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हिंदी, मेट्रोहिंदी, अंगरेजी – भविष्य की संभावना

सितम्बर 30, 2012

इस चिट्ठे की पिछली चार प्रविष्टियों में (देखें तारीख 24 अगस्त 2012 की पोस्ट और उसमें उल्लिखित पूर्ववर्ती आलेखों को) मैंने हिंदी-अंगरेजी के मिश्रण से उपजी एक खिचड़ी भाषा की चर्चा की है, जो आज के महानगरों में अंगरेजी पढ़े-लिखे लोगों द्वारा बोली जा रही है । इसे मैंने मेट्रोहिंदी नाम दिया है । जिस किसी ने इस भाषा के बारे मेरे विचारों को इस ब्लॉग पर पढ़ा हो, और सचेत होकर टीवी चैनलों पर समाचारों/बहसों तथा अपने आसपास विविध मुद्दों पर लोगों के वार्तालापों को सुना हो, उसे यह अंदाजा तो लग ही चुका होगा कि किस प्रकार हिंदी-अंगरेजी मिश्रण की एक नयी भाषा/बोली इस देश में विकसित हो रही है । मैं इस स्थल पर शेष बातें इसी भाषा में व्यक्त कर रहा हूं, ताकि वस्तुस्थिति स्पष्ट हो सके । मेट्रोहिंदी में लिखना मेरे लिए आसान नहीं है, क्योंकि अभी तक देवनागरी के माध्यम से प्रायः साफसुथरी हिंदी में अथवा रोमन के साथ अंगरेजी में लिखने की आदत रही है । अतः उक्त कार्य के लिए अपेक्षया अधिक प्रयास करना पड़ेगा ।

मेट्रोहिंदी की खास बात यह है कि इसमें भारत के लिए कोई जगह नहीं । आपको सभी के मुख से इंडिया सुनने को मिलेगा: इंडिया शाइनिंग, चक दे इंडिया, इंडियन टीम, इंडिया मांगे गोल्ड, एटसेटेरा एटसेटेरा । दरअसल पॉलिटिकल इंडिपेंडेंस के बाद इंडिया में इंग्लिश की इंपॉर्टेन्स घटने के बजाय बढ़ती चली गई । इंडिपेंडेंस के लिए जिन लोगों ने स्ट्रगल किया था उन्होंने यह इक्सपेक्ट किया था कि इस कंट्री की अपनी लैंग्वेज होगी और सूनर ऑर लेटर हमारी सभी एक्टीविटीज उसी लैंग्वेज में होंगी । लेकिन उनके ड्रीम्ज धरे ही रह गये ।

इंग्लिश के फेबर में आर्ग्युमेंट्स
इस कंट्री में एक ऐसा सोशल सेक्सन उभरा है जो ऑफिशियल लैंग्वेज हिंदी को यूज करने में बिल्कुल भी इंटरस्टेड न था, न आज है और न कभी होगा । इस सेक्शन के पास इंग्लिश के फेबर में अनेक रैशनल-इर्रैशनल आर्ग्युमेंट्स हैं । चूंकि कंट्री का एड्मिनिस्ट्रेशन इसी के हाथ में सदा से चला आ रहा है, इसलिए हिंदी समेत सभी इंडियन लैंग्वेजेज पर इंग्लिश आज तक हावी बनी हुई है और आगे भी बनी रहेगी । इनके आर्ग्युमेंट्स के इग्जाम्पुल कुछ यों हैं:

1. इंडिया की इंटिग्रिटी के लिए इंग्लिश जरूरी है ।
2. इंग्लिश इज ऐन इंटरनैशनल लैंग्वेज, इसलिए इंग्लिश को प्रमोट किया जाना चाहिए । हर इंडियन को इंग्लिश सीखनी चाहिए ।
3. दुनिया में हर सब्जेक्ट की नॉलेज इंग्लिश में ही अवेलेबल है, इसलिए इंग्लिश के बिना हम दूसरे कंट्रीज से पिछड़ते चले जाएंगे ।
4. साइंस, इंजिनियरिंग, मेडिसिन जैसे सब्जेक्ट्स की टीचिंग और स्टडी इंडियन लैंग्वेजेज में पॉसिबल ही नहीं है ।
5. आज के कंप्यूटर एज में इंटरनेट का यूज इंग्लिश के बिना पॉसिबल नहीं है ।
6. बिजनेस एंड प्रोफेशनल एक्टिविटीज में इंग्लिश इसेंशियल है । इसलिए नौकरी-पेशे में इंग्लिश जरूरी है ।

और भी आर्ग्युमेंट्स इस सोशल सेक्शन के दिमाग में होंगे । अभी में अधिक नहीं सोच पा रहा हूं ।

मेरे ऑब्जर्वेशन्ज
द सिंपल फैक्ट नाव इज कि इंग्लिश हिंदी और अदर लैंग्वेजेज पर हावी है । इंडियन्ज के दिमाग में यह घुस चुका है कि लाइफ में वे इंग्लिश के बिना सक्सेस नहीं पा सकते हैं । मेरे इन ऑब्जर्वेशन्ज पर नजर डालें और सोचिए कि मैं करेक्ट हूं या नहीं:

1. आम इंडियन, जिसे थोड़ी-बहुत इंग्लिश आती है, रिटन फार्म (लिखित रूप) में हिंदी के यूज में इंटरस्टेड नहीं रहता । उसकी प्रिफरेंस इंग्लिश रहती है । किसी रजिस्टर में नाम/सिग्नेचर रिकार्ड करना हो तो वह इंग्लिश (रोमन) का ही यूज करेगा । ऐसा मैं BHU जैसी यूनिवर्सिटी, जहां मैं टीचिंग एंड रिसर्च करता था, में देखता आया हूं ।
2. कहा जाता है कि हिंदी की पॉपुलरिटी में हिंदी सिनेमा का बड़ा कंट्रिब्यूशन रहा है । बट याद रखें वह हिंदी नहीं मेट्रोहिंदी है । यह भी देखिये कि फिल्मों की कास्टिंग वगैरह देवनागरी में रेयरली होती है ।
3. हिंदी सिनेमा में काम करने वाले एक्टर्स वगैरह मोस्टली मेट्रोहिंदी या प्युअर इंग्लिश में बात करते हैं, भले ही वे हिंदी जानते हों । यही बात स्पोटर्समेन पर भी लागू होती है ।
4. इट इज अ फैक्ट कि हिंदी इस कंट्री की ऑफिशियल लैंग्वेज है न कि इंग्लिश, बट प्रैजिडेंट, प्राइम-मिनिस्टर एंड हाई ऑफिशियल्स फॉरेन टुअर्स या UNO में हिंदी नहीं बोलते हैं, यह जानते हुए भी कि हेड्ज ऑव अदर कंट्रीज अपने यहां की ही लैंग्वेज बोलते हैं । अटल बिहारी बाजपाई वज एन इक्सेप्शन ! आइरनी तो यह है कि हिंदी को खुद यूज नहीं करेंगे लेकिन यूएनओ की ऑफिशियल लैंग्वेजेज में इंक्लूड करने की बात करते हैं ।
5. इंडियन बिजनेसमेन एंड कॉमर्शियल हाउसेज तो हिंदी और उसकी स्क्रिप्ट को यूज न करने के लिए डिटर्मिन्ड हैं । इसलिए आप कंज्यूमर प्रॉडक्ट्स पर रैलिवेंट इंफर्मेशन इंग्लिश में ही प्रिंटेड पाएंगे ।
6. हिंदी-स्पीकिंग हो या न हो, सभी जगह – गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स छोड़ दें – होटल्स, बिल्डिंग्ज, शॅपिंग मॉल्ज, बिजनेस हाउसेज एंड स्कूल-कॉलेज के नाम मोस्टली इंग्लिश में लिखे मिलते हैं ।
7. गवर्नमेंट इंस्टिट्यूशन्स/ऑर्गनाइजेशन्स की बेवसाइट्स इंग्लिश में ही अवेलेबल हैं । कहीं-कहीं उनका हिंदी वर्जन जरूर मिल जाता है, बट ऑनलाइन एक्टिविटी के मामले में इंग्लिश ही यूजुअली काम देती है । फॉर इग्जांपल रेलवे रिजर्वेशन फॉर्म की एंट्रीज इंग्लिश में देनी पड़ती हैं, एंड उसके हिंदी प्रिंट आउट में भी नेम, स्टार्टिंग स्टेशन, डेस्टिनेशन वगैरह रोमन में ही मिलेंगे ।

आई मीन टु से कि गवर्नमेंटल एंड नॉन-गवर्नमेंटल, दोनों लेबल्स पर इंग्लिश की जरूरत फील की जाती है । हिंदी के बिना काम चल सकता है, बट इंग्लिश के बिना नहीं । इसका रिजल्ट यह है कि सभी इंडियन्ज का इंक्लिनेशन इंग्लिश की स्टडी की ओर है । हां बोलचाल के लिए केवल वर्किंग नॉलेज ऑव हिंदी चाहिए, जिसे हिंदी-स्पीकिंग रीजन्ज में लोग बतौर मदरटंग सीख ही लेते हैं । उन्हें काम चलाने के लिए इंप्रेसिव हिंदी-वोकैबुलरी की जरूरत नहीं होती है । बट इंप्रेसिव इंग्लिश-वोकैबुलरी इज ऐन असेट !!

हिंदी का फ्यूचर
मुझे लगता है कि फ्यूचर में प्युअर हिंदी – ऐसी लैंग्वेज जिसमें इंग्लिश वर्ड्स की अन्लिमिटेड मिक्सिंग न हो – केवल लिटरेरी राइटिंग तक सिमट कर रह जाएगी । हाईली-लिटरेट अर्बन पीपल मेट्रोहिंदी ही बोलचाल में यूज करेगा । यहां तक कि हिंदी न्यूजपेपर्स एंड मैगजीन्स में भी मेट्रोहिंदी जगह पा लेगी, जिसका इंडिकेशन उन आर्टिकिल्स एंड ऐड्वरटिजमेंट्स में मिलता है जो आज के यूथ को ऐड्रेस करके लिखे जा रहे हैं । टीवी प्रोग्रैम्ज में तो मेट्रोहिंदी ही दिखती है ।

मैंने जिस सोशल सेक्शन की बात ऊपर कही है उसका इंटरैस्ट प्युअर हिंदी में नहीं है, इसलिए उसकी हिंदी वोकैबुलरी कमजोर रहती है, जिसके चलते हिंदी के बारे उसकी यह ओपीनियन बन जाती है कि हिंदी डिफिकल्ट है । वह कहता है कि उसे हमें सिम्पल बनाना चाहिए और इस पर्पज के लिए इंग्लिश वडर््ज का यूज विदाउट हेजिटेश्न करना चाहिए । ऐसी सिचुएशन में प्युअर हिंदी लिंग्विस्टिक करप्शन से बच पाएगी यह क्वेश्चन इंपॉर्टेन्ट हो जाता है ।

द जिस्ट आव् ह्वट हैज बीन सेड यह है कि हिंदी सर्वाइव करती रहेगी लेकिन अपने इक्सट्रीम्ली करप्ट फॉर्म में । प्युअर हिंदी – चाहे वह लिटरेचर में हो या वेबसाइट पर – को पढ़ने एंड अंडरस्टैंड करने वाले बहुत नहीं रहेंगे । अंगरेजी की सुप्रिमेसी बनी रहेगी, ऐट लीस्ट रिटन फॉर्म में !

जिस लैंग्वेज में मैंने ये आर्टिकल लिखा है उसे आप ऑर्डिनरीली न्यूजपेपर/मैगजीन्स में नहीं देखते होंगे । अभी यह लैंग्वेज बोलचाल में ही सुनने को मिल रही है । बट मेरा मानना है कि फ्यूचर में ऐसे आर्टिकल्स अन्कॉमन नहीं रहेंगे । – योगेन्द्र जोशी

2 Responses to “हिंदी, मेट्रोहिंदी, अंगरेजी – भविष्य की संभावना”


  1. जिसको जुबाँ पर कोई लाता नहीं, उसी बात का सबको डर है यहाँ… आपने ये लेख लिखकर चुभने वाली सच्चाई बोल दी जिसको हर कोई मन ही मन सोचा करता है लेकिन बोलने से डरता है…


  2. आपने बिलकुल सही आकलन किया है। वैसे आकलन तो मुझ और स्‍वप्‍नेश चौहान जैसे अपनी भाषाप्रेमी भी करते हैं। परन्‍तु आपने इसे शब्‍दरुप दे कर अच्‍छा कार्य किया है। आशा है हिन्‍दी के प्रति आपकी भावी शंका का एक विचित्र समाधान तय है, जिसके लिए न तो कोई नीति होगी और ना ही योजना। यह हो कर रहेगा। बस आप मेट्रो हिन्‍दी का प्रसार न करें। इस लेख में विषयगत भावना को दर्शाने के लिए आप ने मेट्रो हिन्‍दी का प्रयोग किया, वह ठीक है। पर भविष्‍य में आप इस दुहराव से बचें, तो हिन्‍दी के लिए अच्‍छा होगा।
    बहुत विचारणीय आलेख।


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