{1}
“हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे लाखों-करोड़ों जनों के बीच दूभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग/वर्ण में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि/विद्वत्ता में अंग्रेज हों । [Indian in blood… English in intellect…] – टी.बी. मैकॉले, तत्कालीन गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिक को 1835 में सौंपी गई अपनी शिक्षा नीति के समर्थन में ।”
{2}
“हमने अंग्रेज विद्वानों की एक जाति तैयार कर ली, जिसे अपने देशवासियों के प्रति नहीं के बराबर या अत्यल्प सहानुभूति है । – प्रोफेसर एच. एच. विल्सन, हाउस अव् लॉर्डज की चयनित समिति के समक्ष, 5 जुलाई, 1863 ।”
{3}
“मैं यह मत व्यक्त करने का जोखिम उठा रहा हूं कि विलियम बैंटिक का पूरब में अंग्रेजी भाषा एवं अंग्रेजी साहित्य को बढ़ावा देने तथा फैलाने का दोहरा कार्य … ठोस नीति की चतुराई भरी शानदार तरकीब, जिसने भारत में ब्रिटिश राज को विशिष्टता प्रदान की है । – डा. डफ्, भारतीय राज्यक्षेत्र से संबंद्ध लॉर्डज की द्वितीय रिपोर्ट में, 1853 ।”
उपर्युक्त उद्धरण, {1}, {2}, एवं {3}, मैंने नवंबर में लिखी गई अपनी पोस्ट से लिए है, मौजूदा विचारणा के संदर्भ के लिए (देखें पोस्ट दिनांक 16.11.2009) ।
मुझे उक्त पोस्ट के संदर्भ में अपने एक सुधी तथा जानकार पाठक से एक विचारणीय टिप्पणी प्राप्त हुई थी । उसी को केंद्र में रखते हुए कुछ और भी कहने का विचार मेरे मन में जगा है । कतिपय अपरिहार्य कारणों से मैं यह सब पहले समय पर नहीं लिख सका था ।
प्रथमतः अपने उन सम्माननीय पाठक से प्राप्त जानकारी (अधोलिखित) का जिक्र करता हूं:-
[A]
इस महत्त्वपूर्ण तथ्य से बहुत कम ही लोग अवगत हैं कि स्वयं लॉर्ड मैकॉले, जिनकी संस्तुति के आधार पर अंगरेजी भाषा 1835 में देश में शिक्षा का माध्यम बनी, अंगरेजी को भारत के लिए एक अस्थायी समाधान के रूप में देखते थे – उनकी मान्यता थी कि चूँकि “इस समय”, यानी 19 सदी के प्रारंभ में, ज्ञान के विविध क्षेत्रों में अंगरेजी (और फ्रांसीसी) भाषी ही सबसे बढ़े-चढ़े हैं, इसलिए जरूरी है कि भारत के योग्य वर्ग को अंगरेजी पुस्तकों में निहित ज्ञान से परिचित कराया जाय ताकि बाद में वे उस ज्ञान को स्थानी (स्थानीय) भाषाओं में अनुवाद कर उसे जन-साधारण तक पहुँचा सकें:-
[B]
“To that class [Indian in blood… English in intellect…] we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from Western nomenclature and to render them, by degrees, fit vehicles for the conveying of knowledge to the great mass of the population.” [परिच्छेद 34] [मेरा अनुवादः हमें उस वर्ग (खून में भारतीय ... बौद्धिकता में अंग्रेज ...) पर छोड़ देना चाहिए कि वह देसी बोलियों (भाषाओं?) का परिष्कार करें, पाश्चात्य शब्दावली से उधार लिये वैज्ञानिक पारिभाषिक पदों द्वारा उन्हें समृद्ध करें, और उन्हें विशाल जनसमुदाय को ज्ञान प्रदान करने के सुयोग्य वाहक के तौर पर उत्तरोत्तर सुयोग्य बनायें ।]
[C]
मैकॉले ने इतिहास से दो उदाहरण दे कर अपना उद्येश्य स्पष्ट किया था – पहला उदाहरण उनके अपने देश का ही था जहाँ 15वीं और 16वीं सदी में दृ अंगरेजी के सशक्त होने से पहले दृ ग्रीस (यूनान) और रोम की भाषाएँ शिक्षा के लिए अपरिहार्य मानी गयीं थीं । दूसरा उदाहरण रूस का था जहाँ जहॉं जार पीटर ‘महान’ के शासनकाल में लोगों में पश्चिमी यूरोप के ज्ञान और वहाँ की भाषाओं, विशेषतः फ्रांसीसी, के प्रति विशेष लगाव जगा था और 120 वर्ष के अंदर ही उन्होंने अपनी भाषा रूसी और अपनी संस्कृति को परिष्कृत कर लिया था ।
[D]
लगता है भारत का आज का शासक वर्ग जन-सामान्य के हित के प्रति उतना भी सजग नहीं है जितना पौने दो सौ वर्ष पहले ब्रितानी मैकॉले था । उसने जिस हल को अल्पकालिक माना था, उसे स्थायी बनाकर हम अपनी भाषाओं की सतत उपेक्षा कर रहे है । (गर्भनाल पत्रिका के जनवरी 2009 अंक में छपा लेख देखें – “भारत की भीषण भाषा समस्या और उसके सम्भावित समाधान”)
(कथित जानकारी का उल्लेख संपन्न । मैंने संदर्भ हेतु इसके अनुच्छेदों को क्रमशः [A], [B], [C], एवं [D] नामांकित किया है ।)
मैं आगे अपना जो मत व्यक्त करने जा रहा हूं उसे सही परिप्रेक्ष में समझने के लिए मेरी 17 जनवरी की पोस्ट का संदर्भ उपयोगी होगा, जिसमें मैंने अंग्रेजी के संक्षिप्त इतिहास का उल्लेख किया है ।
देश की ब्रितानी हुकूमत के संबंध में मैकॉले के विचार उत्कृष्ट तथा उदार थे, इस देश के हितों के प्रति वह समर्पित था, वह यहां पर एक ऐसा शासकीय वर्ग तैयार करने के प्रति प्रयत्नशील था जो यहां की भाषा-संस्कृति के प्रति सम्मान रखता हो, वह यहां के लोगों को ‘सभ्य, सुसंस्कृत एवं सुयोग्य’ बनाकर शासन उनके हाथ में सौंपने का इच्छुक था, इत्यादि बातों में जो लोग विश्वास करते हों उन्हें ऐसा करने की स्वतंत्रता है । पर मैं स्वयं यह सब मानने के लिए तैयार नहीं हूं, क्योंकि मेरे तार्किक चिंतन के अनुसार यह सब सच नहीं हो सकता है । आरंभ में ही मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने मैकॉले संबंधित टिप्पणियों को स्व. सुंदरलाल की पुस्तक से उद्धृत किये हैं (देखें 16 नवंबर 2009 की पोस्ट), जिन्हें मैं अधिक विश्वसनीय मानता हूं । अतः जहां कहीं मुझे वह सुनने को मिले जिसकी उपर्युक्त {1, 2, 3} से असंगति हो तो मैं उन बातों को स्वीकार नहीं कर सकता ।
इस बात पर भी गौर करें कि यूरोप के शासकों ने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में दो प्रकार के उपनिवेश स्थापित किये थे । प्रथम तो वे क्षेत्र थे जहां उनके लोग बस गये थे । वहां के मूल निवासियों को उन्होंने विस्थापित किया या, कुछ हद तक उनका सफाया ही कर डाला । वे अपने को सभ्य और उन्नत दर्जे के मानव समझते थे और उन क्षेत्रों के मूल निवासियों को ‘सभ्य’ बनाने वाले ठेकेदार बन बैठे थे । उनको उन्होंने दोयम दर्जे का नागरिक बना के रखा था । दक्षिण अफ्रिका में तो यह स्थिति हाल तक बनी रही । ये उपनिवेश कालांतर में स्वतंत्र भी हो गये, लेकिन रहे यूरोपीय मूल के लोगों के ही देश । उन क्षेत्रों के मूल निवासी महत्त्वहीन बने रहे । उत्तर तथा दक्षिण अमेरिका के सभी, आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड एवं अफ्रिका के कुछ देश, इस प्रकार के उपनिवेश थे ।
दूसरे वे क्षेत्र थे जहां यूरोप के लोग बसने नहीं पहुंचे थे, बल्कि जहां उन्होंने अपना शासन कायम करके वहां के संसाधनों पर कब्जा करने का इरादे से पहुंचे । इस श्रेणी में एशियाई देश शामिल हैं । ये वे क्षेत्र थे जहां के लोग अमेरिकी, आस्ट्रेलियाई तथा अफ्रिकी महाद्वीपों की तरह अपेक्षतया कम उन्नत और संख्या में यूरोपियों के सापेक्ष नगण्य नहीं थे । एशिया में अपने उपनिवेश स्थापित करने में सर्वाधिक सफल अंग्रेज रहे, जिन्होंने बहुत चतुराई से अपनी नीतियां बनाई थीं, और यहां के लोगों की कमजोरी को भरपूर लाभ उन्होंने उठाया था । याद रहे कि अंग्रेजों ने अपने देश से भारी-भरकम फौज लाकर भारत पर आधिपत्य स्थापित नहीं किया था । उनकी ‘लोगों को बांटो और राज करो’ की नीति की आज भी चर्चा होती है । क्या थी यह नीति ? यही न कि इसी भारत-भूमि से ऐसे लोगों को चुना जाए जो उनके पक्ष में खड़े होवें, ऐसे लोग जो आम भारतीयों के हितों को साधने एवं उनके प्रति संवेदनशील होने के बजाय अंग्रेजों के प्रति समर्पित हों । मैकॉले की शिक्षा नीति इसी उद्वेश्य की पूर्ति करती थी । ये बातें साफ-साफ झलकती हैं {1, 2, 3} में ।
अब विचार करिए उपरिलिखित टिप्पणी संख्या [A, B] पर ।
जब कहा जाता है कि मैकॉले ‘अंग्रेजी’ साहित्य में निहित ‘अपार ज्ञान भंडार’ के बल पर भारतीयों को सुशिक्षित बनाने का नेक इरादा रखता था तो सहसा विश्वास नहीं होता है । मत व्यक्त किया गया है कि भारतीय अपने देश की भाषा-संस्कृति के प्रति इतने जागरूक और समर्पित हो जायेंगे, कि वे अपनी भाषाओं (बकौल मैकॉले ‘बोलियों’) को समृद्ध और अभिव्यक्ति में सुसमर्थ बनाकर जनसामान्य की सेवा करेंगे । अंग्रेजी तात्कालिक प्रयोजन के लिए अस्थाई तौर पर प्रयोग में ली जा रही थी यह बात गले नहीं उतरती है । तब क्यों ऐसे लोगों की जमात पैदा की जा रही जो अंगरेजियत में रंगे हों और केवल चमड़ी से ही भारतीय रह गये हों ? यह मत तो उसी मैकॉले के कथन, जैसा आरंभ के अनुच्छेद {1} में लिखा है के विपरीत है । स्पष्ट कहा गया है कि भारतीयों में से ऐसे लोगों को चुना जाये जो केवल कद-काठी, रूपरंग में भारतीय हों, लेकिन सोच और इरादों में अंग्रेज बन गये हों, अंग्रेजी शासन को चलाने में मदद करने लगें (न कि उनसे मुक्ति के प्रयास में संलग्न हों !), और अंग्रेजों एवं शेष भारतीयों के बीच सेतु का कार्य करें । ऐसे ही मुट्ठी भर किंतु अधिकार-संपन्न लोगों के बल पर अंग्रेजों ने इस देश में राज किया था । {2} तथा {3} में संबंधित अंग्रेज वक्ताओं के उद्गार इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अंग्रेज शासक भारतीयों की ऐसी जमात तैयार करने में सफल रहे, जो अपने देशवासियों के प्रति कम सहानुभूति रखते थे और अंग्रेजों के प्रति अधिक समर्पित थे । स्वाधीनता संघर्ष में इस जमात की कोई रचनात्मक भूमिका नहीं थी । जिन्हें अंग्रेजी राज रास नहीं आया उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी ही छोड़ दी ।
एक बात सोचने योग्य है – क्या यह संभव है कि आप किसी को अंग्रेजियत की घुट्टी निरंतर पिलायें और फिर उससे अपेक्षा करें कि अंग्रेजियत छोड़ आनी भाषा-संस्कृति के उत्थान या सेवा में लग जाये ? सामान्यतः ऐसा नहीं हो सकता, अपवाद भले ही कहीं मिल जाए । याद रहे अंग्रेजों ने इस देश को विवशता में स्वतंत्रता प्रदान की । उन्होंने अंग्रेजियत में बुरी तरह रंग चुकी अधीनस्थ नौकरशाही को यह निर्देश नहीं दिये, “जाओ अब तुम अपनी भाषाओं में ज्ञान बांटो और देश की सेवा करो, हम तो मदद करने आये थे, अस्थाई तौर पर ।” जरा इस तथ्य पर गौर करें कि पूर्व अंग्रेज प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Leonard Spencer Churchill) यहां के नये राजकाज चलाने वालों की योग्यता के प्रति सशंकित था । कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि अंग्रेज शासक अंग्रेजी की घोर पक्षधर नौकरशाही को देश पर लाद गये जो स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद भी बिना कीमत चुकाए समस्त लाभों को अपने हक में बटोरने में कामयाब रहे और आज भी कामयाब चल रहे हैं । भारतीय भाषाओं को न पनपने देने के लिए उन्होंने जैसे कसम खा ली हो । ऐसे में [D] में कही गयी बात में आश्चर्य ही क्या है ?
अब बात करें टिप्पणी [C] के संदर्भ में ।
अंग्रेजी की इंग्लैंड में प्रतिष्ठापना के बारे में पर्याप्त जानकारी मैंने 17 जनवरी की पोस्ट में दी है । यहां उसका पुनरुल्लेख नहीं कर रहा हूं, किंतु इतना याद दिलाना चाहूंगा कि 1204 में जब इंग्लैंड का राजा ‘किंग जॉन’ ने नॉर्मेंडी (Normandy) का प्रदेश फ्रांस के हाथों खो दिया तब फ्रांसीसी भाषा की अहमियत भी समाप्त हो गयी । इंग्लैंड में तो प्रायः सभी लोग अंगरेजी ही जानते तथा बोलते थे और वही भाषाई संपर्कसाधन का अच्छा माध्यम बन चुकी थी । हालत बदलने लगे और चौदहवीं सदी के अंत तक (1350-1380) फ्रांसीसी के बदले अंगरेजी शिक्षा का माध्यम बन गयी । सामाजिक वास्तविकता को देखते हुए वह 1362 में राज-दरबार की भाषा भी घोषित हो गई । ज्ञातव्य है कि 1399 में सिंहासन पर बैठने वाला किंग हेनरी चतुर्थ इस काल का पहला राजा था जिसकी मातृभाषा अंगरेजी ही थी ।
19वीं सदी के भारत में अंगरेजी के सापेक्ष भारतीय भाषाओं की स्थिति की तुलना 14वीं-15वीं सदी के समय के इंग्लैंड में फ्रांसीसी के सापेक्ष अंगरेजी की स्थिति से नहीं की जा सकती है । 14वीं-15वीं सदी के यूरोप में न तो औद्योगिक क्रांति हुई थी और न ही वैज्ञानिक लेखन बढ़-चढ़ के हो रहा था । न कोई भाषा विश्व भर में प्रभावी कही जा सकती थी । सभी भाषाएं क्षेत्र-विशेषों तक ही सीमित थीं, और उनकी अहमियत प्रमुखतया साहित्यिक लेखन से जुड़ी थी । किंतु 19वीं सदी आते-आते स्थितियां बिल्कुल बदल गयीं । विज्ञान-प्रौद्योगिकी में ज्ञान का तेजी से विस्तार हो रहा था । लेखन और प्रकाशन व्यापक स्तर पर होने लगा । यूरोप की भाषाएं दूर-दराज तक पहुंच रही थीं । कालोनाइजेशन यानी यूरोपियों का उपनिवेश स्थापित करने का दौर चल चुका था । अतः [C] में व्यक्त मैकॉले के दृष्टांत मुझे मान्य नहीं लगते हैं ।
गौर करें कि इंग्लैंड में अंग्रेजी की स्थापना बाहर से गये लोगों ने नहीं की बल्कि वहीं के लोगों ने की । अंगरेज हमारे देश में हमारे दूरगामी भले के लिए शासन करने और अंग्रेजी के माध्यम से यहां की भाषाओं को समृद्ध बनाने के उद्येश्य से आये थे ऐसा नहीं माना जा सकता । मेरा दृढ़ मत है कि अंग्रेज अपने साम्राज्य के विस्तार पाने और अंगरेजी भाषा को दुनिया पर राज करते देखना चाहते थे । भला वे यह नीयत कैसे रख सकते थे कि यहां की भाषाएं पनपें और अंततः देशवासियों के ज्ञान का माध्यम बनें । उन्होंने तो यहां के बुद्धजीवियों के दिमाग में यह बात गहरे बिठा दी कि ज्ञान का माध्यम तो अंगरेजी के अलावा कोई अन्य भाषा हो ही नहीं सकती है, कम से कम भारतीय भाषाएं हरगिज नहीं । इस भावना से यह देश स्वतंत्रता के 60 साल के बाद भी नहीं मुक्त हो पाया है । तब कैसे माने कि [C] में लिखित बातें ईमानदार तथा सार्थक थीं ?
जहां तक रूसी भाषा का सवाल है, वहां कोई विदेशी यह कहने नहीं गया कि हे रूसवासियों, अपनी भाषा को आगे बढ़ाओ । वहीं के लोगों के प्रयास से रूसी इतनी समर्थ हुई कि वैज्ञानिक लेखन उस भाषा में आज भी हो रहा है । मुझे कहीं यह पढ़ चुकने की याद है कि करीब 150 वर्ष पहले जापानियों ने भी महसूस किया कि अगर वे अपनी भाषा को सक्षम नहीं बना पाये तो अंगरेजी के वर्चस्व को झेल नहीं पायेंगे । आज जापानी भाषा में भी वैज्ञानिक लेखन हो रहा है । हकीकत तो यह है कि दुनिया की किसी भी भाषा के आगे बढ़ने में अंगरेजी आड़े आई है; अंगरेज एवं अंगरेजी सहायक भी हो सकते हैं इसकी तो कल्पना ही नहीं की जा सकती है ।
अंत में बात की जाये [D] की ।
इतना सब कहने का मतलब यह है कि मैकॉले की शिक्षा नीति यहां के बुद्धजीवियों को अंगरेजी एवं अंगरेजियत में रंग देना था । भारतीय समाज सदा से ही एक बुरी तरह विभक्त समाज रहा है । गैरबराबरी की भावना अपने देशवासियों के खून में इस कदर घुली है कि उससे निजात पाना संभव नहीं है । जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर सामाजिक विभाजन का अनुभव हम सभी कर रहे हैं । स्वाधीनता के बाद दो पीड़ियां गुजर चुकी हैं, परंतु सामाजिक विभाजन जस का तस बना हुआ है । मेरा सोचना है – और आप पूर्ण स्वतंत्र हैं मुझसे असहमत होने के लिए – कि अंगरेज यहां उक्त तथ्य से वाकिफ हो चले थे और उन्हें विश्वास हो चला था कि इस देश पर सफल शासन के लिए इसी जमीन से एक जमात खड़ी की जानी चाहिए, जो भाषाई विभाजन पर आधारित हो । अर्थात् अंगरंजी में रंगे लोगों की फौज तैयार करना जो अंगरेजी के आधार पर स्वयं को शेष भारतीयों से श्रेष्ठ और तथा अंगरेजों के अधिक निकट समझें । यही वर्ग उनका प्रशासक वर्ग बना । उनकी वह नीति कितनी अधिक सफल रही इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि आज हम अंगरेजी छोड़ने के बजाय अपनी भाषाओं को छोड़ रहे हैं । देशी भाषाएं हमारी ही नजर में निरर्थक और दोयम दर्जे की बनी हुई हैं । उनक प्रति आदर भाव समाप्तप्राय हो रहा है । उनका स्वरूप विकृत होता जा रहा है; उनका अंगरेजीकरण हो रहा है । परिणाम यह है कि अब हम अंगरेजी के सामने इतने नतमस्तक हो गये कि उसके बिना सफल जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं । यह राष्ट्रीय दुर्भाग्य नहीं है क्या ?
और यह वर्ग आज भी देश की प्रशासनिक, आर्थिक तथा शैक्षिक नीतियों का निर्धारण करता है, और उस कार्य में अंगरेजी के वर्चस्व को यथावत् बनाये हुए है । स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तत्कालीन राजनेताओं में अपनी भाषाओं के प्रति जो जोश उत्पन्न हुआ था उसे उनकी अगली पीढ़ियों ने शनैःशनैः भुला दिया । इसका लाभ लेते हुए इस वर्ग ने तरह-तरह के तर्क-कुतर्कों के द्वारा देशी भाषाओं को पनपने में अड़ंगे लगाये रखा । अभिजात वर्ग में व्याप्त अंगरेजी के प्रति गर्वानुभूति के पीछे मैकॉले नीति जिम्मेदार नहीं तो कौन है ? – योगेन्द्र जोशी




समाचार माध्यमों में छपी खबरों से ऐसा लगता है कि उक्त आयोजन की तैयारियां संतोषजनक नहीं चल रही हैं । खैर तैयारी के बारे में कुछ कह पाना शायद आम नागरिक के लिए संभव नहीं । लेकिन एक बात पर टिप्पणी करने का मेरा भी मन हो आया, जब मेरी नजर संबंधित



