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हिंदी: ‘राजभाषा’ उपाधि की सार्थकता – हिंदीविरोध एवं राजभाषा अधिनियम, 1963

जुलाई 17, 2009

(29 जून, 2009, की पोस्ट के आगे) हिंदी को लेकर दक्षिण भारत, विशेषतः तमिलभाषी क्षेत्र, में आंरभ से ही विरोध रहा । वहां के राजनेताओं का यह दृढ़ मत था कि उन पर हिंदी थोपी जा रही है । उनका दावा था कि हिंदी के राजभाषा के तौर पर स्थापित किये जाने पर शासन-प्रशासन में हिंदीभाषियों का वर्चस्व बढ़ जायेगा और तब अहिंदीभाषी घाटे की स्थिति में आ जायेंगे । इस संदर्भ में यह तथ्य प्रासंगिक है कि विभिन्न भाषाभाषियों की जनसंख्या के हिसाब से देखा जाये तो ब्रिटिश राज के समय प्रशासन में दक्षिण भारतीयों, खासकर तमिलभाषियों, की संख्या अपेक्षतया अधिक रही है । मेरी समझ में यही आता है कि नौकरशाही के प्रति उस क्षेत्र के उच्च-शिक्षित लोगों में अपेक्षतया अधिक रुझान हुआ करता था और अपनी ‘बेहतर’ अंगरेजी के बल पर वे इस संबंध में लाभ की स्थिति में रहते थे । इस विषय पर मैंने कोई गंभीर अध्ययन अभी तक नहीं किया है, किंतु मेरा अनुमान है कि उस काल में नौकरशाही में अहिंदीभाषियों का वर्चस्व अवश्य हुआ करता था । इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिए अंगरेजी की अहमियत यथावत् बनाये रखना आवश्यक था ।

हिंदीभाषियों के हावी होने की संभावना की बात किस हद तक सही या गलत थी यह कहना मुश्किल है, क्योंकि संविधान निर्माताओं को संभावित दिक्कतों का एहसास तो निःसंदेह रहा ही होगा । उसके समाधान के तौर पर उन्होंने अंगरेजी से हिंदी पर उतरने के लिए 15 वर्ष का समय पर्याप्त समझा । उनके मतानुसार समय के इस अंतराल में लोग कामचलाऊ हिंदी से परिचित हो ही जायेंगे । उस समय समस्या को यदि अत्यंत गंभीर समझा गया होता तो हिंदी को ‘राजभाषा’ का ‘खिताब’ इतनी सरलता से न मिला होता । तब की संविधान बैठक हंगामेदार रही ऐसा उल्लेख मुझे पढ़ने को नहीं मिला । फिर भी तत्कालीन सभी राजनेता पूर्णतः आश्वस्त रहे हों ऐसा नहीं है । इसलिए सांविधानिक प्रावधान के बावजूद हिंदीविरोध के स्वर उठने लगे । स्थिति कहीं अनियंत्रित न होने पावे इस उद्येश्य से सन् 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को हिंदी का विरोध कर रहे संसद सदस्यों को यह आश्वासन देना पड़ा कि उनके हितों के अनुरूप अंग्रेजी का प्रयोग बतौर राजभाषा के 26 जनवरी, 1965, के बाद भी कायम रहेगा । किंतु यह आश्वासन कदाचित् पर्याप्त नहीं माना गया और फलस्वरूप सातवें दशक के आरंभ में सुदूर दक्षिण में ‘हिंदी हटाओ’ का आंदोलन चल पड़ा । तब प्रतिक्रिया में हिंदीभाषी उत्तर भारत में भी ‘अंग्रेजी हटाओ’ का आंदोलन चला, किंतु वह पूरी तरह विफल रहा । उस आंदोलन से तो खुद हिंदीभाषियों के अंगरेजी मोह में रत्ती भर का असर नहीं पड़ा; अन्य क्षेत्रों के लिए तो वह अर्थहीन था ही । इसके विपरीत हिंदीविरोध का आंदोलन अपने उद्येश्य में सफल रहा, क्योंकि वह हिंदी की स्थिति कमजोर करने वाले अधिनियम का कारण बना । उस आंदोलन के पूर्व संसद में राजभाषा अधिनियम, 1963 पारित किया गया था, जिसे बाद में उक्त आंदोलन के मद्देनजर संशोधित किया गया था (राजभाषा अधिनियम, 1963, यथासंशोधित, 1967; देखें राजभाषा की वेबसाइट http://rajbhasha.nic.in) । दरअसल यह अधिनियम हिंदी के पक्ष को कमजोर करने के लिए काफी रहा है । इसमें कई धाराएं और उपधाराएं हैं । अभी मैं धारा 3 की उपधारा (5) के निहितार्थ की चर्चा करता हूं । उपधारा में कहा गया हैः
कि अंग्रेजी का प्रयोग तब तक जारी रहेगा जब तक… अंग्रेजी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी राज्यों के विधानमंडलों द्वारा, जिन्होंने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संकल्प पारित नहीं कर दिए जाते और जब तक पूर्वोक्त संकल्पों पर विचार कर लेने के पश्चात् ऐसी समाप्ति के लिए संसद के हर सदन द्वारा संकल्प पारित नहीं किया जाता ।

गौर से पढ़ने पर यह स्पष्ट दिखता है कि अधिनियम अंगरेजी को सदा के लिए राजकाज की भाषा बनाये रखने का निर्णय प्रस्तुत करता है । जो कहा गया है उससे साफ जाहिर होता है कि अंगरेजी केवल तभी छोड़ी जायेगी जब हरेक राज्य की विधान सभा उसे छोड़ने का संकल्प ले लेगी । इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि हिंदी के पक्ष में कितने राज्य हैं । महत्त्व केवल इस बात का है कि अंगरेजी के पक्ष में एकमेव राज्य भी हो तो अंगरेजी चलती ही रहेगी, हिंदी चले या न कोई माने नहीं रखता ।

विश्व का कोई भी लोकतांत्रिक देश या समाज ऐसा नहीं है जहां किसी मुद्दे को लेकर पूर्ण मतैक्य हो । आप कभी भी यह उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि हरेक राज्य अंगरेजी के ऊपर हिंदी को वरीयता देने लगे जब केंद्र की शिक्षा क्षेत्र के लिए बनी त्रिभाषा सूत्र (Three Language Formula) को ही कुछ राज्यों ने अस्वीकार करते हुए हिंदी को न अपनाने की बात कर दी, और दुर्भाग्य से उनका रवैया आज भी वही है, तो ऐसा कैसे सोचा जा सकता है कि सभी राज्य अंगरेजी छोड़ने को तैयार होंगे कभी ?

गंभीरता से विचार करने पर मैंने पाया है कि उक्त अधिनियम कुछ ऐसा है कि इससे अंगरेजी का पक्ष मजबूत होता है और चूंकि वह सदा चलती रहेगी, अतः हिंदी कभी व्यवहार में राजभाषा नहीं बन सकेगी । हिंदी के लिए यह एक ‘उपाधि’ भर रहनी है । तो क्या हमें अंगरेजी को राजभाषा बना लेना चाहिए ?अभी वह राजभाषा घोषित नहीं है, बल्कि हिंदी की सहायक राजकाज की भाषा कही गयी है, अस्थाई किंतु अनिश्चित् काल तक चलने वाली ! अधिनियम की समीक्षा तथा अन्य बातें अगली पोस्टों में जारी रहेंगी । – योगेन्द्र जोशी

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One Response to “हिंदी: ‘राजभाषा’ उपाधि की सार्थकता – हिंदीविरोध एवं राजभाषा अधिनियम, 1963”

  1. arpita Says:

    prernadayak lekh. Hindi k utkarsh me yogdan k lie sada tatpar


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