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एक प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास मैं अरसे से करता आ रहा हूं कि किसी भाषा में अन्य भाषाओं, विशेषतः विदेशी भाषाओं, के शब्द किस सीमा तक ठूंसे जाने चाहिए और किन परिस्थितियों में । क्या इतर भाषाओं के शब्दों का प्रयोग इस सीमा तक किया जाना चाहिए कि उनसे अपनी भाषा के प्रचलित शब्द विस्थापित होने लगें ? क्या इस तथ्य को भूला देना चाहिए कि जब कोई शब्द लोगों की जुबान पर छा जाए तो उसके तुल्य अन्य शब्द अपरिचित-से लगने लगेंगे ? क्या समय के साथ वे आम भाषा से गायब नहीं हो जाएंगे ? जो लोग अपनी मातृभाषा तथा अन्य सीखी गई भाषाओं की शब्द-संपदा में रुचि रखते हैं उनकी बात छोड़ दें । वे तो उन शब्दों का भी प्रयोग बखूबी कर सकते हैं जिन्हें अन्य जन समझ ही न पाएं । मैं हिन्दी के संदर्भ में बात कर रहा हूं । ऐसे अवसरों पर लोग अक्सर कहते हैं “जनाब, कठिन संस्कृत शब्द मत इस्तेमाल कीजिए ।” (भले ही वह संस्कृत मूल का शब्द ही न हो ।)

अंगेरजी को लेकर हम भारतीय हीनभावना से ग्रस्त हैं । अगर कोई संभ्रांत व्यक्ति लोगों के बीच अंगरेजी का उपयुक्त शब्द बोल पाने में असमर्थ हो तो वह स्वयं को हीन समझने लगता है और सोचता है “काश कि मेरी अंगरेजी भी इनके जैसी प्रभावी होती ।” इसके विपरीत स्वयं को हिन्दीभाषी कहने वाला कोई व्यक्ति साफसुथरी हिन्दी (मेरा मतलब है जिसमें हिन्दी प्रचलित शब्द हों और अंगरेजी शब्दों का अनावश्यक प्रयोग न हो) न बोल सके तो वह अपनी कमजोर हिन्दी के लिए शर्मिदा नहीं होगा, बल्कि तर्क-कुतर्कों का सहारा लेकर अपनी कमजोर हिन्दी को उचित ठहराएगा । इतना ही नहीं वह बातचीत में ऐसे अंगरेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग करेगा जिनका अर्थ अधिसंख्य लोग न समझ पाते हों । वह इसकी परवाह नहीं करेगा कि दूसरों की अंगरेजी अच्छी हो यह आवश्यक नहीं । वह सोचेगा, भले ही मुख से न कहे, कि लोगों को इतनी भी अंगरेजी नही आती । हिन्दी न आए तो चलेगा, अंगरेजी तो आनी ही चाहिए । वाह !

अधिकांश पढ़ेलिखे, प्रमुखतया शहरी, हिन्दीभाषियों के मुख से अब ऐसी भाषा सुनने को मिलती है जिसे मैं हिन्दी मानने को तैयार नहीं । यह एक ऐसी वर्णसंकर भाषा या मिश्रभाषा है जिसे अंगरेजी जानने लेकिन हिन्दी न जानने वाला स्वाभाविक तौर पर नहीं समझ पाएगा । किंतु उसे वह व्यक्ति भी नहीं समझ सकता जो हिन्दी का तो प्रकांड विद्वान हो पर जिसने अंगरेजी न सीखी हो । इस भाषा को मैंने अन्यत्र मैट्रोहिन्दी नाम दिया है । बोलचाल की हिन्दी तो विकृत हो ही चुकी है, किंतु अब लगता है कि अंगरेजी शब्द साहित्यिक लेखन में भी स्थान पाने लगे हैं । अवश्य ही लेखकों का एक वर्ग कालांतर में तैयार हो जाएगा जो इस ‘नवशैली’ का पक्षधर होगा । आगे कुछ कहने से पहले मैं एक दृष्टांत पेश करता हूं जिसने मुझे अपने ब्लाग (चिट्ठे) में यह सब लिखने को प्रेरित किया है ।

‘साहित्यशिल्पी’ नाम की एक ‘ई-पत्रिका’ से मुझे उसमें शामिल रचनाएं बीच-बीच में ई-मेल से प्राप्त होती रहती हंै । उसकी हालिया एक रचना का ई-पता यानी ‘यूआरएल’ ये हैः

http://www.sahityashilpi.com/2015/07/igo-story-sumantyagi.html

उक्त रचना एक कहानी है जिसका शीर्षक है ‘ईगो’ । यह अंगरेजी शब्द है जिसका अर्थ है ‘अहम्’ जिसे ठीक-ठीक कितने लोग समझते होंगे यह मैं कह नहीं सकता । इस रचना में हिन्दी के सुप्रचलित शब्दों के बदले अंगरेजी के शब्दों का प्रयोग मुझे ‘जमा’ नहीं, इसीलिए टिप्पणी कर रहा हूं । प्रथमतः यह स्पष्ट कर दूं कि मैं कोई साहित्यिक समीक्षक या समालोचक नहीं हूं बल्कि एक वैज्ञानिक हूं । मैं किसी भी भाषा के सुप्रतिष्ठित शब्दों के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग का विरोधी हूं । इसीलिए तद्विषयक अपनी बात कह रहा हूं ।

उक्त कहानी के शुरुआती परिच्छेद में अंगरेजी शब्द नहीं दिखे मुझे, किंतु “मिस्टर शर्मा” और “मिसेज शर्मा” का उल्लेख हुआ है । आजकल औपचारिक संबोधन के समय कई लोग मिस्टर, मिसेज, मिज आदि का प्रयोग करने लगे हैं । क्या हिन्दी के तुल्य शब्दों का प्रयोग कठिन है ? अथवा हम इस भावना से ग्रस्त रहते हैं कि अंगरेज जो हमें दे गए हैं उसे वरीयता दी जानी चाहिए ? अस्तु । मैं कहानी के पाठ से चुने गए उन वाक्यों/वाक्यांशों/पदबंधों को उद्धृत कर रहा हूं जिनमें विद्यमान अंगरेजी शब्द मुझे अनावश्यक या अटपटे लगते हैं:

“तेरे हेल्प करने से” … “और बैकग्राउंड में” … “मम्मी का म्यूजिक जारी” … “अपनी फैमिली को” … “शर्मा फैमिली को”  … “दोनों काफी टाइम चैटरबॉक्स बनी रहती” …”पर्सनल बातें शेयर करती” … “वो स्टडी से रिलेटेड हों या फैमिली से” … “कुछ भी स्पेशल हो” … “दोनों का चैट ऑप्सन हमेशा ऑन रहता” … “ननद-भाभी न हों बेस्ट फ्रेंड्स हों” … “अपनी जॉब के लिए” … “अपनी स्टडी कंपलीट करने” … “जिंदगी में कोई टिवस्ट न हो” … “ऋचा और टीना की लाइफ रील लाइफ न होकर रियल लाइफ थी” … “फोन डिसकनेक्ट कर दिया” … “पूरी फैमिली को दहेज के लिए ब्लेम कर दिया” … “जिसका परपज” … “एक नॉर्मल बात” … “फ्रेंडशिप का कोई महत्व नहीं” … “एक लविंग और केयरिंग फ्रेंड की तरह” … “हमारा रिलेशन स्पेशल हो” … “उनको इग्नोर करने” … “जरा भी अंडरस्टैंडिंग नहीं थी” … “इतनी ही थी उनकी फ्रेंडशिप” … “सॉरी कह चुकी थी” … “फ्रेंडशिप की खुशबू” … “ऋचा स्टडी कंप्लीट करके” … “काम में बिजी रखती” …”जितनी भी ड्यूटीज होती” … “मैसेज किये थे” … “आई मिस यू” … “उसके ईगो ने” … “मेरा ईगो था” … “ऐसा ईगो जाये भाड़ में जो एक फ्रेंड को फ्रेंड से दूर कर दे” … “दिल से सॉरी ,प्लीज मुझे माफ कर दो” … “बोली,´कम´।” … “कोई ईगो प्रॉब्लम नहीं” … 

          उपरिलिखित अनुच्छेद में जो अंगरेजी शब्द मौजूद हैं उनमें से एक या दो को छोड़कर शायद ही कोई हो जिसके लिए सुपरिचित एवं आम तौर पर प्रचलित हिन्दी का तुल्य शब्द न हो । उदाहरणार्थ परिवार, दोस्त/मित्र, दोस्ती/मित्रता, सामान्य/आम, विशेष/खास, एवं समस्या आदि हिन्दी शब्दों के बदले क्रमशः फैमिली, फ्रैंड, फैंडशिप, नॉर्मल, स्पेशल एवं प्रॉब्लम आदि का प्रयोग क्यों किया गया है ? क्या हिन्दीभाषी लोगों की अभिव्यक्ति की विधा से हिन्दी के सदा से प्रचलित शब्द गायब होते जा रहे हैं ? क्या हम “फोन डिसकनेक्ट कर दिया” के बदले “फोन काट दिया”, “फोन रख दिया”, या “फोन बंद कर दिया”जैसे वाक्य प्रयोग में नहीं ले सकते ? थोड़ा प्रयास करने पर उक्त अनुच्छेद के अन्य अंगरेजी शब्दों/पदबंधों/वाक्यांशों के लिए भी तुल्य हिन्दी मिल सकती है ।

आज के अंगरेजी-शिक्षित शहरी हिन्दीभाषियों के बोलचाल एवं लेखन (अभी लेखन कम प्रभावित है) में हिन्दी के बदले अंगरेजी शब्दों की भरमार पर विचार करता हूं तो मुझे अधोलिखित संभावनाएं नजर आती हैं:

(1) पहली संभावना तो यह है कि व्यक्ति हिन्दीमय परिवेश में न रहता आया हो और उसके कारण उसकी हिन्दी-शब्दसंपदा अपर्याप्त हो । हिन्दी-भाषी क्षेत्रों के लेखकों (और उनमें प्रसंगगत कहानी की लेखिका शामिल हैं) पर यह बात लागू नहीं होती होगी ऐसा मेरा अनुमान है ।

(2) दूसरी संभावना है असावधानी अथवा एक प्रकार का उपेक्षाभाव जिसके तहत व्यक्ति इस बात की चिंता न करे कि उसकी अंगरेजी-मिश्रित भाषा दूसरों के समझ में आएगी या नहीं और दूसरे उसे पसंद करेंगे या नहीं । भारतीय समाज में ऐसी लापरवाही मौके-बेमौके देखने को मिलती है, जैसे सड़क पर थूक देना, जहां-तहां वाहन खड़ा कर देना, शादी-ब्याह के मौकों पर सड़कों पर जाम लगा देना, धार्मिक कार्यक्रमों पर लाउडस्पीकरों का बेजा प्रयोग करना, इत्यादि । भाषा को विकृत करने में भी यही उपेक्षाभाव दिखता है।

(3) हमारे देश में व्यावसायिक, वाणिज्यिक एवं शासकीय क्षेत्रों में अंगरेजी छाई हुई है । इसी अंगरेजीमय वातावरण में सभी रह रहे हैं । लोगों को चाहे-अनचाहे अंगरेजी शब्दों का सामना पग-पग पर करना पड़ता है । ऐसे माहौल में कई जनों की स्थिति वैसी हो जाती है जैसी वाराणसी के हिन्दीभाषी मल्लाहों और रिक्शा वालों की, जिनकी जबान पर विदेशी एवं अहिन्दी क्षेत्रों के पर्यटकों के संपर्क के कारण अंगरेजी तथा अन्य भाषाओं के शब्द तैरने लगते हैं । ऐसे माहौल में जिसे अंगरेजी ज्ञान न हो उसे भी अंगरेजी के शब्द स्वाभाविक-परिचित लगने लगते हैं । मुझे यह देखकर खेद होता है कि बोलचाल में लोगों के मुख से अब अंगरेजी शब्द सहज रूप से निकलते हैं न कि हिन्दी के । फिर भी लेखन के समय सोच-समझकर उपयुक्त या वैकल्पिक शब्द चुने जा सकते हैं बशर्ते कि लेखक दिलचस्पी ले ।

(4) कुछ लोगों के मुख से मुझे यह तर्क भी सुनने को मिलता है कि भाषाओं को लेकर संकीर्णता नहीं बरती जानी चाहिए, बल्कि पूरी उदारता के साथ अन्य भाषाओं के शब्द ग्रहणकर अपनी भाषा को अधिक समर्थ एवं व्यवहार्य बनाना चाहिए । ठीक है, परंतु सवाल उठता है कौन-से शब्द एवं किस भाषा से ? क्या अंगरेजी ही अकेली वह भाषा है जिससे शब्द उधार लेने चाहिए ? और क्या शब्दों का आयात उन शब्दों को विस्थापित करने के लिए किया जाए जिन्हें आज तक सभी जन रोजमर्रा की जिन्दगी में इस्तेमाल करते आए हैं ? क्या यह जरूरी है कि हम एक-दो-तीन के बदले वन-ट्वू-थ्री बोलें ? क्या लाल-पीला-हरा के स्थान पर  रेड-येलो-ग्रीन कहना जरूरी है ? क्या मां-बाप, पति-पत्नी न कहकर पेरेंट्स, हजबैंड-वाइफ कहना उचित है ? क्या हम बच्चों को आंख-नाक-कान भुलाकर आई-नोज-इअर ही सिखाएं ? ऐसे अनेकों शब्द हैं जिन्हें हम भुलाने पर तुले हैं । आज कई बच्चे अड़सठ-उनहत्तर, कत्थई, यकृत जैसे शब्दों के अर्थ नहीं बता सकते हैं । जाहिर है कि आज के प्रचलित शब्द कल अनजाने लगने लगेंगे ।

          हिन्दी को अधिक समर्थ बनाने के नाम पर अंगरेजी के शब्दों को अनेक हिन्दीभाषी बोलचाल में अंधाधुंध तरीके से इस्तेमाल करते आ रहे हैं । वे क्या देशज भाषाओ के शब्दों को भी उतनी ही उदारता से स्वीकार कर रहे हैं ? क्या भारत में प्रचलित अंगरेजी में हिन्दी एवं अन्य भाषाओं के शब्दों को प्रयोग में लेने का प्रयास कभी किसी ने किया है ? हिन्दीभाषी आदमी “प्लीज मुझे अपनी हिन्दी ग्रामर बुक देना ।” के सदृश वाक्य धड़ल्ले से बोल देता है, परंतु क्या “कृपया गिव मी योअर हिन्दी व्याकरण पुस्तक ।” जैसा वाक्य बोलने की हिम्मत कर सकता है ? हरगिज नहीं । हम भारतीय अंगरेजी की शुद्धता बरकरार रखने के प्रति बेहद सचेत रहते हैं, किंतु अपनी भाषाओं को वर्णसंकरित या विकृत करने में तनिक भी नहीं हिचकते ।

अंगरेजों ने अपनी भाषा में अन्य भाषाओं के शब्द स्वीकार  किए हैं, किंतु अमर्यादित तरीके से नहीं कि वे अपने चिरपरिचित शब्दों को भुला बैठें । इस देश पर करीब 200 वर्ष शासक रूप से रहे किंतु उन्होंने अंगरेजी को हिन्दीमय नहीं कर दिया । कुछ चुने हुए शब्दों की बानगी देखिए:

Avatar (अवतार), Bungalow (बंगला) Cheetah (चीता), Chutney (चटनी), Dacoit (डाकू), Guru (गुरु), Jungle (जंगल), Khaki (खाकी), Loot (लूट), Mantra (मंत्र), Moksha (मोक्ष), Nirvana (निर्वाण), Pundit (पंडित), Pyjamas (पैजामा), Raita (रायता), Roti (रोटी), Thug (ठग), Typhoon (तूफ़ान), Yoga (योग)

इनमें अधिकांश शब्द वे हैं जिनके सटीक तुल्य शब्द अंगरेजी में रहे ही नहीं । मोक्ष, रोटी ऐसे ही शब्द हैं । सोचिए हम जैसे बट, एंड, आलरेडी प्रयोग में लेते हैं वैसे ही क्या वे किंतु, परंतु, और का प्रयोग करते हैं । नहीं न ? क्योंकि ऐसा करने की जरूरत उन्हें न्हीं रही । हमें भी जरूरत नहीं, पर आदत जब बिगड़ चुकी हो तो इलाज कहां है ?

शायद ही कोई देश होगा जिसके लोग रोजमर्रा के सामान्य शब्दों को अंगरेजी शब्दों से विस्थापित करने पर तुले हों ।

हिन्दी को समृद्ध बनाने की वकालत करने वालों से मेरा सवाल है कि क्या अंगरेजी में पारिवारिक रिश्तों को स्पष्टतः संबोधित करने के लिए शब्द हैं ? नहीं न । क्या चाचा, मामा आदि की अभिव्यक्ति के मामले में अंगरेजी कंगाल नहीं है ? क्या हमने हिन्दी के इन शब्दों को अंगरेजी में इस्तेमाल करके उसे समृद्ध किया है ? हिम्मत ही कहां हम भारतीयों में ! मैं नहीं जानता कि मामा-मौसा के संबोधनों को अंगरेजी में कैसे स्पष्ट किया जाता है । “मेरे मामाजी कल मौसाजी के घर जाएंगे ।”को अंगरेजी में कैसे कहा जाएगा ? सीधे के बजाय घुमाफिरा के कहना पडेगा ।

मेरा सवाल यह है कि हम भारतीय हीनग्रंथि से इतना ग्रस्त क्यों हैं कि हिन्दी में अंगरेजी ठूंसकर गर्वान्वित होते हैं और अंगरेजी बोलते  वक्त भूले-से भी कोई हिन्दी शब्द मुंह से निकल पड़े तो शर्मिंदगी महसूस करते हैं ? – योगेन्द्र जोशी

मुझे बीबीसी-डॉट-कॉम पर उपलब्ध एक आलेख पढ़ने को मिला । लेखक हैं अमिताव कुमार और लेख का शीर्षक है “जब हिंदी पुरानी एंबेसैडर कार हो जाए” । लेखक वर्षों से अमेरिका में रहते हैं, न्यू यॉर्क के पास हडसन नदी पर स्थित एक छोटे-से शहर में । शहर के नाम का उल्लेख नहीं है । अपनी मातृभाषा से दूर रहने पर उस भाषा के संपर्क में यदाकदा आने पर कैसा लगता है इस प्रकार की बातें लेखक ने बयां की है । कदाचित पाठकगण भी लेख को पढ़ना चाहें । इसी आशय से यहां उसका संदर्भ प्रस्तुत है:

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2014/05/140521_amitava_kumar_aa.shtml
– योगेन्द्र जोशी

पिछली शताब्दि के अंतिम दशक के आरंभ के आसपास अपने यूरोपीय अनुभव से प्रेरित होकर मैंने निर्णय लिया कि मैं जहां-जहां संभव हो सके वहां-वहां हिन्दी का प्रयोग करूं । किसी परिचित, मित्र, सहकर्मी अथवा अधिकारी से किसी भी प्रकार का प्रोत्साहन अथवा उत्साहवर्धन मुझे मिला हो ऐसा नहीं है । बल्कि मैं समझता हूं कि कई लोगों को मेरी बातें सनक भरी ही लगती रही होंगी । हां, खुलकर किसी ने नकारात्मक टिप्पणी की हो ऐसा नहीं है ।

मेरे कार्यक्षेत्र रहे विश्वविद्यालय में प्रायः सभी दस्तावेजी या लिखित कार्य अंग्रजी में ही होते हैं और उन दिनों भी होते थे, भले ही वहां कार्यरत निचले स्तर के कुछेक कर्मचारियों के लिए वह सब समझ से परे हो । मुझे एक वाकया याद है जब मेरे विभागीय कार्यालय का एक चपरासी एक बार एक नोटिस मेरे पास ले आया, जिसके साथ अध्यापकों की सूची की जीराक्स प्रति (अक्सर इस्तेमाल होने वाली) भी थी । सूची में उन-उन अध्यापकों के नामों के आगे निशान लगे थे जिनको वह नोटिस दिखायी जानी थी । मेरे नाम के आगे निशान नहीं लगा था । मैंने उस व्यक्ति को बताया कि बिल्डिंग के एक कोने में स्थित मेरे कमरे तक आने की जहमत उठाने की उसे जरूरत नहीं थी और यह भी कि जिन के नाम पर टिक किया था केवल उन्हीं के पास उसे जाना चाहिए । उसने मुझे बताया कि वह अंग्रेजी में लिखे नाम तो पढ़ नहीं सकता और उतने सारे लोगों का नाम याद रख पाना उसके लिए कठिन था । कहीं किसी नाम छूट जाये तो ख्वाहमख्वाह ही उसे डांट सुननी पड़ेगी ।

अवश्य ही अंग्रेजी का अतिशय प्रयोग, वह भी उन स्थलों पर जहां हिन्दी अधिक सुविधाजनक हो, मुझे स्वीकार्य नहीं था । मैंने सोचा कि अध्यापकों की सूची क्यों न हिन्दी में तैयार कर ली जाये । मैंने यह कार्य अपने ही जिम्मे ले लिया क्योंकि मुझे मालूम था कि यदि कार्यालय वालों पर छोड़ दिया तो कुछ भी होने से रहा । अतः दो-चार दिन के भीतर मैंने कंप्यूटर पर सूची तैयार की और बड़े बाबू को सोंप दी, ताकि वे उसकी जीराक्स कापी प्रयोग में ले सकें ।
कुछ वर्षों तक तो सब ठीक-ठाक चलता रहा । सालों तक कोई नियुक्ति भी नहीं हुयी, अतः सूची अपरिवर्तित रही । फिर शताब्दि का अंत आते-आते कुछ नये लोग विभाग में नियुक्त हुए । आरंभ में तो उनके नाम हाथ से अंग्रेजी में लिखे जाने लगे और अंत में नयी सूची अंग्रेजी में तैयार हो गयी । मेरा भी उस दिशा में उत्साह ठंडा पड़ गया क्योंकि मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का मन बना लिया था ।

लेकिन मेरा कार्य वैयक्तिक स्तर पर यथासंभव हिन्दी में चलता रहा । जैसा मैंने बताया कि वहां सब कुछ तो अंग्रेजी में था । राजभाषा के नियमों के अनुसार सभी फार्म द्विभाषी होने चाहिए । लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ है । मैंने अपने समय में कई बार विश्वविद्यालय को याद दिलाया कि हिन्दी में भी फार्म उपलब्ध होने चाहिए । हर बार किसी न किसी बहाने प्रशासन टालता रहा । परंतु मैंने निर्णय लिया कि अंग्रेजी में छपे फार्मों की प्रविष्टयां मैं हिन्दी में ही भरूंगा । ऐसा मैं करता रहा । मेरा पत्राचार भी हिन्दी में होने लगा । मैंने जब स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आवेदन पेश किया तो वह भी हिन्दी में ही लिखा । लेकिन उन सभी पत्रों आदि पर संबद्ध अधिकारियों की टिप्पणियां अंग्रेजी में ही हुआ करती थीं, जो कि राजभाषा नियमों के विरुद्ध था । पर परवाह किसे थी ?

मैंने तब अनुभव किया कि दो-चार लोग हों तो शायद कुछ किया जा सकता था । पर जिस तंत्र में सभी अंग्रेजी के प्रति समर्पित हों और उसके परे कुछ भी करने का विचार न रखते हों, वहां भला क्या हो सकता है ? भाषा के मामले में लोग क्यों जड़त्व से ग्रस्त हैं इस पर आगे चर्चा की जायेगी । – योगेन्द्र

(पिछले चिट्ठे से आगे) अध्यापन के अपने जीवन में मेरा सर्वाधिक दिलचस्प अनुभव यह रहा कि विश्वविद्यालय स्तर के इक्के-दुक्के अध्यापकों को छोड़कर प्रायः सभी का हिन्दी के प्रति नकारत्मक रवैया रहता रहा है । किसी को भी (दो-एक अपवाद होंगे) मैंने उन मौकों पर हिन्दी का प्रयोग करते नहीं पाया जहां ऐसा करना संभव ही नहीं वांछनीय होता । इस बात को एक दृष्टांत से समझा जा सकता है ।

मेरे कार्यक्षेत्र रह चुके विश्वविद्यालय में कुलसचिव तथा परीक्षा-नियंता कार्यालयों एवं पुस्तालय आदि जैसे स्थानों पर छात्रों, शिक्षकों और आगंतुकों के लिए हस्ताक्षर पंजी (रजिस्टर) रहती हैं, जिनमें उनके आने-जाने का समय एवं अन्य विवरण हस्ताक्षर सहित दर्ज किये जाते हैं । परीक्षा-नियंता कार्यालय का अनुभव मेरे लिए खास रहा है, जहां केंद्रीय मूल्यांकन की प्रणाली प्रचलित थी । वार्षिक परीक्षाओं के बाद उत्तर-पुस्तिकाओं के चार-छः सप्ताह तक चलने वाले मूल्यांकन के लिए मुझे भी वहां जाना पड़ता था । मैं अपने आत्मना-पोषित नीति के अनुरूप उक्त रजिस्टर में देवनागरी लिपि में दस्तखत करता था । एक पृष्ठ पर करीब पच्चीस जनों के दस्तखत होते होंगे ऐसा मेरा अनुमान है ।

रजिस्टर के संबंधित पृष्ठ तथा उसके पूर्व के एक-दो पृष्ठों पर मैं जिज्ञासावश नजर डाल लिया करता था, यह देखने के लिए कि क्या मेरे अलावा और भी कोई व्यक्ति है जो हिन्दी में हस्ताक्षर करता हो । मुश्किल से कभी कोई अपवाद दिख जाता था । रोचक बात यह होती थी कि रजिस्टर के हर पृष्ठ के शीर्ष पर परीक्षकों के नाम, आने व जाने के समय आदि के शीर्षक स्तंभानुसार (कालमवाइज) देवनागरी में लिखे रहते थे । किंतु ठीक उनके नीचे दस्तखतों का सिलसिला चलता था, जो लगभग पूरी तौर पर अंग्रेजी में ही रहता था । खुद मेरे दस्तखत के बाद भी कोई यह नहीं सोचता था कि वह भी देवनागरी में हस्ताक्षर करे ।

विश्वविद्यालय स्तर के अध्यापकों को मुझ जैसा अदना व्यक्ति प्रेरित कर सकता हो यह मैं सोच नहीं सकता । आखिर योग्यता में सभी तो मेरे तुल्य या उससे ऊपर ही रहे हैं । जब मैं अपना स्वतंत्र निर्णय लेता रहा हूं और किसी के द्वारा प्रेरित किये जाने का इंतजार नहीं करता, तो मेरे लिए यह सोचना स्वाभाविक था कि वे भी स्वतः ही उचितानुचित का निर्णय लेते होंगे । साफ था कि उनकी हिन्दी तथा देवनागरी लिपि के प्रति कोई रुचि नहीं थी ।

और पूरे वाकये का मेरे लिए चौंकाने वाला पहलू यह था कि हिन्दी विभाग के अध्यापक तक अंग्रेजी में ही दस्तखत करते थे । मुझे एक ही सज्जन वहां के मिले जिन्होंने अन्य लोगों के प्रति खेद के साथ बताया कि वे देवनागरी में दस्तखत करते हैं ।

क्या निजी स्तर पर हिन्दी के प्रयोग के लिए भी कोई शासनादेश की जरूरत है ? क्या लोगों में स्वतःस्फूर्त उत्कंठा एवं उत्साह नहीं होना चाहिए ? मेरा निजी आकलन है कि इस माने में पढ़ालिखा हिन्दुस्तानी समाज तो यथास्थितिवादी एवं शून्य ही है । (चर्चा जारी रहेगी ।)
– योगेन्द्र

दो दशक से अधिक का समय बीत चुका है जब मुझे इस बात का एहसास पहली बार हुआ कि अपनी मौलिक भाषाओं के प्रति हम हिंदुस्तानी कितने बेपरवाह हैं और हम उन्हें कितने निरादर भाव से दोयम दर्जे का मान बैठे हैं । यह एहसास अपने इंग्लेंड-प्रवास के दौरान पेरिस-भ्रमण के समय के भाषायी अनुभव से हुआ था । उस घटना का विवरण एक लघुकथा के रूप में मैंने अन्यत्र दिया है । उस समय मुझे लगा कि मुझे अपने विविध कार्यों में हिन्दी को यथासंभव प्रयोग में लेना चाहिए । बाद में स्वदेश लौटने पर मैंने अपने इस विचार का शनैः-शनैः कार्यान्वयन आरंभ कर दिया ।

विज्ञान (भौतिकी) जैसे विषय के अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में अपने देश में हिन्दी में कोई लिखित कार्य नहीं कर सकता था । मेरा तत्संबंधित तकनीकी लेखन उसी भाषा में संभव था जो प्रचलन में है, यानी अंग्रेजी । परंतु अध्यापन में हिन्दी का प्रयोग, खास तौर पर खिचड़ी भाषा, जिसमें तकनीकी शब्द तो अंग्रेजी के हों पर जिसका व्याकरणीय स्वरूप पारंपरिक हिन्दी का हो, का प्रयोग मेरे लिए अवश्य संभव था । उन दिनों मेरी स्नातकोत्तर कक्षाओं में दूरदराज के अहिन्दीभाषी छात्र भी हुआ करते थे । ये छात्र अधिकांशतः बंगाल, आंध्र तथा तमिलनाडु से आते थे । मैंने अनुभव किया कि इनमें से बंगाल के छात्रों की हिन्दी अपेक्षया बेहतर होती थी और तमिलनाडु के छात्रों की सर्वाधिक कमजोर । उस क्षेत्र के कई छात्रों के लिए तो हिन्दी बोलना-समझना भी कभी-कभी संभव नहीं हो पाता था । मेरे देखने में दिलचस्प बात यह होती थी कि वे अंग्रेजी में भी बहुत सहूलियत नहीं अनुभव करते थे । ये छात्र एक माने में अपवाद थे । अन्यथा प्रायः सभी को हिन्दी में बात करने और समझने में अधिक सुविधा होती थी ।

स्नातकोत्तर कक्षाओं के कुछ छात्रों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि अवश्य ही अंग्रेजी की रहती थी और वे लाभ की स्थिति में रहते थे । परंतु अधिकांश के लिए हिन्दी का सहारा आवश्यक था । इनमें हिन्दीभाषी ही नहीं अपितु बांग्ला- तथा तेलुगु-भाषी भी शामिल थे । इसे इस बात से समझा जा सकता है कि कक्षा में जब उन्हें किसी प्रायोगिक विषय से संबंधित मुद्दे पर छोटा-मोटा व्याख्यान देना होता था (यह उनके पाठ्क्रम का एक अंग होता था), तो अंग्रेजी से शुरुआत करते हुए वे हिन्दी पर उतर आते थे । हम अध्यापकों की ओर से उन्हें इस बात की छूट थी कि जिस माध्यम में उन्हें सुविधा हो उसका वे प्रयोग करें । वास्तव में प्रायोगिक कक्षाओं में प्रायः सभी अध्यापक छात्रों से हिन्दी में ही विषय-संबंधी बातें करते थे । अध्यापन के अपने उस काल में मुझे कई छात्रों से यह सुनने को मिला करता था कि उन्हें विषय की बेहतर समझ हो पाती, यदि उन्हें हिन्दी में सुबोध पुस्तकें उपलब्ध होतीं । – योगेन्द्र (चर्चा जारी रहेगी ।)