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मैं जो हिन्दी लिखता हूं उसे वे समझ नहीं पाते, और जो हिन्दी वह समझते हैं उसे मैं लिखना नहीं चाहता।

मेरी हिन्दी?

कुछएक मास पूर्व मेरे एक मित्र ने मुझसे कहा, “मेरी बेटी एक निजी कंपनी में कार्यरत है। कंपनी अपने कर्मियों के लिए हिन्दी में एक पत्रिका छापती है जिसके संपादन आदि का दायित्व बेटी को सोंपा गया है। मैंने उसे बताया कि आप ब्लॉग लिखा करते हैं और सलाह दी कि पत्रिका के लिए वह आपसे भी लेख लिखने का अनुरोध कर सकती है। अथवा आपके ब्लॉगों पर प्रस्तुत आलेखों में से चुनकर पत्रिका में शामिल करने की अनुमति ले सकती है। आप सहमत होंगे न?”

अपने सहमति जताते हुए मैंने उनसे कहा कि वे मेरे ब्लॉगों के पते अपनी बेटी को भेज दें और यह भी कह दें कि आवश्यकता अनुभव करने पर वह मुझसे सीधे संपर्क कर ले।

बात आई-गई-सी हो गई। एक लंबे अंतराल के बाद मुझे अनायास उक्त घटना का स्मरण हो आया। तब मैंने अपने उन मित्र से पूछा, “आपने एक बार कहा था कि आपकी बेटी अपनी पत्रिका के लिए मुझसे संपर्क कर सकती है। इस विषय पर मुझे उसके बाद कुछ सुनने को नहीं मिला; क्या हुआ? उसने इरादा बदल दिया क्या?”

उनका उत्तर था, “वह आपके आलेखों से संतुष्ट थी। आलेखों की विषयवस्तु, उनकी प्रस्तुति में तारतम्य, लेखन की भाषा-शैली आदि में उसे कोई कमी नजर नहीं आई। बस एक ही समस्या उसके सामने थी। उसके पाठकों की हिन्दी उस स्तर की नहीं थी कि वे आपके आलेख पढ़ सकें और उन्हें समझ सकें। या यों कहें कि उनके लिए आलेखों की भाषा क्लिष्ट थी। इसलिए इस बारे में आगे बढ़ना मेरी ’संपादक’ बेटी के लिए सार्थक नहीं हो पा रहा था।”

अंग्रेजी शब्दों के तुल्य हिन्दी शब्द

गूगल जालस्थल पर “हिन्दीअनुवादक” (hindianuvaadak) नाम से एक समूह है, समूह के सदस्य परस्पर भाषा एवं अनुवाद संबंधी विचारों का आदान-प्रदान करते हैं। इस समूह में लोग भाषा से संबंधित सवाल पूछते हैं, और सदस्यवृंद समाधान प्रदान करते हैं अथवा अपनी-अपनी राय व्यक्त करते हैं। मैं स्वयं अनुवादक नहीं हूं किंतु भाषाओं के बारे में जानने-समझने की उत्सुकता या जिज्ञासा रखता हूं। इसलिए मैं भी इस समूह का सदस्य हूं और समूह में उठाई गई बातों एवं शंकाओं पर यदा-कदा अपना भी मत व्यक्त कर लेता हूं।”

इधर कुछ दिनों से उपर्युक्त समूह में एक शब्द पर बहस चल रही है (या अब समाप्त हो चुकी हो!)। किसी अनुवादक ने पूछा “अंग्रेजी के अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ (adjustable) शब्द के लिए उपयुक्त हिन्दी शब्द क्या होना चाहिए? मेरे अपने मतानुसार समायोज्य अथवा समंजनीय ही सर्वाधिक उपयुक्त शब्द है। वैसे प्रश्नगत शब्द में निहित भाव को शायद अपने-अपने विविध तरीकों से लेखकगण व्यक्त कर सकते होंगे। मेरा भाषायी ज्ञान उस उत्कृष्ट श्रेणी का नहीं है, इसलिए सही विकल्प नहीं पेश कर सकता। उक्त समूह में भांति-भांति के मत मुझे पढ़ने को मिले हैं। मेरी दृष्टि में यह समीचीन होगा कि अपनी टिप्पणी पेश करने से पहले उनकी चर्चा संक्षेप में कर लूं।

समूह के कुछ जानकारों का मत था कि समायोज्य जैसा शब्द अधिकांश पाठकों के लिए सर्वथा अपरिचित होगा, अत: उचित होगा “अनुकूलनीय” या “परिवर्तनीय” को प्रयोग में लेना। अवश्य ही यह भी स्वीकारा जा रहा था कि इनमें वह भाव कदाचित निहित नहीं है जिसे हम इंगित करना चाहते हैं। किसी का कहना था कि “अनुकूलन के योग्य” क्यों न इस्तेमाल किया जाए। मैं समझता हूं कि इस पदबंध का अर्थ तो “अनुकूलनीय” में निहित है ही, अतः इतने लंबे की जरूरत नहीं।

एक मत यह भी व्यक्त किया गया है कि क्यों न मराठी मूल का शब्द “बदलानुकारी” को प्रयोग में लिया जाए। मैं व्यक्तिगत तौर पर इस शब्द से परिचित नहीं हूं। अनुवाद कार्य में लगे लोग हो सकता है इससे सुपरिचित हों, परंतु मुझे शंका है कि मेरी तरह अधिकांश पाठकजन इस शब्द से उसी प्रकार अनभिज्ञ होंगे जैसे मैं हूं।

अ(‌ड्‍)जस्टेब्ल्‍ के लिए “सामंजस्य योग्य” शब्द भी सुझाया गया है। मेरा अनुमान है जो व्यक्ति “सामंजस्य” अर्थ जानता होगा वह समायोज्य या समंजनीय का भी अर्थ जानता होगा। अन्यथा भी वह इनके अर्थों का अनुमान लगा सकेगा ऐसा मेरा सोचना है।

दो विचार जो संबंधित बहस में पढ़ने को मिले और जिन्हें मैंने रोचक पाया वे हैं (1) “समायोज्य जैसे शब्द हिंदी माध्यम के विद्यार्थियों के लिए भी एक सरदर्द ही हैं।”  और (2)  “समायोज्य जैसे दुरुह शब्दों का इस्तेमाल करें तो उनके बाद ब्रेकेट में उनका मतलब भी लिख दें।” मतलब समझाया तो जाए लेकिन किस भाषा में और कितने विस्तार से जैसा शब्दकोषों में होता है?

और यह मत भी पढ़ने को मिला कि आजकल लोग अ(ड्‍)जस्ट (adjust) बखूबी समझने लगे हैं। तो क्या इसे ही प्रयोग में ले लिया जाए? शायद हां!

एक वाकया

मुद्दे पर कुछ और कहूं इससे पहले एक वाकये का जिक्र करता हूं। वस्तुस्थिति को स्पष्ट करने में दृष्टांत अक्सर उपयोगी सिद्ध होते हैं। जब मैं विश्वविद्यालय में भौतिकी (फिज़िक्स) विषय पढ़ाता था तो “इलेक्ट्रॉनिकी” में विशेषज्ञता अर्जित कर रहे एम.एससी. (स्नातकोत्तर) के छात्र “क्वांटम यांत्रिकी” (क्वांटम मिकैनिक्स) में रुचि नहीं लेते थे। उनकी अरुचि के बारे में पूछे जाने पर उनका उत्तर होता था, “सर, इलेक्ट्रॉनिक्स स्पेशलाइज़ेशन लेकर जब हम टेक्निकल नौकरी में जायेंगे तो ये क्वांटन मिकैनिक्स हमारी क्या काम आएगी?” तब मेरे पास कोई संतोषप्रद उत्तर नहीं होता था। मैं जानता था तकनीकी पेशे में इस विषय का ज्ञान शायद ही प्रोन्नति (प्रमोशन) पाने या वेतन बढ़ोत्तरी में मददगार हो सकता है। तो वे क्यों क्वांटम भौतिकी/मिकैनिक्स पढ़ें?

घटता शब्द-भंडार 

दरअसल इस प्रकार का उपयोगिता संबंधी प्रश्न अनेक मौकों पर पूछा जा सकता है। मैंने ” समायोज्य ” से जुड़े जिस बहस का जिक्र किया है उससे भी इस सवाल का नाता है। यह कहना कि हिन्दी माध्यम के छात्रों के लिए तक यह शब्द दुरूह है यह दर्शाता है कि उन छात्रों – जो भी वे हों – ने कभी नये-नये शब्द सीखने का प्रयास नहीं होगा, फलतः इस शब्द से उनका सामना कभी पड़ा नहीं होगा और सहज-स्वाभाविक तरीके से यह उनके शब्द-भंडार में शामिल नहीं हो सका होगा। उन्होंने हर किसी के मुख से इस शब्द के बदले अ(ड्‍)जस्ट और उससे व्युत्पन्न शब्दों का ही प्रयोग सुना होगा। परिणाम – समायोज्य अपरिचित शब्द बन गया, अ(ड्‍)जस्टेब्ल्‍ परिचित।

यहां यह प्रश्न उठता है कि स्वयं को “हिन्दीभाषी” कहने वाले अपना हिन्दी शब्द-भंडार क्यों नहीं बढ़ाते? उत्तर साफ है। मेरे भौतिकी छात्रों की तरह आम हिन्दीभाषी कहेगा, “हिन्दी के शब्दों को सीखने से क्या मिलेगा? उसके बदले अंग्रेजी सीखने पर मेहनत करेंगे तो हमें फायदा होगा। हमारा काम तो चल ही जाता है। जहां जरूरत हो अंग्रेजी शब्दों से ही काम चल जाता है। फिर हिन्दी सीखने की जरूरत कहां?”

याद रहे कोई भी व्यक्ति शब्द-भंडार लेकर पैदा नहीं होता है। वह विभिन्न मौकों पर और पत्र-पत्रिकाओं-पुस्तकों के विभिन्न स्रोतों से शब्द सीखता है। और यदि स्रोत विकृत हो जाएं, किसी का शब्दभंडार बढ़ाने में मददगार न रह जाएं, या व्यक्ति इन स्रोतों में रुचि ही न ले, तो परिणाम यही होगा: समायोज्य जैसे शब्द अपरिचित लगेंगे। हिन्दी उसी दिशा में बढ़ रही है।

हिन्दी – उनकी बनाम मेरी

मैं इसे हिन्दी की अवनति कहूं या उन्नति कि आज के अनेक पढ़े-लिखे लोग उस हिन्दी को पढ़-समझ नहीं सकते जो मैंने अपने छात्र जीवन में पढ़ी है, जिस हिन्दी में भारतेन्दु के नाटक लिखे गये हैं, जिसमें जयशंकर प्रसाद का पद्य साहित्य है, जिसमें रामचन्द्र शुक्ल के लेख हैं, इत्यादि। आज के लोग कैसी हिन्दी बोल रहे हैं, पढ़ रहे हैं, और लिख रहे हैं इसकी बानगी यह है:

 “नेशनल महिला प्लेयर की आपत्तिजनक फोटो एफबी पर वायरल, ट्रेनर गिरफ्तार” (jagran.com, 19/05/2017)

इसे मैं हिन्दी कहूं या कुछ और समझ में नहीं आता है। अवश्य ही यह वह भाषा नहीं जिससे मैं बचपन से परिचित रहा हूं। जब हम ऐसी नयी हिन्दी बोलेंगे और सुनेंगे तो हिन्दी के कई शब्द “अन्फ़ैमिलिअर” हो ही जायेंगे।

मेरी कमजोरी है कि मैं ऐसी हिन्दी न लिखता हूं और न लिखना ही चाहता हूं, भले ही इसे लिखना संभव हो और मुझसे अपेक्षित हो। – योगेन्द्र जोशी