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यह वैश्वीकरण का युग है। इस युग में भोज्य पदार्थ और आम जीवन में प्रयुक्त उपभोक्ता सामग्रियां किसी एक स्थान पर उत्पादित होती हैं और किसी दूसरे स्थान पर उपलब्ध हो जाती हैं। स्थानीयता का भाव न वस्तुओं के उत्पादन में रह गया है और न ही उनके उपभोग या उपयोग में रह गया है। बातें इससे भी आगे निकलकर समुदायों के बीच की दूरी का समाप्तप्राय हो जाना तक पहुंच चुकी हैं। भौगोलिक, सांस्कृतिक अथवा भाषाई भिन्नता के कारण विविध समुदायों के बीच एक प्रकार की जो संपर्कहीनता पहले देखने को मिलती थी वह तिरोहित होते जा रही है। अब ‘मुख्यधारा में आने’ जैसी बातें सुनने को मिलती हैं। सांस्कृतिक एव एवं भाषाई अतिक्रमण सामान्य बात हो चुकी है। ऐसी स्थिति में क्या मातृभाषा के अर्थ भी बदल नहीं गये होंगे?

मातृभाषा को लेकर मेरे मन में कुछ शंकाएं है। क्या आज के युग में मातृभाषा का अर्थ वही रह गया है जो सदियों से चला आ रहा था? यह सवाल मेरे मन में तब उठा जब में अपनी मातृभाषा, अपने बच्चों की मातृभाषा और अपने पोतों की मातृभाषा क्या है इस पर विचार करता हूं। इसके लिए मैं अपने बचपन से लेकर अभी तक के अनुभवों को पाठकों के विचारार्थ प्रस्तुत कर रहा हूं।

मेरी मातृभाषा

मेरा जन्म १९४८ में आज के उत्तराखंड (तब उत्तर प्रदेश) के कुमाऊं अंचल के एक सुदूर गांव में हुआ था। हमारे घरों में कुमाउंनी बोली बोली जाती थी जिसे हिन्दी की बोलियों या उपभाषाऑ (दायलेक्ट) में से एक माना जाता है। हिन्दी से तात्पर्य है मानक हिन्दी यानी ‘खड़ी बोली’। उपभाषा होने के बावजूद कुमाउंनी हिन्दीभाषियों की समझ में कमोबेश आ जायेगी ऐसा कदाचित नहीं है। दरअसल इस बोली में ह्रस्व ध्वनियों का प्रयोग अत्यधिक होता है। हम लोग भी ‘मैं’ के लिए ‘मैं’ ही इस्तेमाल करते हैं, लेकिन इस सर्वनाम में ‘ऐ’ की ध्वनि दीर्घ न होकर ह्रस्व होती है, अर्थात् वह सामान्य से काफी छोटे अंतराल तक के लिए उच्चारित होती है। इसी प्रकार ‘पानी’ के लिए यही शब्द प्रयुक्त होता है। हमारे इलाके में इसका उच्चारण ‘पाणि” किया जाता है जिसमें ‘आ’ ध्वनि तो है किंतु बहुत संक्षिप्त काल के लिए। कुमाउंनी का कोई मानक स्वरूप नहीं है। नेपाल सीमा के पास (चंपावत आदि में) ‘पानि’ बोलने वाले मिलेगें। हम ‘मैं’ (ह्रस्व ध्वनि) बोलते है लेकिन रानीखेत के आसपास ‘मिं’ सुनने को मिलता है। यह भी बता दूं इस बोली के कई शब्द हिन्दी के नहीं हैं। इससे भी बोली समझने में अड़चन पैदा होती है।

अस्तु, मैं कुमाउंनी बोली के बारे में अधिक नही कहने जा रहा हूं। इतना बताने का उद्येश्य यही है कि मैं जहां जन्मा था वहां परिवार एवं गांव में और संबंधित परिवेश में कुमाउंनी का ही चलन था। अधिकांश लोगों का हिन्दी से कोई सरोकार नहीं था। नौकरी-पेशे की खातिर जो बाहर निकल जाते उनका कार्य हिन्दी से ही चलता था। लेकिन वे भी जब गांव आते थे कुमाउंनी में ही वार्तालाप होता था।

पांच वर्ष की आयु तक मेरा ज्ञान कुमाउंनी तक ही सीमित था। किंतु जब प्राथमिक विद्यालय (पाठशाला) जाना शुरू हुआ तो पढ़ाई-लिखाई सब हिन्दी में ही चला और वहीं से हिन्दीभाषा अपनी भाषा बन गयी। उसके बाद की शिक्षा के लिए उस पर्वतीय क्षेत्र से बाहर निकला तो कुमाउंनी बोली छूट गयी और हिन्दी ही अपनी रोजमर्रा की भाषा बन गयी। किंतु यह बोली भूल गया ऐसा हुआ नहीं। गांव आना-जाना चलता रहा और पिताश्री एवं भाइयों के साथ रहते हुए कुमाउंनी चलती रही। अब मैं बाल्यावस्था की अपनी बोली को मातृभाषा मानूं या बाद में हिन्दी, जिसका प्रयोग अवश्य ही अधिकांशतः होने लगा। इस प्रश्न की सार्थकता समझने के लिए एक दृष्टांत पेश है। मुझे बनारस में एक पड़ोसी महिला (कदाचित् निरक्षर) का स्मरण हो आता है जो हिन्दी ठीक-से नहीं बोल पाती थीं और अपनी देहाती बोली (कदाचित् भोजपुरी) में ही बातें करती थीं। उनकी मातृभाषा क्या थी? क्या वह हिन्दी जिसे वे बोल नहीं सकती थीं?

मेरी पत्नी कुमाउंनी बोलती हैं यद्यपि उनका जन्म, परवरिश एवं शिक्षा-दीक्षा आदि कानपुर में ही हुई। लेकिन पारंपरिक कुमाउंनी गांव से आईं अपनी मां से उन्होंने कुमाउंनी बोली शौकिया सीखी। हम दोनों घर में खड़ीबोली एवं कुमाउंनी दोनों बोलते हैं। किंतु व्यावसायिक (विश्वविद्यालय में भौतिकी शिक्षण के) स्तर पर अंग्रेजी ही मेरी भाषा रही। मुझे लगता है कि मेरी कोई वास्तविक अथवा स्पष्टतया परिभाषित मातृभाषा नहीं है। मेरा चिंतन-मनन कुमाउंनी, हिन्दी तथा अंग्रेजी, तीनों में, चलता है, मौके-मौके के अनुसार। पता नहीं औरों के साथ ऐसा होता है या नहीं।

अगली पीढ़ियों की मातृभाषा

मेरे दोनो बच्चे बनारस में ही जन्मे तथा पलेबढे और शिक्षित हुए, अधिकांशतः अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में। किंतु जो परिवेश उनको मिला वह अंग्रेजीमय न होकर हिन्दी का रहा। इसलिए हिन्दी उनके लिए सहज रही। व्यावसायिक स्तर पर उनको भी अंततः अंग्रेजी अपनानी पड़ी और अब उसी को सर्वाधिक प्रयोग में लेना पड़ता है। कुमाउंनी परिवेश के अभाव में वे इस बोली को सीख नहीं पाए भले ही हम घर में कुआउंनी में बोलते थे। वे बोली को समझ तो लेते हैं लेकिन ठीक-से बोल नहीं सकते। कहना यही होगा कि उनकी मातृभाषा हिन्दी है जो उन्हें बनारस के परिवेश से मिला।

अब मैं अपने पोतों की स्थिति बताता हूं। छोटा साल भर का है इसलिए उसको लेकर कुछ नहीं कहता, लेकिन बड़ा छः साल का हैं। वह अपने माता-पिता (मेरे ज्येष्ठ पुत्र एवं बहू) के साथ बेंगलूरु के 4-5 हजार फ्लैटों वाले विस्तृत परिसर के एक फ्लैट में रहता है। इस परिसर में मध्य-वर्ग एवं उच्च-मध्य वर्ग के नौकरी-पेशे वाले युवा या अधेड़ अवस्था के लोग रहते हैं। इनमें अधिकतर उत्तर भारतीय हैं जो अलग-अलग प्रांतों से आते है। जैसा मेरे देखने में आया इनकी संपर्क भाषा प्रायः अंग्रेजी-मिश्रित हिन्दी अर्थात् हिंग्लिश रहती है। हमें विगत मार्च-अप्रैल-मई – तीन माह – कोरोना-लॉकडाउन के कारण वही रुकना पड़ा। स्कूल-कालेज सब बंद पड़े थे। वहां के निवासियों को परिसर में सीमित रह जाना पड़ा। वह समय था जब परिसर-वासियों को निकट से देखने को अवसर मिला था।

जैसा मैंने कहा वयस्क जन प्रायः हिन्दी (दरअसल हिंग्लिश) में बात कर लेते थे। अंग्रेजी की तुलना में वे हिन्दी को वरीयता दे रहे थे। जो हिन्दी नहीं जानते थे उनके लिए अंग्रेजी का विकल्प था। अपने देश में व्यावसायिक स्तर पर अंग्रेजी का ही चलन है इसलिए अंग्रेजी तो प्रायः सभी समझ-बोल सकते हैं। देश में अंग्रेजी का आकर्षण बढ़ता जा रहा हैं क्योंकि धनोपार्जन के बेहतर रास्तों के द्वार अंग्रेजी ही खोलती है। अतः संपन्न लोगों के बच्चे अंग्रेजी-आध्यम के विद्यालयों में पढ़ते है। मां-बाप भी परिवार में बच्चों की अंग्रेजी मजबूत करने के लिए अक्सर उनके साथ इसी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। इससे बच्चे माँ-बाप की ‘घोषित’ अथवा तथाकथित मातृभाषा से दूर होते चले जाते हैं। परिणाम क्या होता है बताता हूं। उस परिसर में मैंने वयसा १०-१२ वर्ष तक के बच्चों को आपस में अंग्रेजी में ही बात करते पाया। हमने अपने पोते को भी उसी रंग में रंगे जाते देखा था। हिन्दी वह समझ लेता है लेकिन अच्छा नहीं बोल पाता है। हमने उसे बता दिया था कि हम उससे अंग्रेजी में बात नहीं करेंगे। इतना ही नहीं, अपने बेटे-बहू को भी सलाह दी कि वे उसे हिन्दी भी सिखाते चलें। हमारा कहना था कि आंग्लमय माहौल में अंग्रेजी तो वह सीख ही लेगा। वे भी हाँ-हाँ कहते-कहते अंग्रेजी पर ही उतर जाते थे।

ऐसे में मेरे मन में इस प्रश्न का उठना स्वाभाविक था कि उसकी मातृभाषा क्या मानी जाये? यह प्रश्न परिसर के कमोबेश सभी बच्चों पर लागू होती है। जिन ‘हिन्दीभाषियों’ के परिवार में हिन्दी की पुस्तकें, पत्रिकाएं, और समाचारपत्र तक देखने कोन न मिलें और जहां उक्त सभी चीजें केवल या कमोबेश अंग्रेजी में मिलें उनकी “हिन्दी हमारी मातृभाषा” का दावा कितन स्वीकार्य होगा?

बतौर शिक्षा के माध्यम के अंग्रेजी चलेगी

सरकार ने नई शिक्षा नीति में प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा को बतौर शिक्षा का माध्यम बनाने की बात कही है। लेकिन बताया जा रहा है कि अभिभावकों को अपनी पसंद का माध्यम चुनने की तथाकथित लोकतांत्रिक स्वतंत्रता भी इस शिक्षा नीति में बनी रहेगी। नई शिक्षा नीति में तमाम नये विचार शामिल किए गये हैं ऐसा दावा किया जा रहा है ताकि बच्चों के व्यक्तित्व का समग्र विकास हो सके और शिक्षा उनको बोझ न लगे। किंतु मातृभाषा की अहमियत केवल शिक्षा नीति के ब्योरे तक सीमित रहेगी; हकीकत पुराने ढर्रे पर ही रहेगी। जैसा मैंने ऊपर कहा है ऐसे अनेक परिसर मिलेंगे जिनमें बच्चों की मातृभाषा अंग्रेजी बन चुकी है। वैसे भी माता-पिताओं की मातृभाषा में एकरूपता न होने के कारण इन बच्चों के शिक्षण का माध्यम क्या होवे यह प्रश्न उठेगा ही।

देश की स्वतंत्रता के ७० वर्षों में अंग्रेजी तेजी से आगे बढ़ती गई है। अतः अब उससे छुटकारा पाने की संभावना नहीं के बराबर है। यानी शिक्षा का माध्यम अधिकांश स्तरीय विद्यालयों में अंग्रेजी ही रहेगी। – योगेन्द्र जोशी