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प्रायः सब सभी भारतीयों को यह भ्रम है कि दुनिया में अंग्रेजी सर्वत्र चलती है। ऐसा वस्तुतः है नहीं। चीन, जापान, कोरिया एवं लैटिन अमेरिकी (दक्षिण अमेरिकी) आदि देशों में अंग्रेजी के प्रति लोगों का उतना मोह देखने को नहीं मिलता जितना अपने देश भारत में। प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी कनाडा के फ़्रांसीसी-भाषी क्यूबेक प्रांत में स्थिति भारत की जैसी नहीं है। दुर्भाग्य है कि दुराग्रह से ग्रस्त व्यक्ति वास्तविकता को भी नकार देता है। अपने लगभग सात सप्ताह के कनाडा प्रवास के दौरान अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषा को लेकर जो मैंने अनुभव किया उसे पाठकों के साथ इस लेखमाला के माध्यम से साझा कर रहा हूं।

 

विगत ग्रीष्मकाल के दौरान लगभग 7 सप्ताह के अपने कनाडा प्रवास के दौरान मुझे अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी भाषाओं को लेकर जो अनुभव हुआ उस पर आधारित एक परिचयात्मक लेख मैंने पहली जनवरी की प्रविष्टि (पोस्ट) में प्रस्तुत किया था। तीन लेखों की अपनी लेखमाला में मैंने यह बताने का प्रयास किया है कि अंगरेजी की वैश्विक व्यापकता को लेकर भारतीयों में जो भ्रांति व्याप्त है वह वास्तविक जानकारी पर आधारित नहीं है। इस दूसरे लेख में मॉंट्रियाल शहर में फ़्रांसीसी भाषा को लेकर मेरे देखने में जो कुछ आया उसका संक्षिप्त विवरण कुछ तस्वीरों के माध्यम से मैं यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

कनाडा की कुल आबादी (करीब 3.6 करोड़) का लगभग 25% फ़्रेंच यानी फ़्रांसीसी भाषाभाषी है। प्रायः सभी फ़्रांसीसी-भाषी राजकाज की आधिकारिक भाषा फ़ेंच वाले क्यूबेक प्रांत में रहते हैं – लगभग 82 लाख अकेले क्यूबेक (Quebec) प्रांत में और शेष करीब 3 लाख अति छोटे प्रांतों (न्यू ब्रुंसविक New Brunswick, मनिटोबा Manitoba, नोवा स्कोटिया Nova Scotia में, और छिटपुट तौर पर अन्यत्र रहते हैं। शेष कनाडा में अंग्रेजी प्रचलन में है। राष्ट्र के स्तर पर कनाडा की राजकाज की आधिकारिक भाषाएं अंग्रेजी एवं फ़्रांसीसी, दोनों, हैं।

क्यूबेक प्रांत का सबसे बड़ा शहर मॉंट्रियाल (Montreal, आबादी करीब 38 लाख) है। यह ऑंटारियो प्रांत के टोरंटो (Toronto, आबादी करीब 56 लाख) शहर के बाद कनाडा का दूसरा सबसे बड़ा शहर है। एक पर्यटक के तौर पर मैं अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मॉंट्रियाल गया। पर्यटन की दृष्टि से वहां बहुत कुछ दर्शनीय उपलब्ध है। उस सब का ब्योरा प्रस्तुत करना मेरा मकसद नहीं है। पर्यटन के दौरान दर्शनीय स्थानों पर घुमते-फिरते फ़्रांसीसी भाषा को लेकर वहां जो कुछ मुझे देखने को मिला उस को मैंने अपने स्मृति-पटल एवं कैमरा में संचित करने का प्रयास किया। हर बात चित्रों में अंकित नहीं की जा सकती थी, फिर भी बहुत कुछ ऐसा अवश्य था जिसके माध्यम से पाठकों तक यह जानकारी पहुंचाई जा सकती है कि प्रमुखतया अंग्रेजी-भाषी देश होते हुए भी कनाडा के उस क्षेत्र में फ़्रांसीसी का ही बोलबाला है।

खरीद-फ़रोख्त की रसीद

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मॉंट्रियाल में हमने एक स्थान पर “मेट्रो” नामक “फ़ूडमार्ट” से कुछ फल आदि भोज्य सामग्री खरीदी थीं। अन्य स्थल पर “सबवे” नाम के रेस्तरां में भोजन भी किया था। अन्यत्र पॉपकॉर्न का आस्वादन भी किया था। इन स्थानों पर मिले खरीद-फरोख्त की रसीदों की तस्वीर बानगी के तौर पर मैं प्रस्तुत कर रहा हूं। (चित्र में क्यूबेक की दो रसीदों की तस्वीरें भी शामिल हैं।) ध्यान दें कि ये रसीदें फ़्रेंच भाषा में हैं। इनमें क्या लिखा है यह मैं नहीं बता सकता, क्योंकि कहां क्या खरीदा होगा वह ठीक-ठीक अब याद नहीं है। इन रसीदों का उल्लेख यह बताने के लिए मैं कर रहा हूं कि हमारे देश की भांति क्यूबेक प्रांत में रसीदें अंग्रेजी में नहीं मिलती हैं। राज्य की भाषा फ़्रांसीसी होने का मतलब है लेनदेन की लिखापढ़ी भी फ़्रांसीसी में किया जाना। अपने देश में तो सर्वत्र अंग्रेजी में ही रसीदों का प्रचलन है!

मेट्रो स्टेशन

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हम लोगों ने शहर के भीतर एक स्थान से दूसरे तक जाने के लिए “मेट्रो ट्रेन” की सेवा का भी लाभ लिया। मॉन्ट्रियाल के भूमिगत एक स्टेशन पर गाड़ी की प्रतीक्षा के समय वहां पर दीवाल पर प्रदर्शित विज्ञापन अथवा जानकारी पर मेरी दृष्टि पड़ी तो मैंने उसकी तस्वीर कैमरे में कैद कर ली। यहां प्रस्तुत चित्र उसी छायाचित्र की प्रति है। इस प्रकार के प्रदर्शन-पट (डिस्प्ले-बोर्ड) शहर के अन्य स्थलों पर भी देखने मिल जाते हैं। और ये सभी फ़्रांसीसी भाषा में ही रहते हैं; शायद ही कहीं अंग्रेजी में मिलते हों। प्रस्तुत चित्र के बांये ऊपरी कोने पर उस टिकट (या टोकन जैसा कि उसे वहां कहा जाता है) की प्रति को भी मैंने प्रदर्शित किया है जिसको साथ लेकर मैंने आवागमन किया। यह टोकन भी पूरी तरह फ़्रांसीसी में ही है।

मॉन्ट्रियाल ओलम्पिक स्टेडियम टावर

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आज से चालीस वर्ष पूर्व सन्‍ 1976 में मॉन्ट्रियाल में ओलम्पिक खेल आयोजित हुए थे। उस समय वहां क्रीड़ांगनों (स्टेडियमों) और अन्य भवनों का निर्माण किया गया था। उनमें से प्रमुख था “मॉंट्रियाल स्टेडियम टावर” जो स्वयं में 165 मीटर ऊंचा एक तिरछा स्तंभ है जिसके शीर्ष पर शहर का नजारा देखने के लिए चारों ओर चलने-फिरने का स्थान प्राप्य है। साथ में एक रेस्तरां एवं स्मारक-वस्तुओं/उपहारों की दुकान भी है। वहां पहुंचने के लिए लिफ़्ट की व्यवस्था है। हम लोग भी टावर के शीर्ष पर गये थे। वह टावर उस काल की अनूठी भवन-संरचना के लिए विख्यात हुआ था। इस संदर्भ में वहां बड़े-से बोर्ड पर “गिनीज़ बुक ऑफ़ वर्ल्ड रेकॉर्ड्स” द्वारा प्रदत्त प्रमाणपत्र की प्रदर्शित छायाप्रति मेरी नजर में आई जिसे में यहां प्रस्तुत किया है।

वहां प्रदर्शित बोर्ड पर उल्लिखित जानकारी पूर्ण्तया फ़्रेंच भाषा में है। बोर्ड के निचले भाग में दायीं ओर गिनीस-रेकॉर्ड के प्रमाणपत्र की प्रति भी अंकित है जो अंग्रेजी में है, कदाचित इसलिए कि प्रमाणपत्र अंग्रेजी में ही दिए जाते होंगे। चित्र के निचले भाग में बांयी तरफ़ “इनसेट” में एक रंगीन तस्वीर भी शामिल। यह उसी टावर की तस्वीर है। ध्यान दें कि इस टावर के आधार/तले से लगभग सटी-हुई एक अंडाकार भवन-संरचना भी देखने को मिल रही है। 1976 के ओलंपिक खेलों के समय इसके भीतर साइकिल दौड़ के लिए “साइकिल-ट्रैक” (वेलोड्रोम velodrome) बनाया गया था। 1992 में इसे जैविक संग्रहालय के तौर पर इस्तेमाल में ले लिया गया। इस गुंबदाकार भवन के बाहर नाम-पट पर लिखित है “Biodome de Montreal” फ़्रांसीसी में।

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वनस्पति उद्यान, मॉंट्रियाल

मेरी समझ में मॉंट्रियाल का सबसे महत्वपूर्ण पर्यटक एवं दर्शनीय स्थान है वहां का वनस्पति उद्यान (Botanical Garden of Montreal, फ़्रांसीसी में Jardin Botanique de Montreal)। उद्यान के प्रवेश-द्वार के बाहर तीन सूचना-पटों पर फ़्रेंच भाषा में लिखित संकेत देखने को मिलते हैं। उनके आंशिक तस्वीरों को यहां एक साथ प्रस्तुत किया गया है। सूचना-पटों पर क्या लिखा है इसका अनुमान लगाया जा सकता था, किंतु अंग्रेजी में न होने के कारण वे हमारे लिए स्पष्ट नहीं थे।

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प्रवेश-द्वार पर एक सूचना-पट भी प्रदर्शित है जिससे पता चलता है कि इस उद्यान की व्यवस्था मॉंट्रियाल विश्वविद्यालय (Universite de Mntreal) के प्रशासनिक/शैक्षिक नियंत्रण में है। वस्तुतः यह विश्वविद्यालय के “वनस्पति-विज्ञान शोध संस्थान” (Institute de researche en biologie vegetale) का हिस्सा है। ध्यान दें कि फ़्रांसीसी और अंग्रेजी के कई शब्द मिलते-जुलते हैं, इसलिए प्रदर्शित सूचनाएं थोड़ा-बहुत समझ में आ जाती हैं। किंतु विश्वविद्यालय का विभाग होने के बावजूद विविध जानकारियां अंग्रेजी में लिखित नहीं देखने को मिलीं यह मेरे विचार में ध्यानाकर्षक तो है ही हम भारतीयों के लिए विचारणीय भी है। ऐसा लगता है कि विश्वविद्यालय का शिक्षण-माध्यम प्रमुखतया फ़्रांसीसी ही है होगी, भले ही साथ-साथ अंग्रेजी का भी व्यवहार होता हो।

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इस उद्यान का नक्शा भी प्रवेश-द्वार पर देखने को मिलता है लेकिन वह फ़्रांसीसी न जानने वाले के लिए समझ से परे ही कहा जायेगा।

उद्यान का अंतरंग

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उद्यान के अंदर प्रवेश करने पर स्थान-स्थान पर प्रचलित संकेतों और फ़्रांसीसी में लिखित संदेशों के माध्यम से यह बताया गया है कि कहां क्या है और किस ओर प्रवेश-मार्ग और किस ओर निकास-मार्ग हैं।

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उद्यान के भीतर प्रदर्शित सूचना-पटों में से एक की तस्वीर यहां उदाहरण-स्वरूप प्रस्तुत है। मेरे अनुमान में फ़्रांसेसी में लिखित सूचना शायद यह संदेश देती है कि उद्यान के टिकट से प्राप्त धन प्रकृति-संरक्षण में लगाया जाता है।

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एक अन्य सूचना-पट पर लिखित जानकारी से यह प्रतीत होता है कि उद्यान के एक अंग “चीनी उद्यान” (Le jardin de Chine) का इस समय (2015-17) restoration कार्य चल रहा। अतः उद्यान के इस हिस्से का हम दर्शन हम नहीं कर सके।

निष्कर्ष

इस आलेख में शामिल गिने-चुनी तस्वीरों के माध्यम से मैंने पाठकों के समक्ष यह तथ्य रखने का प्रयास किया है कि क्यूबेक में तमाम स्थानों पर केवल फ़्रांसीसी में लिखित जानकारी प्रदर्शित की हुई मिलती है। इसका अर्थ यह है कि अंग्रेजी के प्रति जैसा आकर्षण एवं उत्साह हम भारतीयों में देखने को मिलता है वैसा अन्य बहुत-से देशों में देखने को नहीं मिलता है। अंग्रेजी की गुलामी उन देशों की खासियत है जो अंग्रेजी शासन के अधीन रहे और जहां अंग्रेजी की जड़ें इतनी गहरी बैठ गयीं कि अंग्रेजों से मुक्ति के बाद भी अंग्रेजी से मुक्ति लोगों को नहीं मिली। और अब इस भाषाई गुलामी से मुक्ति के कोई आसार नजर नहीं आते हैं।

अगले आलेख में मेरा प्रयास क्यूबेक शहर में प्राप्त भाषा संबधी अनुभवों का उल्लेख करने का है। क्यूबेक अपने ही नाम वाले प्रांत का दूसरा बड़ा शहर और पर्यटक स्थल है। – योगेन्द्र जोशी

और कुछ तस्वीरें-

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Auroville - Globe

मैं दो-तीन माह पहले पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) घूमने निकला था । पुद्दुचेरी संघीय सरकार द्वारा शासित एक राज्य है, जिसके बारे में मुझे यह जानकारी नहीं थी कि यह वास्तव में दक्षिण भारत में स्थित चार अलग-अलग और छोटे-छोटे भूक्षेत्रों से बनी प्रशासनिक इकाई है, जिनमें पांडिचेरी (293 वर्ग किलोमीटर) नामक स्थान सबसे बड़ा और मुख्यतः शहरी क्षेत्र है । इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी है, अन्यथा यह लगभग चारों तरफ से तमिलनाडु से घिरा है । इस शहर के बाहर ग्रामीण क्षेत्र भी है । इसके अतिरिक्त दक्षिण की ओर कुछ दूरी पर तमिलनाडु से घिरा समुद्र तट स्थित ‘कराईकल’ (160 वर्ग कि.मी.) भी इसका हिस्सा है  । आंध्र के तटीय क्षेत्र में ‘यानम’ (30 वर्ग कि.लो.) और केरला तट पर ‘माहे’ (9 वर्ग कि.मी.) भी इसी राज्य के अंग हैं । ये सभी स्थान कभी फ्रांसीसी प्रभुत्व में होते थे । उसी के अनुरूप इन्हें मिलाकर एक अलग केंद्र शासित राज्य का दर्जा स्वतंत्र भारत में क्यों दिया गया यह मेरी समझ से परे है ।

पुद्दुचेरी यात्रा के विविध अनुभवों में मेरे लिए सबसे अहम रहा है वहां की भाषाई समस्या । यों तो दक्षिण भारत में हिंदी बहुत नहीं चलती है, फिर भी बड़े शहरों एवं पर्यटन स्थलों में हिंदी से अक्सर काम चल जाता है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही रहा है । यहां तक कि चेन्नई में भी आप भाषा को लेकर असहाय नहीं महसूस करेंगे । दक्षिण भारत की यात्राओें के दौरान हिंदी संबंधी अपने अनुभवों पर मैं पहले भी लिख चुका हूं । देखें 14 मई 2009 की तथा उससे पूर्ववर्ती पोस्टें । पुद्दुचेरी तमिलों का प्रदेश है तमिलनाडु की ही भांति । स्थानीय निवासियों का रहन-सहन, खानपान, जीवनशैली, भाषा आदि वैसा ही है जैसा तमिलों का अन्य स्थानों में है । फ्रांसीसियों का उपनिवेश रह चुकने के कारण वहां फ्रांसीसी भाषा-संस्कति का प्रभाव कुछ हद तक देखा जा सकता है । मेरी समझ से उसका कारण प्रमुखतया श्री ऑरोविंदो रहे हैं, जिन्होंने पुद्दुचेरी को अपनी कर्मभूमि चुना और वहीं अपना आश्रम स्थापित किया । श्री ऑरोविंदो फ्रांसीसी भाषा के ज्ञाता थे और फ्रांसीसियों से उनका घनिष्ठ संबंध रहा है, विशेषतः इसलिए कि आश्रम की ‘द मदर’ (मीरा अल्फासा? Mirra Alfassa) फ्रांस से आकर उनसे जुड़ गईं । श्री ऑरोविंदो के विदेशी शिष्यों में फ्रांसीसी लोग ही अधिकांशतः रहे हैं । आज भी उस आश्रम में आने वालों में फ्रांस के लोग ही सर्वाधिक रहते हैं, चाहे वे पर्यटक की हैसियत रखते हों या श्री ऑरोविंदो के अनुयायी होने की ।

पुद्दुचेरी में मुझे हिंदीभाषी अथवा उत्तरभारतीय नहीं दिखे । अवश्य ही उनकी संख्या नगण्य होगी, अतः मेरी नजर में नहीं आये होंगे । सरदार लोगों (सिखों) के बारे में कहा जाता है कि वे देश के हर कोने में मिल जाते हैं । मुझे याद नहीं आ रहा कि वहां किसी पगड़ीधारी सरदारजी को मैंने देखा हो । मारवाड़ी भी अक्सर सभी जगह मिल जाते हैं व्यापारिक गतिविधियों में संलग्न । वहां कहीं कोई रहा हो तो वह वहीं रचबस कर तमिलभाषी हो गया होगा । दक्षिण के अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोग शायद होंगे, किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं सकता ।

वहां कुल मिलाकर दो-तीन लोग मुझे मिले होंगे जो हिंदी/उर्दू बोलना-समझना कर पा रहे थे । एक व्यक्ति मिला था मुझे एक दुकान के बाहर । मैंने उससे अपने गंतव्य एक चौराहे के बारे में पूछा था, इशारों के साथ हिंदी शब्द बोलकर । उसने साफ हिंदी में जवाब दिया । मेरा अनुमान है कि वह नेपाली रहा होगा । एक और सज्जन मिले अन्यत्र जिनसे मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही । हुलिया से मुझे वे मुस्लिम वंधु लगे । मेरा ख्याल है कि दक्षिण के अधिकांश इस्लाम धर्मावलंबी उर्दू की थोड़ी-बहुत समझ रखते हैं ।

मुझे पुद्दुचेरी में भाषाई समस्या का जो अनुभव हुआ वह अन्य प्रमुख नगरों के अनुभव से कुछ भिन्न था । वहां हिंदी से ठीकठाक काम नहीं चल पाता है, और अंगरेजी भी अच्छा काम नहीं देती है । राह चलते मिलने वाले लोग अंगरेजी कम ही बोल पाते हैं ऐसा मुझे लगा । कुछ हद तक अंगरेजी उच्चारण भी एक समस्या रहती है; उनका उच्चारण उत्तरभारतीयों से भिन्न प्रतीत होता है । मैंने अनुभव किया कि पुद्दुचेरी का महत्व आम भारतीयों के लिए शायद नहीं है । वह कोई चर्चित तीर्थस्थल नहीं है और न ही विशेष आकर्षण का पर्यटक स्थल है । अरोविंदो दर्शन में रुचि लेने वाले ही कदाचित् वहां पहुंचते होंगे । इसलिए न हिंदी वहां पहुंच सकी और न ही वहां के बाशिंदों को अंगरेजी की खास जरूरत महसूस हुई होगी । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि तमिलनाडु की राजनीति आंरभ से ही हिंदी विरोध पर टिकी रही है । तमिलनाडु तथा पुद्दुचेरी की राजनीति में कोई अंतर नहीं है । इसके अलावा अंगरेजी सरकारी एवं व्यावयायिक कार्यालयों तक ही सीमित कर रह गई होगी । जब मैं वहां के पर्यटन कार्यालय गया तो अंगरेजी में बात करना भी सुविधाजनक नहीं लगा ।

हिेदीभाषी तथा अन्य उत्तरभारतीय पर्यटकों की संख्या अधिक न होने से वहां के आटोरिक्शा चालकों और फुटकर दुकानदारों को भी हिंदी की जरूरत नहीं शायद नहीं रहती है । इसलिए उनके साथ मैंने इशारों एवं अंगरेजी-हिंदी शब्दों की मदद से काम चलाया था । लेकिन इतना सब होने के बावजूद एक अनुभव दिलचस्प रहा । मैं पुद्दुचेरी शहर से 20-25 किलोमीटर दूर ऑरोविंदो आश्रम से संबद्ध ऑरोविंदो विलेज गया था । वहां के पर्यटक स्थलों में यही कदाचित् सबसे आकर्षक है । वहां मुझे विदेशी पर्यटकों के अलावा देश के अन्य भागों से आए पर्यटक भी मिले । वहां ऑरोविंदो ग्राम के उद्येश्य एवं कार्यक्रमों के बारे में एक कमरे में 10-15 मिनट का वीडियो दिखाया जाता है, जिसकी भाषा दर्शकों की इच्छानुसार तमिल, अंगरेजी अथवा हिंदी चुनी जाती है । जब मेरी मौजूदगी में वीडियो प्रदर्शित किया गया तब मैंने  पाया कि देश के विभिन्न भागों से आए संभ्रांत और सुशिक्षित-से लगने वाले दर्शकों ने अंगरेजी के बदले हिंदी को चुना । स्पष्ट है अधिकतर देशवासियों के लिए हिंदी अधिक सुविधाजनक सिद्ध होती है । उस घटना से यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अंगरेजी में प्रायः सभी लिखित कार्य करने के आदी होने के बावजूद अधिकतर देशवासी उसमें कही गई मौखिक बातें सरलता से नहीं समझ पाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

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