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“अंगरेजी तो पूरे विश्व में प्रयुक्त होती है” – भ्रम जिससे भारतीय मुक्त नहीं हो सकते

अक्टूबर 19, 2014

दृष्टांत अंगरेजी  का – स्पाई कैमरा की प्रयोग-विधि

मैंने हाल ही में एक सस्ते किस्म का “स्पाई कैमरा” शौकिया खरीदा, “ई-शॉपिंग” के माध्यम से । आजकल बाजार में चीन के बने सस्ते – और मेरी राय में घटिया दर्जे के – इलेक्ट्रिॉनिक उत्पाद बहुतायत में मिल जाते हैं । अपने देश में तो ये भी नहीं बन पाते हैं, भले ही हम प्रथम प्रयास में ही स्वनिर्मित यान मंगल ग्रह पर उतारने में सक्षम हों । उक्त कैमरे के साथ प्रयोगविधि संबंधी एक पन्ने पर छपी जो पाठ्यसामग्री यानी निर्देश-पुस्तिका मिली उसकी प्रति यहां प्रस्तुत है| यह द्विभाषी है, अंगरेजी एवं चीनी भाषा में मुद्रित । अंगरेजी स्पष्टतः विदेशियों के लिए होगी जो चीनी भाषा नहीं जानते हैं, और चीनी मैडरिन खुद चीनियों के लिए ।

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समझ से परे अंगरेजी

जब मैंने उपर्युक्त निर्देश-पुस्तिका पढ़ने की कोशिश की तो पाया कि इसमें दी गई पाठ्यसामग्री अपनी समझ से परे है । शब्द अंगरेजी के हैं परंतु उनसे सार्थक वाक्य बन पा रहे हैं ऐसा मुझे लगता नहीं । अवश्य ही वर्तनी की त्रुटियां भी कहीं-कहीं दिखाई देती हैं । सही वाक्य-विन्यास एवं अर्थपूर्ण शब्दों के चयन के अभाव में वर्तनी की खास अहमियत नहीं रह जाती है । हो सकता है कि अनुभवी व्यक्ति पाठ का सही-सही अर्थ खोजने में समर्थ हों, किंतु मुझे ऐसा कर पाने में कठिनाई हो रही थी । यह बात अलग है कि अंततः उक्त स्पाई कैमरा की कार्य-प्रणाली तुक्के, सहज बुद्धि और अनुभव के आधार पर मैं खोज निकालने में सफल हो गया ।

अंगरेजी की उक्त पाठ्यसामग्री ने एक सवाल जरूर मेरे सामने खड़ा किया । क्या वजह रही होगी कि कैमरा बनाने वाली कंपनी ढंग की निर्देश-पुस्तिका तैयार नहीं कर पाई । अवश्य ही कंपनी एक छोटी एवं सामान्य संस्था होगी जिसका कारोबार कुटीर उद्योग के माफिक होगा । लेकिन क्या उसकी पहुंच अंगरेजी जानने वाले एवं सीधी-सरल अंगरेजी में उक्त युक्ति के बारे में लिख सकने में समर्थ किसी व्यक्ति तक नहीं रही होगी ? अपने देश भारत में तो आपको अंगरेजी के विशेषज्ञ भले ही आसानी से न मिलें, किंतु संबंधित युक्ति की कार्यप्रणाली का कामचलाऊ लेखाजोखा तो लिख सकने वाले मिल ही जाते । कदाचित ऐसा हुआ होगा कि जिस चीनी व्यक्ति ने उक्त पाठ तैयार किया हो उसे अपनी अंगरेजी ठीक लगी हो, और उसे शंका ही न हुई हो वह ठीक से नहीं समझा पाया है । यह भी हो सकता है कि अंगरेजी में ठीक-ठाक लिख सकने वाले बिना फीस लिए मिले ही न हों, और संस्था उत्पाद सस्ता बना रहे इस विचार से अधिक खर्च करने को तैयार न हों ।

उपर्युक्त निर्देश पुस्तिका देख मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि चीन में लोगों का अंगरेजी ज्ञान उतना अच्छा नहीं होता जितना अपने देशवासी सोचते हैं । मैं उच्चाध्ययन के सिलसिले में इंग्लैंड में रह चुका हूं तथा अमेरिका, फ्रांस, इटली जा चुका हूं, जहां मेरे अनुभव में यही आया है कि चीन के लोग विविध विषयों का ज्ञान तो अच्छा रख सकते हैं, किंतु उन्हें अंगरेजी में अपनी बात ठीक-से प्रस्तुत करने में कठिनाई होती है । दरअसल यूरोप के देशों और अंगरेजों के पराधीन रह चुके देशों को छोड़ दें तो हम यही पाऐंगे कि वहां के अधिकांश निवासियों को अंगरेजी में असुविधा ही होती है । यह बात चीन, जापान, कोरिया पर बखूबी लागू होती है । हम मीडिया में इन देशों के राजनयिकों, मीडिया-कर्मियों, एवं विषय-विशेषज्ञों को देखकर यह निष्कर्ष निकाल बैठते हैं कि वहां की आम जनता को अंगरेजी आती है और वे उसे रोजमर्रा के जीवन में सफलतापूर्वक इस्तेमाल भी करते हैं ।

अंगरेजी उतनी नहीं प्रचलित जितनी बताई जाती है

मुझे अपने एक मित्र की प्रासंगिक बात याद आती है । सिंगापुर की बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत उनके पुत्र को एक बार कारोबार के सिलसिले में बीजिंग जाना था । तब उन्होंने बताया था कि उनके पुत्र को यह चिंता थी कि किस प्रकार वह अपने चीनी व्यवसायी को अपने उत्पाद के बारे में प्रभावी ढंग से बता पायेगा, क्योंकि उनसे स्तरीय अंगरेजी की अपेक्षा नहीं की जा सकती है, यानी वे पर्याप्त अंगरेजी जानते ही हों यह आवश्यक नहीं है । अपने देश के अंगरेजी पक्षधरों को इस बात पर विश्वास ही नहीं होगा कि चीन के कारोबरी अवश्यमेव अंगरेजी जानें यह जरूरी नहीं ।

जैसा मैंने आरंभ में कहा अपने देश में चीनी माल धड़ल्ले से बिक रहा है । वहां से आने वाले माल में रोजमर्रा की छोटीमोटी उपभोक्ता वस्तुएं प्रमुख हैं और उनमें एक है कैंची । कुछएक दिन पहले मैंने एक कैंची खरीदी थी, उसी की पैकिंग की आगे-पीछे की तस्वीर यहां प्रस्तुत है:

गौर से देखिए कि इस पर अंकित जानकारी मुख्यतः चीनी मैंडरिन में है, कहीं-कहीं अंगरेजी में भी है । मेरा अनुमान है कि इस उत्पाद की पैकिंग अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए न होकर चीन के घरेलू उपभोक्ताओं के लिए होगा, और अपने देश भारत में वह “गलती” से पहुचा होगा । सवाल पूछा जा सकता है कि कैंची चीनी देशवासियों के लिए हो या विदेशियों के लिए, पैकिंग पर तत्संबंधित जानकारी क्या अंगरेजी में ही नहीं होनी चाहिए थी ?

Scissor fromChina B

भारतीय मानसिकता

उक्त सवाल इसलिए कि अंगरेजी की वकालत करने वाले अपने देशवासी यही तो कहते हैं कि सारी दुनिया में अंगरेजी ही तो चलती है ।

क्या हम अपने यहां कल्पना कर सकते हैं कि किसी उपभोक्ता सामग्री के साथ अंकित पाठ केवल भारतीय भाषा में हो ? नहीं ! बिस्कुट का पैकेट हो या नमक का, डिटर्जेंट की पैकिंग हो या कैंची की, उस पर जानकारी अंगरेजी में ही होगी, विदेशियों के लिए नहीं बल्कि अपने ही देशवासियों के लिए जिनमें अंगरेजी पढ़लिख सकने वाले 10-15 फीसदी से अधिक नहीं होंगे । लेकिन परवाह किसे उन लोगों की जो अंगरेजी नहीं जानते ?

अंत में मैं बाजार में उपलब्ध बूंदी के एक पैकेट का चित्र प्रस्तुत कर रहा हूं।

इस पैकेट पर अंकित पाठ मुख्यतः अंगरेजी में है, लेकिन गौर करें कि एक स्थल पर थोड़ी जानकारी अरबी में भी मुद्रित है । लगता है कि यह निर्यात के विचार के मुद्रित है । अपने यहां के व्यवसायी अरबी में जानकारी दे सकते हैं, किंतु भारतीय भाषाओं में नहीं । मैं आज तक नहीं समझ पाया कि उन्हें देशज भाषाओं से इतना परहेज क्यों है ?

इस विषय पर अन्य कई दृष्टांत मेरे विचार में आ रहे हैं । उनकी चर्चा अगले आलेख में । – योगेन्द्र जोशी

Bundi Packet & Arabic

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One Response to ““अंगरेजी तो पूरे विश्व में प्रयुक्त होती है” – भ्रम जिससे भारतीय मुक्त नहीं हो सकते”

  1. jugbox Says:

    मैं अपने कार्यालय में भी पाता हूँ कि अंग्रेजी जानने वाले कम ही हैं, फिर भी अधिकतर काम अंग्रेज़ी में होता है | यह भी अधिकतर पुराने काम का रटा-रटाया और कॉपी किया हुआ रहता है | राजभाषा अनुभाग को देने हेतु हिन्दी में स्तरीय काम अवश्य किया जाता है, हिन्दी में सरलता अनुभव करने के कारण अधिकतर कर्मचारी हिन्दी को महत्त्व देते हैं |


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