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हिन्दी दिवस, २०१६

आज हिन्दी दिवस है, १४ सितंबर। सन् १९५० से आज तक ६६ वर्षों से हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, एक ही ढर्रे से। कहीं वन-डे प्रोग्राम (यानी एकल-दिवसीय कार्यक्रम), तो कहीं वन-वीक प्रोग्राम (साप्ताहिक कार्यक्रम), और कहीं वन-फ़ोर्टनाइट प्रोग्राम (पाक्षिक कार्यक्रम)। दिवस मनाने का वही बासी पड़ चुका तरीका। उन लोगों के भाषण होंगे जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर हिन्दी से कोई लेना-देना नहीं, किंतु जिनके सामने हिन्दी के बाबत कुछ कहने की विवशता आ जाती है। हिन्दी आम जन की भाषा है, देश की संपर्क भाषा है, राष्ट्रीय एकता की निशानी है इत्यादि जुमले वक्ताओं के मुख से प्रायः निसृत होते हैं। हमें हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, आधिकारिक कार्य हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में होना चाहिए, इत्यादि सलाह साल-दर-साल दी जाती है। जिन्हें यह सब करना है वे अंगरेजी को यथावत अपनी जगह बनाये रखे हैं।

कथनी एक और कथनी कुछ और। पता नहीं आगामी कितनी दशाब्दियों- शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहेगा।

भाषणबाजी के अलावा हिन्दी दिवस मनाने के और भी तरीके प्रचलन में हैं। संस्थाएं निबंध-लेखन, वाद-विवाद, कर्मियों के लिए हिंदी-टंकण आदि की प्रतिस्पर्धाएं भी आयोजित करती हैं और विजेताओं को पुरस्कृत करती हैं। वर्ष में एक बार सितंबर में यह सब ठीक वैसे ही होता है जैसे पावस ऋतु का आना और जाना। सितंबर की समाप्ति होते-होते आकाश से बादल छंट जाते हैं और उसी के साथ तिरोहित होता है हिन्दी के प्रति जागृत अल्पकालिक उत्साह।

जरूरी है क्या हिन्दी दिवस

इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता को मैं आज तक नहीं समझ सका। पता नहीं कितने देशों में तत्सदृश भाषा दिवस मनाये जाते हैं।  देश यथावत चल रहा है। अंगरेजी की अहमियत बढ़ रही है घट नहीं रही। जो कार्य अंगरेजी में होता आया है वह आज भी वैसे ही चल रहा है। हिन्दी एवं अन्य भाषाएं आम बोलचाल तक सीमित होती जा रही हैं। और वे अंगरेजी के साथ खिचड़ी बनती जा रही हैं। अब हालत यह हो रही है कि कई लोगों की हिन्दी बिना अंगरेजी के समझना मुश्किल है। हिन्दी का अंगरेजीकरण बदस्तूर चल रहा है।

तब क्या है इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता? किसको हिन्दी के प्रति प्रेरित किया जाना है? जिस देश के लोग खुद मान चुके हैं कि अंगरेजी के बिना देश नहीं चल सकता, प्रगति नहीं कर सकता, सुख-समृद्धि की कुंजी तो अंगरेजी है, इत्यादि उन्हें हिन्दी दिवस की क्या जरूरत?

कभी-कभी हिन्दी को लेकर बहुत कुछ लिख जाने का मन होता है मेरा। जोश चढ़ता है लेकिन उसके स्थायित्व की कमी रहती है और लेखन का तारतम्य अक्सर टूट जाता है। लेख की प्रगति स्वयं की दृष्टि में संतोषप्रद नही रह जाती है। फिर भी हाल में अपने अल्पकालिक कनाडा प्रवास के अंगरेजी बनाम फ़्रांसीसी संबंधी अनुभव को पाठकों से साझा करने का विचार है। उस विषय पर दो-तीन लेख लिखने हैं, किंतु आज नहीं। आज तो अपने अनुभवों को लेकर एक दो टिप्पणियां काफ़ी होगा।

मैं उपदेशात्मक या निर्देशात्मक लेख नहीं लिखता। इस ब्लॉग में हो या मेरे दूसरे ब्लॉगों में अथवा अन्यत्र, मेरा लेखन यथासंभव तथ्यों के उद्घाटन पर केंद्रित रहता है। उनसे जिसको जो निष्कर्ष निकालना हो वह निकाले। क्या करने योग्य है क्या नहीं यह सुधी जन स्वयं सोचें।

एक अनुभव यह भी

शुरुआत मैं कुछ समय पहले अपने अनुभव में आए एक वाकये के उल्लेख के साथ कर रहा हूं। घटना हिन्दी से जुड़ी है और हिन्दी क्षेत्र के लोगों का उसके प्रति क्या रवैया है इसकी एक झलक प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं तो रोजमर्रा के जीवन में हम सभी के साथ प्रायः होती रहती हैं, किंतु उन पर सामान्यतः ध्यान नहीं दिया जाता है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के कारण मेरी यह “खराब” आदत बन चुकी है कि मैं घटनाओं को गौर से देखता हूं। अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के कार्य में यह तो करना ही पड़ता था, अन्य स्थलों पर भी आदत से मजबूर रहता हूं। घटना का विवरण कुछ यों है –

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में अवस्थित भारतीय स्टेट बैंक शाखा के अहाते में पासबुक प्रिंट (मुद्रित) करने की एक आटोमैटिक (स्वचालित) मशीन लगी है। ( मैं बीएचयू में ही भौतिकी-शिक्षक था।) उस दिन मैं अपनी और अपने परिवारी जनों के पासबुक लेकर बैंक पहुंचा था। उन पासबुकों पर कोई तीन-एक साल से प्रिंटिग (मुद्रण) नहीं हुई थी, क्योंकि घर पर ही इंटरनेट से बैंक-खातों की जानकारी मिल जाया करती है। किंतु मौका देख विचार आया कि पासबुकें प्रिंट कर ली जाएं। मैं मशीन के पास लगी पंक्ति में शामिल हो गया। अपनी बारी आने पर मैंने पाया कि मेरी अकेली एक पासबुक प्रिंट होने में ही पर्याप्त समय लग रहा है। चूंकि बैंक के ग्राहकसेवा का समय समाप्त हो चला था, अतः उस स्थान की भीड़ छंटने लगी थी। सदाशयता के नाते मैं पंक्ति से बाहर निकल आया यह सोचकर कि जब अन्य जनों का कार्य पूरा हो जाएगा तब फुरसत से अपना कार्य पूरा कर लूंगा।

वह स्वचालित मशीन प्रिंटिंग आरंभ करने से पहले प्रक्रिया संबंधी संदेश ध्वनित रूप में (न कि पर्दे पर लिखित रूप में) प्रदान करती है। उसके पहले ग्राहक को पर्दे पर संदेश मिलता है हिन्दी अथवा अंगरेजी का विकल्प चुनने के बारे में। उपस्थित जन क्या विकल्प चुनते हैं इस पर मैं गौर कर रहा था। मैंने पाया कि हर कोई अंगरेजी का ही विकल्प चुन रहा था। सार्वजनिक स्थल पर यदि ऐसा कुछ घटित हो रहा हो जो मुझे अप्रिय लगे तो मैं टिप्पणी किए बिना प्रायः नहीं रह पाता हूं। मित्र-परिचित मेरे इस स्वभाव को “गंदी आदत” कहते हैं। उक्त अवसर पर सभी को सुनाते हुए मेरे मुंह से निकला, “आप लोग आम तौर पर हिन्दी बोलते हैं, तब यहां पर हिन्दी क्यों नहीं चुन रहे हैं?”

मेरी टिप्पणी सुनना उनके लिए नितांत अप्रत्याशित था। वे प्रश्नभरी निगाह से मेरी ओर देखने लगे। फिर उनमें से एक उच्चशिक्षित एवं संभ्रांत-से लग रहे नौजवान (मेरे अनुमान से बीएचयू में शिक्षक/शोधकर्ता) ने कहा, “हमारी सरकारी व्यवस्था ही ऐसी हो चुकी है कि सर्वत्र अंगरेजी का बोलबाला है। अब तो आदत ही हो चली है अंगरेजी की। तब हिन्दी का प्रयोग न करें तो क्या फर्क पड़ता है?” और उसके बाद देखा कि उन्होंने अंगरेजी का ही विकल्प चुना।

वहां मौजूद अधिकांशतः सभी चुप रहे। कुछ मेरी ओर मुस्कराते हुए देखने लगे, गोया कि मैंने कोई अजीब-सी या बेतुकी बात कही हो। फिर एक अधेड़ – जो हावभाव से बीएचयू के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लग रहे थे – की प्रतिक्रिया आई, “अंगरेजी तो सारी दुनिया में चल रही है। तब उसे छोड़ हिन्दी में कार्य करने का क्या फायदा?”

मैंने पहले व्यक्ति को यह समझाने की कोशिश की कि वस्तुस्थिति को बदलने का प्रयास तो हम में से प्रत्येक को ही करना चाहिए, अन्यथा अंगरेजी के वर्चस्व वाली स्थिति यथावत बनी रहेगी। दूसरे व्यक्ति को मैंने यह जताने का प्रयास किया कि दुनिया के अधिकांश देशों में अंगरेजी का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में उतना नहीं होता जितना अपने देश में। वहां अंगरेजी के बिना भी लोग अपना कार्य बखूबी करते हैं। उन्हें अपनी गलतफहमी छोड़नी चाहिए।

अंगरेजी की वैश्विकता का भ्रम

यह घटना दो बातों की ओर संकेत करती हैः (1) पहला यह कि देशवासियों में यह गंभीर भ्रम व्याप्त है कि विश्व में सर्वत्र अंगरेजी में ही कार्य होता है, और (2) दूसरा यह कि जब केंद्र एवं राज्य सरकारें ही अंगरेजी में कार्य करती हैं, उसी को महत्व दे रही हैं, तो आम आदमी क्यों हिन्दी अपनाए ? यह दूसरी बात अधिक गंभीर है, क्योंकि किसी के भ्रम का निवारण करना संभव है, किंतु प्रशासनिक जडत्व दूर करना असंभव-सा है।

ऊपर जिन दो बातों का उल्लेख मैंने किया है वे उक्त अकेली घटना पर आधारित नहीं हैं। अपने विश्वविद्यालयीय जीवन में तथा अन्य मौकों पर लोगों के साथ बातचीत में मुझे उक्त बातों का अनुभव होता रहा है। लोग अपनी धारणा के पक्ष में तर्क-कुतर्क पेश करते हुए भी पाया है।

लोगबाग शायद अब तक यह भूल गये होंगे कि जब चीन के बीजिंग शहर में ओलंपिक खेल आयोजित (2008) हुए थे तो वहां पहली बार सड़कों, क्रीड़ागनों, होटलों तथा अन्य भवनों के नामपट्ट आदि अंगरेजी में भी लिखे गये थे। उसके पहले अंगरेजी में नामपट्ट कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दिखाई देते थे। यह भी याद करें कि कई जगह तो चीनी से अंगरेजी में किए गए अनुवाद हास्यास्पद हो चले थे।

अभी हाल में मेरे एक निकट संबंधी जर्मनी किसी सम्मेलन में गये थे। उन्होंने बताया कि भारतीयों की आम धारणा के विपरीत उन्हें वहां भाषाई समस्या का सामना करना पड़ा, खास तौर पर छोटे-मोटे होटल-रेस्तरां में। ऐसा ही अनुभव मुझे कोई 30 साल पहले पेरिस में हुआ था। जिन लोगों को चीन, जापान, ब्राजील में प्रवास का अनुभव है वे जानते हैं कि वहां अंगरेजी से काम नहीं चलता। यह भी याद करें कि बोफोर्स घोटाले के आरोपी “ओताविओ क्वात्रोची” को अर्जेंटिना देश से सी.बी.आई. प्रत्यर्पण इसलिए नहीं करा पाई कि स्पेनी भाषा में लिखित मामले से संबंद्ध दस्तावेजों का अंगरेजी में अनुवाद कराने में उसको (सी.बी.आई. को) मुश्किल आ रही थी।

उक्त बातों से क्या निष्कर्ष निकलता है?

यही न कि अंगरेजी की विश्व-व्यापकता को लेकर भारतीयों में भ्रम व्याप्त है जिसके चलते वे अंगरेजी को हर स्थल पर हर अवसर पर वरीयता देते हैं। किंतु इस भ्रम से उनको मुक्त करना अतिकठिन असंभव-सा कार्य है, क्योंकि यह भ्रम बरकरार रहे ऐसा प्रयास करने वाले लोग देश में अधिक हैं उनकी तुलना में जो इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि हिन्दी के कई पक्षधर स्वयं इसी भ्रम में जी रहे हैं और हिन्दी की बात वे भावनावश करते हैं। अंगरेजी की व्यापकता की बात मिथ्या है इसकी बात वे नहीं करते।

मैकॉले की शिक्षा नीति

वे क्या कारण हैं कि अंगरेजी भारतीय भाषाओं के ऊपर अजेय वर्चस्व पा सकी है और वह यहां के जनमानस पर जादुई तरीके से राज करती आ रही है? जो कारण मेरी समझ में आते हैं उनमें प्रमुख है अंगरेजी हुकूमत की वह नीति जिसे लोग “मैकॉले की शिक्षा नीति” के नाम से जानते हैं। करीब पौने दो सौ साल पहले की उस नीति का सार मैकॉले के अधोलिखित कथन में निहित हैः

“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” – T.B. Macaulay, in support of his Education Policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.

हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे करोड़ों जनों के बीच दुभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि से अंग्रेज हों।” (हिन्दी अनुवाद मेरा)

ब्रिटिश हुकूमत की वह नीति कैसे सफल हुई और उसके चलते कैसे एक सशक्त प्रशासनिक बिरादरी ने इस देश में जड़ें जमाई इसकी चर्चा मैं अगले आलेख में करूंगा।  आपको यह स्वीकरना होगा कि विलायत के शासकों ने इसी जमात की मदद से इस देश पर राज किया था। यही वह तबका था जो स्वयं को अंग्रजों के निकट और आम लोगों से अलग रहने/दिखने का शौक रखता था और आज भी रखता है। इस देश का “इंडियाकरण” इसी सामाजिक वर्ग का अघोषित उद्येश्य रहा है ऐसी मेरी प्रबल धारणा है। और भी बहुत कुछ रहा है। … अभी के लिए लगभग पौने-उन्नीस सौ शब्दों का यह आलेख पर्याप्त है। – योगेन्द्र जोशी

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{1}
“हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे लाखों-करोड़ों जनों के बीच दूभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग/वर्ण में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि/विद्वत्ता में अंग्रेज हों । [Indian in blood… English in intellect…] – टी.बी. मैकॉले, तत्कालीन गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिक को 1835 में सौंपी गई अपनी शिक्षा नीति के समर्थन में ।”

{2}
“हमने अंग्रेज विद्वानों की एक जाति तैयार कर ली, जिसे अपने देशवासियों के प्रति नहीं के बराबर या अत्यल्प सहानुभूति है । – प्रोफेसर एच. एच. विल्सन, हाउस अव् लॉर्ड‌ज की चयनित समिति के समक्ष, 5 जुलाई, 1863 ।”

{3}
“मैं यह मत व्यक्त करने का जोखिम उठा रहा हूं कि विलियम बैंटिक का पूरब में अंग्रेजी भाषा एवं अंग्रेजी साहित्य को बढ़ावा देने तथा फैलाने का दोहरा कार्य … ठोस नीति की चतुराई भरी शानदार तरकीब, जिसने भारत में ब्रिटिश राज को विशिष्टता प्रदान की है । – डा. डफ्, भारतीय राज्यक्षेत्र से संबंद्ध लॉर्ड‌ज की द्वितीय रिपोर्ट में, 1853 ।”

उपर्युक्त उद्धरण, {1}, {2}, एवं {3}, मैंने नवंबर में लिखी गई अपनी पोस्ट से लिए है, मौजूदा विचारणा के संदर्भ के लिए (देखें पोस्ट दिनांक 16.11.2009) ।

मुझे उक्त पोस्ट के संदर्भ में अपने एक सुधी तथा जानकार पाठक से एक विचारणीय टिप्पणी प्राप्त हुई थी । उसी को केंद्र में रखते हुए कुछ और भी कहने का विचार मेरे मन में जगा है । कतिपय अपरिहार्य कारणों से मैं यह सब पहले समय पर नहीं लिख सका था ।

प्रथमतः अपने उन सम्माननीय पाठक से प्राप्त जानकारी (अधोलिखित) का जिक्र करता हूं:-

[A]
इस महत्त्वपूर्ण तथ्य से बहुत कम ही लोग अवगत हैं कि स्वयं लॉर्ड मैकॉले, जिनकी संस्तुति के आधार पर अंगरेजी भाषा 1835 में देश में शिक्षा का माध्यम बनी, अंगरेजी को भारत के लिए एक अस्थायी समाधान के रूप में देखते थे – उनकी मान्यता थी कि चूँकि “इस समय”, यानी 19 सदी के प्रारंभ में, ज्ञान के विविध क्षेत्रों में अंगरेजी (और फ्रांसीसी) भाषी ही सबसे बढ़े-चढ़े हैं, इसलिए जरूरी है कि भारत के योग्य वर्ग को अंगरेजी पुस्तकों में निहित ज्ञान से परिचित कराया जाय ताकि बाद में वे उस ज्ञान को स्थानी (स्थानीय) भाषाओं में अनुवाद कर उसे जन-साधारण तक पहुँचा सकें:-

[B]
“To that class [Indian in blood… English in intellect…] we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from Western nomenclature and to render them, by degrees, fit vehicles for the conveying of knowledge to the great mass of the population.” [परिच्छेद 34] [मेरा अनुवादः हमें उस वर्ग (खून में भारतीय … बौद्धिकता में अंग्रेज …) पर छोड़ देना चाहिए कि वह देसी बोलियों (भाषाओं?) का परिष्कार करें, पाश्चात्य शब्दावली से उधार लिये वैज्ञानिक पारिभाषिक पदों द्वारा उन्हें समृद्ध करें, और उन्हें विशाल जनसमुदाय को ज्ञान प्रदान करने के सुयोग्य वाहक के तौर पर उत्तरोत्तर सुयोग्य बनायें ।]

[C]
मैकॉले ने इतिहास से दो उदाहरण दे कर अपना उद्येश्य स्पष्ट किया था – पहला उदाहरण उनके अपने देश का ही था जहाँ 15वीं और 16वीं सदी में दृ अंगरेजी के सशक्त होने से पहले दृ ग्रीस (यूनान) और रोम की भाषाएँ शिक्षा के लिए अपरिहार्य मानी गयीं थीं । दूसरा उदाहरण रूस का था जहाँ जहॉं जार पीटर ‘महान’ के शासनकाल में लोगों में पश्चिमी यूरोप के ज्ञान और वहाँ की भाषाओं, विशेषतः फ्रांसीसी, के प्रति विशेष लगाव जगा था और 120 वर्ष के अंदर ही उन्होंने अपनी भाषा रूसी और अपनी संस्कृति को परिष्कृत कर लिया था ।

[D]
लगता है भारत का आज का शासक वर्ग जन-सामान्य के हित के प्रति उतना भी सजग नहीं है जितना पौने दो सौ वर्ष पहले ब्रितानी मैकॉले था । उसने जिस हल को अल्पकालिक माना था, उसे स्थायी बनाकर हम अपनी भाषाओं की सतत उपेक्षा कर रहे है । (गर्भनाल पत्रिका के जनवरी 2009 अंक में छपा लेख देखें – “भारत की भीषण भाषा समस्या और उसके सम्भावित समाधान”)

(कथित जानकारी का उल्लेख संपन्न । मैंने संदर्भ हेतु इसके अनुच्छेदों को क्रमशः [A], [B], [C], एवं [D] नामांकित किया है ।)

मैं आगे अपना जो मत व्यक्त करने जा रहा हूं उसे सही परिप्रेक्ष में समझने के लिए मेरी 17 जनवरी की पोस्ट का संदर्भ उपयोगी होगा, जिसमें मैंने अंग्रेजी के संक्षिप्त इतिहास का उल्लेख किया है ।

देश की ब्रितानी हुकूमत के संबंध में मैकॉले के विचार उत्कृष्ट तथा उदार थे, इस देश के हितों के प्रति वह समर्पित था, वह यहां पर एक ऐसा शासकीय वर्ग तैयार करने के प्रति प्रयत्नशील था जो यहां की भाषा-संस्कृति के प्रति सम्मान रखता हो, वह यहां के लोगों को ‘सभ्य, सुसंस्कृत एवं सुयोग्य’ बनाकर शासन उनके हाथ में सौंपने का इच्छुक था, इत्यादि बातों में जो लोग विश्वास करते हों उन्हें ऐसा करने की स्वतंत्रता है । पर मैं स्वयं यह सब मानने के लिए तैयार नहीं हूं, क्योंकि मेरे तार्किक चिंतन के अनुसार यह सब सच नहीं हो सकता है । आरंभ में ही मैं स्पष्ट कर दूं कि मैंने मैकॉले संबंधित टिप्पणियों को स्व. सुंदरलाल की पुस्तक से उद्धृत किये हैं (देखें 16 नवंबर 2009 की पोस्ट), जिन्हें मैं अधिक विश्वसनीय मानता हूं । अतः जहां कहीं मुझे वह सुनने को मिले जिसकी उपर्युक्त {1, 2, 3} से असंगति हो तो मैं उन बातों को स्वीकार नहीं कर सकता ।

इस बात पर भी गौर करें कि यूरोप के शासकों ने विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में दो प्रकार के उपनिवेश स्थापित किये थे । प्रथम तो वे क्षेत्र थे जहां उनके लोग बस गये थे । वहां के मूल निवासियों को उन्होंने विस्थापित किया या, कुछ हद तक उनका सफाया ही कर डाला । वे अपने को सभ्य और उन्नत दर्जे के मानव समझते थे और उन क्षेत्रों के मूल निवासियों को ‘सभ्य’ बनाने वाले ठेकेदार बन बैठे थे । उनको उन्होंने दोयम दर्जे का नागरिक बना के रखा था । दक्षिण अफ्रिका में तो यह स्थिति हाल तक बनी रही । ये उपनिवेश कालांतर में स्वतंत्र भी हो गये, लेकिन रहे यूरोपीय मूल के लोगों के ही देश । उन क्षेत्रों के मूल निवासी महत्त्वहीन बने रहे । उत्तर तथा दक्षिण अमेरिका के सभी, आस्ट्रेलिया-न्यूजीलैंड एवं अफ्रिका के कुछ देश, इस प्रकार के उपनिवेश थे ।

दूसरे वे क्षेत्र थे जहां यूरोप के लोग बसने नहीं पहुंचे थे, बल्कि जहां उन्होंने अपना शासन कायम करके वहां के संसाधनों पर कब्जा करने का इरादे से पहुंचे । इस श्रेणी में एशियाई देश शामिल हैं । ये वे क्षेत्र थे जहां के लोग अमेरिकी, आस्ट्रेलियाई तथा अफ्रिकी महाद्वीपों की तरह अपेक्षतया कम उन्नत और संख्या में यूरोपियों के सापेक्ष नगण्य नहीं थे । एशिया में अपने उपनिवेश स्थापित करने में सर्वाधिक सफल अंग्रेज रहे, जिन्होंने बहुत चतुराई से अपनी नीतियां बनाई थीं, और यहां के लोगों की कमजोरी को भरपूर लाभ उन्होंने उठाया था । याद रहे कि अंग्रेजों ने अपने देश से भारी-भरकम फौज लाकर भारत पर आधिपत्य स्थापित नहीं किया था । उनकी ‘लोगों को बांटो और राज करो’ की नीति की आज भी चर्चा होती है । क्या थी यह नीति ? यही न कि इसी भारत-भूमि से ऐसे लोगों को चुना जाए जो उनके पक्ष में खड़े होवें, ऐसे लोग जो आम भारतीयों के हितों को साधने एवं उनके प्रति संवेदनशील होने के बजाय अंग्रेजों के प्रति समर्पित हों । मैकॉले की शिक्षा नीति इसी उद्वेश्य की पूर्ति करती थी । ये बातें साफ-साफ झलकती हैं {1, 2, 3} में ।

अब विचार करिए उपरिलिखित टिप्पणी संख्या [A, B] पर ।

जब कहा जाता है कि मैकॉले ‘अंग्रेजी’ साहित्य में निहित ‘अपार ज्ञान भंडार’ के बल पर भारतीयों को सुशिक्षित बनाने का नेक इरादा रखता था तो सहसा विश्वास नहीं होता है । मत व्यक्त किया गया है कि भारतीय अपने देश की भाषा-संस्कृति के प्रति इतने जागरूक और समर्पित हो जायेंगे, कि वे अपनी भाषाओं (बकौल मैकॉले ‘बोलियों’) को समृद्ध और अभिव्यक्ति में सुसमर्थ बनाकर जनसामान्य की सेवा करेंगे । अंग्रेजी तात्कालिक प्रयोजन के लिए अस्थाई तौर पर प्रयोग में ली जा रही थी यह बात गले नहीं उतरती है । तब क्यों ऐसे लोगों की जमात पैदा की जा रही जो अंगरेजियत में रंगे हों और केवल चमड़ी से ही भारतीय रह गये हों ? यह मत तो उसी मैकॉले के कथन, जैसा आरंभ के अनुच्छेद {1} में लिखा है के विपरीत है । स्पष्ट कहा गया है कि भारतीयों में से ऐसे लोगों को चुना जाये जो केवल कद-काठी, रूपरंग में भारतीय हों, लेकिन सोच और इरादों में अंग्रेज बन गये हों, अंग्रेजी शासन को चलाने में मदद करने लगें (न कि उनसे मुक्ति के प्रयास में संलग्न हों !), और अंग्रेजों एवं शेष भारतीयों के बीच सेतु का कार्य करें । ऐसे ही मुट्ठी भर किंतु अधिकार-संपन्न लोगों के बल पर अंग्रेजों ने इस देश में राज किया था । {2} तथा {3} में संबंधित अंग्रेज वक्ताओं के उद्गार इसी तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अंग्रेज शासक भारतीयों की ऐसी जमात तैयार करने में सफल रहे, जो अपने देशवासियों के प्रति कम सहानुभूति रखते थे और अंग्रेजों के प्रति अधिक समर्पित थे । स्वाधीनता संघर्ष में इस जमात की कोई रचनात्मक भूमिका नहीं थी । जिन्हें अंग्रेजी राज रास नहीं आया उन्होंने अंग्रेजों की नौकरी ही छोड़ दी ।

एक बात सोचने योग्य है – क्या यह संभव है कि आप किसी को अंग्रेजियत की घुट्टी निरंतर पिलायें और फिर उससे अपेक्षा करें कि अंग्रेजियत छोड़ आनी भाषा-संस्कृति के उत्थान या सेवा में लग जाये ? सामान्यतः ऐसा नहीं हो सकता, अपवाद भले ही कहीं मिल जाए । याद रहे अंग्रेजों ने इस देश को विवशता में स्वतंत्रता प्रदान की । उन्होंने अंग्रेजियत में बुरी तरह रंग चुकी अधीनस्थ नौकरशाही को यह निर्देश नहीं दिये, “जाओ अब तुम अपनी भाषाओं में ज्ञान बांटो और देश की सेवा करो, हम तो मदद करने आये थे, अस्थाई तौर पर ।” जरा इस तथ्य पर गौर करें कि पूर्व अंग्रेज प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल (Winston Leonard Spencer Churchill) यहां के नये राजकाज चलाने वालों की योग्यता के प्रति सशंकित था । कुल मिलाकर मैं यही मानता हूं कि अंग्रेज शासक अंग्रेजी की घोर पक्षधर नौकरशाही को देश पर लाद गये जो स्वतंत्रता से पहले और उसके बाद भी बिना कीमत चुकाए समस्त लाभों को अपने हक में बटोरने में कामयाब रहे और आज भी कामयाब चल रहे हैं । भारतीय भाषाओं को न पनपने देने के लिए उन्होंने जैसे कसम खा ली हो । ऐसे में [D] में कही गयी बात में आश्चर्य ही क्या है ?

अब बात करें टिप्पणी [C] के संदर्भ में ।

अंग्रेजी की इंग्लैंड में प्रतिष्ठापना के बारे में पर्याप्त जानकारी मैंने 17 जनवरी की पोस्ट में दी है । यहां उसका पुनरुल्लेख नहीं कर रहा हूं, किंतु इतना याद दिलाना चाहूंगा कि 1204 में जब इंग्लैंड का राजा ‘किंग जॉन’ ने नॉर्मेंडी (Normandy) का प्रदेश फ्रांस के हाथों खो दिया तब फ्रांसीसी भाषा की अहमियत भी समाप्त हो गयी । इंग्लैंड में तो प्रायः सभी लोग अंगरेजी ही जानते तथा बोलते थे और वही भाषाई संपर्कसाधन का अच्छा माध्यम बन चुकी थी । हालत बदलने लगे और चौदहवीं सदी के अंत तक (1350-1380) फ्रांसीसी के बदले अंगरेजी शिक्षा का माध्यम बन गयी । सामाजिक वास्तविकता को देखते हुए वह 1362 में राज-दरबार की भाषा भी घोषित हो गई । ज्ञातव्य है कि 1399 में सिंहासन पर बैठने वाला किंग हेनरी चतुर्थ इस काल का पहला राजा था जिसकी मातृभाषा अंगरेजी ही थी ।

19वीं सदी के भारत में अंगरेजी के सापेक्ष भारतीय भाषाओं की स्थिति की तुलना 14वीं-15वीं सदी के समय के इंग्लैंड में फ्रांसीसी के सापेक्ष अंगरेजी की स्थिति से नहीं की जा सकती है । 14वीं-15वीं सदी के यूरोप में न तो औद्योगिक क्रांति हुई थी और न ही वैज्ञानिक लेखन बढ़-चढ़ के हो रहा था । न कोई भाषा विश्व भर में प्रभावी कही जा सकती थी । सभी भाषाएं क्षेत्र-विशेषों तक ही सीमित थीं, और उनकी अहमियत प्रमुखतया साहित्यिक लेखन से जुड़ी थी । किंतु 19वीं सदी आते-आते स्थितियां बिल्कुल बदल गयीं । विज्ञान-प्रौद्योगिकी में ज्ञान का तेजी से विस्तार हो रहा था । लेखन और प्रकाशन व्यापक स्तर पर होने लगा । यूरोप की भाषाएं दूर-दराज तक पहुंच रही थीं । कालोनाइजेशन यानी यूरोपियों का उपनिवेश स्थापित करने का दौर चल चुका था । अतः [C] में व्यक्त मैकॉले के दृष्टांत मुझे मान्य नहीं लगते हैं ।

गौर करें कि इंग्लैंड में अंग्रेजी की स्थापना बाहर से गये लोगों ने नहीं की बल्कि वहीं के लोगों ने की । अंगरेज हमारे देश में हमारे दूरगामी भले के लिए शासन करने और अंग्रेजी के माध्यम से यहां की भाषाओं को समृद्ध बनाने के उद्येश्य से आये थे ऐसा नहीं माना जा सकता । मेरा दृढ़ मत है कि अंग्रेज अपने साम्राज्य के विस्तार पाने और अंगरेजी भाषा को दुनिया पर राज करते देखना चाहते थे । भला वे यह नीयत कैसे रख सकते थे कि यहां की भाषाएं पनपें और अंततः देशवासियों के ज्ञान का माध्यम बनें । उन्होंने तो यहां के बुद्धजीवियों के दिमाग में यह बात गहरे बिठा दी कि ज्ञान का माध्यम तो अंगरेजी के अलावा कोई अन्य भाषा हो ही नहीं सकती है, कम से कम भारतीय भाषाएं हरगिज नहीं । इस भावना से यह देश स्वतंत्रता के 60 साल के बाद भी नहीं मुक्त हो पाया है । तब कैसे माने कि [C] में लिखित बातें ईमानदार तथा सार्थक थीं ?

जहां तक रूसी भाषा का सवाल है, वहां कोई विदेशी यह कहने नहीं गया कि हे रूसवासियों, अपनी भाषा को आगे बढ़ाओ । वहीं के लोगों के प्रयास से रूसी इतनी समर्थ हुई कि वैज्ञानिक लेखन उस भाषा में आज भी हो रहा है । मुझे कहीं यह पढ़ चुकने की याद है कि करीब 150 वर्ष पहले जापानियों ने भी महसूस किया कि अगर वे अपनी भाषा को सक्षम नहीं बना पाये तो अंगरेजी के वर्चस्व को झेल नहीं पायेंगे । आज जापानी भाषा में भी वैज्ञानिक लेखन हो रहा है । हकीकत तो यह है कि दुनिया की किसी भी भाषा के आगे बढ़ने में अंगरेजी आड़े आई है; अंगरेज एवं अंगरेजी सहायक भी हो सकते हैं इसकी तो कल्पना ही नहीं की जा सकती है ।

अंत में बात की जाये [D] की ।

इतना सब कहने का मतलब यह है कि मैकॉले की शिक्षा नीति यहां के बुद्धजीवियों को अंगरेजी एवं अंगरेजियत में रंग देना था । भारतीय समाज सदा से ही एक बुरी तरह विभक्त समाज रहा है । गैरबराबरी की भावना अपने देशवासियों के खून में इस कदर घुली है कि उससे निजात पाना संभव नहीं है । जाति, धर्म और क्षेत्रीयता के आधार पर सामाजिक विभाजन का अनुभव हम सभी कर रहे हैं । स्वाधीनता के बाद दो पीड़ियां गुजर चुकी हैं, परंतु सामाजिक विभाजन जस का तस बना हुआ है । मेरा सोचना है – और आप पूर्ण स्वतंत्र हैं मुझसे असहमत होने के लिए – कि अंगरेज यहां उक्त तथ्य से वाकिफ हो चले थे और उन्हें विश्वास हो चला था कि इस देश पर सफल शासन के लिए इसी जमीन से एक जमात खड़ी की जानी चाहिए, जो भाषाई विभाजन पर आधारित हो । अर्थात् अंगरंजी में रंगे लोगों की फौज तैयार करना जो अंगरेजी के आधार पर स्वयं को शेष भारतीयों से श्रेष्ठ और तथा अंगरेजों के अधिक निकट समझें । यही वर्ग उनका प्रशासक वर्ग बना । उनकी वह नीति कितनी अधिक सफल रही इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि आज हम अंगरेजी छोड़ने के बजाय अपनी भाषाओं को छोड़ रहे हैं । देशी भाषाएं हमारी ही नजर में निरर्थक और दोयम दर्जे की बनी हुई हैं । उनक प्रति आदर भाव समाप्तप्राय हो रहा है । उनका स्वरूप विकृत होता जा रहा है; उनका अंगरेजीकरण हो रहा है । परिणाम यह है कि अब हम अंगरेजी के सामने इतने नतमस्तक हो गये कि उसके बिना सफल जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं । यह राष्ट्रीय दुर्भाग्य नहीं है क्या ?

और यह वर्ग आज भी देश की प्रशासनिक, आर्थिक तथा शैक्षिक नीतियों का निर्धारण करता है, और उस कार्य में अंगरेजी के वर्चस्व को यथावत् बनाये हुए है । स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तत्कालीन राजनेताओं में अपनी भाषाओं के प्रति जो जोश उत्पन्न हुआ था उसे उनकी अगली पीढ़ियों ने शनैःशनैः भुला दिया । इसका लाभ लेते हुए इस वर्ग ने तरह-तरह के तर्क-कुतर्कों के द्वारा देशी भाषाओं को पनपने में अड़ंगे लगाये रखा । अभिजात वर्ग में व्याप्त अंगरेजी के प्रति गर्वानुभूति के पीछे मैकॉले नीति जिम्मेदार नहीं तो कौन है ? – योगेन्द्र जोशी

1.
“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” (T.B. Macaulay, in support of his education policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.)
(हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे लाखों-करोड़ों जनों के बीच दूभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग/वर्ण में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि/विद्वत्ता में अंग्रेज हों । – टी.बी. मैकॉले, तत्कालीन गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिक को 1835 में सौंपी गई अपनी शिक्षा नीति के समर्थन में ।)

2.
“… we created a separate caste of English scholars, who had no longer any sympathy, or very little sympathy with their countrymen;” (Prof. H.H. Wilson before the select committee of the house of Lords, 5th July, 1863.)
(… हमने अंग्रेज विद्वानों की एक जाति तैयार कर ली, जिसे अपने देशवासियों के प्रति नहीं के बराबर या अत्यल्प सहानुभूति है । – प्रोफेसर एच. एच. विल्सन, हाउस अव् लॉर्ड‍‌‌ज की चयनित समिति के समक्ष, 5 जुलाई, 1863 ।)

3.
“… I venture to hazard the opinion, that Lord Willium Bentinck’s double act for the encouragement and diffusion of the English language and English literature in the east …the grandest masterstroke of sound policy that has yet characterised the administration of the British Government in India.” (Dr Duff, in the Lords second report on Indian Territories, 1853, p 409.)
(… मैं यह मत व्यक्त करने का जोखिम उठा रहा हूं कि विलियम बैंटिक का पूरब में अंग्रेजी भाषा एवं अंग्रेजी साहित्य को बढ़ावा देने तथा फैलाने का दोहरा कार्य … ठोस नीति की चतुराई भरी शानदार तरकीब, जिसने भारत में ब्रिटिश राज को विशिष्टता प्रदान की है । – डा. डफ्, भारतीय राज्यक्षेत्र से संबंद्ध लॉर्डज की द्वितीय रिपोर्ट में, 1853 ।)

This information I have taken from an article that I wrote several years back for a Physics education periodical. When I was sorting out old news paper clippings, magazine atircles and other items of information that I had collected during the last more than two decades, I accidentlly came across the manuscript relating to the said article. The reference cited therein is: Sudarlal, Bharat Main Angreji Raj (in Hindi, with footnotes in English), Vol III, pp 1140-42 (Onkar Press, Allahabab, 1938) (यह जानकारी मैंने अपने एक लेख से ली है, जो मैंने वर्षों पहले भौतिकी-विषयक एक पत्रिका के लिए लिखा था । पिछले दो दशकों से अधिक के समय में समाचार-पत्रों की कतरनों, पत्रिकाओं के लेखों तथा अन्य जानकारीशुदा सामग्री की जब मैं छटनी कर रहा था, तब संयोग से उल्लिखित लेख की पांडुलिपि मेरे हाथ लगी । उक्त स्थल पर अंकित संदर्भ यूं है: सुंदरलाल, भारत में अंग्रेजी राज, हिंदी में, अंग्रेजी में पाद-टिप्पणियों के साथ, तृतीय खंड, पृष्ठ 1140-42; ओंकार प्रेस, इलाहाबाद, 1938 ।)

Let me add here this much: Late Pt. Sundarlal, a scholar of History, is reported to have gone to England for higher studies like so many other Indians of those times. During his stay there, he came accross various documents archived in the British libraries – documents pertaining to the British rule in India. Those documents aroused the patriotic rebellian in him, and eventually he turned into a freedom fighter. The first edition of his work was published in1929. Pt. Sundarlal was subsequently jailed for his `offence‘.

(कहा जाता है कि पंडित सुंदरलाल, इतिहास के एक विद्वान, उस काल के अन्य कई भरतीयों की भांति, उच्चाध्ययन के लिए इंग्लैंड गये थे । वहां के प्रवास के दौरान ब्रिटिश पुस्तकालयों में संग्रहीत विभिन्न दस्तावेज उनकी नजर में आये – दस्तावेज जो भारत में ब्रिटिश राज से संबंधित थे । उन दस्तावेजों ने उनके भीतर के विद्रोही को जगाने का काम किया, और अंत में वे एक स्वतंत्रता सेनानी बन बैठे । पं. सुंदरलाल को बाद में अपने ‘अपराध’ के लिए जेल जाना पड़ा ।)

I have no access to the full text of the speech Macaulay may have given in 1935. But I feel that the few words stated in the first paragraph above make it more than clear that he was sowing the seeds of a newer class of `Indians’, who were committed to help the British rule in this country, India. You may not like to use the words `brainwashing‘ in this context, but I definitely opine that something of that sort was there first in his mind and later in the minds of those who were in change of the rule on behalf of the British Royalty. And their scheme did work successfully, perhaps better than what they might have expected. The rulers succeeded in carving out of the Indian society a section of people, who could be regarded as brown Britishers born to Indian parents and physically brought up in the Indian society, but who were enthusiastically committed to the interests of the rulers and had quietly become supporters of the Rule in this country. – Yogendra Joshi (मैकॉले ने 1935 में जो भाषण दिया होगा उसके पाठ्य तक मेरी पहुंच नहीं है । किंतु मैं महसूस करता हूं कि वे कुछएक शब्द जो ऊपर के पहले अनुच्छेद में कहे गये हैं यह स्पष्ट कर देते हैं कि वह भारतीयों के एक नए वर्ग का बीजारोपण कर रहा था, जो ब्रिटिश राज को इस देश, भारत, में चलाने में सहायक हो । आप इस प्रसंग में मति-विपर्यास (ब्रेनवाशिंग) जैसे शब्द को प्रयोग में लेना नहीं चाहेंगे, लेकिन मेरा मत है कि अवश्य ही इसी प्रकार की कोई बात प्रथमतः उसके मन में और बाद में उनके मन में रही जिन्हें ब्रिटिश राजसत्ता की ओर से शासन का दायित्व मिला था । और उनकी योजना सफल भी रही, कदाचित् उनकी अपेक्षा से अधिक । वे शासक भारतीय समाज में से लोगों का एक वर्ग तरासने में सफल रहे जिन्हें भारतीय माता-पिता से जन्मे और भारतीय समाज में पले-बढ़े भूरे अंग्रेज कहा जा सकता है, लेकिन जो शासकों के हितो के प्रति समर्पित थे और उस राज के मूक समर्थक बन बैठे । – योगेन्द्र जोशी )

(टिप्पणीः हिंदीभाषियों के बीच अंग्रेजी शब्द brainwashing का प्रचलन आम बात है, और मेरे अनुमान से प्रायः सभी इसके अर्थ से परिचित हैं । मैंने हिंदी में इसके लिए ‘मति-विपर्यास’ चुना है; विपर्यास अर्थात् परिवर्तन या उलटफेर । इसके लिए उपयुक्त सामासिक शब्द क्या है या होना चाहिए यह मैं नहीं खोज पाया ।)

इस मुद्दे से जुड़े अथवा इस पर आधारित विचार आगामी आलेखों में प्रस्तुत किये जाएंगे । – योगेन्द्र जोशी