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हिन्दी दिवस, २०१६

आज हिन्दी दिवस है, १४ सितंबर। सन् १९५० से आज तक ६६ वर्षों से हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, एक ही ढर्रे से। कहीं वन-डे प्रोग्राम (यानी एकल-दिवसीय कार्यक्रम), तो कहीं वन-वीक प्रोग्राम (साप्ताहिक कार्यक्रम), और कहीं वन-फ़ोर्टनाइट प्रोग्राम (पाक्षिक कार्यक्रम)। दिवस मनाने का वही बासी पड़ चुका तरीका। उन लोगों के भाषण होंगे जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर हिन्दी से कोई लेना-देना नहीं, किंतु जिनके सामने हिन्दी के बाबत कुछ कहने की विवशता आ जाती है। हिन्दी आम जन की भाषा है, देश की संपर्क भाषा है, राष्ट्रीय एकता की निशानी है इत्यादि जुमले वक्ताओं के मुख से प्रायः निसृत होते हैं। हमें हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, आधिकारिक कार्य हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में होना चाहिए, इत्यादि सलाह साल-दर-साल दी जाती है। जिन्हें यह सब करना है वे अंगरेजी को यथावत अपनी जगह बनाये रखे हैं।

कथनी एक और कथनी कुछ और। पता नहीं आगामी कितनी दशाब्दियों- शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहेगा।

भाषणबाजी के अलावा हिन्दी दिवस मनाने के और भी तरीके प्रचलन में हैं। संस्थाएं निबंध-लेखन, वाद-विवाद, कर्मियों के लिए हिंदी-टंकण आदि की प्रतिस्पर्धाएं भी आयोजित करती हैं और विजेताओं को पुरस्कृत करती हैं। वर्ष में एक बार सितंबर में यह सब ठीक वैसे ही होता है जैसे पावस ऋतु का आना और जाना। सितंबर की समाप्ति होते-होते आकाश से बादल छंट जाते हैं और उसी के साथ तिरोहित होता है हिन्दी के प्रति जागृत अल्पकालिक उत्साह।

जरूरी है क्या हिन्दी दिवस

इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता को मैं आज तक नहीं समझ सका। पता नहीं कितने देशों में तत्सदृश भाषा दिवस मनाये जाते हैं।  देश यथावत चल रहा है। अंगरेजी की अहमियत बढ़ रही है घट नहीं रही। जो कार्य अंगरेजी में होता आया है वह आज भी वैसे ही चल रहा है। हिन्दी एवं अन्य भाषाएं आम बोलचाल तक सीमित होती जा रही हैं। और वे अंगरेजी के साथ खिचड़ी बनती जा रही हैं। अब हालत यह हो रही है कि कई लोगों की हिन्दी बिना अंगरेजी के समझना मुश्किल है। हिन्दी का अंगरेजीकरण बदस्तूर चल रहा है।

तब क्या है इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता? किसको हिन्दी के प्रति प्रेरित किया जाना है? जिस देश के लोग खुद मान चुके हैं कि अंगरेजी के बिना देश नहीं चल सकता, प्रगति नहीं कर सकता, सुख-समृद्धि की कुंजी तो अंगरेजी है, इत्यादि उन्हें हिन्दी दिवस की क्या जरूरत?

कभी-कभी हिन्दी को लेकर बहुत कुछ लिख जाने का मन होता है मेरा। जोश चढ़ता है लेकिन उसके स्थायित्व की कमी रहती है और लेखन का तारतम्य अक्सर टूट जाता है। लेख की प्रगति स्वयं की दृष्टि में संतोषप्रद नही रह जाती है। फिर भी हाल में अपने अल्पकालिक कनाडा प्रवास के अंगरेजी बनाम फ़्रांसीसी संबंधी अनुभव को पाठकों से साझा करने का विचार है। उस विषय पर दो-तीन लेख लिखने हैं, किंतु आज नहीं। आज तो अपने अनुभवों को लेकर एक दो टिप्पणियां काफ़ी होगा।

मैं उपदेशात्मक या निर्देशात्मक लेख नहीं लिखता। इस ब्लॉग में हो या मेरे दूसरे ब्लॉगों में अथवा अन्यत्र, मेरा लेखन यथासंभव तथ्यों के उद्घाटन पर केंद्रित रहता है। उनसे जिसको जो निष्कर्ष निकालना हो वह निकाले। क्या करने योग्य है क्या नहीं यह सुधी जन स्वयं सोचें।

एक अनुभव यह भी

शुरुआत मैं कुछ समय पहले अपने अनुभव में आए एक वाकये के उल्लेख के साथ कर रहा हूं। घटना हिन्दी से जुड़ी है और हिन्दी क्षेत्र के लोगों का उसके प्रति क्या रवैया है इसकी एक झलक प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं तो रोजमर्रा के जीवन में हम सभी के साथ प्रायः होती रहती हैं, किंतु उन पर सामान्यतः ध्यान नहीं दिया जाता है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के कारण मेरी यह “खराब” आदत बन चुकी है कि मैं घटनाओं को गौर से देखता हूं। अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के कार्य में यह तो करना ही पड़ता था, अन्य स्थलों पर भी आदत से मजबूर रहता हूं। घटना का विवरण कुछ यों है –

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में अवस्थित भारतीय स्टेट बैंक शाखा के अहाते में पासबुक प्रिंट (मुद्रित) करने की एक आटोमैटिक (स्वचालित) मशीन लगी है। ( मैं बीएचयू में ही भौतिकी-शिक्षक था।) उस दिन मैं अपनी और अपने परिवारी जनों के पासबुक लेकर बैंक पहुंचा था। उन पासबुकों पर कोई तीन-एक साल से प्रिंटिग (मुद्रण) नहीं हुई थी, क्योंकि घर पर ही इंटरनेट से बैंक-खातों की जानकारी मिल जाया करती है। किंतु मौका देख विचार आया कि पासबुकें प्रिंट कर ली जाएं। मैं मशीन के पास लगी पंक्ति में शामिल हो गया। अपनी बारी आने पर मैंने पाया कि मेरी अकेली एक पासबुक प्रिंट होने में ही पर्याप्त समय लग रहा है। चूंकि बैंक के ग्राहकसेवा का समय समाप्त हो चला था, अतः उस स्थान की भीड़ छंटने लगी थी। सदाशयता के नाते मैं पंक्ति से बाहर निकल आया यह सोचकर कि जब अन्य जनों का कार्य पूरा हो जाएगा तब फुरसत से अपना कार्य पूरा कर लूंगा।

वह स्वचालित मशीन प्रिंटिंग आरंभ करने से पहले प्रक्रिया संबंधी संदेश ध्वनित रूप में (न कि पर्दे पर लिखित रूप में) प्रदान करती है। उसके पहले ग्राहक को पर्दे पर संदेश मिलता है हिन्दी अथवा अंगरेजी का विकल्प चुनने के बारे में। उपस्थित जन क्या विकल्प चुनते हैं इस पर मैं गौर कर रहा था। मैंने पाया कि हर कोई अंगरेजी का ही विकल्प चुन रहा था। सार्वजनिक स्थल पर यदि ऐसा कुछ घटित हो रहा हो जो मुझे अप्रिय लगे तो मैं टिप्पणी किए बिना प्रायः नहीं रह पाता हूं। मित्र-परिचित मेरे इस स्वभाव को “गंदी आदत” कहते हैं। उक्त अवसर पर सभी को सुनाते हुए मेरे मुंह से निकला, “आप लोग आम तौर पर हिन्दी बोलते हैं, तब यहां पर हिन्दी क्यों नहीं चुन रहे हैं?”

मेरी टिप्पणी सुनना उनके लिए नितांत अप्रत्याशित था। वे प्रश्नभरी निगाह से मेरी ओर देखने लगे। फिर उनमें से एक उच्चशिक्षित एवं संभ्रांत-से लग रहे नौजवान (मेरे अनुमान से बीएचयू में शिक्षक/शोधकर्ता) ने कहा, “हमारी सरकारी व्यवस्था ही ऐसी हो चुकी है कि सर्वत्र अंगरेजी का बोलबाला है। अब तो आदत ही हो चली है अंगरेजी की। तब हिन्दी का प्रयोग न करें तो क्या फर्क पड़ता है?” और उसके बाद देखा कि उन्होंने अंगरेजी का ही विकल्प चुना।

वहां मौजूद अधिकांशतः सभी चुप रहे। कुछ मेरी ओर मुस्कराते हुए देखने लगे, गोया कि मैंने कोई अजीब-सी या बेतुकी बात कही हो। फिर एक अधेड़ – जो हावभाव से बीएचयू के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लग रहे थे – की प्रतिक्रिया आई, “अंगरेजी तो सारी दुनिया में चल रही है। तब उसे छोड़ हिन्दी में कार्य करने का क्या फायदा?”

मैंने पहले व्यक्ति को यह समझाने की कोशिश की कि वस्तुस्थिति को बदलने का प्रयास तो हम में से प्रत्येक को ही करना चाहिए, अन्यथा अंगरेजी के वर्चस्व वाली स्थिति यथावत बनी रहेगी। दूसरे व्यक्ति को मैंने यह जताने का प्रयास किया कि दुनिया के अधिकांश देशों में अंगरेजी का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में उतना नहीं होता जितना अपने देश में। वहां अंगरेजी के बिना भी लोग अपना कार्य बखूबी करते हैं। उन्हें अपनी गलतफहमी छोड़नी चाहिए।

अंगरेजी की वैश्विकता का भ्रम

यह घटना दो बातों की ओर संकेत करती हैः (1) पहला यह कि देशवासियों में यह गंभीर भ्रम व्याप्त है कि विश्व में सर्वत्र अंगरेजी में ही कार्य होता है, और (2) दूसरा यह कि जब केंद्र एवं राज्य सरकारें ही अंगरेजी में कार्य करती हैं, उसी को महत्व दे रही हैं, तो आम आदमी क्यों हिन्दी अपनाए ? यह दूसरी बात अधिक गंभीर है, क्योंकि किसी के भ्रम का निवारण करना संभव है, किंतु प्रशासनिक जडत्व दूर करना असंभव-सा है।

ऊपर जिन दो बातों का उल्लेख मैंने किया है वे उक्त अकेली घटना पर आधारित नहीं हैं। अपने विश्वविद्यालयीय जीवन में तथा अन्य मौकों पर लोगों के साथ बातचीत में मुझे उक्त बातों का अनुभव होता रहा है। लोग अपनी धारणा के पक्ष में तर्क-कुतर्क पेश करते हुए भी पाया है।

लोगबाग शायद अब तक यह भूल गये होंगे कि जब चीन के बीजिंग शहर में ओलंपिक खेल आयोजित (2008) हुए थे तो वहां पहली बार सड़कों, क्रीड़ागनों, होटलों तथा अन्य भवनों के नामपट्ट आदि अंगरेजी में भी लिखे गये थे। उसके पहले अंगरेजी में नामपट्ट कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दिखाई देते थे। यह भी याद करें कि कई जगह तो चीनी से अंगरेजी में किए गए अनुवाद हास्यास्पद हो चले थे।

अभी हाल में मेरे एक निकट संबंधी जर्मनी किसी सम्मेलन में गये थे। उन्होंने बताया कि भारतीयों की आम धारणा के विपरीत उन्हें वहां भाषाई समस्या का सामना करना पड़ा, खास तौर पर छोटे-मोटे होटल-रेस्तरां में। ऐसा ही अनुभव मुझे कोई 30 साल पहले पेरिस में हुआ था। जिन लोगों को चीन, जापान, ब्राजील में प्रवास का अनुभव है वे जानते हैं कि वहां अंगरेजी से काम नहीं चलता। यह भी याद करें कि बोफोर्स घोटाले के आरोपी “ओताविओ क्वात्रोची” को अर्जेंटिना देश से सी.बी.आई. प्रत्यर्पण इसलिए नहीं करा पाई कि स्पेनी भाषा में लिखित मामले से संबंद्ध दस्तावेजों का अंगरेजी में अनुवाद कराने में उसको (सी.बी.आई. को) मुश्किल आ रही थी।

उक्त बातों से क्या निष्कर्ष निकलता है?

यही न कि अंगरेजी की विश्व-व्यापकता को लेकर भारतीयों में भ्रम व्याप्त है जिसके चलते वे अंगरेजी को हर स्थल पर हर अवसर पर वरीयता देते हैं। किंतु इस भ्रम से उनको मुक्त करना अतिकठिन असंभव-सा कार्य है, क्योंकि यह भ्रम बरकरार रहे ऐसा प्रयास करने वाले लोग देश में अधिक हैं उनकी तुलना में जो इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि हिन्दी के कई पक्षधर स्वयं इसी भ्रम में जी रहे हैं और हिन्दी की बात वे भावनावश करते हैं। अंगरेजी की व्यापकता की बात मिथ्या है इसकी बात वे नहीं करते।

मैकॉले की शिक्षा नीति

वे क्या कारण हैं कि अंगरेजी भारतीय भाषाओं के ऊपर अजेय वर्चस्व पा सकी है और वह यहां के जनमानस पर जादुई तरीके से राज करती आ रही है? जो कारण मेरी समझ में आते हैं उनमें प्रमुख है अंगरेजी हुकूमत की वह नीति जिसे लोग “मैकॉले की शिक्षा नीति” के नाम से जानते हैं। करीब पौने दो सौ साल पहले की उस नीति का सार मैकॉले के अधोलिखित कथन में निहित हैः

“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” – T.B. Macaulay, in support of his Education Policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.

हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे करोड़ों जनों के बीच दुभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि से अंग्रेज हों।” (हिन्दी अनुवाद मेरा)

ब्रिटिश हुकूमत की वह नीति कैसे सफल हुई और उसके चलते कैसे एक सशक्त प्रशासनिक बिरादरी ने इस देश में जड़ें जमाई इसकी चर्चा मैं अगले आलेख में करूंगा।  आपको यह स्वीकरना होगा कि विलायत के शासकों ने इसी जमात की मदद से इस देश पर राज किया था। यही वह तबका था जो स्वयं को अंग्रजों के निकट और आम लोगों से अलग रहने/दिखने का शौक रखता था और आज भी रखता है। इस देश का “इंडियाकरण” इसी सामाजिक वर्ग का अघोषित उद्येश्य रहा है ऐसी मेरी प्रबल धारणा है। और भी बहुत कुछ रहा है। … अभी के लिए लगभग पौने-उन्नीस सौ शब्दों का यह आलेख पर्याप्त है। – योगेन्द्र जोशी

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राजभाषा हिन्दी चर्चा में है, कारण मोदी सरकार द्वारा विभागों को दिए गए निर्देश कि वे राजकीय कार्य प्रमुखतया हिन्दी में करें । हिन्दी भारतीय संघ की संविधान-सम्मत राजभाषा है, यानी राजकाज की भाषा । लेकिन संविधान की बात-बात पर दुहाई देने वाले हमारे अधिकांश राजनेता चाहते हैं कि राजकाज मुख्यतः अंगरेजी में ही होते रहना चाहिए और वह भी भविष्य में सदैव के लिए । मैं समझ नहीं पाता कि जब हिन्दी का प्रयोग होना ही नहीं चाहिए, या मात्र खानापूर्ति भर के लिए हो, तब हिन्दी को राजभाषा बनाए रखने का तुक ही क्या है ? लेकिन इस प्रश्न पर विचार करने की जरूरत भी ये नेता महसूस नहीं करते ।

हिन्दी का विरोध उस समय भी हुआ था जब इसे राजभाषा के खिताब से नवाजा जा रहा था । उस काल में अंततोगत्वा संविधान-निर्माण में लगे नेतावृंद सहमत हो ही गये, हिन्दी के साथ सीमित समय के लिए अंगरेजी भी बनाए रखने की शर्त के साथ । वह सीमित समय विगत 63-64 सालों के बाद भी घटने के बजाय अनंतकाल की ओर बढ़ता जा रहा है । पिछली शताब्दी के पचास-साठ के दशकों में विरोध के सर्वाधिक जोरशोर के स्वर तमिल राजनेताओं ने उठाए थे । और आज भी उनका वह विरोध लगभग जैसा का तैसा बरकरार है । उन्होंने शायद कसम खा रखी है कि हिन्दी को लेकर हम न अभी तक बदले हैं और न ही आगे बदलेंगे ।

हिन्दी का जैसा विरोध पचास-साठ के दशक में था वैसा कदाचित अब नहीं रहा । हिन्दी के प्रति तमिलभाषियों का रवैया काफी-कुछ बदल रहा है, भले ही राजनैतिक कारणों से नेताओं का रवैया खास न बदला हो । यों भी इतना जबरदस्त विरोध किसी और राज्य में न तब था और न अब है । वस्तुतः यह तथाकथित तमिल स्वाभिमान से जुड़ा है, ऐसा स्वाभिमान जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलता । सवाल उठता है कि इस स्वाभिमान को अंगरेजी से कोई खतरा क्यों नहीं होता । मैंने अनुभव किया है कि तमिलनाडु के ही पड़ोसी राज्य केरल में स्थिति आरंभ से ही बहुत कुछ भिन्न रही है, पचास-साठ के दशक में और आज भी ।

इस संबंध में मुझे 1973 की दक्षिण भारत की यात्रा का अनुभव याद आता है । जून-जुलाई का समय था । तब अध्यापन एवं अनुसंधान के क्षेत्र में मेरा नया-नया व्यावसायिक प्रवेश हुआ था । मुझे उच्चाध्ययन से संबंधित कार्य हेतु बेंगलूरु-स्थित आईआईएससी संस्थान में एक माह के लिए ठहरना था । उस काल में बेंगलूरु बंगलोर कहलाता था ।

रेलगाड़ी से बेंगलूरु पहुंचने के लिए मैं पहले चेन्नै (तब मद्रास) पहुंचा रात्रि प्रथम प्रहर । मुझे अगले दिन प्रातःकालीन गाड़ी से बेंगलूरु जाना था । वयस्क जीवन के उस आंरभिक काल तक मुझे लंबी यात्राओं, विशेषतः दक्षिण भारत की यात्राओं, का कोई अनुभव नहीं था । तब रेलगाड़ियों में आरक्षण कराना भी आसान नहीं होता था । दूसरे शहरों से आरंभ होने वाली यात्राओं का आरक्षण आप आज की तरह आसानी से नहीं करा सकते थे । तब रेलवे विभाग इस कार्य को तार (टेलीग्राम) द्वारा संपन्न किया करता था, जिसके परिणाम बहुधा नकारात्मक मिलते थे । हां, आजकल की जैसी भीड़भाड़ तब रेलगाड़ियों में कम ही होती थी ।

मैंने वह रात वहीं प्रतीक्षालय में बिताई, एक किनारे जमीन पर चादर बिछाकर । रेलगाड़ियों के इंतिजार में प्रतीक्षालयों और प्लेटफॉर्मों पर लेटे अथवा सोते हुए समय गुजारना भारतीय यात्रिकों के लिए आज भी आम बात है । तभी वहां मेरे ही नजदीक एक प्रौढ़ सज्जन आकर आराम फरमाने लगे । कुछ काल की चुप्पी के पश्चात नितांत अजनबी होने के बावजूद हम एक दूसरे की ओर मुखातिब हुए और कौन कहां से आया है और कहां जा रहा है जैसे सवालों के माध्यम से परस्पर परिचित होने लगे । यह भारतीय समाज की विशिष्टता है कि रेल-यात्राओं के दौरान जब दो अपरिचित जन आसपास बैठे हों तो वे अधिक देर तक चुपचाप नहीं रहते और किसी भी बहाने परस्पर वार्तालाप पर उतर आते हैं । अपने देश के अभिजात वर्ग में पाश्चात्य समाजों की भांति ऐसा कम ही देखने को मिलता है । हमारे शहरी जीवन में लोग अब इस मामले में अभिजात बनते जा रहे हैं । अस्तु ।

उन सज्जन से मेरी बातचीत का सिलसिला अंगरेजी में आंरभ हुआ । जब मैंने अपने शहर और गंतव्य के बारे में बताया तो वे अंगरेजी से हिंदी पर उतर आये । इधर हिन्दी तो चलती नहीं होगी अपनी इस धारणा को उनके समक्ष रखते हुए मैंने उनकी हिन्दी पर आश्चर्य व्यक्त किया । लगे हाथ उनकी यात्रा संबंधी अन्य बातें भी उनसे जाननी चाहीं ।

उन्होंने मुझे बताया कि वे केरला के रहने वाले हैं और अपने कारोबार के सिलसिले में गुवाहाटी के लिए निकले हैं । बातचीत से पता चला कि उन्हें कारोबार के सिलसिले में आसाम तक के कई राज्यों में जाना होता है । उनका कहना था कि इन सभी जगहों पर कारोबारी बातें अंगरेजी के बदले हिन्दी में करना आसान होता है । सभी प्रकार के लोग मिलते हैं, कई ऐसे भी जो अंगरेजी में ठीक से बात नहीं कर सकते ।

उस समय मैंने उनसे उनके कारोबार के बारे में पूछा या नहीं इसका ध्यान नहीं । मेरे लिए यह समझना अधिक अहम था कि सुदूर दक्षिण के दो पड़ोसी राज्यों, तमिलनाडु और केरला, में   हिन्दी के प्रति एक जैसा रवैया नहीं है । मैं चेन्नै स्टेशन पर यह देख चुका था कि हिन्दी में बात करने पर अधिकांश रेलवे कर्मचारियों के चेहरों पर तिरस्कार के भाव उभर आते हैं । मैंने उनको बताया कि मैं मद्रास पहली बार आया हूं । यहां के हिन्दी-विरोध की बातें मैंने सुन रखी थीं, और इस यात्रा में उसका थोड़ा अनुभव भी हुआ है । मैंने उनके सामने आशंका जताई कि ऐसा विरोध केरला में भी होता होगा ।

उनका उत्तर नहीं में था । उनका कहना था कि केरला के लोग व्यावहारिक सोच रखते हैं । रोजी-रोटी के लिए वे लोग देश के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचते हैं और देश के बाहर भी जाते हैं । वे जानते हंै कि हिन्दी से परहेज करके उन्हें कोई लाभ नहीं होने का ।

मेरा दक्षिण भारत जाना कई बार हो चुका है । हिन्दी को लेकर हर बार मुझे पहले से बेहतर अनुभव हुए हैं । चेन्नई में आज भी हिन्दी अधिक नहीं चलती है, लेकिन उसी राज्य के रामेश्वरम एवं कन्याकुमारी में आपको कोई परेशानी नहीं होती । केरला में हिन्दी के प्रति लोगों का झुकाव है यह बात मुझे एक बार वहां के दो शिक्षकों ने बताई थी जिसका उल्लेख मैंने अपनी अन्य पोस्ट में किया है । इसका मतलब यह नहीं कि वहां हर कोई हिन्दी जानता हो । किसी भाषा का अभ्यास एवं प्रयेाग के पर्याप्त अवसर होने चाहिए जो आम आदमी को नहीं होते । लेकिन विरोध जैसी कोई चीज वहां सामान्यतः नहीं है । – योगेन्द्र जोशी

श्री शशिशेखर जी,

मैंने आपका लेख “हत्‌भागिनी नहीं हमारी हिंदी” (हिन्दुस्तान, सितंबर 8) पढ़ा । उसी के संदर्भ में अपनी टिप्पणी प्रेषित कर रहा हूं । (अपने ब्लॉग https://hinditathaakuchhaur.wordpress.com में भी मैं इसे शामिल कर रहा हूं ।)

प्रथमतः मैं निवेदन करता हूं कि ‘हत्‌भागिनी’ न होकर ‘हतभागिनी’ होना चाहिए था । शब्द हत (मारा गया) है न कि हत् । शीर्षक में यह त्रुटि खलती है; अन्यथा चल सकता था । इस धृष्टता के लिए क्षमा करें ।

देश-विदेश में हिंदी, पर कितनी?

लेख में आप इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिंदी देश-विदेश में विस्तार पा रही है और अधिकाधिक लोग इसे प्रयोग में ले रहे हैं । आपने जिन अनुभवों की बात की है वे कमोवेश सभी को होते हैं, खास तौर पर इंग्लैंड, कनाडा और अमेरिका में । सीधा-सा तथ्य यह है कि जहां कहीं भी पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी/उर्दूभाषी लोग रह रहे हैं, या बस चुके हैं, वहां उनके बीच हिंदी का प्रचलन देखने को मिल जाता है । जब विदेश में अपने देश अथवा भाषाई-सांस्कृतिक दृष्टि से निकटता रखने वाले अन्य देशों के निवासी पहुंचते हैं, तब उनमें परस्पर अपनापन का भाव जगता है यह स्वयं मेरा अनुभव रहा है ।

जब मैं 1983-85 में साउथहैम्पटन (इंग्लैंड) में था तब भारतीयों एवं पाकिस्तानियों से मेरी हिंदी में ही बात होती थी । लंडन के पास साउथहॉल का नजारा कुछ ऐसा हुआ करता था कि वहां पहुंचने पर ‘हम भारत में हैं’ ऐसा लगता था । साउथहैम्पटन में गुजराती दुकानदारों से मैं भारतीय भोजन सामग्री खरीदते समय अक्सर हिंदी में बात करता था । आरंभ में मैं एक पाकिस्तानी खान साहब के मकान में रहा, उनसे हिंदी में बात होती थी । बाद में किसी पंजाबी सज्जन के मकान में रहा जिसके पड़ोस में पंजाबी परिवार रहता था । उस परिवार की हिंदी-पंजाबी बोलने वाली महिला से मेरी पत्नी के अच्छे ताल्लुकात हो चले थे । मुझे एक पाकिस्तानी महोदय की याद है जिन्होंने कहा था, “आप लोग हिंदी बोलने की बात करते हैं, क्या यही हिंदी है, उर्दू जैसी ?”

उन दिनों भारत सरकार हवाई अड्डे पर मात्र 12-13 पौंड की रकम देती थी । मैं जब साउथहैम्पटन पहुंचा तो पता चला कि उस दिन सार्वजनिक छुट्टी है । उसके तथा विदेश यात्रा का पूर्ववर्ती अनुभव न होने के कारण तब मुझे काफी परेशानी झेलनी पड़ी थी । उस दिन एक बांग्लादेशी मूल के रेस्तरांवाले ने मुझे मुफ्त में भोजन कराया था ।

अमेरिका (सिलिकॉन वैली) में भी मेरे अनुभव कुछ मिलते-जुलते रहे । मेरे बेटे के हिंदुस्तानी साथियों के बीच हिंदी-अंगरेजी में वार्तालाप सामान्य बात होती थी । वहां बसे उसके एक मित्र के 5-7 साल के बच्चों को हिंदी में बोलते देख मुझे आश्चर्य हुआ । पता चला कि वे गरमियों में भारत आकर दादा-दादी के पास ठहरते हैं और हिंदी सीखते हैं ।

कहने का मतलब है कि दुनिया के जिन हिस्सों में पर्याप्त संख्या में हिंदीभाषी मूल के लोग हैं वहां वे प्रायः आपका स्वागत करेंगे और हिंदी बोलते हुए भी दिख जाएंगे ।

मुझे पता चला कि कैलिफोर्निया में कुछ प्राथमिक विद्यालयों में चीनी भाषा भी पढ़ाई जाती है । संप्रति अमेरिका में यह सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा है । वहां कई चीनी/कोरियाई मूल के लोगों की दुकानों पर नामपट्ट तक संबंधित लिपि में देखने को मिलते हैं । वहां के एक ‘कंडक्टेड टूअर’ का अनुभव मुझे याद है जिसका गाइड ताइवान मूल का युवक था, जिसने अपनी कमजोर अंगरेजी एवं मजबूत चीनी भाषा में पर्यटक स्थलों का परिचय कराया था । साथ में उपलब्ध पाठ्यसामग्री चीनी एवं अंगरेजी, दोनों में, थी । इस माने में हिंदी एकदम पीछे है ।

आपके-मेरे सरीखे अनुभव संतोष करने के लिए काफी नहीं हैं ऐसा मेरा मानना है । आपने इन दो बातों पर खास कुछ नहीं कहा:

(1) पहला, जो हिंदी अब पढ़ेलिखे लोगों के बीच जड़ें जमा रही है वह दरअसल हिंदी-अंगरेजी का मिश्रण है, और

(2) दूसरा, लिखित रूप में हिंदी की प्रगति निराशाप्रद ही है ।

हिंदी-अंगरेजी मिश्रभाषा

(1) जिस प्रकार यह देश ‘इंडिया’ तथा ‘भारत’ में बंटा है वैसे ही हिंदी (और कदाचित अन्य भारतीय भाषाएं) भी दो श्रेणियों में बंटी है । पहली को मैं व्यक्तिगत तौर पर मैट्रोहिंदी कहता हूं । इसे आप ‘महानगरीय हिंदी’, ‘एंग्लिसाइज्ड हिंदी’, ‘एंग्लोहिंदी’, अथवा ‘हिंदी-इंग्लिश मिश्रभाषा’ या कुछ और नाम दे सकते हैं । यह उन लोगों की भाषा है जो इस देश को ‘भारत’ नहीं कहते बल्कि ‘इंडिया’ कहते हैं । आप बताइए कितने पढ़ेलिखे लोगों के मुख से भारत शब्द निकलता है ? यह उस देश के हाल हैं जहां लोग मुंबई, चेन्नई, पुणे, पश्चिमबंग, ओडिशा, आदि नामों के लिए अभियान चलाते हैं, लेकिन देश को इंडिया कहना पसंद करते हैं । यह उन शिक्षित लोगों की भाषा है जो अंगरेजी के इस कदर आादी हो चुके हैं कि उन्हें समुचित हिंदी शब्द सूझते ही नहीं अथवा उन्हें याद नहीं आते हैं । आज स्थिति यह है कि ‘एंड’, ‘बट’, ‘ऑलरेडी’ आदि शब्द जुबान पर तैरते रहते हैं । कुछ लोग शारीरिक अंगों, ‘किड्नी’, ‘लिवर’, ‘मशल’ आदि और ‘ग्रे’, ‘मरून’ आदि जैसे रंगों की हिंदी बताने में भी असमर्थ पाये जाएंगे । हिंदी की गिनतियां अब जुबान पर कम ही आती हैं । कितने उदाहरण दें ? इस भाषा में अंगरेजी शब्द ही नहीं, वाक्यांश या पूरे वाक्य भी शामिल रहते हैं । पर्याप्त अंगरेजी न जानने वाले की समझ से परे ‘कम्यूनिके’, ‘कॉर्डन-आफ’, ‘सेफ्टी मेजर्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग आम हो चला है । यह सब हो रहा है इस कुतर्क के साथ कि इससे हमारी हिंदी समृद्ध होती है । लेकिन अंगरेजी की शुद्धता के लिए वे पूर्णतः सचेत रहते हैं । उसको भी समृद्ध क्यों नहीं बनाते ?

AmarUjala - Mixed Scripts

दूसरी तरफ हमारी ‘देसी’ हिंदी है जो ग्रामीणों, अशिक्षितों/अल्पशिक्षितों, श्रमिकों आदि के द्वारा बोली जाती है, जिनका अंगरेजी ज्ञान अपर्यााप्त रहता है । उस हिंदी की बात होती ही कहां है ?

यह ठीक है कि अभी उक्त मिश्रभाषा का प्रयोग साहित्यिक कृतियों में नहीं हो रहा है, लेकिन टीवी चैनलों पर तो यही अब जगह पा रही है । विज्ञापनों की भाषा भी यही बन रही है । दिलचस्प तो यह है कि इस भाषा की लिपि भी देवनागरी एवं रोमन का मिश्रण देखने को मिल रहा है । इंटरनेट पर रोमन में लिपिबद्ध हिंदी खुलकर इस्तेमाल हो रही है, जब कि फोनेटिक की-बोर्ड के साथ यूनिकोड में टाइप करना कठिन नहीं होता ।

आशाप्रद नहीं लिखित हिंदी की स्थिति

(2) निःसंदेह हिंदी – अंगरेजी मिश्रित ही सही – एक बोली के रूप में विस्तार पा रही है । लेकिन लिखित तौर पर इसका इस्तेमान कितना हो रहा है ? एक ओर सरकारें इसे संघ की राजभाषा कहती हैं अैर दूसरी ओर वही इससे परहेज रखती हैं । ऐसे में अधिक उम्मीद कैसे की जा सकती है ? लोग बातें तो हिंदी में करते हैं, लेकिन लिखित में कुछ बताना हो तो अंगरेजी पर उतर आते हैं । डॉक्टर मरीज से हिंदी में करता है किंतु नुसखा अंगरेजी में ही लिखता है, इस बात की परवाह किए बिना कि मरीज उसे समझ पाएगा या नहीं । लिफाफे पर पता, रेलवे आरक्षण फॉर्म, बैंक लेनदेन का फॉर्म, इत्यादि वे अंगरेजी में ही भरते हैं, अगर वे अल्पशिक्षित न हों तो । कितनी सरकारी संस्थाएं आप गिना सकते हैं जिनकी वेबसाइटें हिंदी में हैं; अगर कहीं हैं तो अधकचरे । इंटरनेट पर कितने फार्म हैं जिन्हें देवनागरी में भरने का विकल्प उपलब्ध हो ? रेलवे आरक्षण टिकट हों या बिजली/टेलीफोन बिल उनकी प्रविष्टियां अंगरेजी में ही मिलेंगी ! जिस देश की सर्वोच्च अदालत ‘नो हिंदी’ कहे, यूपीएससी जैसी संस्था ‘अंगरेजी कंपल्सरी’ कहे, वहां हिंदी का भविष्य कैसा होगा सोचा जा सकता है ।

देश की व्यावसायिक संस्थाओं ने तो जैसे कसम खा रखी है कि वे हिंदी हरगिज नहीं चलने देंगे । बाजार में उपलब्ध उपभोक्ता सामग्री के बारे में कितनी संस्थाएं हिंदी-देवनागरी में जानकारी देती हैं ? बिस्किट पैकेट हो या टूथपेस्ट या अन्य उत्पाद उन पर हिंदी दिख जाए तो अहोभाग्य । कंप्यूटर संबंधी उपस्करों के साथ उपलब्ध जानकारी वियतनामी, थाई, हिब्रू, आदि में मिल जाएगी, लेकिन भारतीय भाषाओं में नहीं । हिंदीभाषी क्षेत्रों के दिल्ली या अन्य बड़े शहरों में घूम जाइए, आपको हिंदी में शायद ही कहीं नामपट्ट दिखें ।

इस बात से आप अगर संतुष्ट हों कि अब अधिक लोग हिंदी बोल रहे हैं, भले ही उसे विकृत कर रहे हों, और उसे न लिखने की कसम खाए हों तो खुशकिस्मत हैं । लेकिन मुझे इसमें संतोष की गुंजाइश नहीं दिखती ।

भवदीय,

योगेन्द्र जोशी

मुझे अपने ‘भारत महान्’ की बात समझ में नहीं आती है । महान् तो कह दिया लेकिन किस तारीफ में ? भ्रष्टाचार में अव्वल होने पर ? राजनैतिक बेहयाई पर ? लोगों की संवेदनहीनता पर ? उनकी स्वार्थपरता पर ?या फिर समाज में व्याप्त कुंठा अथवा हीन भावना पर, जिसके तहत हर विदेशी चीज को इस देश ने श्रेष्ठतर मानने और उन्हें अपनाने का व्रत पाल रखा है , जिसका नतीजा भारतीय भाषाओं के हालात के तौर हम देखते हैं ।

चार-छः दिन पहले मुझे एक ई-मेल के माध्यम से इस ऐसी वेबसाइट का पता मिला,
(http://media.bloomberg.com/bb/avfile/roQIgEa4jm3w)
इसमें उन देशों की सूची दी गयी है जहां अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाएं भी व्यावसायिक कार्यों में प्रयुक्त होती है । उस पर आधारित इस जानकारी पर गौर करें:

व्यावसायिक भाषाएं

अरबी (Arabic) 25 करीब करोड़ (23)
इतालवी (Italian) करीब 6 करोड़ (4)
कोरियाई (Korean) करीब 7 करोड़ (1)
चीनी मैंडरिन (Chinese Mandarin) 100 करोड़ से अधिक (1)
जर्मन (German) 12-13 करोड़ (6)
जापानी (Japanese) 12-13 करोड़ (1)
तुर्की (Turkish) 6-7 करोड़ (1)
पुर्तगाली (Portuguese) करीब 20 करोड़ (8)
फ्रांसीसी (French) 12-13 करोड़ (27)
रूसी (Russian) 25-26 करोड़ (4)
स्पेनी (Spanish) करीब 40 करोड़ (20)

नोटः- संबंधित भाषा के नाम के आगे उसे बोलने/समझने वालों की अनुमानित संख्या दी गयी है । पंक्ति के अंत के कोष्ठकों में उन देशों की संख्या है जहां भाषा को आधिकारिक होने का दर्जा प्राप्त है ।

अंग्रेजी

इस बात पर ध्यान दें कि विश्व में उन लोगों की संख्या 40 करोड़ के लगभग आंकी जाती है जिनकी प्रथम भाषा अंग्रेजी है । किसी-किसी वेबसाइट पर इसे करीब 50 करोड़ भी बताया गया है, जिसमें हिंदुस्तान के 9-10 करोड़ ‘अंग्रेजीभाषी’शामिल हैं ।

मैंने तत्संबंधित जानकारी विकीपीडिआ, एवं नेशनमास्टर, और विस्टावाइड वेबसाइटों से जुटाई ।  यों अंतरजाल पर तमाम अन्य साइटें मिल जाएंगी । हिंदुस्तान से जुड़ी जानकारी मुझे अविश्वसनीय लगती है । निःसंदेह इस देश में अंग्रेजी समझने और कुछ हद तक पढ़-लिख सकने वाले काफी हैं, लेकिन फिर भी वह संख्या 10 करोड़ पहुंचती होगी इसमें शंका है । दुनिया में अन्य स्थानों पर भी अंग्रेजी जानने वाले हैं, परंतु उनकी संख्या का भरोसेमंद आंकड़ा मुझे खोजे नहीं मिला । अधिकांश देशों में यह संख्या काफी कम है, जैसे चीन, जापान एवं कोरिया । वैसे सच बात यह है कि उत्तरी अमेरिका, पश्चिमी यूरोप, तथा ब्रितानी उपनिवेश रह चुके विश्व के देशों को छोड़कर अन्यत्र अंग्रेजी जानने वाले आपको बहुत कम मिलेंगे । कुल मिलाकर अंग्रेजी चीनी मैंडरिन से पर्याप्त पीछे है । यह बात अलग है कि हिंदुस्तानियों में यह भ्रम व्याप्त है कि अंग्रेजी तो सर्वत्र बखूबी चलती है । कौन समझाये उन्हें ? कौन तोड़े लोगों के भ्रम को ।

भारतीयों, बेहतर होगा इंडियनों कहना, को यह समझना चाहिए कि अंग्रेजी अंतरराष्ट्रीय केवल इस अर्थ में है कि अंतरराष्ट्रीय प्रकृति के कारोबार में प्रायः अंग्रेजी इस्तेमाल होती है, जैसे हवाई यात्राओं की व्यवस्था में, आयात-निर्यात के कार्य में, और वैश्विक महत्ता के मुद्दों की जानकारी लेने-देने आदि में । परंतु अंग्रेजी के अंतरराष्ट्रीय होने का अर्थ यह हरगिज नहीं कि दुनिया के देशों के आंतरिक कामकाज में भी अंग्रेजी ही चलती है । आपने कभी गौर किया है कि जापानी शेयर-मार्केट के प्रदर्शन-पट्टों पर जापानी दिखती है, न कि अंग्रेजी । आपके लिए वहां के आम रेस्तरां में चाय-नास्ते का आर्डर देना भी कठिन हो सकता है, रोजमर्रा का आम निबटाना तो दूर की बात । तथ्य यह है कि चीन, जापान, ब्राजील, अर्जेन्टिना में समस्त आंतरिक व्यावसायिक गतिविधियां अपनी-अपनी भाषाओं में होता है । लेकिन इन बातों को इंडियनों को कौन समझाए ?

चीनी मेंडरिन

चीनी मैंडरिन राजधानी बीजिंग शहर के आसपास की चीनी भाषा पर आधारित और सरलीकृत है, जिसमें आधिकारिक कार्य संपन्न होते हैं । यह कम ही लोग जानते होंगे कि चीन में सर्वत्र चीनी भाषा एक जैसी नहीं बोली जाती है, लेकिन लिपि और लिखित चिह्न के अर्थ सर्वत्र एक होने से दस्तावेज सर्वत्र सरलता से पढ़े-समझे जा सकते हैं । अगर भारत में सर्वत्र देवनागरी स्वीकारी जाती, तो हिंदी के दस्तावेज पढ़ पाना और कुछ हद तक उन्हें समझ पाना अधिकतर लोगों के लिए संभव होता, कदाचित्‌ दक्षिण भारतीयों को छोड़कर । राजनैतिक कारणों से ऐसा किया नहीं गया ।

गौर करें कि किसी भी भारतीय भाषा का नाम ऊपर दी गयी सूची में नहीं है, राजभाषा का खिताब पाई हिंदी भी नहीं, जब कि यहां की कई भारतीय भाषाओं के जानने वालों की संख्या कोरियाई, तुर्की तथा अन्य भाषाओं के ज्ञाताओं से अधिक है । हिंदी जानने वालों की संख्या 50 करोड़ से अधिक आंकी जाती है, क्योंकि हिंदीभाषी क्षेत्रों की जनसंख्या ही स्वयं में बहुत है । जहां तक बोलने-समझने वालों की बात है, अन्य भारतीयों एवं पाकिस्तानियों को मिलाकर यह संख्या 65 करोड़ को पार कर जाती है । दुनिया की सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषाओं में दूसरे, तीसरे अथवा चौथे क्रम (इस संदर्भ में मतैक्य नहीं लगता) पर होने के बावजूद भी इस भाषा को व्यावसायिक क्षेत्र में दस्तावेजी स्तर पर कोई अहमियत नहीं मिली है । मौखिक कारोबार इस देश में हिंदी बोलकर बहुत होता है; बिना उसके कइयों का काम ही न चले । किंतु व्यवसायीगण दस्तावेजी स्तर पर अंग्रेजी पर ही उतरते हैं । अजीब हाल हैं देश के कि बोलें हिंदी लिखें अंग्रेजी !

चीन की हालिया आर्थिक प्रगति और वैश्विक राजनीति में उसकी बढ़ती अहमियत के चलते मैंडरिन का महत्व तेजी से बढ़ रहा है । चंद रोज पहले अंतरजाल के एक लेख में मुझे डेविड ग्रैडल (David Graddol) नामक विशेषज्ञ का यह कथन पढ़ने को मिलाः
“… other languages such as Spanish, Arabic, Hindi/Urdu and Chinese are growing faster than English. The populations who use these languages are younger and have greater potential for economic expansion…”

हिंदी की दशा

‘हमारी राजभाषा’ ‘हमारी राजभाषा’ रटने में हमारी सरकारें पीछे नहीं रहती हैं, और १४ सितंबर के दिन उसके प्रचार-प्रसार एवं प्रयोग पर बहुत-सी बातें कही जाती हैं । (जुबानी जमाखर्च में वे भी नहीं चूकते जिनके मन में विरोध रहता है ।) परंतु व्यावसायिक कार्य में वही सरकारें किसी न किसी बहाने अंग्रेजी का ही दामन थामे रहती हैं । जब सरकारें ही राजभाषा से विरत रहें, तो निजी संस्थाओं से क्या उम्मीद करें । यह हाल तब है जब कि देश का आम आदमी अंग्रेजी न जानता है, न समझता है, सार्थक अभिव्यक्ति तो बहुतों के वश की बात ही नहीं । महज रोमन लिपि से परिचित होना और उसके कुछ शब्द सीख लेना अंग्रेजी जानना नहीं होता है ।

लगता है कि इंडियनों ने अपनी भाषाओं से परहेज की कसम खा रखी है । इसके विपरीत अन्य प्रमुख देशों में अपनी भाषाओं के प्रति लगाव घट नहीं रहा है । जानकारों का मानना है कि भविष्य में चीनी मैंडरिन अंग्रेजी के साथ-साथ, अथवा उसके विकल्प स्वरूप, विश्व की व्यावसायिक भाषा बनने जा रही है । दरअसल मैंडरिन को आगे बढ़ाने में चीन प्रयत्नशील है । इस समय अमेरिका में सर्वाधिक सीखी जा रही भाषा वही है । दो साल पहले मुझे यह देखकर थोड़ा अचरज हुआ कि अमेरिका के सिलिकॉन वैली के कुछ प्राथमिक विद्यालयों में मैंडरिन भी द्वितीय भाषा के तौर पर पढ़ाई जाती है । उस क्षेत्र में चीनी एवं कोरियाई लिपि में सूचनापट्ट देखने को मिल जाएंगे ।

संभव है कि डेविड ग्रैडल का उपर्युक्त कथन सही साबित हो जाये। फिलहाल हिंदी की दशा बदलेगी ऐसा लगता नहीं । उम्मीद जगाने वाली खबरें कम ही सुनने को मिलती हैं । 10 तारीख के अपने अखबार में मुझे यह खबर दिखी:

इसे देखते हुए क्या लगता है आपको ? – योगेन्द्र जोशी

(29 जून, 2009, की पोस्ट के आगे) हिंदी को लेकर दक्षिण भारत, विशेषतः तमिलभाषी क्षेत्र, में आंरभ से ही विरोध रहा । वहां के राजनेताओं का यह दृढ़ मत था कि उन पर हिंदी थोपी जा रही है । उनका दावा था कि हिंदी के राजभाषा के तौर पर स्थापित किये जाने पर शासन-प्रशासन में हिंदीभाषियों का वर्चस्व बढ़ जायेगा और तब अहिंदीभाषी घाटे की स्थिति में आ जायेंगे । इस संदर्भ में यह तथ्य प्रासंगिक है कि विभिन्न भाषाभाषियों की जनसंख्या के हिसाब से देखा जाये तो ब्रिटिश राज के समय प्रशासन में दक्षिण भारतीयों, खासकर तमिलभाषियों, की संख्या अपेक्षतया अधिक रही है । मेरी समझ में यही आता है कि नौकरशाही के प्रति उस क्षेत्र के उच्च-शिक्षित लोगों में अपेक्षतया अधिक रुझान हुआ करता था और अपनी ‘बेहतर’ अंगरेजी के बल पर वे इस संबंध में लाभ की स्थिति में रहते थे । इस विषय पर मैंने कोई गंभीर अध्ययन अभी तक नहीं किया है, किंतु मेरा अनुमान है कि उस काल में नौकरशाही में अहिंदीभाषियों का वर्चस्व अवश्य हुआ करता था । इस वर्चस्व को बनाये रखने के लिए अंगरेजी की अहमियत यथावत् बनाये रखना आवश्यक था ।

हिंदीभाषियों के हावी होने की संभावना की बात किस हद तक सही या गलत थी यह कहना मुश्किल है, क्योंकि संविधान निर्माताओं को संभावित दिक्कतों का एहसास तो निःसंदेह रहा ही होगा । उसके समाधान के तौर पर उन्होंने अंगरेजी से हिंदी पर उतरने के लिए 15 वर्ष का समय पर्याप्त समझा । उनके मतानुसार समय के इस अंतराल में लोग कामचलाऊ हिंदी से परिचित हो ही जायेंगे । उस समय समस्या को यदि अत्यंत गंभीर समझा गया होता तो हिंदी को ‘राजभाषा’ का ‘खिताब’ इतनी सरलता से न मिला होता । तब की संविधान बैठक हंगामेदार रही ऐसा उल्लेख मुझे पढ़ने को नहीं मिला । फिर भी तत्कालीन सभी राजनेता पूर्णतः आश्वस्त रहे हों ऐसा नहीं है । इसलिए सांविधानिक प्रावधान के बावजूद हिंदीविरोध के स्वर उठने लगे । स्थिति कहीं अनियंत्रित न होने पावे इस उद्येश्य से सन् 1959 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू को हिंदी का विरोध कर रहे संसद सदस्यों को यह आश्वासन देना पड़ा कि उनके हितों के अनुरूप अंग्रेजी का प्रयोग बतौर राजभाषा के 26 जनवरी, 1965, के बाद भी कायम रहेगा । किंतु यह आश्वासन कदाचित् पर्याप्त नहीं माना गया और फलस्वरूप सातवें दशक के आरंभ में सुदूर दक्षिण में ‘हिंदी हटाओ’ का आंदोलन चल पड़ा । तब प्रतिक्रिया में हिंदीभाषी उत्तर भारत में भी ‘अंग्रेजी हटाओ’ का आंदोलन चला, किंतु वह पूरी तरह विफल रहा । उस आंदोलन से तो खुद हिंदीभाषियों के अंगरेजी मोह में रत्ती भर का असर नहीं पड़ा; अन्य क्षेत्रों के लिए तो वह अर्थहीन था ही । इसके विपरीत हिंदीविरोध का आंदोलन अपने उद्येश्य में सफल रहा, क्योंकि वह हिंदी की स्थिति कमजोर करने वाले अधिनियम का कारण बना । उस आंदोलन के पूर्व संसद में राजभाषा अधिनियम, 1963 पारित किया गया था, जिसे बाद में उक्त आंदोलन के मद्देनजर संशोधित किया गया था (राजभाषा अधिनियम, 1963, यथासंशोधित, 1967; देखें राजभाषा की वेबसाइट http://rajbhasha.nic.in) । दरअसल यह अधिनियम हिंदी के पक्ष को कमजोर करने के लिए काफी रहा है । इसमें कई धाराएं और उपधाराएं हैं । अभी मैं धारा 3 की उपधारा (5) के निहितार्थ की चर्चा करता हूं । उपधारा में कहा गया हैः
कि अंग्रेजी का प्रयोग तब तक जारी रहेगा जब तक… अंग्रेजी भाषा का प्रयोग समाप्त कर देने के लिए ऐसे सभी राज्यों के विधानमंडलों द्वारा, जिन्होंने हिंदी को अपनी राजभाषा के रूप में नहीं अपनाया है, संकल्प पारित नहीं कर दिए जाते और जब तक पूर्वोक्त संकल्पों पर विचार कर लेने के पश्चात् ऐसी समाप्ति के लिए संसद के हर सदन द्वारा संकल्प पारित नहीं किया जाता ।

गौर से पढ़ने पर यह स्पष्ट दिखता है कि अधिनियम अंगरेजी को सदा के लिए राजकाज की भाषा बनाये रखने का निर्णय प्रस्तुत करता है । जो कहा गया है उससे साफ जाहिर होता है कि अंगरेजी केवल तभी छोड़ी जायेगी जब हरेक राज्य की विधान सभा उसे छोड़ने का संकल्प ले लेगी । इस बात का कोई महत्त्व नहीं है कि हिंदी के पक्ष में कितने राज्य हैं । महत्त्व केवल इस बात का है कि अंगरेजी के पक्ष में एकमेव राज्य भी हो तो अंगरेजी चलती ही रहेगी, हिंदी चले या न कोई माने नहीं रखता ।

विश्व का कोई भी लोकतांत्रिक देश या समाज ऐसा नहीं है जहां किसी मुद्दे को लेकर पूर्ण मतैक्य हो । आप कभी भी यह उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि हरेक राज्य अंगरेजी के ऊपर हिंदी को वरीयता देने लगे जब केंद्र की शिक्षा क्षेत्र के लिए बनी त्रिभाषा सूत्र (Three Language Formula) को ही कुछ राज्यों ने अस्वीकार करते हुए हिंदी को न अपनाने की बात कर दी, और दुर्भाग्य से उनका रवैया आज भी वही है, तो ऐसा कैसे सोचा जा सकता है कि सभी राज्य अंगरेजी छोड़ने को तैयार होंगे कभी ?

गंभीरता से विचार करने पर मैंने पाया है कि उक्त अधिनियम कुछ ऐसा है कि इससे अंगरेजी का पक्ष मजबूत होता है और चूंकि वह सदा चलती रहेगी, अतः हिंदी कभी व्यवहार में राजभाषा नहीं बन सकेगी । हिंदी के लिए यह एक ‘उपाधि’ भर रहनी है । तो क्या हमें अंगरेजी को राजभाषा बना लेना चाहिए ?अभी वह राजभाषा घोषित नहीं है, बल्कि हिंदी की सहायक राजकाज की भाषा कही गयी है, अस्थाई किंतु अनिश्चित् काल तक चलने वाली ! अधिनियम की समीक्षा तथा अन्य बातें अगली पोस्टों में जारी रहेंगी । – योगेन्द्र जोशी

(मई 17, 2009 की पोस्ट के आगे) अपने देश की संघीय ‘राजभाषा’ हिंदी एवं विभिन्न प्रदेशों की अपनी-अपनी ‘राज्यभाषाओं’ से संबंधित निर्णय संविधान के भाग 17 के अनुच्छेद 343 से 351 में सम्मिलित किये गये हैं । राजभाषा नीति के अनुसार

“संघ की राजभाषा हिंदी और लिपि देवनागरी है । संघ के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप भारतीय अंकों का अंतरराष्ट्रीय रूप है । {संविधान का अनुच्छेद 343(1)}”

स्वतंत्रता के समय तक देश तथा राज्यों का राजकाज अंगरेजी में चल रहा था । अंगरेजी से मुक्त होकर ‘राजभाषा’ एवं ‘राज्यभाषाओं’ को रातोंरात व्यवहार में ले पाना व्यावहारिक नहीं हो सकता था इस बात को समझ पाना कठिन नहीं है । इसी के मद्देनजर आरंभ में यह निर्णय लिया गया था कि संविधान के लागू होने के 15 वर्षों तक, यानी 26 जनवरी 1965 तक, शासकीय कार्य हिंदी और अंग्रेजी, दोनों, में चलेंगे, और उस अंतराल में प्रयास किये जायेंगे कि हिंदी का प्रसार तथा व्यवहार तेजी से हो, ताकि पूरे देश में राजकीय कार्यों में वह इस्तेमाल होने लगे और अंग्रेजी का प्रयोग समाप्त हो जावे । इस बात पर भी जोर दिया गया था कि अहिंदीभाषी राज्यों की दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए राज्यों की भाषाएं भी आवश्यकतानुसार प्रयोग में ली जावें ।

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विश्व में कोई अन्य देश नहीं होगा जहां अपनी ‘घोषित राजभाषा’ में शपथ लेना एक समाचार बन जाये । मुझे उक्त तथ्य के प्रति लेशमात्र भी शंका नहीं है । अगर मेरी याददास्त धोखा न दे रही हो तो कह सकता हूं कि अपनी नवनिर्वाचित केंद्रीय सरकार के मंत्रिमंडल के 19 मंत्रियों की पहली किश्त में मात्र 4 मंत्रियों ने राजभाषा हिंदी में शपथ ली थी । आज के मंत्रिमंडल विस्तार के समारोह में 59 मंत्रियों ने शपथ ली और समाचार माध्यम बताते हैं कि आज भी अंगरेजी का ही बोलबाला रहा । कदाचित् एक-तिहाई से कम लोगों ने ही हिंदी में शपथ ली थी ।

टेलीविजन पर समारोह का आखों देखा हाल जीवंत प्रसारित हुआ, किंतु मैंने उसे पूरा नहीं देखा । अपने अन्य कार्यों के साथ बीच-बीच में उस पर भी नजर डाल ले रहा था । मेरी दृष्टि में यह बात अधिक रोचक रही है कि अंगरेजी के विकल्प का चुनाव उन सदस्यों के द्वारा भी किया गया था जो अपनी मातृभाषा हिंदी घोषित करते हैं । (यह मेरा निजी अनुमान है उन सदस्यों के बारे में जो उन क्षेत्रों से आते हैं जहां आम जन की भाषा अंग्रेजी न होकर अभी तक हिंदी रही है ।) अहिंदीभाषी प्रदेश महाराष्ट्र के कुछ सदस्यों का हिंदी में शपथ लेना मुझे अधिक प्रभावित कर गया । मुझे सुखद आश्चर्य हुआ ।

मैं समूचे प्रकरण को महत्त्व न देता यदि टीवी चैनल एक बात को पूरे जोर-शोर से प्रसारित न कर रहे होते । वह बात थी मंत्रिमंडल की सबसे कम-उम्र 28-वर्षीय युवा सांसद सुश्री अगाथा संगमा का हिंदी में शपथग्रहण । सुश्री संगमा पूर्वोत्तर भारत से आती हैं और मेरी जानकारी में हिंदी उनकी मातृभाषा नहीं है । उन्होंने अंगरेजी के बदले हिंदी का चुनाव क्यों किया यह वही बता सकती हैं । हो सकता है कि उन्हें संविधान की इस भावना के प्रति सम्मान हो कि हिंदी, न कि अंगरेजी, इस राष्ट्र की घोषित राजभाषा है । अंगरेजी एक अस्थाई सहयोगी राजभाषा के तौर पर ‘कुछ काल’ (अनंत काल?) तक प्रयोग में ली जा सकेगी ऐसा अपना संविधान कहता है । सुश्री संगमा मंत्रिपरिषद् की सर्वाधिक युवा और कदाचित् 30 वर्ष के कम वय की एकमात्र सदस्य होने के नाते आकर्षण का केंद्र तो बनी हुयी थीं ही, हिंदी में शपथग्रहण ने उन्हें और भी चर्चा का विषय बना दिया । याहू-जागरण ने अपने समाचार में ‘अगाथा ने आज सधी हुई हिंदी में शपथ ली ।’ वाक्य ही लिख दिया ।

हिंदी में शपथ ? यह तो वाकई में एक समाचार है, गोया कि शपथ भारत में नहीं अमेरिका में ली जा रही हो ।

सुश्री संगमा के ठीक विपरीत रवैया रहा कानपुर से चुनकर पहुंचे श्रीमान श्रीप्रकाश जायसवाल का जिन्होंने अंगरेजी में शपथ ली । कोई गुनाह तो नहीं किया न ? लेकिन उनका हिंदी में शपथ न लेना भी समाचार बन गया । एक टीवी चैनल पर पर्दे के शीर्ष पर रह-रह कर यह समाचार प्रकट हो रहा था कि संगमा ने हिंदी में और जायसवाल ने अंगरेजी में शपथ ली । कुछ ऐसा हो गया जो अकल्पनीय था, असामान्य था, अप्रत्याशित था !

हमारे संविधान निर्माताओं ने स्वराज पाने पर स्वदेशी की भावना से प्रेरित होकर भारत की सर्वाधिक बोली-समझी जाने वाली भाषा हिंदी को राजभाषा की उपाधि दे डाली । लगता है कि उन्हें इस बात का तनिक भी अनुमान नहीं रहा होगा कि उनका स्वदेशी का जोश अधिक दिन नहीं टिकेगा । आने वाली पीढ़ियां अंगरेजी को वरीयता के आधार पर चुनेंगी यह उन्होंने सोचा ही नहीं होगा । उन्हें थोड़ा भी अंदाजा होता तो वे अंगरेजी को ही राजभाषा घोषित करते । जब अंगरेजी ही बतौर राजभाषा पिछले करीब साठ सालों से चल रही है और, जैसा लगता है, आगे भी यथावत् चलती रहेगी, तब राजभाषा हिंदी की जरूरत ही क्या है भला ? लेकिन जो गलती वे कर बैठे उसका सुधार अब लगता है संभव नहीं । सो राजभाषा तो हिंदी ही रहेगी, बिल्कुल रहेगी क्योंकि संविधान में ऐसा लिख गया है, लेकिन कार्य सर्वत्र अंगरेजी में ही होंगे । ऐसे में कोई मंत्री हिंदी में शपथ ले तो यह बात समाचार तो बनेगा ही न ? खासकर जब वह व्यक्ति अहिंदीभाषी हो जैसे सुश्री संगमा, जिनसे हिंदी की उम्मीद नहीं की जा सकती । क्या उन्हें कहीं धोखा तो नहीं हुआ होगा इस बात को लेकर कि शपथ संविधान-सम्मत राजभाषा में ही लेना चाहिए ? देखिए भविष्य में वे सुधार करती हैं कि नहीं । – योगेन्द्र