Abundance of English words in spoken Hindi और हिंदी की ‘समृद्धि’ का भ्रमः भाग 1

Posted November 20, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: English, Hindi, language, अंग्रेजी, भाषा, राजभाषा, हिन्दी

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मैं लोगों के मुख ये उद्गार सुनता हूं कि हिंदी को समृद्ध करने के लिए अन्य भाषाओं के शब्द अपनाने में हमें हिचकना नहीं चाहिए । वे यह तर्क दे जाते हैं कि अंग्रेजी ने अन्य भाषाओं के शब्द अपनाकर अपना शब्दभंडार बढ़ाया है । मुझे यह शंका सदैव बनी रही है कि यह सब कहने से पहले उन्होंने अंग्रेजी शब्दों के बारे में पर्याप्त जानकारी हासिल की होगी । बात जब उठती है तो वे बिना गहन अध्ययन के और बिना गंभीर विचारणा के बहुत कुछ कह जाते हैं ऐसा मेरा मानना है । क्या उन्होंने यह जानने का कभी प्रयास किया कि अंग्रेजी ने किन परिस्थितियों में, किन शब्दों ेको आंग्लेतर भाषाओं से ग्रहण किया है ? और उन्होंने कितनी उदारता इस संबंध में बरती है ? सुधी जनों को किसी मत पर पहुंचने से पहले एतद्सदृश प्रश्नों पर विचार करना चाहिए । मैं दावा नहीं करता कि इस विषय पर मेरा मत त्रुटिहीन ही हैं, किंतु मैं भी तो समझूं कि कहा गलती कर रहा हूं ।

इसमें दो राय नहीं कि नई-नई आवश्यकताओं के अनुरूप हर भाषा को नये शब्दों की आवश्यकता पड़ती है । ऐसे शब्दों की या तो रचना की जाती है या उन्हें अन्य भाषाओं से उधार ले लिया जाता है । उधार लेने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते कि ऐसा करने के कारण उचित तथा स्वीकार्य हों । ‘मेरी मरजी’ का सिद्धांत अपनाकर अगर आप ऐसे शब्द अपनी भाषा में शामिल कर रहे हों तो आपत्ति की ही जाएगी । अंग्रेजी नये शब्दों की रचना में सुसमृद्ध नहीं है । उसे ग्रीक या लैटिन पर निर्भर रहना पड़ता है । मेरा अनुमान है कि ऐसी विवशता प्रायः सभी आधुनिक प्राकृतिक भाषाओं के साथ है । वस्तुतः स्वयं हिंदी मुख्यतः संस्कृत पर और उर्दू अरबी/फारसी पर निर्भर रही हैं । शायद चीनी भाषा इस मामले में बेहतर है, क्यों उसका संपर्क अन्य भाषाओं से अपेक्षया कम रहा है । लैटिन-ग्रीक आधारित शब्दों के अतिरिक्त भी कई शब्द किसी न किसी आधार पर रचे गये हैं, यथा भौतिकी (फिजिक्स) का ‘लेसर’ (‘लाइट एम्लिफिकेशन बाइ स्टिम्युलेटिड एमिशन अव् रेडिएशन’ का संक्षिप्त) । ‘एक्स-रे’ तथा ’क्वार्क’ शब्दों का भी अपना इतिहास है । ‘पार्टिकल फिजिक्स’ में ‘कलर’, ‘अप’, ‘डाउन’ जैसे रोजमर्रा के शब्द नितांत नये (पहले कभी न सोचे गये तथा आम आदमी की समझ से परे) अर्थों में प्रयुक्त होते हैं ।

अंग्रेजीभाषियों ने संस्कृत मूल के ‘अहिंसा’, ‘गुरु’, ‘पंडित’ जैसे शब्दों को ग्रहण किया है । मेरा अनुमान है कि जो अर्थ इन शब्दों में निहित हैं, ठीक वही उन्हें अपने पारंपरिक शब्दों में नहीं लगा होगा । ध्यान दें कि वे ‘गुरु’ को ‘टीचर’ के सामान्य अर्थ में प्रयोग में नहीं लेते हैं । हिंदी के ‘पराठा’, ‘जलेबी’ आदि शब्द उनके शब्दकोश में आ चुके हैं तो कारण स्पष्ट है; ये उनके यहां के व्यंजन नहीं हैं । हम भी ‘केक’, ‘बिस्कुट’ की बात करते हैं; मुझे कोई आपत्ति नहीं । और ऐसा ही अन्य भाषाओं के साथ रहा होगा । किंतु यह नहीं कि अंग्रेजी में इतर भाषाओं के शब्द अंधाधुंध ठूंस लिए गये हों । जो शब्द उसमें पहुंचे भी हैं वे किसी एक भाषा के नहीं; वे अधिकतर यूरोपीय भाषाओं के हैं तो कुछ हिंदी-उर्दू जैसे भौगोलिक दृष्टि से दूरस्थ भाषाओं के जिनके संपर्क में अंग्रेजी आई । अपनी भाषा में उन्होंने इतर भाषाओं के शब्द नहीं ठूंसे ऐसा मैं इस आधार पर कहता हूं कि आज भी अंग्रेजी में सूर्य, चंद्र, आकाश, वायु, जल आदि शब्दों के पर्याय देखने को नहीं मिलते हैं । उनके यहां पारिवारिक रिश्तों को स्पष्ट करने वाले शब्द नहीं हैं, यथा मौसा-मौसी, मामा-मामी, चाचा-चाची तथा फूफा-बुआ, सब अंकल-आंट, फिर भी वे संतुष्ट, कहीं से इनके लिए उपयुक्त शब्द उधार नहीं लिए गये ।

परंतु हिंदी की स्थिति एकदम अलग है । इसमें अंग्रेजी के शब्दों को ठूंसने में किसी को न हिचक है और न हया । जो इसकी शब्द-संपदा बढ़ाने के पक्ष में तर्क या कुतर्क पेश करते हैं उन्हें इन प्रश्नों पर विचार करना चाहिए । उन्होंने अन्य भारतीय भाषाओं से कितने शब्द उधार लिए हैं ? और कितने शब्द दूसरी यूरोपीय अथवा पूर्व एशिया की भाषाओं से लिए हैं ? केवल अंग्रेजी शब्दों को शामिल करने को ही वे ‘हिंदी को समर्थ बनाना’ क्यों मानते हैं ?

अंग्रेजी किस कदर हिंदी के भीतर घुस रही है देखिए:
1. हिंदी की गिनतियां नई पीढ़ी भूलती जा रही है; सबकी जुबान से अब वन्-टू…हंडेªड निकलता है ।
2. अब साप्ताहिक दिनों के अंग्रेजी नामों का प्रयोग खुलकर हो रहा है, जैसे संडे-मंडे ।
3. लोग रंगों के अंग्रेजी नाम बेझिझक इस्तेमाल करने लगे हैं, जैसे येलो-ग्रीन-रेड ।
4. हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि शरीर के अंग भी अब अंग्रेजी नामों से संबोधित किए जाने लगे हैं, यथा हार्ट-लंग-थ्रोट ।
5. सामाजिक/पारिवारिक रिश्तों की स्थिति असमंजस की बन गयी है । मॉम-डैड, फादर-मदर, फादर-इन-लॉ, सन-इन-लॉ तो आम हो चुके हैं किंतु अन्य रिश्ते समस्या खड़ी कर रहे हैं, क्योंकि रिश्तों के लिए सटीक शब्द अंग्रेजी में हैं ही नहीं और सभी को एक ही नाम देने में अभी लोग हिचक रहे हैं । कल नहीं तो परसों बची-खुची हिचक भी चली जाएगी ।
6. अंग्रेजी के ‘ऑलरेडी’ (पहले ही), ‘डेफिनिट्ली’ (बेशक, निश्चित तौर पर), ‘एंड’ (और), ‘ऑर’ (या), जैसे शब्द हिंदी में जगह पाने में सफल हो रहे हैं । जो थोड़ी भी अंग्रेजी जानता है वह अपनी बात यूं कहने से नहीं हिचकता हैः “अब सिचुएशन अंडर कंट्रोल है । डिस्ट्रिक्ट एड्मिनिस्ट्रेशन को अप्रोप्रिएट स्टेप उठाने के लिए इंस्ट्रक्शन्स ऑल्रेडी दिए जा चुके हैं ।” जाहिर है कि अंग्रेजी न जानने वाले के लिए ऐसे कथनों के अर्थ समझ पाना कठिन है । पर परवाह किसको है ? आधुनिक ‘देवभाषा’ इंग्लिश के लिए तो भारतीय भाषाओं को त्यागा ही जा सकता है न !

अंग्रेजी शब्दों से हिंदी को ‘समर्थ’ बनाने वाले अपने ‘हिंदीभक्तों’ से पूछा जाना चाहिए कि अंग्रेजी में भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करके उसे भी अधिक समर्थ बनाने से वे क्यों बचते आ रहे हैं ? उनके मुखारविंद से यह ‘सेंटेंस’ क्यों नहीं निकलता: “My chaachaa has brought a kaangree from Srinagar.” I am sure that English does not have appropriate words for the two non-English words in this sentence; using them would benefit English.” (मुझे विश्वास है कि इस वाक्य के दोनों गैर-अंग्रेजी शब्दों के लिए उपयुक्त शब्द अंग्रेजी में नहीं हैं; इन्हें प्रयोग में लेने से अंग्रेजी को लाभ मिलेगा ।)

(टिप्पणी: kaangree, कांगड़ी - शरीर को गर्म रखने के लिए एक छोटी टोकरीनुमा अंगीठी, जिसे काश्मीरी लोग पेट के निकट ढीले कपटों के भीतर छुपाकर प्रयोग में लेते हैं ।)

तो यह था एक संक्षिप्त विवरण हिंदी में अंग्रेजी शब्दों की अमर्यादित भरमार का । आखिर ऐसा क्यों है ? मुझे जो कारण समझ में आते हैं उनकी चर्चा अगली पोस्ट में । ‘टिल देन, गुड बाय.’ – योगेन्द्र जोशी

Macaulay’s Education Policy – Create a class of people English in taste, opinions, …

Posted November 16, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: India, politics, भारत

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1.
“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” (T.B. Macaulay, in support of his education policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.)
(हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे लाखों-करोड़ों जनों के बीच दूभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग/वर्ण में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि/विद्वत्ता में अंग्रेज हों । – टी.बी. मैकॉले, तत्कालीन गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिक को 1835 में सौंपी गई अपनी शिक्षा नीति के समर्थन में ।)

2.
“… we created a separate caste of English scholars, who had no longer any sympathy, or very little sympathy with their countrymen;” (Prof. H.H. Wilson before the select committee of the house of Lords, 5th July, 1863.)
(… हमने अंग्रेज विद्वानों की एक जाति तैयार कर ली, जिसे अपने देशवासियों के प्रति नहीं के बराबर या अत्यल्प सहानुभूति है । – प्रोफेसर एच. एच. विल्सन, हाउस अव् लॉर्ड‍‌‌ज की चयनित समिति के समक्ष, 5 जुलाई, 1863 ।)

3.
“… I venture to hazard the opinion, that Lord Willium Bentinck’s double act for the encouragement and diffusion of the English language and English literature in the east …the grandest masterstroke of sound policy that has yet characterised the administration of the British Government in India.” (Dr Duff, in the Lords second report on Indian Territories, 1853, p 409.)
(… मैं यह मत व्यक्त करने का जोखिम उठा रहा हूं कि विलियम बैंटिक का पूरब में अंग्रेजी भाषा एवं अंग्रेजी साहित्य को बढ़ावा देने तथा फैलाने का दोहरा कार्य … ठोस नीति की चतुराई भरी शानदार तरकीब, जिसने भारत में ब्रिटिश राज को विशिष्टता प्रदान की है । - डा. डफ्, भारतीय राज्यक्षेत्र से संबंद्ध लॉर्डज की द्वितीय रिपोर्ट में, 1853 ।)

This information I have taken from an article that I wrote several years back for a Physics education periodical. When I was sorting out old news paper clippings, magazine atircles and other items of information that I had collected during the last more than two decades, I accidentlly came across the manuscript relating to the said article. The reference cited therein is: Sudarlal, Bharat Main Angreji Raj (in Hindi, with footnotes in English), Vol III, pp 1140-42 (Onkar Press, Allahabab, 1938) (यह जानकारी मैंने अपने एक लेख से ली है, जो मैंने वर्षों पहले भौतिकी-विषयक एक पत्रिका के लिए लिखा था । पिछले दो दशकों से अधिक के समय में समाचार-पत्रों की कतरनों, पत्रिकाओं के लेखों तथा अन्य जानकारीशुदा सामग्री की जब मैं छटनी कर रहा था, तब संयोग से उल्लिखित लेख की पांडुलिपि मेरे हाथ लगी । उक्त स्थल पर अंकित संदर्भ यूं है: सुंदरलाल, भारत में अंग्रेजी राज, हिंदी में, अंग्रेजी में पाद-टिप्पणियों के साथ, तृतीय खंड, पृष्ठ 1140-42; ओंकार प्रेस, इलाहाबाद, 1938 ।)

Let me add here this much: Late Pt. Sundarlal, a scholar of History, is reported to have gone to England for higher studies like so many other Indians of those times. During his stay there, he came accross various documents archived in the British libraries – documents pertaining to the British rule in India. Those documents aroused the patriotic rebellian in him, and eventually he turned into a freedom fighter. The first edition of his work was published in1929. Pt. Sundarlal was subsequently jailed for his `offence‘.

(कहा जाता है कि पंडित सुंदरलाल, इतिहास के एक विद्वान, उस काल के अन्य कई भरतीयों की भांति, उच्चाध्ययन के लिए इंग्लैंड गये थे । वहां के प्रवास के दौरान ब्रिटिश पुस्तकालयों में संग्रहीत विभिन्न दस्तावेज उनकी नजर में आये – दस्तावेज जो भारत में ब्रिटिश राज से संबंधित थे । उन दस्तावेजों ने उनके भीतर के विद्रोही को जगाने का काम किया, और अंत में वे एक स्वतंत्रता सेनानी बन बैठे । पं. सुंदरलाल को बाद में अपने ‘अपराध’ के लिए जेल जाना पड़ा ।)

I have no access to the full text of the speech Macaulay may have given in 1935. But I feel that the few words stated in the first paragraph above make it more than clear that he was sowing the seeds of a newer class of `Indians’, who were committed to help the British rule in this country, India. You may not like to use the words `brainwashing‘ in this context, but I definitely opine that something of that sort was there first in his mind and later in the minds of those who were in change of the rule on behalf of the British Royalty. And their scheme did work successfully, perhaps better than what they might have expected. The rulers succeeded in carving out of the Indian society a section of people, who could be regarded as brown Britishers born to Indian parents and physically brought up in the Indian society, but who were enthusiastically committed to the interests of the rulers and had quietly become supporters of the Rule in this country. – Yogendra Joshi (मैकॉले ने 1935 में जो भाषण दिया होगा उसके पाठ्य तक मेरी पहुंच नहीं है । किंतु मैं महसूस करता हूं कि वे कुछएक शब्द जो ऊपर के पहले अनुच्छेद में कहे गये हैं यह स्पष्ट कर देते हैं कि वह भारतीयों के एक नए वर्ग का बीजारोपण कर रहा था, जो ब्रिटिश राज को इस देश, भारत, में चलाने में सहायक हो । आप इस प्रसंग में मति-विपर्यास (ब्रेनवाशिंग) जैसे शब्द को प्रयोग में लेना नहीं चाहेंगे, लेकिन मेरा मत है कि अवश्य ही इसी प्रकार की कोई बात प्रथमतः उसके मन में और बाद में उनके मन में रही जिन्हें ब्रिटिश राजसत्ता की ओर से शासन का दायित्व मिला था । और उनकी योजना सफल भी रही, कदाचित् उनकी अपेक्षा से अधिक । वे शासक भारतीय समाज में से लोगों का एक वर्ग तरासने में सफल रहे जिन्हें भारतीय माता-पिता से जन्मे और भारतीय समाज में पले-बढ़े भूरे अंग्रेज कहा जा सकता है, लेकिन जो शासकों के हितो के प्रति समर्पित थे और उस राज के मूक समर्थक बन बैठे । – योगेन्द्र जोशी )

(टिप्पणीः हिंदीभाषियों के बीच अंग्रेजी शब्द brainwashing का प्रचलन आम बात है, और मेरे अनुमान से प्रायः सभी इसके अर्थ से परिचित हैं । मैंने हिंदी में इसके लिए ‘मति-विपर्यास’ चुना है; विपर्यास अर्थात् परिवर्तन या उलटफेर । इसके लिए उपयुक्त सामासिक शब्द क्या है या होना चाहिए यह मैं नहीं खोज पाया ।)

इस मुद्दे से जुड़े अथवा इस पर आधारित विचार आगामी आलेखों में प्रस्तुत किये जाएंगे । – योगेन्द्र जोशी

इंटरनेट संबंधी समाचार: वेब नामों में लैटिन लिपि की अनिवार्यता समाप्त

Posted November 2, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: English, Hindi, India, language, अंग्रेजी, भाषा, हिन्दी

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अब आप इंटरनेट वेब साइटों (अंतरजाल स्थलों?) के पतों को लैटिन/रोमन लिपि के बदले विश्व की तमाम अन्य मान्य लिपियों में चुन सकते हैं । इस आशय का एक समाचार (क्लिक करें) मुझे इंग्लैंड से छपने वाली पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ (http://www.newscientist.com/) से मिला है ।

New Scientistt News Clip

यहां पर मैं पत्रिका में छपे पूरे पाठ्य का उल्लेख नहीं कर रहा हूं, केवल कुछ बिंदुओं का सार लिख रहा हूं । उसके पश्चात् अपनी कुछएक टिप्पणियां । पत्रिका का आरंभिक अनुच्छेद इन शब्दों से आरंभ होता है:

आज इंटरनेट का भविष्य कुछ अधिक ही स्पष्ट हो गया है, जब इसकी नियामक संस्था, ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers – http://www.icann.org/en/general/background.htm), ने लैटिन से भिन्न लिपि-चिह्नों में वेब पतों को लिखने को मान्यता प्रदान कर दी । संस्था के अध्यक्ष, पीटर डेन्गेट थ्रश (Peter Dengate Thrush), समझाते हैं, “अभी तक इंटरनेट पतों का अंतिम अंश लैटिन कैरेक्टरों, A to Z, तक सीमित था ।” उनका आशय था कि अभी तक चीनी वेब नामों का आंरभिक अंश भले ही चीनी कैरेक्टरों में लिखा जा सकता था, उनका अंतिम अंश अनिवार्यतः ‘.cn‘ आदि ही हो सकता था । लेकिन अब …

लेख में लिखा है कि 16 नवंबर से सभी देश अब अपना ‘कैरेक्टर’ समुच्चय पंजीकृत कराकर ‘इंटर्नैशनल डोमेन नेम’ (IDNs) चुन सकेंगे । आगे यह भी कि चीनी भाषा-लिपि की वेब साइट Sun0769 में प्रस्तुत पाठ्य का ‘गूगल’ अनुवाद दावा करता है कि अब ‘लैटिन’ का एकछत्र सामाज्य समाप्त हुआ । जो लोग अंग्रेजी तो दूर उसकी लिपि तक से अपरिचित हैं उनके लिए यह खबर राहत पहुंचाने वाली है यह कहना है चीन की सबसे बड़ी इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी HiChina के वरिष्ठ परियोजना प्रबंधक वांग पेंग (Wang Peng) का । वेब पते का आरंभिक अंश http:// यथावत् बना रहेगा, यद्यपि आजकल इसका लिखा होना आवश्यक नहीं । इंटरनेट की मूल कार्यप्रणाली इस सब से बदलेगी नहीं, कुछ तकनीकी फेरबदल शायद कहीं करना पड़े ।

उक्त लेख में इस रोचक एवं अहम बात का जिक्र है कि आज के समय में चीन में इंटरनेट उपयोक्ताओं की संख्या विश्व में सर्वाधिक है – 33 करोड़ (अमेरिका की जनसंख्या, करीब 31 करोड़, से अधिक !)

वेब नामों में लैटिन लिपि की अनिवार्यता की समाप्ति की जानकारी मुझे गूगल के एक समूह (गूगल ग्रूप) के रास्ते श्री लोचन मखीजा महोदय से भी 4-5 दिन पहले मिली थी ।

चीन की भूमिका

लिपि संबंधी अनिवार्यता समाप्त करने की मांग चल रही है और देर-सबेर लैटिन का वर्चस्व समाप्त हो जायेगा इसका अंदाजा मुझे काफी पहले से था । वस्तुतः करीब तीन साल पहले मेरी नजर में एक लेख (http://www.icann.org/en/announcements/idn-tld-cdnc.pdf) आया था, जिसमें चीन के तत्संबंधी प्रयासों का जिक्र था ।

इसमें दो राय नहीं है कि लैटिन की अनिवार्यता समाप्त करने में चीन की भूमिका सर्वोपरि रही है । जैसा पहले कहा गया है चीन में इंटरनेट उपयोक्ताओं की संख्या सर्वाधिक ही नहीं है बल्कि एक प्रकार से आश्चर्यजनक भी है – 33 करोड़, पूरी जनसंख्या का लगभग 25 प्रतिशत । चीन में अंग्रेजी नहीं चलती है, कम से कम उस तरीके से और उस सीमा तक नहीं जैसे अपने देश तथा पूर्व में ब्रिटिश उपनिवेश रह चुके कई अन्य देशों में । यह बात अधिकांश हिंदुस्तानियों के गले नहीं उतर पाएगी कि वहां अंग्रेजी वास्तव में नहीं चलती । अंग्रेजी जानने वाले चीनियों की संख्या बहुत कम है; इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार करोड़ भर भी नहीं । जो जानते भी हैं उनकी अंग्रेजी कामचलाऊ ही कही जायेगी, अच्छी एवं प्रभावित करने वाली तो शायद ही देखने को मिले । 33 करोड़ की जनता तो अंग्रेजी अल्फाबेट से भी ठीक से परिचित नहीं । फिर इंटरनेट का उपयोग वे भला कैसे कर सकते हैं ? साफ जाहिर है कि वहां के लोग अंग्रेजी नहीं, बल्कि अपनी चीनी – असल में मैंडरिन – के माध्यम से ही इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं । चीन ने इस बात को महत्त्व दिया कि उसके अधिकाधिक लोग इंटरनेट का भरपूर प्रयोग करें और इस कार्य में अंग्रेजी उनके लिए रोड़ा न बने । यहां तक कि वेब साइटों के नाम लैटिन में लिखने की बाध्यता से भी उसकी जनता मुक्त रहे यह चीन का लक्ष्य रहा है । कुछ भी हो यह मानता पड़ेगा कि आईसीएएनएन के प्रसंगगत निर्णय के पीछे चीन की भूमिका प्रमुख रही है । भारत या इंडिया का भी कुछ योगदान रहा होगा इसमें मुझे शंका है ।

इंडिया बनाम भारत बनाम चीन

बात जब भाषा और लिपि की हो रही हो तो इस बात का उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि हम भारतीयों, या बेहतर होगा कहना इंडियन्ज, और चीनियों में गंभीर अंतर हैं । चीन के लोग कमोबेश अपनी भाषा/लिपि के प्रति गौरव रखते हैं और कोशिश करते हैं कि उनका कार्य यथासंभव अपनी भाषा/लिपि के माध्यम से हो । इसके विपरीत हममें भाषाई गौरव का अभाव है । अपनी भाषाओं के प्रयोग से यथासंभव बचें इसकी कोशिश हम अधिक करते हैं और अंग्रेजी के पक्ष में तमाम तर्क खोज लाते हैं । चीनी सरकार तथा वहां के तकनीकी विशेषज्ञ यह अच्छी तरह से समझते आये हैं कि वहां के लोग पहले अंग्रेजी सीखें और तत्पश्चात् वे कंप्यूटर पर बैठें ऐसा विचार करके चलना मूर्खतापूर्ण होगा । चीन की सोच यह रही है कि उसकी जनता को अंग्रेजी सीखने की जहमत ही न उठानी पड़े, बल्कि उन्हें कंप्यूटर तथा इंटरनेट सुविधा उनकी भाषा – मैंडरिन – में उपलब्ध कराई जाए । आज कंप्यूटरों के क्षेत्र में जो प्रगति हो चुकी है उसके कारण भाषाएं तथा उनकी लिपियां कोई समस्या नहीं रह गयी हैं । इस तथ्य के मद्देनजर चीन ने इंफर्मेशन टेक्नालॉजी का प्रयोग अपने लोगों के लिए अधिक किया है । अपने लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करके केवल पाश्चात्य देशों को निर्यात हेतु अंग्रेजी के माध्यम से सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में कार्य होवे यह चीन को स्वीकार्य नहीं रहा ऐसा मानना है मेरा । सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में वे हमसे पीछे दिखते हैं, पर मैं समझता हूं कि वस्तुतः ऐसा है नहीं । उनकी प्राथमिकता में उसके अपने लोग शामिल रहे हैं, जिसे अपनी भाषा/लिपि में इंटरनेट सेवा चाहिए । मेरा सोचना है कि इस नीति के कारण सॉफ्टवेयर के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजार से लाभ कमाने में चीन हमारे देश से पीछे रहा है । लेकिन उस कमी की भरपाई उसने हार्डवेयर के क्षेत्र में अतुलनीय प्रगति करके की है । हमारे यहां तो हार्डवेयर क्षेत्र प्रायः गायब-सा है, और साफ्टवेयर अधिकांशतः निर्यात के लिए, देशवासियों और स्वदेशी भाषाओं के लिए बहुत कम । बहरहाल मैं तो ऐसा ही मानता हूं ।

वास्तव में हमारी स्थिति चीन के ठीक उल्टी है । अपने यहां सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में हो रहा कार्य प्रमुखतया निर्यात के लिए रहा है और अंग्रेजी पर अपने यहां अत्यधिक जोर रहा है । यहां तक कहा जाता है कि अंग्रेजी के बल पर ही तो हम सूचना-क्षेत्र में अग्रणी और ‘धुरंधर’ होंगे । हमारी प्रथमिकता यह कभी नहीं रही कि हम स्वयं अपने देशवासियों के लिए ऐसे सॉफ्टवेयर विकसित करें कि हमारी अधिकांश जनता, जो अंग्रेजी नहीं जानती है, इंटरनेट का प्रयोग कारगर तरीके से कर सके । हमारे विशेषज्ञों का शायद ही कभी यह गंभीर प्रयास रहा हो कि अंग्रेजी में उपलब्ध जानकारी को वे अपने देशवासियों के समक्ष उनकी भाषा – जनभाषा – में प्रस्तुत करें, जैसा कि विश्व के सभी प्रमुख देशों में होता रहा है । सच पूछिए तो अपने नीति-निर्धारकों की भाषाई नीति ही दुर्भाग्यपूर्ण और खेदजनक रही है । वे इस बात पर जोर डालते रहे हैं कि समस्त ज्ञान अंग्रेजी में है, उसे पाना है तो हर व्यक्ति स्वयं अंग्रेजी सीखे । इसे वे ‘अंग्रेजी थोपना’ नहीं मानते हैं । इसके विपरीत चीन की नीति रही है कि हर चीनी को अंग्रेजी की जरूरत नहीं । जो ज्ञान अंग्रेजी में उपलब्ध है उसे अंग्रेजी जानने वाले विशषज्ञों द्वारा उनकी भाषा – मैंडरिन – में उनके सामने रखी जाएगी । अंग्रेजी सीखने का समय- तथा श्रम-साध्य कार्य हर व्यक्ति को करना पड़े ऐसी नीति चीन की नहीं रही है । इसी सिद्धांत को लेकर चीन चला है, और उसके प्रयास रहे हैं कि किसी चीनी को लैटिन लिपि का भी ज्ञान न हो तो भी वह बखूबी इंटरनेट का उपयोग कर सके । चीन उन देशों में अग्रणी रहा है जिन्होंने लैटिन लिपि की अनिवार्यता से मुक्त होने की पुरजोर कोशिश की और अंत में सफल भी हो गया । मेरा अनुमान है कि भारत या इंडिया का इस प्रयास में कोई योगदान नहीं रहा ।

वेब साइट नाम और भारतीय लिपियां

इंटरनेट वेब साइटों के नाम और उन पर प्रस्तुत पाठ्य सामग्री का लैटिनेतर लिपियों में उपलब्ध होना अवश्य ही उन उपयोक्ताओं के लिए लाभप्रद है जो उक्त लिपि और अंग्रेजी से सुपरिचित नहीं हैं । अब सवाल उठता है कि आईसीएएनएन का निर्णय अपने देश के संदर्भ में कोई अहमियत रखता है क्या ? इस तथ्य को नहीं झुठलाया जा सकता है कि अपने देश में समाज का अपेक्षया संपन्न वर्ग ही कंप्यूटरों और इंटरनेट तक पहुंच रखता है, और अपवादों को छोड़ दें तो, यह वह वर्ग है जो अंग्रेजी भाषा में अधिक दिलचस्पी रखता है और उसी को प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेने का आदी है । इस वर्ग के जो लोग अपनी नेमप्लेट (नामपट्ट) तक देवनागरी या अन्य भारतीय लिपियों में लिखने से परहेज रखते हैं वे क्या लैटिनेतर लिपि में वेेब नाम चुनना चाहेंगे ? अपने शहरों में दुकानों/कार्यालयों के नामपट्ट तक चयनित तौर पर अंग्रेजी में रहते हैं; ऐसे में भारतीय लिपियों की बात कौन करेगा ? उपभोक्ता वस्तुओं के नाम और उनके साथ संलग्न जानकारी तक भारतीय लिपियों में कम ही देखने को मिलती है । देवनागरी की स्थिति तो और भी दयनीय है । बाजार में हिंदी संगीत/गानों का कैसेट खरीदें, क्या उस पर देवनागरी में लिखा दिखता है कभी ? हिंदी फिल्मों की ‘कास्टिंग’ आदि का विवरण तक देवनागरी में देखने को नहीं मिलता, तब भला उसका प्रयोग इंटरनेट वेब नामों में कौन करेगा ।

अपने देश की प्रायः सभी, विशेषकर सरकारी, वेब साइटें मूलतः अंग्रेजी में बनी हैं। कम ही स्थल हैं जिनमें हिंदी/देवनागरी में जानकारी मिलेगी । उन साइटों का ढांचा भी अक्सर अंग्रेजी में ही रहता है, केवल पाठ्य हिंदी में देखने को मिलेगा । प्रयोग में लिए जा रहे ‘आइकॉन’ और ‘बटन’ पर लैटिन वर्ण ही झलकते हैं । चाहे बैंकीय लेन-देन हो या रेलवे आरक्षण, अथवा इंटरनेट पर सरकारी-गैरसरकारी फार्म भरना, सभी कुछ अंग्रेजी में रहता है । तब आईसीएएनएन का उक्त निर्णय भारत के संदर्भ में क्या कोई माने रखता है । शायद नहीं !

और बात खत्म करते-करते आंरभ में उल्लिखित वेब साइट Sun0769 के एक पेज की तस्वीर पेश कर दूं, यह दर्शाने के लिए कि लैटिनेतर लिपि के प्रयोग का क्या मतलब है ।

Chinese Site

आगे है ‘गूगल अनुवादक’ से प्राप्त वही पृष्ठ । मुझे लगता है कि गूगल अनुवादक हिंदी की तुलना में चीनी भाषा के लिए अधिक सफल है । इस मामले में भी वे हमसे आगे हैं ।

CHinese Site Google Translation

और अंत में यह देखिए तोक्यो विश्वविद्यालय का एक वेब पेज

Tokyo University Site Pge

क्या अपने देश में कोई विश्वविद्यालय है जिसकी वेब साइट पर भारतीय लिपि भी दिखती हो ? मेरी जानकारी में नहीं ! – योगेन्द्र जोशी

आज की हिंदी का एक नमूना हिंदी अख़बार से – यह हिंदी है कि हिंग्लिश ? शेष भाग

Posted October 5, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: Hindi, language, अंग्रेजी, भारत, भाषा, राजभाषा, हिन्दी

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बीते कल (4 अक्टूबर) की पोस्ट के आगे ।
[उक्त पोस्ट में ‘दैनिक भास्कर’ के एक समाचार, जिसमें प्रजेंट (मौजूदा, वर्तमान), चिल्ड्रन्स (बच्चे), हैबिट (आदत), क्वैश्चन (सवाल, प्रश्न), आंसर (उत्तर, जवाब), वॉल (दीवाल), आदि जैसे ढेरों अंग्रेजी शब्द अनावश्यक रूप में ‘यूज’ किए गये हैं, को संदर्भ में लेते हुए हिंदी की दुर्दशा पर कुछ टिप्पणियां की गई हैं । उसी चर्चा का शेष आगे प्रस्तुत है ।]

3.
यह देश का दुर्भाग्य है कि विभिन्न विषयों के हमारे विशेषज्ञ भाषाई दृष्टि से आम जनता से कटे हुए हैं । तात्पर्य यह है वे अपने विषय की बातें आम जनता के समक्ष उनकी भाषा में नहीं प्रस्तुत कर सकते हैं । वे यह बात भूल जाते हैं व्यावसायिक एवं अन्य कारणों से वे जैसी दक्षता अंग्रेजी में स्वयं हासिल कर चुकते हैं वैसी आम जनता के लिए संभव नहीं है । ये विशेषज्ञ यह नहीं सोच पाते हैं कि अच्छी अंग्रेजी सीखने के यह अर्थ कदापि नहीं हो सकते कि आप अपनी मातृभाषा या क्षेत्रीय भाषा को नजरअंदाज कर दें और उसे निरादर भाव से देखें । ऐसा बेहूदा रवैया, जिसे मैं व्यक्तिगत तौर पर बेशर्मी भरा मानता हूं, दुनिया के अन्य प्रमुख देशों में देखने को नहीं मिलता है । वस्तुतः किसी गैर-अंग्रेजीभाषी देश, यथा चीन, जापान, कोरिया, फ्रांस, रूस अथवा ऐसे ही कोई अन्य देश, में एक विशेषज्ञ आम आदमी के साथ विचारों का आदान-प्रदान उसकी भाषा में बखूबी कर लेता है, और ऐसा न कर पाना अपना एक गंभीर दोष मानता है । वस्तुतः ऐसे सभी जनों को अंग्रेजी के अलावा अपनी भाषा पर भी पर्याप्त अधिकार होना चाहिए और ऐसा न कर पाने पर शर्मिंदगी अनुभव करनी चाहिए । मैं इन विशेषज्ञों से साहित्यिक स्तर की उच्च कोटि की भाषाई सामर्थ्य की अपेक्षा नहीं करता, किंतु ‘आदत’ की जगह ‘हैबिट’, ‘परिवार’ के स्थान पर ‘फैमिली’, और ‘दीवाल’ के बदले ‘वॉल’, इत्यादि, जब उनके मुख से सुनता हूं तब माथा पटकने का मन होता है मेरा । इतनी अधिक भाषाई अक्षमता, अपनी ही मातृभाषा में ?

4.
उपर्युक्त भाषाई अक्षमता के लिए विशेषज्ञों को एकबारगी माफ किया जा सकता है, परंतु जब ऐसी कमी समाचार माध्यमों और उनसे जुड़े पत्रकारों में दिखाई देती है, तो मैं विचलित हुए बिना नहीं रह पाता । मैं नहीं समझ पाता कि ये लोग हिंदी में पत्रकारिता कर रहे होते हैं या वर्णसंकर भाषा ‘हिंग्लिश’ में । यदि कोई व्यक्ति दावा करे कि वह अमुक भाषा में पत्रकारिता करता है तो उसे उस भाषा का पर्याप्त ज्ञान होना ही चाहिए । वस्तुतः पत्रकारों के बीच एकाधिक भाषा जानना आम बात होती है । उनमें तो यह काबिलियत होनी ही चाहिए कि जहां जिस भाषा की जरूरत हुई उस भाषा को पर्याप्त शुद्धता के साथ प्रयोग में ले सकें । क्या हमारे पत्रकार किसी चीनी या जापानी अखबार के लिए ऐसी पत्रकारिता कर सकते हैं जिसमें अंग्रेजी शब्द ठुंसे पड़े हों ? ऐसा करने की छूट भारतीय भाषाओं वाले ही ले सकते हैं । यह तो इस देश की बदकिस्मती है कि अंग्रेजी हमारे पढ़े-लिखे लोगों, विशेषतः शहरी जनों, के ऊपर बुरी तरह हावी है, इतना कि हिंदी को कुरूप बना डालने में कहीं कोई हिचक नहीं रह गयी है । वार्ताकारों/संपादकों का यह कर्तव्य बनता है कि वे किसी व्यक्ति के वक्तव्य के अंग्रेजी शब्दों के स्थान पर तुल्य हिंदी शब्द प्रयोग में लें । समाचार तो मूल रूप से विश्व की किसी भी भाषा में हो सकता है; उसे अपनी-अपनी भाषाओं में प्रस्तुत करना समाचारदाताओं का काम है । साफ-सुथरी भाषा बोलना-लिखना स्वयं में एक शिष्टाचार है

5.
जब अखबारों के ये हाल हों तब टेलीविजन चैनलों के हाल तो बुरे होने ही हैं । टीवी चैनलों पर आजकल प्रस्तुत समाचार तथा अन्य कार्यक्रमों में तो अंग्रेजी इस कदर ठुंसी रहती है कि इन चैनलों को मैं हिंग्लिश चैनल कहना पसंद करता हूं । धार्मिक प्रकरणों के मामले में स्थिति कुछ बेहतर रहती है, लेकिन वहां संस्कृतनिष्ठ हिंदी दिखाई देती है । निजी चैनलों की तुलना में ‘दूरदर्शन’ में अवश्य कुछ भाषाई साफ-सुथरापन रहता है । निजी चैनलों पर शायद ही कोई प्रस्तुति देखने को मिले, जिसमें पूरे-पूरे वाक्य अंग्रेजी में न बोले जा रहे हों । अधिकांश प्रस्तुतियों के नाम अंग्रेजी के रहते हैं और देवनागरी लिपि तो उनके लिए जैसे अछूत बन चुकी है; सब रोमन में ! उन्हें देखकर तो कोई भी विदेशी यही सोचेगा कि शुद्ध हिंदी में अभिव्यक्ति संभव नहीं है ।

6.
अंग्रेजी शब्दों के अतिशय प्रयोग के पक्ष में एक तर्क मैं लोगों के मुख से सुनता आ रहा हूं । तर्क है कि ऐसा करने से हमारी भाषा हिंदी अधिक संपन्न एवं समृद्ध बनती है । क्या वास्तव में ऐसा है ? उत्तर अंशतः हां है पर पूरा नहीं । यह बात सही है कि नई आवश्यकताओं के अनुरूप नये-नये शब्द हर भाषा की शब्दसंपदा में जोड़ने पड़ते हैं । ऐसी आवश्यकता का अनुभव विज्ञान, चिकित्सा, अर्थतंत्र आदि के क्षेत्रों में कार्यरत लोग करते रहते हैं । तब आवश्यकता की पूर्ति के लिए या तो नये शब्द भाषा के नियमों के अनुसार रचे जाते हैं, या अन्य भाषाओं से ‘उधार’ ले लिए जाते हैं । अंग्रेजी में ऐसा होता आया है यह मैं अपने विज्ञान-विषयक अध्ययन के आधार पर जानता हूं । मैं ‘उधार’ की परंपरा का विरोधी नहीं हूं, परंतु यह गंभीर शंका मुझे बनी हुई है कि जिस लापरवाही और विचारहीनता के साथ अंग्रेजी शब्द हिंदी में ठूंसे जा रहे हैं वह भाषा को समृद्ध करने वाला नहीं है । समझदार आदमी उन शब्दों को उधार लेगा जिनकी सचमुच में जरूरत हो । लेकिन मेरे हिंदीभाषी मित्र क्या कर रहे हैं ? यही न कि हिंदी के शब्दों को अंग्रेजी शब्दों से विस्थापित कर रहे हैं ? क्या ‘परिवार’ के बदले ‘फैमिली’ और ‘इस्तेमाल करना’ के बदले ‘यूज करना’ किस जरूरत के अनुकूल है ? वास्तव में हम हिंदीभाषी अपनी भाषाई क्षमता खोते जा रहे हैं और अपनी अक्षमता को छिपाने हेतु खोखले तर्क पेश करते हैं । आज हालात यह हैं कि हमारे युवक-युवतियां तथा किशोर-किशोरियां रोजमर्रा के हिंदी शब्दों को भूलते जा रहे । वे हिंदी में गिनतियां नहीं सुना सकते, रंगों के नाम, साप्ताहिक दिनों के नाम नहीं ले सकते । उन्हें साल के बारह महीनों और छः ऋतुओं के नाम मालूम नहीं । अंग्रेजी स्कूलों के बच्चे तो ‘आंख-कान’, ‘कुत्ता-बिल्ली’ के लिए ‘आई-नोज’, ‘डॉग-कैट’ कहने के आदी हो चुके हैं । तो क्या हिंदी को समृद्ध करने का यही सही तरीका है ? सोचिए ।

प्रस्तुत प्रसंग के संदर्भ में ऐसे और भी सवाल उठाये जा सकते हैं । कोई सुने तो उन्हें, सोचे तो उनके बारे में । – योगेन्द  जोशी

आज की हिंदी का एक नमूना हिंदी अख़बार से – यह हिंदी है कि हिंग्लिश ?

Posted October 4, 2009 by योगेन्द्र जोशी
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खुद को हिंदी अखबार होने का दावा करने वाले एक समाचारपत्र में कैसी हिंदी छपती है इसकी एक बानगी प्रस्तुत है ।
मैं बीच-बीच के अंशों को ‘इलिप्सिसों – ellipses’ के प्रयोग के साथ लिख रहा हूं । पूरा विवरण आप अधोलिखित वेबसाइट पते पर देख सकते हैं:-
http://www.bhaskar.com/2009/09/30/090930015246_lifestyle.html

हां तो आगे देखिए उक्त खबर के चुने कुछ शब्द/वाक्यांश:-

“बच्चों में झूठ बोलने की हैबिट को दूर करें [शीर्षक]
“Bhaskar News Wednesday, September 30, 2009 01:45 [IST]
“प्रजेंट टाइम में अधिकांश पेरेंट्स अपने चिल्ड्रन्स के झूठ बोलने की हैबिट से परेशान हैं। … सीखी हुई हैबिट है, जिस पर पेरेंट्स … इसे रोका या चैंज किया … साइकेट्रिस्ट डॉ. राकेश खंडेलवाल का। उन्होंने इस हैबिट को दूर करने के कुछ टिप्स बताए, जो पेरेंट्स के लिए मददगार साबित हो सकते हंै।
“1. बच्चों से ऐसे क्वैश्चन नहीं करना चाहिए, जिनके आंसर में झूठ बोलना … बच्चे को कलर का पैकेट दिलवाने के बाद … वह वॉल को चारों ओर … से रंग-बिरंगी कर देता है। उस टाइम … उसे कहें कि आज और कलर्स यूज करने की इजाजत नहीं है।
“2. … फैमिली आगे बढ़कर … नहीं करना चाहिए।
“3. … बच्चे फ्रैंड्स के सामने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने और इमेज सुधारने … उनके रिलेशन में सभी ऑफिसर रैंक पर हैं। उनके कपड़े बहुत चीफ हैं। इसके लिए बच्चे को अकेले में कॉन्फिडेंस से समझाएं। उसे कहें कि उसकी ऑरिजनलिटी को दिखावे से ज्यादा पसंद किया जाएगा।
“4. पेरेंट्स की ओर से बच्चों के बिहेव पर टफ और सख्त नियंत्रण या बहुत ही फ्री एन्वायरमेंट बच्चे को झूठ बोलने को मोटिव करता है। इनके बीच का माहौल उपयुक्त रहेगा।
“5. … झूठा होने का लेबल नहीं लगाएं।
“6. बच्चे से फ्रैंडली रिश्ता बनाएं। …
“7. फ्री स्ट्रेस के माहौल …बच्चों में टफ और मुश्किल बात को कहने के सोशल कौशल का अभाव …”

जरा ग़ौर से देखें कि अंगरेजी के शब्दों की कितनी भरमार है इस पाठ्यांश में :-
प्रजेंट (मौजूदा, वर्तमान), टाइम (समय), पेरेंट्स (माता-पिता, मां-बाप), चिल्ड्रन्स (बच्चे), हैबिट (आदत), चैंज (बदलाव, तबदीली, परिवर्तन), साइकेट्रिस्ट (मनःचिकित्सक), टिप्स (गुर, नुस्ख़े), क्वैश्चन (सवाल, प्रश्न), आंसर (उत्तर, जवाब), कलर (रंग), पैकेट (डिब्बा), वॉल (दीवाल), यूज (प्रयोग, इस्तेमाल), फैमिली (परिवार), फ्रैंड्स(दोस्तों, मित्रों), इमेज (छबि), रिलेशन (संबंध, रिश्ते), ऑफिसर (अधिकारी), रैंक (स्तर या पद), चीफ (मुख्य; प्रसंगानुसार ‍‘चीप’ यानी ‘सस्ता’ शब्द रहा होगा), कॉन्फिडेंस (विश्वास, भरोसा), ऑरिजनलिटी (मौलिकता), बिहेव (व्यवहार, वर्ताव), टफ (सख्त, कठोर), फ्री (मुक्त, बेरोकटोक), एन्वायरमेंट (वातावरण, माहौल; पर्यावरण नहीं), मोटिव (प्रोत्साहन, प्रेरणा), लेबल (चिप्पी), स्ट्रेस (दबाव), और सोशल (सामाजिक) । (३१ शब्द)

इनमें से कुछ शब्द ऐसे हैं जो लंबे अर्से से हिंदीभाषी प्रयोग में ले रहे हैं और जिनसे आम आदमी भी सुपरिचित है, जैसे
टाइम, ऑफिसर, रैंक, फ्री, और लेबल ।
इन्हें हिंदी के प्रचलित शब्द मान लेना कदाचित्‌ व्यावहारिक लगता है । मुझे इसमें कुछ खास आपत्तिजनक नहीं लगता, पर उक्त समाचार में जिस प्रकार अंधाधुन्द अंग्रेजी के शब्द अमर्यादित तौर पर प्रयुक्त हुए हैं, और इसी प्रकार ‘हिंदी’ समाचार माध्यमों पर अक्सर जो देखने को मिलता है, उन्हें लेकर मेरे मस्तिष्क में कई विचार उठते रहे हैं:

1.
हिंदी बोलते समय, और अब तो हिंदी लिखने में भी, अपने देश के पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी शब्दों को जैसे बेरोकटोक इस्तेमाल करते हैं वह मुझे हिंदी के साथ किया जाने वाला एक भद्दा मजाक लगता है । क्या अंग्रेजी का किंचित् ज्ञान होने का यह अर्थ है कि हम जब चाहें, जहां चाहें, जितना चाहें, अंग्रेजी शब्द प्रयोग में लें ? क्या इस प्रकार का रवैया हम अंग्रेजी बोलते-लिखते समय भी अपनाते हैं ? क्या अपनी अंग्रेजी की शुद्धता के प्रति हम अत्यधिक सचेत नहीं रहते ? भूल से भी हम हिंदी या अन्य भाषाओं के शब्द अपनी अंग्रेजी में बोलते हैं कभी? क्या कोई कभी “डॉक्टर, आइ एम फ़ीलिंग सरदर्द” कहते हुए सुना जायेगा, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी में “डॉक्टर, मुझे हेडेक्‌ हो रहा है” । भले ही हमें एक-दो सेकंड रुकना पड़ जाये उपयुक्त अंग्रेजी शब्द की तलाश में, लेकिन हिंदी शब्द अंग्रेजी में मिलाने से बचते रहेंगे ।

2.
एक कहावत है: “सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है” । यह उक्ति हम हिंदीभाषियों पर भाषाई संदर्भ में पूर्णतः लागू होती है । हम कुछ अंग्रेजी सीख जाते हैं तो सोचने लगते हैं कि इस देश का हर दूसरा व्यक्ति भी हमारे बराबर की अंग्रेजी तो जानता ही है । इसलिये अंग्रेजी शब्दों के धड़्ल्ले से प्रयोग में हमें कहीं कोई ख़राबी नहीं दिखती । परंतु ऊपर लिखी सूची में कई शब्द ऐसे हैं जिनके बारे में राह चलते किसी पूछें तो वह अनभिज्ञता जताएगा । मेरा अनुमान है कि ये शब्द:
प्रजेंट, कॉन्फिडेंस, ऑरिजनलिटी, बिहेव, एन्वायरमेंट, मोटिव, स्ट्रेस, वॉल, यूज
बहुतों को नहीं मलूम होंगे । लेकिन स्कूल-कालेजों, दफ़्तरों आदि में अंग्रेजी में काम करने वाले भूल जाते हैं कि आम आदमी का इन शब्दों से परिचय हो इसकी संभावना कम ही है । दुर्भाग्य से हम सोचते हैं कि दूसरे को पर्याप्त अंग्रेजी नहीं आती है तो यह उसकी गलती है । इतनी भी अंग्रेजी नहीं सीख सका वह ! क्या उदार विचार है यह ! हर हिंदुस्तानी को अंग्रेजी आनी ही चाहिए, अव्वल दर्जे की । अगर यह रवैया अन्य प्रमुख देशों के बाशिंदों में नहीं दिखाई देता है तो वे हमसे पिछड़े हैं । यहां पर मैं बता दूं कि इन शब्दों:
allien (एलिअन), crucial (क्रूश्‌ल्‌), interpret (इंटप्रेट), miniature (मिनिअचर), native (नेतिव), prejudice (प्रेजुडिस)
और ऐसे ही अनेकों शब्दों से मैं सुपरिचित ही नहीं हूं बल्कि मैं इन्हें लेखन-वाचन में बखूबी इस्तेमाल कर सकता हूं । ऐसा मेरे साथ व्यावसायिक कारणों से हुआ है – विश्वविद्यालय में अध्ययन, अध्यापन एवं शोध कार्यों के कारण । पर ये मेरी जबान पर तब भी आयें जब मैं आम आदमी से बात करूं तो उसे उचित नहीं कहूंगा । इन शब्दों तथा इन जैसे शब्दों को मैं लोगों के मुख से सुनता रहता हूं और यह महसूस करता हूं कि ऐसा होना नहीं चाहिए, किंतु ऐसा हो रहा है और आगे भी होगा ।

शेष भाग आगामी कल (5 अक्टूबर) की पोस्ट में देखें । - योगेन्द्र जोशी

14 सितंबर, हिंदी दिवस – रस्मअदायगी का एक दिन, हर बीते वर्ष की भांति

Posted September 14, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: English, Hindi, अंग्रेजी, भारत, राजभाषा, हिन्दी

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आज हिंदी दिवस है, 14 सितंबर ।

सर्वप्रथम मैं हिंदी-प्रमियों के प्रति अपनी शुभकामना व्यक्त करता हूं कि उनका भारतीय भाषाओं के प्रति लगाव बना रहे और यह भी कि वे अपने भाषाई प्रयासों में सफल होवें ।

तारीख के हिसाब से कोई 60 साल पहले आज ही के दिन देश में सर्वाधिक बोली/समझी जाने वाली भाषा हिंदी को राजभाषा की उपाधि दी गयी थी । रस्मअदायगी के तौर पर इस दिन उच्चपदस्थ लोग, चाहे वे राजनीति में हों या प्रशासन में अथवा अन्य व्यावसायिक क्षेत्रों में, यह कहते हुए सुने जाएंगे कि हमें राजभाषा हिन्दी अपनानी चाहिए । किसको अपनानी चाहिए हिंदी और किस क्षेत्र में और किस रूप में यह वह स्पष्ट नहीं कहते हैं । ऐसा लगता है कि वे आम आदमी को नसीहत देना चाहते हैं कि वह हिंदी को यथासंभव अधिकाधिक इस्तेमाल में ले । लेकिन वे स्वयं इसके इस्तेमाल की जिम्मेदारी से मुक्त रहना चाहते हैं और अंगरेजी के सापेक्ष वस्तुस्थिति को यथावत् बनाये रखने के पक्षधर हैं ।

हिंदी के राजभाषा बनाए जाने के औचित्य पर मुझे सदा ही शंका रही है । सैद्धांतिक तौर पर हिंदी के पक्ष में आरंभ में जो तर्क दिये गये थे वे निराधार तथा असत्य थे यह मैं नहीं कहता । किंतु तथ्यात्मक तर्क ही पर्याप्त नहीं माने जा सकते हैं । वास्तविकता के धरातल पर वे तर्क स्वीकार किये जा रहे हैं या नहीं, हामी भर लेने के बावजूद उनके अनुरूप कार्य हो रहा है कि नहीं, नीति-निर्धारण और कार्यान्वयन के लिए जिम्मेदार लोग रुचि लेते हैं या नहीं जैसी बातें अधिक महत्त्व रखते हैं । अपनी बात मैं यूं स्पष्ट करता हूं: आप सिगरेट के किसी लती को सलाह दें कि उसका धूम्रपान करना नुकसानदेह है और वह आपकी बात मानते हुए कहे कि ‘लेकिन मैं फिर भी सिगरेट पीना नहीं छोड़ सकता’ तो आप क्या करेंगे ? आप कहेंगे कि कोई न कोई रास्ता तो खोजा ही जाना चाहिए । एक व्यक्ति को रास्ते पर लाने के लिए तरह-तरह के नुस्खे अपनाये जा सकते हैं, समझाया-बुझाया जा सकता है, जोर-जबरदस्ती की जा सकती है, डराया-धमकाया जा सकता है, इत्यादि, और अंततः सफलता मिल भी सकती है । किंतु ऐसा कोई रास्ता समूचे देश के लिए संभव नहीं है । किसी दिशा में अग्रसर होने की सन्मति यदि लोगों में आ जाये तो ठीक, अन्यथा सब भगवान् भरोसे । राजभाषा हिंदी के मामले में स्थिति कुछ ऐसी ही है ।

यदि अपने देशवासी किसी न किसी बहाने अंगरेजी का प्रयोग यथावत् बनाये रखना चाहें तो फिर इस राजभाषा का अर्थ ही क्या है ? जब मैं अपने देश की तुलना विश्व के अन्य प्रमुख देशों से करता हूं तो पाता हूं कि अपना देश है ही विचित्र, सबसे अजूबा, विरोधाभासों और विसंगतियों से परिपूर्ण । यह विचित्रता सर्वत्र व्याप्त है, किंतु यहा पर इसका उल्लेख अपनी देसी भाषाओं के संदर्भ में ही कर रहा हूं । हम यह मानते है कि हमारी भाषाएं सुसंपन्न हैं, किंतु उन्हें लिखित रूप में प्रयोग में न लेकर केवल बोले जाने तक सीमित रखना चाहते हैं । क्यों ? इसका संतोषप्रद उत्तर किसी के पास नहीं, कदाचित् एक प्रकार का जड़त्व हमें घेरे हुए है कि सार्थक परिवर्तन करने को हम उत्सुक और प्रयत्नशील नहीं हैं, न ऐसा होना चाहते हैं ।

इसमें दो राय नहीं है कि हमारे रोजमर्रा के जीवन में प्रायः सर्वत्र हिंदी अथवा अन्य क्षेत्रीय भाषाएं ही बोली जाती हैं, चाहे बाजार में खरीद-फरोख्त का काम हो या पड़ोसी के हालचाल पूछने का या फोन पर किसी नाते-रिस्तेदार से बात करने का । यहां तक कि अंगरेजी स्कूलों में पढ़ रहे बच्चे भी स्कूल आते-जाते परस्पर अपनी देसी भाषा में ही बोलते दिखते हैं । कार्यालयों में अधिकांशतः सभी स्थानीय भाषा में ही सामान्य वार्तालाप करते हुए पाये जायेंगे । अपवादों को छोड़ दें । राजनीतिक क्षेत्र में तो जनता के सामने बातें क्षेत्रीय भाषाओं में ही रखी जाती हैं । किंतु जैसे ही कहीं कोई औपचारिक बात हो, हम तुरंत ही अंगरेजी में उतर आते हैं । अपनी बात स्थानीय भाषा में कहेंगे जरूर, किंतु उसी को जब लिखित रूप में व्यक्त करना हो तो अंगरेजी हमारी प्राथमिकता बन जाती है । तब हिंदी या अन्य देसी भाषा का प्रयोग समाज के निम्नतम वर्ग या अंगरेजी न पढ़े-लिखे लोगों तक रह जाता है । जिसको थोड़ी भी अंगरेजी आती है वह अपनी भाषाओं में लिखकर कुछ कहने को तैयार नहीं । चाहे रेलयात्रा का आरक्षण हो या बैंकों में कारोबार करने का या अपने ही क्षेत्र का पता चिट्ठी पर लिखने का, सर्वत्र अंगरेजी ही देखने को मिलेती है, कुछ अपवादों को छोड़कर ।

निःसंदेह बोलचाल में हिंदी का प्रयोग देश भर में बढ़ा है । देश के किसी कोने में जाइये रिक्शा-ऑटों वालों से, चाय वालों से, सामान्य दर्जे के होटल वालों से हिंदी में बात करना अधिक सुविधाजनक सिद्ध होता है ऐसा मैंने देशाटन में अनुभव किया है । किंतु इतना सब कुछ होते हुए भी लिखित रूप में हिंदी शायद ही कहीं दिखाई देती है सभी सार्थक जानकारी अंगरेजी में ही लिखित आपको मिलेगी भले ही जनसामान्य के उस जानकारी का हिंदी अथवा क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध होना अधिक लाभप्रद क्यों न हो । मैं उदाहरण पेश करता हूं । मेरी बातें मुख्यतः हिंदीभाषी क्षेत्रों पर लागू होती हैं ।

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प्रवंचन एवं प्रवंचना जैसे शब्दयुग्म – संस्कृत में उपसर्गों एवं प्रत्ययों की भूमिका

Posted August 27, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: Hindi, Sanskrit, language, भाषा, भाषाविज्ञान, संस्कृत, हिन्दी

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चंद रोज पहले अंतरजाल पर ‘हिंदी समूह’ के किसी स्थल पर एक पाठक ने यह प्रश्न उठाया थाः
“प्रवचन एवं प्रवंचना से तो वह परिचित है, किंतु क्या प्रवंचन भी हिंदी का स्वीकार्य शब्द है ?”प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर है हां । वास्तव में प्रवंचन तथा प्रवंचना, दोनों ही स्वीकार्य हैं और दोनों का अर्थ एक ही हैः छल-कपट या धोखा देने का भाव । किंतु व्यवहार में प्रवंचना का प्रयोग ही अधिकाशतः देखने को मिलता है । इन दोनों में लिंगभेद भी है, पहला नपुंसक लिंग है तो दूसरा स्त्रीलिंग । आत्म-प्रवचंना (self-deception) शब्द तो एक पर्याप्त प्रचलित शब्द है ।

संस्कृत में उक्त शब्दों के सदृश कई अन्य जोड़े भी हैं । कुछ चुने हुए शब्दयुग्मों की सूची मैं आगे प्रस्तुत कर रहा हूं:

(टिप्पणी- कोष्ठकों में दी गयी वैकल्पिक वर्तनी ही संस्कृत में मान्य है; अनुस्वार वाली हिंदी के लिए अनुमत है )
1. अन्वेषण, अन्वेषणा; 2. अर्चन, अर्चना 3. अर्हण, अर्हणा (सम्मान-अभिव्यक्ति); 4. अवमानन, अवमानना; 5. अशन, अशना (भोजन, भोजन करना); 6. आमंत्रण, आमंत्रणा (आमन्त्रण, आमन्त्रणा); 7. आराधन, आराधना; 8. उत्तेजन, उत्तेजना; 9. उद्घट्टन, उद्घट्टना (टकराना); 10. उद्घोषण, उद्घोषणा; 11. उपस्थापन, उपस्थापना (निकट रखना); 12. उपार्जन, उपार्जना; 13. उपासन, उपासना; 14. कल्पन, कल्पना; 15. क्षारण, क्षारणा (दोषारोपण, आरोप लगाना); 16. गणन, गणना; 17. गर्जन, गर्जना; 18. गवेषण, गवेषणा; 19. घटन, घटना; 20. घर्षण, घर्षणा; 21. घोषण, घोषणा; 22. चर्वण, चर्वणा (चबाना); 23. चिंतन, चिंतना (चिन्तन, चिन्तना); 24. चेतन, चेतना; 25. छलन, छलना (ठगना); 26. तर्जन, तर्जना (डाटना-फटकारना); 27. ताड़न, ताड़ना (ताडन, ताडना); 28 निराजन, निराजना (आरती, आरती करना); 29. निरूपण, निरूपणा (आकृति, व्यक्त करना); 30. परिकल्पन, परिकल्पना (रूप, रूप देना); 31. परिदेवन, परिदेवना (रोना-धोना); 32. पर्येषण, पर्येषणा (पूछताछ करना); 33. पालन, पालना; 34. प्रघर्षण, प्रघर्षणा (रगण, रगणना); 35. प्रदक्षिण, प्रदक्षिणा; 36. प्रवंचन, प्रवंचना (प्रवञ्चन, प्रवञ्चना) (धोखा देना); 37. प्रार्थन, प्रार्थना; 38. प्रेरण, प्रेरणा; 39. प्रोद्घोषण, प्रोद्घोषणा (ऐलान करना); 40. भर्त्सन, भर्त्सना; 41. भावन, भावना; 42. मंत्रण, मंत्रणा (मन्त्रण, मन्त्रणा); 43. मार्गण, मार्गणा (तलाश करना); 44. याचन, याचना; 45. यातन, यातना; 46. यापन, यापना; 47. योजन, योजना; 48. रोचन, रोचना (प्रकाशन, प्रकाशित करना); 49. लक्षण, लक्षणा (चिह्न); 50. लवण, लवणा (सलोना); 51. लांछन, लांछन (लाञ्छन, लाञ्छन); 52. वंचन, वंचना (वञ्चन, वञ्चना); 53. वर्णन, वर्णना; 54. वर्जन, वर्जना; 55. विगर्हण, विगर्हणा (निंदा); 56. विघट्टन, विघट्टना (टक्कर मारना); 57. विचारण, विचारणा; 58. विज्ञापन, विज्ञापना; 59. विडंबन, विडंबना (विडम्बन, विडम्बना); 60. विमर्दन, विमर्दना (कुचलना); 61. विवेचन, विवेचना; 62. वेदन, वेदना; 63. व्यंजन, व्यंजना (व्यञ्जन, व्यञ्जना ); 64. शुश्रूषण, शुश्रूषणा (सेवा, सेवा करना); 65. श्रवण, श्रवणा; 66. संकलन, संकलना (सङ्कलन, सङ्कलना); 67. संकीर्तन, संकीर्तना (सङ्कीर्तन, सङ्कीर्तना); 68. संघट्टन, संघट्टना (सङ्घट्टन, सङ्घट्टना) (टक्कर, टकराना); 69. संभावन, संभावना (सम्भावन, सम्भावना); 70. संवाहन, संवाहना (बोझा ढोना); 1. संवेदन, संवेदना; 72. संश्लेषण, संश्लेषणा (मिलाकर बांधना); 73. संस्थापन, संस्थापन; 74. सांत्वन, सांत्वना; 75. साधन, साधना; 76. सूचन, सूचना; 77. स्थापन, स्थापना; 78. हिंसन, हिंसना (चोट मारना); 79. हेलन, हेलना (अवहेलना करना)

चूंकि हिंदी में संस्कृत के शब्द सहज तौर पर स्वीकार कर लिये जाते हैं, अतः ये सभी शब्द स्वीकार्य कहे जाएंगे । यह एक तथ्य है कि किसी शब्दयुग्म के दोनों सदस्य व्यवहार में समान रूप से प्रयुक्त हों ऐसा नहीं होता । अज्ञात कारणों से कोई एक शब्द प्रायः पूरी तौर पर व्यवहार में आ जाता है और दूसरा अप्रयुक्त तथा अपरिचित-सा छूट जाता है । किंतु सैद्धांतिक रूप से वह संस्कृत में स्वीकार्य अवश्य रहता है ऐसा मेरा मत है । ये शब्द आए कहां से या कैसे बने इस पर यदि तनिक विचार किया जाए तो वस्तुस्थिति समझ में आ सकती है । इस संदर्भ में मैं इस स्थल पर उपसर्गों तथा प्रत्ययों की संक्षिप्त चर्चा करना चाहूंगा ।

आगे बढ़ने से पहले संस्कृत के एक नियम का उल्लेख कर लेना समीचीन होगा । संस्कृत पदों में अनुस्वार बिंदु का प्रयोग केवल ‘य’ से ‘ह’ तक के व्यंजनों के ठीक पूर्व किया जा सकता है, यथा संयम, संलग्न, संवेग, संशय आदि । किंतु किसी वर्गीय वर्ण (‘क’ से लेकर ‘म’ तक के कवर्ग, चवर्ग आदि के वर्ण) के पूर्व अनुस्वार नहीं प्रयुक्त होता बल्कि उसके स्थान पर संबंधित वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे अंक (हिंदी में) को संस्कृत में अङ्क लिखा जायेगा । इसी प्रकार भङ्गुर, कञ्चन, कण्टक, दन्द्व, लम्पट ही सही हैं । उक्त सूची में संस्कृत के इस नियम के अनुसार मान्य वर्तनी कोष्टक में दी गयी है ।

उपसर्ग (prefix) तथा प्रत्यय (suffix) - मेरी दृष्टि में संस्कृत प्रमुखतया क्रियाधातु-आधारित भाषा है, जिसका तात्पर्य यह है कि अधिकांश संज्ञा तथा विशेषण शब्दों को कतिपय नियमों के अधीन क्रियाधातुओं से प्राप्त किया जाता है । स्वयं नयी-नयी क्रियाधातुओं की रचना भी मूल धातुओं के पूर्व एक या अधिक उपसर्गों को जोड़ने से संभव है । व्याकरण पुस्तकों में निम्नलिखित 22 उपसर्गों का उल्लेख मिलता हैः
“अति, अधि, अनु, अपि, अभि, अव, आ, उत्, उप, दुर्, दुस्, नि, निर्, निस्, परा, परि, प्र, प्रति, वि, सम्, एवं सु”
(दुस् दुर् वस्तुतः एक ही उपसर्ग के दो भिन्न-भिन्न स्थितियों में प्रयोजनीय रूप हैं; और यही बात निर्, निस् के लिए भी है ।)

उपसर्गों के बारे में कहा जाता है “उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते । प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत् ।।”
(उपसर्ग से धातु का अर्थ बलपूर्वक अन्यत्र पहुंचा दिया जाता है, यानी उसका अर्थ बदल जाता है, जैसे प्रहार, आहार, संहार, विहार, परिहार, जो सभी मूल धातु ‘हृ’ = ले जाना, हरना, आदि से प्राप्य हैं । हृ से हार और फिर प्र + हार आदि ।)

धातुओं और संज्ञाशब्दों से वाक्यों में प्रयोजनीय पदों की प्राप्ति प्रत्ययों के माध्यम से होती है, जिनकी संख्या बहुत है । उनका यहां उल्लेख करना न तो संभव है, और न ही मुझमें वह विशेषज्ञता है कि व्यापक चर्चा कर सकूं । फिर भी अतिसंक्षिप्त परिचय देकर उनकी प्रतीति देने की कोशिश कर सकता हूं । पहले बता दूं कि (संस्कृत में), पद धातु/संज्ञाशब्द का वह बदला हुआ रूप है जो वाक्य में वांछित अर्थ ग्रहण करना है । उदाहरणर्थः ‘राम’ से रामः, रामौ, रामाः इत्यादि (सुबन्त प्रत्यय), और ‘गम्’ (जाना) से गच्छति, गच्छतः, गच्छन्ति इत्यादि (तिङन्त प्रत्यय) । इसी प्रकार ‘कृ’ (करना) से कृति, कार्य, कर्तव्य (कृदन्त प्रत्यय); और उपसर्ग भी प्रयोग में ले लें तो आकृति, अनुकृति, प्रकृति, विकृति इत्यादि । इसके अलावा ‘सुन्दर’ से सौन्दर्य, सुन्दरता इत्यादि (तद्धित प्रत्यय) । ‘आत्मज’ से आत्मजा और तपस्विन् (तपस्वी) से तपस्विनी इत्यादि (स्त्रीप्रत्यय) । व्याकरणवेत्ता प्रत्ययों को पांच वर्गों में बांटते हैं: तिङन्त तथा कृदन्त क्रियाधातुओं के लिए और सुबन्त, तद्धित एवं स्त्रीप्रत्यय संज्ञा/सर्वनाम/विशेषण शब्दों के लिए । उपसर्गों की तुलना में प्रत्ययों का विषय कहीं अधिक गंभीर और विस्तृत है ।

एक बात और । उपसर्ग धातु/शब्द के पहले यथावत् (अपरिवर्तित) जुड़ता है, जैसे अनु+वाद = अनुवाद, परि+वाद = परिवाद, प्रति+वाद = प्रतिवाद, वि+वाद = विवाद, एवं सम्+वाद = संवाद । किंतु प्रत्ययों के मामले में यह बात शब्दशः लागू नहीं होती है । मेरे मत में प्रत्ययों को धातु/शब्द के पश्चात् क्या जुड़ना है और वह कब क्या रूप लेगा इसका द्योतक समझा जाना चाहिए । उदाहरणर्थ: ‘तुमुन्’ एवं ‘क्तवा’ धातुओं के साथ प्रयोजनीय कृदन्त वर्ग के दो प्रत्यय हैं । पहला धातु से संबंधित क्रिया ‘करने के लिए’ (to perform that act) के भाव को दर्शाने हेतु प्रयोग में लिया जाता है, जैसे गम्+तुमुन् = गन्तुम् (जाने को, जाने के लिए = to go; सः गन्तुं इच्छति = He wants to go), ज्ञा+तुमुन् = ज्ञातुम् (जानने के लिए), पठ्+तुमुन् = पठितुम् (पढ़ने के लिए), पा+तुमुन् = पातुम् (पीने के लिए), आदि । दूसरा ‘क्त्वा’ किसी क्रिया के ‘हो चुकने, कर चुकने, या संपन्न हो जाने’ के भाव को व्यक्त करने में प्रयोग में लिया जाता है, जैसे गम्+क्त्वा = गत्वा (जाकर), ज्ञा+क्त्वा = ज्ञात्वा (जान लेने पर), पठ्+क्त्वा = पठित्वा (पढ़ चुकने पर), पा+क्त्वा = पीत्वा (पीकर), आदि ।

उक्त परिचय के बाद मैं वापस अन्वेषण, अन्वेषणा, आदि शब्दों पर लौटता हूं । मैं जितना समझ पाया हूं, प्रत्येक धातु से संबंधित क्रिया के ‘होने का भाव’ व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्द की रचना सदैव संभव है । इस कार्य हेतु ‘ल्युट्’ कृदन्त प्रत्यय उपलब्ध है, जिसके प्रयोग के दो-चार उदाहरण ये हैं:
अर्च् + ल्युट् = अर्चन
पठ् + ल्युट् = पठन
युज् + ल्युट् = योजन
लाञ्छ् + ल्युट् = लाञ्छन
विद् + ल्युट् = वेदन
स्पष्ट है कि ल्युट् के योग से धातु के अंत में ‘अन’ जुड़ जाता है (अर्च् + अन = अर्चन) । किंतु स्थिति सदैव इतनी सरल नहीं रहती है । यदि धातु में हलन्त व्यंजन से पूर्व ‘इ’, ‘उ’, या ‘ऋ’ हो तो उसका क्रमशः ए, ओ या अर् हो जाता है, जैसे कृ + ल्युट् = करण । ध्यान दें कि कुछ दशाओं में ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है (मूर्धन्य घ्वनियों की मौजूदगी में) । ल्युट् के प्रयोग के नियम बहुत सरल नहीं हैं ।

उक्त प्रकार से प्राप्त संज्ञाशब्द मूलतः नपुंसक लिंग में प्रयुक्त होते हैं । उनके साथ स्त्रीप्रत्यय ‘टाप्’ जोड़ने से सिद्धांततः स्त्रीलिंग में शब्द मिलता है, जैसे अर्चन से अर्चन + टाप् = अर्चना । इस प्रकार अनेकों शब्द बन सकते हैं, किंतु सभी शब्द संस्कृत भाषा में व्यवहारिक तौर पर स्थान बना नहीं पाते हैं । फलतः अधिकांश शब्द नपुंसक लिंग में ही प्रयुक्त होते हैं, तो कुछ केवल स्त्रीलिंग में, और कुछ दोनों ही में । कभी-कभी पुंलिंग में भी प्रयोग देखने को मिल जाता है जिसकी वर्तनी नपुंसक वाली ही रहती है । उदाहरण हैं तापनम्, तापनः; तारणम्, तारणः; पूरणम्, पूरणः । और विरले अवसरों पर तीनों लिंगों में शब्द का प्रयोग देखने को मिल सकता है, यथा श्रवणः, श्रवणम्, श्रवणा ।

इतना और बता देना आवश्यक है कि उसी वर्तनी का शब्द अलग-अलग लिंगों में प्रयुक्त होता है तो बहुधा उनके अर्थ एक जैसे नहीं रह जाते हैं । ऐसा अक्सर होता है कि शब्द रुढ़ि अर्थ पा जाते हैं और उनके व्यापक अर्थ खो जाते है । तदनुसार पूरणम् के अर्थ पूरा करना, भरना, संपन्न करना आदि लिए जाते हैं, जब कि पूरणः पुल या बांध के अर्थ में न कि पूरणम् के अर्थ में । – योगेन्द्र

इंग्लिश, स्पेलिङ्, प्रोनंसिएशन – वर्तनी एवं उच्चारण में असंदिग्ध संबंध का अभाव

Posted August 20, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: English, language, phonetics, अंग्रेजी, इंग्लिश, भाषा

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(3 अगस्त 2009 की पोस्ट के आगे) पिछली बार मैंने VOGUE एवं YACHTING के गलत उच्चारण (क्रमशः ‘वोग्यू’ एवं ‘याचिंग’) के उदाहरण देते हुए इस बात पर जोर देना चाहा था कि अंगरेजी में वर्तनी के आधार पर पदों के उच्चारण का सही अंदाजा कभी-कभी संभव नहीं हो पाता है । पदों के सही उच्चारण के लिए किसी जानकार व्यक्ति अथवा शब्दकोश से मदद लेनी पड़ सकती है, जो, मुझे शंका है, कि कई लोग नहीं करते हैं । खैर, अंगरेजी के कुछएक प्रतिनिधि शब्दों पर नजर डालने की मेरी जिज्ञासा हुई जिनकी वर्तनी मिलती-जुलती हो लेकिन जिनमें उच्चारण की दृष्टि से परस्पर भेद देखने को मिलता है । शब्दकोश को पूरी तरह टटोला जाए तो ऐसे तमाम शब्द नजर आयेंगे । कुछ दृष्टांत आगे दे रहा हूं:

अधोलिखित एकाक्षरीय (मोनोसिलेबिक) शब्दों को ही ले लीजिए:
but, cut, gut, hut, jut, nut, rut, shut, tut
इन सभी के उच्चारण में ‘अ’ की स्वरध्वनि सुनने को मिलती है । लेकिन मात्र एक अपवाद मुझे देखने को मिला, और वह है
put
शब्द का । मैं सोचता हूं कि इस अकेले बेचारे शब्द को औरों से बहिष्कृत करने के क्या कारण रहे होंगे ? अंगरेजीभाषियों द्वारा इसे अगर ‘पट्’ बोला जाता तो सभी शब्दों में एक प्रकार की समानता न दिखती और भाषा सीखने वाले को सुविधा न होती ? खैर put इतना आम शब्द है कि भाषा सीखने के आरंभिक दौर में ही इससे लोगों का परिचय हो जाता है, और इसका उच्चारण उन्हें ‘रट’ जाता है । लेकिन जो शब्द प्रचलन में आम न हों लेकिन वर्तनी की दृष्टि से अनेक अन्य शब्दों से साम्य रखते हों उनके उच्चारण में धोखा हो सकता है । उदाहरण के लिए इन्हें देखिए:
insure – इंशुअ(र), sure – शुअ(र)
में मौजूद sure का उच्चारण वही नहीं है जो यह अगले इन शब्दों में देखने को मिलता है:
censure – सेंशअ(र), tonsure – टांशअ(र),
उसी sure का उच्चारण कुछ और ही है इनमें:
leisure – लेझ़अ(र), measure – मेझ़अ(र), pleasure – प्लेझ़अ(र),
treasure – ट्रेझ़अ(र)

इस स्थल पर यह स्पष्ट कर दूं कि ऊपर मैंने ‘लेझ़अ(र)’ आदि में ‘झ़’ का प्रयोग किया है । मैंने इसे उस ध्वनि के लिए इस्तेमाल किया है जो ‘श’ से उसी प्रकार संबद्ध है जैसे ‘स’ ‘ज़’ से । (ज़ is में s की ध्वनि है ।) वस्तुतः ‘श’ अघोष है जब कि ‘झ़’ घोष, अन्यथा दोनों के उच्चारण में समान प्रयत्न आवश्यक है । pleasure के उच्चारण का प्रदर्शन कोई जानकार ही कर सकता है । दूसरी बात अंगरेजी में ‘र’ की ध्वनि उतनी स्पष्ट नहीं होती है जितनी हमारी भाषाओं में । यह काफी कुछ ‘अ’ के सदृश रहता है ।

sure की ही तरह sion से भी कोई सुनिश्चित ध्वनि संबद्ध नहीं है । इन शब्दों पर विचार करें:
pension, tension, adhesion, decision, occasion, vision
इस सूची के प्रथम दो में sion का उच्चारण ‘शन’ है, जब कि शेष चार में यह ‘झ़न’ है ।

अधोलिखित शब्दों में ough के चार संभावित उच्चारण मुझे देखने को मिले हैं:
cough (कफ), enough (इनफ), rough (रफ)
plough (प्लाव), slough (स्लाव)
although (अल्दो), though (दो), thorough (थरो),
through (थ्रू)

alkaline (अल्कलाइन), interline (इंटअलाइन), spline (स्प्लाइन) शब्दों में line से संबद्ध उच्चारण ‘लाइन’ है, लेकिन discipline (डिसप्लिन) में इसे ‘प्लिन’ ध्वनि प्रदान की गयी है । पता नहीं कितने और शब्दों का उच्चारण तदनुरूप है । मेरा अंदाजा है कि कम ही होंगे । कोई बेचारा यदि ‘डिसिप्लाइन’ बोले तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए ।

सामान्य से कुछ भिन्न उच्चारण वाले अपवाद तुल्य कई शब्द मिल जाएंगे । मेरी नजर में सबसे पहले सर्वाधिक प्रयुक्त शब्दों में एक have (हैव्) आया है । वर्तनी तथा उच्चारण में समानता रखने वाला दूसरा शब्द मुझे नजर नहीं आया । have के ‘निकट संबंधी’ behave के उच्चारण में भी ‘एव’ की ध्वनि सुनने में आती है । cave, gave, octave, pave, shave, wave आदि में भी यही घ्वनि विद्यमान है । अंगरेजी में सामान्यतः यह नियम देखने में आता है कि जिन शब्दों में `$a&e’ के क्रम में स्वर तथा व्यंजन वर्ण हों उनमें `a’ की ध्वनि ‘ए’ जैसी होती है । यहां $, & व्यंजन वर्णों को व्यक्त करते हैं । पता नहीं क्यों have को अपवाद बना डाला

वर्तनी की समानता के साथ उच्चारण में असमानता के कुछ अन्य उदाहरण ये हैं:
(1) clove (क्लोव), hove (होव), love (लव), move (मूव), stove (स्टोव)
(2) bull, full, pull (बुल् आदि); dull, gull, hull, lull, null (डल् आदि);
(3) book, cook, foot, good, hook, rook, stood, wood, wool (बुक् आदि); boot, booth, cool, food, fool, mood, moot, pool, root, shoot (बूट आदि)

यह तो बात हुई वर्तनी की समानता के बावजूद उच्चारण भेद । इसके विपरीत अंगरेजी की यह खासियत है कि कई अवसरों पर भिन्न वर्तनी के बावजूद कुछ शब्दों के उच्चारण में अंतर नहीं रहता है । ऐसे शब्दों में वे रोचक हैं जिनमें k अनुच्चारित (silent) रहता है । उदाहरण देखें:
(knee, nee), (knew, new ), (knight, night), (knit, nit), (knot, not), (know, now) (क्रमशः नी, न्यू, नाइट्, निट्, नॉट्, नो)

और अंत में ऐसे कुछएक शब्द जो वर्तनी एवं अर्थ में तो भिन्न हैं, किंतु उच्चारण में एक समान हैं:
(be, bee), (boar, bore), (cell, sell), (cite, site, sight), (dear, deer), (fair, fare), (mail, mail), (meat, meet), (pail, pale), (plain, plane), (right, rite, write), (road, rode), (sail, sale), (seen, scene), (sent, sent), (sew, so, sow), (sole, soul), (tail, tale), (too, two), (weak, week)
ये सभी शब्द आम प्रचलन में हैं, अतः उच्चारण का ध्यान आने पर सही वर्तनी अधिकांश जन लिख लेते होंगे ऐसा में सोचता हूं । किंतु जिनकी अंगरेजी लिखने-पढ़ने की आदत कम हो उनसे अक्सर भूल हो सकती है ।

सो ये थीं कुछ बातें अंगरेजी में वर्तनी और उच्चारण से संबंधित जो हम भारतीयों के लिए समस्या हो सकती है, जो उच्चारण और वर्तनी में अनूठे संबंध के आदी हैं । अगली पोस्ट में मैं अपने लोगों के अंगरेजी उच्चारण की कुछ दिक्कतों की बात करूंगा । – योगेन्द्र

क्या है संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ का उच्चारण? कैसे लिखें इसे ‘रोमन’ में? – एक टिप्पणी

Posted August 9, 2009 by योगेन्द्र जोशी
Categories: Hindi, language, linguistics, phonetics, भाषा, संस्कृत, हिन्दी

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इधर कुछ दिनों पहले गूगल के ‘हिंदी समूह’ पर चर्चा चल पड़ी कि संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ को रोमन लिपि में सही-सही कैसे लिखा जाए । उसी से प्रेरित हो मैंने यह आलेख लिखा है ।

संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ को रोमन में लिखने की जब बात की जाती है तो दो प्रकार के उत्तर दिये जा सकते हैं । पहला यह कि विभिन्न भाषाभाषियों के बीच इसका जो भी उच्चारण प्रचलित हो उसी के अनुरूप उसे निरूपित किया जाये । आम तौर पर हिंदीभाषी इसे ‘ग्य’ बोलते हैं, जो अशुद्ध किंतु सर्वस्वीकृत है । तदनुसार इसे रोमन में gya लिखा जायेगा जैसा आम तौर पर देखने को मिलता है । दक्षिण भारत (jna) तथा महाराष्ट्र (dnya) में स्थिति कुछ भिन्न है ।

परंतु संस्कृत के अनुसार होना क्या चाहिए यदि इसका उत्तर दिया जाना हो तो किंचित् गंभीर विचारणा की आवश्यकता होगी । दुर्भाग्य से इसका सही उच्चारण संस्कृतज्ञों के मुख से भी मैंने सदैव नहीं सुना है । “यदि प्रचलन में जो आ चुका वही सही” का सिद्धांत मान लें तो फिर ‘ग्य’ ही ठीक है, अन्यथा नहीं ।

संस्कृत के बारे में मेरी धारणा है कि इसकी प्रचलित लिपि पूर्णतः ध्वन्यात्मक है । हर वर्ण अथवा उसके तुल्य चिह्न (यथा स्वर की मात्रा) तथा उससे संबद्ध ध्वनि के बीच असंदिग्ध एवं अनन्य संबंध रहता है । यदि कहीं अपवाद दिखता है तो वह वक्ता के त्रुटिपूर्ण उच्चारण के कारण होगा, न कि संस्कृत की किसी कमी या विशिष्टता के कारण । मेरी टिप्पणी इसी सिद्धांत पर आधारित है । (मेरी टिप्पणी वरदाचार्यरचित ‘लघुसिद्धांतकौमुदी’ और स्वतः अर्जित संस्कृत ज्ञान पर आधारित है । लघुसिद्धांतकौमुदी पाणिनीय व्याकरण पर संक्षिप्त तथा प्राथमिक स्तर की टीका-पुस्तक है । व्यक्तिगत स्तर पर मेरा प्रयास है कि संस्कृत की घ्वनियों को एक भौतिकीविद् यानी फिजिसिस्ट की दृष्टि से समझूं । प्रतिष्ठित संस्कृतज्ञ मेरी बात से असहमत हो सकते हैं इस बात का मुझे भान है ।)

मेरी जानकारी के अनुसार ‘ज्ञ’ केवल संस्कृत मूल के शब्दों/पदों में प्रयुक्त होता है । (यह बात स्वर वर्ण ‘ऋ’ एवं विसर्ग पर भी लागू होती है । स्वर ‘ऌ’ तो लुप्तप्राय है ।) मेरे अनुमान से ऐसे शब्द/पद शायद हैं ही नहीं, जिनमें ‘ञ’ स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो । यह वर्ण संयुक्ताक्षर के तौर पर जिनमें विद्यमान हो ऐसे पदों की संख्या भी मेरी जानकारी में बहुत कम है । उनमें भी अधिकतर वे पद हैं जिनमें प्रयुक्त संयुक्ताक्षर का आरंभिक वर्ण ‘ञ’ रहता है । उदाहरण: ‘अञ्चल’, ‘वाञ्छित’, ‘सञ्जय’, ‘झञ्झावात’ । हिंदी में अब ‘ञ’ के बदले अनुस्वार का प्रयोग होता है । तदनुसार हिंदी में पूर्वोक्त शब्द: ‘अंचल’, ‘वांछित’, ‘संजय’, ‘झंझावात’ लिखे जायेंगे । फलतः संस्कृत के नियमों के साथ संगति वाली वर्तनी देखने को नहीं मिलती है । (संस्कृत की स्थापित पद्धति के अनुसार इन पदों को अनुस्वार बिंदु के साथ लिखना अशुद्ध है!) मैं केवल ‘ज्ञ’ से परिचित हूं जिसमें ‘ञ’ संयुक्ताक्षर का द्वितीय व्यंजन (व्यञ्जन) है । पूर्वोक्त शब्दों के उच्चारण में हमारे मुख से च-छ-ज-झ के ठीक पहले अनुस्वार से व्यक्त अनुनासिक व्यंजन ‘ञ‌‍’ की ध्वनि निसृत होती है, जिसके प्रति हम कदाचित् सचेत नहीं रहते । अनुस्वार के प्रयोग के कारण हिंदी में ऐसे शब्द देखने को नहीं मिलते जिनमें ‘ञ’ स्पष्टतः लिखित हो । बहुतों को यह भी शायद मालूम न हो कि ‘ज्ञ’ वस्तुतः ‘ज’ एवं ‘ञ’ का संयुक्ताक्षर है । मुझे लगता है कि इन कारणों से ‘ज्ञ’ के उच्चारण के प्रति भ्रम व्याप्त है ।

ध्यान रहे कि संयुक्ताक्षर ज्ञ = ज्+ञ । ये दोनों संस्कृत व्यंजन वर्णमाला के ‘चवर्ग’ के क्रमशः तृतीय एवं पंचम वर्ण हैं । संस्कृत की खूबी यह है कि उसमें वर्णों का वर्ग-विभाजन उनके उच्चारण के ‘प्रयत्न’ (articulatory effort) के अनुरूप किया गया है । चवर्ग ‘स्पृष्ट – तालव्य’ कहलाता है, जिसका अर्थ यह है कि वर्ग के पांचों वर्णों के उच्चारण में मुख के भीतरी कोष्ठ की आकृति, मुख के भीतर जीभ की स्थिति, दांत-होंठ की भूमिका, आदि सब एक समान है और उनका मूल स्थान तालु है । उच्चारण में अंतर इन वर्णों के घोष/अघोष (voiced/voiceless), महाप्राण/अल्पप्राण (aspirated/inaspirated), एवं अनुनासिक/अननुनासिक- (nasal/non-nasal) होने के कारण है । वस्तुतः इन वर्णों के परस्पर भेद यूं लिखे जा सकते हैं (सभी तालव्य):
च - अघोष, अल्पप्राण (अननुनासिक )
छ –
अघोष, महाप्राण (अननुनासिक)
ज –
घोष, अल्पप्राण (अननुनासिक)
झ -
घोष, महाप्राण (अननुनासिक)
ञ –
घोष, अल्पप्राण, अनुनासिक
इस जानकारी के आधार पर यह समझना कठिन नहीं है कि ‘ञ’ के लिए हमें वही प्रयास करना पड़ता है जो ‘ज’ के उच्चारण में, अंतर केवल यह रहता है ‘ञ’ के मामले में स्वरतंतुओं (vocal chords) के साथ नासा गुहा (nasal cavity) में भी ध्वनिकंपन (अनुनादित?) होने लगते हैं । (वस्तुतः ऐसा सभी वर्गों के पंचम वर्ण तथा अनुस्वार के साथ होता है ।)

अनुनासिक अन्य वर्णों (ङ, ण, न तथा म) की भांति ‘ञ’ की अपनी विशिष्ट नासिक्य ध्वनि है, जो हिंदीभाषियों के ‘ग्य’ में है ही नहीं । यदि ‘ग्य’ के वदले ‘ग्यॅं’ (ग्य के ऊपर चंद्रबिंदु) प्रयुक्त होता तो भी कुछ बात होती । रोमन लिपि में विशेषक चिह्न (diacritical mark) के साथ ‘ञ्’ का निरूपण ñ और फोनेटिक निरूपण ɲ स्वीकारा गया है । (ङ्, ञ्, ण्, न्, म् = क्रमशः ṅ, ñ, ṇ, n, m विशेषकचिह्नित, एवं ŋ, ɲ, ɳ, n, m फोनेटिक ।)

उक्त जानकारी के अनुसार ज्ञ = ज्+ञ को विशेषक चिह्न के साथ रोमन में jña, एवं फोनेटिक लिपि में jɲa लिखा जाना चाहिए । संस्कृत की विशिष्टता ही यही है कि वर्तनी में जो वर्ण हों उच्चारण में वही विद्यमान रहें और उच्चारण में जो हो वही वर्तनी में दिखे । (वर्णों का उच्चारण सामान्यतः नहीं बदल सकता, किंतु यदि बदले तो फिर वर्तनी में भी संबंधित परिवर्तन दिखे । संधि के नियम परिवर्तन की अनुमति अथवा आदेश देते हैं । उदाहरणः जगत्+शरण्यम् = जगच्छरण्यम्, तद्+लीनः = तल्लीनः, यशस्+वर्धनः = यशोवर्धनः ।)

जानकारी होने के बावजूद मेरे मुख से ‘ज्ञ’ का सही उच्चारण नहीं निकल पाता है । पिछले पांच दशकों से ‘ग्य’ का जो उच्चारण जबान से चिपक चुका है उससे छुटकारा अभी भी नहीं मिल पा रहा है । वास्तव में गलत उच्चारण के आदी हो जाने के बाद सुधार करना सरल नहीं होता । और कोई सही उच्चारण बताने वाला ही न हो तो ?

प्रस्तुत विवेचना में स्पृष्ट, तालव्य, घोष/अघोष, महाप्राण/अल्पप्राण, अनुनासिक आदि तकनीकी शब्दों का प्रयोग किया गया है । संस्कृत भाषा में स्वर-व्यंजन वर्णों से संबद्ध ध्वनियों का बहुत बारीकी तथा वैज्ञानिक दृष्टि से वर्गीकरण किया गया है । इस वर्गीकरण की किंचित् विस्तार से चर्चा की जाए, तो संस्कृत की ध्वन्यात्मक विशिष्टता की प्रतीति हो सकती है । आगामी किसी पोस्ट में इस विषय की चर्चा करने का मेरा प्रयास रहेगा । - योगेन्द्र जोशी