Home

श्री शशिशेखर जी,

मैंने आपका लेख “हत्‌भागिनी नहीं हमारी हिंदी” (हिन्दुस्तान, सितंबर 8) पढ़ा । उसी के संदर्भ में अपनी टिप्पणी प्रेषित कर रहा हूं । (अपने ब्लॉग https://hinditathaakuchhaur.wordpress.com में भी मैं इसे शामिल कर रहा हूं ।)

प्रथमतः मैं निवेदन करता हूं कि ‘हत्‌भागिनी’ न होकर ‘हतभागिनी’ होना चाहिए था । शब्द हत (मारा गया) है न कि हत् । शीर्षक में यह त्रुटि खलती है; अन्यथा चल सकता था । इस धृष्टता के लिए क्षमा करें ।

देश-विदेश में हिंदी, पर कितनी?

लेख में आप इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिंदी देश-विदेश में विस्तार पा रही है और अधिकाधिक लोग इसे प्रयोग में ले रहे हैं । आपने जिन अनुभवों की बात की है वे कमोवेश सभी को होते हैं, खास तौर पर इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में । सीधा-सा तथ्य यह है कि जहां कहीं भी पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी/उर्दूभाषी लोग रह रहे हैं, या बस चुके हैं, वहां उनके बीच हिंदी का प्रचलन देखने को मिल जाता है । जब विदेश में अपने देश अथवा भाषाई-सांस्कृतिक दृष्टि से निकटता रखने वाले अन्य देशों के निवासी पहुंचते हैं, तब उनमें परस्पर अपनापन का भाव जगता है यह स्वयं मेरा अनुभव रहा है ।

जब मैं 1983-85 में साउथहैम्पटन (इंग्लैंड) में था तब भारतीयों एवं पाकिस्तानियों से मेरी हिंदी में ही बात होती थी । लंडन के पास साउथहॉल का नजारा कुछ ऐसा हुआ करता था कि वहां पहुंचने पर ‘हम भारत में हैं’ ऐसा लगता था । साउथहैम्पटन में गुजराती दुकानदारों से मैं भारतीय भोजन सामग्री खरीदते समय अक्सर हिंदी में बात करता था । आरंभ में मैं एक पाकिस्तानी खान साहब के मकान में रहा, उनसे हिंदी में बात होती थी । बाद में किसी पंजाबी सज्जन के मकान में रहा जिसके पड़ोस में पंजाबी परिवार रहता था । उस परिवार की हिंदी-पंजाबी बोलने वाली महिला से मेरी पत्नी के अच्छे ताल्लुकात हो चले थे । मुझे एक पाकिस्तानी महोदय की याद है जिन्होंने कहा था, “आप लोग हिंदी बोलने की बात करते हैं, क्या यही हिंदी है, उर्दू जैसी ?”

उन दिनों भारत सरकार हवाई अड्डे पर मात्र 12-13 पौंड की रकम देती थी । मैं जब साउथहैम्पटन पहुंचा तो पता चला कि उस दिन सार्वजनिक छुट्टी है । उसके तथा विदेश यात्रा का पूर्ववर्ती अनुभव न होने के कारण तब मुझे काफी परेशानी झेलनी पड़ी थी । उस दिन एक बांग्लादेशी मूल के रेस्तरांवाले ने मुझे मुफ्त में भोजन कराया था ।

अमेरिका (सिलिकॉन वैली) में भी मेरे अनुभव कुछ मिलते-जुलते रहे । मेरे बेटे के हिंदुस्तानी साथियों के बीच हिंदी-अंगरेजी में वार्तालाप सामान्य बात होती थी । वहां बसे उसके एक मित्र के 5-7 साल के बच्चों को हिंदी में बोलते देख मुझे आश्चर्य हुआ । पता चला कि वे गरमियों में भारत आकर दादा-दादी के पास ठहरते हैं और हिंदी सीखते हैं ।

कहने का मतलब है कि दुनिया के जिन हिस्सों में पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी मूल के लोग हैं वहां वे प्रायः आपका स्वागत करेंगे और हिंदी बोलते हुए भी दिख जाएंगे ।

मुझे पता चला कि कैलिफोर्निया में कुछ प्राथमिक विद्यालयों में चीनी भाषा भी पढ़ाई जाती है । संप्रति अमेरिका में यह सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा है । वहां कई चीनी/कोरियाई मूल के लोगों की दुकानों पर नामपट्ट तक संबंधित लिपि में देखने को मिलते हैं । वहां के एक ‘कंडक्टेड टूअर’ का अनुभव मुझे याद है जिसका गाइड ताइवान मूल का युवक था, जिसने अपनी कमजोर अंगरेजी एवं मजबूत चीनी भाषा में पर्यटक स्थलों का परिचय कराया था । साथ में उपलब्ध पाठ्यसामग्री चीनी एवं अंगरेजी, दोनों में, थी । इस माने में हिंदी एकदम पीछे है ।

आपके-मेरे सरीखे अनुभव संतोष करने के लिए काफी नहीं हैं ऐसा मेरा मानना है । आपने इन दो बातों पर खास कुछ नहीं कहा:

(1) पहला, जो हिंदी अब पढ़ेलिखे लोगों के बीच जड़ें जमा रही है वह दरअसल हिंदी-अंगरेजी का मिश्रण है, और

(2) दूसरा, लिखित रूप में हिंदी की प्रगति निराशाप्रद ही है ।

हिंदी-अंगरेजी मिश्रभाषा

(1) जिस प्रकार यह देश ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ में बंटा है वैसे ही हिंदी (और कदाचित अन्य भारतीय भाषाएं) भी दो श्रेणियों में बंटी है । पहली को मैं व्यक्तिगत तौर पर मैट्रोहिंदी कहता हूं । इसे आप ‘महानगरीय हिंदी’, ‘एंग्लिसाइज्ड हिंदी’, ‘एंग्लोहिंदी’, अथवा ‘हिंदी-इंग्लिश मिश्रभाषा’ या कुछ और नाम दे सकते हैं । यह उन लोगों की भाषा है जो इस देश को ‘भारत’ नहीं कहते बल्कि ‘इंडिया’ कहते हैं । आप बताइए कितने पढ़ेलिखे लोगों के मुख से भारत शब्द निकलता है ? यह उस देश के हाल हैं जहां लोग मुंबई, चेन्नई, पुणे, पश्चिमबंग, ओडिशा, आदि नामों के लिए अभियान चलाते हैं, लेकिन देश को इंडिया कहना पसंद करते हैं । यह उन शिक्षित लोगों की भाषा है जो अंगरेजी के इस कदर आादी हो चुके हैं कि उन्हें समुचित हिंदी शब्द सूझते ही नहीं अथवा उन्हें याद नहीं आते हैं । आज स्थिति यह है कि ‘एंड’, ‘बट’, ‘ऑलरेडी’ आदि शब्द जुबान पर तैरते रहते हैं । कुछ लोग शारीरिक अंगों, ‘किड्नी’, ‘लिवर’, ‘मशल’ आदि और ‘ग्रे’, ‘मरून’ आदि जैसे रंगों की हिंदी बताने में भी असमर्थ पाये जाएंगे । हिंदी की गिनतियां अब जुबान पर कम ही आती हैं । कितने उदाहरण दें ? इस भाषा में अंगरेजी शब्द ही नहीं, वाक्यांश या पूरे वाक्य भी शामिल रहते हैं । पर्याप्त अंगरेजी न जानने वाले की समझ से परे ‘कम्यूनिके’, ‘कॉर्डन-आफ’, ‘सेफ्टी मेजर्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है । यह सब हो रहा है इस कुतर्क के साथ कि इससे हमारी हिंदी समृद्ध होती है । लेकिन अंगरेजी की शुद्धता के लिए वे पूर्णतः सचेत रहते हैं । उसको भी समृद्ध क्यों नहीं बनाते ?

AmarUjala - Mixed Scripts

दूसरी तरफ हमारी ‘देसी’ हिंदी है जो ग्रामीणों, अशिक्षितों/अल्पशिक्षितों, श्रमिकों आदि के द्वारा बोली जाती है, जिनका अंगरेजी ज्ञान अपर्यााप्त रहता है । उस हिंदी की बात होती ही कहां है ?

यह ठीक है कि अभी उक्त मिश्रभाषा का प्रयोग साहित्यिक कृतियों में नहीं हो रहा है, लेकिन टीवी चैनलों पर तो यही अब जगह पा रही है । विज्ञापनों की भाषा भी यही बन रही है । दिलचस्प तो यह है कि इस भाषा की लिपि भी देवनागरी एवं रोमन का मिश्रण देखने को मिल रहा है । इंटरनेट पर रोमन में लिपिबद्ध हिंदी खुलकर इस्तेमाल हो रही है, जब कि फोनेटिक की-बोर्ड के साथ यूनिकोड में टाइप करना कठिन नहीं होता ।

आशाप्रद नहीं लिखित हिंदी की स्थिति

(2) निःसंदेह हिंदी – अंगरेजी मिश्रित ही सही – एक बोली के रूप में विस्तार पा रही है । लेकिन लिखित तौर पर इसका इस्तेमान कितना हो रहा है ? एक ओर सरकारें इसे संघ की राजभाषा कहती हैं अैर दूसरी ओर वही इससे परहेज रखती हैं । ऐसे में अधिक उम्मीद कैसे की जा सकती है ? लोग बातें तो हिंदी में करते हैं, लेकिन लिखित में कुछ बताना हो तो अंगरेजी पर उतर आते हैं । डॉक्टर मरीज से हिंदी में करता है किंतु नुसखा अंगरेजी में ही लिखता है, इस बात की परवाह किए बिना कि मरीज उसे समझ पाएगा या नहीं । लिफाफे पर पता, रेलवे आरक्षण फॉर्म, बैंक लेनदेन का फॉर्म, इत्यादि वे अंगरेजी में ही भरते हैं, अगर वे अल्पशिक्षित न हों तो । कितनी सरकारी संस्थाएं आप गिना सकते हैं जिनकी वेबसाइटें हिंदी में हैं; अगर कहीं हैं तो अधकचरे । इंटरनेट पर कितने फार्म हैं जिन्हें देवनागरी में भरने का विकल्प उपलब्ध हो ? रेलवे आरक्षण टिकट हों या बिजली/टेलीफोन बिल उनकी प्रविष्टियां अंगरेजी में ही मिलेंगी ! जिस देश की सर्वोच्च अदालत ‘नो हिंदी’ कहे, यूपीएससी जैसी संस्था ‘अंगरेजी कंपल्सरी’ कहे, वहां हिंदी का भविष्य कैसा होगा सोचा जा सकता है ।

देश की व्यावसायिक संस्थाओं ने तो जैसे कसम खा रखी है कि वे हिंदी हरगिज नहीं चलने देंगे । बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामग्री के बारे में कितनी संस्थाएं हिंदी-देवनागरी में जानकारी देती हैं ? बिस्किट पैकेट हो या टूथपेस्ट या अन्य उत्पाद उन पर हिंदी दिख जाए तो अहोभाग्य । कंप्यूटर संबंधी उपस्करों के साथ उपलब्ध जानकारी वियतनामी, थाई, हिब्रू, आदि में मिल जाएगी, लेकिन भारतीय भाषाओं में नहीं । हिंदीभाषी क्षेत्रों के दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में घूम जाइए, आपको हिंदी में शायद ही कहीं नामपट्ट दिखें ।

इस बात से आप अगर संतुष्ट हों कि अब अधिक लोग हिंदी बोल रहे हैं, भले ही उसे विकृत कर रहे हों, और उसे न लिखने की कसम खाए हों तो खुशकिस्मत हैं । लेकिन मुझे इसमें संतोष की गुंजाइश नहीं दिखती ।

भवदीय,

योगेन्द्र जोशी

बीते मार्च माह की 26 तारीख अहमदाबाद अवस्थित आई.आई.एम. (इंडियन इंस्टिट्यूट आफ् मैनेजमेंट, भारतीय प्रबंधन संस्थान) में दीक्षांत समारोह था । मुझे भी उस समारोह में बतौर अतिथि के उपस्थित होने का अवसर मिला था । उस आयोजन में देश के माननीय प्रधानमंत्री, डा. मनमोहन सिंह, एवं गुजरात राज्य के माननीय मुख्यमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी, भी मौजूद थे और दोनों ने छात्र, शिक्षक एवं अतिथि समुदाय को संबोधित किया । जहां श्री मोदी ने अपने विचार अलिखित, स्वतःस्फूर्त एवं दमदार तरीके से पेश किये, वहीं डा. सिंह का संबोधन लिखित, महज औपचारिक, एवं नितांत निष्प्रेरक था । डा. सिंह के संबोधन के प्रति निराशाजनक प्रतिक्रिया मैंने कुछएक छात्रों के मुख से सुनीं ।

अस्तु, इस स्थल पर मेरा इरादा उस आयोजन की व्यवस्था, संबोधनोंउद्बोधनों आदि के बारे में चर्चा करने का नहीं है । नामोच्चारण की एक समस्या जो मैंने वहां देखी वह मेरे प्रस्तुत आलेख का विषय है । समारोह के दौरान जब छात्रों को अर्जित उपाधियां प्रदान की जा रही थीं, तब उनके नाम कितने सही उच्चारित हो रहे थे यह ठीकठीक बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है । मैं एकएककर पुकारे जा रहे नामों को बहुत ध्यान से सुन भी नहीं रहा था । किंतु एक नाम, जिसने अनायास मेरा ध्यान खींचा वह था अतानु। असल नाम अतनुया अतनूहै, जो बंगाली समुदाय में पर्याप्त प्रचलित है, दोनों एकार्थी हैं, और मेरी समझ से इनका अर्थ तनुहीन’, ‘बिना देह का’, ‘अशरीरीअथवा अमूर्तहोना चाहिए । वस्तुतः संस्कृत में तनुस्’ (नपुंसक लिंग) तथा तनू’ (स्त्रीलिंग, दीर्घ ऊ की मात्रा) दोनों हैं । प्रचलित भाषाओं में तनुस्को तनु की भांति प्रयोग में लिया जाएगा । किसी पुरुष का नाम ह्रस्व उ के साथ लिखा जाना पारंपरानुरूप है ।

वस्तुतः उस छात्र का नामअतनु राय’ (या रॉय) था । उससे मेरा परिचय पहले ही हो चुका था, अपने बेटे के माध्यम से । संयोग से यह नाम मेरे लिए सुपरिचित था । कोई तीन दशक पहले ठीक इसी नाम का एक छात्र मेरे विश्वविद्यालय के चिकित्सा संस्थान में डाक्टरेटउपाधि के लिए अध्ययनरत हुआ करता था । मेरे पड़ोस में रहने के कारण उससे हमारा अच्छाखासा परिचय था । तब तक यह नाम मेरे लिए पूर्णतः नया और कभीसुनाहुआ था । उक्त दीक्षांत के अवसर पर संयोग से ठीक उसी नामजातिनाम के एक और छात्र से मेरा संक्षिप्त परिचय हो गया था । दीक्षांत आयोजन के पश्चात् मैंने उससे पूछा कि उसका नाम क्या सही पुकारा गया था । तब उसने बताया कि नाम तो अतनु ही है । इस नाम में की विशिष्ट बंगाली ध्वनि निहित है, किंतु अन्य भाषाभाषी अतनुके अनुरूप ही पुकारेंगे ।

उस अवसर पर मेरे जेहन में यह सवाल उठा कि उक्त नाम का सही उच्चरण न कर पाने का क्या कारण रहा होगा । संस्था से जुड़े किसी व्यक्ति से उत्तर पाने की कोशिश मेरे लिए संभव नहीं थी । मैंने स्वयं संभव तार्किक उत्तर सोचने का प्रयास किया । जो मैं समझ पाया वह यों हैः हमारे देश में भले ही घोषित राजभाषा हिंदी हो, लगभग सभी कामकाज अंग्रेजी में ही होते हैं, खास तौर पर शिक्षण संस्थाओं में इस्तेमाल होने वाली वाली छात्रछात्राओं की सूची तैयार करने में । आईआईएम जैसी संस्था में तो अंग्रेजी से इतर कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो सकता है । रोमन लिपि की एक गंभीर कमी यह है कि इसमें लिखित किसी नाम का सहीसही उच्चारण क्या होगा यह कह पाना कठिन होता है । वस्तुतः हर उस लिपि के साथ ऐसी समस्या होती है, जो ध्वनिमूलक नहीं होती है । अंग्रेजों के यहां नामों की भरमार नहीं है । उस समाज में व्यक्तियों के नाम घूमफिर के वहीवही रहते हैं, अतः वहां के बाशिंदों के नामों की वर्तनी और उनके उच्चारण लोगों को कमोबेश मालूम रहते हैं ।

किंतु हमारे यहां, विशेषतः हिंदू समाज में नामों की विविधता उल्लेखनीय है । हाल के वर्षों में तो एक नया चलन देखने को मिल रहा है, जिसके अनुसार बच्चों के नाम खोजखोजकर ऐसे चुने जाने लगे हैं जो नितांत नये हों, कभी सुने न गये हों, और जिस नाम का दूसरा व्यक्ति ढूढ़ने पर भी न मिले । अपनी देशज लिपियों में इन्हें लिखने और उसके अनुसार उच्चारित करने में कोई परेशानी नहीं होती है । किंतु रोमन में व्यक्त किये जाने पर इन नामों को सहीसही पुकारना कठिन होता है, विशेषतः जब वे कभी पहले सुने ही न गये हों । अपने देश के कामकाज में रोमन लिपि को ऐसे नहीं ढाला गया है कि हमारी अलगअलग ध्वनियों को स्पष्टतः भिन्न रोमन लेटर/लेटर्ससे व्यक्त किया जा सके । आप अंग्रेजी `a’ को देखकर निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि वह की ध्वनि व्यक्त करता है या की । कुछ ऐसा ही `i’ के मामले में भी है । वस्तुतः ऐसे अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनके उच्चारण में संदिग्धता का सामना करना पड़ सकता है । क्या आप ऋतुएवं रितुको रोमन में स्पष्टतः भिन्न वर्तनी से व्यक्त कर सकते हैं ? रोमन में बुद्ध (बुद्धा?) एवं बुड्ढा में फर्क कर पाना कठिन है । इस प्रकार के अनेकों उदाहरण देखने को मिल जाएंगे । अवश्य ही विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग का संभव है, किंतु आम लेखन में उनका प्रयोग कोई नहीं करता है, और न ही उनका प्रयोग सुविधाजनक होता है ।

लेकिन भारतीय जनमानस अंग्रेजी एवं उसकी लिपि रोमन (या लैटिन) के समक्ष इस कदर नतमस्तक है कि उसे वे अमृत तुल्य, जीवनरक्षक, तथा अपरिहार्य लगते हैं । उसके लिए भारतीय लिपियों का ध्वन्यात्मक होना कोई महत्त्व नहीं रखता है । अब तो सर्वत्र अंग्रेजी एवं रोमन का ही बोलबाला नजर आता है । हिंदी आम बोलचाल तक सीमित है वह भी अंग्रेजी शब्दों की भरमार के साथ और वह दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकी है । अतः पढ़ेलिखे भारतीयों बेहतर होगा इंडियनों कहना का एक वर्ग ऐसा उभर चुका है जिसका हिंदी एवं देवनागरी का ज्ञान अत्यल्प है और अपने अज्ञान पर उसे खेद नहीं बल्कि गर्व का अनुभव होता है । यह वर्ग देशज साहित्य से परहेज रखता है; वह आम तौर पर भारतीय लिपियों में निबद्ध समाचारपत्रोंपत्रिकाओं को नहीं पढ़ता है; उसके पुस्तकसंग्रह में शायद ही कोई देशी भाषा की पुस्तक देखने को मिले । इस वर्ग के लोगों का देशी भाषाओं के शब्दों पर आधारित नामों का ज्ञान अपर्याप्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी । मैं समझता हूं कि आई.आई.एम. जैसी संस्थाओं में बहुत कम लोग होंगे जो आजकल प्रचलन में लिए जा रहे अपारंपरिक एवं असामान्य नामों का ठीकठीक उच्चारण करने में समर्थ होंगे

मैंने ‘अतनु रॉयका उदाहरण पेश किया है । उस दीक्षांत समारोह से संबद्ध दीक्षीत छात्रों की सूची में मुझे ऐसे नाम लिखे हुए मिले जिनका उच्चारण क्या होगा यह मैं तय नहीं कर सका । कुछएक यों हैं:Ashtha Agarwalla (आस्था/अष्ठ अगरवाल्ला/अगरवाल/…), Aarthy Sridhar (आरती/आर्ती/आरथी/… श्रीधर/स्रीधर), Astha Modi (आस्था/अष्ठा मोदी), Anil Meena (अनिल मीणा/मीना), Mansi Chilalia (मानसी/मांसी चिललिया/चिलालिआ), Pritika Padhi (प्रीतिका पाढी/पाधी), V. M. Avinass Kumar (वी. एम. अविनाश/अविनास्स कुमार), Maneka Bhogale (मेनका/मनेका भोगले/भोगाले) हाल में मुझे अपने परिचितों के बच्चों के ये अपरिचित से नाम सुनने को मिलेः अरविंदाक्षाएवं आयुषी। पहला नाम रोमन में सहीसही कैसे लिखा जाना चाहिए Arvindaksha या Aravindaksha ? और दूसरे नाम की उचित वर्तनी क्या होनी चाहिए Ayushi या Ayushee ? जिसने इन नामों को पहले कभी सुना न हो और जिसे संस्कृत का थोड़ाबहुत ज्ञान न हो उसके लिए इनका सही उच्चारण संभवतः कठिन हो । लेकिन देवनागरी में लिखे होने पर यह समस्या नहीं रहती है, भले ही इन सार्थक नामों के अर्थ मालूम न हों । (अरविंदाक्ष = अरविंद + अक्ष; उससे स्त्रीलिंग में अरविंदाक्षा, कमल के समान नयन वाली । आयुषी संस्कृत के नपुंसक शब्द आयुस्’ = आयु से बना हुआ प्रतीत होता है स्त्रीत्व का बोध कराने के लिए । मैं कह नहीं सकता कि संस्कृतज्ञ इसे स्वीकार्य शब्द मानेंगे कि नहीं; आयुष्मान्, आयुष्मती अवश्य प्रचलित हैं ।)योगेन्द्र जोशी