Home

कल के दैनिक समाचार-पत्र ‘हिन्दुस्तान’ में एनडीटीवी टीवी चैनल से संबद्ध प्रियदर्शनजी का लिखा एक आलेख पढ़ने को मिला । लेखक इन शब्दों के साथ अपने विचार रखते हैः- “‘फैबुलस फोर’ को हिन्दी में क्या लिखेंगे ? ‘यूजर फ्रेंडली’ के लिए क्या शब्द इस्तेमाल करना चाहिए ?’ क्या ‘पोलिटिकली करेक्ट’ के लिए कोई कायदे का अनुवाद नहीं है? ऐसे कई सवालों से हिन्दी पत्रकारिता जूझ रही है । …” (हिन्दुस्तान में छपा आलेख देखें)

इसके पश्चात् हिन्दी पत्रकारिता से संबंधित कुछेक प्रश्नों को लेकर लेखक ने अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत की हैं । जहां तक उपर्युक्त तथा ऐसे ही अनेक अन्य अंग्रेजी शब्दों का प्रश्न है, उनके लिए समुचित तुल्य हिन्दी शब्दों का अभाव है ऐसा कहना गलत होगा । अवश्य ही कुछ स्थलों पर नयी आवश्यकताओं के अनुरूप नितांत नवीन शब्दों की आवश्यकता किसी भी भाषा में पड़ सकती है । अतः हिन्दी में कभी उचित शब्द किसी को न सूझ पा रहा हो तो आश्चर्य नहीं होगा । ऐसे अवसरों पर नितांत नये शब्दों की रचना की आवश्यकता पड़ सकती है । हिन्दी के मामले में तब संस्कृत सहायतार्थ उपलब्ध है । या फिर अन्य भाषाओं से वांछित शब्द स्वीकारा और अपने शब्दसंग्रह में शामिल किया जा सकता है ।

इस मामले में अंग्रेजी कोई अपवाद नहीं है और उसने विगत काल में सदा ग्रीक तथा लैटिन का सहारा लिया है, या फिर अन्य भाषाओं, विशेषतः अन्य यूरोपीय भाषाओं, से शब्द उधार लिए हैं । कुछेक शब्द तो स्वयं संस्कृत से भी अंग्रेजी में पहुंचे हैं, जैसे अहिंसा, आत्मा, मोक्ष आदि । भारतीय दार्शनिक चिंतन से जुड़े इन शब्दों के सही-सही तुल्य शब्दों की उम्मींद वहां नहीं की जा सकती थी । अंग्रेजी में तो विज्ञान जैसे विषयों के लिए नये तकनीकी शब्दों की रचना अपारंपरिक तरीके से भी यदा-कदा की गयी है, जैसे laser (light amplification by stimulated emission of radiation) जिससे to lase, lasing, lased जैसे क्रिया/क्रियापदों की रचना की गयी है । और ऐसे ही है पदार्थ-जगत् के मूलकण के लिए सुझाया गया नाम ुनंता है । रोजमर्रा का शब्द बन चुका robot वस्तुतः चेक लेखक Karel Capek के नाटक Rossum’s Universal Robots में मशीन की तरह के मानव-पात्रों के लिए प्रयुक्त हुआ है । कंप्यूटर विज्ञान में bit, pixel, alphameric आदि नयी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए रचे गये शब्द हैं । ये सब प्रयास विज्ञान तक ही सीमित नहीं हैं । हालिया वर्षों में हिन्दी के कुछ शब्द अंग्रेजी में इसलिए पहुंचे, क्योंकि वे एक नयी सामाजिक परिस्थिति के लिए उपयुक्त पाये गये, जैसे dharna, gherao आदि । —

लेकिन नये शब्दों की रचना की आवश्यकता विरले मौकों पर ही पड़ती है । आम तौर पर एक भाषा के किसी शब्द के अर्थ के तुल्य अर्थ वाला शब्द अन्य उन्नत भाषा में भी मिल ही जाता है । किंतु इस सब के लिए अपना शब्द-सामर्थ्य बढ़ाने की आवश्यकता होती है । मैं न तो हिन्दी का विद्वान रहा हूं और न ही पत्रकारिता मेरा व्यवसाय रहा है । व्यावसायिक तौर पर जीवन भर विज्ञान का अध्येता, अनुसंधानकर्ता और अध्यापक होने के बावजूद मैं भाषाओं के प्रति सचेत रहा हूं । मेरी राय में किसी भी भाषा की पत्रकारिता में संलग्न व्यक्ति के लिए उस भाषा की समुचित जानकारी होनी ही चाहिए और उसका भाषा पर अधिकार सामान्य जन की तुलना में कहीं अधिक होना चाहिए । और अगर वह व्यक्ति अंग्रेजी से अनुवाद पर निर्भर हो तो उसे दोनों ही भाषाओं पर अधिकार होना चाहिए । वास्तव में पत्रकारिता का क्षेत्र ऐसा है जिसमें एकाधिक भाषाओं की जानकारी उपयोगी और कभी-कभी निहायत जरूरी हो सकती है ।

पर दुर्भाग्य से स्थिति इतनी सरल नहीं है । अपने देश में अपनी भाषाएं इस हाल तक तिरस्कृत हो चली हैं कि उनको चलते-चलाते जितना हम सीख गये हों उससे एक कदम आगे बढ़ने का विचार हम लोगों में नहीं रहता । मुझे विज्ञान जैसे क्षेत्र में ऐसे विशेषज्ञ ढूढ़े नहीं दीखते जो देसी भाषाओं में जनसामान्य के अपर्याप्त अंग्रेजी-ज्ञान को ध्यान में रखते हुए अपने विचारों को स्पष्ट अभिव्यक्ति दे सकें । कदाचित् पत्रकारिता भी इस कमजोरी से ग्रस्त है । (यह चर्चा अभी जारी रहेगी ।) – योगेन्द्र