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“लिवे देबते” क्या होता है? – मामला लिप्यांतरण का

अगस्त 28, 2013

लिवे देवते टीवी तस्वीर

श्रीमतीजी टेलीविजन पर कार्यक्रम देख रही थीं, और मैं कमरे के एक कोने में कुर्सी पर बैठा अखबार के पन्ने पलट रहा था । अचानक उन्होंने ने आवाज दी, “अरे भई, ये ‘लिवे देबते’” क्या होता है ?

“‘लिवे देबते’ ? देखूं, कहां लिखा है ?” कहते हुए मैं उनकी ओर मुखातिब हुआ । उन्होंने टीवी की ओर इशारा किया । मैंने उस ओर नजर घुमाई तो पता चला कि वे समाचार चैनलों पर कूदते-फांदते ‘एबीपी न्यूज’ पर आ टिकी हैं । पर्दें पर चैनल नं., समय, कार्यक्रम, आदि की जानकारी अंकित थी । चैनल बदलने पर इस प्रकार की जानकारी हिंदी में हमारे टीवी के पर्दे पर 2-4 सेकंड के लिए सदैव प्रकट होती है । उस विशेष मौके पर, राजनेता, पत्रकार तथा विशेषज्ञों के 5-6 जनों के जमावड़े के बीच किसी मुद्दे को लेकर बहस चल रही थी ।

मैंने पाया कि टीवी पर्दें पर उपलब्ध जानकारी में वास्तव में ‘लिवे देबते’ भी शामिल था । उसे देख एकबारगी मेरा भी माथा चकराया । इस ‘लिवे देबते’ का मतलब क्या हो सकता है ? अपने दिमाग का घोड़ा सरपट दौड़ाते हुए मैं उसकी खोज में मन ही मन निकल पड़ा । मेरे दिमाग में यह बात कौंधी कि यह तो हिंदी के कोई शब्द लगते नहीं । स्वयं से सवाल किया कि ये कहीं किसी अन्य भाषा के शब्द तो नहीं जो अंगरेजी के रास्ते यहां पहुंचे हों ! रोमन में ये कैसे लिखे जाएंगे यह जिज्ञासा भी मन में उठी और मुझे तुरंत बुद्धत्व प्राप्त हो गया । समझ गया कि यह तो ‘LIVE DEBATE’ है जो उस कार्यक्रम का सार्थक शीर्षक था । वाह! वाह रे चैनल वालो, कार्यक्रम को हिंदी में ‘जीवंत बहस’ या इसी प्रकार के शब्दों में लिख सकते थे । अथवा इसे ‘लाइव डिबेट’ लिख देते । न जाने किस मशीनी ‘ट्रांसलिटरेशन’ (Transliteration) प्रणाली का उन्होंने प्रयोग किया कि यह ‘लिवे देबते’ बन गया । ध्यान दें कि रोमन अक्षरों के लिए L = ल, I = ई, V = व, E = ए, D = द, B = ब, A = अ, T = त, का ध्वन्यात्मक संबंध स्वीकारने पर उक्त लिप्यांतरण मिल जाता है । परंतु अंगरेजी में रोमन अक्षरों की घ्वनियां इतनी सुनिश्चित नहीं होतीं यह संबंधित लोग भूल गये ।

और जब दूसरे दिन फिर चैनल को हम देखने बैठे तो देखा कि गलती दूर हो चुकी है ।  पर्दे पर ‘लाइव डिबेट’ अंकित नजर आरहा था।

इस घटना ने इस तथ्य की ओर हमारा ध्यान खींचा कि हमारे देश में सर्वत्र अंगरेजी छाई हुई है और हिंदी माध्यमों पर परोसी जाने वाला ज्ञान अंगरेजी में उपलब्ध जानकारी के अनुवाद/लिप्यांतरण पर आधारित होता है; अथवा तत्संबंधित उच्चारण को देवनागरी में प्रस्तुत किया जाता है । इस प्रक्रिया में कभी-कभी हास्यास्पद प्रस्तुति भी पेश हो जाती है, क्योंकि अनुवाद करने वाला शब्दों से संबंधित ध्वनियों से सदैव वाकिफ नहीं होता और शायद उसे किसी स्रोत से जानने की कोशिश भी नहीं करता । दो-एक उदाहरणों पर गौर करें:

(1) समाचारपत्र हिन्दुस्तान में मुझे जर्मनी की समाचार/रेडियो/टीवी संस्था का कभी-कभार उल्लेख देखने को मिल जाता है । लिखा रहता है ‘डाइचे विले’ (Deutsche Welle), जब कि होना चाहिए था ‘डॉइच वेलऽ’ – निकटतम उच्चारण । ऐसा क्यों है ? इसका कारण मेरी समझ में इस तथ्य को नजरअंदाज करना है कि अधिकांश यूरोपीय भाषाओं की लिपि मूलतः रोमन है, जिसे लैटिन भी कहते हैं । आवश्यकतानुसार कहीं-कहीं विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग भी होता है । किंतु हर भाषा के उच्चारण के नियम अलग-अलग हैं जो बहुधा अंगरेजी से पर्याप्त भिन्न रहते हैं । उच्चारण की द्ष्टि से फ्रांसीसी एवं तत्पश्चात् अंगरेजी घटिया मानी जाती हैं । जर्मन भाषा के नियम अधिक साफ-सुथरे हैं । कुछ भी हो, किसी व्यक्ति, संस्था अथवा शहर आदि विदेशी नामों का संबंधित भाषा के बोलने वालों के उच्चारण से भिन्न नहीं होना चाहिए । वह नाम उस भाषा में भी रोमन में ही लिखा जाता है तो क्या उसे हम अंगरेजी के हिसाब से बोलें, क्योंकि हम केवल अंगरेजी से सुपरिचित हैं ? जर्मन में ‘आल्बर्त आइंस्ताइन’ बोला जाता है न कि ‘ऐल्बर्ट आइंस्टीन’ । किसे सही माना जाए ? इन बातों की जानकारी मुझे तब हुई जब एम.एससी. पाठ्यक्रम के दौरान मुझे एक आस्ट्रियाई सज्जन से प्राथमिक जर्मन पढ़ने का मौका मिला । (आस्ट्रिया की भाषा भी जर्मन है ।)

(2) मैं जब एम.एससी. में पढ़ता था तो हमें आरंभ के कुछ समय तक रज्जू भैया जी (जो कालांतर में आर.एस.एस. प्रमुख बने थे) ने भी पढ़ाया था । हम लोग फ्रांसीसी वैज्ञानिक Langevin को ‘लांजेविन’ कहते थे । उन्होंने ही हमें बताया कि यह फ्रांसीसी नाम असल में ‘लाजवां’ बोला जाता है । इसी प्रकार यह भी जाना कि वैज्ञानिक Fermat का नाम फर्मा है न कि ‘फर्मैट’

(3) ब्रिटेन का एक शहर है Leicester जहां अनेक भारतीय बसे हैं । मैं उसे ‘लाइसेस्टर’ कहता था । इंग्लैंड पहुंचने पर पता चला कि वह ‘लेस्टर’ है ।

(4) दो-तीन रोज पहले अखबार में अमेरिका के Yosemite राट्रीय उद्यान (कैलिफोर्निया) के बारे में खबर थी । उसमें इस स्थल को ‘योसेमाइट’ कहा गया था । बहुत अंतर तो नहीं, फिर भी यह ‘योसेमिती’ कहा जाता है, जो स्पेनी भाषा पर आधारित है जिसका प्रचलन आारंभ से ही उस क्षेत्र में काफी रहा है । वहां पहुचने पर मुझे पता चला कि जिस शहर को मैं ‘सैन जोस’ (San Jose) समझता था वह दरअसल ‘सान होजे’ कहलाता है ।

किसी भाषा का विस्तृत ज्ञान कदाचित् किसी को नहीं होता है । किंतु जो लोग पत्रकारिता जैसे व्यवसाय में लगे हों उन्हें सही-सही वर्तनी एवं उच्चारण जानने की उत्कंठा होनी ही चाहिए । आज के युग में शब्दकोश तथा इंटरनेट काफी उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं । – योगेन्द्र जोशी

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5 Responses to ““लिवे देबते” क्या होता है? – मामला लिप्यांतरण का”


  1. किससे कह रहे हैं आप ,ये लोग तो हिन्दी के शब्द लिखते समय भी, सही क्या है ये जानने की कोशिश नहीं करते – हिन्दी अख़बार के एक पन्ने पर दर्जन भर ग़लतियां मिल जाएँगी.


  2. जी, सही मुद्दे पर ध्यान दिलाया है। जिस स्तर की पत्रकारिता हो रही है उसमें ऐसे ही उच्चारणों की गुंजाइश बची है। विविधता भरे संसार में सर्वज्ञानी होना असंभव है लेकिन दुखद सच यह है कि भारतीय चैनल देखने के बाद प्रोफेशनलिज़्म के पूर्णाभाव पर अफसोस होता है। लेकिन यह दुख तब और बढ़ जाता है जब बीबीसी जैसी ख्यातिप्राप्त संस्था का हिन्दी खंड भी अशुद्धियों से भरा दिखाता है। कल ही एक मित्र ने फेसबुक पर हिंदुस्तान टाइम्स का चित्र लगाया जहां अखबार में खबर का हैडिंग तो अङ्ग्रेज़ी में था परंतु अंदर खबर के बजाय पूरा का पूरा लैटिन का फिलर ही था और अखबार ऐसे भी छप कर लोगों के घरों तक पहुँच गया।

  3. विकेश कुमार बडोला Says:

    जोशी जी प्रणाम। कैसे हैं। आपने अच्‍छा विवेचन किया है। लेकिन क्‍या आपको कहीं किसी स्‍तर पर यह नहीं लगता कि अंग्रेजी उच्‍चारण के मामले में स्‍वयं के अन्‍तर्विरोधों, अन्‍तर्जटिलताओं, अव्‍यावहारिकताओं से गहरे दबी हुई है। इसलिए उसके किसी शब्‍द का देवनागरी उच्‍चारण स्‍थापित शब्‍दकोश में अंकित उच्‍चारण के इतर कर भी दिया जाए तो क्‍या फर्क पड़ता है। ध्‍यान यह रखना होगा कि हम लोग हिन्‍दी शब्‍दों का सही अंकन, उच्‍चारण करें।

    • योगेन्द्र जोशी Says:

      धन्यवाद, विवेक जी, और मेरा अभिवादन स्वीकार करें। आपका यह कहना कि अंग्रेजी
      उच्‍चारण के मामले में स्‍वयं के अन्‍तर्विरोधों, अन्‍तर्जटिलताओं,
      अव्‍यावहारिकताओं से गहरे दबी हुई है सही है। इस ओर मैंने इशारा भी किया था
      अपने उक्त आलेख में। दरअसल अंगरेजी की अपनी तमाम खामियां हैं, लेकिब एक बार
      दुनिया में चल निकली तो चल पड़ी। उसके पीछे ऐतिहासिक एवं व्यावसायिक कारण रहे
      है जिसकी चर्चा यहां पर संभव नहीं। बड़ी भाषाएं छोटी भाषाओं को निगलती गयीं हैं
      जैसे-जैसे विभिन्न मानव समुदाय अभिकाधिक निकट आते गये। जो भाषा अधिक लोगों से
      संपर्क साध सकी वह पुष्ट होती गयी। अंगरेजी को इसका सर्वाधिक लाभ मिला, और आज
      उसे अंतरराष्ट्रीय कहा जाने लगा है। मेरा मत है कि उसकी व्यापकता उसके सबसे
      अच्छा होने का प्रमाण नहीं है। रही अगली बात तो हम इस तथ्य को कदाचित अहमियत
      नहीं देते कि हर भाषा का अपना विशिष्ट ध्वनि-समुच्चय होता है जिसकी ध्वनियां
      अन्य भाषाओं से काफ़ी भिन्न हो सकती है। कई बार तो एक की किसी ध्वनि की निकटतम
      तुल्य ध्वनि दूसरे में खोजना मुश्किल होता है। इसलिए जो सर्वाधिक अच्छा हो सके
      वह किया जाना चाहिए। लेख में मेरा मंतव्य यह था कि यदि किसी कारण से हिंदी में
      अंगरेजी शब्द इस्तेमाल करना पड़े तो उसकी ध्वनि वही होनी चाहिए जो प्रचलन में
      हो। “लिवे देबते” अर्थहीन है बस। शुभाकांक्षाओं के साथ। -योगेन्द्र जोशी

      29 अगस्त 2013 2:07 pm को, हिन्दी तथा कुछ और भी


  4. आदरणीय जोशी जी।

    सादर नमस्कार।

    हमें आपके साथ संपर्क करना है। कृपया अपना ई-मेल पता हमें दें।

    अग्रिम धन्यवाद।

    सादर


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