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दिव्यांग

आपने पहले कभी –  यों कहें कि दो-तीन साल पह्ले तक – दिव्यांग शब्द सुना था? शायद नहीं सुना होगा। हो सकता है आपकी जानकारी में किसी व्यक्ति का नाम दिव्यांग हो। मैंने भी कुछ समय पहले तक इसे नहीं सुना था । संस्कृत के अपने न्यूनाधिक ज्ञान के कारण इस शब्द को अपरिचित नहीं कहूंगा। परन्तु जिस अर्थ में यह अब प्रचलन में आ गया है वह मेरे लिए नया है। नये अर्थ में इस शब्द से मेरा परिचय दो-ढाई साल पहले हुआ जब देश के प्रधानमंत्री मोदी जी का वाराणसी आगमन हुआ।

दरअसल 2014 की जनवरी माह की 22 तारीख को प्रधानमंत्री मोदी जी हमारे शहर वाराणसी (उनका संसदीय क्षेत्र) आए थे । यहां उन्होंने शारीरिक अथवा मानसिक रूप से असामान्य (अलौकिक नहीं) सामर्थ्य वाले लोगों के बीच उपयोगी उपकरणों/साधनों का वितरण किया। उसी सिलसिले में उन्होंने संबंधित व्यक्तियों के लिए दिव्यांग शब्द का प्रयोग किया। पहले ऐसे व्यक्तियों के लिए विकलांग शब्द का प्रयोग किया जाता था। किंतु मोदीजी द्वारा सुझाये इस नये शब्द को समाचार माध्यमों ने सोत्साह स्वीकार कर लिया।  आरंभ में मैंने देखा कि दिव्यांग के साथ-साथ विकलांग शब्द का प्रयोग भी समान रूप से हो रहा था, पर अब तो यही शब्द प्रचलन में आ गया है ऐसा लगता है। सरकारी दस्तावेजों में शायद यही मानक बन चुका है। मेरा अनुमान है कि शिक्षा और नौकरी-पेशे से जुड़ी संस्थाओं ने अब तक अपने फ़ॉर्मों में वांछित बदलाव कर लिया होगा।

अंगरेजी का हैंडिकैप्ड अर्थात् विकलांग

कोई व्यक्ति शारीरिक एवं मानसिक तौर पर सामान्य न होकर न्यूनाधिक अक्षम है इस बात को दर्शाने के लिए अंगरेजी में हैंडिकैप्ड (handicapped) शब्द प्रयोग में लिया जाता है। यह शब्द कब और कैसे व्यवहार में आया इस बाबत अंतर्जाल पर विविध स्रोतों से जानकारी उपलब्ध हो सकती है, उदाहरणार्थ snopes.com पर। यह शब्द प्रथमतः खेलों के संदर्भ में प्रयुक्त हुआ था। समय के साथ इसने नये अर्थ ग्रहण किए और आज यह शारीरिक/मानसिक लाभहीनता (disadvantage) की स्थिति के द्योतक के तौर पर प्रयुक्त होता है। कुछ लोग इसके लिए अंगरेजी में physically/mentally disabled शब्द प्रयोग में लेना पसंद करते हैं। अन्य़ लोग differently able का प्रयोग अधिक उचित समझते हैं।

हैंडीकैप्ड शब्द वस्तुस्थिति का समुचित द्योतक है और अभी तक प्रयोग में लिया जाता रहा है, फिर भी आजकल कईयों को यह अपमानजनक या अप्रिय लगने लगा है। तदनुसार अंगरेजी में वैकल्पिक शब्द व्यवहार में लिए जाने लगे हैं। मोदीजी की नजर में ठीक उसी तरह विकलांग शब्द अनुचित लगने लगा होगा, जिसके कारण उन्होंने नये शब्द “दिव्यांग” का प्रयोग अपने वाराणसी संबोधन में किया था। उनको लगता होगा कि हैंडीकैप्ड को दिव्यांग कहना सम्मान-द्योतक है। समाचार-पत्रों ने मोदी जी के इस भाषायी योगदान की जानकारी आम जन को दी, किसी ने निष्पक्ष भाव से तो किसी ने आपत्ति उठाते हुए। (उदाहरण के तौर पर देखें इकनॉमिक_टाइम्ज़ और द_न्यूज़_माइन्यूट।)

मैं नहीं जानता कि यह नया शब्द दिव्यांग उनके अपने दिमाग की उपज है या भाषाविदों ने उनको इसके प्रयोग की सलाह दी थी। अगर शब्दरचना उनकी अपनी है तो क्या किसी भाषाविद्‍ ने किसी प्रकार की आपत्ति नहीं की होगी? और यदि भाषाविदों ने ही इसे सुझाया हो तो ऐसा क्या सोच के किया होगा?

अनुपयुक्त शब्द दिव्यांग

मुझे इस पर संदेह नहीं कि यह शब्द सुन्दर, कर्णप्रिय और सम्मान-द्योतक है, परंतु जिस मुद्दे की बात की जा रही है उसके संदर्भ में अर्थपूर्ण नहीं लगता है। इससे वह अर्थ नहीं ध्वनित होते हैं जो शारीरिक अक्षमता को दर्शाता हो। मैं क्यों इस शब्द पर आपत्ति उठा रहा हूं इसे समझने के लिए संस्कृत के “दिव्” क्रियाधातु एवं “दिव्य” शब्द पर गौर करना होगा।  यहां पर मैं संस्कृत के शिव वामन आप्टे द्वारा रचित सुविख्यात संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश के पृष्ठ 446-7 एवं हिन्दी के एक शब्दकोश के पृष्ठ 521 की प्रतियां प्रस्तुत कर रहा हूं।

ध्यान दें कि दिव् क्रियाधातु कई अर्थों में प्रयुक्त होती है, किंतु इससे व्युत्पन्न विशेषण दिव्य में इसका अर्थ स्पष्टतः चमकना या उज्ज्वल होना है। तदनुसार इस विशेषण शब्द के अर्थ हैं दैवी, स्वर्गीय, अलौकिक, उज्ज्वल, मनोहर, सुन्दर इत्यादि। कुल मिलाकर दिव्य उस विशिष्ठता को व्यक्त करता है जिसकी केवल कामना की जा सकती है, ऐसी विशिष्ठता जो देवताओं को उपलब्ध है, और जो सामान्यतः मनुष्य के लिए अप्राप्य है।  यह उस दोष का संकेतक नहीं हो सकता है जिससे मनुष्य मुक्त रहना चाहेगा, परंतु जिसका सामना उसे दुर्भाग्य से करना पड़ सकता है। गौर करें कि हिन्दी के शब्दकोश में भी कमोबेश यही बातें उल्लिखित हैं।

अपनी बात आगे बढ़ाऊं इससे पहले यह उल्लेख कर दूं कि दिव्यचक्षु शब्द अंधता से ग्रस्त (अंधे) व्यक्ति के लिए अवश्य इस्तेमाल होता है। परंतु ऐसा करने के खास कारण हैं ऐसा मेरा मानना है। इस तथ्य से सभी परिचित होंगे कि अंधे व्यक्तियों की अन्य ज्ञानेन्द्रियां सामान्य व्यक्ति की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं। कभी-कभी उनकी विशिष्ठ क्षमता को इंगित करने हेतु हम कहते हैं कि उनके पास छठी इंद्रिय है। मैंने उनके लिए प्रज्ञाचक्षु का प्रयोग भी सुना है।

परंतु अन्य प्रकार के शारीरिक/मानसिक दोषों से ग्रस्त जनों के मामले में उक्त प्रकार की बात लागू नहीं होती।

गंभीरता से सोचने पर यही निष्कर्ष निकाला जायेगा कि दिव्यांग उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त होना चाहिए जिसका अंग अलौकिक हो, दैवी प्रकार का हो, जिसे पाने की कामना हर कोई करना चाहेगा। उक्त अर्थ के मद्देनजर दिव्यांग किसी का नाम रखा जा सकता है। दिव्यांगना तो अप्सरा के लिए प्रयुक्त भी होता है, और सभी जानते हैं कि अप्सराओं के सौन्दर्य की हम कैसी कल्पना करते हैं।

विकलांग के बदले दिव्यांग का प्रयोग सम्मानसूचक है महज इस कारण से उसके असली अर्थ को भुला देना चाहिए क्या? असल में विकलांग अंगरेजी के physically/mentally disabled का करीब-करीब समानार्थी है। जैसा पहले कहा गया है अंगरेजी में differently able भी प्रयुक्त होता है। उसी की तर्ज पर “भिन्नतः सक्षम” या उसी प्रकार के अन्य शब्द का प्रयोग किया जा सकता है। किंतु दिव्यांग का प्रयोग उसके अर्थ का अनर्थ करना ही समझा जायेगा।

मोदी जी का भाषायी योगदान

मोदी जी देश के 14वें प्रधानमंत्री हैं। उनकी कार्यशैली अपने पूर्ववर्ती 13 प्रधानमंत्रियों की तुलना में काफी भिन्न है। वे कई मानों में “फ़र्स्ट” होंगे। उनमें से एक है उनका भाषायी योगदान करना। नये-नये नारे गढ़ना, नये संयुक्ताक्षर सुझाना, पदबंधों की अपने तरीके से पुनर्व्याख्या करना, आदि उनकी खासियत है। मैं नहीं समझता कि किसी और प्र,मं. ने ऐसी महारत पायी हो या ऐसा करने का विचार उन्हें सूझा भी हो। इस दिशा में उनके “योगदान” का संक्षिप्त उल्लेख यहां पर करना समीचीन होगा:

(1) दिव्यांग तथा ब्रेन गेन – उपर्युक्त दिव्यांग शब्द के अतिरिक्त कितने और शब्दों का योगदान उन्होंने किया मुझे नही मालूम। मुझे वनइंडिया समाचार माध्यम पर उनके द्वारा दिया गया पद-बंध “ब्रेन गेन” (Brain Gain) देखने को मिला जो “ब्रेन ड्रेन” (Brain Drain) के ठीक उलट अर्थ वाली प्रक्रिया को दर्शाने के लिए सुझाया। अर्थात्‍ बौद्धिक कौशल वालों का विदेश गमन न हो, विपरीत उसके वे देश में ही टिकें और बाहर से लौट आवें। यह शब्द अर्थ तो रखता है, किंतु किसी ने कभी प्रयोग में लिया हो ऐसा लगता नहीं।

(2) नये नारे – मोदी जी ने नये-नये नारे गढ़ने में भी अपना कौशल दिखाया है। कुछ दृष्टांत ये हैं:

Make in India,  Skill India,  Digital India,  Start up India  

मोदी जी ने जब अपने पद की शपथ ली तो राजभाषा हिन्दी का प्रयोग बढ़े उत्साह से किया। यहां तक कि कई विदेशी मेहमानों के साथ दुभाषिये के माध्यम से वार्तालाप किया था। विदेशों में भी प्रायः हिन्दी में बोले। कालान्तर में उनका उत्साह ठंडा पड़ गया। उनका सुप्त अंगरेजी प्रेम अब जग चुका है। उनके नारे अब अंगरेजी में ही अधिक सुनने को मिलते हैं।

(3) नये सूत्र – मोदी जी ने राजनैतिक-सामाजिक व्यवस्था के संदर्भ में भी कुछ सूत्र सुझाए हैं, जैसे

Desire +Stability = Resolution

Resolution + Hard Work = Success

Indian Talent + Information Technology = India Tomorrow

जिसे संक्षेप में वे IT+IT=IT लिखते हैं।

(4) पदबंधों का संक्षिप्तीकरण – योजनाओं में निवेश के संदर्भ में PPP (Private, Public Partnership) को मोदी जी ने PPPP (People, Private, Public Partnership) में बदलकर आम आदमी के निवेश के समावेशन तक पहुंचा दिया। इसी प्रकार 3Ss (तीन S) = Skill, Scale, Speed अथवा Samaveshak, Sarvadeshak, Sarvasparshi की परिभाषा दे डाली। इसी प्रकार Pro People Good Governance के लिए संक्षेप P2G2 और Economy, Environment, Energy, Empathy and Equity के लिए  5Es (पांच E) भी उन्हीं के सुझाए हैं। ऐसे ही अन्य संक्षिप्ताक्षर भी मीडिया में खोजे जा सक्ते हैं। इन सबके अर्थों को मोदी जी ही ठीक-से समझते होंगे।

मोदी जी के ऐसे तमाम प्रयास लोगों को लुभा सकते हैं, मिथ्या दिलाशा दे सकते हैं, अथवा महज प्रमुदित कर सकते हैं। किंतु इनसे कोई जमीनी कार्य भी सिद्ध हो सकता है इसमें मुझे संदेह है।

जिस “दिव्यांग” शब्द से मैंने अपनी बातें प्रस्तुत की है वह प्रसंगोचित नहीं है यह में लेख-समापन पर दुबारा कहना चाहूंगा। योगेन्द्र जोशी

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लिवे देवते टीवी तस्वीर

श्रीमतीजी टेलीविजन पर कार्यक्रम देख रही थीं, और मैं कमरे के एक कोने में कुर्सी पर बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था । अचानक उन्होंने ने आवाज दी, “अरे भई, ये ‘लिवे देबते’” क्या होता है ?

“‘लिवे देबते’ ? देखूं, कहां लिखा है ?” कहते हुए मैं उनकी ओर मुखातिब हुआ । उन्होंने टीवी की ओर इशारा किया । मैंने उस ओर नजर घुमाई तो पता चला कि वे समाचार चैनलों पर कूदते-फांदते ‘एबीपी न्यूज’ पर आ टिकी हैं । पर्दें पर चैनल नं., समय, कार्यक्रम, आदि की जानकारी अंकित थी । चैनल बदलने पर इस प्रकार की जानकारी हिंदी में हमारे टीवी के पर्दे पर 2-4 सेकंड के लिए सदैव प्रकट होती है । उस विशेष मौके पर, राजनेता, पत्रकार तथा विशेषज्ञों के 5-6 जनों के जमावड़े के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस चल रही थी ।

मैंने पाया कि टीवी पर्दें पर उपलब्ध जानकारी में वास्तव में ‘लिवे देबते’ भी शामिल था । उसे देख एकबारगी मेरा भी माथा चकराया । इस ‘लिवे देबते’ का मतलब क्या हो सकता है ? अपने दिमाग का घोड़ा सरपट दौड़ाते हुए मैं उसकी खोज में मन ही मन निकल पड़ा । मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि यह तो हिंदी के कोई शब्द लगते नहीं । स्वयं से सवाल किया कि ये कहीं किसी अन्य भाषा के शब्द तो नहीं जो अंगरेजी के रास्ते यहां पहुंचे हों ! रोमन में ये कैसे लिखे जाएंगे यह जिज्ञासा भी मन में उठी और मुझे तुरंत बुद्धत्व प्राप्त हो गया । समझ गया कि यह तो ‘LIVE DEBATE’ है जो उस कार्यक्रम का सार्थक शीर्षक था । वाह! वाह रे चैनल वालो, कार्यक्रम को हिंदी में ‘जीवंत बहस’ या इसी प्रकार के शब्दों में लिख सकते थे । अथवा इसे ‘लाइव डिबेट’ लिख देते । न जाने किस मशीनी ‘ट्रांसलिटरेशन’ (Transliteration) प्रणाली का उन्होंने प्रयोग किया कि यह ‘लिवे देबते’ बन गया । ध्यान दें कि रोमन अक्षरों के लिए L = ल, I = ई, V = व, E = ए, D = द, B = ब, A = अ, T = त, का ध्वन्यात्मक संबंध स्वीकारने पर उक्त लिप्यांतरण मिल जाता है । परंतु अंगरेजी में रोमन अक्षरों की घ्वनियां इतनी सुनिश्चित नहीं होतीं यह संबंधित लोग भूल गये ।

और जब दूसरे दिन फिर चैनल को हम देखने बैठे तो देखा कि गलती दूर हो चुकी है ।  पर्दे पर ‘लाइव डिबेट’ अंकित नजर आरहा था।

इस घटना ने इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान खींचा कि हमारे देश में सर्वत्र अंगरेजी छाई हुई है और हिंदी माध्यमों पर परोसी जाने वाला ज्ञान अंगरेजी में उपलब्ध जानकारी के अनुवाद/लिप्यांतरण पर आधारित होता है; अथवा तत्संबंधित उच्चारण को देवनागरी में प्रस्तुत किया जाता है । इस प्रक्रिया में कभी-कभी हास्यास्पद प्रस्तुति भी पेश हो जाती है, क्योंकि अनुवाद करने वाला शब्दों से संबंधित ध्वनियों से सदैव वाकिफ नहीं होता और शायद उसे किसी स्रोत से जानने की कोशिश भी नहीं करता । दो-एक उदाहरणों पर गौर करें:

(1) समाचारपत्र हिन्दुस्तान में मुझे जर्मनी की समाचार/रेडियो/टीवी संस्था का कभी-कभार उल्लेख देखने को मिल जाता है । लिखा रहता है ‘डाइचे विले’ (Deutsche Welle), जब कि होना चाहिए था ‘डॉइच वेलऽ’ – निकटतम उच्चारण । ऐसा क्यों है ? इसका कारण मेरी समझ में इस तथ्य को नजरअंदाज करना है कि अधिकांश यूरोपीय भाषाओं की लिपि मूलतः रोमन है, जिसे लैटिन भी कहते हैं । आवश्यकतानुसार कहीं-कहीं विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग भी होता है । किंतु हर भाषा के उच्चारण के नियम अलग-अलग हैं जो बहुधा अंगरेजी से पर्याप्त भिन्न रहते हैं । उच्चारण की द्ष्टि से फ्रांसीसी एवं तत्पश्चात् अंगरेजी घटिया मानी जाती हैं । जर्मन भाषा के नियम अधिक साफ-सुथरे हैं । कुछ भी हो, किसी व्यक्ति, संस्था अथवा शहर आदि विदेशी नामों का संबंधित भाषा के बोलने वालों के उच्चारण से भिन्न नहीं होना चाहिए । वह नाम उस भाषा में भी रोमन में ही लिखा जाता है तो क्या उसे हम अंगरेजी के हिसाब से बोलें, क्योंकि हम केवल अंगरेजी से सुपरिचित हैं ? जर्मन में ‘आल्बर्त आइंस्ताइन’ बोला जाता है न कि ‘ऐल्बर्ट आइंस्टीन’ । किसे सही माना जाए ? इन बातों की जानकारी मुझे तब हुई जब एम.एससी. पाठ्यक्रम के दौरान मुझे एक आस्ट्रियाई सज्जन से प्राथमिक जर्मन पढ़ने का मौका मिला । (आस्ट्रिया की भाषा भी जर्मन है ।)

(2) मैं जब एम.एससी. में पढ़ता था तो हमें आरंभ के कुछ समय तक रज्जू भैया जी (जो कालांतर में आर.एस.एस. प्रमुख बने थे) ने भी पढ़ाया था । हम लोग फ्रांसीसी वैज्ञानिक Langevin को ‘लांजेविन’ कहते थे । उन्होंने ही हमें बताया कि यह फ्रांसीसी नाम असल में ‘लाजवां’ बोला जाता है । इसी प्रकार यह भी जाना कि वैज्ञानिक Fermat का नाम फर्मा है न कि ‘फर्मैट’

(3) ब्रिटेन का एक शहर है Leicester जहां अनेक भारतीय बसे हैं । मैं उसे ‘लाइसेस्टर’ कहता था । इंग्लैंड पहुंचने पर पता चला कि वह ‘लेस्टर’ है ।

(4) दो-तीन रोज पहले अखबार में अमेरिका के Yosemite राट्रीय उद्यान (कैलिफोर्निया) के बारे में खबर थी । उसमें इस स्थल को ‘योसेमाइट’ कहा गया था । बहुत अंतर तो नहीं, फिर भी यह ‘योसेमिती’ कहा जाता है, जो स्पेनी भाषा पर आधारित है जिसका प्रचलन आारंभ से ही उस क्षेत्र में काफी रहा है । वहां पहुचने पर मुझे पता चला कि जिस शहर को मैं ‘सैन जोस’ (San Jose) समझता था वह दरअसल ‘सान होजे’ कहलाता है ।

किसी भाषा का विस्तृत ज्ञान कदाचित् किसी को नहीं होता है । किंतु जो लोग पत्रकारिता जैसे व्यवसाय में लगे हों उन्हें सही-सही वर्तनी एवं उच्चारण जानने की उत्कंठा होनी ही चाहिए । आज के युग में शब्दकोश तथा इंटरनेट काफी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं । – योगेन्द्र जोशी

अपने देश के महानगरों में एक ऐसी भाषा जन्म ले चुकी है जो न हिंदी है और न ही अंगरेजी । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । इसे लेकर अपने ब्लॉग की पिछली तीन प्रविष्टियों में मैंने कुछ विचार व्यक्त किए हैं (तारीख 22 जून3 जुलाई, तथा 23 जुलाई) ।

मेरी नजर में मेट्रोहिंदी के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है । इसका प्रभाव क्षेत्र इतना बढ़ चुका है कि इसे भाषावेत्ताओं एवं शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन के योग्य विषय के तौर पर चुना जाना चाहिए । इसकी कुछएक विशिष्टताओं का संक्षिप्त उल्लेख मैंने पिछले आलेख में किया था । उन्हीं की चर्चा किंचित् विस्तार से मैं यहां कर रहा हूं ।

(1) पारंपरिक हिंदी के वे शब्द, जिन्हें हिंदीभाषी सदियों से बोलचाल में प्रयोग में लेते आए हैं, इस नई भाषा, मेट्रोहिंदी, से विलुप्त होते जा रहे हैं । इनकी सूची निम्न प्रकार से दी जा सकती हैः

1 – गिनती के शब्दः वन् (एक), टू (दो), थ्री (तीन) …
2 – साप्ताहिक दिनों के नामः मंडे (सोमवार), ट्यूज्डे (मंगलवार) …
3- रंगों के नामः रेड (लाल), येलो (पीला), ब्लैक (काला) …
4 – शरीर के अंग एवं रोग-लक्षणों के नामः किडनी (वृक्क – कम ही लोग जानते होंगे!), लिवर (यकृत्), हार्ट-अटैक (हृदयाघात), थ्रोट-इंफेक्शन (गले का संक्रमण), ब्लड-टेस्ट (खून की जांच) ….
5 – ‘प्रगतिशील’ अभिभावकों द्वारा बच्चों को रटाए जा रहे अनेकों शब्दः डॉगी (कुत्ता), टाइगर (बाघ), हॉर्स (घोड़ा), फिश् (मछली), कॉक्रोच (तिलचट्टा – कितने बच्चे जानते होंगे?) …
6 – साग-सब्जी के नाम जो बच्चे सीख रहे हैंः बनाना (केला), ऐपल् (सेब), ऑरेंज (संतरा), टोमेटो (टमाटर), पोटैटो (आलू), …
7 – पारिवारिक रिश्तों के नामः मम्मी/पापा (माता/पिता) तो प्रायः हर हिंदीभाषी के जुबान पर बस चुके हैं (बुजुर्ग अपवाद होंगे!!) । अब कई लोग मॉम/डैड/डैडी पर भी उतर चुके हैं । इसके अलावा हजबैंड/वाइफ (पत्नी/पति), मदर-इन-लॉ/फादर-इन-लॉ (सास/ससुर), ग्रैंडमा/ग्रैंडपा (दादी/दादा), आदि रिश्तों के संकेत के तौर पर इस्तेमाल होते हैं ।

इसी प्रकार कई अन्य क्षेत्रों में भी हिंदी के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग हो रहा है ।

(2) मेट्रोहिंदी में उन अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं किया जाता है जो अंगरेजी का सामान्य ज्ञान रखने वाले को तक समझ में न आते हों; अंगरेजी न जानने वाले सामान्य हिंदीभाषी के लिए तो ‘काला अक्षर भेंस बराबर’ की ही स्थिति रहती है । लेकिन इस तथ्य की परवाह किसी वक्ता को नहीं रहती है । ऐसे शब्दों/ पदबंधों की सूची काफी लंबी होगी । इन उदाहरणों पर नजर डालें:

(3) औपचारिक बातचीत के अनेकों शब्द/पदबंध, यथा ‘थैंक् यू’ (धन्यवाद), एक्सक्यूज मी (माफ करें), वेरी गुड (शाबास), कांग्रैच्युलेशन्स (बधाई), हैप्पी बर्थडे (जन्मदिन मुबारक) …

(4) मेट्रोहिंदी में व्याकरणीय ढांचा मूलतः हिंदी का ही है, किंतु उस पर अंगरेजी के व्याकरण का असर साफ नजर आ जाता है । व्याकरण संबंधी विकृति कई रूपों में दिखाई देती है । प्रमुखतया अधोलिखित बिंदु ध्यान आकर्षित करते हैं:

1- अंगरेजी से लिए गये कई संज्ञाशब्दों के बहुवचन बहुधा अंगरेजी के नियमों के अनुसार चुने जाते हैं, न कि हिंदी के व्याकरण के अनुसार, जैसे फ्रेंड्स (न कि फ्रेंडों), ऑफिसेज्, यूनिवर्सिटीज्, …
2- हिंदी के कुछ संयोजक शब्द अंगरेजी के तुल्य शब्दों से विस्थापित होने लगे हैं । इनमें एंड (और) एवं बट् (लेकिन) मुख्य हैं ।
3- मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के विशेाणों/क्रियाविशेषणों का प्रयोग सामान्य हो चला है, जैसे ऑलरेडी (पहले ही), इन् फैक्ट (दरअसल), इक्जैक्ट्ली (ठीक, सही-सही), परफेक्ट्ली (परिपूर्णतः), …
4- गनीमत यह है कि हिंदी के सर्वनामों को अभी छेड़ा नहीं गया है । मैंने किसी के मुख इस प्रकार के वाक्य नहीं सुने हैं:
“माई स्कूल में स्पोर्ट्स कल होंगे ।”; “ही (वह) कॉलेज गया है ।” आदि ।

(5) महानगरीय हिंदी में अंगरेजी शब्दों के साथ ‘होना’, ‘करना’, ‘सकना’ जैसे सहायक क्रियाओं के प्रयोग के साथ उपयुक्त क्रियापदों की रचना आम बात हो चुकी है । दृष्टांत प्रस्तुत हैं:
कॉल किया था (बुलाया था), इरेज् कर दिया (मिटा दिया), स्पाइसेज् ऐड् करो (मसाले डालो), अटेंडेंस ले लो (उपस्थिति दर्ज करो), मॉर्निंग वाक् करिए (सुबह टहलिए), इत्यादि ।

(6) बात इतने पर समाप्त नहीं होती है । बताया जा चुका है कि मेट्रोहिंदी अभी लिखित पाठों में जगह नहीं पा सकी है । भले ही शहरी लोग इसे आम बोलचाल एवं टीवी-बहसों में बेझिझक इस्तेमाल करते हों, उनका लेखन-कार्य लगभग शुद्ध हिंदी/हिंदुस्तानी में ही हो रहा है । फिर भी टीवी एवं पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापनों/सूचनाओं में इसका खूब प्रयोग हो रहा है । जहां कहीं मेट्रोहिंदी में थोड़ा-बहुत लेखन हो रहा है, वहां देवनागरी के साथ-साथ लैटिन लिपि भी इस्तेमाल हो रही है । मतलब यह है कि मेट्रोहिंदी हिंदी के वर्णों एवं लैटिन के अल्फावेट को मिलाकर प्राप्त लिपि को स्वीकार करने लगी है । मात्र देवनागरी इस मिश्रभाषा के लिए अपर्याप्त समझी जाएगी । आपको ऐसे नारे/कथन/विज्ञापन देखने को मिल जाएंगे:

(7) और अंत में सबसे अधिक अहम बात यह है कि इस भाषा का प्रयोक्ता देश को भूलवश भी ‘भारत’ नहीं कहता; अपनी बात कहने में वह ‘इंडिया’ का ही नाम लेता है । आने वाले समय में इस भाषा के माहौल में पल रहे बच्चे यदि भारत का मतलब पूछने लगें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा ।

अगली बार हिंदी के भविष्य पर अपनी राय । – योगेन्द्र जोशी

मेट्रोहिंदी

इस चिट्ठे की पिछली पोस्ट (22 जून) में हिंदी-अंगरेजी की एक मिश्रित भाषा की चर्चा आंरभ की गई है, जिसे मैं मेट्रोहिंदी कहता हूं । यह हमारे महानगरों में निरंतर विस्तार एवं लोकप्रियता पा रही भाषा है, जिसमें अंगरेजी के मिश्रण की मर्यादा क्या हो इस सवाल का कोई महत्त्व ही नहीं है । हिंदी में अंगरेजी का मिश्रण वक्ता की सुविधा और उसके हिंदी-अंगरेजी ज्ञान पर निर्भर करता है । इस वर्णसंकर भाषा को मैं नितांत नूतन भाषा के रूप में देखता हूं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी से मिलती-जुलती होने के बावजूद उर्दू अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है । कौन हैं जो मेट्रोहिंदी उपयोग में ले रहे हैं इसका उत्तर देने से पहले किस तरह के बोल हमें टेलीविजन चैनलों या अन्य अनेक मंचों पर अक्सर सुनने को मिलते हैं इनके दृष्टांत प्रस्तुत करता हूं:

(1) चिड़ियाघर में मां बेटे सेः “ये टाइगर नहीं, लेपर्ड है । डौन्च्यू रेमेंबर कि टाइगर के डार्क स्ट्राइप्स होती हैं, न कि डार्क स्पॉट्स ।”
(2) दो पर्यटकों के बीच संवादः “एक्सक्यूज मी, इस कैमरे से मेरा स्नैपशॉट ले देंगे?” … “या, श्युअर ।” … “थैंक्यू इंडीड ।”
(3) टीवी विज्ञापनः “… ये क्रीम रखे आपकी स्किन सॉफ्ट, स्मूथ, और फेअर ।”
(4) सिने-अभिनेताः “फिल्म में परफॉर्म करना चैलेंजिंग एंड एंजॉयेबल् टास्क था । मुझे एक रेबेलियन का रोल प्ले करना था जो … ।”
(5) नृत्य प्रतिस्पर्धा निर्णायकः “एक्सेलेंट परफॉर्मेन्स! आप दोनों के डांस मूवमेंट्स का सिंक्रोनाइजेशन काबिलेतारीफ था ।”
(6) ओलंपिक टीम प्रबंधकः “… इंडिया की परफॉर्मेन्स अच्छी रहेगी । वेटलिफ्टिंग, रैसलिंग, एंड बॉक्सिंग में हमारे प्लेयर्स जरूर मेडल जीतेंगे ।”
(7) समाचार वाचकः “… पीएम ने कहा कि हम अपने नेबरिंग कंट्रीज के साथ कॉर्डियल रिलेशन्स चाहते हैं । इसके लिए डिप्लोमैटिक लेवल पर जरूरी स्टेप्स लिए जा रहे हैं ।”
(8) टीवी समाचारः “… हाइवे पर पिल्ग्रिम्स से भरी बस का सीरियस एक्सिडेंट हो गया है । पंद्रह पैसें जर्स के डेथ की ऑफिशियल रिपोर्ट मिली है । सीरियस्ली इंज्यर्ड को पास के हॉस्पिटल्स में एड्मिट कराया गया है; शेष को फर्स्ट एड के बाद छोड़ दिया गया है ।”

मेट्रोहिंदीः अंगरेजी मोह से जन्मी भाषा

मेट्रोहिंदी ऐसी भाषा है जिसे आम हिंदीभाषी नहीं समझ सकता है, क्योंकि इसमें अंगरेजी के तमाम ऐसे शब्द शामिल रहते हैं जिनका ज्ञान उसे हो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है । उसकी बातें आम हिंदीभाषी समझ भी पा रहा है या नहीं इस बात से मेट्रोहिंदी बोलने वाले को कोई सरोकार नहीं रहता है । उसके अपने वर्ग के लोग बातें समझ ले रहे होंगे यही पर्याप्त माना जाता है ।

वास्तव में यह उन लोगों की भाषा है जिन्हें प्राथमिक दर्जे की हिंदी आती है और जिनका अंगरेजी ज्ञान हिंदी की तुलना में बेहतर होता है । अपनी हिंदी को अधिक समृद्ध करने का विचार उन लोगों के मन में उपजता ही नहीं । हिंदी का उनकी शब्दसंग्रह या तो अपर्याप्त होती है या अभ्यास के अभाव के कारण उसके मुख से सही मौके पर सही शब्द निकल ही नहीं पाते हैं । इसके विपरीत अंगरेजी आधारित शिक्षा एवं व्यावसायिक कारणों से वह अंगरेजी के निरंतर अभ्यास का आदी होता है । भले ही वह धाराप्रवाह अंगरेजी न बोल पाता हो, अंगरेजी के शब्दों का मौके-बेमौके उसके मुख से निकलना थमता नहीं है ।

“गरीब की लुगाई सबकी भौजाई”

हिंदी के मामले में “गरीब की लुगाई सबकी भौजाई” की लोकोक्ति सटीक बैठती है । अपने समाज में ऐसे लोगों की अच्छीखासी संख्या है जिनका अंगरेजी के प्रति लगाव अद्वितीय है । उनकी धारणा है कि हिंदी में अंगरेजी के शब्दों को जहां-तहां ठूंस देना किसी भी हाल में अनुचित नहीं है । खुद हिंदी के तथाकथित पक्षधर भी यह कहते देखे जाते हैं कि ऐसा करने से हिंदी समृद्ध होती है । किंतु जब बात अंगरेजी की होती है तो ये ही लोग उसकी शुद्धता के प्रति सचेत रहते हैं । क्या मजाल कि हिंदी का एक शब्द भी भूल से उनकी अंगरेजी में सुनने को मिल जाए । आप किसी को यों बोलते हुए कभी – जी हां कभी भी, सपने में ही सही – सुन सकते हैं:
“द पीएम सेड, ‘वी वुड लाइक टु हैव मैत्रीपूर्ण संबंध विद अवर पड़ोसी कंट्रीज ।’”

अपने देश में अंगरेजी महज एक ‘और’ भाषा नहीं है, जैसे दुनिया की तमाम भाषाएं होती हैं । अंगरेजी को तो देश की प्रगति एवं उन्नति का मंत्र और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार समझा जाता है । इसलिए देशज भाषाओं में पूरे गर्व के साथ इसका ‘तड़का लगाने’ की एक प्रथा अपने समाज में चल चुकी है । इसी ‘तड़के’ का फल है अपनी मेट्रोहिंदी ।

मेट्रोहिंदी के उपयोक्ता यानी ‘यूजर्स’

हिंदीभाषी क्षेत्र में कौन उर्दू बोलता है और कौन नहीं यह कह पाना कठिन है । उर्दूभाषी होने का दावा करने वाले भी मीरजा गालिब की उर्दू समझ ही लेंगे जरूरी नहीं है । अरबी-फारसी के अल्फाज कुछ ज्यादा ही हों और ‘जहां का नूर’ न कहकर ‘नूर-ए-जहां’ जैसे पदबंध इस्तेमाल हों तो उर्दू हो गयी । ठीक इसी प्रकार हिंदी में अंगरेजी ठूंसते जाइए, ‘एंड’, ‘इवन’, ‘ऑलरेडी’ जैसे अव्ययों का मुक्त हृदय से प्रयोग करिए तो हो गयी मेट्रोहिंदी । मोटे तौर पर कहूं तो ये लोग मेट्रोहिंदी बोलते हैं:

(1) ‘इंग्लिश-स्कूलों’ में शिक्षित – विद्यालयों जिनकी शिक्षा ‘इंग्लिश-मीडिया’ विद्यालयों में होती है, जहां अंगरेजी सीखने और उसीका शब्दसंग्रह बढ़ाने पर पूरा जोर रहता है । छात्रों के मन में यह भावना बिठा दी जाती है कि कामचलाऊ हिंदी पर्याप्त है ।

(2) अंगरेजी के व्यावसायिक प्रयोग वाले – अपने देश में लगभग सभी व्यावसायिक कार्य अंगरेजी में ही संपन्न होते हैं । इस कार्य के दौरान कर्मचारी अंगरेजी का ही अभ्यास पाते हैं । यही अंगरेजी उनके परस्पर बातचीत में घुस जाती है । वैज्ञानिक, चिकित्सक, अर्थशास्त्री, कानूनविद्, आदि सभी इस वर्ग में आते हैं ।

(3) अंगरेजी से प्रतिष्ठा के इच्छुक – अपने समाज में अंगरेजी प्रतिष्ठा की निशानी है । जिसे अंगरेजी आती है वह अंगरेजी शब्दों के माध्यम से अपना रुतबा कायम करना जरूरी समझता है । आम धारणा है कि अंगरेजी बोलने वाले को तवज्जू दी जाती है ।

(4) भाषाई हीनभावना से ग्रस्त – यही प्रतिष्ठा है जो अंगरेजी कम या नहीं जानने वालों की हीन भावना के रूप में दिखाई देती है । वे अपना अंगरेजी ज्ञान सुधारने की कोशिश के साथ-साथ मौके-बेमौके हिंदी में अंगरेजी ठूंसना जरूरी समझने लगते हैं । – योगेन्द्र जोशी

यह एक परंपरा-सी बन गई है कि विशेष अवसरों पर लोग संस्कृत भाषा आधारित वाक्यांशों या सूक्तियों का प्रयोग करते हैं । केंद्रीय सरकार के मोहर या सील पर ‘सत्यमेव जयते’ अंकित रहता है इसे सभी जानते हैं । इसी प्रकार ‘अतिथिदेवो भव’, ‘अहिंसा परमो धर्म’, ‘विद्यया९मृतमश्नुते’, ‘योगक्षेमं वहाम्यहम्’, आदि जैसी उक्तियां प्रसंगानुसार देखने को मिल जाती हैं । निमंत्रणपत्रों पर गणेश वंदना अथवा देवी-देवताओं की वंदना के श्लोकों का प्रचलन भी आम बात है । मैंने कई बार देखा है कि इनका उल्लेख वर्तनी की दृष्टि से त्रुटिपूर्ण रहता है । इस विषय पर मैंने पहले भी अपनी बातें लिखी हैं (देखें 7 मार्च 2011 की प्रविष्टि)

कल के अपने हिंदी अखबार के मुखपृष्ठ पर पूरे पेज का एक विज्ञापन मुझे देखने को मिला । विज्ञापन किसी कोचिंग संस्था का है और पूरा का पूरा अंग्रेजी में है । फिर भी उसमें गुरुमहिमा को रेखांकित करने के लिए अधोलिखित श्लोक का उल्लेख है, जिसे मैं यथावत् प्रस्तुत कर रहा हूं:

गुरुः ब्रह्मा गुरुः विष्णुः, गुरुः देवो महेश्वरा ।
गुरुः साक्षात परब्रह्मा, तस्मै श्री गुरुवे नमः ॥

इस श्लोक के उद्धरण में एकाधिक त्रुटियां देखी जा सकती हैं । प्रथम तो यह है कि ‘महेश्वरा’ के स्थान पर ‘महेश्वरः’ होना चाहिए । दूसरा ‘साक्षात’ को हलंत अर्थात् ‘साक्षात्’ होना चाहिए । पद्यरचना के संस्कृत भाषा के नियमों के अनुसार छंदों (श्लोकों) में पदों (शब्दों) को परस्पर संधि करके लिखना अनिवार्य है । उक्त श्लोक में कुछ स्थलों पर ‘विसर्ग’ का ‘र्’ होकर अगले पद के साथ संधि होनी चाहिए । यह तीसरी त्रुटि समझी जानी चाहिए ।  इसके अतिरिक्त मेरे मत में ‘श्री गुरुवे’ सामासिक पद के रूप में अर्थात् ‘श्रीगुरवे’ लिखा जाना चाहिए; गुरुवे नहीं गुरवे। परब्रह्मा के स्थान पर परब्रह्म होना चाहिए । इन त्रुटियों के निवारण के बाद सही श्लोक यों लिखा जाना चाहिए:

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः ।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

(शाब्दिक अर्थः गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु देव महेश्वर शिव हैं, गुरु ही वस्तुतः परब्रह्म परमेश्वर हैं; ऐसे श्रीगुरु के प्रति मेरा नमन है । गुरु ज्ञान-दाता अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति होता है । उक्त श्लोक में यह भाव व्यक्त हैं कि परमात्मा का ज्ञान पाने, उस तक पहुंचने, का मार्ग गुरु ही होते हैं । ‘श्री’ सम्मान, प्रतिष्ठा, या ऐश्वर्यवत्ता का द्योतक है और नामों के साथ आदरसूचक संबोधन के तौर पर प्रयुक्त होता है ।)

इस बात पर भी ध्यान दें परंपरानुसार संस्कृत में ‘कॉमा’ का प्रयोग नहीं होता, क्योंकि यह विराम चिह्न संस्कृत का है नहीं । आधुनिक संस्कृत-लेखक इसे प्रयोग में लेने लगे हैं । काफी पहले छपे ग्रंथों में इनका अभाव देखने को मिलेगा ।

मैं समझता हूं कि संस्कृत छंदों/सूक्तियों का प्रयोग करके उसे प्रभावी बनाने की कोशिश विविध मौकों पर की जाती है, कदाचित् अपने समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का स्मरण कराने के लिए । ‘कोटेशनों’ का प्रयोग साहित्य में नई बात नहीं है । लिखित सामग्री को प्रभावी बनाने के लिए ऐसा किया ही जाता है । विज्ञापनों में भी उनका सम्मिलित किया जाना अनुचित नहीं है । परंतु जब उनके लेखन में सावधानी नहीं बरती गई हो और दोषपूर्ण वर्तनी प्रयोग में ली गई हो तो मुझ जैसे लोगों को वह खलता है । पाठ्य सामग्री के अंतर्गत कहीं बीच में ऐसी त्रुटियां अक्सर रहती हैं, और वे बहुत नहीं खलती हैं । किंतु जब वे शीर्षक के तौर पर प्रयुक्त हों, या ऐसे स्थल पर हों जहां सहज ही ध्यान चला जाता हो, अथवा जब उन पर बरबस नजर पड़ने जा रही हो, तब मुझे बेचैनी होने लगती है ।

यह सच है कि अधिकतर लोगों का संस्कृत विषयक ज्ञान नहीं के बराबर रहता है । वे किसी उक्ति/कथन को अपने लेखन में उस रूप में शामिल कर लेते हैं जिस रूप में उसे उन्होंने कहीं देखा या सुना होता है । आम तौर पर वे इस संभावना पर ध्यान नहीं देते कि उसमें त्रुटि भी हो सकती है । मेरा मत है कि जिस बात के सही/गलत का समुचित ज्ञान उन्हें न हो उसके बारे में किसी जानकार से सलाह लेनी चाहिए । मैं समझता हूं जिन शब्दों को आप लाखों टीवी दर्शकों के सामने दिखा रहे हों, अथवा जो अखबार आदि के प्रमुख स्थलों पर अनेक जनों की दृष्टि में आने के लिए मुद्रित हों, उनमें त्रुटियां न हों इसकी सावधानी बरती जानी चाहिए । मुझे लगता है उपर्युक्त विज्ञापन में ऐसी सावधानी नहीं बरती गई है ।

इस समय एक और उदाहरण मेरे ध्यान में आ रहा है । आजकल किस टीवी चैनल पर एक धारावाहिक दिखाया जा रहा है जिसका नाम है ‘सौभाग्यवती भवः’ । ऐसा लगता है कि निर्माता ने इस नाम को चुनने में सावधानी नहीं बरती । वास्तव में संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘भवः’ सर्वथा गलत है । इसके स्थान पर बिना विसर्ग के ‘भव’ होना चाहिए ।

आरंभ में मैंने ‘सत्यमेव जयते’ का जिक्र किया है । मुझे शंका है कि भी उसमें एक छोटी-सी व्याकरणमूलक त्रुटि है । इस बारे में मैंने अन्यत्र पहले कभी लिखा है । – योगेन्द्र जोशी

 ‘एंग्लोस्फियर’ 

दो-चार दिन पहले मुझे ब्रिटेन से छपने वाली ‘न्यू साइंटिस्ट’ (New Scientist) नामक पत्रिका में एक लेख पढ़ने को मिला, जिसमें द्विभाषी अथवा बहुभाषी होने के लाभ की बातें कही गयी हैं । (newscientist.com, editorial dated 08 May 2012, New Scientist print version, issue 2863, page 3, related article page 30) पत्रिका में जिन प्रमुख बिंदुओं का जिक्र किया गया है उनकी चर्चा मैं इस स्थल पर कर रहा हूं । संपादकीय का शीर्षक हैः ‘Oh, to be bilingual in the Anglosphere’, और यह प्रत्रिका में अन्यत्र छपे एतद्विषयक अध्ययन पर लिखित शोध-प्रबंध पर आधारित है ।

पत्रिका का मानना है कि इस युग में अंग्रेजी मानवीय क्रिया-कलापों के बहुत-से क्षेत्रों में दुनिया भर में प्रयुक्त हो रही है । यह विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं चिकित्सा, व्यवसाय, राजनयिक कार्य, तथा सांस्कृतिक संपर्क-साधन आदि के क्षेत्रों में प्रमुख भाषाई माध्यम बन चुकी है । विश्व में तमाम लोग अंग्रेजी माध्यम से कार्य निष्पादन की क्षमता अर्जित कर चुके हैं । अंग्रेजी ने अपने लिए भाषाई प्रयोग का एक विस्तृत क्षेत्र निर्माण कर लिया है, जिसे ‘एंग्लोस्फियर’ (Anglosphere) नाम दिया है ।

द्विभाषी-बहुभाषी 

यूरोपीय देशों में द्विभाषियों की संख्या काफी है । वहां दो से अधिक भाषाएं जानने-बोलने वाले भी पर्याप्त संख्या में मिल जाएंगे । पत्रिका कहती है कि फ्रांस तक में दूसरी भाषा, मुख्यतया अंग्रेजी, के जानकार बहुत हैं । ध्यान रहे कि फ्रांस अपने भाषाभिमान और अंग्रेजी से परहेज के लिए जाना जाता है ।

यूरोपीय महाद्वीप के देशों के विपरीत ब्रिटेन तथा आयरलैंड में 70 फीसदी लोगों को किसी अन्य भाषा का कोई ज्ञान नहीं है । दरअसल उन देशों में जहां अंग्रेजी ही मुख्य रूप से मातृभाषा है वहां इस बात का अहंकार व्याप्त है कि जब अन्य भाषाभाषी अंग्रेजी सीखने के लिए बेताब हैं तो हम अन्य भाषा सीखने की मेहनत ही क्यों करें । इसमें दो राय नहीं है कि मातृभाषा के अलावा कोई और भाषा सीखना श्रम- एवं समय-साध्य तो होता ही है । इस बात को हर भारतीय अच्छी तरह अनुभव करता है कि हमारे कई बच्चों का समय तो अंग्रेजी सीखने में ही निकल जाता है और अन्य विषयों में नींव अपेक्षया कमजोर होती है ।

ब्रिटेन-आयरलैंड वाली स्थिति अंग्रेजीभाषी अन्य देशों में भी देखने को मिलती है । अमेरिका तक में केवल 25 प्रतिशत लोग ही किसी अन्य भाषा में बात कर सकते हैं । यह स्थिति तब है जब वहां अन्य मातृभाषा वाले समुदायों के लोगों की संख्या अच्छीखासी है, जिनमें स्पेनी बोलने वाले प्रमुख हैं । संपादकीय के अनुसार इस मामले में आस्ट्रेलिया की स्थिति और भी कमजोर है ।

गैर-अंग्रेजीभाषी देशों में अंग्रेजी सीखने के अपने किस्म के कारण हैं । वहां कुछ बच्चे तो बचपन में ही इसे सीख लेते हैं, तो बहुत-से लोगों को सीखने का अवसर बाद में मिलता है । कुछ भी हो, अंग्रेजी या अन्य भाषा सीखने के अपने कुछ अतिरिक्त लाभ भी हैं, जो मात्र एक ही भाषा जानने वालों को नहीं मिलते हैं ।

द्विभाषी होने का लाभ

पत्रिका में छपे शोध परिणामों के अनुसार द्विभाषी (या बहुभाषी) होना मस्तिष्क के लिए लाभदायक होता है । एक से अधिक भाषाओं को प्रयोग में लेने वाले व्यक्ति का मस्तिष्क अपेक्षया तीव्र, वस्तुस्थिति को बारीकी से समझने वाला, ध्यानस्थ होने में अधिक समर्थ, और विविध कार्य कर पाने में सक्षम होता है । अधिक महत्त्व की बात यह है कि चढ़ती उम्र के साथ बुजुर्गों में पाए जाने वाले मनोभ्रंश (dementia) के रोग की शुरुआत द्विभाषी होने पर कम से कम 5 वर्ष के लिए टल सकती है । एकाधिक भाषा का प्रयोग मस्तिष्क के लिए वस्तुतः एक कारगर व्यायाम है जो उसे तेज बनाता है । जिस प्रकार कायिक व्यायाम शरीर के अंगों को दुरुस्त रखने मदद करता है, वैसे ही दिमागी व्यायाम मस्तिष्क की सक्रियता बनाए रखने में समर्थ होता है ।

संपादकीय ने यह टिप्पणी भी की है अंग्रेजीभाषी देशों के लोगों को अंग्रेजी से इतर भाषा सीखने की न तो स्वयं कोई आवश्यकता दिखती है और न ही उन्हें इस दिशा में प्रेरित किया जा रहा है । बताया गया है कि शिक्षा के ‘ए’ स्तर को पार कर चुके (16 वर्ष) अतिरिक्त भाषा की कक्षाओं में प्रवेश के इच्छुक छात्रों की संख्या 1990 की तुलना में अब लगभग आधी रह गई है । कठिन प्रतिस्पर्धा वाले इस युग में वे लोग उस लाभ की स्थिति से वंचित रह सकते हैं, जो बहुभाषियों को प्राप्य है । – योगेन्द्र जोशी

बीते मार्च माह की 26 तारीख अहमदाबाद अवस्थित आई.आई.एम. (इंडियन इंस्टिट्यूट आफ् मैनेजमेंट, भारतीय प्रबंधन संस्थान) में दीक्षांत समारोह था । मुझे भी उस समारोह में बतौर अतिथि के उपस्थित होने का अवसर मिला था । उस आयोजन में देश के माननीय प्रधानमंत्री, डा. मनमोहन सिंह, एवं गुजरात राज्य के माननीय मुख्यमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी, भी मौजूद थे और दोनों ने छात्र, शिक्षक एवं अतिथि समुदाय को संबोधित किया । जहां श्री मोदी ने अपने विचार अलिखित, स्वतःस्फूर्त एवं दमदार तरीके से पेश किये, वहीं डा. सिंह का संबोधन लिखित, महज औपचारिक, एवं नितांत निष्प्रेरक था । डा. सिंह के संबोधन के प्रति निराशाजनक प्रतिक्रिया मैंने कुछएक छात्रों के मुख से सुनीं ।

अस्तु, इस स्थल पर मेरा इरादा उस आयोजन की व्यवस्था, संबोधनोंउद्बोधनों आदि के बारे में चर्चा करने का नहीं है । नामोच्चारण की एक समस्या जो मैंने वहां देखी वह मेरे प्रस्तुत आलेख का विषय है । समारोह के दौरान जब छात्रों को अर्जित उपाधियां प्रदान की जा रही थीं, तब उनके नाम कितने सही उच्चारित हो रहे थे यह ठीकठीक बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है । मैं एकएककर पुकारे जा रहे नामों को बहुत ध्यान से सुन भी नहीं रहा था । किंतु एक नाम, जिसने अनायास मेरा ध्यान खींचा वह था अतानु। असल नाम अतनुया अतनूहै, जो बंगाली समुदाय में पर्याप्त प्रचलित है, दोनों एकार्थी हैं, और मेरी समझ से इनका अर्थ तनुहीन’, ‘बिना देह का’, ‘अशरीरीअथवा अमूर्तहोना चाहिए । वस्तुतः संस्कृत में तनुस्’ (नपुंसक लिंग) तथा तनू’ (स्त्रीलिंग, दीर्घ ऊ की मात्रा) दोनों हैं । प्रचलित भाषाओं में तनुस्को तनु की भांति प्रयोग में लिया जाएगा । किसी पुरुष का नाम ह्रस्व उ के साथ लिखा जाना पारंपरानुरूप है ।

वस्तुतः उस छात्र का नामअतनु राय’ (या रॉय) था । उससे मेरा परिचय पहले ही हो चुका था, अपने बेटे के माध्यम से । संयोग से यह नाम मेरे लिए सुपरिचित था । कोई तीन दशक पहले ठीक इसी नाम का एक छात्र मेरे विश्वविद्यालय के चिकित्सा संस्थान में डाक्टरेटउपाधि के लिए अध्ययनरत हुआ करता था । मेरे पड़ोस में रहने के कारण उससे हमारा अच्छाखासा परिचय था । तब तक यह नाम मेरे लिए पूर्णतः नया और कभीसुनाहुआ था । उक्त दीक्षांत के अवसर पर संयोग से ठीक उसी नामजातिनाम के एक और छात्र से मेरा संक्षिप्त परिचय हो गया था । दीक्षांत आयोजन के पश्चात् मैंने उससे पूछा कि उसका नाम क्या सही पुकारा गया था । तब उसने बताया कि नाम तो अतनु ही है । इस नाम में की विशिष्ट बंगाली ध्वनि निहित है, किंतु अन्य भाषाभाषी अतनुके अनुरूप ही पुकारेंगे ।

उस अवसर पर मेरे जेहन में यह सवाल उठा कि उक्त नाम का सही उच्चरण न कर पाने का क्या कारण रहा होगा । संस्था से जुड़े किसी व्यक्ति से उत्तर पाने की कोशिश मेरे लिए संभव नहीं थी । मैंने स्वयं संभव तार्किक उत्तर सोचने का प्रयास किया । जो मैं समझ पाया वह यों हैः हमारे देश में भले ही घोषित राजभाषा हिंदी हो, लगभग सभी कामकाज अंग्रेजी में ही होते हैं, खास तौर पर शिक्षण संस्थाओं में इस्तेमाल होने वाली वाली छात्रछात्राओं की सूची तैयार करने में । आईआईएम जैसी संस्था में तो अंग्रेजी से इतर कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो सकता है । रोमन लिपि की एक गंभीर कमी यह है कि इसमें लिखित किसी नाम का सहीसही उच्चारण क्या होगा यह कह पाना कठिन होता है । वस्तुतः हर उस लिपि के साथ ऐसी समस्या होती है, जो ध्वनिमूलक नहीं होती है । अंग्रेजों के यहां नामों की भरमार नहीं है । उस समाज में व्यक्तियों के नाम घूमफिर के वहीवही रहते हैं, अतः वहां के बाशिंदों के नामों की वर्तनी और उनके उच्चारण लोगों को कमोबेश मालूम रहते हैं ।

किंतु हमारे यहां, विशेषतः हिंदू समाज में नामों की विविधता उल्लेखनीय है । हाल के वर्षों में तो एक नया चलन देखने को मिल रहा है, जिसके अनुसार बच्चों के नाम खोजखोजकर ऐसे चुने जाने लगे हैं जो नितांत नये हों, कभी सुने न गये हों, और जिस नाम का दूसरा व्यक्ति ढूढ़ने पर भी न मिले । अपनी देशज लिपियों में इन्हें लिखने और उसके अनुसार उच्चारित करने में कोई परेशानी नहीं होती है । किंतु रोमन में व्यक्त किये जाने पर इन नामों को सहीसही पुकारना कठिन होता है, विशेषतः जब वे कभी पहले सुने ही न गये हों । अपने देश के कामकाज में रोमन लिपि को ऐसे नहीं ढाला गया है कि हमारी अलगअलग ध्वनियों को स्पष्टतः भिन्न रोमन लेटर/लेटर्ससे व्यक्त किया जा सके । आप अंग्रेजी `a’ को देखकर निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि वह की ध्वनि व्यक्त करता है या की । कुछ ऐसा ही `i’ के मामले में भी है । वस्तुतः ऐसे अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनके उच्चारण में संदिग्धता का सामना करना पड़ सकता है । क्या आप ऋतुएवं रितुको रोमन में स्पष्टतः भिन्न वर्तनी से व्यक्त कर सकते हैं ? रोमन में बुद्ध (बुद्धा?) एवं बुड्ढा में फर्क कर पाना कठिन है । इस प्रकार के अनेकों उदाहरण देखने को मिल जाएंगे । अवश्य ही विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग का संभव है, किंतु आम लेखन में उनका प्रयोग कोई नहीं करता है, और न ही उनका प्रयोग सुविधाजनक होता है ।

लेकिन भारतीय जनमानस अंग्रेजी एवं उसकी लिपि रोमन (या लैटिन) के समक्ष इस कदर नतमस्तक है कि उसे वे अमृत तुल्य, जीवनरक्षक, तथा अपरिहार्य लगते हैं । उसके लिए भारतीय लिपियों का ध्वन्यात्मक होना कोई महत्त्व नहीं रखता है । अब तो सर्वत्र अंग्रेजी एवं रोमन का ही बोलबाला नजर आता है । हिंदी आम बोलचाल तक सीमित है वह भी अंग्रेजी शब्दों की भरमार के साथ और वह दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकी है । अतः पढ़ेलिखे भारतीयों बेहतर होगा इंडियनों कहना का एक वर्ग ऐसा उभर चुका है जिसका हिंदी एवं देवनागरी का ज्ञान अत्यल्प है और अपने अज्ञान पर उसे खेद नहीं बल्कि गर्व का अनुभव होता है । यह वर्ग देशज साहित्य से परहेज रखता है; वह आम तौर पर भारतीय लिपियों में निबद्ध समाचारपत्रोंपत्रिकाओं को नहीं पढ़ता है; उसके पुस्तकसंग्रह में शायद ही कोई देशी भाषा की पुस्तक देखने को मिले । इस वर्ग के लोगों का देशी भाषाओं के शब्दों पर आधारित नामों का ज्ञान अपर्याप्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी । मैं समझता हूं कि आई.आई.एम. जैसी संस्थाओं में बहुत कम लोग होंगे जो आजकल प्रचलन में लिए जा रहे अपारंपरिक एवं असामान्य नामों का ठीकठीक उच्चारण करने में समर्थ होंगे

मैंने ‘अतनु रॉयका उदाहरण पेश किया है । उस दीक्षांत समारोह से संबद्ध दीक्षीत छात्रों की सूची में मुझे ऐसे नाम लिखे हुए मिले जिनका उच्चारण क्या होगा यह मैं तय नहीं कर सका । कुछएक यों हैं:Ashtha Agarwalla (आस्था/अष्ठ अगरवाल्ला/अगरवाल/…), Aarthy Sridhar (आरती/आर्ती/आरथी/… श्रीधर/स्रीधर), Astha Modi (आस्था/अष्ठा मोदी), Anil Meena (अनिल मीणा/मीना), Mansi Chilalia (मानसी/मांसी चिललिया/चिलालिआ), Pritika Padhi (प्रीतिका पाढी/पाधी), V. M. Avinass Kumar (वी. एम. अविनाश/अविनास्स कुमार), Maneka Bhogale (मेनका/मनेका भोगले/भोगाले) हाल में मुझे अपने परिचितों के बच्चों के ये अपरिचित से नाम सुनने को मिलेः अरविंदाक्षाएवं आयुषी। पहला नाम रोमन में सहीसही कैसे लिखा जाना चाहिए Arvindaksha या Aravindaksha ? और दूसरे नाम की उचित वर्तनी क्या होनी चाहिए Ayushi या Ayushee ? जिसने इन नामों को पहले कभी सुना न हो और जिसे संस्कृत का थोड़ाबहुत ज्ञान न हो उसके लिए इनका सही उच्चारण संभवतः कठिन हो । लेकिन देवनागरी में लिखे होने पर यह समस्या नहीं रहती है, भले ही इन सार्थक नामों के अर्थ मालूम न हों । (अरविंदाक्ष = अरविंद + अक्ष; उससे स्त्रीलिंग में अरविंदाक्षा, कमल के समान नयन वाली । आयुषी संस्कृत के नपुंसक शब्द आयुस्’ = आयु से बना हुआ प्रतीत होता है स्त्रीत्व का बोध कराने के लिए । मैं कह नहीं सकता कि संस्कृतज्ञ इसे स्वीकार्य शब्द मानेंगे कि नहीं; आयुष्मान्, आयुष्मती अवश्य प्रचलित हैं ।)योगेन्द्र जोशी