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हिन्दी दिवस, २०१६

आज हिन्दी दिवस है, १४ सितंबर। सन् १९५० से आज तक ६६ वर्षों से हिन्दी दिवस मनाया जा रहा है, एक ही ढर्रे से। कहीं वन-डे प्रोग्राम (यानी एकल-दिवसीय कार्यक्रम), तो कहीं वन-वीक प्रोग्राम (साप्ताहिक कार्यक्रम), और कहीं वन-फ़ोर्टनाइट प्रोग्राम (पाक्षिक कार्यक्रम)। दिवस मनाने का वही बासी पड़ चुका तरीका। उन लोगों के भाषण होंगे जिन्हें व्यक्तिगत तौर पर हिन्दी से कोई लेना-देना नहीं, किंतु जिनके सामने हिन्दी के बाबत कुछ कहने की विवशता आ जाती है। हिन्दी आम जन की भाषा है, देश की संपर्क भाषा है, राष्ट्रीय एकता की निशानी है इत्यादि जुमले वक्ताओं के मुख से प्रायः निसृत होते हैं। हमें हिन्दी का अधिकाधिक प्रयोग करना चाहिए, शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए, आधिकारिक कार्य हिन्दी अथवा क्षेत्रीय भाषाओं में होना चाहिए, इत्यादि सलाह साल-दर-साल दी जाती है। जिन्हें यह सब करना है वे अंगरेजी को यथावत अपनी जगह बनाये रखे हैं।

कथनी एक और कथनी कुछ और। पता नहीं आगामी कितनी दशाब्दियों- शताब्दियों तक पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह सिलसिला चलता रहेगा।

भाषणबाजी के अलावा हिन्दी दिवस मनाने के और भी तरीके प्रचलन में हैं। संस्थाएं निबंध-लेखन, वाद-विवाद, कर्मियों के लिए हिंदी-टंकण आदि की प्रतिस्पर्धाएं भी आयोजित करती हैं और विजेताओं को पुरस्कृत करती हैं। वर्ष में एक बार सितंबर में यह सब ठीक वैसे ही होता है जैसे पावस ऋतु का आना और जाना। सितंबर की समाप्ति होते-होते आकाश से बादल छंट जाते हैं और उसी के साथ तिरोहित होता है हिन्दी के प्रति जागृत अल्पकालिक उत्साह।

जरूरी है क्या हिन्दी दिवस

इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता को मैं आज तक नहीं समझ सका। पता नहीं कितने देशों में तत्सदृश भाषा दिवस मनाये जाते हैं।  देश यथावत चल रहा है। अंगरेजी की अहमियत बढ़ रही है घट नहीं रही। जो कार्य अंगरेजी में होता आया है वह आज भी वैसे ही चल रहा है। हिन्दी एवं अन्य भाषाएं आम बोलचाल तक सीमित होती जा रही हैं। और वे अंगरेजी के साथ खिचड़ी बनती जा रही हैं। अब हालत यह हो रही है कि कई लोगों की हिन्दी बिना अंगरेजी के समझना मुश्किल है। हिन्दी का अंगरेजीकरण बदस्तूर चल रहा है।

तब क्या है इस हिन्दी दिवस की आवश्यकता? किसको हिन्दी के प्रति प्रेरित किया जाना है? जिस देश के लोग खुद मान चुके हैं कि अंगरेजी के बिना देश नहीं चल सकता, प्रगति नहीं कर सकता, सुख-समृद्धि की कुंजी तो अंगरेजी है, इत्यादि उन्हें हिन्दी दिवस की क्या जरूरत?

कभी-कभी हिन्दी को लेकर बहुत कुछ लिख जाने का मन होता है मेरा। जोश चढ़ता है लेकिन उसके स्थायित्व की कमी रहती है और लेखन का तारतम्य अक्सर टूट जाता है। लेख की प्रगति स्वयं की दृष्टि में संतोषप्रद नही रह जाती है। फिर भी हाल में अपने अल्पकालिक कनाडा प्रवास के अंगरेजी बनाम फ़्रांसीसी संबंधी अनुभव को पाठकों से साझा करने का विचार है। उस विषय पर दो-तीन लेख लिखने हैं, किंतु आज नहीं। आज तो अपने अनुभवों को लेकर एक दो टिप्पणियां काफ़ी होगा।

मैं उपदेशात्मक या निर्देशात्मक लेख नहीं लिखता। इस ब्लॉग में हो या मेरे दूसरे ब्लॉगों में अथवा अन्यत्र, मेरा लेखन यथासंभव तथ्यों के उद्घाटन पर केंद्रित रहता है। उनसे जिसको जो निष्कर्ष निकालना हो वह निकाले। क्या करने योग्य है क्या नहीं यह सुधी जन स्वयं सोचें।

एक अनुभव यह भी

शुरुआत मैं कुछ समय पहले अपने अनुभव में आए एक वाकये के उल्लेख के साथ कर रहा हूं। घटना हिन्दी से जुड़ी है और हिन्दी क्षेत्र के लोगों का उसके प्रति क्या रवैया है इसकी एक झलक प्रस्तुत करता है। इस प्रकार की छोटी-मोटी घटनाएं तो रोजमर्रा के जीवन में हम सभी के साथ प्रायः होती रहती हैं, किंतु उन पर सामान्यतः ध्यान नहीं दिया जाता है। अपनी वैज्ञानिक पृष्ठभूमि के कारण मेरी यह “खराब” आदत बन चुकी है कि मैं घटनाओं को गौर से देखता हूं। अपने वैज्ञानिक अनुसंधान के कार्य में यह तो करना ही पड़ता था, अन्य स्थलों पर भी आदत से मजबूर रहता हूं। घटना का विवरण कुछ यों है –

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) परिसर में अवस्थित भारतीय स्टेट बैंक शाखा के अहाते में पासबुक प्रिंट (मुद्रित) करने की एक आटोमैटिक (स्वचालित) मशीन लगी है। ( मैं बीएचयू में ही भौतिकी-शिक्षक था।) उस दिन मैं अपनी और अपने परिवारी जनों के पासबुक लेकर बैंक पहुंचा था। उन पासबुकों पर कोई तीन-एक साल से प्रिंटिग (मुद्रण) नहीं हुई थी, क्योंकि घर पर ही इंटरनेट से बैंक-खातों की जानकारी मिल जाया करती है। किंतु मौका देख विचार आया कि पासबुकें प्रिंट कर ली जाएं। मैं मशीन के पास लगी पंक्ति में शामिल हो गया। अपनी बारी आने पर मैंने पाया कि मेरी अकेली एक पासबुक प्रिंट होने में ही पर्याप्त समय लग रहा है। चूंकि बैंक के ग्राहकसेवा का समय समाप्त हो चला था, अतः उस स्थान की भीड़ छंटने लगी थी। सदाशयता के नाते मैं पंक्ति से बाहर निकल आया यह सोचकर कि जब अन्य जनों का कार्य पूरा हो जाएगा तब फुरसत से अपना कार्य पूरा कर लूंगा।

वह स्वचालित मशीन प्रिंटिंग आरंभ करने से पहले प्रक्रिया संबंधी संदेश ध्वनित रूप में (न कि पर्दे पर लिखित रूप में) प्रदान करती है। उसके पहले ग्राहक को पर्दे पर संदेश मिलता है हिन्दी अथवा अंगरेजी का विकल्प चुनने के बारे में। उपस्थित जन क्या विकल्प चुनते हैं इस पर मैं गौर कर रहा था। मैंने पाया कि हर कोई अंगरेजी का ही विकल्प चुन रहा था। सार्वजनिक स्थल पर यदि ऐसा कुछ घटित हो रहा हो जो मुझे अप्रिय लगे तो मैं टिप्पणी किए बिना प्रायः नहीं रह पाता हूं। मित्र-परिचित मेरे इस स्वभाव को “गंदी आदत” कहते हैं। उक्त अवसर पर सभी को सुनाते हुए मेरे मुंह से निकला, “आप लोग आम तौर पर हिन्दी बोलते हैं, तब यहां पर हिन्दी क्यों नहीं चुन रहे हैं?”

मेरी टिप्पणी सुनना उनके लिए नितांत अप्रत्याशित था। वे प्रश्नभरी निगाह से मेरी ओर देखने लगे। फिर उनमें से एक उच्चशिक्षित एवं संभ्रांत-से लग रहे नौजवान (मेरे अनुमान से बीएचयू में शिक्षक/शोधकर्ता) ने कहा, “हमारी सरकारी व्यवस्था ही ऐसी हो चुकी है कि सर्वत्र अंगरेजी का बोलबाला है। अब तो आदत ही हो चली है अंगरेजी की। तब हिन्दी का प्रयोग न करें तो क्या फर्क पड़ता है?” और उसके बाद देखा कि उन्होंने अंगरेजी का ही विकल्प चुना।

वहां मौजूद अधिकांशतः सभी चुप रहे। कुछ मेरी ओर मुस्कराते हुए देखने लगे, गोया कि मैंने कोई अजीब-सी या बेतुकी बात कही हो। फिर एक अधेड़ – जो हावभाव से बीएचयू के चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी लग रहे थे – की प्रतिक्रिया आई, “अंगरेजी तो सारी दुनिया में चल रही है। तब उसे छोड़ हिन्दी में कार्य करने का क्या फायदा?”

मैंने पहले व्यक्ति को यह समझाने की कोशिश की कि वस्तुस्थिति को बदलने का प्रयास तो हम में से प्रत्येक को ही करना चाहिए, अन्यथा अंगरेजी के वर्चस्व वाली स्थिति यथावत बनी रहेगी। दूसरे व्यक्ति को मैंने यह जताने का प्रयास किया कि दुनिया के अधिकांश देशों में अंगरेजी का प्रयोग रोजमर्रा के जीवन में उतना नहीं होता जितना अपने देश में। वहां अंगरेजी के बिना भी लोग अपना कार्य बखूबी करते हैं। उन्हें अपनी गलतफहमी छोड़नी चाहिए।

अंगरेजी की वैश्विकता का भ्रम

यह घटना दो बातों की ओर संकेत करती हैः (1) पहला यह कि देशवासियों में यह गंभीर भ्रम व्याप्त है कि विश्व में सर्वत्र अंगरेजी में ही कार्य होता है, और (2) दूसरा यह कि जब केंद्र एवं राज्य सरकारें ही अंगरेजी में कार्य करती हैं, उसी को महत्व दे रही हैं, तो आम आदमी क्यों हिन्दी अपनाए ? यह दूसरी बात अधिक गंभीर है, क्योंकि किसी के भ्रम का निवारण करना संभव है, किंतु प्रशासनिक जडत्व दूर करना असंभव-सा है।

ऊपर जिन दो बातों का उल्लेख मैंने किया है वे उक्त अकेली घटना पर आधारित नहीं हैं। अपने विश्वविद्यालयीय जीवन में तथा अन्य मौकों पर लोगों के साथ बातचीत में मुझे उक्त बातों का अनुभव होता रहा है। लोग अपनी धारणा के पक्ष में तर्क-कुतर्क पेश करते हुए भी पाया है।

लोगबाग शायद अब तक यह भूल गये होंगे कि जब चीन के बीजिंग शहर में ओलंपिक खेल आयोजित (2008) हुए थे तो वहां पहली बार सड़कों, क्रीड़ागनों, होटलों तथा अन्य भवनों के नामपट्ट आदि अंगरेजी में भी लिखे गये थे। उसके पहले अंगरेजी में नामपट्ट कहीं-कहीं अपवाद स्वरूप दिखाई देते थे। यह भी याद करें कि कई जगह तो चीनी से अंगरेजी में किए गए अनुवाद हास्यास्पद हो चले थे।

अभी हाल में मेरे एक निकट संबंधी जर्मनी किसी सम्मेलन में गये थे। उन्होंने बताया कि भारतीयों की आम धारणा के विपरीत उन्हें वहां भाषाई समस्या का सामना करना पड़ा, खास तौर पर छोटे-मोटे होटल-रेस्तरां में। ऐसा ही अनुभव मुझे कोई 30 साल पहले पेरिस में हुआ था। जिन लोगों को चीन, जापान, ब्राजील में प्रवास का अनुभव है वे जानते हैं कि वहां अंगरेजी से काम नहीं चलता। यह भी याद करें कि बोफोर्स घोटाले के आरोपी “ओताविओ क्वात्रोची” को अर्जेंटिना देश से सी.बी.आई. प्रत्यर्पण इसलिए नहीं करा पाई कि स्पेनी भाषा में लिखित मामले से संबंद्ध दस्तावेजों का अंगरेजी में अनुवाद कराने में उसको (सी.बी.आई. को) मुश्किल आ रही थी।

उक्त बातों से क्या निष्कर्ष निकलता है?

यही न कि अंगरेजी की विश्व-व्यापकता को लेकर भारतीयों में भ्रम व्याप्त है जिसके चलते वे अंगरेजी को हर स्थल पर हर अवसर पर वरीयता देते हैं। किंतु इस भ्रम से उनको मुक्त करना अतिकठिन असंभव-सा कार्य है, क्योंकि यह भ्रम बरकरार रहे ऐसा प्रयास करने वाले लोग देश में अधिक हैं उनकी तुलना में जो इस भ्रम को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। दुर्भाग्य तो यह है कि हिन्दी के कई पक्षधर स्वयं इसी भ्रम में जी रहे हैं और हिन्दी की बात वे भावनावश करते हैं। अंगरेजी की व्यापकता की बात मिथ्या है इसकी बात वे नहीं करते।

मैकॉले की शिक्षा नीति

वे क्या कारण हैं कि अंगरेजी भारतीय भाषाओं के ऊपर अजेय वर्चस्व पा सकी है और वह यहां के जनमानस पर जादुई तरीके से राज करती आ रही है? जो कारण मेरी समझ में आते हैं उनमें प्रमुख है अंगरेजी हुकूमत की वह नीति जिसे लोग “मैकॉले की शिक्षा नीति” के नाम से जानते हैं। करीब पौने दो सौ साल पहले की उस नीति का सार मैकॉले के अधोलिखित कथन में निहित हैः

“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” – T.B. Macaulay, in support of his Education Policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.

हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे करोड़ों जनों के बीच दुभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि से अंग्रेज हों।” (हिन्दी अनुवाद मेरा)

ब्रिटिश हुकूमत की वह नीति कैसे सफल हुई और उसके चलते कैसे एक सशक्त प्रशासनिक बिरादरी ने इस देश में जड़ें जमाई इसकी चर्चा मैं अगले आलेख में करूंगा।  आपको यह स्वीकरना होगा कि विलायत के शासकों ने इसी जमात की मदद से इस देश पर राज किया था। यही वह तबका था जो स्वयं को अंग्रजों के निकट और आम लोगों से अलग रहने/दिखने का शौक रखता था और आज भी रखता है। इस देश का “इंडियाकरण” इसी सामाजिक वर्ग का अघोषित उद्येश्य रहा है ऐसी मेरी प्रबल धारणा है। और भी बहुत कुछ रहा है। … अभी के लिए लगभग पौने-उन्नीस सौ शब्दों का यह आलेख पर्याप्त है। – योगेन्द्र जोशी

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इस चिट्ठे की पिछली चार प्रविष्टियों में (देखें तारीख 24 अगस्त 2012 की पोस्ट और उसमें उल्लिखित पूर्ववर्ती आलेखों को) मैंने हिंदी-अंगरेजी के मिश्रण से उपजी एक खिचड़ी भाषा की चर्चा की है, जो आज के महानगरों में अंगरेजी पढ़े-लिखे लोगों द्वारा बोली जा रही है । इसे मैंने मेट्रोहिंदी नाम दिया है । जिस किसी ने इस भाषा के बारे मेरे विचारों को इस ब्लॉग पर पढ़ा हो, और सचेत होकर टीवी चैनलों पर समाचारों/बहसों तथा अपने आसपास विविध मुद्दों पर लोगों के वार्तालापों को सुना हो, उसे यह अंदाजा तो लग ही चुका होगा कि किस प्रकार हिंदी-अंगरेजी मिश्रण की एक नयी भाषा/बोली इस देश में विकसित हो रही है । मैं इस स्थल पर शेष बातें इसी भाषा में व्यक्त कर रहा हूं, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो सके । मेट्रोहिंदी में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि अभी तक देवनागरी के माध्यम से प्रायः साफसुथरी हिंदी में अथवा रोमन के साथ अंगरेजी में लिखने की आदत रही है । अतः उक्त कार्य के लिए अपेक्षया अधिक प्रयास करना पड़ेगा ।

मेट्रोहिंदी की खास बात यह है कि इसमें भारत के लिए कोई जगह नहीं । आपको सभी के मुख से इंडिया सुनने को मिलेगा: इंडिया शाइनिंग, चक दे इंडिया, इंडियन टीम, इंडिया मांगे गोल्ड, एटसेटेरा एटसेटेरा । दरअसल पॉलिटिकल इंडिपेंडेंस के बाद इंडिया में इंग्लिश की इंपॉर्टेन्स घटने के बजाय बढ़ती चली गई । इंडिपेंडेंस के लिए जिन लोगों ने स्ट्रगल किया था उन्होंने यह इक्सपेक्ट किया था कि इस कंट्री की अपनी लैंग्वेज होगी और सूनर ऑर लेटर हमारी सभी एक्टीविटीज उसी लैंग्वेज में होंगी । लेकिन उनके ड्रीम्ज धरे ही रह गये ।

इंग्लिश के फेबर में आर्ग्युमेंट्स
इस कंट्री में एक ऐसा सोशल सेक्सन उभरा है जो ऑफिशियल लैंग्वेज हिंदी को यूज करने में बिल्कुल भी इंटरस्टेड न था, न आज है और न कभी होगा । इस सेक्शन के पास इंग्लिश के फेबर में अनेक रैशनल-इर्रैशनल आर्ग्युमेंट्स हैं । चूंकि कंट्री का एड्मिनिस्ट्रेशन इसी के हाथ में सदा से चला आ रहा है, इसलिए हिंदी समेत सभी इंडियन लैंग्वेजेज पर इंग्लिश आज तक हावी बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी । इनके आर्ग्युमेंट्स के इग्जाम्पुल कुछ यों हैं:

1. इंडिया की इंटिग्रिटी के लिए इंग्लिश जरूरी है ।
2. इंग्लिश इज ऐन इंटरनैशनल लैंग्वेज, इसलिए इंग्लिश को प्रमोट किया जाना चाहिए । हर इंडियन को इंग्लिश सीखनी चाहिए ।
3. दुनिया में हर सब्जेक्ट की नॉलेज इंग्लिश में ही अवेलेबल है, इसलिए इंग्लिश के बिना हम दूसरे कंट्रीज से पिछड़ते चले जाएंगे ।
4. साइंस, इंजिनियरिंग, मेडिसिन जैसे सब्जेक्ट्स की टीचिंग और स्टडी इंडियन लैंग्वेजेज में पॉसिबल ही नहीं है ।
5. आज के कंप्यूटर एज में इंटरनेट का यूज इंग्लिश के बिना पॉसिबल नहीं है ।
6. बिजनेस एंड प्रोफेशनल एक्टिविटीज में इंग्लिश इसेंशियल है । इसलिए नौकरी-पेशे में इंग्लिश जरूरी है ।

और भी आर्ग्युमेंट्स इस सोशल सेक्शन के दिमाग में होंगे । अभी में अधिक नहीं सोच पा रहा हूं ।

मेरे ऑब्जर्वेशन्ज
द सिंपल फैक्ट नाव इज कि इंग्लिश हिंदी और अदर लैंग्वेजेज पर हावी है । इंडियन्ज के दिमाग में यह घुस चुका है कि लाइफ में वे इंग्लिश के बिना सक्सेस नहीं पा सकते हैं । मेरे इन ऑब्जर्वेशन्ज पर नजर डालें और सोचिए कि मैं करेक्ट हूं या नहीं:

1. आम इंडियन, जिसे थोड़ी-बहुत इंग्लिश आती है, रिटन फार्म (लिखित रूप) में हिंदी के यूज में इंटरस्टेड नहीं रहता । उसकी प्रिफरेंस इंग्लिश रहती है । किसी रजिस्टर में नाम/सिग्नेचर रिकार्ड करना हो तो वह इंग्लिश (रोमन) का ही यूज करेगा । ऐसा मैं BHU जैसी यूनिवर्सिटी, जहां मैं टीचिंग एंड रिसर्च करता था, में देखता आया हूं ।
2. कहा जाता है कि हिंदी की पॉपुलरिटी में हिंदी सिनेमा का बड़ा कंट्रिब्यूशन रहा है । बट याद रखें वह हिंदी नहीं मेट्रोहिंदी है । यह भी देखिये कि फिल्मों की कास्टिंग वगैरह देवनागरी में रेयरली होती है ।
3. हिंदी सिनेमा में काम करने वाले एक्टर्स वगैरह मोस्टली मेट्रोहिंदी या प्युअर इंग्लिश में बात करते हैं, भले ही वे हिंदी जानते हों । यही बात स्पोटर्समेन पर भी लागू होती है ।
4. इट इज अ फैक्ट कि हिंदी इस कंट्री की ऑफिशियल लैंग्वेज है न कि इंग्लिश, बट प्रैजिडेंट, प्राइम-मिनिस्टर एंड हाई ऑफिशियल्स फॉरेन टुअर्स या UNO में हिंदी नहीं बोलते हैं, यह जानते हुए भी कि हेड्ज ऑव अदर कंट्रीज अपने यहां की ही लैंग्वेज बोलते हैं । अटल बिहारी बाजपाई वज एन इक्सेप्शन ! आइरनी तो यह है कि हिंदी को खुद यूज नहीं करेंगे लेकिन यूएनओ की ऑफिशियल लैंग्वेजेज में इंक्लूड करने की बात करते हैं ।
5. इंडियन बिजनेसमेन एंड कॉमर्शियल हाउसेज तो हिंदी और उसकी स्क्रिप्ट को यूज न करने के लिए डिटर्मिन्ड हैं । इसलिए आप कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स पर रैलिवेंट इंफर्मेशन इंग्लिश में ही प्रिंटेड पाएंगे ।
6. हिंदी-स्पीकिंग हो या न हो, सभी जगह – गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स छोड़ दें – होटल्स, बिल्डिंग्ज, शॅपिंग मॉल्ज, बिजनेस हाउसेज एंड स्कूल-कॉलेज के नाम मोस्टली इंग्लिश में लिखे मिलते हैं ।
7. गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स की बेवसाइट्स इंग्लिश में ही अवेलेबल हैं । कहीं-कहीं उनका हिंदी वर्जन जरूर मिल जाता है, बट ऑनलाइन एक्टिविटी के मामले में इंग्लिश ही यूजुअली काम देती है । फॉर इग्जांपल रेलवे रिजर्वेशन फॉर्म की एंट्रीज इंग्लिश में देनी पड़ती हैं, एंड उसके हिंदी प्रिंट आउट में भी नेम, स्टार्टिंग स्टेशन, डेस्टिनेशन वगैरह रोमन में ही मिलेंगे ।

आई मीन टु से कि गवर्नमेंटल एंड नॉन-गवर्नमेंटल, दोनों लेबल्स पर इंग्लिश की जरूरत फील की जाती है । हिंदी के बिना काम चल सकता है, बट इंग्लिश के बिना नहीं । इसका रिजल्ट यह है कि सभी इंडियन्ज का इंक्लिनेशन इंग्लिश की स्टडी की ओर है । हां बोलचाल के लिए केवल वर्किंग नॉलेज ऑव हिंदी चाहिए, जिसे हिंदी-स्पीकिंग रीजन्ज में लोग बतौर मदरटंग सीख ही लेते हैं । उन्हें काम चलाने के लिए इंप्रेसिव हिंदी-वोकैबुलरी की जरूरत नहीं होती है । बट इंप्रेसिव इंग्लिश-वोकैबुलरी इज ऐन असेट !!

हिंदी का फ्यूचर
मुझे लगता है कि फ्यूचर में प्युअर हिंदी – ऐसी लैंग्वेज जिसमें इंग्लिश वर्ड्स की अन्लिमिटेड मिक्सिंग न हो – केवल लिटरेरी राइटिंग तक सिमट कर रह जाएगी । हाईली-लिटरेट अर्बन पीपल मेट्रोहिंदी ही बोलचाल में यूज करेगा । यहां तक कि हिंदी न्यूजपेपर्स एंड मैगजीन्स में भी मेट्रोहिंदी जगह पा लेगी, जिसका इंडिकेशन उन आर्टिकिल्स एंड ऐड्वरटिजमेंट्स में मिलता है जो आज के यूथ को ऐड्रेस करके लिखे जा रहे हैं । टीवी प्रोग्रैम्ज में तो मेट्रोहिंदी ही दिखती है ।

मैंने जिस सोशल सेक्शन की बात ऊपर कही है उसका इंटरैस्ट प्युअर हिंदी में नहीं है, इसलिए उसकी हिंदी वोकैबुलरी कमजोर रहती है, जिसके चलते हिंदी के बारे उसकी यह ओपीनियन बन जाती है कि हिंदी डिफिकल्ट है । वह कहता है कि उसे हमें सिम्पल बनाना चाहिए और इस पर्पज के लिए इंग्लिश वडर््ज का यूज विदाउट हेजिटेश्न करना चाहिए । ऐसी सिचुएशन में प्युअर हिंदी लिंग्विस्टिक करप्शन से बच पाएगी यह क्वेश्चन इंपॉर्टेन्ट हो जाता है ।

द जिस्ट आव् ह्वट हैज बीन सेड यह है कि हिंदी सर्वाइव करती रहेगी लेकिन अपने इक्सट्रीम्ली करप्ट फॉर्म में । प्युअर हिंदी – चाहे वह लिटरेचर में हो या वेबसाइट पर – को पढ़ने एंड अंडरस्टैंड करने वाले बहुत नहीं रहेंगे । अंगरेजी की सुप्रिमेसी बनी रहेगी, ऐट लीस्ट रिटन फॉर्म में !

जिस लैंग्वेज में मैंने ये आर्टिकल लिखा है उसे आप ऑर्डिनरीली न्यूजपेपर/मैगजीन्स में नहीं देखते होंगे । अभी यह लैंग्वेज बोलचाल में ही सुनने को मिल रही है । बट मेरा मानना है कि फ्यूचर में ऐसे आर्टिकल्स अन्कॉमन नहीं रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

आज (14 सितंबर) हिंदी दिवस है । इस अवसर पर प्रथमतः देशवासियों, विशेषतः हिंदीप्रेमियों, के प्रति शुभेच्छा संदेश देना चाहता हूं ।

असल में आज हिंदी का जन्मदिन है बतौर राजभाषा के । अन्यथ हिंदी भाषा तो सदियों से अस्तित्व में है । आज के दिन 61 साल पहले उसे राजभाषा होने का गौरव मिलाए और इसी अर्थ उसका जन्मदिन है । उसे वैधानिक सम्मान तो मिला, किंतु ‘इंडियन’ प्रशासनिक तंत्र से वह सम्मान नहीं मिला जो राजभाषा घोषित होने पर मिलना चाहिए था । यह कमोबेश वहीं की वहीं है । और रोजमर्रा के जीवन में उसका जितना भी प्रयोग देखने को मिल रहा है, वह राजभाषा के नाते कम है और जनभाषा होने के कारण अधिक है ।
आज हिंदी का सही माने में जन्मदिन है । जैसे जन्मदिन पर उत्सव का माहौल रहता है, संबंधित व्यक्ति को शुभकामनाएं दी जाती हैं, उसके दीर्घायुष्य की कामना की जाती है, इत्यादि, उसी भांति आज हिंदी का गुणगान किया जाता है, उसके पक्ष में बहुत कुछ कहा जाता हैं । उसके बाद सब कुछ सामान्य हो जाता है अगले जन्मदिन तक । जैसे जन्मदिन रोज नहीं मनाया जाता है, उसी प्रकार हिंदी की बात रोज नहीं की जाती है । उसकी शेष चिंता अगले हिंदी दिवस तक भुला दी जाती है । लोग रोज की तरह ‘जन्मदिन’ मनाकर सामान्य जीवनचर्या पर लौट आते हैं ।

आज के बुद्धिजीवियों के द्वारा वार्तापत्रों/पत्रिकाओं में हिंदी को लेकर भांति-भांति के उद्गार व्यक्त किए जाते हैं । मेरे पास प्रातःकाल हिंदी के दो दैनिक समाचारपत्र आते हैं, दैनिक हिन्दुस्तान एवं अमर उजाला । मैंने हिंदी से संबंधित उनमें क्या छपा है, इसे देखना/खोजना आरंभ किया । आज के हिन्दुस्तान समाचारपत्र के संपादकीय पृष्ठ पर छपे एक व्यंगलेख ने मेरा ध्यान सर्वाधिक खींचा । उसमें लिखा थाः

“… आज पूज रहे हैं, दिवस मना रहे हैं । कल एक पुरानी पोथी की तरह कपड़े में लपेटकर ऊंचे पर रख देंगे । …”

यह वाक्य कटु वास्तविकता का बखान करता है, जैसा में पहले ही कह चुका हूं । इसी पर आधारित मैंने इस लेख का भी शीर्षक चुना है ।

इसी पृष्ठ पर 75 साल पहले के समाचार का भी जिक्र देखने को मिला, जिसमें तत्कालीन राजकीय निर्णय का उल्लेख थाः “… सिक्कों पर केवल अंग्रेजी (रोमन) एवं उर्दू (अरबी) लिपि ही रहेंगी ।…” अर्थात् देवनागरी लिपि की तब कोई मान्यता ही नहीं थी ।

उक्त समाचारपत्र के अन्य पृष्ठ पर “हिंदी के आईने में कैसी दिखती है हमारी युवा पीढ़ी” नाम का एक लेख भी पढ़ने को मिला । इसमें महाविद्यालय/विश्वविद्यालय स्तर के छात्रों का हिंदी संबंधी ज्ञान की चर्चा की गयी है । ‘किडनी’ जैसे अंग्रेजी शब्दों, ‘पानी-पानी होना’ जैसे मुहावरों, ‘हजारी प्रसाद द्विवेदी’ जैसे लेखकों आदि के बारे में छात्रों से जानकारी ली गयी थी । कइयों के उत्तर भाषाई स्थिति की भयावहता का दर्शन कराते हैं । उनका ज्ञान नैराश्यजनक है ।

इस समाचारपत्र में एक स्थान पर सिनेमा एवं टीवी क्षेत्र की कुछ हस्तियों के हिंदी संबंधी विचारों का भी उल्लेख किया गया है । देखिए क्या कहा उन लोगों ने
“आवाम से बात हिंदी में होगी” – महमूद फारूकी
“मैं ख्वाब देखूं तो हिंदी में, मैं ख्याल यदि सोचूं तो हिंदी में” – कैलाश खेर
“हिंदी को प्राथमिक और अंग्रेजी को गौण बनाकर चलें” – रिजवान सिद्दीकी
“मैं उसकी काउंसिलिंग करना चाहूंगा जो कहता है हिंदी में करियर नहीं” – खुराफाती नितिन
“हिंदी बढ़ा देती है आपकी पहुंच” – अद्वैत काला
“बिना हिंदी सीखे नहीं चला काम” – कैटरीना कैफ
“हिंदी ने ही मुझे बनाया” – शाहरूख खान
“टीवी में हिंदीभाषियों के लिए मौके ही मौके” – साक्षी तंवर
“हिंदी तरक्की की भाषा है” – प्रकाश झा
“मेरे सपनों की भाषा है हिंदी” – आशुतोष राणा
“अनुवाद से लेकर अभिनय, सबमें हिंदी ने दिया सहारा” – सुशांत सिंह


इन लोगों के उद्गार उनकी वास्तविक सोच का ज्ञान कराती हैं, या ये महज औपचारिकता में बोले गये शब्द हैं यह जान पाना मेरे लिए संभव नहीं । कम ही विश्वास होता है कि वे सब सच बोल रहे होंगे । फिर भी आशुतोष राणा एवं एक-दो अन्य जनों के बारे में सच होगा यह मानता हूं ।

मेरे दूसरे समाचारपत्र अमर उजाला में काफी कम पाठ्य सामग्री मुझे पढ़ने को मिली । उसमें कही गयी एक बात अवश्य आशाप्रद और जमीनी वास्तविकता से जुड़ी लगती है मुझे । लेखक ने श्री अन्ना के हालिया आंदोलन का जिक्र करते हुए इस बात को रेखाकिंत किया है कि अंग्रेजी की जितनी भी वकालत ‘इंडियन’ बुद्धिजीवी करें, हकीकत यह है कि आम आदमी को वांछित संदेश तभी पहुंचता है जब बात जनसामान्य की जुबान में कही जाती है । हिंदी ऐसी सर्वाधिक बोली/समझी जाने वाली जुबान है । यह वह भाषा है जो देश के अधिकांश क्षेत्रों में समझी जाती है । अन्य स्थानों पर भी समझने वाले मिल जाएंगे और उनकी संख्या बढ़ रही है । गैरहिंदीभाषी क्षेत्रों के कई लोग हिंदी कुछ हद तक इसलिए भी समझ लेते हैं कि उनकी अपनी भाषा का हिंदी से काफी हद तक साम्य है, भले ही वे बोल न सकें ।  आसाम, उड़ीसा, गुजरात, महाराष्ट्र ऐसे ही क्षेत्र हैं । अंग्रेजी के संबोधनों और लेखों के पाठक आम आदमी नहीं होते हैं, अतः बातें सीमित दायरे में और आम आदमी की पहुंच से बाहर रह जाती हैं । अन्ना जी का अंग्रेजी ज्ञान नहीं के बराबर है, फिर भी मराठी पुट के साथ हिंदी में कही गयी उनकी बातें जनमानस तकपहुंच सकीं । इस तथ्य को हमारे राजनेता बखूबी जानते हैं । तभी तो वे चुनावी भाषण हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में देते हैं, शायद ही कभी अंग्रेजी में । (एक सवालः अन्ना के बदले अण्णा क्यों नहीं लिखते हिंदी पत्रकार ? मराठी में तो उसकी वर्तनी यही है !)

अमर उजाला के संपादकीय पृष्ठ पर हिंदी के राजभाषा बनाए जाने और 1950 की 14 सितंबर की तारीख पर उसके सांविधानिक मान्यता पाने के बारे में भी संक्षिप्त लेख छपा है । अन्य लेख में नौकरशाही पर उनकी अंग्रेजी-भक्ति पर कटाक्ष भी है । श्री मणिशंकर अय्यर का दृष्टांत देते हुए उनकी अंग्रेजीपरस्त सोच की चर्चा की है । दरअसल इस देश की नौकरशाही ही है जो हिंदी को दस्तावेजी भाषा बनने में अड़ंगा लगाती आ रही है । निराशा तो इस बात को देखकर होती है कि जो युवक हिंदी माध्यम से प्रशासनिक सेवाओं में नियुक्ति पाते हैं वे भी हीन भावना से ग्रस्त होकर शनैःशनैः अंग्रेजियत के रंग में रंग जाते हैं । वे क्या कभी स्वयं को एवं देशवासियों को इस भ्रम से मुक्ति दिला पाएंगे कि विश्व में सर्वत्र अंग्रेजी ही चलती है । इस देश में जैसा अंग्रेजी-मोह देखने को मिलता है वैसा किसी भी प्रमुख देश में देखने को नहीं मिलता है । भ्रमित नौकरशाही को अंग्रेजी की व्यापकता के अज्ञान से मुक्ति मिले यही मेरी प्रार्थना है ।

मुझे दो-चार दिन पहले एक ई-मेल से इंटरनेट लिंक मिला था, जो एक लेख पर मुझे ले गया जिसमें अंग्रेजी से इतर विश्व की उन भाषाओं का जिक्र है जिन्हें व्यावसायिक कार्य में लिया जाता है । भारतीय भाषाओं में से कोई भी दी गयी सूची में शामिल नहीं है । इस बारे दो-चार शब्द लिखने का मेरा विचार था, लेकिन अब उस पर अगले लेख में ही कुछ बोलूंगा । -योगेन्द्र जोशी

 

कुछएक हफ्तों पहले मैंने ‘न्यू साइंटिस्ट’ नामक ब्रितानी विज्ञान पत्रिका में एक लेख पढ़ा । विख्यात न्यूरोसाइंटिस्ट डेविड ईगलमैन (David Eagleman) के इस लेख का शीर्षक था “Beyond God and atheism: Why I am a possibilian”, जिसमें उन्होंने एक नितांत नया शब्द गढ़ा है अपनी दार्शनिक मान्यता को स्पष्ट करने के लिए । (देखें न्यू साइंटिस्ट, 27 सितंबर, 2010, इंटरनेट संस्करण)

अभी शब्दकोष में उनुपलब्ध इस शब्द को सही परिप्रेक्ष में समझने के लिए मानव समाजों में व्याप्त दार्शनिक मान्यताओं की विविधता पर विचार करने की आवश्यकता होगी । आज की दुनिया में कुछ लोग अनीश्वरवादी हैं, जो यह मानते हैं कि यह संसार विशुद्ध रूप से इंद्रियगम्य भौतिक मूल का है, जिसका ईश्वर जैसा कोई स्रष्टा नहीं है (atheism) । यह अपने आप में ‘स्वयंभू’ है । बौद्ध धर्म भी अनीश्वरवाद पर टिका है, किंतु उसमें कर्मवाद है, कर्म ही प्राणियों के जन्ममरण के चक्र का कारण माना गया है । हिंदू समाज में द्वैतवाद और अद्वैतवाद के दर्शनों का जिक्र मिलता है, जो परमात्मा की अवधारणा पर केंद्रित हैं । पाश्चात्य ख्रिस्तीय मतावलंबी ईश्वर को एक सृष्टिकर्ता के रूप में देखते हैं और सृष्टिवाद के पक्षधर हैं (theism)। इसी प्रकार के कई दार्शनिक मत प्रचलन में हैं । सभी मतों में वैचारिक सुदृढ़ता है, ‘ऐसा ही है, वैसा नहीं है’ के असंदिग्ध अपने-अपने मत । यहां मेरा मकसद दार्शनिक मतों की चर्चा करना नहीं है, बल्कि उस पृष्ठभूमि को स्पष्ट करना है जिसमें एक नया शब्द गढ़ा गया ।

डेविड ईगलमैन ने अपने लेख में यह भावना व्यक्त की है कि मनुष्य बहुत कुछ नहीं जानता है । सृष्टि के जिस रहस्य को जान लेने का दावा चिंतकों ने किया है उसे अंतिम रूप से संशय से परे सुस्थापित मानकर चलना नितांत अवैज्ञानिक समझा जाना चाहिए । एक सुलझे हुए वैज्ञानिक के नाते उनका मानना है कि ईश्वर नहीं ही है यह दावा करना उचित नहीं होगा । ईश्वर है ही इसे भी प्रमाणित कोई नहीं कर सका है । अतः ईश्वर के अस्तित्व के बारे में फिलहाल केवल संभावना की बात करना ही उचित होगा, और अपने इस लचीले दार्शनिक विचार को उन्होंने ‘possibilianism‘ नाम दिया है, जिसे उन्होंने possibility शब्द से गढ़ा है । हिंदी में इसे संभावनावाद कहना उचित होगा । इस दर्शन के पक्षधर को possibilian कहा गया है । चूंकि अभी तक ऐसे लचीले दर्शन की व्याख्या एवं उसका प्रचार नहीं हुआ था, अतः यह शब्द पहले अस्तित्व में नहीं आ सका । अस्तु, इस समय

possibilianism = संभावनावाद; ईश्वर के अस्तित्व के बारे में शायद हो और शायद न हो की मिश्रित मान्यता रखना ।

यह शब्द मुश्किल से डेड़-दो वर्ष पुराना है और इसे अभी अंग्रेजी शब्दकोशों में प्रवेश पाना है । हो सकता है किसी ‘वेब डिक्शनरी’ में यह शामिल हो । इंटरनेट खोज में यह शब्द मुझे अधिकांशतः इगलमैन के लेखों/व्याख्यानों एवं एक पुस्तक, Sum: Forty Tales from the Afterlives,  के संदर्भ में ही मिला । विकीपीडिया (http://en.wikipedia.org/wiki/Possibilianism) पर भी कुछ ऐसा ही दिखता है । दिलचस्प यह है कि इस शब्द को लेकर एक वेब साइट भी मेरे नजर में आयी है । (http://www.possibilian.com/)

उपर्युल्लिखित शब्द का परिचय पाने के बाद मुझे जिज्ञासा हुई कि इसी प्रकार हाल में अन्य नये शब्द भी अंग्रेजी में जगह पा रहे हैं क्या ? मेरी दृष्टि में एक वेब साइट (http://www.learn-english-today.com/) आई जिसमें हालिया नये शब्दों की सूची दी गयी थी । इनमें से अधिकांश को आगे सूचीबद्ध किया जा रहा है । ध्यान दें कि जिन शब्दों को मैं अपनी पहुंच के शब्दकोशों में नहीं पा सका उन्हें तारांकित किया गया है । इन शब्दों की रचना पारंपरिक व्याकरण के नियमों के अनुसार की गयी हो ऐसा नहीं है । ये आवश्यकता एवं सुविधा पर आधारित हैं ।

Affluenza = affluence + influenza = अकूत धन-दौलत के लिए अतिश्रम, अंधाधुंध खर्च, कर्ज, बरबादी, तनाव, चिंता, आदि लक्षण वाला सामाजिक रोग

Agritourism = कृषि-फार्मों की सैर एवं उसमें भागीदारी पर आधारित पर्यटन उद्योग

Alcopop = फलों के रस और अल्कोहल के मिश्रण से बना पेयAudiophile =  उच्च गुणवत्ता वाले ध्वनि संसाधनों को संग्रह करने वाला व्यक्ति

Baggravation* = bag + aggravation = हवाई अड्डे पर ‘बैगेज’ को लेकर होने वाली चिंता-असुविधा

Burkini or Burquini* = Burqa + bikini = बुर्का एवं बिकिनी के मेल से बना तैराकी-पोषाक

Buzzword = विशिष्ट व्यावसायिक परिवेश और व्यक्ति समूह के बीच प्रचलित नया शब्द

Captcha = Completely Automated Public Turing Test To Tell Computers and Humans Apart टेड़े-मेढ़े अक्षरों से बना शब्द जिसके द्वारा मानव एवं मशीन में भेद किया जा सके ।

Carjacking = Car + hijacking = कार-अपहरण का कृत्य

Daycation* = Day + vacation = दिन भर बाहर धूमते-फिरते रात्रि घर लौटकर छुट्टी मनाने का तरीका

Decruitment* =  कर्मचारियों की छुट्टी करके कंपनी का कार्मिक आकार घटाना

Docusoap = Documetary + soap (opera) = वृत्तचित्र यानी डॉक्युमेंटरी की तर्ज पर टेलीविजन ‘रियलिटी’ कार्यक्रम

Dramedy* = Drama + comedy = ड्रामा एवं हास्य का मिश्रित चलचित्र

Earworm* = वह धुन जो कानों में निरंतर सुनाई देती है

E-cruitment* = आधुनिक इलेक्ट्रानिक माध्यमों द्वारा आवेदन, चयन एवं नियुक्ति

Emoticon = Emotion + icon = कंप्यूटर संदेशों में प्रयुक्त प्रतिमा-चिह्न

E-stalk* = इंटरनेट खोज माध्यम से किसी का पीछा करना

Fashionista = आधुनिकतम फैशन अपनाने वाला

Flame war = ई-संदेशों द्वारा आरोप-प्रत्यारोपों का वाग्युद्ध

Flash mob = त्वरित गति से जनसमूह का एकत्र होना, घटना को अंजाम देना, और फिर वहां से तुरंत हट जाना

Flexitarian* = Flexible + vegitarian = शाकाहारी जो कभीकभार मांसभक्षण स्वीकार लेता हो

Freemale* = अकेले एवं स्वतंत्र रहना पसंद करने वाली महिला

Flightmare* = Flight + nightmare = हवाई यात्रा का दुःस्वप्नात्मक अनुभव

Funkinetics* = ऊर्जामूलक हवाई कलाबाजी पर आधारित ससंगीत व्यायाम

Gastropub = जिस ‘पब’ में अल्कोहल पेयों के अतिरिक्त स्वादिष्ट व्यंजन भी परोसे जाते हों

Gastrosexuals* = नई पीढ़ी के वे पुरुष जो अपने यौन-मित्रों को अपनी पाककला द्वारा प्रभावित करते हों

Greycation* = Grey + vacation = दादा-दादी/नाना-नानी के साथ कम खर्चे में छुट्टी बिताना

Guesstimate = तर्क एवं तुक्के की खिचड़ी पर आधारित अनुमान

Hoody or hoodie = सिर ढकने वाले ‘हुड’ वाला वस्त्र या उसे धारण करने वाला

Infomania* = अनेक बार प्राप्त संदेशों को जांचने एवं उन्हें भेजने की लत

Infotainment = सूचना और मनोरंजन के मिश्रण की ‘ऑनलाइन’ सेवा

Jumbrella* = खुले स्थान पर प्रयोजनीय वृहदाकार छत्र

Mailbomb* = ई-मेल संदेशों की बौछार द्वारा किसी कंप्यूटर के कार्य में विघ्न डालना

Meritocracy = बौद्धिक क्षमता की श्रेष्ठता पर आधारित शासन प्रणाली

Mocktail* = कॉकटेल सदृश अल्कोहल-मुक्त पेय

Netiquette = Network + etiquette = इंटरनेट प्रयोग संबंधी आचार संहिता

Netizen = internet + citizen = सामान्य से अधिक समय इंटरनेट पर बिताने वाला

Nonliner* = इंटरनेट का प्रयोग (लगभग) नहीं के बराबर करने वाला

Notspot* = स्थान जहां इंटरनेट नहीं हो या मंदगति का हो

Noughties = ट्वेंटीज, थर्टीज, फॉर्टीज, आदि की तर्ज पर 2000-2009 का दशक नाम

Offshorable* = कार्य जो दूसरे देश में सस्ते में कराया जा सके

Oversharing* = इंटरनेट पर वैयक्तिक जानकारी अनावश्यक तौर पर प्रदान करना

Screenager* =  कंप्यूटर पर अत्यधिक समय बिताने वाला किशोर/युवक

Sitcom = Situation + comedy = रोजमर्रा के हास्यप्रद स्थिति पर आधारित ड्रामा/टीवी कार्यक्रम

Slumdog* = शहरी झोपड़पट्टी में रहने वाला समाज के निम्नतम पायदान का व्यक्ति

Snail mail =  इलेट्रानिक संदेशों की तुलना में धीमी गति की पारंपरिक डाक

Spinnish* = चिकित्सकों, राजनेताओं, संस्था-प्रवक्ताओं आदि द्वारा लोगों को प्रभावित करते हुए सूचना देने में प्रयुक्त सम्मोहक भाषा

Staycation* = Stay + vacation = घर में आराम फरमाते छुट्टियां बिताना

Tombstoning* = अति ऊंचे स्थल, जैसे पहाड़ की चोटी, से खतरनाक गोता लगाना

Trekkie = टीवी धारावाहिक ‘स्टार ट्रेक’ का शौकीन

Tweet* = माइक्रोब्लॉगिंग Twitter के माध्यम से संदेश भेजना

Upskill = कर्मचारी को नये प्रकार के कौशल सिखाना

Videophile* = वीडियो देखने/बनाने का शौकीन व्यक्ति

Viral marketing* = ‘वाइरस’ की तरह फैलने वाले मित्रों-परिचितों को भेजे गये ई-पत्रों के माध्यम से बाजार बढ़ाना

Web rage* = इंटरनेट प्रयोग में हो रही दिक्कतों के कारण होने वाली हताशा

Webinar = इंटरनेट माध्यम से संपन्न सेमिनार का इलेक्ट्रानिक संस्करण

Wordle* = शब्दसूची जिसमें शब्दों का आकार पाठ में उनकी आवृत्ति के अनुपात में दिखाया जाता है

– योगेन्द्र

PIDGIN –  A simple form of a language with elements taken from the local languages used for communication between people not sharing a common language. Origin: Chinese alteration for business.

CREOLE1 a person of mixed European and Black descent. 2 a descendent of European settlers in the Caribbians  or Central or South America. 3 a descendent of French settlers in the south of US. 4 a language formed with the combination of a European Language and an African Language.


पिजिन
‘पिजिन’ एवं ‘क्रिओल’ की ये परिभाषाएं कॉम्पैक्ट ऑक्सफर्ड रेफरेंस डिक्शनरी (Compact Oxford Reference Dictionary) से ली गयी हैं । अंतरजाल पर खोजने पर आपको इन शब्दों की व्याख्या अलग-अलग प्रकार से मिलेगी, लेकिन सभी का सार एक ही रहता है । देखने-पढ़ने के लिए संदर्भों की संख्या की कोई कमी नहीं हैं । मैंने निम्नलिखित को अधिक ध्यान से देखा था:

http://privatewww.essex.ac.uk/~patrickp/Courses/CreolesIntro.html
http://humanities.uchicago.edu/faculty/mufwene/pidginCreoleLanguage.html
http://logos.uoregon.edu/explore/socioling/pidgin.html

पिजिन (Pidgin) वस्तुतः एक मिश्रित बोली है । इसे भाषा कहना उचित नहीं होगा । जब ऐसे व्यक्ति-समूह परस्पर मिलते हैं जो एक-दूसरे की भाषा/बोली न जानते हों, किंतु उन्हें परस्पर व्यावसायिक/व्यापारिक संबंध स्थापित करने हों, तब कामचलाऊ बोली का जन्म होता है । दो या अधिक भाषाओं के शब्दों की खिचड़ी बोली जिससे परस्पर का कार्यव्यापार चल जाए वह पिजिन कहलाती है । बताया जाता है कि ‘पिजिन’ शब्द अंग्रेजी शब्द बिजनेस (business) का चीनी भाषा में रूपांतर है । शब्द की व्युत्पत्ति का खास इतिहास नहीं है । कहा जाता है कि पिजिन शब्द 1807 से प्रचलन में है ।

पिजिन बोलियों के इतिहास का यूरोपियों द्वारा अमेरिकी द्वीपों में उपनिवेश स्थापित करने से घनिष्ठ संबंध रहा है । स्थानीय जनसमुदायों के साथ काम भर का संपर्क स्थापित करने अथवा उनकी श्रमशक्ति का उपयोग करने के लिए ऐसी टूटी-फूटी बोली का प्रचलन हुआ । इतना ही नहीं, कई क्षेत्रों में कृषि एवं अन्य कार्यों के लिए वे लोग अपने साथ अफ्रिकी ‘गुलामों’ को भी ले गये । उनके साथ संवाद के लिए भी ऐसी बोली प्रचलन में आई । इन अवसरों पर ‘सभ्य’ कहे जाने वाले और समुन्नत भाषाओं के धनी यूरोपियों की उन श्रमिकों या ‘गुलामों’ की अपेक्षया अविकसित भाषा सीखने में स्वाभाविक तौर पर कोई दिलचस्पी नहीं रही होगी । दूसरी तरफ श्रमिकों/‘गुलामों’ में भी इतनी क्षमता कदाचित् नहीं रही होगी कि वे ‘मालिकों’ की भाषा को सरलता से अपना लें । दोनों प्रकार के समुदायों का परस्पर संपर्क केवल जरूरी कार्यव्यापार तक सीमित था जिसके लिए पिजिन से काम लेना पर्याप्त था । श्रमिक/‘गुलाम’ जब स्वयं ही अलग-अलग क्षेत्रों के मूल बाशिंदे होते थे, तब वे भी आपस में पिजिन का सहारा लेते थ और उस बोली में दो से अधिक भाषाओं/बोलियों के शब्द शामिल हो जाते थे । इन मिश्रित बोलियों को संबंधित भाषाओं के नाम से पुकारा जाने लगा, यथा पापुआ न्यू गिनी पिजिन जर्मन (Papua New Guinea Pidgin German ), कैमरून पिजिन इंग्लिश (English based Cameroon Pidgin) आदि ।

पिजिन बोली का कोई सुनिश्चित व्याकारणीय स्वरूप नहीं रहता । इसकी शब्दसंपदा बेहद कम और कामचलाऊ रहती है, जिसमें संबंधित भाषाओं के शब्द रहते हैं । आम तौर यूरोनीय भाषा के शब्द अधिक रहते हैं जब कि उनका उच्चारण, वाक्य में क्रम, आदि स्थानीय बोली पर अधिक आधारित रहते हैं । प्रमुख भाषा को उपरिस्तरीय (Superstrate) एवं गौण को अधोस्तरीय (Substrate) कहा जाता है । पिजिन का एक उदाहरण (उपर्युक्त किसी जालस्थल से लिया गया कैमरून पिजिन इंग्लिश) देखिए:
dis smol swain i bin go fo maket (दिस स्मोल स्वैन इ बिन गो फो माकेट) = this little pig went to market
पिजिन एवं क्रिओल (आगे देखें) का अध्ययन अपने देश में शायद नहीं होता है, किंतु यूरोप एवं अमेरिका के कुछ शिक्षण संस्थाओं के भाषा विभागों में इनके बारे में पढ़ाया जाता है (जैसे एसेक्स वि0वि0, ब्रिटेन, एवं शिकागो वि0वि0, अमेरिका) ।

क्रिओल
पिजिन की भांति क्रिओल भी एक मिश्रित या वर्णसंकर (Hybrid) बोली है । यों समझा जा सकता है कि जब पिजिन समय के साथ परिष्कृत होकर स्थायित्व धारण कर लेती है तो वही क्रिओल कहलाने लगती है । यह माना जाता है कि अफ्रिकी, अमेरिकी देशों के अपेक्षया पिछड़े जनसमुदायों की भाषा पर यूरोपीय भाषाओं के अत्यधिक प्रभाव से क्रिओलों का जन्म हुआ है । आरंभ में वे जनसमुदाय अपनी मूल भाषा का ही प्रयोग करते रहे, किंतु व्यापारिक/व्यावसायिक संपर्क के कारण पिजिन का प्रयोग भी साथ-साथ चलता रहा । कालांतर में आने वाली पीढ़ियां पिजिन के आदी होते चले गये । इस प्रक्रिया के फलस्वरूप ऐसी भाषा व्यवहार में आई जिसने एक स्पष्ट व्याकरणीय ढांचा इख्तियार कर लिया और जिसका एक अच्छा-खासा शब्दसंग्रह भी तैयार हो गया । संबंधित मूल भाषाओं के नामों पर आधारित क्रिओल संबोधन से यह भाषा पुकारी जाने लगी ओर उन लोगों की आम भाषा ही बन गयी ।

विषय के जानकारों के अनुसार क्रिओलों की शब्दसंपदा मुख्यतः बाहरी (यूरोपीय) भाषा पर आधारित रहती है जब कि वाक्यविन्यास स्थानीय भाषा पर । स्थानीयता शब्दों के स्वरूप एवं अर्थ को प्रभावित करती है । अंग्रेजी-आधारित जमैकी पिजिन में शब्द रचना का एक दृष्टांत देखें: हैन-मिगल् = हथेली (Han-migl = hand+middle = palm) ।
पापुआ न्यू गिनी में अंग्रेजी और स्थानीय भाषा से प्राप्त टोक पिसिन (Toke Pisin = Talk Pidgin?) नाम की क्रिओल राष्ट्रीय भाषा बन चुकी है और देश की ‘असेम्बली’ और रेडियो प्रसारण में प्रयुक्त होती है । इसका एक वाक्य यह है:

“Sapos yu kaikai planti pinat, bai yu kamap strong olsem phantom.”
(सापोस यू काइकाइ प्लान्टी पीनाट, बाइ यू कमअप स्ट्रॉंग ओल्सम फैंटम ।)
“If you eat plenty of peanuts, you will come up strong like the phantom.”

अमेरिका में लूसियाना क्रिओल प्रचलन में है, जो फ्रांसीसी एवं अफ्रिकन भाषाओं पर आधारित है । अन्य कुछ क्रिओल भाषाएं ये हैं: Haitian, Mauritian, and Seychellois (French based); Jamaican, Guyanese, and Hawaiian Creole  (English based); Cape Verdian Criolou (Portuguese based) and Papiamentu in the Netherlands Antilles (Portuguese based, Spanish influenced) |

हिंग्लिश
इस आलेख में मेरा मुख्य उद्येश्य है हिंग्लिश पर अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करना । पिजिन एवं क्रिओल की संक्षिप्त परिचयात्मक चर्चा के पीछे प्रयोजन यह रहा है कि इनके सापेक्ष हिंग्लिश को तौला जा सके । मेरे विचार में स्वतंत्र इंडिया दैट इज भारत (ह्विच इट इज नॉट!) की एक बड़ी, किंतु नकारात्मक, उपलब्धि रही है हिंग्लिश की प्रतिष्ठापना । हिंग्लिश हिंदी एवं अंग्रेजी के घालमेल से बनी एक वर्णसंकर भाषा है, जिसके बीज तो अंग्रेजी राज में पड़ चुके थे, लेकिन जिसका विकास एवं अधिकाधिक प्रयोग स्वतंत्रता के बाद ही हुआ ।

मैं यह निश्चित नहीं कर पा रहा हूं कि हिंग्लिश को पिजिन कहा जाए या क्रिओल । पिजिनों/क्रिओलों के प्रचलन में आने की जिन परिस्थितियों की बात कही गयी है वे अवश्य ही हिंग्लिश पर लागू नहीं होती हैं । अंग्रेजी राज से पहले से जो भी भाषाएं इस भूभाग में प्रचलित रही हैं वे उच्च दर्जे की रही हैं और अभिव्यक्ति के स्तर पर वे यूरोपीय भाषाओं से कमतर नहीं मानी जा सकती हैं । यहां के लोग आवश्यकतानुसार अंग्रेजी तथा अन्य भाषाएं सीखने में समर्थ थे और उन्होंने उन्हें सीखा भी । फिरंगियों के समय में ऐसी परिस्थितियां नहीं थीं कि किसी पिजिन/क्रिओल की जरूरत रही हो । उनका राज यही के लोग चला रहे थे, जो अंग्रेजी के साथ एक (मातृभाषा) या अधिक भाषाएं बोल/लिख सकते थे । तब फिर हिंग्लिश की जरूरत क्यों पड़ी ? अंग्रेजी शासन चलाने में योगदान दे रहे वे लोग इतने सक्षम रहे कि वे इन भाषाओं को साफ-सुथरे रूप में प्रयोग में ले सकते थे । तो फिर हिंग्लिश तथा उसी तर्ज पर ‘बांग्लिश’, ‘कन्नलिश’, ‘गुजलिश’ जैसी वर्णसंकर भाषाओं का प्रचलन तेजी से क्यों बढ़ा ?
हिंग्लिश की बात तो मैंने कर दी पर यह स्पष्ट नहीं किया कि यह आखिर है क्या ? यह आज के हिंदुस्तान के शहरी पढ़े-लिखे लोगों के बीच पूर्णतः प्रचलित हो चुकी एक भाषा है जिसका व्याकरणीय ढांचा तो हिंदी का है, किंतु शब्दसंग्रह कमोबेश अंग्रेजी का है । यह उन लोगों की देन है जो चमड़ी के रंग से तो हिंदुस्तानी हैं, लेकिन जो दिल से अंग्रेज बन चुके हैं । ये वे लोग हैं जो भारतीय भाषाओं को केवल मजबूरी में ही प्रयोग में लेना चाहते हैं, जिन्हें मूल/मातृ- भाषा की शब्दसंपदा समृद्ध करने में कोई दिलचस्पी नहीं है, और जिनके मुख से मौके पर हिंदी का उचित शब्द नहीं निकल सकता है । हिंदी में अंग्रेजी के शब्दों को जहां तबियत हुई वहां ठूंस देने में उन्हें कोई हिचक नहीं होती है । उन्हें इस बात पर कोई कोफ्त अथवा लज्जा अनुभव नहीं होती कि वे अपनी ‘तथाकथित’ मातृभाषा में भी ठीक से नहीं बोल सकते, विचारों को व्यक्त नहीं कर सकते । वे इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करते हैं कि जिससे वे बात कर रहे हैं उसके भेजे में उनकी यह नयी भाषा घुस भी पा रही कि नहीं । हिंदीभाषियों का बृहत्तर जनसमुदाय उनकी भाषा वस्तुतः नहीं समझ सकता । हिंग्लिश में व्यक्त इस कथन पर गौर करें:

“चीफ़-मिनिस्टर ने नैक्सलाइट्स को डायलॉग के लिए इंवाइट किया है । लेकिन नैक्सलाइट्स अन्कंडिशनल मीटिंग के लिए तैयार नहीं हैं । उनका कहना है कि सरकार कांबिग आपरेशन बंद करे और उन्हें सेफ पैसेज दे तो वे निगोशिएशन टेबल पर आ सकते हैं ।”

इस कथन को सड़क पर का आम आदमी (man on the street) क्या वास्तव में समझ सकता है ? उसे मालूम है कि कांबिग क्या होती है और निगोशिएशन किसे कहते हैं, आदि ? जरा सोचें ।

इस देश में अंग्रेजीपरस्त एक ऐसा वर्ग उभरा है जिस पर ‘सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है’ की कहावत चरितार्थ होती है । निःसंदेह उसके पास अंग्रेजी शब्दों का अपार शब्दभंडार है, किंतु आम हिंदुस्तानी का हाथ तो अंग्रेजी में तंग ही है न । क्या कोई सोचेगा कि क्यों उसे अंग्रेजी के लिए मजबूर किया जाए, क्यों नहीं अंग्रेजीपरस्त ही अपनी हिंदी बेहतर कर लेते हैं, उस बेचारे की खातिर ? खैर, यह सब होने से रहा ।

हिंग्लिश को इंडिया की उदीयमान, तेजी से जड़ें जमाती, और लोकप्रिय होती जा रही क्रिओल भाषा के तौर पर देखा जाना चाहिए । जहां के लोग अब भारत नाम भूलते जा रहे हों और देश को इंडिया बनाने का ख्वाब देख रहे हों, वहां साफ-सुथरी हिंदी के लिए कोई स्थान नहीं हो सकता है । दुर्भाग्य से वहां अंग्रेजी भी नहीं चल सकती है, क्योंकि अधिसंख्य जन उसमें बातचीत नहीं कर सकते हैं । ऐसे में हिंग्लिश क्रिओल ही उपयुक्त विकल्प रह जाता है ।

अस्तु, मैं इस पक्ष का हूं कि हिंग्लिश – एक प्रकार की क्रिओल – को अब मान्यता दे देनी चाहिए । यह अभिजात वर्ग के मुंह पर कब्जा कर चुकी है; अब यह दिन-ब-दिन मजबूत होने जा रही है । आखिर सोचिए उर्दू और हिंदी में अंतर ही कितना है ? जब उर्दू को अलग भाषा का दर्जा मिला हुआ है, तो ठीक उसी तरह – जी हां उसी तरह – हिंग्लिश को मान्यता क्यों न दी जाए ? हिंदी से जितनी दूर उर्दू है उससे कम दूर हिंग्लिश नहीं है ! – योगेन्द्र जोशी

पिछली पोस्ट (24 जुलाई 2010) में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि अपने भारत में लोगों के अंग्रेजी उच्चारण में काफी असमानता देखने को मिलती है । अधिकांश लोग अपनी मातृभाषा की उच्चारण-शैली के अनुसार ही अंग्रेजी बोलते हैं । कइयों के लिए उनकी अपनी भाषा की ध्वनियों और अंग्रेजी की ध्वनियों में कोई अंतर ही नहीं होता । अंग्रेजी सिखने का मतलब अधिकतर यही लिया जाता है कि उसके व्याकरण से सुपरिचित हुआ जाए और उसके शब्दभंडार को अधिकाधिक बढ़ाया जाए । उच्चारण सीखने/सिखाने पर खास जोर नहीं रहता है । मेरी जानकारी के अनुसार स्कूल-कालेजों में छात्रों की उच्चारण संबंधी परीक्षा नहीं होती है । उन्हें सही लिखना आना चाहिए केवल यही जांचा जाता है । फलतः व्यक्ति-व्यक्ति के उच्चारण में भेद रहता है ।

उच्चारण संबंधी एक अनुभव

अंग्रेजी उच्चारण के दो अहम पहलुओं की चर्चा करने से पहले में अपने एक अनुभव का उल्लेख करना चाहता हूं । बात 35-40 साल पहले की है । तब मैं डाक्टरेट उपाधि के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधकार्य में कार्यरत था । इस उपाधि की अर्हता का एक अनिवार्य अंग यह था कि शोधार्थी किसी आधुनिक यूरोपी भाषा में प्रवीणता का प्रमाणपत्र अर्जित करे । तदनुसार मैं जर्मन भाषा सीख रहा था । सौभाग्य से हम छात्रों को आस्ट्रिया से आए हुए एक आगंतुक शिक्षक महोदय से पढ़ने का अवसर मिला । (आस्ट्रिया की भाषा जर्मन है ।) उन्होंने हमें जर्मन ध्वनियों की बारीकियां समझाई थीं । वांछित ध्वनि निकालने के लिए होंठों को कैसी आकृति देनी होगी, जीभ मुंह के अंदर किस स्थान पर स्थापित रहेगी, गले के स्वरतंतु प्रकंपित होंगे या नहीं, इत्यादि बातें उन्होंने स्पष्ट की थीं । तब मैंने जाना था कि जर्मन शब्द ‘ich’ (मैं) के ch का उच्चारण ‘श्’ नहीं होता । संबंधित घ्वनि न हिंदी में है और न ही अंग्रेजी में । इसी प्रकार जर्मन ‘उम्लाउटों’ (umlauts ä, ö तथा ü) की स्वरध्वनियां भी अंग्रेजी के किसी स्वर से मेल नहीं खाती हैं । हमें बताया गया था इन्हें उच्चारित करने के लिए होंठों को कुछ वैसे ही गोलाई देकर खोलना होता है जैसे सीटी की आवाज पैदा करने में किया जाता है । वस्तुतः इस प्रकार का अंतर हिंदी एवं अंग्रेजी के स्वर-व्यंजन ध्वनियों के साथ भी है, लेकिन उनको शायद ही कभी समझाया जाता है । अस्तु, अभी मैं बलाघात की बात पर आता हूं ।

अक्षर अथवा सिलेबल्
स्वर-व्यंजन ध्वनियां भाषा की प्राथमिक इकाइयां हैं जिनका स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता । जिस मौलिक इकाई के साथ कोई अर्थ जोड़ा जाता है वह है शब्द जो इन ध्वनियों के चुने हुए संयोजन होते हैं । हर शब्द एक या अधिक ‘सिलेबल्’ (syllable) या अक्षर से बना रहता है । सिलेबल् वह न्यूनतम ध्वन्यात्मक इकाई है जो स्वर ध्वनि पर केंद्रित होती है । यह एक स्वतंत्र स्वर हो सकता है अथवा उसके आगे, पीछे, अथवा दोनों ओर एकल अथवा संयुक्त व्यंजन हो सकते हैं । हिंदी में सिलेबल् को सीधे-सीधे सरलता से पहचाना जा सकता है, जैसे अक्षर = अ+क्ष+र; स्पष्ट = स्पष्+ट । संयुक्ताक्षर की व्यंजन ध्वनियों में से अधिकांश को पूर्ववर्ती स्वर के साथ उच्चारित करना सहज लगता है । अंग्रेजी में सिलेबल् विभाजन सदैव बहुत स्पष्ट नहीं रहता । उदाहरणः a=a(ए), an=an (ऐन्), fact=fact (फैक्ट्) (monosyllabic words); under=un+der (अन्+डर्), figure=fi+gure (फि+गर्), rea+dy (रे+डी) (bisyllabic); technical= tech+ni+cal (टेक्+नि+कल्), technology = tech+no+lo+gy (टेक्+नॉ+लॉ+जी) । ध्यान दें कि सिलेबल् इस बात को स्पष्ट करते हैं कि शब्द टुकड़ों में विभक्त होकर कैसे उच्चारित होता है ।

टिप्पणीः
1. इस स्थल पर स्वर शब्द में शुद्ध स्वर ध्वनियां, यथा अ, आ, इ, ए आदि और संधिस्वर या डिफ्थॉंग, diphthong, जैसे ऐ, औ, दोनों शामिल हैं । वस्तुतः coil, out, pyre आदि में मौजूद स्वर ध्वनियां डिफ्थॉंग कहलाती हैं । ध्यान दें इनमें ऑय्, आव्, आय् जैसी ध्वनियां मौजूद हैं ।)
2. अंग्रेजी का र हमारे र से कुछ भिन्न है । स्वर के पूर्व यह स्पष्टतः उच्चारित होती है, अन्यथा इसका उच्चारण कुछ हद अ की भांति होता है, जैसे rare = रेअ, raring = रेअ+रिंग । ध्यान रहे कि इसमें एअ कि ध्वनि एक डिफ्थॉंग है, और एक ही सिलेबल् का द्योतक है ।
3. देवनागरी में लिखित उच्चारण पूरी तरह सही नहीं कहे जाएंगे, क्योंकि अंग्रेजी की कई ध्वनियां हमारी संस्कृत-हिंदी की ध्वनियों से पूर्णतः मेल नहीं खाती हैं ।

स्वराघात अथवा स्ट्रेस/एक्सेंट
हिंदी में स्वराघात का खास महत्त्व नहीं है । उसे वक्ता ही संभाषण-शैली का हिस्सा कहा जा सकता है । ऊपर दिए गए शब्द technology का एक ठेठ हिंदीभाषी ‘टेक् नॉ लॉ जी’ कहेगा । वह उसके चारों सिलेबलों को ध्वनि की समान तीव्रता (loudness) के साथ उच्चारित करेगा । लेकिन अंग्रेजी में यह उच्चारण अस्वीकार्य है । नियमों के अनुसार बोलते समय ‘नॉ’ पर जोर डाला जाएगा, जब कि अन्य सिलेबलों पर आवाज में उतना दम नहीं रहता है, कुछ ऐसे कि ‘नॉ’ तो साफ-साफ सुनाई दे, लेकिन टेक् आदि में उतना दम न दिखे । इतना ही नहीं, ‘लॉ’ की ध्वनि मात्र ‘ल’ सरीखी रह जाती है जिसमें स्वर ‘अ’ अतिअल्पकालिक रह जाता है, कुछ-कुछ ‘ल्’ के समान । अर्थात्
उक्त शब्द को ‘टेक् नॉ ल जी’, जो ‘टेक् नॉ ल् जी’ जैसा सुनाई पड़ेगा । यहां जोर वाले सिलेबल् को ‘बोल्ड’ टाइप से दर्शाया गया है ।

किसी सिलेबल् की ध्वनि-तीव्रता को बलाघात अथवा स्ट्रेस (stress) या एक्सेंट (accent) कहा गया । कुछ लंबे शब्दों में एक से अधिक सिलेबलों पर बलाघात रहता है किंतु असमान तीव्रता के साथ । प्रायः किसी एक पर अधिक जोर रहता है और दूसरे पर कम । ऐसे में पहले को प्राथमिक बलाघात (primary stress or acute accent) और दूसरे को द्वितीयक बलाघात (secondary stress or grave accent) कहा जाता है । इनको दर्शाने के लिए संबंधित सिलेबल् के ठीक पहले क्रमशः (´) तथा (`) प्रयोग में लिए जाते हैं । अन्य निरूपण भी मैंन देखे हैं जैसे (‘) तथा (,) । कहीं-कहीं कैपिटल अथवा बोल्डफेस लेटर्स भी विकल्पतः प्रयुक्त होते हैं । सेकंडरी स्ट्रेस का एक उदाहरण हैः counterfoil = ´coun+ter+`foil या ‘coun+ter+,foil (काव्‌न्‌+टर्+फॉय्‌ल्‌) । इस शब्द को बोलने में coun पर सर्वाधिक जोर रहता है, किंतु ter धीमा रहता है और foil उसकी अपेक्षा थोड़ा जोर से ।

सेकंडरी स्ट्रेस केवल लंबे शब्दों में ही देखने को मिलता है, लेकिन वह भी सदैव नहीं । दो अथवा अधिक सिलेबलों वाले शब्दों पर ही स्ट्रेस देखने को मिलता है, किंतु स्ट्रेस हो ही यह आवश्यक नहीं रहता । आम तौर पर किसी शब्द के एक ही सिलेबल् पर स्ट्रेस रहता है और वह प्राइमरी होता है ।

अंग्रेजी में बलाघात की काफी अहमियत है । यह शब्दों का अर्थ निर्धारित करता है । उदाहरण:
export = ‘ex+port (एक्स+पोर्ट) noun, ex+’port (एक्स+पोर्ट) verb; present = ‘pre+sent (प्रै+जंट) noun, pre+’sent (प्रि+जेंट) verb; record = ‘re+cord (रे+कॉर्ड) noun, re+’cord (रि+कॉर्ड) verb
। सामान्य नियम है कि संज्ञा शब्द के पहले और क्रियापद के दूसरे/अंतिम सिलेबल् पर बलाघात हो । (बोल्ड टाइप माने बलाघात ।)

स्वरशैली अथवा इंटोनेशन
प्रायः हर भाषा में स्वरशैली (intonation) का न्यूनाधिक महत्त्व देखने को मिलता है । स्वरशैली का संबंध बोलते वक्त ध्वनि के उतार-चढ़ाव से है, जैसा कि गायन-वादन में होता है । इसकी अहमियत को समझने के लिए स्टार-वार जैसी फिल्मों में रोबोटों द्वारा बोली जाने वाली संश्लिष्ट (synthetic) शैली पर गौर करें । यह एकदम सपाट और नीरस रहती है । लेकिन आम आदमी द्वारा बोले गये शब्दों का तारत्व (pitch) एक जैसा नहीं रहता है । उसकी आवाज कभी भारी तो कभी पतली होती है । संगीत में रुचि रखने वाले तारत्व से सुपरिचित रहते हैं । वे अच्छी तरह समझते हैं कि मंद्र से मध्य सप्तक की ओर बढ़ने पर तारत्व कैसे बदलता है । इस प्रकार के उतार-चढ़ाव की पहली अहमियत तो यह है कि बोली में एकरसता नहीं रहती । इसके अतिरिक्त इस उतार-चढ़ाव का महत्त्व भावाभिव्यक्ति को अधिक प्रभावी बनाता है । बोलने के लहजे से यह स्पष्ट होता है कि गदित वाक्य महज एक तथ्य का उद्घाटन है, अथवा उसमें कोई प्रश्न निहित है, अथवा उसके माध्यम से आश्चर्य या भय जैसे भाव व्यक्त किये जा रहे हैं । लिपिबद्ध कथनों में स्वरशैली नहीं व्यक्त रहती है । पाठक प्रसंग के आधार पर उसकी कल्पना मन में करता है । विराम चिह्नों के प्रयोग से स्थिति स्पष्ट होती है, किंतु पूरी तरह नहीं । सभी लोग इस स्वरशैली या इंटोनेशन को अनुभव से सीखते हैं । अंग्रेजी में इसे पर्याप्त महत्त्व मिला है और पुस्तकों/लेखों में उसकी चर्चा देखने को मिल जाती है ।

स्वरशैली को उदाहरणों से समझा जा सकता है । इस वाक्य पर ध्यान दें: I can’t believe it. यह वाक्य कहीं बीच में आवाज रोके बिना बोले गये इन सिलेबलों की शृंखला है (देवनागरी में व्यक्त निकटतम उच्चारण): ‘आई कांट बि-लीव् इट्’ (पांच सिलेबल्) । ध्वनि के बिना उतार-चढ़ाव के इनको एकसमान सुर में बोला जा सकता है । जैसा कि एक प्राथमिक दर्जे का रोबोट करता है । व्यवहार में उतार-चढ़ाव रहता है, जो इस पर निर्भर करता है कि आप किस पर जोर डालने के इच्छुक हैं । अगर कोई यह जताना चाहे कि अमुक बात पर लोग विश्वास करते हों तो करें लेकिन कम से कम वह ऐसा नहीं कर सकता है । तब ‘आइ’ पर जोर रहेगा । तब आइ किंचित् उच्च स्वर में बोलते हुए स्वर नीचे गिरता है, जैसा कि संगीतज्ञ सरगम के ग या म से स पर उतर आता है । दूसरी ओर यदि वह व्यक्ति अमुक बात पर विश्वास करने के समुचित कारण नहीं देखता, और विश्वास करना अपनी सामर्थ्य से बाहर पाता है, तो वह ‘कांट’ पर जोर डालेगा और आई को सामान्य तौर पर उच्चारित करते हुए आवाज कुछ उठाएगा फिर कांट बोलकर वापस अन्य सिलेबलों को सामान्य आवाज में बोलेगा । इस प्रकार के उतार-चढ़ाव को चित्र में दिखाया गया है । तीसरे दृष्टांत में (be)lieve पर जोर दिया गया है ।

उच्चारण में ध्वनि के उठने-गिरने को दर्शाने वाली रेखा को स्वरशैली समोच्च रेखा (intonation contour) कहा जाता है । आम तौर पर वाक्यों या वाक्यांशों को बोलते समय अंतिम सिलेबल् पर स्वर उतर आता है । लेकिन कभी-कभी इसका उल्टा भी होता है । अगले चित्र के प्रथम वाक्य में वक्ता का स्वर आंरभ में समान रहता है, किंतु अंतिम सिलेबल् (Am)rita पर पहुंचते हुए ऊपर उठ जाता है । उत्तरदाता का स्वर उच्च से आरंभ होकर नीचे उतरता है । किंतु अगले प्रश्न में what पर स्वर अनायास ऊंचा उठता है, फिर हल्का ऊंचा रहते हुए name पर उतर जाता है ।

हम हिंदुस्तानियों के अंग्रेजी संभाषण में स्ट्रेस एवं इंटोनेशन का प्रायः अभाव रहता है, अथवा ये स्थापित मानक के अनुसार न होकर हमारी सामान्य बोली से प्रभावित रहते हैं । लेकिन जिन्हें मानक उच्चारण सीखने के अवसर मिले हों, अथवा जो उस माहौल में रह चुके हों, उनकी अंग्रेजी अवश्य भिन्न रहती है । चूंकि देशवासियों को प्राप्त अवसरों, उनके अंग्रेजी-शिक्षण के स्रोतों, और मातृभाषाओं में गंभीर असमानता सदा से रही है, अतः इंडियन इंग्लिश में वैसी ही विविधता है जैसी देशवासियों में ।
योगेन्द्र जोशी

अंतरजाल के ये स्रोत इस विषय में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं:
http://www.englishclub.com/pronunciation/word-stress-rules.htm
http://www.worldlingo.com/ma/enwiki/en/Secondary_stress
http://iteslj.org/Techniques/Celik-Intonation.html
http://home.cc.umanitoba.ca/~krussll/138/sec3/inton.htm

विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों के मानव समाजों द्वारा विकसित प्राकृतिक भाषाएं (natural languages) मूलतः उच्चारित होने के लिए बनी हैं । (मैं यहां इशारों की भाषा अथवा आधुनिक युग की कंप्यूटर भाषाओं की बात नहीं कर रहा हूं ।) वे कब और कैसे विकसित हुई होंगी इसका कोई लेखा-जोखा न है और न ही हो सकता है । इतना निश्चित है कि मानवजाति ने कई सहस्राब्दियों पहले ही ध्वनियों का प्रयोग करते हुए परस्पर संदेश देने की कला, जिसे आदिम भाषा कहा जा सकता है, सीख ली होगी । बौद्धिक विकास के साथ उसकी भाषाई क्षमता बढ़ती गयी होगी । यह तो बहुत ही बाद की बात है कि मौखिक रूप से परस्पर कही गयी बातों अथवा संदेशों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने के लिए लिपियां भी विकसित हुईं । भाषाओं के लिपिबद्ध निरूपण के ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर पूर्ववर्ती मौखिक भाषाओं के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है । इस विषय पर उपयोगी जानकारी यहां (http://www.trueorigin.org/language01.asp) उपलब्ध है ।

इतना कुछ कहने का मंतव्य यह है कि किसी भी भाषा की विशिष्टता मूलतः उसके उच्चारण में निहित रहती है । उसके ध्वनि-समुच्चय, व्याकरण, और शब्द-संपदा भाषा के गदित स्वरूप से संबंधित रहते हैं । लिपि किसी स्थाई माध्यम पर उसके अंकित निरूपण के लिए केवल साधन प्रदान करती हैं; वे उस भाषा की विशिष्टता का आधार नहीं होती हैं । लिपि बदल लेने पर भी भाषा वही रहती है । अवश्य ही लिपि का अपना महत्त्व है और बोली जा रही भाषा से उसका अतिघनिष्ठ संबंध रहता है । अंकित लिपि कैसे उच्चारित होगी इसके सुस्पष्ट तथा सामान्यतः स्थाई नियम स्थापित रहते हैं, ताकि संबद्ध भाषा सही-सही बोली जा सके । इसीलिए किसी भाषा के लिए नितांत नई लिपि स्वेच्छया नही अपनाई जा सकती है; आपको तब लिपि एवं उससे संबद्ध घ्वनियों के लिए नियम तय करने होंगे । कहने का तात्पर्य है कि भाषा की अपनी खासियत लिपि से नहीं नियत होती है । उसकी विशिष्टताओं को लिपि से परे हटकर समझा जाना चाहिए । दरअसल एक ही लिपि एक से अधिक भाषाओं के लिए प्रयुक्त हो सकती है, जैसे देवनागरी लिपि भारतीय और लैटिन लिपि यूरोपीय भाषाओं के लिए ।

अंग्रेजी कई देशों में जनभाषा के रूप में स्थापित है, जैसे ब्रिटेन (इसका उद्गम स्थान), संयुक्त राज्य अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा आदि । उन देशों में प्रायः सभी इसी भाषा का प्रयोग करते हैं । अतः उनके बोलने में एकरूपता स्वाभाविक तौर पर देखने को मिलती है, भले ही वह दुनिया के अन्य अंग्रेजी भाषी क्षेत्रों से भिन्न हो । इसी आधार पर उन स्थानों के अंग्रेजी को विशिष्ट नाम दिया जाता है, यथा ब्रिटिश इंग्लिश, अमेरिकन इंग्लिश, इत्यादि । अंग्रेजी भारत में भी प्रचलित है, और इस आधार पर ‘इंडियन इंग्लिश’ का भी जिक्र सुनने को मिलता है । पर क्या इंडियन इंग्लिश जैसी कोई चीज वाकई में है ? मेरा उत्तर नहीं में है; क्यों इसी बात पर मेरी टिप्पणियां यहां प्रस्तुत हैं । इस संबंध में कुछ बातें मैं पहले ही अन्यत्र (3 जून 2010) कह चुका हूं ।

अंग्रेजी वस्तुतः अपने देश की जनभाषा नहीं है । यह तो १० फ़ीसदी से कम लोगों की द्वितीय भाषा है, जो विरल रूप से देश भर में सर्वत्र फैले हैं । इसे रोजमर्रा की जिंदगी में नियमित रूप से इस्तेमाल करने वाले लोग संख्या में नगण्य होंगे । शौकिया अथवा अंग्रेजी के प्रति अति लगाव के कारण इक्के-दुक्के जन अपने घरों में बोलते होंगे, किंतु आम तौर पर हर कोई अड़ोसी-पड़ोसियों, मित्र-परिचितों, कार्यालय के संगी-साथियों, दुकानदारों, रिक्शा-ऑटो वालों और राह चलते मिले अजनबियों आदि से स्थानीय भाषा में ही वार्तालाप करता है । फलतः सामान्य वार्तालाप में अंग्रेजी बोलने का न अभ्यास हो पाता है और न ही उसके उच्चारण की एकरूपता स्थापित हो पाती है । सच कहें तो अंग्रेजी अपने देश की दस्तावेजी भाषा है और लिखित जानकारी प्रायः सर्वत्र अंग्रेजी में रहती है । अतः हमारा अंग्रेजी ज्ञान मुख्यतः लिखित सामग्री तक सीमित रहता है । हम बोलते हैं स्थानीय भाषा में और लिखते हैं अंग्रेजी में । यहां तक कि कार्यालयों में भी कार्य संबंधी वार्तालाप अपनी रोज की भाषा में ही होता है । लेकिन जैसे ही दस्तावेज तैयार करने का काम हाथ में आता है, कलम से (आजकल कंप्यूटर पर) अंग्रेजी का प्रवाह आरंभ हो जाता है । अंग्रेजी बोल तब मुंह से अवश्य फूटते हैं जब कोई औपचारिक कार्य आरंभ होता है, जैसा बैठकों/गोष्ठियों में होता है । लोग परस्पर स्थानीय भाषा में बोलते मिलेंगे, किंतु जैसे ही औपचारिक कार्यवाही आरंभ होती है, सब अंग्रेजी के लिए तैयार हो जाते हैं । ऐसे अवसरों पर अंग्रेजी तभी बोली जाती है जब वार्ता में शामिल जन अलग-अलग भाषाएं बोलते हों । तब अंग्रेजी हमारी प्राथमिकता बन जाती है । याद रहे कि इतने भर से हमारे अंग्रेजी उच्चारण में समानता नहीं आती है ।

आम बातचीत में अंग्रेजी के प्रयुक्त न होने का सीधा अर्थ यह है कि हम इसे एक-दूसरे से नहीं सीखते है, बल्कि इसे किताबों से सीखते हैं, अपने स्कूलों से सीखते है, अथवा आजकल कुकुरमुत्तों की तरह उग आये ‘महीने भर में अंग्रेजी’ वाले संस्थानों से सीखते हैं । अन सब स्रोतों का परस्पर कोई संबंध नहीं रहता है, इसलिए सब जगह अपनी-अपनी अंग्रेजी होती है जो उन जनों पर निर्भर करती है जो उन स्थानों पर कार्यरत हों । ध्यान रहे किताबों से आप व्याकरण सीख सकते हैं और अपना शब्दज्ञान बढ़ा सकते हैं, किंतु उच्चारण नहीं सीख सकते जब तक कि उच्चारण की बारीकियों का सही-सही, आरंभिक एवं मौलिक ज्ञान अलग से अर्जित न कर चुके हों और शब्दकोशों की सहायता न लेते हों । आम देशवासी इतना परिश्रम नहीं कर पाता है, उसका तो कामचलाऊ अंग्रेजी सीखने में ही दम निकल जाता है । जहां तक स्कूलों या अन्य संस्थाओं का सवाल है, आपका अंग्रेजी उच्चारण उस व्यक्ति पर निर्भर करता है जो आपको पढ़ा रहा होता है । आपकी जबान पर वह उच्चारण स्थाई हो जाता है जो आप आरंभिक दौर में सीखते हैं । कितना अच्छा सीख पाऐंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपको पढ़ाने वाला खुद कितना जानकार है । यदि यह स्पष्ट करे कि अंग्रेजी की ध्वनियां मुख से कैसे निकाली जाती हैं, इस बात को भी स्पष्ट करे कि वे हमारी अपनी ध्वनियों के समान अथवा उनसे अलग कैसे हैं, तो आपका उच्चारण बेहतर होगा । कदाचित् वह आपको ‘स्ट्रेस’ एवं ‘इंटोनेशन’ से भी परिचित कराए । ऐसा संभवतः उच्च स्तर के विद्यालयों होता होगा । आम तौर पर सही उच्चारण का तरीका सिखाया नहीं जाता है । शिक्षक/प्रशिक्षक बोलता है और आप उसकी नकल करते हैं । बारीकियों का कहीं सवाल ही नहीं उठता । यह भी एक तथ्य है कि हमारे विद्यालयों के अध्यापकों का भाषाई ज्ञान आम तौर पर दोयम दरजे का होता है । उच्चारण की बारीकियों से वे स्वयं परिचित हों इसकी संभावना कम रहती है ।

हमारी अंग्रेजी ब्रितानी अंग्रेजी पर आधारित है । अतः शब्द-संपदा और वर्तनी के नजरिये से हमारी अंग्रेजी उनसे मेल खाती है, किंतु उच्चारण हमारा अपना निजी होता है । सभी भारतीयों की अपनी-अपनी अंग्रेजी होती है जो इन बातों पर निर्भर करती है कि वे शहरों से आते हैं या देहात से, कि वे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े हैं या सरकारी क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों में, कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का अंग्रेजी से कोई नाता रहा है या नहीं, कि वे उच्चारित अंग्रेजी वाले रेडियो, टेलीविजन आदि के कार्यक्रमों में रुचि लेते हैं या नहीं, कि वे अच्छी अंग्रेजी के लिए प्रयत्नशील रहते हैं या उसके प्रति उदासीन, इत्यादि । कहने का अर्थ है कि उच्चारण की दृष्टि से ‘इंडियन इंग्लिश’ जैसी कोई चीज नजर नहीं आती है ।

इस सबके अलावा सही ‘स्ट्रेस’ तथा ‘इंटोनेशन’ का अभाव भी हमारी अंग्रेजी की एक विशिष्टता है । इनका जिक्र अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी