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पिछली पोस्ट (मार्च १, २००९) के आगे । मैं इस बात का जिक्र कर चुका हूं कि मेरी पहली दक्षिण-भारत यात्रा (१९७३) के दौरान हिंदी को लेकर हुआ अनुभव निराशाप्रद रहा उसके बाद मैं दूसरी बार १९८० में भी वहां गया था । तब स्थिति कुछ अनुकूल लगी थी । उसके बाद के लंबे अंतराल में पांच-छः बार उस क्षेत्र में जा चुका हूं । चार-पांच साल पहले की और फिर विगत फरवरी की यात्राएं कुछ हद तक आशाप्रद रहीं मैं ऐसा कह सकता हूं ।

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एक बात मैं आंरभ में ही स्पष्ट कर दूं कि हिंदी देश की राजभाषा घोषित होने के बावजूद दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकी है । अवश्य ही इसका देश के कोने-कोने तक कुछ हद तक फैलाव हो रहा है, और यह भी कहा जा सकता है कि अधिकाधिक लोग इसे समझने लगे हैं और थोड़ा-बहुत, टूटी-फूटी ही सही, इसे बोलने भी लगे हैं । लेकिन लिखित रूप में इसे कम ही लोग इस्तेमाल में ले रहे हैं । और तो और खुद हिंदीभाषी भी लिखित हिंदी में नाममात्र की रुचि रखते हैं । इस माने में उनकी प्राथमिकता अंग्रेजी ही रहती आ रही है । अतः जब में हिंदी की किंचित् आशाप्रद स्थिति की बात करता हूं तो इसका मतलब मात्र यह है कि अब नये क्षेत्रों में भी बोलने-चालने के स्तर पर इसकी मौजूदगी देखी जा सकती है । दक्षिण भारत के कुछ शहरी इलाकों में हिंदी बोलकर आप कुछ हद तक काम चला सकते हैं । लेकिन लिखित तौर पर इसे आप शायद ही कहीं देखें । आपको हिंदी पत्र-पत्रिकाएं खोजने पर बमुश्किल ही मिलेंगे । केंद्र सरकार के उपक्रमों के नामपट्टों को छोड़ इक्के-दुक्के स्थलों पर लिखित हिंदी दिखेगी । आगे पढ़ने के लिए यहां >> क्लिक करें

कन्याकुमारी - विवेकानंद रॉक मेमॉरिअल, शिला स्मारककन्याकुमारी – विवेकानंद रॉक मेमॉरिअल, शिला स्मारक

जब मैं पहली बार (जुलाई १९७३ में, जैसा मुझे याद है) चेन्नै, यानी तत्कालीन मद्रास, गया था तो मुझे वहां हिन्दी के विरुद्ध एक प्रकार का द्वेष या उदासीनता का भाव देखने को मिला था । रेलवे स्टेशन पर हिन्दी में जानकारी पाना मुझे असंभव-सा लगा था । पूछताछ कार्यालय और टिकट खिड़की पर हिन्दी में कुछ पूछने पर संबंधित कर्मचारी के मुख पर एक प्रकार की नाखुशी का भाव मुझे देखने को मिला था । उस समय मैं स्वयं हिन्दी के प्रति विशेष जागरूक नहीं था और अंग्रेजी के प्रयोग से बचने का विचार भी मेरे मन में नहीं हुआ करता था । (हिन्दी और भारतीय भाषाओं के प्रति मौजूदा विचार कई वर्षों बाद मेरे मन में उपजे थे ।) सच तो यह है कि हिन्दी के प्रति वहां व्याप्त विरोध-भाव तब मेरे लिए चिंता या चिंतन का विषय ही नहीं था । अंग्रेजी से मेरा काम उस समय चल गया था और मैं संतुष्ट था । यह तो आज है कि मैं उस घटना को नये नजरिये से देखता हूं ।

वह ऐसा समय था जब तमिलनाडु में कुछ काल पहले लगी हिन्दी-विरोध की आग शांत नहीं हुयी थी । वस्तुतः उस राज्य में हिन्दी विरोध काफी पुराना रहा है । विकीपीडिया पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह विरोध १९३८ से ही वहां चलता आ रहा था । ध्यान दें कि वर्ष १९५० में संविधान संशोधन के द्वारा हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था । शेष के लिए यहां >> क्लिक करें

सुदूर दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के दो-एक पर्यटक स्थलों की दश-द्वादश-दिवसीय यात्रा के पश्चात् मैं अभी हाल ही में लौटा हूं । मैं पारिवारिक सदस्यों के चार जनों के दल में शामिल था । हम लोग चेन्नै होते हुए रामेश्वरम्, कन्याकुमारी तथा मदुरै तक हो आये और फिर चेन्नै दो दिन रुककर वापस वाराणसी लौट आये । इस आलेख में अपनी यात्रा का विवरण प्रस्तुत करना मेरा इरादा नहीं है; मैं हिन्दी को लेकर अर्जित अपने अनुभवों का उल्लेख भर करना चाहता हूं ।

मेरे लिए तमिलनाडु के उक्त स्थलों की यात्रा कोई नयी बात नहीं थी । मैंने आज से करीब पैंतीस वर्ष पूर्व, यानी उन्नीस सौ तिरहत्तर, में पहली बार इन नगरों का दर्शन किया था । तब से अब तक मैं कुल पांच बार कन्याकुमारी और तीन-तीन बार रामेश्वरम् एवं मदुरै की यात्रा कर चुका हूं । हर बार आना-जाना चेन्नै के रास्ते ही हुआ है, जहां मैं अन्य मौकों पर भी गया हूं । पैंतीस सालों के लंबे अंतराल में कन्याकुमारी नगरी उल्लेखनीय रूप से बदल चुकी है । थोड़ा बहुत बदलाव तो रामेश्वरम् में भी स्वाभाविक रूप से हुआ ही है । हिन्दी संबंधी मेरा अब तक वहां क्या अनुभव रहा इस बात की चर्चा मैं एक अजनबी से अपनी मुलाकात के जिक्र के साथ करता हूं, जो चेन्नै (तत्कालीन मद्रास) सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर तब हुई थी जब मैं पहली बार वहां गया था । पूरा वाकया कुछ यूं है:- (आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)