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पुद्दुचेरी की यात्रा और भाषा की समस्या

जुलाई 3, 2013

Auroville - Globe

मैं दो-तीन माह पहले पुद्दुचेरी (पांडिचेरी) घूमने निकला था । पुद्दुचेरी संघीय सरकार द्वारा शासित एक राज्य है, जिसके बारे में मुझे यह जानकारी नहीं थी कि यह वास्तव में दक्षिण भारत में स्थित चार अलग-अलग और छोटे-छोटे भूक्षेत्रों से बनी प्रशासनिक इकाई है, जिनमें पांडिचेरी (293 वर्ग किलोमीटर) नामक स्थान सबसे बड़ा और मुख्यतः शहरी क्षेत्र है । इसके पूर्व में बंगाल की खाड़ी है, अन्यथा यह लगभग चारों तरफ से तमिलनाडु से घिरा है । इस शहर के बाहर ग्रामीण क्षेत्र भी है । इसके अतिरिक्त दक्षिण की ओर कुछ दूरी पर तमिलनाडु से घिरा समुद्र तट स्थित ‘कराईकल’ (160 वर्ग कि.मी.) भी इसका हिस्सा है  । आंध्र के तटीय क्षेत्र में ‘यानम’ (30 वर्ग कि.लो.) और केरला तट पर ‘माहे’ (9 वर्ग कि.मी.) भी इसी राज्य के अंग हैं । ये सभी स्थान कभी फ्रांसीसी प्रभुत्व में होते थे । उसी के अनुरूप इन्हें मिलाकर एक अलग केंद्र शासित राज्य का दर्जा स्वतंत्र भारत में क्यों दिया गया यह मेरी समझ से परे है ।

पुद्दुचेरी यात्रा के विविध अनुभवों में मेरे लिए सबसे अहम रहा है वहां की भाषाई समस्या । यों तो दक्षिण भारत में हिंदी बहुत नहीं चलती है, फिर भी बड़े शहरों एवं पर्यटन स्थलों में हिंदी से अक्सर काम चल जाता है । मेरा अनुभव तो कुछ ऐसा ही रहा है । यहां तक कि चेन्नई में भी आप भाषा को लेकर असहाय नहीं महसूस करेंगे । दक्षिण भारत की यात्राओें के दौरान हिंदी संबंधी अपने अनुभवों पर मैं पहले भी लिख चुका हूं । देखें 14 मई 2009 की तथा उससे पूर्ववर्ती पोस्टें । पुद्दुचेरी तमिलों का प्रदेश है तमिलनाडु की ही भांति । स्थानीय निवासियों का रहन-सहन, खानपान, जीवनशैली, भाषा आदि वैसा ही है जैसा तमिलों का अन्य स्थानों में है । फ्रांसीसियों का उपनिवेश रह चुकने के कारण वहां फ्रांसीसी भाषा-संस्कति का प्रभाव कुछ हद तक देखा जा सकता है । मेरी समझ से उसका कारण प्रमुखतया श्री ऑरोविंदो रहे हैं, जिन्होंने पुद्दुचेरी को अपनी कर्मभूमि चुना और वहीं अपना आश्रम स्थापित किया । श्री ऑरोविंदो फ्रांसीसी भाषा के ज्ञाता थे और फ्रांसीसियों से उनका घनिष्ठ संबंध रहा है, विशेषतः इसलिए कि आश्रम की ‘द मदर’ (मीरा अल्फासा? Mirra Alfassa) फ्रांस से आकर उनसे जुड़ गईं । श्री ऑरोविंदो के विदेशी शिष्यों में फ्रांसीसी लोग ही अधिकांशतः रहे हैं । आज भी उस आश्रम में आने वालों में फ्रांस के लोग ही सर्वाधिक रहते हैं, चाहे वे पर्यटक की हैसियत रखते हों या श्री ऑरोविंदो के अनुयायी होने की ।

पुद्दुचेरी में मुझे हिंदीभाषी अथवा उत्तरभारतीय नहीं दिखे । अवश्य ही उनकी संख्या नगण्य होगी, अतः मेरी नजर में नहीं आये होंगे । सरदार लोगों (सिखों) के बारे में कहा जाता है कि वे देश के हर कोने में मिल जाते हैं । मुझे याद नहीं आ रहा कि वहां किसी पगड़ीधारी सरदारजी को मैंने देखा हो । मारवाड़ी भी अक्सर सभी जगह मिल जाते हैं व्यापारिक गतिविधियों में संलग्न । वहां कहीं कोई रहा हो तो वह वहीं रचबस कर तमिलभाषी हो गया होगा । दक्षिण के अन्य प्रदेशों से आकर बसे लोग शायद होंगे, किंतु मैं उन्हें पहचान नहीं सकता ।

वहां कुल मिलाकर दो-तीन लोग मुझे मिले होंगे जो हिंदी/उर्दू बोलना-समझना कर पा रहे थे । एक व्यक्ति मिला था मुझे एक दुकान के बाहर । मैंने उससे अपने गंतव्य एक चौराहे के बारे में पूछा था, इशारों के साथ हिंदी शब्द बोलकर । उसने साफ हिंदी में जवाब दिया । मेरा अनुमान है कि वह नेपाली रहा होगा । एक और सज्जन मिले अन्यत्र जिनसे मैंने कुछ जानकारी लेनी चाही । हुलिया से मुझे वे मुस्लिम वंधु लगे । मेरा ख्याल है कि दक्षिण के अधिकांश इस्लाम धर्मावलंबी उर्दू की थोड़ी-बहुत समझ रखते हैं ।

मुझे पुद्दुचेरी में भाषाई समस्या का जो अनुभव हुआ वह अन्य प्रमुख नगरों के अनुभव से कुछ भिन्न था । वहां हिंदी से ठीकठाक काम नहीं चल पाता है, और अंगरेजी भी अच्छा काम नहीं देती है । राह चलते मिलने वाले लोग अंगरेजी कम ही बोल पाते हैं ऐसा मुझे लगा । कुछ हद तक अंगरेजी उच्चारण भी एक समस्या रहती है; उनका उच्चारण उत्तरभारतीयों से भिन्न प्रतीत होता है । मैंने अनुभव किया कि पुद्दुचेरी का महत्व आम भारतीयों के लिए शायद नहीं है । वह कोई चर्चित तीर्थस्थल नहीं है और न ही विशेष आकर्षण का पर्यटक स्थल है । अरोविंदो दर्शन में रुचि लेने वाले ही कदाचित् वहां पहुंचते होंगे । इसलिए न हिंदी वहां पहुंच सकी और न ही वहां के बाशिंदों को अंगरेजी की खास जरूरत महसूस हुई होगी । इस बात को ध्यान में रखना होगा कि तमिलनाडु की राजनीति आंरभ से ही हिंदी विरोध पर टिकी रही है । तमिलनाडु तथा पुद्दुचेरी की राजनीति में कोई अंतर नहीं है । इसके अलावा अंगरेजी सरकारी एवं व्यावयायिक कार्यालयों तक ही सीमित कर रह गई होगी । जब मैं वहां के पर्यटन कार्यालय गया तो अंगरेजी में बात करना भी सुविधाजनक नहीं लगा ।

हिेदीभाषी तथा अन्य उत्तरभारतीय पर्यटकों की संख्या अधिक न होने से वहां के आटोरिक्शा चालकों और फुटकर दुकानदारों को भी हिंदी की जरूरत नहीं शायद नहीं रहती है । इसलिए उनके साथ मैंने इशारों एवं अंगरेजी-हिंदी शब्दों की मदद से काम चलाया था । लेकिन इतना सब होने के बावजूद एक अनुभव दिलचस्प रहा । मैं पुद्दुचेरी शहर से 20-25 किलोमीटर दूर ऑरोविंदो आश्रम से संबद्ध ऑरोविंदो विलेज गया था । वहां के पर्यटक स्थलों में यही कदाचित् सबसे आकर्षक है । वहां मुझे विदेशी पर्यटकों के अलावा देश के अन्य भागों से आए पर्यटक भी मिले । वहां ऑरोविंदो ग्राम के उद्येश्य एवं कार्यक्रमों के बारे में एक कमरे में 10-15 मिनट का वीडियो दिखाया जाता है, जिसकी भाषा दर्शकों की इच्छानुसार तमिल, अंगरेजी अथवा हिंदी चुनी जाती है । जब मेरी मौजूदगी में वीडियो प्रदर्शित किया गया तब मैंने  पाया कि देश के विभिन्न भागों से आए संभ्रांत और सुशिक्षित-से लगने वाले दर्शकों ने अंगरेजी के बदले हिंदी को चुना । स्पष्ट है अधिकतर देशवासियों के लिए हिंदी अधिक सुविधाजनक सिद्ध होती है । उस घटना से यही निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि अंगरेजी में प्रायः सभी लिखित कार्य करने के आदी होने के बावजूद अधिकतर देशवासी उसमें कही गई मौखिक बातें सरलता से नहीं समझ पाते हैं । – योगेन्द्र जोशी

Pondichery - Ambedkar Mandapam

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2 Responses to “पुद्दुचेरी की यात्रा और भाषा की समस्या”

  1. विकेश कुमार बडोला Says:

    पुड्डुचेरी में हिन्‍दी की संभावनाओं और असंभावनाओं पर बहुत बढ़िया रिपोर्ताज।

  2. Praveen Says:

    बढ़िया आकलन पर आशा है आने वाले वर्षों में हिंदी वहाँ बढ़ेगी कारण साफ़ हैं


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