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एक प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास मैं अरसे से करता आ रहा हूं कि किसी भाषा में अन्य भाषाओं, विशेषतः विदेशी भाषाओं, के शब्द किस सीमा तक ठूंसे जाने चाहिए और किन परिस्थितियों में । क्या इतर भाषाओं के शब्दों का प्रयोग इस सीमा तक किया जाना चाहिए कि उनसे अपनी भाषा के प्रचलित शब्द विस्थापित होने लगें ? क्या इस तथ्य को भूला देना चाहिए कि जब कोई शब्द लोगों की जुबान पर छा जाए तो उसके तुल्य अन्य शब्द अपरिचित-से लगने लगेंगे ? क्या समय के साथ वे आम भाषा से गायब नहीं हो जाएंगे ? जो लोग अपनी मातृभाषा तथा अन्य सीखी गई भाषाओं की शब्द-संपदा में रुचि रखते हैं उनकी बात छोड़ दें । वे तो उन शब्दों का भी प्रयोग बखूबी कर सकते हैं जिन्हें अन्य जन समझ ही न पाएं । मैं हिन्दी के संदर्भ में बात कर रहा हूं । ऐसे अवसरों पर लोग अक्सर कहते हैं “जनाब, कठिन संस्कृत शब्द मत इस्तेमाल कीजिए ।” (भले ही वह संस्कृत मूल का शब्द ही न हो ।)

अंगेरजी को लेकर हम भारतीय हीनभावना से ग्रस्त हैं । अगर कोई संभ्रांत व्यक्ति लोगों के बीच अंगरेजी का उपयुक्त शब्द बोल पाने में असमर्थ हो तो वह स्वयं को हीन समझने लगता है और सोचता है “काश कि मेरी अंगरेजी भी इनके जैसी प्रभावी होती ।” इसके विपरीत स्वयं को हिन्दीभाषी कहने वाला कोई व्यक्ति साफसुथरी हिन्दी (मेरा मतलब है जिसमें हिन्दी प्रचलित शब्द हों और अंगरेजी शब्दों का अनावश्यक प्रयोग न हो) न बोल सके तो वह अपनी कमजोर हिन्दी के लिए शर्मिदा नहीं होगा, बल्कि तर्क-कुतर्कों का सहारा लेकर अपनी कमजोर हिन्दी को उचित ठहराएगा । इतना ही नहीं वह बातचीत में ऐसे अंगरेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करेगा जिनका अर्थ अधिसंख्य लोग न समझ पाते हों । वह इसकी परवाह नहीं करेगा कि दूसरों की अंगरेजी अच्छी हो यह आवश्यक नहीं । वह सोचेगा, भले ही मुख से न कहे, कि लोगों को इतनी भी अंगरेजी नही आती । हिन्दी न आए तो चलेगा, अंगरेजी तो आनी ही चाहिए । वाह !

अधिकांश पढ़ेलिखे, प्रमुखतया शहरी, हिन्दीभाषियों के मुख से अब ऐसी भाषा सुनने को मिलती है जिसे मैं हिन्दी मानने को तैयार नहीं । यह एक ऐसी वर्णसंकर भाषा या मिश्रभाषा है जिसे अंगरेजी जानने लेकिन हिन्दी न जानने वाला स्वाभाविक तौर पर नहीं समझ पाएगा । किंतु उसे वह व्यक्ति भी नहीं समझ सकता जो हिन्दी का तो प्रकांड विद्वान हो पर जिसने अंगरेजी न सीखी हो । इस भाषा को मैंने अन्यत्र मैट्रोहिन्दी नाम दिया है । बोलचाल की हिन्दी तो विकृत हो ही चुकी है, किंतु अब लगता है कि अंगरेजी शब्द साहित्यिक लेखन में भी स्थान पाने लगे हैं । अवश्य ही लेखकों का एक वर्ग कालांतर में तैयार हो जाएगा जो इस ‘नवशैली’ का पक्षधर होगा । आगे कुछ कहने से पहले मैं एक दृष्टांत पेश करता हूं जिसने मुझे अपने ब्लाग (चिट्ठे) में यह सब लिखने को प्रेरित किया है ।

‘साहित्यशिल्पी’ नाम की एक ‘ई-पत्रिका’ से मुझे उसमें शामिल रचनाएं बीच-बीच में ई-मेल से प्राप्त होती रहती हंै । उसकी हालिया एक रचना का ई-पता यानी ‘यूआरएल’ ये हैः

http://www.sahityashilpi.com/2015/07/igo-story-sumantyagi.html

उक्त रचना एक कहानी है जिसका शीर्षक है ‘ईगो’ । यह अंगरेजी शब्द है जिसका अर्थ है ‘अहम्’ जिसे ठीक-ठीक कितने लोग समझते होंगे यह मैं कह नहीं सकता । इस रचना में हिन्दी के सुप्रचलित शब्दों के बदले अंगरेजी के शब्दों का प्रयोग मुझे ‘जमा’ नहीं, इसीलिए टिप्पणी कर रहा हूं । प्रथमतः यह स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई साहित्यिक समीक्षक या समालोचक नहीं हूं बल्कि एक वैज्ञानिक हूं । मैं किसी भी भाषा के सुप्रतिष्ठित शब्दों के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग का विरोधी हूं । इसीलिए तद्विषयक अपनी बात कह रहा हूं ।

उक्त कहानी के शुरुआती परिच्छेद में अंगरेजी शब्द नहीं दिखे मुझे, किंतु “मिस्टर शर्मा” और “मिसेज शर्मा” का उल्लेख हुआ है । आजकल औपचारिक संबोधन के समय कई लोग मिस्टर, मिसेज, मिज आदि का प्रयोग करने लगे हैं । क्या हिन्दी के तुल्य शब्दों का प्रयोग कठिन है ? अथवा हम इस भावना से ग्रस्त रहते हैं कि अंगरेज जो हमें दे गए हैं उसे वरीयता दी जानी चाहिए ? अस्तु । मैं कहानी के पाठ से चुने गए उन वाक्यों/वाक्यांशों/पदबंधों को उद्धृत कर रहा हूं जिनमें विद्यमान अंगरेजी शब्द मुझे अनावश्यक या अटपटे लगते हैं:

“तेरे हेल्प करने से” … “और बैकग्राउंड में” … “मम्मी का म्यूजिक जारी” … “अपनी फैमिली को” … “शर्मा फैमिली को”  … “दोनों काफी टाइम चैटरबॉक्स बनी रहती” …”पर्सनल बातें शेयर करती” … “वो स्टडी से रिलेटेड हों या फैमिली से” … “कुछ भी स्पेशल हो” … “दोनों का चैट ऑप्सन हमेशा ऑन रहता” … “ननद-भाभी न हों बेस्ट फ्रेंड्स हों” … “अपनी जॉब के लिए” … “अपनी स्टडी कंपलीट करने” … “जिंदगी में कोई टिवस्ट न हो” … “ऋचा और टीना की लाइफ रील लाइफ न होकर रियल लाइफ थी” … “फोन डिसकनेक्ट कर दिया” … “पूरी फैमिली को दहेज के लिए ब्लेम कर दिया” … “जिसका परपज” … “एक नॉर्मल बात” … “फ्रेंडशिप का कोई महत्व नहीं” … “एक लविंग और केयरिंग फ्रेंड की तरह” … “हमारा रिलेशन स्पेशल हो” … “उनको इग्नोर करने” … “जरा भी अंडरस्टैंडिंग नहीं थी” … “इतनी ही थी उनकी फ्रेंडशिप” … “सॉरी कह चुकी थी” … “फ्रेंडशिप की खुशबू” … “ऋचा स्टडी कंप्लीट करके” … “काम में बिजी रखती” …”जितनी भी ड्यूटीज होती” … “मैसेज किये थे” … “आई मिस यू” … “उसके ईगो ने” … “मेरा ईगो था” … “ऐसा ईगो जाये भाड़ में जो एक फ्रेंड को फ्रेंड से दूर कर दे” … “दिल से सॉरी ,प्लीज मुझे माफ कर दो” … “बोली,´कम´।” … “कोई ईगो प्रॉब्लम नहीं” … 

          उपरिलिखित अनुच्छेद में जो अंगरेजी शब्द मौजूद हैं उनमें से एक या दो को छोड़कर शायद ही कोई हो जिसके लिए सुपरिचित एवं आम तौर पर प्रचलित हिन्दी का तुल्य शब्द न हो । उदाहरणार्थ परिवार, दोस्त/मित्र, दोस्ती/मित्रता, सामान्य/आम, विशेष/खास, एवं समस्या आदि हिन्दी शब्दों के बदले क्रमशः फैमिली, फ्रैंड, फैंडशिप, नॉर्मल, स्पेशल एवं प्रॉब्लम आदि का प्रयोग क्यों किया गया है ? क्या हिन्दीभाषी लोगों की अभिव्यक्ति की विधा से हिन्दी के सदा से प्रचलित शब्द गायब होते जा रहे हैं ? क्या हम “फोन डिसकनेक्ट कर दिया” के बदले “फोन काट दिया”, “फोन रख दिया”, या “फोन बंद कर दिया”जैसे वाक्य प्रयोग में नहीं ले सकते ? थोड़ा प्रयास करने पर उक्त अनुच्छेद के अन्य अंगरेजी शब्दों/पदबंधों/वाक्यांशों के लिए भी तुल्य हिन्दी मिल सकती है ।

आज के अंगरेजी-शिक्षित शहरी हिन्दीभाषियों के बोलचाल एवं लेखन (अभी लेखन कम प्रभावित है) में हिन्दी के बदले अंगरेजी शब्दों की भरमार पर विचार करता हूं तो मुझे अधोलिखित संभावनाएं नजर आती हैं:

(1) पहली संभावना तो यह है कि व्यक्ति हिन्दीमय परिवेश में न रहता आया हो और उसके कारण उसकी हिन्दी-शब्दसंपदा अपर्याप्त हो । हिन्दी-भाषी क्षेत्रों के लेखकों (और उनमें प्रसंगगत कहानी की लेखिका शामिल हैं) पर यह बात लागू नहीं होती होगी ऐसा मेरा अनुमान है ।

(2) दूसरी संभावना है असावधानी अथवा एक प्रकार का उपेक्षाभाव जिसके तहत व्यक्ति इस बात की चिंता न करे कि उसकी अंगरेजी-मिश्रित भाषा दूसरों के समझ में आएगी या नहीं और दूसरे उसे पसंद करेंगे या नहीं । भारतीय समाज में ऐसी लापरवाही मौके-बेमौके देखने को मिलती है, जैसे सड़क पर थूक देना, जहां-तहां वाहन खड़ा कर देना, शादी-ब्याह के मौकों पर सड़कों पर जाम लगा देना, धार्मिक कार्यक्रमों पर लाउडस्पीकरों का बेजा प्रयोग करना, इत्यादि । भाषा को विकृत करने में भी यही उपेक्षाभाव दिखता है।

(3) हमारे देश में व्यावसायिक, वाणिज्यिक एवं शासकीय क्षेत्रों में अंगरेजी छाई हुई है । इसी अंगरेजीमय वातावरण में सभी रह रहे हैं । लोगों को चाहे-अनचाहे अंगरेजी शब्दों का सामना पग-पग पर करना पड़ता है । ऐसे माहौल में कई जनों की स्थिति वैसी हो जाती है जैसी वाराणसी के हिन्दीभाषी मल्लाहों और रिक्शा वालों की, जिनकी जबान पर विदेशी एवं अहिन्दी क्षेत्रों के पर्यटकों के संपर्क के कारण अंगरेजी तथा अन्य भाषाओं के शब्द तैरने लगते हैं । ऐसे माहौल में जिसे अंगरेजी ज्ञान न हो उसे भी अंगरेजी के शब्द स्वाभाविक-परिचित लगने लगते हैं । मुझे यह देखकर खेद होता है कि बोलचाल में लोगों के मुख से अब अंगरेजी शब्द सहज रूप से निकलते हैं न कि हिन्दी के । फिर भी लेखन के समय सोच-समझकर उपयुक्त या वैकल्पिक शब्द चुने जा सकते हैं बशर्ते कि लेखक दिलचस्पी ले ।

(4) कुछ लोगों के मुख से मुझे यह तर्क भी सुनने को मिलता है कि भाषाओं को लेकर संकीर्णता नहीं बरती जानी चाहिए, बल्कि पूरी उदारता के साथ अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहणकर अपनी भाषा को अधिक समर्थ एवं व्यवहार्य बनाना चाहिए । ठीक है, परंतु सवाल उठता है कौन-से शब्द एवं किस भाषा से ? क्या अंगरेजी ही अकेली वह भाषा है जिससे शब्द उधार लेने चाहिए ? और क्या शब्दों का आयात उन शब्दों को विस्थापित करने के लिए किया जाए जिन्हें आज तक सभी जन रोजमर्रा की जिन्दगी में इस्तेमाल करते आए हैं ? क्या यह जरूरी है कि हम एक-दो-तीन के बदले वन-ट्वू-थ्री बोलें ? क्या लाल-पीला-हरा के स्थान पर  रेड-येलो-ग्रीन कहना जरूरी है ? क्या मां-बाप, पति-पत्नी न कहकर पेरेंट्स, हजबैंड-वाइफ कहना उचित है ? क्या हम बच्चों को आंख-नाक-कान भुलाकर आई-नोज-इअर ही सिखाएं ? ऐसे अनेकों शब्द हैं जिन्हें हम भुलाने पर तुले हैं । आज कई बच्चे अड़सठ-उनहत्तर, कत्थई, यकृत जैसे शब्दों के अर्थ नहीं बता सकते हैं । जाहिर है कि आज के प्रचलित शब्द कल अनजाने लगने लगेंगे ।

          हिन्दी को अधिक समर्थ बनाने के नाम पर अंगरेजी के शब्दों को अनेक हिन्दीभाषी बोलचाल में अंधाधुंध तरीके से इस्तेमाल करते आ रहे हैं । वे क्या देशज भाषाओ के शब्दों को भी उतनी ही उदारता से स्वीकार कर रहे हैं ? क्या भारत में प्रचलित अंगरेजी में हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के शब्दों को प्रयोग में लेने का प्रयास कभी किसी ने किया है ? हिन्दीभाषी आदमी “प्लीज मुझे अपनी हिन्दी ग्रामर बुक देना ।” के सदृश वाक्य धड़ल्ले से बोल देता है, परंतु क्या “कृपया गिव मी योअर हिन्दी व्याकरण पुस्तक ।” जैसा वाक्य बोलने की हिम्मत कर सकता है ? हरगिज नहीं । हम भारतीय अंगरेजी की शुद्धता बरकरार रखने के प्रति बेहद सचेत रहते हैं, किंतु अपनी भाषाओं को वर्णसंकरित या विकृत करने में तनिक भी नहीं हिचकते ।

अंगरेजों ने अपनी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द स्वीकार  किए हैं, किंतु अमर्यादित तरीके से नहीं कि वे अपने चिरपरिचित शब्दों को भुला बैठें । इस देश पर करीब 200 वर्ष शासक रूप से रहे किंतु उन्होंने अंगरेजी को हिन्दीमय नहीं कर दिया । कुछ चुने हुए शब्दों की बानगी देखिए:

Avatar (अवतार), Bungalow (बंगला) Cheetah (चीता), Chutney (चटनी), Dacoit (डाकू), Guru (गुरु), Jungle (जंगल), Khaki (खाकी), Loot (लूट), Mantra (मंत्र), Moksha (मोक्ष), Nirvana (निर्वाण), Pundit (पंडित), Pyjamas (पैजामा), Raita (रायता), Roti (रोटी), Thug (ठग), Typhoon (तूफ़ान), Yoga (योग)

इनमें अधिकांश शब्द वे हैं जिनके सटीक तुल्य शब्द अंगरेजी में रहे ही नहीं । मोक्ष, रोटी ऐसे ही शब्द हैं । सोचिए हम जैसे बट, एंड, आलरेडी प्रयोग में लेते हैं वैसे ही क्या वे किंतु, परंतु, और का प्रयोग करते हैं । नहीं न ? क्योंकि ऐसा करने की जरूरत उन्हें न्हीं रही । हमें भी जरूरत नहीं, पर आदत जब बिगड़ चुकी हो तो इलाज कहां है ?

शायद ही कोई देश होगा जिसके लोग रोजमर्रा के सामान्य शब्दों को अंगरेजी शब्दों से विस्थापित करने पर तुले हों ।

हिन्दी को समृद्ध बनाने की वकालत करने वालों से मेरा सवाल है कि क्या अंगरेजी में पारिवारिक रिश्तों को स्पष्टतः संबोधित करने के लिए शब्द हैं ? नहीं न । क्या चाचा, मामा आदि की अभिव्यक्ति के मामले में अंगरेजी कंगाल नहीं है ? क्या हमने हिन्दी के इन शब्दों को अंगरेजी में इस्तेमाल करके उसे समृद्ध किया है ? हिम्मत ही कहां हम भारतीयों में ! मैं नहीं जानता कि मामा-मौसा के संबोधनों को अंगरेजी में कैसे स्पष्ट किया जाता है । “मेरे मामाजी कल मौसाजी के घर जाएंगे ।”को अंगरेजी में कैसे कहा जाएगा ? सीधे के बजाय घुमाफिरा के कहना पडेगा ।

मेरा सवाल यह है कि हम भारतीय हीनग्रंथि से इतना ग्रस्त क्यों हैं कि हिन्दी में अंगरेजी ठूंसकर गर्वान्वित होते हैं और अंगरेजी बोलते  वक्त भूले-से भी कोई हिन्दी शब्द मुंह से निकल पड़े तो शर्मिंदगी महसूस करते हैं ? – योगेन्द्र जोशी

मुझे बीबीसी-डॉट-कॉम पर उपलब्ध एक आलेख पढ़ने को मिला । लेखक हैं अमिताव कुमार और लेख का शीर्षक है “जब हिंदी पुरानी एंबेसैडर कार हो जाए” । लेखक वर्षों से अमेरिका में रहते हैं, न्यू यॉर्क के पास हडसन नदी पर स्थित एक छोटे-से शहर में । शहर के नाम का उल्लेख नहीं है । अपनी मातृभाषा से दूर रहने पर उस भाषा के संपर्क में यदाकदा आने पर कैसा लगता है इस प्रकार की बातें लेखक ने बयां की है । कदाचित पाठकगण भी लेख को पढ़ना चाहें । इसी आशय से यहां उसका संदर्भ प्रस्तुत है:

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/05/140521_amitava_kumar_aa.shtml
– योगेन्द्र जोशी

Auroville - Globe

मैं दो-तीन माह पहले पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) घूमने निकला था । पुद्दुचेरी संघीय सरकार द्वारा शासित एक राज्य है, जिसके बारे में मुझे यह जानकारी नहीं थी कि यह वास्तव में दक्षिण भारत में स्थित चार अलग-अलग और छोटे-छोटे भूक्षेत्रों से बनी प्रशासनिक इकाई है, जिनमें पांडिचेरी (293 वर्ग किलोमीटर) नामक स्थान सबसे बड़ा और मुख्यतः शहरी क्षेत्र है । इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी है, अन्यथा यह लगभग चारों तरफ से तमिलनाडु से घिरा है । इस शहर के बाहर ग्रामीण क्षेत्र भी है । इसके अतिरिक्त दक्षिण की ओर कुछ दूरी पर तमिलनाडु से घिरा समुद्र तट स्थित ‘कराईकल’ (160 वर्ग कि.मी.) भी इसका हिस्सा है  । आंध्र के तटीय क्षेत्र में ‘यानम’ (30 वर्ग कि.लो.) और केरला तट पर ‘माहे’ (9 वर्ग कि.मी.) भी इसी राज्य के अंग हैं । ये सभी स्थान कभी फ्रांसीसी प्रभुत्व में होते थे । उसी के अनुरूप इन्हें मिलाकर एक अलग केंद्र शासित राज्य का दर्जा स्वतंत्र भारत में क्यों दिया गया यह मेरी समझ से परे है ।

पुद्दुचेरी यात्रा के विविध अनुभवों में मेरे लिए सबसे अहम रहा है वहां की भाषाई समस्या । यों तो दक्षिण भारत में हिंदी बहुत नहीं चलती है, फिर भी बड़े शहरों एवं पर्यटन स्थलों में हिंदी से अक्सर काम चल जाता है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही रहा है । यहां तक कि चेन्नई में भी आप भाषा को लेकर असहाय नहीं महसूस करेंगे । दक्षिण भारत की यात्राओें के दौरान हिंदी संबंधी अपने अनुभवों पर मैं पहले भी लिख चुका हूं । देखें 14 मई 2009 की तथा उससे पूर्ववर्ती पोस्टें । पुद्दुचेरी तमिलों का प्रदेश है तमिलनाडु की ही भांति । स्थानीय निवासियों का रहन-सहन, खानपान, जीवनशैली, भाषा आदि वैसा ही है जैसा तमिलों का अन्य स्थानों में है । फ्रांसीसियों का उपनिवेश रह चुकने के कारण वहां फ्रांसीसी भाषा-संस्कति का प्रभाव कुछ हद तक देखा जा सकता है । मेरी समझ से उसका कारण प्रमुखतया श्री ऑरोविंदो रहे हैं, जिन्होंने पुद्दुचेरी को अपनी कर्मभूमि चुना और वहीं अपना आश्रम स्थापित किया । श्री ऑरोविंदो फ्रांसीसी भाषा के ज्ञाता थे और फ्रांसीसियों से उनका घनिष्ठ संबंध रहा है, विशेषतः इसलिए कि आश्रम की ‘द मदर’ (मीरा अल्फासा? Mirra Alfassa) फ्रांस से आकर उनसे जुड़ गईं । श्री ऑरोविंदो के विदेशी शिष्यों में फ्रांसीसी लोग ही अधिकांशतः रहे हैं । आज भी उस आश्रम में आने वालों में फ्रांस के लोग ही सर्वाधिक रहते हैं, चाहे वे पर्यटक की हैसियत रखते हों या श्री ऑरोविंदो के अनुयायी होने की ।

पुद्दुचेरी में मुझे हिंदीभाषी अथवा उत्तरभारतीय नहीं दिखे । अवश्य ही उनकी संख्या नगण्य होगी, अतः मेरी नजर में नहीं आये होंगे । सरदार लोगों (सिखों) के बारे में कहा जाता है कि वे देश के हर कोने में मिल जाते हैं । मुझे याद नहीं आ रहा कि वहां किसी पगड़ीधारी सरदारजी को मैंने देखा हो । मारवाड़ी भी अक्सर सभी जगह मिल जाते हैं व्यापारिक गतिविधियों में संलग्न । वहां कहीं कोई रहा हो तो वह वहीं रचबस कर तमिलभाषी हो गया होगा । दक्षिण के अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोग शायद होंगे, किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं सकता ।

वहां कुल मिलाकर दो-तीन लोग मुझे मिले होंगे जो हिंदी/उर्दू बोलना-समझना कर पा रहे थे । एक व्यक्ति मिला था मुझे एक दुकान के बाहर । मैंने उससे अपने गंतव्य एक चौराहे के बारे में पूछा था, इशारों के साथ हिंदी शब्द बोलकर । उसने साफ हिंदी में जवाब दिया । मेरा अनुमान है कि वह नेपाली रहा होगा । एक और सज्जन मिले अन्यत्र जिनसे मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही । हुलिया से मुझे वे मुस्लिम वंधु लगे । मेरा ख्याल है कि दक्षिण के अधिकांश इस्लाम धर्मावलंबी उर्दू की थोड़ी-बहुत समझ रखते हैं ।

मुझे पुद्दुचेरी में भाषाई समस्या का जो अनुभव हुआ वह अन्य प्रमुख नगरों के अनुभव से कुछ भिन्न था । वहां हिंदी से ठीकठाक काम नहीं चल पाता है, और अंगरेजी भी अच्छा काम नहीं देती है । राह चलते मिलने वाले लोग अंगरेजी कम ही बोल पाते हैं ऐसा मुझे लगा । कुछ हद तक अंगरेजी उच्चारण भी एक समस्या रहती है; उनका उच्चारण उत्तरभारतीयों से भिन्न प्रतीत होता है । मैंने अनुभव किया कि पुद्दुचेरी का महत्व आम भारतीयों के लिए शायद नहीं है । वह कोई चर्चित तीर्थस्थल नहीं है और न ही विशेष आकर्षण का पर्यटक स्थल है । अरोविंदो दर्शन में रुचि लेने वाले ही कदाचित् वहां पहुंचते होंगे । इसलिए न हिंदी वहां पहुंच सकी और न ही वहां के बाशिंदों को अंगरेजी की खास जरूरत महसूस हुई होगी । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि तमिलनाडु की राजनीति आंरभ से ही हिंदी विरोध पर टिकी रही है । तमिलनाडु तथा पुद्दुचेरी की राजनीति में कोई अंतर नहीं है । इसके अलावा अंगरेजी सरकारी एवं व्यावयायिक कार्यालयों तक ही सीमित कर रह गई होगी । जब मैं वहां के पर्यटन कार्यालय गया तो अंगरेजी में बात करना भी सुविधाजनक नहीं लगा ।

हिेदीभाषी तथा अन्य उत्तरभारतीय पर्यटकों की संख्या अधिक न होने से वहां के आटोरिक्शा चालकों और फुटकर दुकानदारों को भी हिंदी की जरूरत नहीं शायद नहीं रहती है । इसलिए उनके साथ मैंने इशारों एवं अंगरेजी-हिंदी शब्दों की मदद से काम चलाया था । लेकिन इतना सब होने के बावजूद एक अनुभव दिलचस्प रहा । मैं पुद्दुचेरी शहर से 20-25 किलोमीटर दूर ऑरोविंदो आश्रम से संबद्ध ऑरोविंदो विलेज गया था । वहां के पर्यटक स्थलों में यही कदाचित् सबसे आकर्षक है । वहां मुझे विदेशी पर्यटकों के अलावा देश के अन्य भागों से आए पर्यटक भी मिले । वहां ऑरोविंदो ग्राम के उद्येश्य एवं कार्यक्रमों के बारे में एक कमरे में 10-15 मिनट का वीडियो दिखाया जाता है, जिसकी भाषा दर्शकों की इच्छानुसार तमिल, अंगरेजी अथवा हिंदी चुनी जाती है । जब मेरी मौजूदगी में वीडियो प्रदर्शित किया गया तब मैंने  पाया कि देश के विभिन्न भागों से आए संभ्रांत और सुशिक्षित-से लगने वाले दर्शकों ने अंगरेजी के बदले हिंदी को चुना । स्पष्ट है अधिकतर देशवासियों के लिए हिंदी अधिक सुविधाजनक सिद्ध होती है । उस घटना से यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अंगरेजी में प्रायः सभी लिखित कार्य करने के आदी होने के बावजूद अधिकतर देशवासी उसमें कही गई मौखिक बातें सरलता से नहीं समझ पाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

Pondichery - Ambedkar Mandapam

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इस चिट्ठे की पिछली चार प्रविष्टियों में (देखें तारीख 24 अगस्त 2012 की पोस्ट और उसमें उल्लिखित पूर्ववर्ती आलेखों को) मैंने हिंदी-अंगरेजी के मिश्रण से उपजी एक खिचड़ी भाषा की चर्चा की है, जो आज के महानगरों में अंगरेजी पढ़े-लिखे लोगों द्वारा बोली जा रही है । इसे मैंने मेट्रोहिंदी नाम दिया है । जिस किसी ने इस भाषा के बारे मेरे विचारों को इस ब्लॉग पर पढ़ा हो, और सचेत होकर टीवी चैनलों पर समाचारों/बहसों तथा अपने आसपास विविध मुद्दों पर लोगों के वार्तालापों को सुना हो, उसे यह अंदाजा तो लग ही चुका होगा कि किस प्रकार हिंदी-अंगरेजी मिश्रण की एक नयी भाषा/बोली इस देश में विकसित हो रही है । मैं इस स्थल पर शेष बातें इसी भाषा में व्यक्त कर रहा हूं, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो सके । मेट्रोहिंदी में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि अभी तक देवनागरी के माध्यम से प्रायः साफसुथरी हिंदी में अथवा रोमन के साथ अंगरेजी में लिखने की आदत रही है । अतः उक्त कार्य के लिए अपेक्षया अधिक प्रयास करना पड़ेगा ।

मेट्रोहिंदी की खास बात यह है कि इसमें भारत के लिए कोई जगह नहीं । आपको सभी के मुख से इंडिया सुनने को मिलेगा: इंडिया शाइनिंग, चक दे इंडिया, इंडियन टीम, इंडिया मांगे गोल्ड, एटसेटेरा एटसेटेरा । दरअसल पॉलिटिकल इंडिपेंडेंस के बाद इंडिया में इंग्लिश की इंपॉर्टेन्स घटने के बजाय बढ़ती चली गई । इंडिपेंडेंस के लिए जिन लोगों ने स्ट्रगल किया था उन्होंने यह इक्सपेक्ट किया था कि इस कंट्री की अपनी लैंग्वेज होगी और सूनर ऑर लेटर हमारी सभी एक्टीविटीज उसी लैंग्वेज में होंगी । लेकिन उनके ड्रीम्ज धरे ही रह गये ।

इंग्लिश के फेबर में आर्ग्युमेंट्स
इस कंट्री में एक ऐसा सोशल सेक्सन उभरा है जो ऑफिशियल लैंग्वेज हिंदी को यूज करने में बिल्कुल भी इंटरस्टेड न था, न आज है और न कभी होगा । इस सेक्शन के पास इंग्लिश के फेबर में अनेक रैशनल-इर्रैशनल आर्ग्युमेंट्स हैं । चूंकि कंट्री का एड्मिनिस्ट्रेशन इसी के हाथ में सदा से चला आ रहा है, इसलिए हिंदी समेत सभी इंडियन लैंग्वेजेज पर इंग्लिश आज तक हावी बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी । इनके आर्ग्युमेंट्स के इग्जाम्पुल कुछ यों हैं:

1. इंडिया की इंटिग्रिटी के लिए इंग्लिश जरूरी है ।
2. इंग्लिश इज ऐन इंटरनैशनल लैंग्वेज, इसलिए इंग्लिश को प्रमोट किया जाना चाहिए । हर इंडियन को इंग्लिश सीखनी चाहिए ।
3. दुनिया में हर सब्जेक्ट की नॉलेज इंग्लिश में ही अवेलेबल है, इसलिए इंग्लिश के बिना हम दूसरे कंट्रीज से पिछड़ते चले जाएंगे ।
4. साइंस, इंजिनियरिंग, मेडिसिन जैसे सब्जेक्ट्स की टीचिंग और स्टडी इंडियन लैंग्वेजेज में पॉसिबल ही नहीं है ।
5. आज के कंप्यूटर एज में इंटरनेट का यूज इंग्लिश के बिना पॉसिबल नहीं है ।
6. बिजनेस एंड प्रोफेशनल एक्टिविटीज में इंग्लिश इसेंशियल है । इसलिए नौकरी-पेशे में इंग्लिश जरूरी है ।

और भी आर्ग्युमेंट्स इस सोशल सेक्शन के दिमाग में होंगे । अभी में अधिक नहीं सोच पा रहा हूं ।

मेरे ऑब्जर्वेशन्ज
द सिंपल फैक्ट नाव इज कि इंग्लिश हिंदी और अदर लैंग्वेजेज पर हावी है । इंडियन्ज के दिमाग में यह घुस चुका है कि लाइफ में वे इंग्लिश के बिना सक्सेस नहीं पा सकते हैं । मेरे इन ऑब्जर्वेशन्ज पर नजर डालें और सोचिए कि मैं करेक्ट हूं या नहीं:

1. आम इंडियन, जिसे थोड़ी-बहुत इंग्लिश आती है, रिटन फार्म (लिखित रूप) में हिंदी के यूज में इंटरस्टेड नहीं रहता । उसकी प्रिफरेंस इंग्लिश रहती है । किसी रजिस्टर में नाम/सिग्नेचर रिकार्ड करना हो तो वह इंग्लिश (रोमन) का ही यूज करेगा । ऐसा मैं BHU जैसी यूनिवर्सिटी, जहां मैं टीचिंग एंड रिसर्च करता था, में देखता आया हूं ।
2. कहा जाता है कि हिंदी की पॉपुलरिटी में हिंदी सिनेमा का बड़ा कंट्रिब्यूशन रहा है । बट याद रखें वह हिंदी नहीं मेट्रोहिंदी है । यह भी देखिये कि फिल्मों की कास्टिंग वगैरह देवनागरी में रेयरली होती है ।
3. हिंदी सिनेमा में काम करने वाले एक्टर्स वगैरह मोस्टली मेट्रोहिंदी या प्युअर इंग्लिश में बात करते हैं, भले ही वे हिंदी जानते हों । यही बात स्पोटर्समेन पर भी लागू होती है ।
4. इट इज अ फैक्ट कि हिंदी इस कंट्री की ऑफिशियल लैंग्वेज है न कि इंग्लिश, बट प्रैजिडेंट, प्राइम-मिनिस्टर एंड हाई ऑफिशियल्स फॉरेन टुअर्स या UNO में हिंदी नहीं बोलते हैं, यह जानते हुए भी कि हेड्ज ऑव अदर कंट्रीज अपने यहां की ही लैंग्वेज बोलते हैं । अटल बिहारी बाजपाई वज एन इक्सेप्शन ! आइरनी तो यह है कि हिंदी को खुद यूज नहीं करेंगे लेकिन यूएनओ की ऑफिशियल लैंग्वेजेज में इंक्लूड करने की बात करते हैं ।
5. इंडियन बिजनेसमेन एंड कॉमर्शियल हाउसेज तो हिंदी और उसकी स्क्रिप्ट को यूज न करने के लिए डिटर्मिन्ड हैं । इसलिए आप कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स पर रैलिवेंट इंफर्मेशन इंग्लिश में ही प्रिंटेड पाएंगे ।
6. हिंदी-स्पीकिंग हो या न हो, सभी जगह – गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स छोड़ दें – होटल्स, बिल्डिंग्ज, शॅपिंग मॉल्ज, बिजनेस हाउसेज एंड स्कूल-कॉलेज के नाम मोस्टली इंग्लिश में लिखे मिलते हैं ।
7. गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स की बेवसाइट्स इंग्लिश में ही अवेलेबल हैं । कहीं-कहीं उनका हिंदी वर्जन जरूर मिल जाता है, बट ऑनलाइन एक्टिविटी के मामले में इंग्लिश ही यूजुअली काम देती है । फॉर इग्जांपल रेलवे रिजर्वेशन फॉर्म की एंट्रीज इंग्लिश में देनी पड़ती हैं, एंड उसके हिंदी प्रिंट आउट में भी नेम, स्टार्टिंग स्टेशन, डेस्टिनेशन वगैरह रोमन में ही मिलेंगे ।

आई मीन टु से कि गवर्नमेंटल एंड नॉन-गवर्नमेंटल, दोनों लेबल्स पर इंग्लिश की जरूरत फील की जाती है । हिंदी के बिना काम चल सकता है, बट इंग्लिश के बिना नहीं । इसका रिजल्ट यह है कि सभी इंडियन्ज का इंक्लिनेशन इंग्लिश की स्टडी की ओर है । हां बोलचाल के लिए केवल वर्किंग नॉलेज ऑव हिंदी चाहिए, जिसे हिंदी-स्पीकिंग रीजन्ज में लोग बतौर मदरटंग सीख ही लेते हैं । उन्हें काम चलाने के लिए इंप्रेसिव हिंदी-वोकैबुलरी की जरूरत नहीं होती है । बट इंप्रेसिव इंग्लिश-वोकैबुलरी इज ऐन असेट !!

हिंदी का फ्यूचर
मुझे लगता है कि फ्यूचर में प्युअर हिंदी – ऐसी लैंग्वेज जिसमें इंग्लिश वर्ड्स की अन्लिमिटेड मिक्सिंग न हो – केवल लिटरेरी राइटिंग तक सिमट कर रह जाएगी । हाईली-लिटरेट अर्बन पीपल मेट्रोहिंदी ही बोलचाल में यूज करेगा । यहां तक कि हिंदी न्यूजपेपर्स एंड मैगजीन्स में भी मेट्रोहिंदी जगह पा लेगी, जिसका इंडिकेशन उन आर्टिकिल्स एंड ऐड्वरटिजमेंट्स में मिलता है जो आज के यूथ को ऐड्रेस करके लिखे जा रहे हैं । टीवी प्रोग्रैम्ज में तो मेट्रोहिंदी ही दिखती है ।

मैंने जिस सोशल सेक्शन की बात ऊपर कही है उसका इंटरैस्ट प्युअर हिंदी में नहीं है, इसलिए उसकी हिंदी वोकैबुलरी कमजोर रहती है, जिसके चलते हिंदी के बारे उसकी यह ओपीनियन बन जाती है कि हिंदी डिफिकल्ट है । वह कहता है कि उसे हमें सिम्पल बनाना चाहिए और इस पर्पज के लिए इंग्लिश वडर््ज का यूज विदाउट हेजिटेश्न करना चाहिए । ऐसी सिचुएशन में प्युअर हिंदी लिंग्विस्टिक करप्शन से बच पाएगी यह क्वेश्चन इंपॉर्टेन्ट हो जाता है ।

द जिस्ट आव् ह्वट हैज बीन सेड यह है कि हिंदी सर्वाइव करती रहेगी लेकिन अपने इक्सट्रीम्ली करप्ट फॉर्म में । प्युअर हिंदी – चाहे वह लिटरेचर में हो या वेबसाइट पर – को पढ़ने एंड अंडरस्टैंड करने वाले बहुत नहीं रहेंगे । अंगरेजी की सुप्रिमेसी बनी रहेगी, ऐट लीस्ट रिटन फॉर्म में !

जिस लैंग्वेज में मैंने ये आर्टिकल लिखा है उसे आप ऑर्डिनरीली न्यूजपेपर/मैगजीन्स में नहीं देखते होंगे । अभी यह लैंग्वेज बोलचाल में ही सुनने को मिल रही है । बट मेरा मानना है कि फ्यूचर में ऐसे आर्टिकल्स अन्कॉमन नहीं रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

अपने देश के महानगरों में एक ऐसी भाषा जन्म ले चुकी है जो न हिंदी है और न ही अंगरेजी । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । इसे लेकर अपने ब्लॉग की पिछली तीन प्रविष्टियों में मैंने कुछ विचार व्यक्त किए हैं (तारीख 22 जून3 जुलाई, तथा 23 जुलाई) ।

मेरी नजर में मेट्रोहिंदी के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है । इसका प्रभाव क्षेत्र इतना बढ़ चुका है कि इसे भाषावेत्ताओं एवं शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन के योग्य विषय के तौर पर चुना जाना चाहिए । इसकी कुछएक विशिष्टताओं का संक्षिप्त उल्लेख मैंने पिछले आलेख में किया था । उन्हीं की चर्चा किंचित् विस्तार से मैं यहां कर रहा हूं ।

(1) पारंपरिक हिंदी के वे शब्द, जिन्हें हिंदीभाषी सदियों से बोलचाल में प्रयोग में लेते आए हैं, इस नई भाषा, मेट्रोहिंदी, से विलुप्त होते जा रहे हैं । इनकी सूची निम्न प्रकार से दी जा सकती हैः

1 – गिनती के शब्दः वन् (एक), टू (दो), थ्री (तीन) …
2 – साप्ताहिक दिनों के नामः मंडे (सोमवार), ट्यूज्डे (मंगलवार) …
3- रंगों के नामः रेड (लाल), येलो (पीला), ब्लैक (काला) …
4 – शरीर के अंग एवं रोग-लक्षणों के नामः किडनी (वृक्क – कम ही लोग जानते होंगे!), लिवर (यकृत्), हार्ट-अटैक (हृदयाघात), थ्रोट-इंफेक्शन (गले का संक्रमण), ब्लड-टेस्ट (खून की जांच) ….
5 – ‘प्रगतिशील’ अभिभावकों द्वारा बच्चों को रटाए जा रहे अनेकों शब्दः डॉगी (कुत्ता), टाइगर (बाघ), हॉर्स (घोड़ा), फिश् (मछली), कॉक्रोच (तिलचट्टा – कितने बच्चे जानते होंगे?) …
6 – साग-सब्जी के नाम जो बच्चे सीख रहे हैंः बनाना (केला), ऐपल् (सेब), ऑरेंज (संतरा), टोमेटो (टमाटर), पोटैटो (आलू), …
7 – पारिवारिक रिश्तों के नामः मम्मी/पापा (माता/पिता) तो प्रायः हर हिंदीभाषी के जुबान पर बस चुके हैं (बुजुर्ग अपवाद होंगे!!) । अब कई लोग मॉम/डैड/डैडी पर भी उतर चुके हैं । इसके अलावा हजबैंड/वाइफ (पत्नी/पति), मदर-इन-लॉ/फादर-इन-लॉ (सास/ससुर), ग्रैंडमा/ग्रैंडपा (दादी/दादा), आदि रिश्तों के संकेत के तौर पर इस्तेमाल होते हैं ।

इसी प्रकार कई अन्य क्षेत्रों में भी हिंदी के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग हो रहा है ।

(2) मेट्रोहिंदी में उन अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं किया जाता है जो अंगरेजी का सामान्य ज्ञान रखने वाले को तक समझ में न आते हों; अंगरेजी न जानने वाले सामान्य हिंदीभाषी के लिए तो ‘काला अक्षर भेंस बराबर’ की ही स्थिति रहती है । लेकिन इस तथ्य की परवाह किसी वक्ता को नहीं रहती है । ऐसे शब्दों/ पदबंधों की सूची काफी लंबी होगी । इन उदाहरणों पर नजर डालें:

(3) औपचारिक बातचीत के अनेकों शब्द/पदबंध, यथा ‘थैंक् यू’ (धन्यवाद), एक्सक्यूज मी (माफ करें), वेरी गुड (शाबास), कांग्रैच्युलेशन्स (बधाई), हैप्पी बर्थडे (जन्मदिन मुबारक) …

(4) मेट्रोहिंदी में व्याकरणीय ढांचा मूलतः हिंदी का ही है, किंतु उस पर अंगरेजी के व्याकरण का असर साफ नजर आ जाता है । व्याकरण संबंधी विकृति कई रूपों में दिखाई देती है । प्रमुखतया अधोलिखित बिंदु ध्यान आकर्षित करते हैं:

1- अंगरेजी से लिए गये कई संज्ञाशब्दों के बहुवचन बहुधा अंगरेजी के नियमों के अनुसार चुने जाते हैं, न कि हिंदी के व्याकरण के अनुसार, जैसे फ्रेंड्स (न कि फ्रेंडों), ऑफिसेज्, यूनिवर्सिटीज्, …
2- हिंदी के कुछ संयोजक शब्द अंगरेजी के तुल्य शब्दों से विस्थापित होने लगे हैं । इनमें एंड (और) एवं बट् (लेकिन) मुख्य हैं ।
3- मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के विशेाणों/क्रियाविशेषणों का प्रयोग सामान्य हो चला है, जैसे ऑलरेडी (पहले ही), इन् फैक्ट (दरअसल), इक्जैक्ट्ली (ठीक, सही-सही), परफेक्ट्ली (परिपूर्णतः), …
4- गनीमत यह है कि हिंदी के सर्वनामों को अभी छेड़ा नहीं गया है । मैंने किसी के मुख इस प्रकार के वाक्य नहीं सुने हैं:
“माई स्कूल में स्पोर्ट्स कल होंगे ।”; “ही (वह) कॉलेज गया है ।” आदि ।

(5) महानगरीय हिंदी में अंगरेजी शब्दों के साथ ‘होना’, ‘करना’, ‘सकना’ जैसे सहायक क्रियाओं के प्रयोग के साथ उपयुक्त क्रियापदों की रचना आम बात हो चुकी है । दृष्टांत प्रस्तुत हैं:
कॉल किया था (बुलाया था), इरेज् कर दिया (मिटा दिया), स्पाइसेज् ऐड् करो (मसाले डालो), अटेंडेंस ले लो (उपस्थिति दर्ज करो), मॉर्निंग वाक् करिए (सुबह टहलिए), इत्यादि ।

(6) बात इतने पर समाप्त नहीं होती है । बताया जा चुका है कि मेट्रोहिंदी अभी लिखित पाठों में जगह नहीं पा सकी है । भले ही शहरी लोग इसे आम बोलचाल एवं टीवी-बहसों में बेझिझक इस्तेमाल करते हों, उनका लेखन-कार्य लगभग शुद्ध हिंदी/हिंदुस्तानी में ही हो रहा है । फिर भी टीवी एवं पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापनों/सूचनाओं में इसका खूब प्रयोग हो रहा है । जहां कहीं मेट्रोहिंदी में थोड़ा-बहुत लेखन हो रहा है, वहां देवनागरी के साथ-साथ लैटिन लिपि भी इस्तेमाल हो रही है । मतलब यह है कि मेट्रोहिंदी हिंदी के वर्णों एवं लैटिन के अल्फावेट को मिलाकर प्राप्त लिपि को स्वीकार करने लगी है । मात्र देवनागरी इस मिश्रभाषा के लिए अपर्याप्त समझी जाएगी । आपको ऐसे नारे/कथन/विज्ञापन देखने को मिल जाएंगे:

(7) और अंत में सबसे अधिक अहम बात यह है कि इस भाषा का प्रयोक्ता देश को भूलवश भी ‘भारत’ नहीं कहता; अपनी बात कहने में वह ‘इंडिया’ का ही नाम लेता है । आने वाले समय में इस भाषा के माहौल में पल रहे बच्चे यदि भारत का मतलब पूछने लगें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा ।

अगली बार हिंदी के भविष्य पर अपनी राय । – योगेन्द्र जोशी

इस चिट्ठे की पिछली दो प्रविष्टियों, 22 जून तथा 3 जुलाई, में मैंने हिंदी एवं अंगरेजी के अमर्यादित मिश्रण से उत्पन्न ‘क्रिओल’ सदृश भाषा का जिक्र किया था जो तेजी से शहरी पढ़ेलिखे नागरिकों, विशेषतः छात्रों-युवाओं, के बोलचाल की आम भाषा बन रही है । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । मेरी नजर में यह तेजी से फैल रही है और ‘शिक्षित’ हिंदीभाषी भारतीय समाज में अपनी जड़ें जमा रही है । यहां मैं उन क्षेत्रों का किंचित् विस्तार से उल्लेख कर रहा हूं जहां इसका प्रयोग सामान्य बात बनती जा रही है ।

मेट्रोहिंदी का प्रयोग
मेट्रोहिंदी अभी लेखन की भाषा नहीं है । अंगरेजी शिक्षित महानगर-निवासी व्यक्ति बोलचाल में तो इसका इस्तेमाल बेझिझक करता है, किंतु लिखते समय पर्याप्त कोशिश करता है कि उसकी भाषा यथासंभव पारंपरिक हिंदी या हिंदुस्तानी पर आधारित हो । अर्थात् उसमें प्रचलित हिंदी लफ्जों का प्रयोग हो और व्याकरणीय शुद्धता कमोबेश बनी रहे । परंतु हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं का मेट्रोहिंदी से परहेज घटता जा रहा है । फलस्वरूप अब ऐसे लेख भी पढ़ने को मिलने लगे हैं जो हिंदी में लिखित नहीं माने जा सकते । उन्हें हिंदी का कोई भी विद्वान नहीं समझ सकता जब तक कि उसने अंगरेजी का भी पर्याप्त ज्ञान अर्जित न कर लिया हो । दैनिक वार्तापत्र ‘अमर उजाला’ के एक लेख का छोटा हिस्सा उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है:

इस उदाहरण का “ड्रेसेज में ज्यादा कट्स, सिलुएट्स व फ्रील यूज ना करें” वाक्य किस हद तक हिंदी है यह आप खुद ही तय करें ।

मेट्रोहिंदी के लक्षण
मेरी नजर में मेट्रोहिंदी की खासियतें क्या हैं इनकी संक्षिप्त चर्चा मैं आगे कर रहा हूं । इस विषय की समीक्षा अभी मैंने गहराई से नहीं की है । चलते-चलाते मुझे जो सूझ पाया है वही मैं कहने जा रहा हूं ।

(1) मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के कौन-से और कितने शब्द इस्तेमाल होने चाहिए इसका कोई नियम नहीं है ।
(2) इसमें अंगरेजी पदबंध (फ्रेज) भी धड़ल्ले से प्रयोग में लिए जा सकते हैं ।
(3) अंगरेजी के शब्दों के साथ ‘करना’, ‘सकना’, ‘होना’ के प्रयोग से इच्छित क्रियापद बनाए जाते हैं ।
(4) अंगरेजी के संयोजकों (कनेक्टिव) एवं क्रियाविशेषणों (एड्वर्व) के इस्तेमाल में कोई रोक नहीं रहती ।
(5) मेट्रोहिंदी की लिपि में भी लचीलापन देखने को मिल रहा है । आम तौर पर आप आप देवनागरी में लिखते हैं, किंतु चाहें तो सुविधानुसार रोमन लिपि भी यहां-वहां प्रयोग में ले सकते हैं ।

बानगी
नीचे के उदाहरण पर गौर करें:

प्रदर्शित पदबंध/वाक्यांश अपने हिंदी अखबार से चुने हैं मैंने । इसे हिंदी कहें या अंगरेजी ? दूसरा उदाहरण एक विज्ञापन का है:

साफ जाहिर है कि इनमें क्या कहा गया है इसे समझने के लिए हिंदी तथा अंगरेजी, दोनों, की जानकारी पाठक को होनी चाहिए । अंगरेजी न जानने वालों के समझ से परे हैं यह मेट्रोहिंदी ।

अगली पोस्ट में उपर्युक्त ‘खासियतों’ पर तनिक और प्रकाश डालते हुए हिंदी के उज्ज्वल/अंधकारमय भविष्य पर मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

मेट्रोहिंदी

इस चिट्ठे की पिछली पोस्ट (22 जून) में हिंदी-अंगरेजी की एक मिश्रित भाषा की चर्चा आंरभ की गई है, जिसे मैं मेट्रोहिंदी कहता हूं । यह हमारे महानगरों में निरंतर विस्तार एवं लोकप्रियता पा रही भाषा है, जिसमें अंगरेजी के मिश्रण की मर्यादा क्या हो इस सवाल का कोई महत्त्व ही नहीं है । हिंदी में अंगरेजी का मिश्रण वक्ता की सुविधा और उसके हिंदी-अंगरेजी ज्ञान पर निर्भर करता है । इस वर्णसंकर भाषा को मैं नितांत नूतन भाषा के रूप में देखता हूं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी से मिलती-जुलती होने के बावजूद उर्दू अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है । कौन हैं जो मेट्रोहिंदी उपयोग में ले रहे हैं इसका उत्तर देने से पहले किस तरह के बोल हमें टेलीविजन चैनलों या अन्य अनेक मंचों पर अक्सर सुनने को मिलते हैं इनके दृष्टांत प्रस्तुत करता हूं:

(1) चिड़ियाघर में मां बेटे सेः “ये टाइगर नहीं, लेपर्ड है । डौन्च्यू रेमेंबर कि टाइगर के डार्क स्ट्राइप्स होती हैं, न कि डार्क स्पॉट्स ।”
(2) दो पर्यटकों के बीच संवादः “एक्सक्यूज मी, इस कैमरे से मेरा स्नैपशॉट ले देंगे?” … “या, श्युअर ।” … “थैंक्यू इंडीड ।”
(3) टीवी विज्ञापनः “… ये क्रीम रखे आपकी स्किन सॉफ्ट, स्मूथ, और फेअर ।”
(4) सिने-अभिनेताः “फिल्म में परफॉर्म करना चैलेंजिंग एंड एंजॉयेबल् टास्क था । मुझे एक रेबेलियन का रोल प्ले करना था जो … ।”
(5) नृत्य प्रतिस्पर्धा निर्णायकः “एक्सेलेंट परफॉर्मेन्स! आप दोनों के डांस मूवमेंट्स का सिंक्रोनाइजेशन काबिलेतारीफ था ।”
(6) ओलंपिक टीम प्रबंधकः “… इंडिया की परफॉर्मेन्स अच्छी रहेगी । वेटलिफ्टिंग, रैसलिंग, एंड बॉक्सिंग में हमारे प्लेयर्स जरूर मेडल जीतेंगे ।”
(7) समाचार वाचकः “… पीएम ने कहा कि हम अपने नेबरिंग कंट्रीज के साथ कॉर्डियल रिलेशन्स चाहते हैं । इसके लिए डिप्लोमैटिक लेवल पर जरूरी स्टेप्स लिए जा रहे हैं ।”
(8) टीवी समाचारः “… हाइवे पर पिल्ग्रिम्स से भरी बस का सीरियस एक्सिडेंट हो गया है । पंद्रह पैसें जर्स के डेथ की ऑफिशियल रिपोर्ट मिली है । सीरियस्ली इंज्यर्ड को पास के हॉस्पिटल्स में एड्मिट कराया गया है; शेष को फर्स्ट एड के बाद छोड़ दिया गया है ।”

मेट्रोहिंदीः अंगरेजी मोह से जन्मी भाषा

मेट्रोहिंदी ऐसी भाषा है जिसे आम हिंदीभाषी नहीं समझ सकता है, क्योंकि इसमें अंगरेजी के तमाम ऐसे शब्द शामिल रहते हैं जिनका ज्ञान उसे हो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है । उसकी बातें आम हिंदीभाषी समझ भी पा रहा है या नहीं इस बात से मेट्रोहिंदी बोलने वाले को कोई सरोकार नहीं रहता है । उसके अपने वर्ग के लोग बातें समझ ले रहे होंगे यही पर्याप्त माना जाता है ।

वास्तव में यह उन लोगों की भाषा है जिन्हें प्राथमिक दर्जे की हिंदी आती है और जिनका अंगरेजी ज्ञान हिंदी की तुलना में बेहतर होता है । अपनी हिंदी को अधिक समृद्ध करने का विचार उन लोगों के मन में उपजता ही नहीं । हिंदी का उनकी शब्दसंग्रह या तो अपर्याप्त होती है या अभ्यास के अभाव के कारण उसके मुख से सही मौके पर सही शब्द निकल ही नहीं पाते हैं । इसके विपरीत अंगरेजी आधारित शिक्षा एवं व्यावसायिक कारणों से वह अंगरेजी के निरंतर अभ्यास का आदी होता है । भले ही वह धाराप्रवाह अंगरेजी न बोल पाता हो, अंगरेजी के शब्दों का मौके-बेमौके उसके मुख से निकलना थमता नहीं है ।

“गरीब की लुगाई सबकी भौजाई”

हिंदी के मामले में “गरीब की लुगाई सबकी भौजाई” की लोकोक्ति सटीक बैठती है । अपने समाज में ऐसे लोगों की अच्छीखासी संख्या है जिनका अंगरेजी के प्रति लगाव अद्वितीय है । उनकी धारणा है कि हिंदी में अंगरेजी के शब्दों को जहां-तहां ठूंस देना किसी भी हाल में अनुचित नहीं है । खुद हिंदी के तथाकथित पक्षधर भी यह कहते देखे जाते हैं कि ऐसा करने से हिंदी समृद्ध होती है । किंतु जब बात अंगरेजी की होती है तो ये ही लोग उसकी शुद्धता के प्रति सचेत रहते हैं । क्या मजाल कि हिंदी का एक शब्द भी भूल से उनकी अंगरेजी में सुनने को मिल जाए । आप किसी को यों बोलते हुए कभी – जी हां कभी भी, सपने में ही सही – सुन सकते हैं:
“द पीएम सेड, ‘वी वुड लाइक टु हैव मैत्रीपूर्ण संबंध विद अवर पड़ोसी कंट्रीज ।’”

अपने देश में अंगरेजी महज एक ‘और’ भाषा नहीं है, जैसे दुनिया की तमाम भाषाएं होती हैं । अंगरेजी को तो देश की प्रगति एवं उन्नति का मंत्र और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार समझा जाता है । इसलिए देशज भाषाओं में पूरे गर्व के साथ इसका ‘तड़का लगाने’ की एक प्रथा अपने समाज में चल चुकी है । इसी ‘तड़के’ का फल है अपनी मेट्रोहिंदी ।

मेट्रोहिंदी के उपयोक्ता यानी ‘यूजर्स’

हिंदीभाषी क्षेत्र में कौन उर्दू बोलता है और कौन नहीं यह कह पाना कठिन है । उर्दूभाषी होने का दावा करने वाले भी मीरजा गालिब की उर्दू समझ ही लेंगे जरूरी नहीं है । अरबी-फारसी के अल्फाज कुछ ज्यादा ही हों और ‘जहां का नूर’ न कहकर ‘नूर-ए-जहां’ जैसे पदबंध इस्तेमाल हों तो उर्दू हो गयी । ठीक इसी प्रकार हिंदी में अंगरेजी ठूंसते जाइए, ‘एंड’, ‘इवन’, ‘ऑलरेडी’ जैसे अव्ययों का मुक्त हृदय से प्रयोग करिए तो हो गयी मेट्रोहिंदी । मोटे तौर पर कहूं तो ये लोग मेट्रोहिंदी बोलते हैं:

(1) ‘इंग्लिश-स्कूलों’ में शिक्षित – विद्यालयों जिनकी शिक्षा ‘इंग्लिश-मीडिया’ विद्यालयों में होती है, जहां अंगरेजी सीखने और उसीका शब्दसंग्रह बढ़ाने पर पूरा जोर रहता है । छात्रों के मन में यह भावना बिठा दी जाती है कि कामचलाऊ हिंदी पर्याप्त है ।

(2) अंगरेजी के व्यावसायिक प्रयोग वाले – अपने देश में लगभग सभी व्यावसायिक कार्य अंगरेजी में ही संपन्न होते हैं । इस कार्य के दौरान कर्मचारी अंगरेजी का ही अभ्यास पाते हैं । यही अंगरेजी उनके परस्पर बातचीत में घुस जाती है । वैज्ञानिक, चिकित्सक, अर्थशास्त्री, कानूनविद्, आदि सभी इस वर्ग में आते हैं ।

(3) अंगरेजी से प्रतिष्ठा के इच्छुक – अपने समाज में अंगरेजी प्रतिष्ठा की निशानी है । जिसे अंगरेजी आती है वह अंगरेजी शब्दों के माध्यम से अपना रुतबा कायम करना जरूरी समझता है । आम धारणा है कि अंगरेजी बोलने वाले को तवज्जू दी जाती है ।

(4) भाषाई हीनभावना से ग्रस्त – यही प्रतिष्ठा है जो अंगरेजी कम या नहीं जानने वालों की हीन भावना के रूप में दिखाई देती है । वे अपना अंगरेजी ज्ञान सुधारने की कोशिश के साथ-साथ मौके-बेमौके हिंदी में अंगरेजी ठूंसना जरूरी समझने लगते हैं । – योगेन्द्र जोशी

‘इंडिया दैट इज भारत’ क्या वास्तव में स्वतंत्र हो पाया है ? यह ऐसा सवाल है जिसका उत्तर मैं ‘नहीं’ में पाता हूं । मेरी दृष्टि में अंग्रेजों द्वारा भारतीय राजनेताओं के हाथों में सत्ता का राजनैतिक हस्तांतरण कर दिये जाने की व्याख्या पूर्ण स्वतंत्रता के रूप में नहीं की जा सकती है । स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत तत्कालीन राजनेताओं ने आशा की थी कि राजनैतिक स्वतंत्रता के बाद कालांतर में यह देश अंग्रेजी एवं अंग्रेजियत से भी मुक्त हो जाएगा । परंतु ऐसा हो नहीं पाया ।

आज स्थिति यह है कि अंग्रेजी एवं अंग्रेजियत ने इस देश को पूरी तरह कब्जे में ले लिया है । मैं यहां पर अंग्रेजी के हिंदी पर पड़ रहे कुप्रभाव की बात कर रहा हूं । यों तो अंग्रेजी ने सभी भारतीय भाषाओं को विकृत कर डाला है, किंतु मेरी बात हिंदी तक सीमित रहेगी । इस देश में महानगरों में संपन्न, अंग्रेजी-शिक्षित एक ऐसा वर्ग उभर रहा है, जो स्वयं को हिंदीभाषी बताता है, किंतु जिसे हिंदी में वास्तविक रुचि रह नहीं गयी है । यह ऐसा वर्ग है जो हिंदी को अपनी मातृभाषा घोषित करता है, किंतु साफ-सुथरी हिंदी न तो बोल सकता है और न लिख सकता है । वह ऐसी भाषा बोलने लगा है जो हरगिज हिंदी नहीं कही जा सकती है । इस भाषा को हिंग्लिश कहना भी उचित नहीं होगा । इसे मैं ‘मेट्रोहिंदी’ अथवा ‘एचईमिक्स’ कहना चाहूंगा ।

मेट्रोहिंदी

इसका ‘मेट्रोहिंदी’ नामकरण मैं इसलिए करता हूं, क्योंकि यह मुख्यतया महानगरों, ‘मेट्रोसिटीज्’, के शिक्षित एवं संपन्न लोगों द्वारा प्रयोग में ली जा रही है । इसका प्रभावक्षेत्र निरंतर बढ़ रहा है । इसकी पहुंच छोटे शहरों से होते हुए कस्बों-गांवों तक के शिक्षित लोगों तक हो रही है । इस भाषा की खासियत यह है कि इसकी शब्दसंपदा में कितने अंग्रेजी शब्दों को शामिल किया जाएगा इस पर किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं है । अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग वक्ता के अंग्रेजी ज्ञान एवं उसकी सुविधा पर निर्भर करता है । यहां तक कि उसका व्याकरणीय ढांचा भी आवश्यकतानुसार तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है और अंग्रेजी व्याकरण के अनुरूप ढाला जा सकता है । इस भाषा में अंग्रेजी के पदबंध (फ्रेज), वाक्यांश, एवं कभी-कभी पूरे वाक्य स्वीकार्य रहते हैं । इसी अर्थ में मेट्रोहिंदी को मैं विकल्पतः ‘एचईमिक्स’ भी कहता हूं, एचईमिक्स अर्थात् ‘हिंदी-इंग्लिश-मिक्स्चर’ । मैं इस भाषा को हिंग्लिश नहीं मानता, क्योंकि इसमें अंग्रेजी के शब्दों की ही बहुतायत नहीं है, बल्कि उसके आगे बहुत कुछ – जी हां बहुत कुछ – और भी है ।

मेट्रोहिंदी अभी औपचारिक रूप से स्थापित भाषा नहीं है । इसका अस्तित्व तो है, किंतु ऐसा लगता है कि अभी भाषाविदों ने इसका अध्ययन पारंपरिक हिंदी से भिन्न स्वयं में एक नई भाषा के तौर पर करने का प्रयास नहीं किया है । कदाचित् सभी भारतीय इसे हिंदी की ही आधुनिक बोली मानकर चलते हों । लेकिन मैं ऐसा नहीं समझता । हिंदी से मिलती-जुलती होने के बावजूद उर्दू एक अलग भाषा कही जाती है । ठीक वैसे ही मेट्रोहिंदी को हिंदी से मिलती-जुलती लेकिन उससे अलहदा भाषा माना जाना चाहिए ।

एक बानगी

मेट्रोहिंदी की क्या खासियत है और इसके उपयोक्ता कौन हैं इन पर अपना मत व्यक्त करने से पहले में एक बानगी पेश करता हूं । आजकल ब्राजील के दूसरे सबसे बड़े शहर रिओ द जनेरो (Rio de Janeiro) में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर विभिन्न राष्ट्रों के प्रतिनिधियों की बैठक चल रही है । निम्नलिखित अनुच्छेद मैंने New Scientist पत्रिका के वेबसाइट पर उक्त बैठक से संबंधित रपट (18 June 2012) से उद्धृत किया है । अंग्रेजी में इसका मूल पाठ यों है:

“The Earth Summit in this week is not looking promising. The conference will be devoid of the world leaders who attended its predecessor, 20 years ago. And there are no headline-grabbing treaties to sign. Its final declaration will not be binding to anyone. The main outcome will probably be to launch a set of “sustainable development goals” on issues like protecting forests, fisheries and water supplies.”

हिंदी संवाददाता, विषय-समीक्षक, अथवा प्रशासनिक प्रवक्ता, जो अंग्रेजी में ही कार्य करने का आदी हो चुका हो और जिसे साफसुथरी हिंदी के प्रयोग का अभ्यास ही न रह गया हो, उक्त अनुच्छेद को अंग्रेजीकृत ‘हिंदी’ (अर्थात् मेट्रोहिंदी) में कुछ यों प्रस्तुत करेगा:

“रिओ द जनेरो में चल रही इस वीक की अर्थ समिट प्रोमिसिंग नहीं लग रही है । इस कॉंफरेंस में उन वर्ल्ड लीडर्स की कमी रहेगी जिन्होंने 20 साल पहले इसका प्रिडिसेसर अटेंड किया था । और इसमें हेडलाइनलाइन-ग्रैबिंग ट्रीटीज साइन करने के लिए नहीं हैं । इसका फाइनल डिक्लेरेशन किसी के लिए बाइंडिंग नहीं होगा । संभवतः इसका मेन आउटकम फॉरेस्ट, फिशरीज्, एंड वाटर सप्लाइज् के प्रोटेक्शन के इश्यूज् पर “सस्टेनेबल् डिवेलपमेंट गोल्ज” पेश करना रहेगा ।”
(ध्यान दें कि अपने निजी टीवी चैनलों पर हिंदी समाचार प्रस्तुति कुछ ऐसी ही रहती है!)

यह हिंदी नहीं है । उसमें मौजूद अंग्रेजी शब्दों की अवांछित भरमार इसे उस व्यक्ति की समझ से बाहर कर देती है, जिसका अंग्रेजी ज्ञान पर्याप्त न हो । जो लोग अंग्रेजी के उक्त प्रकार के शब्द निर्लज्जता के साथ प्रयोग में लेते हैं उन्हें इस बात की परवाह नहीं रहती है कि ऐसी वैचारिक प्रस्तुति आम हिंदीभाषी की समझ से परे होगी । वह यह मानता है हर हिंदीभाषी को अंग्रेजी ज्ञान तो होना ही चाहिए । इसके विपरीत वह यह हरगिज नहीं मानता कि जब वह हिंदी बोलता है तब वह वास्तव में हिंदी ही बोले । अन्यथा हिंदी बोलने का नाटक न करके अंग्रेजी में बोले ।

जैसे अंग्रेजी समाचारों में आप हिंदी शब्दों को मनमरजी से नहीं ठूंसते, वैसे ही हिंदी समाचारों में अंग्रेजी शब्द महज इसलिए नहीं ठूंसे जा सकते हैं क्योंकि आपको हिंदी शब्द नहीं सूझते । इस तर्क को ध्यान में रखते हुए उक्त अनुच्छेद साफसुथरी हिंदी में कुछ ऐसे प्रस्तुत होना चाहिए:

“रिओ द जनेरो में चल रही इस सप्ताह का पृथ्वी सम्मेलन सफल होते नहीं लग रहा है । इस सम्मेलन में विश्व के उन नेताओं की कमी रहेगी, जिन्होंने 20 साल पहले इसके पूर्ववर्ती में भाग लिया था । और इसमें हस्ताक्षर करने के लिए समाचार-शीर्षक बनने योग्य समझौते भी नहीं हैं । इसका अंतिम घोषणापत्र किसी के लिए बाध्य नहीं होगा । संभवतः इसका मुख्य प्रतिफल वन, मत्स्यक्षेत्र, एवं जलापूर्ति के संरक्षण के मुद्दों पर “विकास के चिरस्थाई लक्ष्य” पेश करना रहेगा ।” (यह मेरा अनुवाद है; कदाचित् इससे बेहतर अनुवाद संभव हो ।)

मेट्रोहिंदी की वे खासियतें जो इसे आम हिंदी से अलहदा बनाती हैं, और वे कौन हैं जो इसे प्रयोग में ले रहे हैं इन बातों की चर्चा इस चिट्ठे की अगली प्रविष्टि में किया जाएगा । – योगेन्द्र जोशी

मुझे अपने ‘भारत महान्’ की बात समझ में नहीं आती है । महान् तो कह दिया लेकिन किस तारीफ में ? भ्रष्टाचार में अव्वल होने पर ? राजनैतिक बेहयाई पर ? लोगों की संवेदनहीनता पर ? उनकी स्वार्थपरता पर ?या फिर समाज में व्याप्त कुंठा अथवा हीन भावना पर, जिसके तहत हर विदेशी चीज को इस देश ने श्रेष्ठतर मानने और उन्हें अपनाने का व्रत पाल रखा है , जिसका नतीजा भारतीय भाषाओं के हालात के तौर हम देखते हैं ।

चार-छः दिन पहले मुझे एक ई-मेल के माध्यम से इस ऐसी वेबसाइट का पता मिला,
(http://media.bloomberg.com/bb/avfile/roQIgEa4jm3w)
इसमें उन देशों की सूची दी गयी है जहां अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाएं भी व्यावसायिक कार्यों में प्रयुक्त होती है । उस पर आधारित इस जानकारी पर गौर करें:

व्यावसायिक भाषाएं

अरबी (Arabic) 25 करीब करोड़ (23)
इतालवी (Italian) करीब 6 करोड़ (4)
कोरियाई (Korean) करीब 7 करोड़ (1)
चीनी मैंडरिन (Chinese Mandarin) 100 करोड़ से अधिक (1)
जर्मन (German) 12-13 करोड़ (6)
जापानी (Japanese) 12-13 करोड़ (1)
तुर्की (Turkish) 6-7 करोड़ (1)
पुर्तगाली (Portuguese) करीब 20 करोड़ (8)
फ्रांसीसी (French) 12-13 करोड़ (27)
रूसी (Russian) 25-26 करोड़ (4)
स्पेनी (Spanish) करीब 40 करोड़ (20)

नोटः- संबंधित भाषा के नाम के आगे उसे बोलने/समझने वालों की अनुमानित संख्या दी गयी है । पंक्ति के अंत के कोष्ठकों में उन देशों की संख्या है जहां भाषा को आधिकारिक होने का दर्जा प्राप्त है ।

अंग्रेजी

इस बात पर ध्यान दें कि विश्व में उन लोगों की संख्या 40 करोड़ के लगभग आंकी जाती है जिनकी प्रथम भाषा अंग्रेजी है । किसी-किसी वेबसाइट पर इसे करीब 50 करोड़ भी बताया गया है, जिसमें हिंदुस्तान के 9-10 करोड़ ‘अंग्रेजीभाषी’शामिल हैं ।

मैंने तत्संबंधित जानकारी विकीपीडिआ, एवं नेशनमास्टर, और विस्टावाइड वेबसाइटों से जुटाई ।  यों अंतरजाल पर तमाम अन्य साइटें मिल जाएंगी । हिंदुस्तान से जुड़ी जानकारी मुझे अविश्वसनीय लगती है । निःसंदेह इस देश में अंग्रेजी समझने और कुछ हद तक पढ़-लिख सकने वाले काफी हैं, लेकिन फिर भी वह संख्या 10 करोड़ पहुंचती होगी इसमें शंका है । दुनिया में अन्य स्थानों पर भी अंग्रेजी जानने वाले हैं, परंतु उनकी संख्या का भरोसेमंद आंकड़ा मुझे खोजे नहीं मिला । अधिकांश देशों में यह संख्या काफी कम है, जैसे चीन, जापान एवं कोरिया । वैसे सच बात यह है कि उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, तथा ब्रितानी उपनिवेश रह चुके विश्व के देशों को छोड़कर अन्यत्र अंग्रेजी जानने वाले आपको बहुत कम मिलेंगे । कुल मिलाकर अंग्रेजी चीनी मैंडरिन से पर्याप्त पीछे है । यह बात अलग है कि हिंदुस्तानियों में यह भ्रम व्याप्त है कि अंग्रेजी तो सर्वत्र बखूबी चलती है । कौन समझाये उन्हें ? कौन तोड़े लोगों के भ्रम को ।

भारतीयों, बेहतर होगा इंडियनों कहना, को यह समझना चाहिए कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय केवल इस अर्थ में है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कारोबार में प्रायः अंग्रेजी इस्तेमाल होती है, जैसे हवाई यात्राओं की व्यवस्था में, आयात-निर्यात के कार्य में, और वैश्विक महत्ता के मुद्दों की जानकारी लेने-देने आदि में । परंतु अंग्रेजी के अंतरराष्ट्रीय होने का अर्थ यह हरगिज नहीं कि दुनिया के देशों के आंतरिक कामकाज में भी अंग्रेजी ही चलती है । आपने कभी गौर किया है कि जापानी शेयर-मार्केट के प्रदर्शन-पट्टों पर जापानी दिखती है, न कि अंग्रेजी । आपके लिए वहां के आम रेस्तरां में चाय-नास्ते का आर्डर देना भी कठिन हो सकता है, रोजमर्रा का आम निबटाना तो दूर की बात । तथ्य यह है कि चीन, जापान, ब्राजील, अर्जेन्टिना में समस्त आंतरिक व्यावसायिक गतिविधियां अपनी-अपनी भाषाओं में होता है । लेकिन इन बातों को इंडियनों को कौन समझाए ?

चीनी मेंडरिन

चीनी मैंडरिन राजधानी बीजिंग शहर के आसपास की चीनी भाषा पर आधारित और सरलीकृत है, जिसमें आधिकारिक कार्य संपन्न होते हैं । यह कम ही लोग जानते होंगे कि चीन में सर्वत्र चीनी भाषा एक जैसी नहीं बोली जाती है, लेकिन लिपि और लिखित चिह्न के अर्थ सर्वत्र एक होने से दस्तावेज सर्वत्र सरलता से पढ़े-समझे जा सकते हैं । अगर भारत में सर्वत्र देवनागरी स्वीकारी जाती, तो हिंदी के दस्तावेज पढ़ पाना और कुछ हद तक उन्हें समझ पाना अधिकतर लोगों के लिए संभव होता, कदाचित्‌ दक्षिण भारतीयों को छोड़कर । राजनैतिक कारणों से ऐसा किया नहीं गया ।

गौर करें कि किसी भी भारतीय भाषा का नाम ऊपर दी गयी सूची में नहीं है, राजभाषा का खिताब पाई हिंदी भी नहीं, जब कि यहां की कई भारतीय भाषाओं के जानने वालों की संख्या कोरियाई, तुर्की तथा अन्य भाषाओं के ज्ञाताओं से अधिक है । हिंदी जानने वालों की संख्या 50 करोड़ से अधिक आंकी जाती है, क्योंकि हिंदीभाषी क्षेत्रों की जनसंख्या ही स्वयं में बहुत है । जहां तक बोलने-समझने वालों की बात है, अन्य भारतीयों एवं पाकिस्तानियों को मिलाकर यह संख्या 65 करोड़ को पार कर जाती है । दुनिया की सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषाओं में दूसरे, तीसरे अथवा चौथे क्रम (इस संदर्भ में मतैक्य नहीं लगता) पर होने के बावजूद भी इस भाषा को व्यावसायिक क्षेत्र में दस्तावेजी स्तर पर कोई अहमियत नहीं मिली है । मौखिक कारोबार इस देश में हिंदी बोलकर बहुत होता है; बिना उसके कइयों का काम ही न चले । किंतु व्यवसायीगण दस्तावेजी स्तर पर अंग्रेजी पर ही उतरते हैं । अजीब हाल हैं देश के कि बोलें हिंदी लिखें अंग्रेजी !

चीन की हालिया आर्थिक प्रगति और वैश्विक राजनीति में उसकी बढ़ती अहमियत के चलते मैंडरिन का महत्व तेजी से बढ़ रहा है । चंद रोज पहले अंतरजाल के एक लेख में मुझे डेविड ग्रैडल (David Graddol) नामक विशेषज्ञ का यह कथन पढ़ने को मिलाः
“… other languages such as Spanish, Arabic, Hindi/Urdu and Chinese are growing faster than English. The populations who use these languages are younger and have greater potential for economic expansion…”

हिंदी की दशा

‘हमारी राजभाषा’ ‘हमारी राजभाषा’ रटने में हमारी सरकारें पीछे नहीं रहती हैं, और १४ सितंबर के दिन उसके प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग पर बहुत-सी बातें कही जाती हैं । (जुबानी जमाखर्च में वे भी नहीं चूकते जिनके मन में विरोध रहता है ।) परंतु व्यावसायिक कार्य में वही सरकारें किसी न किसी बहाने अंग्रेजी का ही दामन थामे रहती हैं । जब सरकारें ही राजभाषा से विरत रहें, तो निजी संस्थाओं से क्या उम्मीद करें । यह हाल तब है जब कि देश का आम आदमी अंग्रेजी न जानता है, न समझता है, सार्थक अभिव्यक्ति तो बहुतों के वश की बात ही नहीं । महज रोमन लिपि से परिचित होना और उसके कुछ शब्द सीख लेना अंग्रेजी जानना नहीं होता है ।

लगता है कि इंडियनों ने अपनी भाषाओं से परहेज की कसम खा रखी है । इसके विपरीत अन्य प्रमुख देशों में अपनी भाषाओं के प्रति लगाव घट नहीं रहा है । जानकारों का मानना है कि भविष्य में चीनी मैंडरिन अंग्रेजी के साथ-साथ, अथवा उसके विकल्प स्वरूप, विश्व की व्यावसायिक भाषा बनने जा रही है । दरअसल मैंडरिन को आगे बढ़ाने में चीन प्रयत्नशील है । इस समय अमेरिका में सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा वही है । दो साल पहले मुझे यह देखकर थोड़ा अचरज हुआ कि अमेरिका के सिलिकॉन वैली के कुछ प्राथमिक विद्यालयों में मैंडरिन भी द्वितीय भाषा के तौर पर पढ़ाई जाती है । उस क्षेत्र में चीनी एवं कोरियाई लिपि में सूचनापट्ट देखने को मिल जाएंगे ।

संभव है कि डेविड ग्रैडल का उपर्युक्त कथन सही साबित हो जाये। फिलहाल हिंदी की दशा बदलेगी ऐसा लगता नहीं । उम्मीद जगाने वाली खबरें कम ही सुनने को मिलती हैं । 10 तारीख के अपने अखबार में मुझे यह खबर दिखी:

इसे देखते हुए क्या लगता है आपको ? – योगेन्द्र जोशी

मैं लोगों के मुख ये उद्गार सुनता हूं कि हिंदी को समृद्ध करने के लिए अन्य भाषाओं के शब्द अपनाने में हमें हिचकना नहीं चाहिए । वे यह तर्क दे जाते हैं कि अंग्रेजी ने अन्य भाषाओं के शब्द अपनाकर अपना शब्दभंडार बढ़ाया है । मुझे यह शंका सदैव बनी रही है कि यह सब कहने से पहले उन्होंने अंग्रेजी शब्दों के बारे में पर्याप्त जानकारी हासिल की होगी । बात जब उठती है तो वे बिना गहन अध्ययन के और बिना गंभीर विचारणा के बहुत कुछ कह जाते हैं ऐसा मेरा मानना है । क्या उन्होंने यह जानने का कभी प्रयास किया कि अंग्रेजी ने किन परिस्थितियों में, किन शब्दों ेको आंग्लेतर भाषाओं से ग्रहण किया है ? और उन्होंने कितनी उदारता इस संबंध में बरती है ? सुधी जनों को किसी मत पर पहुंचने से पहले एतद्सदृश प्रश्नों पर विचार करना चाहिए । मैं दावा नहीं करता कि इस विषय पर मेरा मत त्रुटिहीन ही हैं, किंतु मैं भी तो समझूं कि कहा गलती कर रहा हूं ।

इसमें दो राय नहीं कि नई-नई आवश्यकताओं के अनुरूप हर भाषा को नये शब्दों की आवश्यकता पड़ती है । ऐसे शब्दों की या तो रचना की जाती है या उन्हें अन्य भाषाओं से उधार ले लिया जाता है । उधार लेने में कोई बुराई नहीं है, बशर्ते कि ऐसा करने के कारण उचित तथा स्वीकार्य हों । ‘मेरी मरजी’ का सिद्धांत अपनाकर अगर आप ऐसे शब्द अपनी भाषा में शामिल कर रहे हों तो आपत्ति की ही जाएगी । अंग्रेजी नये शब्दों की रचना में सुसमृद्ध नहीं है । उसे ग्रीक या लैटिन पर निर्भर रहना पड़ता है । मेरा अनुमान है कि ऐसी विवशता प्रायः सभी आधुनिक प्राकृतिक भाषाओं के साथ है । वस्तुतः स्वयं हिंदी मुख्यतः संस्कृत पर और उर्दू अरबी/फारसी पर निर्भर रही हैं । शायद चीनी भाषा इस मामले में बेहतर है, क्यों उसका संपर्क अन्य भाषाओं से अपेक्षया कम रहा है । लैटिन-ग्रीक आधारित शब्दों के अतिरिक्त भी कई शब्द किसी न किसी आधार पर रचे गये हैं, यथा भौतिकी (फिजिक्स) का ‘लेसर’ (‘लाइट एम्लिफिकेशन बाइ स्टिम्युलेटिड एमिशन अव् रेडिएशन’ का संक्षिप्त) । ‘एक्स-रे’ तथा ’क्वार्क’ शब्दों का भी अपना इतिहास है । ‘पार्टिकल फिजिक्स’ में ‘कलर’, ‘अप’, ‘डाउन’ जैसे रोजमर्रा के शब्द नितांत नये (पहले कभी न सोचे गये तथा आम आदमी की समझ से परे) अर्थों में प्रयुक्त होते हैं ।

अंग्रेजीभाषियों ने संस्कृत मूल के ‘अहिंसा’, ‘गुरु’, ‘पंडित’ जैसे शब्दों को ग्रहण किया है । मेरा अनुमान है कि जो अर्थ इन शब्दों में निहित हैं, ठीक वही उन्हें अपने पारंपरिक शब्दों में नहीं लगा होगा । ध्यान दें कि वे ‘गुरु’ को ‘टीचर’ के सामान्य अर्थ में प्रयोग में नहीं लेते हैं । हिंदी के ‘पराठा’, ‘जलेबी’ आदि शब्द उनके शब्दकोश में आ चुके हैं तो कारण स्पष्ट है; ये उनके यहां के व्यंजन नहीं हैं । हम भी ‘केक’, ‘बिस्कुट’ की बात करते हैं; मुझे कोई आपत्ति नहीं । और ऐसा ही अन्य भाषाओं के साथ रहा होगा । किंतु यह नहीं कि अंग्रेजी में इतर भाषाओं के शब्द अंधाधुंध ठूंस लिए गये हों । जो शब्द उसमें पहुंचे भी हैं वे किसी एक भाषा के नहीं; वे अधिकतर यूरोपीय भाषाओं के हैं तो कुछ हिंदी-उर्दू जैसे भौगोलिक दृष्टि से दूरस्थ भाषाओं के जिनके संपर्क में अंग्रेजी आई । अपनी भाषा में उन्होंने इतर भाषाओं के शब्द नहीं ठूंसे ऐसा मैं इस आधार पर कहता हूं कि आज भी अंग्रेजी में सूर्य, चंद्र, आकाश, वायु, जल आदि शब्दों के पर्याय देखने को नहीं मिलते हैं । उनके यहां पारिवारिक रिश्तों को स्पष्ट करने वाले शब्द नहीं हैं, यथा मौसा-मौसी, मामा-मामी, चाचा-चाची तथा फूफा-बुआ, सब अंकल-आंट, फिर भी वे संतुष्ट, कहीं से इनके लिए उपयुक्त शब्द उधार नहीं लिए गये ।

परंतु हिंदी की स्थिति एकदम अलग है । इसमें अंग्रेजी के शब्दों को ठूंसने में किसी को न हिचक है और न हया । जो इसकी शब्द-संपदा बढ़ाने के पक्ष में तर्क या कुतर्क पेश करते हैं उन्हें इन प्रश्नों पर विचार करना चाहिए । उन्होंने अन्य भारतीय भाषाओं से कितने शब्द उधार लिए हैं ? और कितने शब्द दूसरी यूरोपीय अथवा पूर्व एशिया की भाषाओं से लिए हैं ? केवल अंग्रेजी शब्दों को शामिल करने को ही वे ‘हिंदी को समर्थ बनाना’ क्यों मानते हैं ?

अंग्रेजी किस कदर हिंदी के भीतर घुस रही है देखिए:
1. हिंदी की गिनतियां नई पीढ़ी भूलती जा रही है; सबकी जुबान से अब वन्-टू…हंडेªड निकलता है ।
2. अब साप्ताहिक दिनों के अंग्रेजी नामों का प्रयोग खुलकर हो रहा है, जैसे संडे-मंडे ।
3. लोग रंगों के अंग्रेजी नाम बेझिझक इस्तेमाल करने लगे हैं, जैसे येलो-ग्रीन-रेड ।
4. हालात यहां तक पहुंच चुके हैं कि शरीर के अंग भी अब अंग्रेजी नामों से संबोधित किए जाने लगे हैं, यथा हार्ट-लंग-थ्रोट ।
5. सामाजिक/पारिवारिक रिश्तों की स्थिति असमंजस की बन गयी है । मॉम-डैड, फादर-मदर, फादर-इन-लॉ, सन-इन-लॉ तो आम हो चुके हैं किंतु अन्य रिश्ते समस्या खड़ी कर रहे हैं, क्योंकि रिश्तों के लिए सटीक शब्द अंग्रेजी में हैं ही नहीं और सभी को एक ही नाम देने में अभी लोग हिचक रहे हैं । कल नहीं तो परसों बची-खुची हिचक भी चली जाएगी ।
6. अंग्रेजी के ‘ऑलरेडी’ (पहले ही), ‘डेफिनिट्ली’ (बेशक, निश्चित तौर पर), ‘एंड’ (और), ‘ऑर’ (या), जैसे शब्द हिंदी में जगह पाने में सफल हो रहे हैं । जो थोड़ी भी अंग्रेजी जानता है वह अपनी बात यूं कहने से नहीं हिचकता हैः “अब सिचुएशन अंडर कंट्रोल है । डिस्ट्रिक्ट एड्मिनिस्ट्रेशन को अप्रोप्रिएट स्टेप उठाने के लिए इंस्ट्रक्शन्स ऑल्रेडी दिए जा चुके हैं ।” जाहिर है कि अंग्रेजी न जानने वाले के लिए ऐसे कथनों के अर्थ समझ पाना कठिन है । पर परवाह किसको है ? आधुनिक ‘देवभाषा’ इंग्लिश के लिए तो भारतीय भाषाओं को त्यागा ही जा सकता है न !

अंग्रेजी शब्दों से हिंदी को ‘समर्थ’ बनाने वाले अपने ‘हिंदीभक्तों’ से पूछा जाना चाहिए कि अंग्रेजी में भारतीय भाषाओं के शब्दों को शामिल करके उसे भी अधिक समर्थ बनाने से वे क्यों बचते आ रहे हैं ? उनके मुखारविंद से यह ‘सेंटेंस’ क्यों नहीं निकलता: “My chaachaa has brought a kaangree from Srinagar.” I am sure that English does not have appropriate words for the two non-English words in this sentence; using them would benefit English.” (मुझे विश्वास है कि इस वाक्य के दोनों गैर-अंग्रेजी शब्दों के लिए उपयुक्त शब्द अंग्रेजी में नहीं हैं; इन्हें प्रयोग में लेने से अंग्रेजी को लाभ मिलेगा ।)

(टिप्पणी: kaangree, कांगड़ी – शरीर को गर्म रखने के लिए एक छोटी टोकरीनुमा अंगीठी, जिसे काश्मीरी लोग पेट के निकट ढीले कपटों के भीतर छुपाकर प्रयोग में लेते हैं ।)

तो यह था एक संक्षिप्त विवरण हिंदी में अंग्रेजी शब्दों की अमर्यादित भरमार का । आखिर ऐसा क्यों है ? मुझे जो कारण समझ में आते हैं उनकी चर्चा अगली पोस्ट में । ‘टिल देन, गुड बाय.’ – योगेन्द्र जोशी