मैं लोगों के मुख ये उद्गार सुनता हूं कि हिंदी को समृद्ध करने के लिए अन्य भाषाओं के शब्द अपनाने में हमें हिचकना नहीं चाहिए । वे यह तर्क दे जाते हैं कि अंग्रेजी ने अन्य भाषाओं के शब्द अपनाकर अपना शब्दभंडार बढ़ाया है । मुझे यह शंका सदैव बनी रही है कि यह सब कहने से पहले उन्होंने अंग्रेजी शब्दों के बारे में पर्याप्त जानकारी हासिल की होगी । बात जब उठती है तो वे बिना गहन अध्ययन के और बिना गंभीर विचारणा के बहुत कुछ कह जाते हैं ऐसा मेरा मानना है । क्या उन्होंने यह जानने का कभी प्रयास किया कि अंग्रेजी ने किन परिस्थितियों में, किन शब्दों ेको आंग्लेतर भाषाओं से ग्रहण किया है ? और उन्होंने कितनी उदारता इस संबंध में बरती है ? सुधी जनों को किसी मत पर पहुंचने से पहले एतद्सदृश प्रश्नों पर विचार करना चाहिए । मैं दावा नहीं करता कि इस विषय पर मेरा मत त्रुटिहीन ही हैं, किंतु मैं भी तो समझूं कि कहा गलती कर रहा हूं ।
इसमें दो राय नहीं कि नई-नई आवश्यकताओं के अनुरूप हर भाषा को नये शब्दों की आवश्यकता पड़ती है । ऐसे शब्दों की या तो रचना की जाती है या उन्हें अन्य भाषाओं से उधार ले लिया जाता है । उधार लेने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते कि ऐसा करने के कारण उचित तथा स्वीकार्य हों । ‘मेरी मरजी’ का सिद्धांत अपनाकर अगर आप ऐसे शब्द अपनी भाषा में शामिल कर रहे हों तो आपत्ति की ही जाएगी । अंग्रेजी नये शब्दों की रचना में सुसमृद्ध नहीं है । उसे ग्रीक या लैटिन पर निर्भर रहना पड़ता है । मेरा अनुमान है कि ऐसी विवशता प्रायः सभी आधुनिक प्राकृतिक भाषाओं के साथ है । वस्तुतः स्वयं हिंदी मुख्यतः संस्कृत पर और उर्दू अरबी/फारसी पर निर्भर रही हैं । शायद चीनी भाषा इस मामले में बेहतर है, क्यों उसका संपर्क अन्य भाषाओं से अपेक्षया कम रहा है । लैटिन-ग्रीक आधारित शब्दों के अतिरिक्त भी कई शब्द किसी न किसी आधार पर रचे गये हैं, यथा भौतिकी (फिजिक्स) का ‘लेसर’ (‘लाइट एम्लिफिकेशन बाइ स्टिम्युलेटिड एमिशन अव् रेडिएशन’ का संक्षिप्त) । ‘एक्स-रे’ तथा ’क्वार्क’ शब्दों का भी अपना इतिहास है । ‘पार्टिकल फिजिक्स’ में ‘कलर’, ‘अप’, ‘डाउन’ जैसे रोजमर्रा के शब्द नितांत नये (पहले कभी न सोचे गये तथा आम आदमी की समझ से परे) अर्थों में प्रयुक्त होते हैं ।
अंग्रेजीभाषियों ने संस्कृत मूल के ‘अहिंसा’, ‘गुरु’, ‘पंडित’ जैसे शब्दों को ग्रहण किया है । मेरा अनुमान है कि जो अर्थ इन शब्दों में निहित हैं, ठीक वही उन्हें अपने पारंपरिक शब्दों में नहीं लगा होगा । ध्यान दें कि वे ‘गुरु’ को ‘टीचर’ के सामान्य अर्थ में प्रयोग में नहीं लेते हैं । हिंदी के ‘पराठा’, ‘जलेबी’ आदि शब्द उनके शब्दकोश में आ चुके हैं तो कारण स्पष्ट है; ये उनके यहां के व्यंजन नहीं हैं । हम भी ‘केक’, ‘बिस्कुट’ की बात करते हैं; मुझे कोई आपत्ति नहीं । और ऐसा ही अन्य भाषाओं के साथ रहा होगा । किंतु यह नहीं कि अंग्रेजी में इतर भाषाओं के शब्द अंधाधुंध ठूंस लिए गये हों । जो शब्द उसमें पहुंचे भी हैं वे किसी एक भाषा के नहीं; वे अधिकतर यूरोपीय भाषाओं के हैं तो कुछ हिंदी-उर्दू जैसे भौगोलिक दृष्टि से दूरस्थ भाषाओं के जिनके संपर्क में अंग्रेजी आई । अपनी भाषा में उन्होंने इतर भाषाओं के शब्द नहीं ठूंसे ऐसा मैं इस आधार पर कहता हूं कि आज भी अंग्रेजी में सूर्य, चंद्र, आकाश, वायु, जल आदि शब्दों के पर्याय देखने को नहीं मिलते हैं । उनके यहां पारिवारिक रिश्तों को स्पष्ट करने वाले शब्द नहीं हैं, यथा मौसा-मौसी, मामा-मामी, चाचा-चाची तथा फूफा-बुआ, सब अंकल-आंट, फिर भी वे संतुष्ट, कहीं से इनके लिए उपयुक्त शब्द उधार नहीं लिए गये ।
परंतु हिंदी की स्थिति एकदम अलग है । इसमें अंग्रेजी के शब्दों को ठूंसने में किसी को न हिचक है और न हया । जो इसकी शब्द-संपदा बढ़ाने के पक्ष में तर्क या कुतर्क पेश करते हैं उन्हें इन प्रश्नों पर विचार करना चाहिए । उन्होंने अन्य भारतीय भाषाओं से कितने शब्द उधार लिए हैं ? और कितने शब्द दूसरी यूरोपीय अथवा पूर्व एशिया की भाषाओं से लिए हैं ? केवल अंग्रेजी शब्दों को शामिल करने को ही वे ‘हिंदी को समर्थ बनाना’ क्यों मानते हैं ?
अंग्रेजी किस कदर हिंदी के भीतर घुस रही है देखिए:
1. हिंदी की गिनतियां नई पीढ़ी भूलती जा रही है; सबकी जुबान से अब वन्-टू…हंडेªड निकलता है ।
2. अब साप्ताहिक दिनों के अंग्रेजी नामों का प्रयोग खुलकर हो रहा है, जैसे संडे-मंडे ।
3. लोग रंगों के अंग्रेजी नाम बेझिझक इस्तेमाल करने लगे हैं, जैसे येलो-ग्रीन-रेड ।
4. हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि शरीर के अंग भी अब अंग्रेजी नामों से संबोधित किए जाने लगे हैं, यथा हार्ट-लंग-थ्रोट ।
5. सामाजिक/पारिवारिक रिश्तों की स्थिति असमंजस की बन गयी है । मॉम-डैड, फादर-मदर, फादर-इन-लॉ, सन-इन-लॉ तो आम हो चुके हैं किंतु अन्य रिश्ते समस्या खड़ी कर रहे हैं, क्योंकि रिश्तों के लिए सटीक शब्द अंग्रेजी में हैं ही नहीं और सभी को एक ही नाम देने में अभी लोग हिचक रहे हैं । कल नहीं तो परसों बची-खुची हिचक भी चली जाएगी ।
6. अंग्रेजी के ‘ऑलरेडी’ (पहले ही), ‘डेफिनिट्ली’ (बेशक, निश्चित तौर पर), ‘एंड’ (और), ‘ऑर’ (या), जैसे शब्द हिंदी में जगह पाने में सफल हो रहे हैं । जो थोड़ी भी अंग्रेजी जानता है वह अपनी बात यूं कहने से नहीं हिचकता हैः “अब सिचुएशन अंडर कंट्रोल है । डिस्ट्रिक्ट एड्मिनिस्ट्रेशन को अप्रोप्रिएट स्टेप उठाने के लिए इंस्ट्रक्शन्स ऑल्रेडी दिए जा चुके हैं ।” जाहिर है कि अंग्रेजी न जानने वाले के लिए ऐसे कथनों के अर्थ समझ पाना कठिन है । पर परवाह किसको है ? आधुनिक ‘देवभाषा’ इंग्लिश के लिए तो भारतीय भाषाओं को त्यागा ही जा सकता है न !
अंग्रेजी शब्दों से हिंदी को ‘समर्थ’ बनाने वाले अपने ‘हिंदीभक्तों’ से पूछा जाना चाहिए कि अंग्रेजी में भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करके उसे भी अधिक समर्थ बनाने से वे क्यों बचते आ रहे हैं ? उनके मुखारविंद से यह ‘सेंटेंस’ क्यों नहीं निकलता: “My chaachaa has brought a kaangree from Srinagar.” I am sure that English does not have appropriate words for the two non-English words in this sentence; using them would benefit English.” (मुझे विश्वास है कि इस वाक्य के दोनों गैर-अंग्रेजी शब्दों के लिए उपयुक्त शब्द अंग्रेजी में नहीं हैं; इन्हें प्रयोग में लेने से अंग्रेजी को लाभ मिलेगा ।)
(टिप्पणी: kaangree, कांगड़ी - शरीर को गर्म रखने के लिए एक छोटी टोकरीनुमा अंगीठी, जिसे काश्मीरी लोग पेट के निकट ढीले कपटों के भीतर छुपाकर प्रयोग में लेते हैं ।)
तो यह था एक संक्षिप्त विवरण हिंदी में अंग्रेजी शब्दों की अमर्यादित भरमार का । आखिर ऐसा क्यों है ? मुझे जो कारण समझ में आते हैं उनकी चर्चा अगली पोस्ट में । ‘टिल देन, गुड बाय.’ – योगेन्द्र जोशी




समाचार माध्यमों में छपी खबरों से ऐसा लगता है कि उक्त आयोजन की तैयारियां संतोषजनक नहीं चल रही हैं । खैर तैयारी के बारे में कुछ कह पाना शायद आम नागरिक के लिए संभव नहीं । लेकिन एक बात पर टिप्पणी करने का मेरा भी मन हो आया, जब मेरी नजर संबंधित



