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दृष्टांत अंगरेजी  का – स्पाई कैमरा की प्रयोग-विधि

मैंने हाल ही में एक सस्ते किस्म का “स्पाई कैमरा” शौकिया खरीदा, “ई-शॉपिंग” के माध्यम से । आजकल बाजार में चीन के बने सस्ते – और मेरी राय में घटिया दर्जे के – इलेक्ट्रिॉनिक उत्पाद बहुतायत में मिल जाते हैं । अपने देश में तो ये भी नहीं बन पाते हैं, भले ही हम प्रथम प्रयास में ही स्वनिर्मित यान मंगल ग्रह पर उतारने में सक्षम हों । उक्त कैमरे के साथ प्रयोगविधि संबंधी एक पन्ने पर छपी जो पाठ्यसामग्री यानी निर्देश-पुस्तिका मिली उसकी प्रति यहां प्रस्तुत है| यह द्विभाषी है, अंगरेजी एवं चीनी भाषा में मुद्रित । अंगरेजी स्पष्टतः विदेशियों के लिए होगी जो चीनी भाषा नहीं जानते हैं, और चीनी मैडरिन खुद चीनियों के लिए ।

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समझ से परे अंगरेजी

जब मैंने उपर्युक्त निर्देश-पुस्तिका पढ़ने की कोशिश की तो पाया कि इसमें दी गई पाठ्यसामग्री अपनी समझ से परे है । शब्द अंगरेजी के हैं परंतु उनसे सार्थक वाक्य बन पा रहे हैं ऐसा मुझे लगता नहीं । अवश्य ही वर्तनी की त्रुटियां भी कहीं-कहीं दिखाई देती हैं । सही वाक्य-विन्यास एवं अर्थपूर्ण शब्दों के चयन के अभाव में वर्तनी की खास अहमियत नहीं रह जाती है । हो सकता है कि अनुभवी व्यक्ति पाठ का सही-सही अर्थ खोजने में समर्थ हों, किंतु मुझे ऐसा कर पाने में कठिनाई हो रही थी । यह बात अलग है कि अंततः उक्त स्पाई कैमरा की कार्य-प्रणाली तुक्के, सहज बुद्धि और अनुभव के आधार पर मैं खोज निकालने में सफल हो गया ।

अंगरेजी की उक्त पाठ्यसामग्री ने एक सवाल जरूर मेरे सामने खड़ा किया । क्या वजह रही होगी कि कैमरा बनाने वाली कंपनी ढंग की निर्देश-पुस्तिका तैयार नहीं कर पाई । अवश्य ही कंपनी एक छोटी एवं सामान्य संस्था होगी जिसका कारोबार कुटीर उद्योग के माफिक होगा । लेकिन क्या उसकी पहुंच अंगरेजी जानने वाले एवं सीधी-सरल अंगरेजी में उक्त युक्ति के बारे में लिख सकने में समर्थ किसी व्यक्ति तक नहीं रही होगी ? अपने देश भारत में तो आपको अंगरेजी के विशेषज्ञ भले ही आसानी से न मिलें, किंतु संबंधित युक्ति की कार्यप्रणाली का कामचलाऊ लेखाजोखा तो लिख सकने वाले मिल ही जाते । कदाचित ऐसा हुआ होगा कि जिस चीनी व्यक्ति ने उक्त पाठ तैयार किया हो उसे अपनी अंगरेजी ठीक लगी हो, और उसे शंका ही न हुई हो वह ठीक से नहीं समझा पाया है । यह भी हो सकता है कि अंगरेजी में ठीक-ठाक लिख सकने वाले बिना फीस लिए मिले ही न हों, और संस्था उत्पाद सस्ता बना रहे इस विचार से अधिक खर्च करने को तैयार न हों ।

उपर्युक्त निर्देश पुस्तिका देख मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि चीन में लोगों का अंगरेजी ज्ञान उतना अच्छा नहीं होता जितना अपने देशवासी सोचते हैं । मैं उच्चाध्ययन के सिलसिले में इंग्लैंड में रह चुका हूं तथा अमेरिका, फ्रांस, इटली जा चुका हूं, जहां मेरे अनुभव में यही आया है कि चीन के लोग विविध विषयों का ज्ञान तो अच्छा रख सकते हैं, किंतु उन्हें अंगरेजी में अपनी बात ठीक-से प्रस्तुत करने में कठिनाई होती है । दरअसल यूरोप के देशों और अंगरेजों के पराधीन रह चुके देशों को छोड़ दें तो हम यही पाऐंगे कि वहां के अधिकांश निवासियों को अंगरेजी में असुविधा ही होती है । यह बात चीन, जापान, कोरिया पर बखूबी लागू होती है । हम मीडिया में इन देशों के राजनयिकों, मीडिया-कर्मियों, एवं विषय-विशेषज्ञों को देखकर यह निष्कर्ष निकाल बैठते हैं कि वहां की आम जनता को अंगरेजी आती है और वे उसे रोजमर्रा के जीवन में सफलतापूर्वक इस्तेमाल भी करते हैं ।

अंगरेजी उतनी नहीं प्रचलित जितनी बताई जाती है

मुझे अपने एक मित्र की प्रासंगिक बात याद आती है । सिंगापुर की बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत उनके पुत्र को एक बार कारोबार के सिलसिले में बीजिंग जाना था । तब उन्होंने बताया था कि उनके पुत्र को यह चिंता थी कि किस प्रकार वह अपने चीनी व्यवसायी को अपने उत्पाद के बारे में प्रभावी ढंग से बता पायेगा, क्योंकि उनसे स्तरीय अंगरेजी की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, यानी वे पर्याप्त अंगरेजी जानते ही हों यह आवश्यक नहीं है । अपने देश के अंगरेजी पक्षधरों को इस बात पर विश्वास ही नहीं होगा कि चीन के कारोबरी अवश्यमेव अंगरेजी जानें यह जरूरी नहीं ।

जैसा मैंने आरंभ में कहा अपने देश में चीनी माल धड़ल्ले से बिक रहा है । वहां से आने वाले माल में रोजमर्रा की छोटीमोटी उपभोक्ता वस्तुएं प्रमुख हैं और उनमें एक है कैंची । कुछएक दिन पहले मैंने एक कैंची खरीदी थी, उसी की पैकिंग की आगे-पीछे की तस्वीर यहां प्रस्तुत है:

गौर से देखिए कि इस पर अंकित जानकारी मुख्यतः चीनी मैंडरिन में है, कहीं-कहीं अंगरेजी में भी है । मेरा अनुमान है कि इस उत्पाद की पैकिंग अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए न होकर चीन के घरेलू उपभोक्ताओं के लिए होगा, और अपने देश भारत में वह “गलती” से पहुचा होगा । सवाल पूछा जा सकता है कि कैंची चीनी देशवासियों के लिए हो या विदेशियों के लिए, पैकिंग पर तत्संबंधित जानकारी क्या अंगरेजी में ही नहीं होनी चाहिए थी ?

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भारतीय मानसिकता

उक्त सवाल इसलिए कि अंगरेजी की वकालत करने वाले अपने देशवासी यही तो कहते हैं कि सारी दुनिया में अंगरेजी ही तो चलती है ।

क्या हम अपने यहां कल्पना कर सकते हैं कि किसी उपभोक्ता सामग्री के साथ अंकित पाठ केवल भारतीय भाषा में हो ? नहीं ! बिस्कुट का पैकेट हो या नमक का, डिटर्जेंट की पैकिंग हो या कैंची की, उस पर जानकारी अंगरेजी में ही होगी, विदेशियों के लिए नहीं बल्कि अपने ही देशवासियों के लिए जिनमें अंगरेजी पढ़लिख सकने वाले 10-15 फीसदी से अधिक नहीं होंगे । लेकिन परवाह किसे उन लोगों की जो अंगरेजी नहीं जानते ?

अंत में मैं बाजार में उपलब्ध बूंदी के एक पैकेट का चित्र प्रस्तुत कर रहा हूं।

इस पैकेट पर अंकित पाठ मुख्यतः अंगरेजी में है, लेकिन गौर करें कि एक स्थल पर थोड़ी जानकारी अरबी में भी मुद्रित है । लगता है कि यह निर्यात के विचार के मुद्रित है । अपने यहां के व्यवसायी अरबी में जानकारी दे सकते हैं, किंतु भारतीय भाषाओं में नहीं । मैं आज तक नहीं समझ पाया कि उन्हें देशज भाषाओं से इतना परहेज क्यों है ?

इस विषय पर अन्य कई दृष्टांत मेरे विचार में आ रहे हैं । उनकी चर्चा अगले आलेख में । – योगेन्द्र जोशी

Bundi Packet & Arabic

राजभाषा हिन्दी चर्चा में है, कारण मोदी सरकार द्वारा विभागों को दिए गए निर्देश कि वे राजकीय कार्य प्रमुखतया हिन्दी में करें । हिन्दी भारतीय संघ की संविधान-सम्मत राजभाषा है, यानी राजकाज की भाषा । लेकिन संविधान की बात-बात पर दुहाई देने वाले हमारे अधिकांश राजनेता चाहते हैं कि राजकाज मुख्यतः अंगरेजी में ही होते रहना चाहिए और वह भी भविष्य में सदैव के लिए । मैं समझ नहीं पाता कि जब हिन्दी का प्रयोग होना ही नहीं चाहिए, या मात्र खानापूर्ति भर के लिए हो, तब हिन्दी को राजभाषा बनाए रखने का तुक ही क्या है ? लेकिन इस प्रश्न पर विचार करने की जरूरत भी ये नेता महसूस नहीं करते ।

हिन्दी का विरोध उस समय भी हुआ था जब इसे राजभाषा के खिताब से नवाजा जा रहा था । उस काल में अंततोगत्वा संविधान-निर्माण में लगे नेतावृंद सहमत हो ही गये, हिन्दी के साथ सीमित समय के लिए अंगरेजी भी बनाए रखने की शर्त के साथ । वह सीमित समय विगत 63-64 सालों के बाद भी घटने के बजाय अनंतकाल की ओर बढ़ता जा रहा है । पिछली शताब्दी के पचास-साठ के दशकों में विरोध के सर्वाधिक जोरशोर के स्वर तमिल राजनेताओं ने उठाए थे । और आज भी उनका वह विरोध लगभग जैसा का तैसा बरकरार है । उन्होंने शायद कसम खा रखी है कि हिन्दी को लेकर हम न अभी तक बदले हैं और न ही आगे बदलेंगे ।

हिन्दी का जैसा विरोध पचास-साठ के दशक में था वैसा कदाचित अब नहीं रहा । हिन्दी के प्रति तमिलभाषियों का रवैया काफी-कुछ बदल रहा है, भले ही राजनैतिक कारणों से नेताओं का रवैया खास न बदला हो । यों भी इतना जबरदस्त विरोध किसी और राज्य में न तब था और न अब है । वस्तुतः यह तथाकथित तमिल स्वाभिमान से जुड़ा है, ऐसा स्वाभिमान जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । सवाल उठता है कि इस स्वाभिमान को अंगरेजी से कोई खतरा क्यों नहीं होता । मैंने अनुभव किया है कि तमिलनाडु के ही पड़ोसी राज्य केरल में स्थिति आरंभ से ही बहुत कुछ भिन्न रही है, पचास-साठ के दशक में और आज भी ।

इस संबंध में मुझे 1973 की दक्षिण भारत की यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में मेरा नया-नया व्यावसायिक प्रवेश हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । उस काल में बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । दूसरे शहरों से आरंभ होने वाली यात्राओं का आरक्षण आप आज की तरह आसानी से नहीं करा सकते थे । तब रेलवे विभाग इस कार्य को तार (टेलीग्राम) द्वारा संपन्न किया करता था, जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । हां, आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में कम ही होती थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । रेलगाड़ियों के इंतिजार में प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर लेटे अथवा सोते हुए समय गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है । तभी वहां मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । कुछ काल की चुप्पी के पश्चात नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि रेल-यात्राओं के दौरान जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रहते और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । अपने देश के अभिजात वर्ग में पाश्चात्य समाजों की भांति ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन में लोग अब इस मामले में अभिजात बनते जा रहे हैं । अस्तु ।

उन सज्जन से मेरी बातचीत का सिलसिला अंगरेजी में आंरभ हुआ । जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में बताया तो वे अंगरेजी से हिंदी पर उतर आये । इधर हिन्दी तो चलती नहीं होगी अपनी इस धारणा को उनके समक्ष रखते हुए मैंने उनकी हिन्दी पर आश्चर्य व्यक्त किया । लगे हाथ उनकी यात्रा संबंधी अन्य बातें भी उनसे जाननी चाहीं ।

उन्होंने मुझे बताया कि वे केरला के रहने वाले हैं और अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकले हैं । बातचीत से पता चला कि उन्हें कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । उनका कहना था कि इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से बात नहीं कर सकते ।

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनको बताया कि मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उसका थोड़ा अनुभव भी हुआ है । मैंने उनके सामने आशंका जताई कि ऐसा विरोध केरला में भी होता होगा ।

उनका उत्तर नहीं में था । उनका कहना था कि केरला के लोग व्यावहारिक सोच रखते हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं और देश के बाहर भी जाते हैं । वे जानते हंै कि हिन्दी से परहेज करके उन्हें कोई लाभ नहीं होने का ।

मेरा दक्षिण भारत जाना कई बार हो चुका है । हिन्दी को लेकर हर बार मुझे पहले से बेहतर अनुभव हुए हैं । चेन्नई में आज भी हिन्दी अधिक नहीं चलती है, लेकिन उसी राज्य के रामेश्वरम एवं कन्याकुमारी में आपको कोई परेशानी नहीं होती । केरला में हिन्दी के प्रति लोगों का झुकाव है यह बात मुझे एक बार वहां के दो शिक्षकों ने बताई थी जिसका उल्लेख मैंने अपनी अन्य पोस्ट में किया है । इसका मतलब यह नहीं कि वहां हर कोई हिन्दी जानता हो । किसी भाषा का अभ्यास एवं प्रयेाग के पर्याप्त अवसर होने चाहिए जो आम आदमी को नहीं होते । लेकिन विरोध जैसी कोई चीज वहां सामान्यतः नहीं है । – योगेन्द्र जोशी

मुझे बीबीसी-डॉट-कॉम पर उपलब्ध एक आलेख पढ़ने को मिला । लेखक हैं अमिताव कुमार और लेख का शीर्षक है “जब हिंदी पुरानी एंबेसैडर कार हो जाए” । लेखक वर्षों से अमेरिका में रहते हैं, न्यू यॉर्क के पास हडसन नदी पर स्थित एक छोटे-से शहर में । शहर के नाम का उल्लेख नहीं है । अपनी मातृभाषा से दूर रहने पर उस भाषा के संपर्क में यदाकदा आने पर कैसा लगता है इस प्रकार की बातें लेखक ने बयां की है । कदाचित पाठकगण भी लेख को पढ़ना चाहें । इसी आशय से यहां उसका संदर्भ प्रस्तुत है:

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/05/140521_amitava_kumar_aa.shtml
– योगेन्द्र जोशी

आज (21 फरवरी) मातृभाषा दिवस है । उन सभी जनों को इस दिवस की बधाई जिन्हें अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव हो, जो उसे सम्मान की दृष्टि से देखते हैं, और जो उसे यथासंभव व्यवहार में लाते हैं । उन शेष जनों के प्रति बधाई का कोई अर्थ नहीं हैं जो किसी भारतीय भाषा को अपनी मातृभाषा घोषित करते हैं, लेकिन उसी से परहेज भी रखते हैं, उसे पिछड़ेपन की निशानी मानते हैं ।

अपना भारत ऐसा देश है जहां अनेकों भाषाएं बोली जाती हैं, और जहां के लोगों की क्षेत्रीय विविधता के अनुरूप अपनी-अपनी मातृभाषाएं हैं । विडंबना यह है कि अधिकांश भारतीय अंग्रेजी के सापेक्ष अपनी घोषित मातृभाषा को दोयम दर्जे का मानते हैं । वे समझते हैं कि उनकी मातृभाषा सामान्य रोजमर्रा की बोलचाल से आगे किसी काम की नहीं । वे समझते हैं कि किसी गहन अथवा विशेषज्ञता स्तर की अभिव्यक्ति उनकी मातृभाषा में संभव नहीं । अतः वे अंग्रेजी का ही प्रयोग अधिकाधिक करते हैं । अंग्रेजी उनके जबान पर इस कदर चड़ी रहती है कि उनकी बोलचाल में अंग्रेजी के शब्दों की भरमार रहती है । लेखन में वे अंग्रेजी को वरीयता देते हैं, या यों कहें कि वे अपनी तथाकथित मातृभाषा में लिख तक नहीं सकते हैं । अध्ययन-पठन के प्रयोजन हेतु भी वे अंग्रेजी ही इस्तेमाल में लाते हैं । उनके घरों में आपको अंगरेजी पत्र-पत्रिकाएं एवं पुस्तकें ही देखने को मिलेंगी । उनके बच्चे जन्म के बाद से ही अंगरेजी की घुट्टी पीने लगते हैं । घर और बाहर वे जो बोलते हैं वह उनकी तथाकथित मातृभाषा न होती है, बल्कि उस भाषा का अंगरेजी के साथ मिश्रण रहता है ।

उन लोगों को देखकर मेरे समझ में नहीं आता है कि उनकी असल मातृभाषा क्या मानी जाए ? मैं यहां पर जो टिप्पणियां करने जा रहा हूं वे दरअसल देश की अन्य भाषाओं के संदर्भ में भी लागू होती हैं । एक स्पष्ट उदाहरण के तौर पर मैं अपनी बातें हिंदी को संदर्भ में लेकर  कह रहा हूं, जिसे मैं अपनी मातृभाषा मानता हूं । मैं सर्वप्रथम यह सवाल पूछता हूं कि आप उस भाषा को क्या कहेंगे जिसमें अंगरेजी के शब्दों की बहुलता इतनी हो कि उसे अंगरेजी का पर्याप्त ज्ञान न रखने वाला व्यक्ति समझ ही न सके । प्रश्न का उत्तर और कठिन हो जाता है जब उस भाषा में अंगरेजी शब्दों के अलावा अंगरेजी के पदबंध तथा वाक्यांश और कभी-कभी पूरे वाक्य भी प्रयुक्त रहते हों । सामान्य हिंदीभाषी उनके कथनों को कैसे समझ सकेगा यह प्रश्न मेरे मन में प्रायः उठता है । हिंदी को अपनी मातृभाषा बताने वाले अनेक शहरी आपको मिल जाएंगे जो उक्त प्रकार की भाषा आपसी बोलचाल में इस्तेमाल करते हैं, घर पर, कार्यस्थल पर, वस्तुतः सर्वत्र, अपने बच्चों के साथ भी ।

आज के शहरी, विशेषकर महानगरीय, परिवेश में लोगों की बोलचाल से हिंदी के वे तमाम शब्द गायब हो चुके हैं जो सदियों से प्रयुक्त होते रहे हैं । अवश्य ही साहित्यिक रचनाओं में ऐसा देखने को सामान्यतः नहीं मिलेगा । लेकिन सवाल साहित्यकारों की मातृभाषा का नहीं है । (भारत में ऐसे साहित्यकारों की संख्या कम नहीं होगी जो अपनी घेषित मातृभाषा में लिखने के बजाय अंगरेजी में रचना करते हैं और तर्क देते हैं कि वे अंगरेजी में अपने भाव बेहतर व्यक्त कर सकते हैं ।) बात साहित्यकारों से परे के लोगों की हो रही है जिनके लिए भाषा रोजमर्रा की अभिव्यक्ति के लिए होती है, व्यवसाय अथवा कार्यालय में संपर्क के लिए, बाजार में खरीद-फरोख्त के लिए, पारिवारिक सदस्यों, मित्रों, पड़ोसियों से वार्तालाप के लिए, इत्यादि । इन सभी मौकों पर कौन-सी भाषा प्रयोग में लेते हैं शहरी लोग ? वही जिसका जिक्र मैं ऊपर कर चुका हूं । मैं उस भाषा को हिंदी हरगिज नहीं मान सकता । वह न हिंदी है और न ही अंगरेजी, वह तो दोनों का नियमहीन मिश्रण है, जिसमें स्वेच्छया, नितांत उन्मुक्तता के साथ, हिंदी एवं अंगरेजी ठूंस दी जाती है । यह आज की भाषा है उन शहरी लोगों की जो दावा करते हैं कि उनकी मातृभाषा हिंदी है जिसे वे ठीक-से बोल तक नहीं सकते हैं । तब उनकी मातृभाषा क्या मानी जानी चाहिए ?

मेरा यह सवाल हिंदी को अपनी मातृभाषा कहने वालों के संदर्भ में था । अब में दूसरी बात पर आता हूं, मातृभाषा दिवस की अवधारणा के औचित्य पर ?

आज दुनिया में दिवसों को मनाने की परंपरा चल पड़ी है । दिवस तो सदियों से मनाये जाते रहे हैं त्योहारों के रूप में या उत्सवों के तौर पर, अथवा किसी और तरीके से । जन्मदिन या त्योहार रोज-रोज नहीं मनाए जा सकते हैं, अतः उनके लिए तार्किक आधार पर दिन-विशेष चुनना अर्थयुक्त कहा जाएगा । किंतु कई अन्य प्रयोजनों के लिए किसी दिन को मुकर्रर करना मेरे समझ से परे है । मैं “वैलेंटाइन डे” का उदाहरण लेता हूं । प्रेमी-प्रमिका अपने प्यार का इजहार एक विशेष दिन ही करें यह विचार क्या बेवकूफी भरा नहीं है ? (मेरी जानकरी में वैलेंटाइन डे दो प्रेमियों के मध्य प्रेमाभिव्यक्ति के लिए ही नियत है; पता नहीं कि मैं सही हूं या गलत ।) क्या वजह है कि प्रेम की अभिव्यक्ति एक ही दिन एक ही शैली में सभी मनाने बैठ जाएं ? और वह भी सर्वत्र विज्ञापित करते हुए । प्रेम की अभिव्यक्ति दुनिया को बताके करने की क्या जरूरत है ? यह तो नितांत निजी मामला माना जाना चाहिए दो जनों के बीच का और वह पूर्णतः मूक भी हो सकता है । उसमें भौतिक उपहारों की अहमियत उतनी नहीं जितनी भावनाओं की । प्रेमाभिव्यक्ति कभी भी कहीं भी की जा सकती है, उसमें औपचारिकता ठूंसना मेरी समझ से परे है । फिर भी लोग उसे औपचारिक तरीके से मनाते हैं वैलेंटाइन डे के तौर पर । क्या साल के शेष 364 दिन हम उसे भूल जाएं । इसी प्रकार की बात मैं “फादर्स डे”, “मदर्स डे”, “फ़्रेंड्स डे” आदि के बारे में भी सोचता हूं । इन रिश्तों को किसी एक दिन औपचारिक तरीके से मनाने का औचित्य मेरी समझ से परे है । ये रिश्ते साल के 365 दिन, चौबीसों घंटे, माने रखते हैं । जब जिस रूप में आवश्यकता पड़े उन्हें निभाया जाना चाहिए । किसी एक दिन उन्हें याद करने की बात बेमानी लगती है । फिर भी लोग इन दिवसों को मनाते हैं, जैसे कि उन्हें निभाने की बात अगले 364 दिनों के बाद ही की जानी चाहिए ।

और कुछ ऐसा ही मैं मातृभाषा विदस के बारे में भी सोचता हूं ।

कहा जाता है कि विश्व की सांस्कृतिक विविधता बचाए रखने के उद्येश्य से राष्ट्रसंघ ने 21 फरवरी को मातृभाषा दिवस घोषित किया है । किंतु क्या “ग्लोबलाइजेशन” के इस युग में सांस्कृतिक संक्रमण और तदनुसार भाषाओं का विद्रूपण अथवा विलोपन रुक सकता है ? अपने देश में अंगरेजी के प्रभाव से जिस प्रकार हिंदी एवं अन्य भाषाएं प्रदूषित हो रही हैं, और जिस प्रकार उस प्रदूषण को लोग समय की आवश्यकता के तौर पर उचित ठहराते हैं, उससे यही लगता है कि इस “दिवस” का लोगों के लिए कोई महत्व नहीं हैं । इस दिन पत्र-पत्रिकाओं में दो-चार लेख अगले दिन भुला दिए जाने के लिए अवश्य लोग देख लेते होंगे, लेकिन अपनी मातृभाषाओं को सम्मान देने के लिए वे प्रेरित होते होंगे ऐसा मुझे लगता नहीं । अंगरेजी को गले लगाने के लिए जिस तरह भारतीय दौड़ रहे हैं, उससे यही लगता है कि भारतीय भाषाएं मातृभाषा के तौर पर उन्हीं तक सिमट जाएंगी जो दुर्भग्य से अंगरेजी न सीख पा रहे हों । – योगेन्द्र जोशी

श्री शशिशेखर जी,

मैंने आपका लेख “हत्‌भागिनी नहीं हमारी हिंदी” (हिन्दुस्तान, सितंबर 8) पढ़ा । उसी के संदर्भ में अपनी टिप्पणी प्रेषित कर रहा हूं । (अपने ब्लॉग http://hinditathaakuchhaur.wordpress.com में भी मैं इसे शामिल कर रहा हूं ।)

प्रथमतः मैं निवेदन करता हूं कि ‘हत्‌भागिनी’ न होकर ‘हतभागिनी’ होना चाहिए था । शब्द हत (मारा गया) है न कि हत् । शीर्षक में यह त्रुटि खलती है; अन्यथा चल सकता था । इस धृष्टता के लिए क्षमा करें ।

देश-विदेश में हिंदी, पर कितनी?

लेख में आप इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिंदी देश-विदेश में विस्तार पा रही है और अधिकाधिक लोग इसे प्रयोग में ले रहे हैं । आपने जिन अनुभवों की बात की है वे कमोवेश सभी को होते हैं, खास तौर पर इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में । सीधा-सा तथ्य यह है कि जहां कहीं भी पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी/उर्दूभाषी लोग रह रहे हैं, या बस चुके हैं, वहां उनके बीच हिंदी का प्रचलन देखने को मिल जाता है । जब विदेश में अपने देश अथवा भाषाई-सांस्कृतिक दृष्टि से निकटता रखने वाले अन्य देशों के निवासी पहुंचते हैं, तब उनमें परस्पर अपनापन का भाव जगता है यह स्वयं मेरा अनुभव रहा है ।

जब मैं 1983-85 में साउथहैम्पटन (इंग्लैंड) में था तब भारतीयों एवं पाकिस्तानियों से मेरी हिंदी में ही बात होती थी । लंडन के पास साउथहॉल का नजारा कुछ ऐसा हुआ करता था कि वहां पहुंचने पर ‘हम भारत में हैं’ ऐसा लगता था । साउथहैम्पटन में गुजराती दुकानदारों से मैं भारतीय भोजन सामग्री खरीदते समय अक्सर हिंदी में बात करता था । आरंभ में मैं एक पाकिस्तानी खान साहब के मकान में रहा, उनसे हिंदी में बात होती थी । बाद में किसी पंजाबी सज्जन के मकान में रहा जिसके पड़ोस में पंजाबी परिवार रहता था । उस परिवार की हिंदी-पंजाबी बोलने वाली महिला से मेरी पत्नी के अच्छे ताल्लुकात हो चले थे । मुझे एक पाकिस्तानी महोदय की याद है जिन्होंने कहा था, “आप लोग हिंदी बोलने की बात करते हैं, क्या यही हिंदी है, उर्दू जैसी ?”

उन दिनों भारत सरकार हवाई अड्डे पर मात्र 12-13 पौंड की रकम देती थी । मैं जब साउथहैम्पटन पहुंचा तो पता चला कि उस दिन सार्वजनिक छुट्टी है । उसके तथा विदेश यात्रा का पूर्ववर्ती अनुभव न होने के कारण तब मुझे काफी परेशानी झेलनी पड़ी थी । उस दिन एक बांग्लादेशी मूल के रेस्तरांवाले ने मुझे मुफ्त में भोजन कराया था ।

अमेरिका (सिलिकॉन वैली) में भी मेरे अनुभव कुछ मिलते-जुलते रहे । मेरे बेटे के हिंदुस्तानी साथियों के बीच हिंदी-अंगरेजी में वार्तालाप सामान्य बात होती थी । वहां बसे उसके एक मित्र के 5-7 साल के बच्चों को हिंदी में बोलते देख मुझे आश्चर्य हुआ । पता चला कि वे गरमियों में भारत आकर दादा-दादी के पास ठहरते हैं और हिंदी सीखते हैं ।

कहने का मतलब है कि दुनिया के जिन हिस्सों में पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी मूल के लोग हैं वहां वे प्रायः आपका स्वागत करेंगे और हिंदी बोलते हुए भी दिख जाएंगे ।

मुझे पता चला कि कैलिफोर्निया में कुछ प्राथमिक विद्यालयों में चीनी भाषा भी पढ़ाई जाती है । संप्रति अमेरिका में यह सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा है । वहां कई चीनी/कोरियाई मूल के लोगों की दुकानों पर नामपट्ट तक संबंधित लिपि में देखने को मिलते हैं । वहां के एक ‘कंडक्टेड टूअर’ का अनुभव मुझे याद है जिसका गाइड ताइवान मूल का युवक था, जिसने अपनी कमजोर अंगरेजी एवं मजबूत चीनी भाषा में पर्यटक स्थलों का परिचय कराया था । साथ में उपलब्ध पाठ्यसामग्री चीनी एवं अंगरेजी, दोनों में, थी । इस माने में हिंदी एकदम पीछे है ।

आपके-मेरे सरीखे अनुभव संतोष करने के लिए काफी नहीं हैं ऐसा मेरा मानना है । आपने इन दो बातों पर खास कुछ नहीं कहा:

(1) पहला, जो हिंदी अब पढ़ेलिखे लोगों के बीच जड़ें जमा रही है वह दरअसल हिंदी-अंगरेजी का मिश्रण है, और

(2) दूसरा, लिखित रूप में हिंदी की प्रगति निराशाप्रद ही है ।

हिंदी-अंगरेजी मिश्रभाषा

(1) जिस प्रकार यह देश ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ में बंटा है वैसे ही हिंदी (और कदाचित अन्य भारतीय भाषाएं) भी दो श्रेणियों में बंटी है । पहली को मैं व्यक्तिगत तौर पर मैट्रोहिंदी कहता हूं । इसे आप ‘महानगरीय हिंदी’, ‘एंग्लिसाइज्ड हिंदी’, ‘एंग्लोहिंदी’, अथवा ‘हिंदी-इंग्लिश मिश्रभाषा’ या कुछ और नाम दे सकते हैं । यह उन लोगों की भाषा है जो इस देश को ‘भारत’ नहीं कहते बल्कि ‘इंडिया’ कहते हैं । आप बताइए कितने पढ़ेलिखे लोगों के मुख से भारत शब्द निकलता है ? यह उस देश के हाल हैं जहां लोग मुंबई, चेन्नई, पुणे, पश्चिमबंग, ओडिशा, आदि नामों के लिए अभियान चलाते हैं, लेकिन देश को इंडिया कहना पसंद करते हैं । यह उन शिक्षित लोगों की भाषा है जो अंगरेजी के इस कदर आादी हो चुके हैं कि उन्हें समुचित हिंदी शब्द सूझते ही नहीं अथवा उन्हें याद नहीं आते हैं । आज स्थिति यह है कि ‘एंड’, ‘बट’, ‘ऑलरेडी’ आदि शब्द जुबान पर तैरते रहते हैं । कुछ लोग शारीरिक अंगों, ‘किड्नी’, ‘लिवर’, ‘मशल’ आदि और ‘ग्रे’, ‘मरून’ आदि जैसे रंगों की हिंदी बताने में भी असमर्थ पाये जाएंगे । हिंदी की गिनतियां अब जुबान पर कम ही आती हैं । कितने उदाहरण दें ? इस भाषा में अंगरेजी शब्द ही नहीं, वाक्यांश या पूरे वाक्य भी शामिल रहते हैं । पर्याप्त अंगरेजी न जानने वाले की समझ से परे ‘कम्यूनिके’, ‘कॉर्डन-आफ’, ‘सेफ्टी मेजर्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है । यह सब हो रहा है इस कुतर्क के साथ कि इससे हमारी हिंदी समृद्ध होती है । लेकिन अंगरेजी की शुद्धता के लिए वे पूर्णतः सचेत रहते हैं । उसको भी समृद्ध क्यों नहीं बनाते ?

AmarUjala - Mixed Scripts

दूसरी तरफ हमारी ‘देसी’ हिंदी है जो ग्रामीणों, अशिक्षितों/अल्पशिक्षितों, श्रमिकों आदि के द्वारा बोली जाती है, जिनका अंगरेजी ज्ञान अपर्यााप्त रहता है । उस हिंदी की बात होती ही कहां है ?

यह ठीक है कि अभी उक्त मिश्रभाषा का प्रयोग साहित्यिक कृतियों में नहीं हो रहा है, लेकिन टीवी चैनलों पर तो यही अब जगह पा रही है । विज्ञापनों की भाषा भी यही बन रही है । दिलचस्प तो यह है कि इस भाषा की लिपि भी देवनागरी एवं रोमन का मिश्रण देखने को मिल रहा है । इंटरनेट पर रोमन में लिपिबद्ध हिंदी खुलकर इस्तेमाल हो रही है, जब कि फोनेटिक की-बोर्ड के साथ यूनिकोड में टाइप करना कठिन नहीं होता ।

आशाप्रद नहीं लिखित हिंदी की स्थिति

(2) निःसंदेह हिंदी – अंगरेजी मिश्रित ही सही – एक बोली के रूप में विस्तार पा रही है । लेकिन लिखित तौर पर इसका इस्तेमान कितना हो रहा है ? एक ओर सरकारें इसे संघ की राजभाषा कहती हैं अैर दूसरी ओर वही इससे परहेज रखती हैं । ऐसे में अधिक उम्मीद कैसे की जा सकती है ? लोग बातें तो हिंदी में करते हैं, लेकिन लिखित में कुछ बताना हो तो अंगरेजी पर उतर आते हैं । डॉक्टर मरीज से हिंदी में करता है किंतु नुसखा अंगरेजी में ही लिखता है, इस बात की परवाह किए बिना कि मरीज उसे समझ पाएगा या नहीं । लिफाफे पर पता, रेलवे आरक्षण फॉर्म, बैंक लेनदेन का फॉर्म, इत्यादि वे अंगरेजी में ही भरते हैं, अगर वे अल्पशिक्षित न हों तो । कितनी सरकारी संस्थाएं आप गिना सकते हैं जिनकी वेबसाइटें हिंदी में हैं; अगर कहीं हैं तो अधकचरे । इंटरनेट पर कितने फार्म हैं जिन्हें देवनागरी में भरने का विकल्प उपलब्ध हो ? रेलवे आरक्षण टिकट हों या बिजली/टेलीफोन बिल उनकी प्रविष्टियां अंगरेजी में ही मिलेंगी ! जिस देश की सर्वोच्च अदालत ‘नो हिंदी’ कहे, यूपीएससी जैसी संस्था ‘अंगरेजी कंपल्सरी’ कहे, वहां हिंदी का भविष्य कैसा होगा सोचा जा सकता है ।

देश की व्यावसायिक संस्थाओं ने तो जैसे कसम खा रखी है कि वे हिंदी हरगिज नहीं चलने देंगे । बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामग्री के बारे में कितनी संस्थाएं हिंदी-देवनागरी में जानकारी देती हैं ? बिस्किट पैकेट हो या टूथपेस्ट या अन्य उत्पाद उन पर हिंदी दिख जाए तो अहोभाग्य । कंप्यूटर संबंधी उपस्करों के साथ उपलब्ध जानकारी वियतनामी, थाई, हिब्रू, आदि में मिल जाएगी, लेकिन भारतीय भाषाओं में नहीं । हिंदीभाषी क्षेत्रों के दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में घूम जाइए, आपको हिंदी में शायद ही कहीं नामपट्ट दिखें ।

इस बात से आप अगर संतुष्ट हों कि अब अधिक लोग हिंदी बोल रहे हैं, भले ही उसे विकृत कर रहे हों, और उसे न लिखने की कसम खाए हों तो खुशकिस्मत हैं । लेकिन मुझे इसमें संतोष की गुंजाइश नहीं दिखती ।

भवदीय,

योगेन्द्र जोशी

लिवे देवते टीवी तस्वीर

श्रीमतीजी टेलीविजन पर कार्यक्रम देख रही थीं, और मैं कमरे के एक कोने में कुर्सी पर बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था । अचानक उन्होंने ने आवाज दी, “अरे भई, ये ‘लिवे देबते’” क्या होता है ?

“‘लिवे देबते’ ? देखूं, कहां लिखा है ?” कहते हुए मैं उनकी ओर मुखातिब हुआ । उन्होंने टीवी की ओर इशारा किया । मैंने उस ओर नजर घुमाई तो पता चला कि वे समाचार चैनलों पर कूदते-फांदते ‘एबीपी न्यूज’ पर आ टिकी हैं । पर्दें पर चैनल नं., समय, कार्यक्रम, आदि की जानकारी अंकित थी । चैनल बदलने पर इस प्रकार की जानकारी हिंदी में हमारे टीवी के पर्दे पर 2-4 सेकंड के लिए सदैव प्रकट होती है । उस विशेष मौके पर, राजनेता, पत्रकार तथा विशेषज्ञों के 5-6 जनों के जमावड़े के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस चल रही थी ।

मैंने पाया कि टीवी पर्दें पर उपलब्ध जानकारी में वास्तव में ‘लिवे देबते’ भी शामिल था । उसे देख एकबारगी मेरा भी माथा चकराया । इस ‘लिवे देबते’ का मतलब क्या हो सकता है ? अपने दिमाग का घोड़ा सरपट दौड़ाते हुए मैं उसकी खोज में मन ही मन निकल पड़ा । मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि यह तो हिंदी के कोई शब्द लगते नहीं । स्वयं से सवाल किया कि ये कहीं किसी अन्य भाषा के शब्द तो नहीं जो अंगरेजी के रास्ते यहां पहुंचे हों ! रोमन में ये कैसे लिखे जाएंगे यह जिज्ञासा भी मन में उठी और मुझे तुरंत बुद्धत्व प्राप्त हो गया । समझ गया कि यह तो ‘LIVE DEBATE’ है जो उस कार्यक्रम का सार्थक शीर्षक था । वाह! वाह रे चैनल वालो, कार्यक्रम को हिंदी में ‘जीवंत बहस’ या इसी प्रकार के शब्दों में लिख सकते थे । अथवा इसे ‘लाइव डिबेट’ लिख देते । न जाने किस मशीनी ‘ट्रांसलिटरेशन’ (Transliteration) प्रणाली का उन्होंने प्रयोग किया कि यह ‘लिवे देबते’ बन गया । ध्यान दें कि रोमन अक्षरों के लिए L = ल, I = ई, V = व, E = ए, D = द, B = ब, A = अ, T = त, का ध्वन्यात्मक संबंध स्वीकारने पर उक्त लिप्यांतरण मिल जाता है । परंतु अंगरेजी में रोमन अक्षरों की घ्वनियां इतनी सुनिश्चित नहीं होतीं यह संबंधित लोग भूल गये ।

और जब दूसरे दिन फिर चैनल को हम देखने बैठे तो देखा कि गलती दूर हो चुकी है ।  पर्दे पर ‘लाइव डिबेट’ अंकित नजर आरहा था।

इस घटना ने इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान खींचा कि हमारे देश में सर्वत्र अंगरेजी छाई हुई है और हिंदी माध्यमों पर परोसी जाने वाला ज्ञान अंगरेजी में उपलब्ध जानकारी के अनुवाद/लिप्यांतरण पर आधारित होता है; अथवा तत्संबंधित उच्चारण को देवनागरी में प्रस्तुत किया जाता है । इस प्रक्रिया में कभी-कभी हास्यास्पद प्रस्तुति भी पेश हो जाती है, क्योंकि अनुवाद करने वाला शब्दों से संबंधित ध्वनियों से सदैव वाकिफ नहीं होता और शायद उसे किसी स्रोत से जानने की कोशिश भी नहीं करता । दो-एक उदाहरणों पर गौर करें:

(1) समाचारपत्र हिन्दुस्तान में मुझे जर्मनी की समाचार/रेडियो/टीवी संस्था का कभी-कभार उल्लेख देखने को मिल जाता है । लिखा रहता है ‘डाइचे विले’ (Deutsche Welle), जब कि होना चाहिए था ‘डॉइच वेलऽ’ – निकटतम उच्चारण । ऐसा क्यों है ? इसका कारण मेरी समझ में इस तथ्य को नजरअंदाज करना है कि अधिकांश यूरोपीय भाषाओं की लिपि मूलतः रोमन है, जिसे लैटिन भी कहते हैं । आवश्यकतानुसार कहीं-कहीं विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग भी होता है । किंतु हर भाषा के उच्चारण के नियम अलग-अलग हैं जो बहुधा अंगरेजी से पर्याप्त भिन्न रहते हैं । उच्चारण की द्ष्टि से फ्रांसीसी एवं तत्पश्चात् अंगरेजी घटिया मानी जाती हैं । जर्मन भाषा के नियम अधिक साफ-सुथरे हैं । कुछ भी हो, किसी व्यक्ति, संस्था अथवा शहर आदि विदेशी नामों का संबंधित भाषा के बोलने वालों के उच्चारण से भिन्न नहीं होना चाहिए । वह नाम उस भाषा में भी रोमन में ही लिखा जाता है तो क्या उसे हम अंगरेजी के हिसाब से बोलें, क्योंकि हम केवल अंगरेजी से सुपरिचित हैं ? जर्मन में ‘आल्बर्त आइंस्ताइन’ बोला जाता है न कि ‘ऐल्बर्ट आइंस्टीन’ । किसे सही माना जाए ? इन बातों की जानकारी मुझे तब हुई जब एम.एससी. पाठ्यक्रम के दौरान मुझे एक आस्ट्रियाई सज्जन से प्राथमिक जर्मन पढ़ने का मौका मिला । (आस्ट्रिया की भाषा भी जर्मन है ।)

(2) मैं जब एम.एससी. में पढ़ता था तो हमें आरंभ के कुछ समय तक रज्जू भैया जी (जो कालांतर में आर.एस.एस. प्रमुख बने थे) ने भी पढ़ाया था । हम लोग फ्रांसीसी वैज्ञानिक Langevin को ‘लांजेविन’ कहते थे । उन्होंने ही हमें बताया कि यह फ्रांसीसी नाम असल में ‘लाजवां’ बोला जाता है । इसी प्रकार यह भी जाना कि वैज्ञानिक Fermat का नाम फर्मा है न कि ‘फर्मैट’

(3) ब्रिटेन का एक शहर है Leicester जहां अनेक भारतीय बसे हैं । मैं उसे ‘लाइसेस्टर’ कहता था । इंग्लैंड पहुंचने पर पता चला कि वह ‘लेस्टर’ है ।

(4) दो-तीन रोज पहले अखबार में अमेरिका के Yosemite राट्रीय उद्यान (कैलिफोर्निया) के बारे में खबर थी । उसमें इस स्थल को ‘योसेमाइट’ कहा गया था । बहुत अंतर तो नहीं, फिर भी यह ‘योसेमिती’ कहा जाता है, जो स्पेनी भाषा पर आधारित है जिसका प्रचलन आारंभ से ही उस क्षेत्र में काफी रहा है । वहां पहुचने पर मुझे पता चला कि जिस शहर को मैं ‘सैन जोस’ (San Jose) समझता था वह दरअसल ‘सान होजे’ कहलाता है ।

किसी भाषा का विस्तृत ज्ञान कदाचित् किसी को नहीं होता है । किंतु जो लोग पत्रकारिता जैसे व्यवसाय में लगे हों उन्हें सही-सही वर्तनी एवं उच्चारण जानने की उत्कंठा होनी ही चाहिए । आज के युग में शब्दकोश तथा इंटरनेट काफी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं । – योगेन्द्र जोशी

Auroville - Globe

मैं दो-तीन माह पहले पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) घूमने निकला था । पुद्दुचेरी संघीय सरकार द्वारा शासित एक राज्य है, जिसके बारे में मुझे यह जानकारी नहीं थी कि यह वास्तव में दक्षिण भारत में स्थित चार अलग-अलग और छोटे-छोटे भूक्षेत्रों से बनी प्रशासनिक इकाई है, जिनमें पांडिचेरी (293 वर्ग किलोमीटर) नामक स्थान सबसे बड़ा और मुख्यतः शहरी क्षेत्र है । इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी है, अन्यथा यह लगभग चारों तरफ से तमिलनाडु से घिरा है । इस शहर के बाहर ग्रामीण क्षेत्र भी है । इसके अतिरिक्त दक्षिण की ओर कुछ दूरी पर तमिलनाडु से घिरा समुद्र तट स्थित ‘कराईकल’ (160 वर्ग कि.मी.) भी इसका हिस्सा है  । आंध्र के तटीय क्षेत्र में ‘यानम’ (30 वर्ग कि.लो.) और केरला तट पर ‘माहे’ (9 वर्ग कि.मी.) भी इसी राज्य के अंग हैं । ये सभी स्थान कभी फ्रांसीसी प्रभुत्व में होते थे । उसी के अनुरूप इन्हें मिलाकर एक अलग केंद्र शासित राज्य का दर्जा स्वतंत्र भारत में क्यों दिया गया यह मेरी समझ से परे है ।

पुद्दुचेरी यात्रा के विविध अनुभवों में मेरे लिए सबसे अहम रहा है वहां की भाषाई समस्या । यों तो दक्षिण भारत में हिंदी बहुत नहीं चलती है, फिर भी बड़े शहरों एवं पर्यटन स्थलों में हिंदी से अक्सर काम चल जाता है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही रहा है । यहां तक कि चेन्नई में भी आप भाषा को लेकर असहाय नहीं महसूस करेंगे । दक्षिण भारत की यात्राओें के दौरान हिंदी संबंधी अपने अनुभवों पर मैं पहले भी लिख चुका हूं । देखें 14 मई 2009 की तथा उससे पूर्ववर्ती पोस्टें । पुद्दुचेरी तमिलों का प्रदेश है तमिलनाडु की ही भांति । स्थानीय निवासियों का रहन-सहन, खानपान, जीवनशैली, भाषा आदि वैसा ही है जैसा तमिलों का अन्य स्थानों में है । फ्रांसीसियों का उपनिवेश रह चुकने के कारण वहां फ्रांसीसी भाषा-संस्कति का प्रभाव कुछ हद तक देखा जा सकता है । मेरी समझ से उसका कारण प्रमुखतया श्री ऑरोविंदो रहे हैं, जिन्होंने पुद्दुचेरी को अपनी कर्मभूमि चुना और वहीं अपना आश्रम स्थापित किया । श्री ऑरोविंदो फ्रांसीसी भाषा के ज्ञाता थे और फ्रांसीसियों से उनका घनिष्ठ संबंध रहा है, विशेषतः इसलिए कि आश्रम की ‘द मदर’ (मीरा अल्फासा? Mirra Alfassa) फ्रांस से आकर उनसे जुड़ गईं । श्री ऑरोविंदो के विदेशी शिष्यों में फ्रांसीसी लोग ही अधिकांशतः रहे हैं । आज भी उस आश्रम में आने वालों में फ्रांस के लोग ही सर्वाधिक रहते हैं, चाहे वे पर्यटक की हैसियत रखते हों या श्री ऑरोविंदो के अनुयायी होने की ।

पुद्दुचेरी में मुझे हिंदीभाषी अथवा उत्तरभारतीय नहीं दिखे । अवश्य ही उनकी संख्या नगण्य होगी, अतः मेरी नजर में नहीं आये होंगे । सरदार लोगों (सिखों) के बारे में कहा जाता है कि वे देश के हर कोने में मिल जाते हैं । मुझे याद नहीं आ रहा कि वहां किसी पगड़ीधारी सरदारजी को मैंने देखा हो । मारवाड़ी भी अक्सर सभी जगह मिल जाते हैं व्यापारिक गतिविधियों में संलग्न । वहां कहीं कोई रहा हो तो वह वहीं रचबस कर तमिलभाषी हो गया होगा । दक्षिण के अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोग शायद होंगे, किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं सकता ।

वहां कुल मिलाकर दो-तीन लोग मुझे मिले होंगे जो हिंदी/उर्दू बोलना-समझना कर पा रहे थे । एक व्यक्ति मिला था मुझे एक दुकान के बाहर । मैंने उससे अपने गंतव्य एक चौराहे के बारे में पूछा था, इशारों के साथ हिंदी शब्द बोलकर । उसने साफ हिंदी में जवाब दिया । मेरा अनुमान है कि वह नेपाली रहा होगा । एक और सज्जन मिले अन्यत्र जिनसे मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही । हुलिया से मुझे वे मुस्लिम वंधु लगे । मेरा ख्याल है कि दक्षिण के अधिकांश इस्लाम धर्मावलंबी उर्दू की थोड़ी-बहुत समझ रखते हैं ।

मुझे पुद्दुचेरी में भाषाई समस्या का जो अनुभव हुआ वह अन्य प्रमुख नगरों के अनुभव से कुछ भिन्न था । वहां हिंदी से ठीकठाक काम नहीं चल पाता है, और अंगरेजी भी अच्छा काम नहीं देती है । राह चलते मिलने वाले लोग अंगरेजी कम ही बोल पाते हैं ऐसा मुझे लगा । कुछ हद तक अंगरेजी उच्चारण भी एक समस्या रहती है; उनका उच्चारण उत्तरभारतीयों से भिन्न प्रतीत होता है । मैंने अनुभव किया कि पुद्दुचेरी का महत्व आम भारतीयों के लिए शायद नहीं है । वह कोई चर्चित तीर्थस्थल नहीं है और न ही विशेष आकर्षण का पर्यटक स्थल है । अरोविंदो दर्शन में रुचि लेने वाले ही कदाचित् वहां पहुंचते होंगे । इसलिए न हिंदी वहां पहुंच सकी और न ही वहां के बाशिंदों को अंगरेजी की खास जरूरत महसूस हुई होगी । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि तमिलनाडु की राजनीति आंरभ से ही हिंदी विरोध पर टिकी रही है । तमिलनाडु तथा पुद्दुचेरी की राजनीति में कोई अंतर नहीं है । इसके अलावा अंगरेजी सरकारी एवं व्यावयायिक कार्यालयों तक ही सीमित कर रह गई होगी । जब मैं वहां के पर्यटन कार्यालय गया तो अंगरेजी में बात करना भी सुविधाजनक नहीं लगा ।

हिेदीभाषी तथा अन्य उत्तरभारतीय पर्यटकों की संख्या अधिक न होने से वहां के आटोरिक्शा चालकों और फुटकर दुकानदारों को भी हिंदी की जरूरत नहीं शायद नहीं रहती है । इसलिए उनके साथ मैंने इशारों एवं अंगरेजी-हिंदी शब्दों की मदद से काम चलाया था । लेकिन इतना सब होने के बावजूद एक अनुभव दिलचस्प रहा । मैं पुद्दुचेरी शहर से 20-25 किलोमीटर दूर ऑरोविंदो आश्रम से संबद्ध ऑरोविंदो विलेज गया था । वहां के पर्यटक स्थलों में यही कदाचित् सबसे आकर्षक है । वहां मुझे विदेशी पर्यटकों के अलावा देश के अन्य भागों से आए पर्यटक भी मिले । वहां ऑरोविंदो ग्राम के उद्येश्य एवं कार्यक्रमों के बारे में एक कमरे में 10-15 मिनट का वीडियो दिखाया जाता है, जिसकी भाषा दर्शकों की इच्छानुसार तमिल, अंगरेजी अथवा हिंदी चुनी जाती है । जब मेरी मौजूदगी में वीडियो प्रदर्शित किया गया तब मैंने  पाया कि देश के विभिन्न भागों से आए संभ्रांत और सुशिक्षित-से लगने वाले दर्शकों ने अंगरेजी के बदले हिंदी को चुना । स्पष्ट है अधिकतर देशवासियों के लिए हिंदी अधिक सुविधाजनक सिद्ध होती है । उस घटना से यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अंगरेजी में प्रायः सभी लिखित कार्य करने के आदी होने के बावजूद अधिकतर देशवासी उसमें कही गई मौखिक बातें सरलता से नहीं समझ पाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

Pondichery - Ambedkar Mandapam

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