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सुदूर दक्षिणी राज्य तमिलनाडु के दो-एक पर्यटक स्थलों की दश-द्वादश-दिवसीय यात्रा के पश्चात् मैं अभी हाल ही में लौटा हूं । मैं पारिवारिक सदस्यों के चार जनों के दल में शामिल था । हम लोग चेन्नै होते हुए रामेश्वरम्, कन्याकुमारी तथा मदुरै तक हो आये और फिर चेन्नै दो दिन रुककर वापस वाराणसी लौट आये । इस आलेख में अपनी यात्रा का विवरण प्रस्तुत करना मेरा इरादा नहीं है; मैं हिन्दी को लेकर अर्जित अपने अनुभवों का उल्लेख भर करना चाहता हूं ।

मेरे लिए तमिलनाडु के उक्त स्थलों की यात्रा कोई नयी बात नहीं थी । मैंने आज से करीब पैंतीस वर्ष पूर्व, यानी उन्नीस सौ तिरहत्तर, में पहली बार इन नगरों का दर्शन किया था । तब से अब तक मैं कुल पांच बार कन्याकुमारी और तीन-तीन बार रामेश्वरम् एवं मदुरै की यात्रा कर चुका हूं । हर बार आना-जाना चेन्नै के रास्ते ही हुआ है, जहां मैं अन्य मौकों पर भी गया हूं । पैंतीस सालों के लंबे अंतराल में कन्याकुमारी नगरी उल्लेखनीय रूप से बदल चुकी है । थोड़ा बहुत बदलाव तो रामेश्वरम् में भी स्वाभाविक रूप से हुआ ही है । हिन्दी संबंधी मेरा अब तक वहां क्या अनुभव रहा इस बात की चर्चा मैं एक अजनबी से अपनी मुलाकात के जिक्र के साथ करता हूं, जो चेन्नै (तत्कालीन मद्रास) सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर तब हुई थी जब मैं पहली बार वहां गया था । पूरा वाकया कुछ यूं है:- (आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें)