापित करते हुए । प्रेम की अभिव्यक्ति दुनिया को बताके करने की क्या जरूरत है ? यह तो नितांत निजी मामला माना जाना चाहिए दो जनों के बीच का और वह पूर्णतः मूक भी हो सकता है । उसमें भौतिक उपहारों की अहमियत उतनी नहीं जितनी भावनाओं की । प्रेमाभिव्यक्ति कभी भी कहीं भी की जा सकती है, उसमें औपचारिकता ठूंसना मेरी समझ से परे है । फिर भी लोग उसे औपचारिक तरीके से मनाते हैं वैलेंटाइन डे के तौर पर । क्या साल के शेष 364 दिन हम उसे भूल जाएं । इसी प्रकार की बात मैं “फादर्स डे”, “मदर्स डे”, “फ़्रेंड्स डे” आदि के बारे में भी सोचता हूं । इन रिश्तों को किसी एक दिन औपचारिक तरीके से मनाने का औचित्य मेरी समझ से परे है । ये रिश्ते साल के 365 दिन, चौबीसों घंटे, माने रखते हैं । जब जिस रूप में आवश्यकता पड़े उन्हें निभाया जाना चाहिए । किसी एक दिन उन्हें याद करने की बात बेमानी लगती है । फिर भी लोग इन दिवसों को मनाते हैं, जैसे कि उन्हें निभाने की बात अगले 364 दिनों के बाद ही की जानी चाहिए ।

और कुछ ऐसा ही मैं मातृभाषा विदस के बारे में भी सोचता हूं ।

कहा जाता है कि विश्व की सांस्कृतिक विविधता बचाए रखने के उद्येश्य से राष्ट्रसंघ ने 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस घोषित किया है । किंतु क्या “ग्लोबलाइजेशन” के इस युग में सांस्कृतिक संक्रमण और तदनुसार भाषाओं का विद्रूपण अथवा विलोपन रुक सकता है ? अपने देश में अंगरेजी के प्रभाव से जिस प्रकार हिंदी एवं अन्य भाषाएं प्रदूषित हो रही हैं, और जिस प्रकार उस प्रदूषण को लोग समय की आवश्यकता के तौर पर उचित ठहराते हैं, उससे यही लगता है कि इस “दिवस” का लोगों के लिए कोई महत्व नहीं हैं । इस दिन पत्र-पत्रिकाओं में दो-चार लेख अगले दिन भुला दिए जाने के लिए अवश्य लोग देख लेते होंगे, लेकिन अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देने के लिए वे प्रेरित होते होंगे ऐसा मुझे लगता नहीं । अंगरेजी को गले लगाने के लिए जिस तरह भारतीय दौड़ रहे हैं, उससे यही लगता है कि भारतीय भाषाएं मातृभाषा के तौर पर उन्हीं तक सिमट जाएंगी जो दुर्भग्य से अंगरेजी न सीख पा रहे हों । – योगेन्द्र जोशी

श्री शशिशेखर जी,

मैंने आपका लेख “हत्‌भागिनी नहीं हमारी हिंदी” (हिन्दुस्तान, सितंबर 8) पढ़ा । उसी के संदर्भ में अपनी टिप्पणी प्रेषित कर रहा हूं । (अपने ब्लॉग http://hinditathaakuchhaur.wordpress.com में भी मैं इसे शामिल कर रहा हूं ।)

प्रथमतः मैं निवेदन करता हूं कि ‘हत्‌भागिनी’ न होकर ‘हतभागिनी’ होना चाहिए था । शब्द हत (मारा गया) है न कि हत् । शीर्षक में यह त्रुटि खलती है; अन्यथा चल सकता था । इस धृष्टता के लिए क्षमा करें ।

देश-विदेश में हिंदी, पर कितनी?

लेख में आप इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिंदी देश-विदेश में विस्तार पा रही है और अधिकाधिक लोग इसे प्रयोग में ले रहे हैं । आपने जिन अनुभवों की बात की है वे कमोवेश सभी को होते हैं, खास तौर पर इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में । सीधा-सा तथ्य यह है कि जहां कहीं भी पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी/उर्दूभाषी लोग रह रहे हैं, या बस चुके हैं, वहां उनके बीच हिंदी का प्रचलन देखने को मिल जाता है । जब विदेश में अपने देश अथवा भाषाई-सांस्कृतिक दृष्टि से निकटता रखने वाले अन्य देशों के निवासी पहुंचते हैं, तब उनमें परस्पर अपनापन का भाव जगता है यह स्वयं मेरा अनुभव रहा है ।

जब मैं 1983-85 में साउथहैम्पटन (इंग्लैंड) में था तब भारतीयों एवं पाकिस्तानियों से मेरी हिंदी में ही बात होती थी । लंडन के पास साउथहॉल का नजारा कुछ ऐसा हुआ करता था कि वहां पहुंचने पर ‘हम भारत में हैं’ ऐसा लगता था । साउथहैम्पटन में गुजराती दुकानदारों से मैं भारतीय भोजन सामग्री खरीदते समय अक्सर हिंदी में बात करता था । आरंभ में मैं एक पाकिस्तानी खान साहब के मकान में रहा, उनसे हिंदी में बात होती थी । बाद में किसी पंजाबी सज्जन के मकान में रहा जिसके पड़ोस में पंजाबी परिवार रहता था । उस परिवार की हिंदी-पंजाबी बोलने वाली महिला से मेरी पत्नी के अच्छे ताल्लुकात हो चले थे । मुझे एक पाकिस्तानी महोदय की याद है जिन्होंने कहा था, “आप लोग हिंदी बोलने की बात करते हैं, क्या यही हिंदी है, उर्दू जैसी ?”

उन दिनों भारत सरकार हवाई अड्डे पर मात्र 12-13 पौंड की रकम देती थी । मैं जब साउथहैम्पटन पहुंचा तो पता चला कि उस दिन सार्वजनिक छुट्टी है । उसके तथा विदेश यात्रा का पूर्ववर्ती अनुभव न होने के कारण तब मुझे काफी परेशानी झेलनी पड़ी थी । उस दिन एक बांग्लादेशी मूल के रेस्तरांवाले ने मुझे मुफ्त में भोजन कराया था ।

अमेरिका (सिलिकॉन वैली) में भी मेरे अनुभव कुछ मिलते-जुलते रहे । मेरे बेटे के हिंदुस्तानी साथियों के बीच हिंदी-अंगरेजी में वार्तालाप सामान्य बात होती थी । वहां बसे उसके एक मित्र के 5-7 साल के बच्चों को हिंदी में बोलते देख मुझे आश्चर्य हुआ । पता चला कि वे गरमियों में भारत आकर दादा-दादी के पास ठहरते हैं और हिंदी सीखते हैं ।

कहने का मतलब है कि दुनिया के जिन हिस्सों में पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी मूल के लोग हैं वहां वे प्रायः आपका स्वागत करेंगे और हिंदी बोलते हुए भी दिख जाएंगे ।

मुझे पता चला कि कैलिफोर्निया में कुछ प्राथमिक विद्यालयों में चीनी भाषा भी पढ़ाई जाती है । संप्रति अमेरिका में यह सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा है । वहां कई चीनी/कोरियाई मूल के लोगों की दुकानों पर नामपट्ट तक संबंधित लिपि में देखने को मिलते हैं । वहां के एक ‘कंडक्टेड टूअर’ का अनुभव मुझे याद है जिसका गाइड ताइवान मूल का युवक था, जिसने अपनी कमजोर अंगरेजी एवं मजबूत चीनी भाषा में पर्यटक स्थलों का परिचय कराया था । साथ में उपलब्ध पाठ्यसामग्री चीनी एवं अंगरेजी, दोनों में, थी । इस माने में हिंदी एकदम पीछे है ।

आपके-मेरे सरीखे अनुभव संतोष करने के लिए काफी नहीं हैं ऐसा मेरा मानना है । आपने इन दो बातों पर खास कुछ नहीं कहा:

(1) पहला, जो हिंदी अब पढ़ेलिखे लोगों के बीच जड़ें जमा रही है वह दरअसल हिंदी-अंगरेजी का मिश्रण है, और

(2) दूसरा, लिखित रूप में हिंदी की प्रगति निराशाप्रद ही है ।

हिंदी-अंगरेजी मिश्रभाषा

(1) जिस प्रकार यह देश ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ में बंटा है वैसे ही हिंदी (और कदाचित अन्य भारतीय भाषाएं) भी दो श्रेणियों में बंटी है । पहली को मैं व्यक्तिगत तौर पर मैट्रोहिंदी कहता हूं । इसे आप ‘महानगरीय हिंदी’, ‘एंग्लिसाइज्ड हिंदी’, ‘एंग्लोहिंदी’, अथवा ‘हिंदी-इंग्लिश मिश्रभाषा’ या कुछ और नाम दे सकते हैं । यह उन लोगों की भाषा है जो इस देश को ‘भारत’ नहीं कहते बल्कि ‘इंडिया’ कहते हैं । आप बताइए कितने पढ़ेलिखे लोगों के मुख से भारत शब्द निकलता है ? यह उस देश के हाल हैं जहां लोग मुंबई, चेन्नई, पुणे, पश्चिमबंग, ओडिशा, आदि नामों के लिए अभियान चलाते हैं, लेकिन देश को इंडिया कहना पसंद करते हैं । यह उन शिक्षित लोगों की भाषा है जो अंगरेजी के इस कदर आादी हो चुके हैं कि उन्हें समुचित हिंदी शब्द सूझते ही नहीं अथवा उन्हें याद नहीं आते हैं । आज स्थिति यह है कि ‘एंड’, ‘बट’, ‘ऑलरेडी’ आदि शब्द जुबान पर तैरते रहते हैं । कुछ लोग शारीरिक अंगों, ‘किड्नी’, ‘लिवर’, ‘मशल’ आदि और ‘ग्रे’, ‘मरून’ आदि जैसे रंगों की हिंदी बताने में भी असमर्थ पाये जाएंगे । हिंदी की गिनतियां अब जुबान पर कम ही आती हैं । कितने उदाहरण दें ? इस भाषा में अंगरेजी शब्द ही नहीं, वाक्यांश या पूरे वाक्य भी शामिल रहते हैं । पर्याप्त अंगरेजी न जानने वाले की समझ से परे ‘कम्यूनिके’, ‘कॉर्डन-आफ’, ‘सेफ्टी मेजर्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है । यह सब हो रहा है इस कुतर्क के साथ कि इससे हमारी हिंदी समृद्ध होती है । लेकिन अंगरेजी की शुद्धता के लिए वे पूर्णतः सचेत रहते हैं । उसको भी समृद्ध क्यों नहीं बनाते ?

AmarUjala - Mixed Scripts

दूसरी तरफ हमारी ‘देसी’ हिंदी है जो ग्रामीणों, अशिक्षितों/अल्पशिक्षितों, श्रमिकों आदि के द्वारा बोली जाती है, जिनका अंगरेजी ज्ञान अपर्यााप्त रहता है । उस हिंदी की बात होती ही कहां है ?

यह ठीक है कि अभी उक्त मिश्रभाषा का प्रयोग साहित्यिक कृतियों में नहीं हो रहा है, लेकिन टीवी चैनलों पर तो यही अब जगह पा रही है । विज्ञापनों की भाषा भी यही बन रही है । दिलचस्प तो यह है कि इस भाषा की लिपि भी देवनागरी एवं रोमन का मिश्रण देखने को मिल रहा है । इंटरनेट पर रोमन में लिपिबद्ध हिंदी खुलकर इस्तेमाल हो रही है, जब कि फोनेटिक की-बोर्ड के साथ यूनिकोड में टाइप करना कठिन नहीं होता ।

आशाप्रद नहीं लिखित हिंदी की स्थिति

(2) निःसंदेह हिंदी – अंगरेजी मिश्रित ही सही – एक बोली के रूप में विस्तार पा रही है । लेकिन लिखित तौर पर इसका इस्तेमान कितना हो रहा है ? एक ओर सरकारें इसे संघ की राजभाषा कहती हैं अैर दूसरी ओर वही इससे परहेज रखती हैं । ऐसे में अधिक उम्मीद कैसे की जा सकती है ? लोग बातें तो हिंदी में करते हैं, लेकिन लिखित में कुछ बताना हो तो अंगरेजी पर उतर आते हैं । डॉक्टर मरीज से हिंदी में करता है किंतु नुसखा अंगरेजी में ही लिखता है, इस बात की परवाह किए बिना कि मरीज उसे समझ पाएगा या नहीं । लिफाफे पर पता, रेलवे आरक्षण फॉर्म, बैंक लेनदेन का फॉर्म, इत्यादि वे अंगरेजी में ही भरते हैं, अगर वे अल्पशिक्षित न हों तो । कितनी सरकारी संस्थाएं आप गिना सकते हैं जिनकी वेबसाइटें हिंदी में हैं; अगर कहीं हैं तो अधकचरे । इंटरनेट पर कितने फार्म हैं जिन्हें देवनागरी में भरने का विकल्प उपलब्ध हो ? रेलवे आरक्षण टिकट हों या बिजली/टेलीफोन बिल उनकी प्रविष्टियां अंगरेजी में ही मिलेंगी ! जिस देश की सर्वोच्च अदालत ‘नो हिंदी’ कहे, यूपीएससी जैसी संस्था ‘अंगरेजी कंपल्सरी’ कहे, वहां हिंदी का भविष्य कैसा होगा सोचा जा सकता है ।

देश की व्यावसायिक संस्थाओं ने तो जैसे कसम खा रखी है कि वे हिंदी हरगिज नहीं चलने देंगे । बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामग्री के बारे में कितनी संस्थाएं हिंदी-देवनागरी में जानकारी देती हैं ? बिस्किट पैकेट हो या टूथपेस्ट या अन्य उत्पाद उन पर हिंदी दिख जाए तो अहोभाग्य । कंप्यूटर संबंधी उपस्करों के साथ उपलब्ध जानकारी वियतनामी, थाई, हिब्रू, आदि में मिल जाएगी, लेकिन भारतीय भाषाओं में नहीं । हिंदीभाषी क्षेत्रों के दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में घूम जाइए, आपको हिंदी में शायद ही कहीं नामपट्ट दिखें ।

इस बात से आप अगर संतुष्ट हों कि अब अधिक लोग हिंदी बोल रहे हैं, भले ही उसे विकृत कर रहे हों, और उसे न लिखने की कसम खाए हों तो खुशकिस्मत हैं । लेकिन मुझे इसमें संतोष की गुंजाइश नहीं दिखती ।

भवदीय,

योगेन्द्र जोशी

लिवे देवते टीवी तस्वीर

श्रीमतीजी टेलीविजन पर कार्यक्रम देख रही थीं, और मैं कमरे के एक कोने में कुर्सी पर बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था । अचानक उन्होंने ने आवाज दी, “अरे भई, ये ‘लिवे देबते’” क्या होता है ?

“‘लिवे देबते’ ? देखूं, कहां लिखा है ?” कहते हुए मैं उनकी ओर मुखातिब हुआ । उन्होंने टीवी की ओर इशारा किया । मैंने उस ओर नजर घुमाई तो पता चला कि वे समाचार चैनलों पर कूदते-फांदते ‘एबीपी न्यूज’ पर आ टिकी हैं । पर्दें पर चैनल नं., समय, कार्यक्रम, आदि की जानकारी अंकित थी । चैनल बदलने पर इस प्रकार की जानकारी हिंदी में हमारे टीवी के पर्दे पर 2-4 सेकंड के लिए सदैव प्रकट होती है । उस विशेष मौके पर, राजनेता, पत्रकार तथा विशेषज्ञों के 5-6 जनों के जमावड़े के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस चल रही थी ।

मैंने पाया कि टीवी पर्दें पर उपलब्ध जानकारी में वास्तव में ‘लिवे देबते’ भी शामिल था । उसे देख एकबारगी मेरा भी माथा चकराया । इस ‘लिवे देबते’ का मतलब क्या हो सकता है ? अपने दिमाग का घोड़ा सरपट दौड़ाते हुए मैं उसकी खोज में मन ही मन निकल पड़ा । मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि यह तो हिंदी के कोई शब्द लगते नहीं । स्वयं से सवाल किया कि ये कहीं किसी अन्य भाषा के शब्द तो नहीं जो अंगरेजी के रास्ते यहां पहुंचे हों ! रोमन में ये कैसे लिखे जाएंगे यह जिज्ञासा भी मन में उठी और मुझे तुरंत बुद्धत्व प्राप्त हो गया । समझ गया कि यह तो ‘LIVE DEBATE’ है जो उस कार्यक्रम का सार्थक शीर्षक था । वाह! वाह रे चैनल वालो, कार्यक्रम को हिंदी में ‘जीवंत बहस’ या इसी प्रकार के शब्दों में लिख सकते थे । अथवा इसे ‘लाइव डिबेट’ लिख देते । न जाने किस मशीनी ‘ट्रांसलिटरेशन’ (Transliteration) प्रणाली का उन्होंने प्रयोग किया कि यह ‘लिवे देबते’ बन गया । ध्यान दें कि रोमन अक्षरों के लिए L = ल, I = ई, V = व, E = ए, D = द, B = ब, A = अ, T = त, का ध्वन्यात्मक संबंध स्वीकारने पर उक्त लिप्यांतरण मिल जाता है । परंतु अंगरेजी में रोमन अक्षरों की घ्वनियां इतनी सुनिश्चित नहीं होतीं यह संबंधित लोग भूल गये ।

और जब दूसरे दिन फिर चैनल को हम देखने बैठे तो देखा कि गलती दूर हो चुकी है ।  पर्दे पर ‘लाइव डिबेट’ अंकित नजर आरहा था।

इस घटना ने इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान खींचा कि हमारे देश में सर्वत्र अंगरेजी छाई हुई है और हिंदी माध्यमों पर परोसी जाने वाला ज्ञान अंगरेजी में उपलब्ध जानकारी के अनुवाद/लिप्यांतरण पर आधारित होता है; अथवा तत्संबंधित उच्चारण को देवनागरी में प्रस्तुत किया जाता है । इस प्रक्रिया में कभी-कभी हास्यास्पद प्रस्तुति भी पेश हो जाती है, क्योंकि अनुवाद करने वाला शब्दों से संबंधित ध्वनियों से सदैव वाकिफ नहीं होता और शायद उसे किसी स्रोत से जानने की कोशिश भी नहीं करता । दो-एक उदाहरणों पर गौर करें:

(1) समाचारपत्र हिन्दुस्तान में मुझे जर्मनी की समाचार/रेडियो/टीवी संस्था का कभी-कभार उल्लेख देखने को मिल जाता है । लिखा रहता है ‘डाइचे विले’ (Deutsche Welle), जब कि होना चाहिए था ‘डॉइच वेलऽ’ – निकटतम उच्चारण । ऐसा क्यों है ? इसका कारण मेरी समझ में इस तथ्य को नजरअंदाज करना है कि अधिकांश यूरोपीय भाषाओं की लिपि मूलतः रोमन है, जिसे लैटिन भी कहते हैं । आवश्यकतानुसार कहीं-कहीं विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग भी होता है । किंतु हर भाषा के उच्चारण के नियम अलग-अलग हैं जो बहुधा अंगरेजी से पर्याप्त भिन्न रहते हैं । उच्चारण की द्ष्टि से फ्रांसीसी एवं तत्पश्चात् अंगरेजी घटिया मानी जाती हैं । जर्मन भाषा के नियम अधिक साफ-सुथरे हैं । कुछ भी हो, किसी व्यक्ति, संस्था अथवा शहर आदि विदेशी नामों का संबंधित भाषा के बोलने वालों के उच्चारण से भिन्न नहीं होना चाहिए । वह नाम उस भाषा में भी रोमन में ही लिखा जाता है तो क्या उसे हम अंगरेजी के हिसाब से बोलें, क्योंकि हम केवल अंगरेजी से सुपरिचित हैं ? जर्मन में ‘आल्बर्त आइंस्ताइन’ बोला जाता है न कि ‘ऐल्बर्ट आइंस्टीन’ । किसे सही माना जाए ? इन बातों की जानकारी मुझे तब हुई जब एम.एससी. पाठ्यक्रम के दौरान मुझे एक आस्ट्रियाई सज्जन से प्राथमिक जर्मन पढ़ने का मौका मिला । (आस्ट्रिया की भाषा भी जर्मन है ।)

(2) मैं जब एम.एससी. में पढ़ता था तो हमें आरंभ के कुछ समय तक रज्जू भैया जी (जो कालांतर में आर.एस.एस. प्रमुख बने थे) ने भी पढ़ाया था । हम लोग फ्रांसीसी वैज्ञानिक Langevin को ‘लांजेविन’ कहते थे । उन्होंने ही हमें बताया कि यह फ्रांसीसी नाम असल में ‘लाजवां’ बोला जाता है । इसी प्रकार यह भी जाना कि वैज्ञानिक Fermat का नाम फर्मा है न कि ‘फर्मैट’

(3) ब्रिटेन का एक शहर है Leicester जहां अनेक भारतीय बसे हैं । मैं उसे ‘लाइसेस्टर’ कहता था । इंग्लैंड पहुंचने पर पता चला कि वह ‘लेस्टर’ है ।

(4) दो-तीन रोज पहले अखबार में अमेरिका के Yosemite राट्रीय उद्यान (कैलिफोर्निया) के बारे में खबर थी । उसमें इस स्थल को ‘योसेमाइट’ कहा गया था । बहुत अंतर तो नहीं, फिर भी यह ‘योसेमिती’ कहा जाता है, जो स्पेनी भाषा पर आधारित है जिसका प्रचलन आारंभ से ही उस क्षेत्र में काफी रहा है । वहां पहुचने पर मुझे पता चला कि जिस शहर को मैं ‘सैन जोस’ (San Jose) समझता था वह दरअसल ‘सान होजे’ कहलाता है ।

किसी भाषा का विस्तृत ज्ञान कदाचित् किसी को नहीं होता है । किंतु जो लोग पत्रकारिता जैसे व्यवसाय में लगे हों उन्हें सही-सही वर्तनी एवं उच्चारण जानने की उत्कंठा होनी ही चाहिए । आज के युग में शब्दकोश तथा इंटरनेट काफी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं । – योगेन्द्र जोशी

Auroville - Globe

मैं दो-तीन माह पहले पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) घूमने निकला था । पुद्दुचेरी संघीय सरकार द्वारा शासित एक राज्य है, जिसके बारे में मुझे यह जानकारी नहीं थी कि यह वास्तव में दक्षिण भारत में स्थित चार अलग-अलग और छोटे-छोटे भूक्षेत्रों से बनी प्रशासनिक इकाई है, जिनमें पांडिचेरी (293 वर्ग किलोमीटर) नामक स्थान सबसे बड़ा और मुख्यतः शहरी क्षेत्र है । इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी है, अन्यथा यह लगभग चारों तरफ से तमिलनाडु से घिरा है । इस शहर के बाहर ग्रामीण क्षेत्र भी है । इसके अतिरिक्त दक्षिण की ओर कुछ दूरी पर तमिलनाडु से घिरा समुद्र तट स्थित ‘कराईकल’ (160 वर्ग कि.मी.) भी इसका हिस्सा है  । आंध्र के तटीय क्षेत्र में ‘यानम’ (30 वर्ग कि.लो.) और केरला तट पर ‘माहे’ (9 वर्ग कि.मी.) भी इसी राज्य के अंग हैं । ये सभी स्थान कभी फ्रांसीसी प्रभुत्व में होते थे । उसी के अनुरूप इन्हें मिलाकर एक अलग केंद्र शासित राज्य का दर्जा स्वतंत्र भारत में क्यों दिया गया यह मेरी समझ से परे है ।

पुद्दुचेरी यात्रा के विविध अनुभवों में मेरे लिए सबसे अहम रहा है वहां की भाषाई समस्या । यों तो दक्षिण भारत में हिंदी बहुत नहीं चलती है, फिर भी बड़े शहरों एवं पर्यटन स्थलों में हिंदी से अक्सर काम चल जाता है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही रहा है । यहां तक कि चेन्नई में भी आप भाषा को लेकर असहाय नहीं महसूस करेंगे । दक्षिण भारत की यात्राओें के दौरान हिंदी संबंधी अपने अनुभवों पर मैं पहले भी लिख चुका हूं । देखें 14 मई 2009 की तथा उससे पूर्ववर्ती पोस्टें । पुद्दुचेरी तमिलों का प्रदेश है तमिलनाडु की ही भांति । स्थानीय निवासियों का रहन-सहन, खानपान, जीवनशैली, भाषा आदि वैसा ही है जैसा तमिलों का अन्य स्थानों में है । फ्रांसीसियों का उपनिवेश रह चुकने के कारण वहां फ्रांसीसी भाषा-संस्कति का प्रभाव कुछ हद तक देखा जा सकता है । मेरी समझ से उसका कारण प्रमुखतया श्री ऑरोविंदो रहे हैं, जिन्होंने पुद्दुचेरी को अपनी कर्मभूमि चुना और वहीं अपना आश्रम स्थापित किया । श्री ऑरोविंदो फ्रांसीसी भाषा के ज्ञाता थे और फ्रांसीसियों से उनका घनिष्ठ संबंध रहा है, विशेषतः इसलिए कि आश्रम की ‘द मदर’ (मीरा अल्फासा? Mirra Alfassa) फ्रांस से आकर उनसे जुड़ गईं । श्री ऑरोविंदो के विदेशी शिष्यों में फ्रांसीसी लोग ही अधिकांशतः रहे हैं । आज भी उस आश्रम में आने वालों में फ्रांस के लोग ही सर्वाधिक रहते हैं, चाहे वे पर्यटक की हैसियत रखते हों या श्री ऑरोविंदो के अनुयायी होने की ।

पुद्दुचेरी में मुझे हिंदीभाषी अथवा उत्तरभारतीय नहीं दिखे । अवश्य ही उनकी संख्या नगण्य होगी, अतः मेरी नजर में नहीं आये होंगे । सरदार लोगों (सिखों) के बारे में कहा जाता है कि वे देश के हर कोने में मिल जाते हैं । मुझे याद नहीं आ रहा कि वहां किसी पगड़ीधारी सरदारजी को मैंने देखा हो । मारवाड़ी भी अक्सर सभी जगह मिल जाते हैं व्यापारिक गतिविधियों में संलग्न । वहां कहीं कोई रहा हो तो वह वहीं रचबस कर तमिलभाषी हो गया होगा । दक्षिण के अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोग शायद होंगे, किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं सकता ।

वहां कुल मिलाकर दो-तीन लोग मुझे मिले होंगे जो हिंदी/उर्दू बोलना-समझना कर पा रहे थे । एक व्यक्ति मिला था मुझे एक दुकान के बाहर । मैंने उससे अपने गंतव्य एक चौराहे के बारे में पूछा था, इशारों के साथ हिंदी शब्द बोलकर । उसने साफ हिंदी में जवाब दिया । मेरा अनुमान है कि वह नेपाली रहा होगा । एक और सज्जन मिले अन्यत्र जिनसे मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही । हुलिया से मुझे वे मुस्लिम वंधु लगे । मेरा ख्याल है कि दक्षिण के अधिकांश इस्लाम धर्मावलंबी उर्दू की थोड़ी-बहुत समझ रखते हैं ।

मुझे पुद्दुचेरी में भाषाई समस्या का जो अनुभव हुआ वह अन्य प्रमुख नगरों के अनुभव से कुछ भिन्न था । वहां हिंदी से ठीकठाक काम नहीं चल पाता है, और अंगरेजी भी अच्छा काम नहीं देती है । राह चलते मिलने वाले लोग अंगरेजी कम ही बोल पाते हैं ऐसा मुझे लगा । कुछ हद तक अंगरेजी उच्चारण भी एक समस्या रहती है; उनका उच्चारण उत्तरभारतीयों से भिन्न प्रतीत होता है । मैंने अनुभव किया कि पुद्दुचेरी का महत्व आम भारतीयों के लिए शायद नहीं है । वह कोई चर्चित तीर्थस्थल नहीं है और न ही विशेष आकर्षण का पर्यटक स्थल है । अरोविंदो दर्शन में रुचि लेने वाले ही कदाचित् वहां पहुंचते होंगे । इसलिए न हिंदी वहां पहुंच सकी और न ही वहां के बाशिंदों को अंगरेजी की खास जरूरत महसूस हुई होगी । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि तमिलनाडु की राजनीति आंरभ से ही हिंदी विरोध पर टिकी रही है । तमिलनाडु तथा पुद्दुचेरी की राजनीति में कोई अंतर नहीं है । इसके अलावा अंगरेजी सरकारी एवं व्यावयायिक कार्यालयों तक ही सीमित कर रह गई होगी । जब मैं वहां के पर्यटन कार्यालय गया तो अंगरेजी में बात करना भी सुविधाजनक नहीं लगा ।

हिेदीभाषी तथा अन्य उत्तरभारतीय पर्यटकों की संख्या अधिक न होने से वहां के आटोरिक्शा चालकों और फुटकर दुकानदारों को भी हिंदी की जरूरत नहीं शायद नहीं रहती है । इसलिए उनके साथ मैंने इशारों एवं अंगरेजी-हिंदी शब्दों की मदद से काम चलाया था । लेकिन इतना सब होने के बावजूद एक अनुभव दिलचस्प रहा । मैं पुद्दुचेरी शहर से 20-25 किलोमीटर दूर ऑरोविंदो आश्रम से संबद्ध ऑरोविंदो विलेज गया था । वहां के पर्यटक स्थलों में यही कदाचित् सबसे आकर्षक है । वहां मुझे विदेशी पर्यटकों के अलावा देश के अन्य भागों से आए पर्यटक भी मिले । वहां ऑरोविंदो ग्राम के उद्येश्य एवं कार्यक्रमों के बारे में एक कमरे में 10-15 मिनट का वीडियो दिखाया जाता है, जिसकी भाषा दर्शकों की इच्छानुसार तमिल, अंगरेजी अथवा हिंदी चुनी जाती है । जब मेरी मौजूदगी में वीडियो प्रदर्शित किया गया तब मैंने  पाया कि देश के विभिन्न भागों से आए संभ्रांत और सुशिक्षित-से लगने वाले दर्शकों ने अंगरेजी के बदले हिंदी को चुना । स्पष्ट है अधिकतर देशवासियों के लिए हिंदी अधिक सुविधाजनक सिद्ध होती है । उस घटना से यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अंगरेजी में प्रायः सभी लिखित कार्य करने के आदी होने के बावजूद अधिकतर देशवासी उसमें कही गई मौखिक बातें सरलता से नहीं समझ पाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

Pondichery - Ambedkar Mandapam

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भारतीय (बेहतर होगा इंडियंस कहना ) अपनी ही भाषाओं का तिरस्कार क्यों करते हैं? इस सवाल का सर्वस्वीकार्य उत्तर शायद ही कोई दे सकता हो; हां अपनी-अपनी सोच के अनुसार लोग तमाम संभावनाओं की चर्चा कर सकते हैं । इस विषय में मेरे अपने कुछ विचार हैं किंतु उनका उल्लेख मैं इस आलेख में नहीं कर रहा हूं । इस समय मैं एक हालिया (7 मार्च) लेख की चर्चा करना चाहता हूं जो मुझे इकॉनॉमिस्ट-डाट-कॉम पर पढ़ने को मिला था । उसमें उल्लिखित कुछ बातें में यहां प्रस्तुत कर रहा हूं। उसमें कही गई जो बात मुझे खास लगी वह है “प्रायः सभी समाजों में लोग अपनी भाषाओं से अत्यंत लगाव रखते हैं। हिंदी एक अपवाद है।”  अंग्रेजी में लिखित इस लेख का शीर्षक है “The keenest Wikipedians(क्लिक करें) ।

10 लाख से अधिक विकीपीडिया लेख

लेख के अनुसार ‘विकीपीडिया’ विभिन्न भाषाओं में लिखित लेखों का भंडार बन चुका हैं, जिसमें उपलब्ध कई लेख अत्यंत उपयोगी पाए जाते हैं, पर सभी नहीं । विश्व की पांच भाषाओं में 10 लाख से भी अधिक लेख छप चुके हैं । ये भाषाएं हैं: अंग्रेजी (English), जर्मन (German), फ्रांसीसी (French), इतालवी (Italian), एवं डच (Dutch) ।

लेख में बताया गया है कि यूरोप के नेदरलैंड राष्ट्र के 100 प्रतिशत डचभाषी छात्र अंग्रेजी भी पढ़ते हैं, और प्रायः हर नागरिक फर्राटे से अंग्रेजी बोल सकता है । ऐसा क्यों है कि अंग्रेजी जानने के बावजूद डच भाषा में इतने अधिक लेख छपते हैं, जब कि उस देश की जनसंख्या मात्र लगभग 1.7 करोड़ है ? लेखक के अनुसार इसका कारण मात्र यह है कि अन्य भाषाओं की अच्छीखासी जानकारी रखने के बावजूद लोग अपनी भाषाओं से अत्यंत लगाव रखते हैं और उसे ही इस्तेमाल करने की इच्छा रखते हैं ।
अपनी उस भाषा को जिसे लोग छोड़ने की नहीं सोचते उसे लेखक ने “अंडरवेयर लैंग्वेज” (Underwear Language) की संज्ञा दी है ।

1 से 10 लाख तक के लेख

अन्य भाषाओं, जिनके 1 लाख से अधिक लेख विकीपीडिया पर उपलब्ध हैं, में रूसी, अरबी एवं चीनी शामिल हैं । किंतु दिलचस्प तो यह है कि ऐसी भी कुछ भाषाएं हैं जो किसी देश की भाषा के रूप में स्थापित नहीं हैं, फिर भी उनमें छपे लेख 1 लाख से कम नहीं हैं, क्योंकि उन्हें बोलने वाले लोग है और वे उनका भरपूर प्रयोग करने का इरादा रखते हैं । इनमें शामिल हैं स्पेन में प्रचलित गैलिशियन (Galician), बास्क (Basque) तथा कैटलैन (Catalan) भाषाएं । ये स्पेन के उन बाशिंदों की भाषाएं हैं जो स्पेनी बोल सकते हैं और उसे इस्तेमाल भी करते हैं, फिर भी अपनी भाषाओं को प्रयोग में लेना पसंद करते हैं । लेख के अनुसार उक्त तथ्य इस बात का संकेत देता है कि लोग अपनी भाषाओं के प्रति विशेष लगाव रखते हैं ।

परंतु इससे अधिक चकित करने वाली बात तो यह है कि एस्परांटो (Esperanto, यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित आम शब्दों पर आधारित एक कृत्रिम भाषा) में करीब 176,800 लेख विकीपीढिया में मिलते हैं । इसी प्रकार वोलापुक (Volapuk, एक अन्य कृत्रिम भाषा, जो लैटिन क्रियाओं को प्रयोग में लेते हुए मुख्यतः अंग्रेजी एवं कुछ सीमा तक जर्मन एवं फ्रांसीसी पर आधारित है) में 119,091 लेखों के छपे होने की बात कही गई है । यह भी जानकारी दी गई है कि इसके बोलने वाले कुछ गिने-चुने लोग ही हैं । फिर भी इतनी बड़ी संख्या में लेखों पर ताज्जुब ता होता ही है । ऐसा प्रतीत होता है कि किसी ने ‘ऑटोट्रांसलेशन’ के जरिये अन्य भाषाओं के लेख वोलापुक में डाल दिए हों ।

दिलचस्प यह है कि विकीपीढिया पर वोलापुक के लेखों की संख्या हिंदी में उपलब्ध लेखों से अधिक है । ऑटोट्रांसलेशन के माध्यम से तो हिंदी में भी लेख छप सकते हैं । फिर किसी ने ऐसा प्रयास क्यों नहीं किया होगा ?

हिंदी को लेकर लेखक की टिप्पणी सीधी-सी है: हिंदी कदाचित् ‘भाषाई लगाव के सिद्धांत’ का एक अपवाद है । अर्थात् हिंदीभाषी स्वयं अपनी भाषा से लगाव नहीं रखते और अंगरेजी लेखों का ही अध्ययन करते हैं । जब आपकी अपनी भाषा में रुचि ही न हो तो उसमें लेख लिखने की जहमत क्या उठाएंगे? यह स्थिति तब है जब हिंदी में लिखित रचनाओं की कोई कमी नहीं और इसके बोलने वाले लोगों की संख्या दशियों करोड़ों में है – किसी भी यूरोपीय भाषा के बोलने वालों से अधिक ।

1 लाख से कम लेख

लेखक ने इस पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि अलेमानिक (Alemannic) पीडमोंटीज (Piedmontese) जावानीज (Javanese) में भी लेखों की संख्या (क्रमशः 13,708, 59,303, तथा 43,122) निराशाप्रद है, जब की इनके भाषाभाषियों की संख्या करोड़ों में है । स्पष्ट है कि संबंधित लोग उन अन्य भाषाओं में लेख पढ़ते हैं जिन्हें वे जानते हैं ।

आगे यह भी जानकारी दी गई है कि हावजू (Zhosa) में मात्र 146 लेख ही उपलब्ध हैं । इस भाषा के जानने वालों की संख्या करीब 80 लाख बताई गई है और यह भी कि नेल्सन मंडेला की मातृभाषा है । अपनी भाषाओं के प्रति उदासीनता काफी व्यापक है, और यह उसका एक उदाहरण है ।

विकीपीडिया लेखों के भाषाई आधार पर विभाजन के अध्ययन में एक भाषा हेरेरो (Herero, कुछ अफ्रिकी देशों में बोली जाने वाली भाषाओं में से एक) का भी जिक्र है, जिसमें एक भी लेख शामिल नहीं है, यद्यपि उसका होमपेज बना हुआ है

भाषाई गहराई

लेखक ने भाषाई गहराई (Depth of Language) को भी परिभाषित किया है । अध्ययनकर्ता के अनुसार अहमियत केवल इस बात की नहीं होती है कि कितने लेख अमुक भाषा में लिखित पाए जाते हैं । यह बात भी अहमियत रखती है कि उन लेखों को कितना संपादित किया जाता है, जो लोगों की सक्रिय दिलचस्पी का द्योतक हैं । भाषाई गहराई को दोनों (संख्या एवं गहराई) के अनुपात के तौर पर परिभाषित किया गया है । उम्मीद के अनुरूप 42 लाख लेखों के साथ अंगरेजी अन्य भाषाओं के बहुत आगे पाई गई है । रोचक तथ्य यह भी है कम लेखों के बावजूद हिब्रू, अरबी, फारसी, तथा तुर्की इस गहराई के मामले में जर्मन एवं इतालवी के आगे हैं । हिंदी कहां पर है इसका जिक्र नहीं किया गया है । चीनी भाषा की चर्चा भी कहीं नहीं दिखी ।

बहरहाल इस दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य पर अपने देशवासियों को विचार करना चाहिए कि जिस भाषा को राजभाषा का तमगा पहनाया गया है और जो अनेकों जनों की मातृभाषा है, उसी के बोलने वाले उसे इतनी हिकारत की निगाह से क्यों देखते हैं । क्या यह हमारी मानसिक ग़ुलामी का द्योतक है, यानी कि देश राजनैतिक तौर पर तो आज़ाद हो गया लेकिन दिमागी तौर पर नहीं । हाल में संघ लोकसेवा आयोग (UPSC) की परीक्षाओं में अंगरेजी का कद बढ़ाने और देशी भाषाओं को हासिये पर डालने का निर्णय इसी मानसिकता का संकेतक है । (फ़िलहाल वह निर्णय टल गया है ।) - योगेन्द्र जोशी

इस चिट्ठे की पिछली चार प्रविष्टियों में (देखें तारीख 24 अगस्त 2012 की पोस्ट और उसमें उल्लिखित पूर्ववर्ती आलेखों को) मैंने हिंदी-अंगरेजी के मिश्रण से उपजी एक खिचड़ी भाषा की चर्चा की है, जो आज के महानगरों में अंगरेजी पढ़े-लिखे लोगों द्वारा बोली जा रही है । इसे मैंने मेट्रोहिंदी नाम दिया है । जिस किसी ने इस भाषा के बारे मेरे विचारों को इस ब्लॉग पर पढ़ा हो, और सचेत होकर टीवी चैनलों पर समाचारों/बहसों तथा अपने आसपास विविध मुद्दों पर लोगों के वार्तालापों को सुना हो, उसे यह अंदाजा तो लग ही चुका होगा कि किस प्रकार हिंदी-अंगरेजी मिश्रण की एक नयी भाषा/बोली इस देश में विकसित हो रही है । मैं इस स्थल पर शेष बातें इसी भाषा में व्यक्त कर रहा हूं, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो सके । मेट्रोहिंदी में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि अभी तक देवनागरी के माध्यम से प्रायः साफसुथरी हिंदी में अथवा रोमन के साथ अंगरेजी में लिखने की आदत रही है । अतः उक्त कार्य के लिए अपेक्षया अधिक प्रयास करना पड़ेगा ।

मेट्रोहिंदी की खास बात यह है कि इसमें भारत के लिए कोई जगह नहीं । आपको सभी के मुख से इंडिया सुनने को मिलेगा: इंडिया शाइनिंग, चक दे इंडिया, इंडियन टीम, इंडिया मांगे गोल्ड, एटसेटेरा एटसेटेरा । दरअसल पॉलिटिकल इंडिपेंडेंस के बाद इंडिया में इंग्लिश की इंपॉर्टेन्स घटने के बजाय बढ़ती चली गई । इंडिपेंडेंस के लिए जिन लोगों ने स्ट्रगल किया था उन्होंने यह इक्सपेक्ट किया था कि इस कंट्री की अपनी लैंग्वेज होगी और सूनर ऑर लेटर हमारी सभी एक्टीविटीज उसी लैंग्वेज में होंगी । लेकिन उनके ड्रीम्ज धरे ही रह गये ।

इंग्लिश के फेबर में आर्ग्युमेंट्स
इस कंट्री में एक ऐसा सोशल सेक्सन उभरा है जो ऑफिशियल लैंग्वेज हिंदी को यूज करने में बिल्कुल भी इंटरस्टेड न था, न आज है और न कभी होगा । इस सेक्शन के पास इंग्लिश के फेबर में अनेक रैशनल-इर्रैशनल आर्ग्युमेंट्स हैं । चूंकि कंट्री का एड्मिनिस्ट्रेशन इसी के हाथ में सदा से चला आ रहा है, इसलिए हिंदी समेत सभी इंडियन लैंग्वेजेज पर इंग्लिश आज तक हावी बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी । इनके आर्ग्युमेंट्स के इग्जाम्पुल कुछ यों हैं:

1. इंडिया की इंटिग्रिटी के लिए इंग्लिश जरूरी है ।
2. इंग्लिश इज ऐन इंटरनैशनल लैंग्वेज, इसलिए इंग्लिश को प्रमोट किया जाना चाहिए । हर इंडियन को इंग्लिश सीखनी चाहिए ।
3. दुनिया में हर सब्जेक्ट की नॉलेज इंग्लिश में ही अवेलेबल है, इसलिए इंग्लिश के बिना हम दूसरे कंट्रीज से पिछड़ते चले जाएंगे ।
4. साइंस, इंजिनियरिंग, मेडिसिन जैसे सब्जेक्ट्स की टीचिंग और स्टडी इंडियन लैंग्वेजेज में पॉसिबल ही नहीं है ।
5. आज के कंप्यूटर एज में इंटरनेट का यूज इंग्लिश के बिना पॉसिबल नहीं है ।
6. बिजनेस एंड प्रोफेशनल एक्टिविटीज में इंग्लिश इसेंशियल है । इसलिए नौकरी-पेशे में इंग्लिश जरूरी है ।

और भी आर्ग्युमेंट्स इस सोशल सेक्शन के दिमाग में होंगे । अभी में अधिक नहीं सोच पा रहा हूं ।

मेरे ऑब्जर्वेशन्ज
द सिंपल फैक्ट नाव इज कि इंग्लिश हिंदी और अदर लैंग्वेजेज पर हावी है । इंडियन्ज के दिमाग में यह घुस चुका है कि लाइफ में वे इंग्लिश के बिना सक्सेस नहीं पा सकते हैं । मेरे इन ऑब्जर्वेशन्ज पर नजर डालें और सोचिए कि मैं करेक्ट हूं या नहीं:

1. आम इंडियन, जिसे थोड़ी-बहुत इंग्लिश आती है, रिटन फार्म (लिखित रूप) में हिंदी के यूज में इंटरस्टेड नहीं रहता । उसकी प्रिफरेंस इंग्लिश रहती है । किसी रजिस्टर में नाम/सिग्नेचर रिकार्ड करना हो तो वह इंग्लिश (रोमन) का ही यूज करेगा । ऐसा मैं BHU जैसी यूनिवर्सिटी, जहां मैं टीचिंग एंड रिसर्च करता था, में देखता आया हूं ।
2. कहा जाता है कि हिंदी की पॉपुलरिटी में हिंदी सिनेमा का बड़ा कंट्रिब्यूशन रहा है । बट याद रखें वह हिंदी नहीं मेट्रोहिंदी है । यह भी देखिये कि फिल्मों की कास्टिंग वगैरह देवनागरी में रेयरली होती है ।
3. हिंदी सिनेमा में काम करने वाले एक्टर्स वगैरह मोस्टली मेट्रोहिंदी या प्युअर इंग्लिश में बात करते हैं, भले ही वे हिंदी जानते हों । यही बात स्पोटर्समेन पर भी लागू होती है ।
4. इट इज अ फैक्ट कि हिंदी इस कंट्री की ऑफिशियल लैंग्वेज है न कि इंग्लिश, बट प्रैजिडेंट, प्राइम-मिनिस्टर एंड हाई ऑफिशियल्स फॉरेन टुअर्स या UNO में हिंदी नहीं बोलते हैं, यह जानते हुए भी कि हेड्ज ऑव अदर कंट्रीज अपने यहां की ही लैंग्वेज बोलते हैं । अटल बिहारी बाजपाई वज एन इक्सेप्शन ! आइरनी तो यह है कि हिंदी को खुद यूज नहीं करेंगे लेकिन यूएनओ की ऑफिशियल लैंग्वेजेज में इंक्लूड करने की बात करते हैं ।
5. इंडियन बिजनेसमेन एंड कॉमर्शियल हाउसेज तो हिंदी और उसकी स्क्रिप्ट को यूज न करने के लिए डिटर्मिन्ड हैं । इसलिए आप कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स पर रैलिवेंट इंफर्मेशन इंग्लिश में ही प्रिंटेड पाएंगे ।
6. हिंदी-स्पीकिंग हो या न हो, सभी जगह – गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स छोड़ दें – होटल्स, बिल्डिंग्ज, शॅपिंग मॉल्ज, बिजनेस हाउसेज एंड स्कूल-कॉलेज के नाम मोस्टली इंग्लिश में लिखे मिलते हैं ।
7. गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स की बेवसाइट्स इंग्लिश में ही अवेलेबल हैं । कहीं-कहीं उनका हिंदी वर्जन जरूर मिल जाता है, बट ऑनलाइन एक्टिविटी के मामले में इंग्लिश ही यूजुअली काम देती है । फॉर इग्जांपल रेलवे रिजर्वेशन फॉर्म की एंट्रीज इंग्लिश में देनी पड़ती हैं, एंड उसके हिंदी प्रिंट आउट में भी नेम, स्टार्टिंग स्टेशन, डेस्टिनेशन वगैरह रोमन में ही मिलेंगे ।

आई मीन टु से कि गवर्नमेंटल एंड नॉन-गवर्नमेंटल, दोनों लेबल्स पर इंग्लिश की जरूरत फील की जाती है । हिंदी के बिना काम चल सकता है, बट इंग्लिश के बिना नहीं । इसका रिजल्ट यह है कि सभी इंडियन्ज का इंक्लिनेशन इंग्लिश की स्टडी की ओर है । हां बोलचाल के लिए केवल वर्किंग नॉलेज ऑव हिंदी चाहिए, जिसे हिंदी-स्पीकिंग रीजन्ज में लोग बतौर मदरटंग सीख ही लेते हैं । उन्हें काम चलाने के लिए इंप्रेसिव हिंदी-वोकैबुलरी की जरूरत नहीं होती है । बट इंप्रेसिव इंग्लिश-वोकैबुलरी इज ऐन असेट !!

हिंदी का फ्यूचर
मुझे लगता है कि फ्यूचर में प्युअर हिंदी – ऐसी लैंग्वेज जिसमें इंग्लिश वर्ड्स की अन्लिमिटेड मिक्सिंग न हो – केवल लिटरेरी राइटिंग तक सिमट कर रह जाएगी । हाईली-लिटरेट अर्बन पीपल मेट्रोहिंदी ही बोलचाल में यूज करेगा । यहां तक कि हिंदी न्यूजपेपर्स एंड मैगजीन्स में भी मेट्रोहिंदी जगह पा लेगी, जिसका इंडिकेशन उन आर्टिकिल्स एंड ऐड्वरटिजमेंट्स में मिलता है जो आज के यूथ को ऐड्रेस करके लिखे जा रहे हैं । टीवी प्रोग्रैम्ज में तो मेट्रोहिंदी ही दिखती है ।

मैंने जिस सोशल सेक्शन की बात ऊपर कही है उसका इंटरैस्ट प्युअर हिंदी में नहीं है, इसलिए उसकी हिंदी वोकैबुलरी कमजोर रहती है, जिसके चलते हिंदी के बारे उसकी यह ओपीनियन बन जाती है कि हिंदी डिफिकल्ट है । वह कहता है कि उसे हमें सिम्पल बनाना चाहिए और इस पर्पज के लिए इंग्लिश वडर््ज का यूज विदाउट हेजिटेश्न करना चाहिए । ऐसी सिचुएशन में प्युअर हिंदी लिंग्विस्टिक करप्शन से बच पाएगी यह क्वेश्चन इंपॉर्टेन्ट हो जाता है ।

द जिस्ट आव् ह्वट हैज बीन सेड यह है कि हिंदी सर्वाइव करती रहेगी लेकिन अपने इक्सट्रीम्ली करप्ट फॉर्म में । प्युअर हिंदी – चाहे वह लिटरेचर में हो या वेबसाइट पर – को पढ़ने एंड अंडरस्टैंड करने वाले बहुत नहीं रहेंगे । अंगरेजी की सुप्रिमेसी बनी रहेगी, ऐट लीस्ट रिटन फॉर्म में !

जिस लैंग्वेज में मैंने ये आर्टिकल लिखा है उसे आप ऑर्डिनरीली न्यूजपेपर/मैगजीन्स में नहीं देखते होंगे । अभी यह लैंग्वेज बोलचाल में ही सुनने को मिल रही है । बट मेरा मानना है कि फ्यूचर में ऐसे आर्टिकल्स अन्कॉमन नहीं रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

आज 14 सितंबर यानी ‘हिन्दी दिवस’ है, इंडिया दैट इज भारत की घोषित राजभाषा को ‘याद’ करने का दिन । यह वही दिन है जब 62 वर्ष पहले हिन्दी को संघ की राजभाषा घोषित किया गया ।

मैं आज तक नहीं समझ पाया कि इस देश के संविधान-निर्माताओं के मन में हिन्दी राजभाषा घोषित करने का उत्साह क्योंकर जागा? क्या इसलिए कि ‘अपनी देशज भाषा’ ही स्वाभिमान रखने वाले देश के राजकाज की भाषा होनी चाहिए ? मुझे अपना यह मत व्यक्त करने में संकोच नहीं होता है कि अपने संविधान-निर्माताओं में दूरदृष्टि का अभाव रहा होगा । मैं ऐसा इस आधार पर कहता हूं कि आज राजनैतिक दृष्टि से और राजभाषा की दृष्टि से देश के जो हालात हैं उनकी कल्पना उन्होंने नहीं की । उन्होंने संविधान लिखने में और राजभाषा घोषित करने में आदर्शों को ध्यान में रखा, न कि जमीनी हकीकत को । वे यह कल्पना नहीं कर सके कि भावी राजनेता किस हद तक सत्तालोलुप होंगे और अपने हितों को सही-गलत तरीकों से साधने में लगे रहेंगे । वे यह भी समझ पाये कि भावी जनप्रतिनिधि ‘बांटो और राज करो’ की नीति अपनाकर समाज के विभिन्न समुदायों को वोट-बैंकों में विभाजित कर देंगे ।

मैं संविधान की कमियों की चर्चा नहीं करना चाहता, लेकिन यह अवश्य कहूंगा कि हिन्दी को राजभाषा घोषित करने में संविधान-निर्माता उतावले जरूर रहे । वे इस बात को क्यों नहीं समझ सके कि देश में अंगरेजी का वर्चस्व घटने वाला नहीं, और वह देशज भाषाओं के ऊपर राज करती रहेगी ? वे क्यों नहीं समझ सके कि शासन में महती भूमिका निभाने वाला प्रशासनिक वर्ग हिंदी को कभी बतौर राजकाज की भाषा के पनपने नहीं देगा ? और यह भी कि वह वर्ग समाज में यह भ्रांति फैलाएगा कि अंगरेजी के बिना हम शेष विश्व की तुलना में पिछड़ते ही चले जाएंगे ?

हिंदी के राजभाषा घोषित होने के बाद शुरुआती दौर में अवश्य कुछ हलचल रही, किंतु समय के साथ उसे प्रयोग में लेने का उत्साह ठंडा पड़ गया । तथ्य तो यह है कि एक दशक बीतते-बीतते यह व्यवस्था कर ली गई कि अंगरेजी ही राजकाज में चलती रहे ।

आज स्थिति यह है कि स्वयं केंद्र सरकार हिंदी में धेले भर का कार्य नहीं करती । बस, अंगरेजी में संपन्न मूल कार्य का हिंदी अनुवाद कभी-कभी देखने को मिल जाता है । न तो राज्यों के साथ हिंदी में पत्राचार होता है, न ही व्यावसायिक संस्थाओं के साथ । ऐसी राजभाषा किस काम की जिसे इस्तेमाल ही नहीं किया जाना है ? आप कहेंगे कि शनैः-शनैः प्रगति हो रही है, और भविष्य में हिंदी व्यावहारिक अर्थ में राजभाषा हो ही जाएगी । जो प्रगति बीते 62 सालों में हुई है उसे देखकर तो कह पाना मुश्किल कि कितनी सदियां अभी और लगेंगी ।

इस बात पर गौर करना निहायत जरूरी है कि किसी भी भाषा का महत्त्व तभी बढ़ता है जब वह व्यावसायिक कार्यक्षेत्र में प्रयुक्त होती है । याद रखें कि अंगरेजी अंतरराष्ट्रीय इसलिए नहीं बनी कि वह कुछ देशों की राजकाज की भाषा रही है, बल्कि इसलिए कि संयोग से व्यापारिक कार्यों में वह अपनी गहरी पैठ बना सकी । आम आदमी को केंद्र सरकार के साथ पत्राचार या कामधंधे की उतनी बात नहीं करनी पड़ती है जितनी व्यावसायिक संस्थाओं से । अपने देश की स्थिति क्या है आज ? सर्वत्र अंगरेजी छाई हुई है । देखिए हकीकत:

1.     बाजार में समस्त उपभोक्ता सामग्रियों के बारे में मुद्रित जानकारी अंगरेजी में ही मिलती है । रोजमर्रा के प्रयोग की चीजों, यथा साबुन, टूथपेस्ट, बिस्कुट, तेल आदि के पैकेट पर अंगरेजी में ही लिखा मिलता है ।

2.     अस्पतालों में रोगी की जांच की रिपोर्ट अंगरेजी में ही रहेगी और डाक्टर दवा का ब्योरा अंगरेजी में ही लिखेगा, मरीज के समझ आवे या न, परवाह नहीं ।

3.     सरकारी बैंकों के नोटिस-बोर्डों पर हिन्दी में कार्य करने की बात लिखी होती है, लेकिन कामकाज अंगरेजी में ही होता है ।

4.     स्तरीय स्कूल-कालेजों – अधिकांशतः निजी एवं अंगरेजी माध्यम – में प्रायः पूरा कार्य अंगरेजी में ही होता है । जिस संस्था में हिन्दी में कार्य होता है उसे दोयम दर्जे का माना जाता है, और वहां गरीबी के कारण या अन्य मजबूरी के कारण ही बच्चे पढ़ते हैं । इन घटिया सरकारी स्कूलों के कई छात्रों को तो ठीक-से पढ़ना-लिखना तक नहीं हो आता !

5.     सरकारी संस्थाओं की वेबसाइटें अंगरेजी में ही तैयार होती आ रही हैं । अवश्य ही कुछ वेबसाइटें हिंदी का विकल्प भी दिखाती हैं, लेकिन वे बेमन से तैयार की गईं प्रतीत होती हैं । घूमफिर कर आपको अंगरेजी पर ही लौटना पड़ता है ।

6.     आयकर विभाग के पैन कार्डों तथा राष्ट्रीयकृत बैंकों के एटीएम/क्रैडिट कार्डों जैसे आम जन के दस्तावेजों में राजभाषा कहलाने के बावजूद हिन्दी इस्तेमाल नहीं होती ।

7.     हिन्दीभाषी क्षेत्रों के बड़े शहरों के दुकानों एवं निजी संस्थानों के नामपट्ट अंगरेजी में ही प्रायः देखने को मिलते हैं; हिंदी में तो इक्का-दुक्का अपवाद स्वरूप रहते हैं । लगता है कि होटलों, मॉलों एवं बहुमंजिली इमारतों के नाम हिन्दी में लिखना वर्जित है ।

8.     नौकरी-पेशे में अंगरेजी आज भी बहुधा घोषित एवं कभी-कभार अघोषित तौर पर अनिवार्य बनी हुई है ।

9.     विश्व के सभी प्रमुख देशों के राष्ट्राध्यक्षों/शीर्ष-राजनेताओं को पारस्परिक या सामूहिक बैठकों में अपनी भाषा के माध्यम से विचार रखते देखा जाता है । क्या इस देश के नुमाइंदे ऐसा करते हैं ? पूर्व प्रधानमंत्री बाजपेई अवश्य अपवाद रहे हैं ।

इस प्रकार के तमाम उदाहरण खोजे जा सकते हैं, जिनसे स्पष्ट होता है कि वास्तविकता में अंगरेजी ही देश पर राज कर रही है, और आगे भी करती रहेगी । ‘क्यों ऐसा है’ का तार्किक कारण कोई नहीं दे सकता है । कुतर्कों के जाल में प्रश्नकर्ता को फंसाने की कोशिशें सभी करते हैं ।

दरअसल देशवासियों के लिए अंगरेजी एक उपयोगी भाषा ही नहीं है यह सामाजिक प्रतिष्ठा और उन्नति का द्योतक भी है । यह धारणा सर्वत्र घर कर चुकी है कि अन्य कोई भाषा सीखी जाए या नहीं, अंगरेजी अवश्य सीखी जानी चाहिए । अंगरेजी माध्यम विद्यालयों का माहौल तो छात्रों को यही संदेश देता है । अंगरेजी की श्रेष्ठता एवं देशज भाषाओं की हीनता की भावना तो देश के नौनिहालों के दिमाग में उनकी शिक्षा के साथ ही बिठा दी जाती है ।

मेरे देखने में तो यही आ रहा है कि हिन्दी एवं क्षेत्रीय भाषाएं महज बोलने की भाषाएं बनती जा रही हैं । लिखित रूप में वे पत्र-पत्रिकाओं एवं कतिपय साहित्यिक कृतियों तक सिमट रही हैं । रोजमर्रा के आम जीवन का दस्तावेजी कामकाज तो अंगरेजी में ही चल रहा है । कहने का अर्थ है कि सहायक राजभाषा होने के बावजूद अंगरेजी ही देश की असली राजभाषा बनी हुई है ।

मुझे हिन्दी दिवस मनाने का कोई औचित्य नहीं दिखता । हिन्दी को लेकर हर वर्ष वही रटी-रटाई बातें कही जाती हैं । मंचों से कही जाने वाली ऊंची-ऊंची बातों का असर श्रोताओं पर नहीं पड़ता है, और भी वक्ता इस पर मनन नहीं करता है कि कही गयी बातों को तो वह स्वयं ही अमल में नहीं लाता । गंभीर चिंतन वाले लोग भाषणबाजी नहीं करते बल्कि धरातल पर कुछ ठोस करने का प्रयास करते हैं । सरकारी तंत्र में कितने जन हैं ऐसे ? - योगेन्द्र जोशी

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