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हिंदी (हिन्दी) दिवस यानी Hindi Day, 14 Sept 2021

सितम्बर 14, 2021

1. हिंदी दिवस

आज 14 सितंबर हिंदी दिवस है, अर्थात् Hindi Day(?)! इसी दिन हिन्दी को राजभाषा की उपाधि मिली थी (सन् 1950)। यह दिवस किस वर्ष से मनाया जा रहा है यह मुझे पता नहीं। शायद सन् 1950 के बाद प्रतिवर्ष मनाया जा रहा हो। इसमें मेरी दिलचस्पी 30-35 सालों से है जब से मैं हिंदी लेखन-पठन में विशेष रुचि लेने लगा (फ्रांसीसी शहर पेरिस के अनुभव के बाद)।

आरंभ में मुझे यह दिवस सार्थक एवं आशाप्रद लगा, किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया मुझे इस दिवस के औचित्य पर गंभीर शंका होने लगी। समय के साथ मुझे लगने लगा कि अंग्रेजी की महत्ता दिनबदिन बढ़ ही रही है और लोगों का उसके प्रति लगाव भी बढ़ने लगा है। हर क्षेत्र में उसका प्रयोग घटने के बजाये बढ़ ही रहा है। यहां तक कि सरकारें भी अघोषित तरीके से अंग्रेजी प्रयोग को बढ़ावा देती आ रही हैं। अब तो वैश्विक अंतरजाल (इंटरनेट) ने रही सही कमी पूरी कर दी है। लोगों के मन में यह धारणा घर कर चुकी है कि अंग्रेजी के बिना काम चलेगा नहीं। अब हर किसी को अंग्रेजी आनी चाहिए। तो फिर किस बात पर संतुष्ट होकर इस दिवस की सोची जाये?

2. भारत या इंडिया?

मेरा परिचय ‘इंडिया, India) शब्द से किशोरावस्था तक नहीं हुआ था ऐसा ही कुछ मुझे याद है। मेरी प्राथमिक शिक्षा (कक्षा 5 तक) अपने गांव (उत्तराखंड, तब उत्तर प्रदेश) की पाठशाला (विद्यालय) में हुई थी। ये बातें सन् 1950 के मध्य दशक की हैं। तब देश को स्वाधीन हुए मात्र 8-10 वर्ष बीते थे। हम लोग देश को ‘भारतवर्ष’ अथवा ‘भारत’ पुकारते थे। तब न अंग्रेजी शब्दों को जानते थे और न ही उसकी लिपि (लैटिन/रोमन)। पढ़ाई का माध्यम हिंदी (लिपि देवनागरी) थी। अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय (स्कूल) भी हुआ करते हैं इसका ज्ञान मुझे तब हुआ जब आगे की पढ़ाई के लिए गांव से बाहर निकला। लेकिन ऐसे स्कूलों की संख्या बड़े शहरों में भी अधिक नहीं होती थी। अधिकांशतः ये ‘इसाई मिशनरियों’ की देन थे। छोटेमोटे कस्बों में तो शायद ऐसे स्कूल रहे ही नहीं होंगे। अन्य छात्रों की तरह मेरी आगे की पढ़ाई हिंदी माध्यम से ही हुई।

उक्त बातें मैं इसलिए कह रहा हूं कि स्वाधीनता के बाद काफी समय तक लोग देश को भारत कहकर ही संबोधित करते थे। टीवी चैनल तो तब थे नहीं, रेडियो होता था और उस पर भी भारत ही सुनने को मिलता था। अब लगभग सर्वत्र ‘भारत’ को ‘इंडिया’ ने विस्थापित कर दिया है। ऐसा क्यों हुआ? भारतीयों ने देश के प्राचीन नाम को छोड़कर अंग्रेजों के दिए नाम को क्यों अपना लिया? लगे हाथ यह बता दूं कि विष्णुपुराण में लिखा हैः

उत्तरं यत्समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम् ।

वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र संततिः ।। (विष्णुपुराण, 2.3.1)

मेरा मानना है जिस देश के बाशिंदे अपने देश को पुरखों के दिये नाम से पुकारने के बजाय विदेशियों के दिए नाम से पुकारना पसंद करते हों, वे देशज भाषाओं से क्या लगाव रखेंगे? मतलब यह है कि आप हिंदी दिवस मनायें या न, देश में अंग्रेजी ही आगे बढ़ेगी। कटु सत्य तो यह है कि समाज के ऊपरी तबके ने पाश्चात्य तौरतरीकों, जीवन-मूल्यों को अपनाना आरंभ कर दिया है। इसके लिए समाज को गौर से एवं बारीकी से देखने की जरूरत है। महज मेरी बात का खंडन करना पर्याप्त नहीं होगा।

3. ‘स्मार्ट स्कूल” एवं अंग्रेजी माध्यम

मैं अपनी बात को एक उदाहरण से स्पष्ट करता हूं। अभी हाल में प्र.मं. महोदय ने हमारे शहर वाराणसी (मोदीजी का निर्वाचन क्षेत्र) में ‘स्मार्ट स्कूल’ (smart school) का उद्घाटन किया। मछोदरी इलाके का यह सरकारी विद्यालय आधुनिकतम साजसज्जा और सुविधाओं से लैस है जैसा स्थानीय अखबारों में जानकारी छपी है। कदाचित् किसी भी प्रतिष्ठित (निजी) अंग्रेजी विद्यालय से बेहतर। (दैनिक जागरण, वाराणसी, 30-8-2021, पृ 7)

दैनिक जागरण के अनुसार उक्त विद्यालय में पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी होगी। यदि ऐसा है तो यही कहा जायेगा कि शासक वर्ग के लोग हों या आम जनता, सबका झुकाव अंग्रेजी की ओर बढ़ रहा है। तब हिन्दी दिवस की अर्थवत्ता क्या रह जाती है? उत्तर प्रदेश की राजकाज की भाषा हिंदी है (कहने को उर्दू भी) जो उस राज्य की जनभाषा है। आजकल चर्चा है कि पढ़ाई का माध्यम मातृभाषा होनी चाहिए, लेकिन विडंबना यह है कि कोई सरकार इस विचार को व्यवहार में उतारना नहीं चाहती।

स्पष्ट है कि अब स्थितियां बदल चुकी हैं। प्रायः हर निजी विद्यालय अंग्रेजी माध्यम से पठन-पाठन करता है। शहरों में हर गली चौराहे पर मिल जायेंगे ऐसे विद्यालय। बीते समय में क्षेत्रीय भाषाओं के सरकारी विद्यालयों की संख्या उतनी नहीं बढ़ी है जितनी इनकी। निजी विद्यालयों के साथ बराबरी कर पाने या उनसे आगे निकलने की होड़ में सरकारों को स्वयं अंग्रेजी-माध्यम विद्यालय खोलने पड़ रहे हैं। अंग्रेजी का महत्त्व घटने से रहा, इसलिए हिन्दी पीछे छूटती जा रही है।

4. व्यावसायिक महत्ता

रोजमर्रा के जीवन में परस्पर वैचारिक अभिव्यक्ति या जानकारी साझा करने के लिए भाषा की जरूरत होती है यह जगजाहिर है। लेकिन इससे परे व्यावसायिक कार्यों में उसका उपयोग विशेष महत्व रखता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यूरोप की दो-अढाई सौ वर्ष पहले की औद्योगिक क्रांति इंग्लैंड से आरंभ हुई। उस क्रांति के बाद उनकी व्यापारिक गतिविधि दूसरे देशों में तेजी से फैलने लगी। अंग्रेजी उनकी गतिविधि का माध्यम बनी और जहां-जहां वे पहुंचे उन्होंने वहां भी अंग्रेजी फैलाई। जिन देशों को अपने साम्राज्य में मिलाया वहां भी व्यापारिक गतिविधि के साथ राजकाज की भाषा भी अंग्रेजी बनाते चले। दुर्भाग्य यह रहा कि भारत जैसे विशाल और भाषायी समृद्धि वाले देश में स्वाधीनता के बाद भी राजकाज और व्यावसायिक कार्यों का माध्यम अंग्रेजी ही बनी रही, और आज भी है। जब नौकरी-पेशे, शिक्षा, स्वास्थ्य, व्यापार आदि के लिए अंग्रेजी ही वांछनीय है तो आम लोगों के लिए हिन्दी तथा अन्य भाषाओं की उपयोगिता क्या रहेगी? जो देशज भाषाओं के प्रति लगाव रखेगा उसके लिए उपयोगिता का सवाल गौण होता है। लेकिन अधिकतर लोगों के मन में अंग्रेजी की उपयोगिता की भावना सुस्थापित है। हिन्दी या अन्य-भाषाओं के कामचलाऊ ज्ञान के लिए अधिक मेहनत नहीं चाहिए। इन बातों को हमारा शासकीय-प्रशासनिक तंत्र भली भांति समझता है।

5. दूरदर्शन समाचार

यह आलेख यह बताने के लिख रहा हूं कि देशज भाषाओं के पक्ष में तमाम बड़ी-बड़ी बातें कही जाती हैं। फिर क्यों सरकारों की कथनी और करनी में अंतर रहता है? मैं कुछएक दृष्टांत प्रस्तुत करता हूं।

एक समय था जब सरकारी टेलीविजन समाचार चैनल का नाम ‘दूरदर्शन’ हुआ करता था, और हिंदी में ‘समाचार’ लिखा रहता था। उसके साथ कुछ सालों के लिए ‘सत्यं शिवं सुंदरं’ भी अंकित रहा; बाद में वह हट गया। मैं अंग्रेजी प्रसारण की बात नहीं कर रहा हूं। टीवी पर्दे पर आजकल ‘DD’ के साथ हिन्दी में ‘न्यूज’ या अंग्रेजी में ‘News’ लिखा रहता है। हिंदी में ‘समाचार’ शब्द क्यों गायब हो गया?

बात होती है हिंदी के पक्ष में और काम होता है अंग्रेजी में। अजीब विडंबना है। हिन्दी राजभाषा है भारतीय संघ के राजकाज की, न कि देश की राष्ट्रभाषा जैसा कई देशवासियों को भ्रम है। कदाचित् सभी हिंदीभाषी राज्यों की राजभाषा भी हिन्दी है। बताइए संघ सरकार (केंद्र सरकार) का कौन-सा काम हिंदी में होता है? अंग्रेजी अंतरिम तौर पर सहायक राजभाषा स्वीकारी गयी थी। विडंबना देखिए कि वह वास्तविक (de facto) राजभाषा बनी हुई (और आगे भी रहेगी)!

6. स्वदेशी की भावना एवं हिंदी समाचारपत्र

योगगुरु स्वामी रामदेव का दृष्टांत मेरे ध्यान में आता है। वे अब एक कारोबारी की भूमिका में भी उतर चुके हैं। भोज्य पदार्थों एवं औषधियों के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी उनकी संस्थाएं व्यवसाय कर रही होंगी। मैंने उनके मुख से ‘स्वदेशी’ अपनाने की बातें सुनी हैं। क्या स्वदेशी शब्द में देश की भाषाएं स्वतः शामिल नहीं कही जाएंगी? लेकिन उनके उत्पादों पर जो जानकारी छपी रहती है वह अंग्रेजी में ही रहती है। हिंदी एवं अन्य भाषाएं अत्यल्प मात्रा में कभी-कभार दिख सकती हैं। वे शहद या मधु नहीं कहते, कहते हैं हनी! मुझे अंग्रेजी से परहेज नहीं, लेकिन यह कहना चाहूंगा कि देश के किसी भी कोने में प्रायः सभी वहां की क्षेत्रीय भाषा बोलते हैं, अर्थात् उनकी प्रथम भाषा अंग्रेजी नहीं होती। अत्यल्प संख्या में कुछ होंगे जो जिन्होंने अंग्रेजी अपनी प्रथम भाषा बताई हो। ऐसे में देश के विभिन्न उत्पादों पर लिखित जानकारी केवल अंग्रेजी में होना खेदजनक नहीं है क्या?

दूसरा उदाहरण दैनिक जागरण समाचारपत्र का है जिसका प्रकाशन झांसी से 1942 में हुआ था। फिर कानपुर और बारी-बारी से अन्य शहरों से भी आरंभ हुआ था। स्वाधीनता संघर्ष में भी इसकी भूमिका रही है। आज जागरण प्रकाशन समूह एक बड़ी संस्था बन चुका है और शिक्षा के क्षेत्र में प्रवेश करते हुए शिक्षण संस्थानों की शृंखला भी आरंभ कर लिया है। मेरा अनुमान था दैनिक समाचार पत्र की भांति इस शृंखला से यह समूह हिन्दी को आगे बढ़ाएगा, लेकिन उक्त संस्थानों का शिक्षण माध्यम अंग्रेजी है। क्यों? इसलिए कि चारों ओर अंग्रेजी माध्यम स्कूलों की मांग है।

मेरी दृष्टि में १४ सितंबर और उसके आगे-पीछे के एक-दो सप्ताह का समय एक पर्व के माफिक रहता है। इस दौरान इस भाषा को लेकर कहीं विद्वानों के  व्याख्यानों का तो कहीं वाद-विवाद या निबंधलेखन या टंकण आदि की प्रतियोगिता का आयोजन होता है। फिर पूर्वस्थिति लौट आती है।

7. अंग्रेजी बिना समझ से परे है हिंदी

हाल के दशकों में हिन्दी में अंग्रेजी का मर्यादाहीन घालमेल करने की प्रवृत्ति बढ़ी है। कई मौकों पर बिना अंग्रेजी ज्ञान के नयी हिन्दी (हिंग्लिश) समझ पाना मुश्किल होता है। आप टीवी धारावाहिकों की हिन्दी सुनिए; बिना अंग्रेजी शब्दों, पदबंधों और वाक्यों के कोई पात्र अपनी बात नहीं कहता। टीवी समाचार-प्रसारण का भी यही हाल है; संवाददाता और समाचार वाचक/वाचिका की हिंदी अंग्रेजीमय रहती है। कभी-कभी ऐसे शब्द प्रयुक्त होते है जिन्हें आम हिंदीभाषी समझ नहीं सकता। हम भारतीयों की यह खूबी है कि अपनी हिन्दी में हम बिलाझिझक अंग्रेजी के शब्द ठूंस लेते है। भाषा के साफसुथरेपन की परवाह नहीं करते। लेकिन जब बारी अंग्रेजी की आती है तो उसकी शुद्धता के प्रति बेहद सचेत रहते हैं।

यह याद रहे कि भारतीयों के लिए अंग्रेजी एक उपयोगी भाषा ही नहीं है, बल्कि उससे अधिक सामाजिक प्रतिष्ठा का द्योतक भी है।

8. और अंत में

हाल में अंतरजाल (internet) पर उपलब्ध दो लेखों पर मेरी नजर पड़ी। दोनों अंग्रेजी में लिखित हैं। मैं दोनों के आरंभिक दो-तीन अनुच्छेदों को आगे उद्धृत कर रहा हूं जिससे उनके मुद्दों का अंदाजा लग जाएगा।

पहले लेख में अफ्रिकी देशों के वैज्ञानिकोँ-भाषाविदों की एक कोशिश का जिक्र है कि हमें अपनी भाषाओं में ही वैज्ञानिक विषयों के शब्दों की रचना करना चाहिए। उनका तर्क है, “अंग्रेजी पर अतिनिर्भरता हमारे देशवासियों के लिए ठीक नहीं है।” देखें:

https://www.masakhane.io/lacuna-fund/masakhane-mt-decolonise-science

Masakhane MT: Decolonise Science

Our Mission

“Masakhane is a grassroots organisation whose mission is to strengthen and spur NLP research in African languages, for Africans, by Africans. Despite the fact that 2000 of the world’s languages are African, African languages are barely represented in technology. The tragic past of colonialism has been devastating for African languages in terms of their support, preservation and integration. This has resulted in technological space that does not understand our names, our cultures, our places, our history.

“Masakhane roughly translates to “We build together” in isiZulu. Our goal is for Africans to shape and own these technological advances towards human dignity, well-being and equity, through inclusive community building, open participatory research and multidisciplinarity.”

Rationale

“When it comes to scientific communication and education, language matters. The ability of science to be discussed in local indigenous languages not only has the ability to reach more people who do not speak English or French as a first language, but also has the ability to integrate the facts and methods of science into cultures that have been denied it in the past. s sociology professor Kwesi Kwaa Prah put it in a 2007 report to the Foundation for Human Rights in South Africa, “Without literacy in the languages of the masses, science and technology cannot be culturally-owned by Africans. Africans will remain mere consumers, incapable of creating competitive goods, services and value-additions in this era of globalization.”

“When it comes to scientific communication and education, language matters. The ability of science to be discussed in local indigenous languages not only has the ability to reach more people who do not speak English or French as a first language, but also has the ability to integrate the facts and methods of science into cultures that have been denied it in the past. s sociology professor Kwesi Kwaa Prah put it in a 2007 report to the Foundation for Human Rights in South Africa, “Without literacy in the languages of the masses, science and technology cannot be culturally-owned by Africans. Africans will remain mere consumers, incapable of creating competitive goods, services and value-additions in this era of globalization.”

इस विषय में ‘नेचर’ पत्रिका में भी लेख उपलब्ध हैः

https://www.nature.com/articles/d41586-021-02218-x?

दूसरे लेख में चीन के उस इरादे का जिक्र है जिसमें तिब्बत की भाषा-लिपि (तिब्बती) को हाशिए की ओर धकेलकर चीनी मैंडरिन को स्थापित करना है।

https://www.reuters.com/article/us-china-education-tibet-idUSKBN20S13W

BEIJING (Reuters) – China is eroding access to Tibetan language learning and resources in the Tibet Autonomous Region while carrying out so-called “bilingual education”, according to a new report from Human Rights Watch.

“China, while ensuring its minority Tibetan community gets education in their native tongue, has sidelined Tibetan-language classes by making Mandarin Chinese the primary language of instruction, said the report released on Thursday.

“In 2002, the Tibet Autonomous Region’s government issued decrees that bilingual education meant Chinese and Tibetan were to be given ‘equal weight’, but that wording has now disappeared from official messaging.

“China has started pushing bilingual education in recent years, while remaining vague in its public-facing comments on what bilingual education actually means, the report said.”

चीन के बारे में ही एक अन्य समाचार-सार मुझे पढ़ने को मिला। अधिक विवरण मुझे अभी खोजना है। आगे देखिएः

https://www.bbc.com/news/world-asia-pacific-12050067

“China has banned newspapers, publishers and website-owners from using foreign words – particularly English ones.”

– योगेंद्र जोशी

2 Responses to “हिंदी (हिन्दी) दिवस यानी Hindi Day, 14 Sept 2021”

  1. योगेन्द्र जोशी Says:

    Reblogged this on इंडिया बनाम भारत and commented:

    “हिन्दी दिवस” की सार्थकता पर संदेह व्यक्त करते हुए लिखित ब्लॉग-पोस्ट।

  2. रघुनाथ सिंह प्राध्यापक राजनीति विज्ञान Says:

    तथ्यात्मक जानकारी प्रेषित कर ज्ञान वर्धन कर मातृभाषा हिंदी के प्रति प्रेम जागृत कर निभाने राष्ट्रधर्म आभार आपका जय सनातन धर्म संस्कृति रक्षक की आपके लेखन की आपकी यह पोस्ट छात्रों को साझा होगी
    और भविष्य में भी प्रेषित करते रहें इसी आशा और अपेक्षा के साथ


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