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महानगरों के बच्चों की मातृभाषा स्पष्टतः बताई जा सकती है क्या?

अगस्त 9, 2018

क्या होती है मातृभाषा?

एक प्रश्न है जो मुझे काफी समय से उलझाए हुए है। प्रश्न है कि मातृभाषा की क्या कोई स्पष्ट परिभाषा आज के युग में दी जा सकती है? यह सवाल मेरे मन में तब उठा जब शिक्षण संबंधी कई अध्ययनों ने सुझाया है कि बच्चों की पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए।

 यह प्रश्न मेरे दिमाग में उठा कैसे यह स्पष्ट करता हूं: एक समय था जब अलग-अलग भाषाभाषी समुदाय भिन्न-भिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में रहते थे। वे समुदाय इतना अधिक परस्पर मिश्रित नहीं होते थे कि किसी को भी सुबह-शाम दूसरे समुदाय की भाषा से वास्ता पड़ता हो। कुछएक शब्द एक भाषायी समुदाय से दूसरे समुदाय की भाषा में यदा-कदा चले जाते थे, किंतु इतना अधिक मिश्रण नही हो पाता था कि संबंधित भाषा पूरी तरह विकृत हो जाए। पैदा होने के बाद लंबे अर्से तक किसी भी बच्चे का सान्निध्य एवं संपर्क कमोबेश अपने समुदाय तक ही सीमित रहता था, जब तक कि वह बाहरी समुदायों के बीच नहीं पहुंच जाता था। ऐसी स्थिति में ऐसे बच्चे की भाषा उसके अपने समुदाय की भाषा ही होती थी, उसी का प्रयोग वह दैनंदिनी कार्यों में करता था। उसको हम निस्संदेह उसकी मातृभाषा अथवा पैतृक भाषा मान सकते हैं।

इस आलेख में हिन्दी से मेरा तात्पर्य “खड़ी बोली” से जिसे आप हिन्दी का मानक कह सकते हैं। अन्यथा अन्य भाषाओं की तरह हिन्दी भी सर्वत्र एक जैसी नहीं बोली जाती है। स्थानीयता का कुछ असर रहता जरूर है।

लेकिन आज स्थिति एकदम भिन्न है। कल्पना कीजिए कि एक व्यक्ति मूलतः बांग्लाभाषी है, बांग्लाभाषी क्षेत्र में रहता आया है, और घर के सदस्यों के साथ एवं परिवेश के लोगों के साथ बंगाली में वार्तालाप करता है। वह व्यक्ति नौकरी-पेशे में बेंगलूरु या मैसूरु पहुंच जाता है, जहां उसके संतान जन्म लेती है। कल्पना कीजिए कि वहां उसे मुख्यतः कन्नडभाषियों के बीच रहना पड़ता है, लेकिन अड़ोस-पड़ोस में हिन्दीभाषियों की संख्या भी पर्याप्त है, जो या तो मूलतः हिन्दीभाषी हैं या अलग-अलग प्रांतों से आए लोग हैं जो परस्पर हिन्दी या अंग्रेजी में संपर्क साधते हैं। बच्चे के जन्म के बाद शुरुआती दौर में मां-बाप उससे बंगाली में ही बातें करते हैं। परंतु यह पर्याप्त नहीं। शैशवावस्था तथा बाल्यावस्था के विकास की प्रक्रिया पेचीदी होती है और यह बात बच्चे के भाषायी ज्ञान पर भी लागू होता है। प्रायः सभी कुछ अस्थाई होता है किंतु जिन वस्तुओं एवं क्रियाओं को बच्चा बारबार देखता-सुनता है और जिन्हें अभ्यास में लेने लगता है वे मस्तिष्क में स्थायित्व ग्रहण करने लगती हैं।

अब देखिए जैसे-जैसे बच्चा साल-छ:माह का और उससे बड़ा होने लगता है, परिवार से मिलने वाले पड़ोसी उससे अपने-अपने तरीके से बातें करते हैं कोई कन्नड में तो कोई हिन्दी में अथवा अंग्रेजी में। संबंधित शब्द एवं ध्वनियां भी उसकी भाषा में जुड़ने लगते हैं। परिवेश बदलता जाता है और बच्चा क्रेश में जाने लगता है। वहां संभव है कि एकाधिक भाषाओं के संपर्क आ जाए और फिर आरंभिक पाठशाला में जाने लगे जहां कदाचित्‍ अंग्रेजी से उसका वास्ता सर्वाधिक पड़े। आजकल अपने देश में अंग्रेजी पर ही पूरा जोर है, अतः बच्चे के साथ मां-बाप भी अंग्रेजी में अधिक बोलने लगते हैं ताकि उसकी अंग्रेजी मजबूत हो सके। इस प्रकार की पेचीदी परिस्थिति में उसके मातृभाषा का स्वरूप भला क्या होगा?

निजी अनुभव

मैं अपनी बात को आगे प्रस्तुत कुछ दृष्टांतो के माध्यम से स्पष्ट करता हूं। स्पष्ट कर दूं कि ये दृष्टांत काल्पनिक नहीं हैं अपितु मेरे अनुभव में आई बातें हैं।

(१)     मेरा जन्म उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के एक गांव में तब हुआ था जब देश स्वतंत्र होने जा रहा था (१९४७)। तब हम बच्चों (और कई वयस्कों की भी) दुनिया गांव एवं उसके पास के क्षेत्र तक सीमित थी। टेलीफोन, बिजली, रेलगाड़ी आदि शब्द सुने तो जरूर थे पर ये होते क्या हैं इसका कोई अनुभव नहीं था। गांव कुमाऊं क्षेत्र में था और वहां कुमाउंनी बोली जाती थी, जिसे आप हिन्दी की बोली या उपभाषा कह सकते हैं। आम हिन्दीभाषी को कुमाउंनी ठीक से समझ में आ जाती होगी इसमें मुझे संदेह है। एक बानगी पेश है: “मैंलि आज रात्तै क्योल खाछ।” जिसका हिन्दी रूपान्तर है: “मैंने आज प्रातः केला खाया (था)।” (रात्तै = रात के अंत का समय)। कुमाउंनी में सहायक क्रिया “होना” के लिए “हुंण” है जिसके रूप अक्सर छ से आरंभ होते हैं। जब हम बच्चे ५-६ वर्ष की उम्र में पाठशाला जाने लगे तो पढ़ाई के माध्यम एवं पुस्तकें हिन्दी में थीं। आरंभ में सही हिन्दी बोलने में थोड़ा दिक्कत तो हुई होगी, लेकिन किताबें पढ़ने/समझने में कोई परेशानी नहीं हुई। परंतु घर और बाहर कुमाउंनी ही में हम बोलते थे। तब क्या थी हमारी मातृभाषा? उपभाषा के तौर पर कुमाउंनी और भाषा के तौर पर हिन्दी। निश्चित ही हमारा अंग्रेजी एवं अन्य किसी भाषा से कोई संपर्क नहीं था।  अंग्रेजी से संपर्क तो कक्षा ६ से आरंभ हुआ और उसका प्रभाव हमारी हिन्दी/कुमाउंनी पर नहीं के बराबर था।

(२)     मेरे पड़ोस में पांच भाइयों के परिवार रहते हैं। ये लोग उस जमीन के मालिकों में से एक हुआ करते थे जिसमें हमारी कालोनी बसी है। ये और इनकी संतानें फल-सब्जियां बेचने का धंधा करती हैं या उनमें से कुछएक ऑटो-ट्राली आदि चलाते हैं। माली हालत निम्नवर्ग के अनुरूप है। तीस साल पहले जब मैंने इस कालोनी में मकान बनवाया तब इनके पिता जीवित थे। वे निरक्षर थे और शायद ये सभी भाई भी निरक्षर हैं। तीसरी पीढ़ी के युवा भी अधिक पढ़े-लिखे नहीं हैं। शायद कुछ ने हाई-स्कूल या इंटर तक की पढ़ाई की है। शैक्षिक स्तर सभी का अतिसामन्य प्रतीत होता है। इस पीढ़ी की कुछ संतानें (चौथी पीढ़ी) किशोरावस्था में चल रही हैं और सरकारी विद्यालयों को छोड़कर निजी अंग्रेजी-माध्यम स्कूलों में पढ़ती हैं। ये बच्चे “अंकल, गुड मॉर्निंग” की भाषा बोलने लगे हैं और “हैप्पी बर्थडे सेलिब्रेट” करते हैं। मैंने पाया है कि उनकी शब्द संपदा में अब अंग्रेजी घुस चुकी है। फिर भी यही कहूंगा कि हिन्दी (या कहिए भोजपुरी) अभी इनकी मातृभाषा है, क्योंकि घरों में अंग्रेजी बोल सकने वाले सदस्य हैं नहीं। किंतु उसके बाद की पीढ़ी अवश्य ही यथासंभव अंग्रेजी पर जोर डालेगी और मातृभाषा प्रभावित होने लगेगी।

(३)     अब बात करता हूं बड़े शहर में रह रहे कुमाउंनी मूल के ऐसे परिवार की जहां मुझे ६०-७० वर्षीय जन मिल गए और जिनसे मैं कुमाउंनी में बात कर सका। चूंकि इन जनों की अगली पीढ़ी शहरो में ही पैदा हुई, पली-बढ़ी और पढ़ी-लिखी, अतः वे कुमाउंनी समझ तो सकते हैं परंतु बोल नहीं सकते। उस परिवार में मुझे चारएक साल का ऐसा बच्चा दिखा जो हिन्दी नहीं बोल सकता था भले ही समझ लेता था। उससे सभी अंग्रेजी में ही बात कर रहे थे। मुझे लगा कि उसकी हिन्दी के प्रति कोई भी व्यक्ति चिंतित नहीं था। फलतः एक ऐसी पीढ़ी तैयार हो रही थी जिसकी मातृभाषा अंग्रेजी बन चुकी थी, माता-पिता की मातृभाषा हिन्दी होने के बावजूद। रही-सही कमी अंग्रेजी-माध्यम का स्कूल पूरा कर रहा था। सवाल है कि किसी बच्चे की मातृभाषा मां-बाप की भाषा ही होगी ऐसा मानना तर्कसंगत होगा क्या?

(४)     मैं जब मूलतः हिन्दीभाषी मध्यवर्गीय शहरी परिवार में जाता हूं, मैंने पाया है कि वहां हिन्दी बोली तो जाती है, परंतु तिरस्कृत भी बनी रहती है। हिन्दी उन परिवारों के लिए मजबूरी कही जा सकती है, क्योंकि निचले सामाजिक तबके के लोगों और घर-परिवार के सद्स्यों तथा मित्र-परिचितों के साथ हिन्दी में ही संपर्क साधना पड़ता है। अन्यथा उनके यहां हिन्दी की पत्र-पत्रिकाएं-पुस्तकें बमुश्किल देखने को मिलती है। उस माहौल में बच्चे की अक्षर-ज्ञान की आरंभिक पुस्तकें भी अंग्रेजी में ही मिलती हैं जो उसे “ए फ़ॉर ऐपल, बी फ़ॉर बनाना, सी फ़ॉर कैट, …” सिखाती हैं। ऐसी स्थिति में बच्चे की मातृभाषा क्या हिन्दी रह सकती है? क्या वह एक खिचड़ी भाषा नहीं होगी जिसमें अंग्रेजी अधिक, हिन्दी कम हो?

गायब हो रहे हैं हिन्दी शब्द

एक बार मैं एक दुकान पर खड़ा था। १०-११ साल के एक बच्चे ने कोई सामान खरीदा और उसका दाम पूछा। दुकानदार ने जब “अड़तीस रुपये” कहा तो वह समझ नहीं सका। तब उसे “थर्टीएट” बताया गया। टीवी चैनलों पर शायद ही कोई साफ-सुथरी हिन्दी में समाचार देता होगा। “… में एक बिल्डिंग कोलैप्स हो गई है। मलवे से दो लोगों की डेड बॉडी निकाली गईं हैं। चार लोग इन्ज्यर्ड बताए गए हैं। …” समाचार का ऐसा ही पाठ सुनने को मिलता है। विज्ञापनों की भाषा कुछ यों होती है: “… बनाए आपकी स्किन फेअर एंड मुलायम …।” सुपरिचित बाबा रामदेव स्वदेशी के हिमायती  होने की दावा करते हैं। उनके खुद के विज्ञापनो में आप पाएंगे कि वे मधु/शह्द के बदले हनी, नारियल तेल के बदले कोकोनट ऑयल जैसे शब्द इस्तेमाल करते हैं। उनके उत्पादों पर लिखित जानकारी भी शायद ही कभी मुख्यतया हिन्दी में देखने को मिलती है।

यह ठीक है कि हर भाषा की शब्द-संपदा में अन्य भाषाओं के कुछएक शब्द भी अक्सर शामिल हो जाते हैं। लेकिन हिन्दी में तो वे शब्द भी अंग्रेजी शब्दों से विस्थापित होते जा रहे हैं जो सदा से ही आम लोगों के मुख में रहते थे। क्या यह सच नहीं है कि अब हिन्दी की गिनतियां, साप्ताहिक दिनों के नाम, फल-फूलों, पशु-पक्षिओं, शारीरिक अंगों, आम बिमारियों, आदि के नाम आम बोलचाल में कम सुनने को मिल रहे हैं, विशेषतः शहरी नवयुवाओं, किशोरों एवं बच्चों के मुख से? ऐसी दशा में किसी बच्चे की विकसित हो रही भाषा क्या असल हिन्दी हो सकती है, भले ही उसके मां-बाप मूलतः हिन्दीभाषी हों? वह जो सीखेगा उसे मैं हिन्दी नहीं मान सकता। भाषा के मूल शब्द गायब होते जाएं और व्याकरणीय ढांचा भर रह जाए तो भी आप उसे हिन्दी कहें तो कहते रहें। यह सार्वलौकिक (कॉज़्मोपॉलिटन) महानगरों की विशेष समस्या है।

अंत में इस तथ्य की ओर पाठकों का ध्यान फिर से खींचता हूं कि आज के युग में जन्म के बाद से ही बच्चे को भाषा की दृष्टि से खिचड़ी परिवेश मिलने लगा है, विशेषतः महानगरों में। जब तक उसके मस्तिष्क में भाषा का स्वरूप स्थायित्व पाए तब तक उस पर एकाधिक कारकों का प्रभाव पड़ने लगता है। चूंकि महानगरों में अब अंग्रेजी माध्यम विद्यालय ही लोगों की प्राथमिकता बन चुके हैं, अतः वहां का महौल घर से अलग रहता है। अड़ोस-पड़ोस का परिवेश कुछ रहता है और तथा टीवी चैनल कुछ और ही परोसते हैं। ये सभी बच्चे की भाषा को प्रभावित करते हैं। (मैंने समाचार पढ़ा था कि कर्नाटक में सरकारी विद्यालयों का माध्यम अब अंग्रेजी होगी। उत्तर प्रदेश के कुछ सरकारी विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम रहेगा। कुछ राज्यों में प्राथमिक दर्जे से अंग्रेजी पढ़ाई जा रही है।) ऐसे में संभव है कि कोई खिचड़ी भाषा मातृभाषा के तौर पर विकसित हो। – योगेन्द्र जोशी

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