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श्री शशिशेखर जी,

मैंने आपका लेख “हत्‌भागिनी नहीं हमारी हिंदी” (हिन्दुस्तान, सितंबर 8) पढ़ा । उसी के संदर्भ में अपनी टिप्पणी प्रेषित कर रहा हूं । (अपने ब्लॉग https://hinditathaakuchhaur.wordpress.com में भी मैं इसे शामिल कर रहा हूं ।)

प्रथमतः मैं निवेदन करता हूं कि ‘हत्‌भागिनी’ न होकर ‘हतभागिनी’ होना चाहिए था । शब्द हत (मारा गया) है न कि हत् । शीर्षक में यह त्रुटि खलती है; अन्यथा चल सकता था । इस धृष्टता के लिए क्षमा करें ।

देश-विदेश में हिंदी, पर कितनी?

लेख में आप इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिंदी देश-विदेश में विस्तार पा रही है और अधिकाधिक लोग इसे प्रयोग में ले रहे हैं । आपने जिन अनुभवों की बात की है वे कमोवेश सभी को होते हैं, खास तौर पर इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में । सीधा-सा तथ्य यह है कि जहां कहीं भी पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी/उर्दूभाषी लोग रह रहे हैं, या बस चुके हैं, वहां उनके बीच हिंदी का प्रचलन देखने को मिल जाता है । जब विदेश में अपने देश अथवा भाषाई-सांस्कृतिक दृष्टि से निकटता रखने वाले अन्य देशों के निवासी पहुंचते हैं, तब उनमें परस्पर अपनापन का भाव जगता है यह स्वयं मेरा अनुभव रहा है ।

जब मैं 1983-85 में साउथहैम्पटन (इंग्लैंड) में था तब भारतीयों एवं पाकिस्तानियों से मेरी हिंदी में ही बात होती थी । लंडन के पास साउथहॉल का नजारा कुछ ऐसा हुआ करता था कि वहां पहुंचने पर ‘हम भारत में हैं’ ऐसा लगता था । साउथहैम्पटन में गुजराती दुकानदारों से मैं भारतीय भोजन सामग्री खरीदते समय अक्सर हिंदी में बात करता था । आरंभ में मैं एक पाकिस्तानी खान साहब के मकान में रहा, उनसे हिंदी में बात होती थी । बाद में किसी पंजाबी सज्जन के मकान में रहा जिसके पड़ोस में पंजाबी परिवार रहता था । उस परिवार की हिंदी-पंजाबी बोलने वाली महिला से मेरी पत्नी के अच्छे ताल्लुकात हो चले थे । मुझे एक पाकिस्तानी महोदय की याद है जिन्होंने कहा था, “आप लोग हिंदी बोलने की बात करते हैं, क्या यही हिंदी है, उर्दू जैसी ?”

उन दिनों भारत सरकार हवाई अड्डे पर मात्र 12-13 पौंड की रकम देती थी । मैं जब साउथहैम्पटन पहुंचा तो पता चला कि उस दिन सार्वजनिक छुट्टी है । उसके तथा विदेश यात्रा का पूर्ववर्ती अनुभव न होने के कारण तब मुझे काफी परेशानी झेलनी पड़ी थी । उस दिन एक बांग्लादेशी मूल के रेस्तरांवाले ने मुझे मुफ्त में भोजन कराया था ।

अमेरिका (सिलिकॉन वैली) में भी मेरे अनुभव कुछ मिलते-जुलते रहे । मेरे बेटे के हिंदुस्तानी साथियों के बीच हिंदी-अंगरेजी में वार्तालाप सामान्य बात होती थी । वहां बसे उसके एक मित्र के 5-7 साल के बच्चों को हिंदी में बोलते देख मुझे आश्चर्य हुआ । पता चला कि वे गरमियों में भारत आकर दादा-दादी के पास ठहरते हैं और हिंदी सीखते हैं ।

कहने का मतलब है कि दुनिया के जिन हिस्सों में पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी मूल के लोग हैं वहां वे प्रायः आपका स्वागत करेंगे और हिंदी बोलते हुए भी दिख जाएंगे ।

मुझे पता चला कि कैलिफोर्निया में कुछ प्राथमिक विद्यालयों में चीनी भाषा भी पढ़ाई जाती है । संप्रति अमेरिका में यह सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा है । वहां कई चीनी/कोरियाई मूल के लोगों की दुकानों पर नामपट्ट तक संबंधित लिपि में देखने को मिलते हैं । वहां के एक ‘कंडक्टेड टूअर’ का अनुभव मुझे याद है जिसका गाइड ताइवान मूल का युवक था, जिसने अपनी कमजोर अंगरेजी एवं मजबूत चीनी भाषा में पर्यटक स्थलों का परिचय कराया था । साथ में उपलब्ध पाठ्यसामग्री चीनी एवं अंगरेजी, दोनों में, थी । इस माने में हिंदी एकदम पीछे है ।

आपके-मेरे सरीखे अनुभव संतोष करने के लिए काफी नहीं हैं ऐसा मेरा मानना है । आपने इन दो बातों पर खास कुछ नहीं कहा:

(1) पहला, जो हिंदी अब पढ़ेलिखे लोगों के बीच जड़ें जमा रही है वह दरअसल हिंदी-अंगरेजी का मिश्रण है, और

(2) दूसरा, लिखित रूप में हिंदी की प्रगति निराशाप्रद ही है ।

हिंदी-अंगरेजी मिश्रभाषा

(1) जिस प्रकार यह देश ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ में बंटा है वैसे ही हिंदी (और कदाचित अन्य भारतीय भाषाएं) भी दो श्रेणियों में बंटी है । पहली को मैं व्यक्तिगत तौर पर मैट्रोहिंदी कहता हूं । इसे आप ‘महानगरीय हिंदी’, ‘एंग्लिसाइज्ड हिंदी’, ‘एंग्लोहिंदी’, अथवा ‘हिंदी-इंग्लिश मिश्रभाषा’ या कुछ और नाम दे सकते हैं । यह उन लोगों की भाषा है जो इस देश को ‘भारत’ नहीं कहते बल्कि ‘इंडिया’ कहते हैं । आप बताइए कितने पढ़ेलिखे लोगों के मुख से भारत शब्द निकलता है ? यह उस देश के हाल हैं जहां लोग मुंबई, चेन्नई, पुणे, पश्चिमबंग, ओडिशा, आदि नामों के लिए अभियान चलाते हैं, लेकिन देश को इंडिया कहना पसंद करते हैं । यह उन शिक्षित लोगों की भाषा है जो अंगरेजी के इस कदर आादी हो चुके हैं कि उन्हें समुचित हिंदी शब्द सूझते ही नहीं अथवा उन्हें याद नहीं आते हैं । आज स्थिति यह है कि ‘एंड’, ‘बट’, ‘ऑलरेडी’ आदि शब्द जुबान पर तैरते रहते हैं । कुछ लोग शारीरिक अंगों, ‘किड्नी’, ‘लिवर’, ‘मशल’ आदि और ‘ग्रे’, ‘मरून’ आदि जैसे रंगों की हिंदी बताने में भी असमर्थ पाये जाएंगे । हिंदी की गिनतियां अब जुबान पर कम ही आती हैं । कितने उदाहरण दें ? इस भाषा में अंगरेजी शब्द ही नहीं, वाक्यांश या पूरे वाक्य भी शामिल रहते हैं । पर्याप्त अंगरेजी न जानने वाले की समझ से परे ‘कम्यूनिके’, ‘कॉर्डन-आफ’, ‘सेफ्टी मेजर्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है । यह सब हो रहा है इस कुतर्क के साथ कि इससे हमारी हिंदी समृद्ध होती है । लेकिन अंगरेजी की शुद्धता के लिए वे पूर्णतः सचेत रहते हैं । उसको भी समृद्ध क्यों नहीं बनाते ?

AmarUjala - Mixed Scripts

दूसरी तरफ हमारी ‘देसी’ हिंदी है जो ग्रामीणों, अशिक्षितों/अल्पशिक्षितों, श्रमिकों आदि के द्वारा बोली जाती है, जिनका अंगरेजी ज्ञान अपर्यााप्त रहता है । उस हिंदी की बात होती ही कहां है ?

यह ठीक है कि अभी उक्त मिश्रभाषा का प्रयोग साहित्यिक कृतियों में नहीं हो रहा है, लेकिन टीवी चैनलों पर तो यही अब जगह पा रही है । विज्ञापनों की भाषा भी यही बन रही है । दिलचस्प तो यह है कि इस भाषा की लिपि भी देवनागरी एवं रोमन का मिश्रण देखने को मिल रहा है । इंटरनेट पर रोमन में लिपिबद्ध हिंदी खुलकर इस्तेमाल हो रही है, जब कि फोनेटिक की-बोर्ड के साथ यूनिकोड में टाइप करना कठिन नहीं होता ।

आशाप्रद नहीं लिखित हिंदी की स्थिति

(2) निःसंदेह हिंदी – अंगरेजी मिश्रित ही सही – एक बोली के रूप में विस्तार पा रही है । लेकिन लिखित तौर पर इसका इस्तेमान कितना हो रहा है ? एक ओर सरकारें इसे संघ की राजभाषा कहती हैं अैर दूसरी ओर वही इससे परहेज रखती हैं । ऐसे में अधिक उम्मीद कैसे की जा सकती है ? लोग बातें तो हिंदी में करते हैं, लेकिन लिखित में कुछ बताना हो तो अंगरेजी पर उतर आते हैं । डॉक्टर मरीज से हिंदी में करता है किंतु नुसखा अंगरेजी में ही लिखता है, इस बात की परवाह किए बिना कि मरीज उसे समझ पाएगा या नहीं । लिफाफे पर पता, रेलवे आरक्षण फॉर्म, बैंक लेनदेन का फॉर्म, इत्यादि वे अंगरेजी में ही भरते हैं, अगर वे अल्पशिक्षित न हों तो । कितनी सरकारी संस्थाएं आप गिना सकते हैं जिनकी वेबसाइटें हिंदी में हैं; अगर कहीं हैं तो अधकचरे । इंटरनेट पर कितने फार्म हैं जिन्हें देवनागरी में भरने का विकल्प उपलब्ध हो ? रेलवे आरक्षण टिकट हों या बिजली/टेलीफोन बिल उनकी प्रविष्टियां अंगरेजी में ही मिलेंगी ! जिस देश की सर्वोच्च अदालत ‘नो हिंदी’ कहे, यूपीएससी जैसी संस्था ‘अंगरेजी कंपल्सरी’ कहे, वहां हिंदी का भविष्य कैसा होगा सोचा जा सकता है ।

देश की व्यावसायिक संस्थाओं ने तो जैसे कसम खा रखी है कि वे हिंदी हरगिज नहीं चलने देंगे । बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामग्री के बारे में कितनी संस्थाएं हिंदी-देवनागरी में जानकारी देती हैं ? बिस्किट पैकेट हो या टूथपेस्ट या अन्य उत्पाद उन पर हिंदी दिख जाए तो अहोभाग्य । कंप्यूटर संबंधी उपस्करों के साथ उपलब्ध जानकारी वियतनामी, थाई, हिब्रू, आदि में मिल जाएगी, लेकिन भारतीय भाषाओं में नहीं । हिंदीभाषी क्षेत्रों के दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में घूम जाइए, आपको हिंदी में शायद ही कहीं नामपट्ट दिखें ।

इस बात से आप अगर संतुष्ट हों कि अब अधिक लोग हिंदी बोल रहे हैं, भले ही उसे विकृत कर रहे हों, और उसे न लिखने की कसम खाए हों तो खुशकिस्मत हैं । लेकिन मुझे इसमें संतोष की गुंजाइश नहीं दिखती ।

भवदीय,

योगेन्द्र जोशी

इस चिट्ठे की पिछली चार प्रविष्टियों में (देखें तारीख 24 अगस्त 2012 की पोस्ट और उसमें उल्लिखित पूर्ववर्ती आलेखों को) मैंने हिंदी-अंगरेजी के मिश्रण से उपजी एक खिचड़ी भाषा की चर्चा की है, जो आज के महानगरों में अंगरेजी पढ़े-लिखे लोगों द्वारा बोली जा रही है । इसे मैंने मेट्रोहिंदी नाम दिया है । जिस किसी ने इस भाषा के बारे मेरे विचारों को इस ब्लॉग पर पढ़ा हो, और सचेत होकर टीवी चैनलों पर समाचारों/बहसों तथा अपने आसपास विविध मुद्दों पर लोगों के वार्तालापों को सुना हो, उसे यह अंदाजा तो लग ही चुका होगा कि किस प्रकार हिंदी-अंगरेजी मिश्रण की एक नयी भाषा/बोली इस देश में विकसित हो रही है । मैं इस स्थल पर शेष बातें इसी भाषा में व्यक्त कर रहा हूं, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो सके । मेट्रोहिंदी में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि अभी तक देवनागरी के माध्यम से प्रायः साफसुथरी हिंदी में अथवा रोमन के साथ अंगरेजी में लिखने की आदत रही है । अतः उक्त कार्य के लिए अपेक्षया अधिक प्रयास करना पड़ेगा ।

मेट्रोहिंदी की खास बात यह है कि इसमें भारत के लिए कोई जगह नहीं । आपको सभी के मुख से इंडिया सुनने को मिलेगा: इंडिया शाइनिंग, चक दे इंडिया, इंडियन टीम, इंडिया मांगे गोल्ड, एटसेटेरा एटसेटेरा । दरअसल पॉलिटिकल इंडिपेंडेंस के बाद इंडिया में इंग्लिश की इंपॉर्टेन्स घटने के बजाय बढ़ती चली गई । इंडिपेंडेंस के लिए जिन लोगों ने स्ट्रगल किया था उन्होंने यह इक्सपेक्ट किया था कि इस कंट्री की अपनी लैंग्वेज होगी और सूनर ऑर लेटर हमारी सभी एक्टीविटीज उसी लैंग्वेज में होंगी । लेकिन उनके ड्रीम्ज धरे ही रह गये ।

इंग्लिश के फेबर में आर्ग्युमेंट्स
इस कंट्री में एक ऐसा सोशल सेक्सन उभरा है जो ऑफिशियल लैंग्वेज हिंदी को यूज करने में बिल्कुल भी इंटरस्टेड न था, न आज है और न कभी होगा । इस सेक्शन के पास इंग्लिश के फेबर में अनेक रैशनल-इर्रैशनल आर्ग्युमेंट्स हैं । चूंकि कंट्री का एड्मिनिस्ट्रेशन इसी के हाथ में सदा से चला आ रहा है, इसलिए हिंदी समेत सभी इंडियन लैंग्वेजेज पर इंग्लिश आज तक हावी बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी । इनके आर्ग्युमेंट्स के इग्जाम्पुल कुछ यों हैं:

1. इंडिया की इंटिग्रिटी के लिए इंग्लिश जरूरी है ।
2. इंग्लिश इज ऐन इंटरनैशनल लैंग्वेज, इसलिए इंग्लिश को प्रमोट किया जाना चाहिए । हर इंडियन को इंग्लिश सीखनी चाहिए ।
3. दुनिया में हर सब्जेक्ट की नॉलेज इंग्लिश में ही अवेलेबल है, इसलिए इंग्लिश के बिना हम दूसरे कंट्रीज से पिछड़ते चले जाएंगे ।
4. साइंस, इंजिनियरिंग, मेडिसिन जैसे सब्जेक्ट्स की टीचिंग और स्टडी इंडियन लैंग्वेजेज में पॉसिबल ही नहीं है ।
5. आज के कंप्यूटर एज में इंटरनेट का यूज इंग्लिश के बिना पॉसिबल नहीं है ।
6. बिजनेस एंड प्रोफेशनल एक्टिविटीज में इंग्लिश इसेंशियल है । इसलिए नौकरी-पेशे में इंग्लिश जरूरी है ।

और भी आर्ग्युमेंट्स इस सोशल सेक्शन के दिमाग में होंगे । अभी में अधिक नहीं सोच पा रहा हूं ।

मेरे ऑब्जर्वेशन्ज
द सिंपल फैक्ट नाव इज कि इंग्लिश हिंदी और अदर लैंग्वेजेज पर हावी है । इंडियन्ज के दिमाग में यह घुस चुका है कि लाइफ में वे इंग्लिश के बिना सक्सेस नहीं पा सकते हैं । मेरे इन ऑब्जर्वेशन्ज पर नजर डालें और सोचिए कि मैं करेक्ट हूं या नहीं:

1. आम इंडियन, जिसे थोड़ी-बहुत इंग्लिश आती है, रिटन फार्म (लिखित रूप) में हिंदी के यूज में इंटरस्टेड नहीं रहता । उसकी प्रिफरेंस इंग्लिश रहती है । किसी रजिस्टर में नाम/सिग्नेचर रिकार्ड करना हो तो वह इंग्लिश (रोमन) का ही यूज करेगा । ऐसा मैं BHU जैसी यूनिवर्सिटी, जहां मैं टीचिंग एंड रिसर्च करता था, में देखता आया हूं ।
2. कहा जाता है कि हिंदी की पॉपुलरिटी में हिंदी सिनेमा का बड़ा कंट्रिब्यूशन रहा है । बट याद रखें वह हिंदी नहीं मेट्रोहिंदी है । यह भी देखिये कि फिल्मों की कास्टिंग वगैरह देवनागरी में रेयरली होती है ।
3. हिंदी सिनेमा में काम करने वाले एक्टर्स वगैरह मोस्टली मेट्रोहिंदी या प्युअर इंग्लिश में बात करते हैं, भले ही वे हिंदी जानते हों । यही बात स्पोटर्समेन पर भी लागू होती है ।
4. इट इज अ फैक्ट कि हिंदी इस कंट्री की ऑफिशियल लैंग्वेज है न कि इंग्लिश, बट प्रैजिडेंट, प्राइम-मिनिस्टर एंड हाई ऑफिशियल्स फॉरेन टुअर्स या UNO में हिंदी नहीं बोलते हैं, यह जानते हुए भी कि हेड्ज ऑव अदर कंट्रीज अपने यहां की ही लैंग्वेज बोलते हैं । अटल बिहारी बाजपाई वज एन इक्सेप्शन ! आइरनी तो यह है कि हिंदी को खुद यूज नहीं करेंगे लेकिन यूएनओ की ऑफिशियल लैंग्वेजेज में इंक्लूड करने की बात करते हैं ।
5. इंडियन बिजनेसमेन एंड कॉमर्शियल हाउसेज तो हिंदी और उसकी स्क्रिप्ट को यूज न करने के लिए डिटर्मिन्ड हैं । इसलिए आप कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स पर रैलिवेंट इंफर्मेशन इंग्लिश में ही प्रिंटेड पाएंगे ।
6. हिंदी-स्पीकिंग हो या न हो, सभी जगह – गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स छोड़ दें – होटल्स, बिल्डिंग्ज, शॅपिंग मॉल्ज, बिजनेस हाउसेज एंड स्कूल-कॉलेज के नाम मोस्टली इंग्लिश में लिखे मिलते हैं ।
7. गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स की बेवसाइट्स इंग्लिश में ही अवेलेबल हैं । कहीं-कहीं उनका हिंदी वर्जन जरूर मिल जाता है, बट ऑनलाइन एक्टिविटी के मामले में इंग्लिश ही यूजुअली काम देती है । फॉर इग्जांपल रेलवे रिजर्वेशन फॉर्म की एंट्रीज इंग्लिश में देनी पड़ती हैं, एंड उसके हिंदी प्रिंट आउट में भी नेम, स्टार्टिंग स्टेशन, डेस्टिनेशन वगैरह रोमन में ही मिलेंगे ।

आई मीन टु से कि गवर्नमेंटल एंड नॉन-गवर्नमेंटल, दोनों लेबल्स पर इंग्लिश की जरूरत फील की जाती है । हिंदी के बिना काम चल सकता है, बट इंग्लिश के बिना नहीं । इसका रिजल्ट यह है कि सभी इंडियन्ज का इंक्लिनेशन इंग्लिश की स्टडी की ओर है । हां बोलचाल के लिए केवल वर्किंग नॉलेज ऑव हिंदी चाहिए, जिसे हिंदी-स्पीकिंग रीजन्ज में लोग बतौर मदरटंग सीख ही लेते हैं । उन्हें काम चलाने के लिए इंप्रेसिव हिंदी-वोकैबुलरी की जरूरत नहीं होती है । बट इंप्रेसिव इंग्लिश-वोकैबुलरी इज ऐन असेट !!

हिंदी का फ्यूचर
मुझे लगता है कि फ्यूचर में प्युअर हिंदी – ऐसी लैंग्वेज जिसमें इंग्लिश वर्ड्स की अन्लिमिटेड मिक्सिंग न हो – केवल लिटरेरी राइटिंग तक सिमट कर रह जाएगी । हाईली-लिटरेट अर्बन पीपल मेट्रोहिंदी ही बोलचाल में यूज करेगा । यहां तक कि हिंदी न्यूजपेपर्स एंड मैगजीन्स में भी मेट्रोहिंदी जगह पा लेगी, जिसका इंडिकेशन उन आर्टिकिल्स एंड ऐड्वरटिजमेंट्स में मिलता है जो आज के यूथ को ऐड्रेस करके लिखे जा रहे हैं । टीवी प्रोग्रैम्ज में तो मेट्रोहिंदी ही दिखती है ।

मैंने जिस सोशल सेक्शन की बात ऊपर कही है उसका इंटरैस्ट प्युअर हिंदी में नहीं है, इसलिए उसकी हिंदी वोकैबुलरी कमजोर रहती है, जिसके चलते हिंदी के बारे उसकी यह ओपीनियन बन जाती है कि हिंदी डिफिकल्ट है । वह कहता है कि उसे हमें सिम्पल बनाना चाहिए और इस पर्पज के लिए इंग्लिश वडर््ज का यूज विदाउट हेजिटेश्न करना चाहिए । ऐसी सिचुएशन में प्युअर हिंदी लिंग्विस्टिक करप्शन से बच पाएगी यह क्वेश्चन इंपॉर्टेन्ट हो जाता है ।

द जिस्ट आव् ह्वट हैज बीन सेड यह है कि हिंदी सर्वाइव करती रहेगी लेकिन अपने इक्सट्रीम्ली करप्ट फॉर्म में । प्युअर हिंदी – चाहे वह लिटरेचर में हो या वेबसाइट पर – को पढ़ने एंड अंडरस्टैंड करने वाले बहुत नहीं रहेंगे । अंगरेजी की सुप्रिमेसी बनी रहेगी, ऐट लीस्ट रिटन फॉर्म में !

जिस लैंग्वेज में मैंने ये आर्टिकल लिखा है उसे आप ऑर्डिनरीली न्यूजपेपर/मैगजीन्स में नहीं देखते होंगे । अभी यह लैंग्वेज बोलचाल में ही सुनने को मिल रही है । बट मेरा मानना है कि फ्यूचर में ऐसे आर्टिकल्स अन्कॉमन नहीं रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

अपने देश के महानगरों में एक ऐसी भाषा जन्म ले चुकी है जो न हिंदी है और न ही अंगरेजी । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । इसे लेकर अपने ब्लॉग की पिछली तीन प्रविष्टियों में मैंने कुछ विचार व्यक्त किए हैं (तारीख 22 जून3 जुलाई, तथा 23 जुलाई) ।

मेरी नजर में मेट्रोहिंदी के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है । इसका प्रभाव क्षेत्र इतना बढ़ चुका है कि इसे भाषावेत्ताओं एवं शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन के योग्य विषय के तौर पर चुना जाना चाहिए । इसकी कुछएक विशिष्टताओं का संक्षिप्त उल्लेख मैंने पिछले आलेख में किया था । उन्हीं की चर्चा किंचित् विस्तार से मैं यहां कर रहा हूं ।

(1) पारंपरिक हिंदी के वे शब्द, जिन्हें हिंदीभाषी सदियों से बोलचाल में प्रयोग में लेते आए हैं, इस नई भाषा, मेट्रोहिंदी, से विलुप्त होते जा रहे हैं । इनकी सूची निम्न प्रकार से दी जा सकती हैः

1 – गिनती के शब्दः वन् (एक), टू (दो), थ्री (तीन) …
2 – साप्ताहिक दिनों के नामः मंडे (सोमवार), ट्यूज्डे (मंगलवार) …
3- रंगों के नामः रेड (लाल), येलो (पीला), ब्लैक (काला) …
4 – शरीर के अंग एवं रोग-लक्षणों के नामः किडनी (वृक्क – कम ही लोग जानते होंगे!), लिवर (यकृत्), हार्ट-अटैक (हृदयाघात), थ्रोट-इंफेक्शन (गले का संक्रमण), ब्लड-टेस्ट (खून की जांच) ….
5 – ‘प्रगतिशील’ अभिभावकों द्वारा बच्चों को रटाए जा रहे अनेकों शब्दः डॉगी (कुत्ता), टाइगर (बाघ), हॉर्स (घोड़ा), फिश् (मछली), कॉक्रोच (तिलचट्टा – कितने बच्चे जानते होंगे?) …
6 – साग-सब्जी के नाम जो बच्चे सीख रहे हैंः बनाना (केला), ऐपल् (सेब), ऑरेंज (संतरा), टोमेटो (टमाटर), पोटैटो (आलू), …
7 – पारिवारिक रिश्तों के नामः मम्मी/पापा (माता/पिता) तो प्रायः हर हिंदीभाषी के जुबान पर बस चुके हैं (बुजुर्ग अपवाद होंगे!!) । अब कई लोग मॉम/डैड/डैडी पर भी उतर चुके हैं । इसके अलावा हजबैंड/वाइफ (पत्नी/पति), मदर-इन-लॉ/फादर-इन-लॉ (सास/ससुर), ग्रैंडमा/ग्रैंडपा (दादी/दादा), आदि रिश्तों के संकेत के तौर पर इस्तेमाल होते हैं ।

इसी प्रकार कई अन्य क्षेत्रों में भी हिंदी के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग हो रहा है ।

(2) मेट्रोहिंदी में उन अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं किया जाता है जो अंगरेजी का सामान्य ज्ञान रखने वाले को तक समझ में न आते हों; अंगरेजी न जानने वाले सामान्य हिंदीभाषी के लिए तो ‘काला अक्षर भेंस बराबर’ की ही स्थिति रहती है । लेकिन इस तथ्य की परवाह किसी वक्ता को नहीं रहती है । ऐसे शब्दों/ पदबंधों की सूची काफी लंबी होगी । इन उदाहरणों पर नजर डालें:

(3) औपचारिक बातचीत के अनेकों शब्द/पदबंध, यथा ‘थैंक् यू’ (धन्यवाद), एक्सक्यूज मी (माफ करें), वेरी गुड (शाबास), कांग्रैच्युलेशन्स (बधाई), हैप्पी बर्थडे (जन्मदिन मुबारक) …

(4) मेट्रोहिंदी में व्याकरणीय ढांचा मूलतः हिंदी का ही है, किंतु उस पर अंगरेजी के व्याकरण का असर साफ नजर आ जाता है । व्याकरण संबंधी विकृति कई रूपों में दिखाई देती है । प्रमुखतया अधोलिखित बिंदु ध्यान आकर्षित करते हैं:

1- अंगरेजी से लिए गये कई संज्ञाशब्दों के बहुवचन बहुधा अंगरेजी के नियमों के अनुसार चुने जाते हैं, न कि हिंदी के व्याकरण के अनुसार, जैसे फ्रेंड्स (न कि फ्रेंडों), ऑफिसेज्, यूनिवर्सिटीज्, …
2- हिंदी के कुछ संयोजक शब्द अंगरेजी के तुल्य शब्दों से विस्थापित होने लगे हैं । इनमें एंड (और) एवं बट् (लेकिन) मुख्य हैं ।
3- मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के विशेाणों/क्रियाविशेषणों का प्रयोग सामान्य हो चला है, जैसे ऑलरेडी (पहले ही), इन् फैक्ट (दरअसल), इक्जैक्ट्ली (ठीक, सही-सही), परफेक्ट्ली (परिपूर्णतः), …
4- गनीमत यह है कि हिंदी के सर्वनामों को अभी छेड़ा नहीं गया है । मैंने किसी के मुख इस प्रकार के वाक्य नहीं सुने हैं:
“माई स्कूल में स्पोर्ट्स कल होंगे ।”; “ही (वह) कॉलेज गया है ।” आदि ।

(5) महानगरीय हिंदी में अंगरेजी शब्दों के साथ ‘होना’, ‘करना’, ‘सकना’ जैसे सहायक क्रियाओं के प्रयोग के साथ उपयुक्त क्रियापदों की रचना आम बात हो चुकी है । दृष्टांत प्रस्तुत हैं:
कॉल किया था (बुलाया था), इरेज् कर दिया (मिटा दिया), स्पाइसेज् ऐड् करो (मसाले डालो), अटेंडेंस ले लो (उपस्थिति दर्ज करो), मॉर्निंग वाक् करिए (सुबह टहलिए), इत्यादि ।

(6) बात इतने पर समाप्त नहीं होती है । बताया जा चुका है कि मेट्रोहिंदी अभी लिखित पाठों में जगह नहीं पा सकी है । भले ही शहरी लोग इसे आम बोलचाल एवं टीवी-बहसों में बेझिझक इस्तेमाल करते हों, उनका लेखन-कार्य लगभग शुद्ध हिंदी/हिंदुस्तानी में ही हो रहा है । फिर भी टीवी एवं पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापनों/सूचनाओं में इसका खूब प्रयोग हो रहा है । जहां कहीं मेट्रोहिंदी में थोड़ा-बहुत लेखन हो रहा है, वहां देवनागरी के साथ-साथ लैटिन लिपि भी इस्तेमाल हो रही है । मतलब यह है कि मेट्रोहिंदी हिंदी के वर्णों एवं लैटिन के अल्फावेट को मिलाकर प्राप्त लिपि को स्वीकार करने लगी है । मात्र देवनागरी इस मिश्रभाषा के लिए अपर्याप्त समझी जाएगी । आपको ऐसे नारे/कथन/विज्ञापन देखने को मिल जाएंगे:

(7) और अंत में सबसे अधिक अहम बात यह है कि इस भाषा का प्रयोक्ता देश को भूलवश भी ‘भारत’ नहीं कहता; अपनी बात कहने में वह ‘इंडिया’ का ही नाम लेता है । आने वाले समय में इस भाषा के माहौल में पल रहे बच्चे यदि भारत का मतलब पूछने लगें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा ।

अगली बार हिंदी के भविष्य पर अपनी राय । – योगेन्द्र जोशी

इस चिट्ठे की पिछली दो प्रविष्टियों, 22 जून तथा 3 जुलाई, में मैंने हिंदी एवं अंगरेजी के अमर्यादित मिश्रण से उत्पन्न ‘क्रिओल’ सदृश भाषा का जिक्र किया था जो तेजी से शहरी पढ़ेलिखे नागरिकों, विशेषतः छात्रों-युवाओं, के बोलचाल की आम भाषा बन रही है । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । मेरी नजर में यह तेजी से फैल रही है और ‘शिक्षित’ हिंदीभाषी भारतीय समाज में अपनी जड़ें जमा रही है । यहां मैं उन क्षेत्रों का किंचित् विस्तार से उल्लेख कर रहा हूं जहां इसका प्रयोग सामान्य बात बनती जा रही है ।

मेट्रोहिंदी का प्रयोग
मेट्रोहिंदी अभी लेखन की भाषा नहीं है । अंगरेजी शिक्षित महानगर-निवासी व्यक्ति बोलचाल में तो इसका इस्तेमाल बेझिझक करता है, किंतु लिखते समय पर्याप्त कोशिश करता है कि उसकी भाषा यथासंभव पारंपरिक हिंदी या हिंदुस्तानी पर आधारित हो । अर्थात् उसमें प्रचलित हिंदी लफ्जों का प्रयोग हो और व्याकरणीय शुद्धता कमोबेश बनी रहे । परंतु हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं का मेट्रोहिंदी से परहेज घटता जा रहा है । फलस्वरूप अब ऐसे लेख भी पढ़ने को मिलने लगे हैं जो हिंदी में लिखित नहीं माने जा सकते । उन्हें हिंदी का कोई भी विद्वान नहीं समझ सकता जब तक कि उसने अंगरेजी का भी पर्याप्त ज्ञान अर्जित न कर लिया हो । दैनिक वार्तापत्र ‘अमर उजाला’ के एक लेख का छोटा हिस्सा उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है:

इस उदाहरण का “ड्रेसेज में ज्यादा कट्स, सिलुएट्स व फ्रील यूज ना करें” वाक्य किस हद तक हिंदी है यह आप खुद ही तय करें ।

मेट्रोहिंदी के लक्षण
मेरी नजर में मेट्रोहिंदी की खासियतें क्या हैं इनकी संक्षिप्त चर्चा मैं आगे कर रहा हूं । इस विषय की समीक्षा अभी मैंने गहराई से नहीं की है । चलते-चलाते मुझे जो सूझ पाया है वही मैं कहने जा रहा हूं ।

(1) मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के कौन-से और कितने शब्द इस्तेमाल होने चाहिए इसका कोई नियम नहीं है ।
(2) इसमें अंगरेजी पदबंध (फ्रेज) भी धड़ल्ले से प्रयोग में लिए जा सकते हैं ।
(3) अंगरेजी के शब्दों के साथ ‘करना’, ‘सकना’, ‘होना’ के प्रयोग से इच्छित क्रियापद बनाए जाते हैं ।
(4) अंगरेजी के संयोजकों (कनेक्टिव) एवं क्रियाविशेषणों (एड्वर्व) के इस्तेमाल में कोई रोक नहीं रहती ।
(5) मेट्रोहिंदी की लिपि में भी लचीलापन देखने को मिल रहा है । आम तौर पर आप आप देवनागरी में लिखते हैं, किंतु चाहें तो सुविधानुसार रोमन लिपि भी यहां-वहां प्रयोग में ले सकते हैं ।

बानगी
नीचे के उदाहरण पर गौर करें:

प्रदर्शित पदबंध/वाक्यांश अपने हिंदी अखबार से चुने हैं मैंने । इसे हिंदी कहें या अंगरेजी ? दूसरा उदाहरण एक विज्ञापन का है:

साफ जाहिर है कि इनमें क्या कहा गया है इसे समझने के लिए हिंदी तथा अंगरेजी, दोनों, की जानकारी पाठक को होनी चाहिए । अंगरेजी न जानने वालों के समझ से परे हैं यह मेट्रोहिंदी ।

अगली पोस्ट में उपर्युक्त ‘खासियतों’ पर तनिक और प्रकाश डालते हुए हिंदी के उज्ज्वल/अंधकारमय भविष्य पर मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

मेट्रोहिंदी

इस चिट्ठे की पिछली पोस्ट (22 जून) में हिंदी-अंगरेजी की एक मिश्रित भाषा की चर्चा आंरभ की गई है, जिसे मैं मेट्रोहिंदी कहता हूं । यह हमारे महानगरों में निरंतर विस्तार एवं लोकप्रियता पा रही भाषा है, जिसमें अंगरेजी के मिश्रण की मर्यादा क्या हो इस सवाल का कोई महत्त्व ही नहीं है । हिंदी में अंगरेजी का मिश्रण वक्ता की सुविधा और उसके हिंदी-अंगरेजी ज्ञान पर निर्भर करता है । इस वर्णसंकर भाषा को मैं नितांत नूतन भाषा के रूप में देखता हूं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी से मिलती-जुलती होने के बावजूद उर्दू अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है । कौन हैं जो मेट्रोहिंदी उपयोग में ले रहे हैं इसका उत्तर देने से पहले किस तरह के बोल हमें टेलीविजन चैनलों या अन्य अनेक मंचों पर अक्सर सुनने को मिलते हैं इनके दृष्टांत प्रस्तुत करता हूं:

(1) चिड़ियाघर में मां बेटे सेः “ये टाइगर नहीं, लेपर्ड है । डौन्च्यू रेमेंबर कि टाइगर के डार्क स्ट्राइप्स होती हैं, न कि डार्क स्पॉट्स ।”
(2) दो पर्यटकों के बीच संवादः “एक्सक्यूज मी, इस कैमरे से मेरा स्नैपशॉट ले देंगे?” … “या, श्युअर ।” … “थैंक्यू इंडीड ।”
(3) टीवी विज्ञापनः “… ये क्रीम रखे आपकी स्किन सॉफ्ट, स्मूथ, और फेअर ।”
(4) सिने-अभिनेताः “फिल्म में परफॉर्म करना चैलेंजिंग एंड एंजॉयेबल् टास्क था । मुझे एक रेबेलियन का रोल प्ले करना था जो … ।”
(5) नृत्य प्रतिस्पर्धा निर्णायकः “एक्सेलेंट परफॉर्मेन्स! आप दोनों के डांस मूवमेंट्स का सिंक्रोनाइजेशन काबिलेतारीफ था ।”
(6) ओलंपिक टीम प्रबंधकः “… इंडिया की परफॉर्मेन्स अच्छी रहेगी । वेटलिफ्टिंग, रैसलिंग, एंड बॉक्सिंग में हमारे प्लेयर्स जरूर मेडल जीतेंगे ।”
(7) समाचार वाचकः “… पीएम ने कहा कि हम अपने नेबरिंग कंट्रीज के साथ कॉर्डियल रिलेशन्स चाहते हैं । इसके लिए डिप्लोमैटिक लेवल पर जरूरी स्टेप्स लिए जा रहे हैं ।”
(8) टीवी समाचारः “… हाइवे पर पिल्ग्रिम्स से भरी बस का सीरियस एक्सिडेंट हो गया है । पंद्रह पैसें जर्स के डेथ की ऑफिशियल रिपोर्ट मिली है । सीरियस्ली इंज्यर्ड को पास के हॉस्पिटल्स में एड्मिट कराया गया है; शेष को फर्स्ट एड के बाद छोड़ दिया गया है ।”

मेट्रोहिंदीः अंगरेजी मोह से जन्मी भाषा

मेट्रोहिंदी ऐसी भाषा है जिसे आम हिंदीभाषी नहीं समझ सकता है, क्योंकि इसमें अंगरेजी के तमाम ऐसे शब्द शामिल रहते हैं जिनका ज्ञान उसे हो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है । उसकी बातें आम हिंदीभाषी समझ भी पा रहा है या नहीं इस बात से मेट्रोहिंदी बोलने वाले को कोई सरोकार नहीं रहता है । उसके अपने वर्ग के लोग बातें समझ ले रहे होंगे यही पर्याप्त माना जाता है ।

वास्तव में यह उन लोगों की भाषा है जिन्हें प्राथमिक दर्जे की हिंदी आती है और जिनका अंगरेजी ज्ञान हिंदी की तुलना में बेहतर होता है । अपनी हिंदी को अधिक समृद्ध करने का विचार उन लोगों के मन में उपजता ही नहीं । हिंदी का उनकी शब्दसंग्रह या तो अपर्याप्त होती है या अभ्यास के अभाव के कारण उसके मुख से सही मौके पर सही शब्द निकल ही नहीं पाते हैं । इसके विपरीत अंगरेजी आधारित शिक्षा एवं व्यावसायिक कारणों से वह अंगरेजी के निरंतर अभ्यास का आदी होता है । भले ही वह धाराप्रवाह अंगरेजी न बोल पाता हो, अंगरेजी के शब्दों का मौके-बेमौके उसके मुख से निकलना थमता नहीं है ।

“गरीब की लुगाई सबकी भौजाई”

हिंदी के मामले में “गरीब की लुगाई सबकी भौजाई” की लोकोक्ति सटीक बैठती है । अपने समाज में ऐसे लोगों की अच्छीखासी संख्या है जिनका अंगरेजी के प्रति लगाव अद्वितीय है । उनकी धारणा है कि हिंदी में अंगरेजी के शब्दों को जहां-तहां ठूंस देना किसी भी हाल में अनुचित नहीं है । खुद हिंदी के तथाकथित पक्षधर भी यह कहते देखे जाते हैं कि ऐसा करने से हिंदी समृद्ध होती है । किंतु जब बात अंगरेजी की होती है तो ये ही लोग उसकी शुद्धता के प्रति सचेत रहते हैं । क्या मजाल कि हिंदी का एक शब्द भी भूल से उनकी अंगरेजी में सुनने को मिल जाए । आप किसी को यों बोलते हुए कभी – जी हां कभी भी, सपने में ही सही – सुन सकते हैं:
“द पीएम सेड, ‘वी वुड लाइक टु हैव मैत्रीपूर्ण संबंध विद अवर पड़ोसी कंट्रीज ।’”

अपने देश में अंगरेजी महज एक ‘और’ भाषा नहीं है, जैसे दुनिया की तमाम भाषाएं होती हैं । अंगरेजी को तो देश की प्रगति एवं उन्नति का मंत्र और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार समझा जाता है । इसलिए देशज भाषाओं में पूरे गर्व के साथ इसका ‘तड़का लगाने’ की एक प्रथा अपने समाज में चल चुकी है । इसी ‘तड़के’ का फल है अपनी मेट्रोहिंदी ।

मेट्रोहिंदी के उपयोक्ता यानी ‘यूजर्स’

हिंदीभाषी क्षेत्र में कौन उर्दू बोलता है और कौन नहीं यह कह पाना कठिन है । उर्दूभाषी होने का दावा करने वाले भी मीरजा गालिब की उर्दू समझ ही लेंगे जरूरी नहीं है । अरबी-फारसी के अल्फाज कुछ ज्यादा ही हों और ‘जहां का नूर’ न कहकर ‘नूर-ए-जहां’ जैसे पदबंध इस्तेमाल हों तो उर्दू हो गयी । ठीक इसी प्रकार हिंदी में अंगरेजी ठूंसते जाइए, ‘एंड’, ‘इवन’, ‘ऑलरेडी’ जैसे अव्ययों का मुक्त हृदय से प्रयोग करिए तो हो गयी मेट्रोहिंदी । मोटे तौर पर कहूं तो ये लोग मेट्रोहिंदी बोलते हैं:

(1) ‘इंग्लिश-स्कूलों’ में शिक्षित – विद्यालयों जिनकी शिक्षा ‘इंग्लिश-मीडिया’ विद्यालयों में होती है, जहां अंगरेजी सीखने और उसीका शब्दसंग्रह बढ़ाने पर पूरा जोर रहता है । छात्रों के मन में यह भावना बिठा दी जाती है कि कामचलाऊ हिंदी पर्याप्त है ।

(2) अंगरेजी के व्यावसायिक प्रयोग वाले – अपने देश में लगभग सभी व्यावसायिक कार्य अंगरेजी में ही संपन्न होते हैं । इस कार्य के दौरान कर्मचारी अंगरेजी का ही अभ्यास पाते हैं । यही अंगरेजी उनके परस्पर बातचीत में घुस जाती है । वैज्ञानिक, चिकित्सक, अर्थशास्त्री, कानूनविद्, आदि सभी इस वर्ग में आते हैं ।

(3) अंगरेजी से प्रतिष्ठा के इच्छुक – अपने समाज में अंगरेजी प्रतिष्ठा की निशानी है । जिसे अंगरेजी आती है वह अंगरेजी शब्दों के माध्यम से अपना रुतबा कायम करना जरूरी समझता है । आम धारणा है कि अंगरेजी बोलने वाले को तवज्जू दी जाती है ।

(4) भाषाई हीनभावना से ग्रस्त – यही प्रतिष्ठा है जो अंगरेजी कम या नहीं जानने वालों की हीन भावना के रूप में दिखाई देती है । वे अपना अंगरेजी ज्ञान सुधारने की कोशिश के साथ-साथ मौके-बेमौके हिंदी में अंगरेजी ठूंसना जरूरी समझने लगते हैं । – योगेन्द्र जोशी

‘इंडिया दैट इज भारत’ क्या वास्तव में स्वतंत्र हो पाया है ? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर मैं ‘नहीं’ में पाता हूं । मेरी दृष्टि में अंग्रेजों द्वारा भारतीय राजनेताओं के हाथों में सत्ता का राजनैतिक हस्तांतरण कर दिये जाने की व्याख्या पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में नहीं की जा सकती है । स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत तत्कालीन राजनेताओं ने आशा की थी कि राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद कालांतर में यह देश अंग्रेजी एवं अंग्रेजियत से भी मुक्त हो जाएगा । परंतु ऐसा हो नहीं पाया ।

आज स्थिति यह है कि अंग्रेजी एवं अंग्रेजियत ने इस देश को पूरी तरह कब्जे में ले लिया है । मैं यहां पर अंग्रेजी के हिंदी पर पड़ रहे कुप्रभाव की बात कर रहा हूं । यों तो अंग्रेजी ने सभी भारतीय भाषाओं को विकृत कर डाला है, किंतु मेरी बात हिंदी तक सीमित रहेगी । इस देश में महानगरों में संपन्न, अंग्रेजी-शिक्षित एक ऐसा वर्ग उभर रहा है, जो स्वयं को हिंदीभाषी बताता है, किंतु जिसे हिंदी में वास्तविक रुचि रह नहीं गयी है । यह ऐसा वर्ग है जो हिंदी को अपनी मातृभाषा घोषित करता है, किंतु साफ-सुथरी हिंदी न तो बोल सकता है और न लिख सकता है । वह ऐसी भाषा बोलने लगा है जो हरगिज हिंदी नहीं कही जा सकती है । इस भाषा को हिंग्लिश कहना भी उचित नहीं होगा । इसे मैं ‘मेट्रोहिंदी’ अथवा ‘एचईमिक्स’ कहना चाहूंगा ।

मेट्रोहिंदी

इसका ‘मेट्रोहिंदी’ नामकरण मैं इसलिए करता हूं, क्योंकि यह मुख्यतया महानगरों, ‘मेट्रोसिटीज्’, के शिक्षित एवं संपन्न लोगों द्वारा प्रयोग में ली जा रही है । इसका प्रभावक्षेत्र निरंतर बढ़ रहा है । इसकी पहुंच छोटे शहरों से होते हुए कस्बों-गांवों तक के शिक्षित लोगों तक हो रही है । इस भाषा की खासियत यह है कि इसकी शब्दसंपदा में कितने अंग्रेजी शब्दों को शामिल किया जाएगा इस पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है । अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग वक्ता के अंग्रेजी ज्ञान एवं उसकी सुविधा पर निर्भर करता है । यहां तक कि उसका व्याकरणीय ढांचा भी आवश्यकतानुसार तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है और अंग्रेजी व्याकरण के अनुरूप ढाला जा सकता है । इस भाषा में अंग्रेजी के पदबंध (फ्रेज), वाक्यांश, एवं कभी-कभी पूरे वाक्य स्वीकार्य रहते हैं । इसी अर्थ में मेट्रोहिंदी को मैं विकल्पतः ‘एचईमिक्स’ भी कहता हूं, एचईमिक्स अर्थात् ‘हिंदी-इंग्लिश-मिक्स्चर’ । मैं इस भाषा को हिंग्लिश नहीं मानता, क्योंकि इसमें अंग्रेजी के शब्दों की ही बहुतायत नहीं है, बल्कि उसके आगे बहुत कुछ – जी हां बहुत कुछ – और भी है ।

मेट्रोहिंदी अभी औपचारिक रूप से स्थापित भाषा नहीं है । इसका अस्तित्व तो है, किंतु ऐसा लगता है कि अभी भाषाविदों ने इसका अध्ययन पारंपरिक हिंदी से भिन्न स्वयं में एक नई भाषा के तौर पर करने का प्रयास नहीं किया है । कदाचित् सभी भारतीय इसे हिंदी की ही आधुनिक बोली मानकर चलते हों । लेकिन मैं ऐसा नहीं समझता । हिंदी से मिलती-जुलती होने के बावजूद उर्दू एक अलग भाषा कही जाती है । ठीक वैसे ही मेट्रोहिंदी को हिंदी से मिलती-जुलती लेकिन उससे अलहदा भाषा माना जाना चाहिए ।

एक बानगी

मेट्रोहिंदी की क्या खासियत है और इसके उपयोक्ता कौन हैं इन पर अपना मत व्यक्त करने से पहले में एक बानगी पेश करता हूं । आजकल ब्राजील के दूसरे सबसे बड़े शहर रिओ द जनेरो (Rio de Janeiro) में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर विभिन्न राष्ट्रों के प्रतिनिधियों की बैठक चल रही है । निम्नलिखित अनुच्छेद मैंने New Scientist पत्रिका के वेबसाइट पर उक्त बैठक से संबंधित रपट (18 June 2012) से उद्धृत किया है । अंग्रेजी में इसका मूल पाठ यों है:

“The Earth Summit in this week is not looking promising. The conference will be devoid of the world leaders who attended its predecessor, 20 years ago. And there are no headline-grabbing treaties to sign. Its final declaration will not be binding to anyone. The main outcome will probably be to launch a set of “sustainable development goals” on issues like protecting forests, fisheries and water supplies.”

हिंदी संवाददाता, विषय-समीक्षक, अथवा प्रशासनिक प्रवक्ता, जो अंग्रेजी में ही कार्य करने का आदी हो चुका हो और जिसे साफसुथरी हिंदी के प्रयोग का अभ्यास ही न रह गया हो, उक्त अनुच्छेद को अंग्रेजीकृत ‘हिंदी’ (अर्थात् मेट्रोहिंदी) में कुछ यों प्रस्तुत करेगा:

“रिओ द जनेरो में चल रही इस वीक की अर्थ समिट प्रोमिसिंग नहीं लग रही है । इस कॉंफरेंस में उन वर्ल्ड लीडर्स की कमी रहेगी जिन्होंने 20 साल पहले इसका प्रिडिसेसर अटेंड किया था । और इसमें हेडलाइनलाइन-ग्रैबिंग ट्रीटीज साइन करने के लिए नहीं हैं । इसका फाइनल डिक्लेरेशन किसी के लिए बाइंडिंग नहीं होगा । संभवतः इसका मेन आउटकम फॉरेस्ट, फिशरीज्, एंड वाटर सप्लाइज् के प्रोटेक्शन के इश्यूज् पर “सस्टेनेबल् डिवेलपमेंट गोल्ज” पेश करना रहेगा ।”
(ध्यान दें कि अपने निजी टीवी चैनलों पर हिंदी समाचार प्रस्तुति कुछ ऐसी ही रहती है!)

यह हिंदी नहीं है । उसमें मौजूद अंग्रेजी शब्दों की अवांछित भरमार इसे उस व्यक्ति की समझ से बाहर कर देती है, जिसका अंग्रेजी ज्ञान पर्याप्त न हो । जो लोग अंग्रेजी के उक्त प्रकार के शब्द निर्लज्जता के साथ प्रयोग में लेते हैं उन्हें इस बात की परवाह नहीं रहती है कि ऐसी वैचारिक प्रस्तुति आम हिंदीभाषी की समझ से परे होगी । वह यह मानता है हर हिंदीभाषी को अंग्रेजी ज्ञान तो होना ही चाहिए । इसके विपरीत वह यह हरगिज नहीं मानता कि जब वह हिंदी बोलता है तब वह वास्तव में हिंदी ही बोले । अन्यथा हिंदी बोलने का नाटक न करके अंग्रेजी में बोले ।

जैसे अंग्रेजी समाचारों में आप हिंदी शब्दों को मनमरजी से नहीं ठूंसते, वैसे ही हिंदी समाचारों में अंग्रेजी शब्द महज इसलिए नहीं ठूंसे जा सकते हैं क्योंकि आपको हिंदी शब्द नहीं सूझते । इस तर्क को ध्यान में रखते हुए उक्त अनुच्छेद साफसुथरी हिंदी में कुछ ऐसे प्रस्तुत होना चाहिए:

“रिओ द जनेरो में चल रही इस सप्ताह का पृथ्वी सम्मेलन सफल होते नहीं लग रहा है । इस सम्मेलन में विश्व के उन नेताओं की कमी रहेगी, जिन्होंने 20 साल पहले इसके पूर्ववर्ती में भाग लिया था । और इसमें हस्ताक्षर करने के लिए समाचार-शीर्षक बनने योग्य समझौते भी नहीं हैं । इसका अंतिम घोषणापत्र किसी के लिए बाध्य नहीं होगा । संभवतः इसका मुख्य प्रतिफल वन, मत्स्यक्षेत्र, एवं जलापूर्ति के संरक्षण के मुद्दों पर “विकास के चिरस्थाई लक्ष्य” पेश करना रहेगा ।” (यह मेरा अनुवाद है; कदाचित् इससे बेहतर अनुवाद संभव हो ।)

मेट्रोहिंदी की वे खासियतें जो इसे आम हिंदी से अलहदा बनाती हैं, और वे कौन हैं जो इसे प्रयोग में ले रहे हैं इन बातों की चर्चा इस चिट्ठे की अगली प्रविष्टि में किया जाएगा । – योगेन्द्र जोशी