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मेट्रोहिंदीः बहुत बड़ा फर्क है इसमें और पारंपरिक हिंदी में!!

अगस्त 24, 2012

अपने देश के महानगरों में एक ऐसी भाषा जन्म ले चुकी है जो न हिंदी है और न ही अंगरेजी । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । इसे लेकर अपने ब्लॉग की पिछली तीन प्रविष्टियों में मैंने कुछ विचार व्यक्त किए हैं (तारीख 22 जून3 जुलाई, तथा 23 जुलाई) ।

मेरी नजर में मेट्रोहिंदी के अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है । इसका प्रभाव क्षेत्र इतना बढ़ चुका है कि इसे भाषावेत्ताओं एवं शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन के योग्य विषय के तौर पर चुना जाना चाहिए । इसकी कुछएक विशिष्टताओं का संक्षिप्त उल्लेख मैंने पिछले आलेख में किया था । उन्हीं की चर्चा किंचित् विस्तार से मैं यहां कर रहा हूं ।

(1) पारंपरिक हिंदी के वे शब्द, जिन्हें हिंदीभाषी सदियों से बोलचाल में प्रयोग में लेते आए हैं, इस नई भाषा, मेट्रोहिंदी, से विलुप्त होते जा रहे हैं । इनकी सूची निम्न प्रकार से दी जा सकती हैः

1 – गिनती के शब्दः वन् (एक), टू (दो), थ्री (तीन) …
2 – साप्ताहिक दिनों के नामः मंडे (सोमवार), ट्यूज्डे (मंगलवार) …
3- रंगों के नामः रेड (लाल), येलो (पीला), ब्लैक (काला) …
4 – शरीर के अंग एवं रोग-लक्षणों के नामः किडनी (वृक्क – कम ही लोग जानते होंगे!), लिवर (यकृत्), हार्ट-अटैक (हृदयाघात), थ्रोट-इंफेक्शन (गले का संक्रमण), ब्लड-टेस्ट (खून की जांच) ….
5 – ‘प्रगतिशील’ अभिभावकों द्वारा बच्चों को रटाए जा रहे अनेकों शब्दः डॉगी (कुत्ता), टाइगर (बाघ), हॉर्स (घोड़ा), फिश् (मछली), कॉक्रोच (तिलचट्टा – कितने बच्चे जानते होंगे?) …
6 – साग-सब्जी के नाम जो बच्चे सीख रहे हैंः बनाना (केला), ऐपल् (सेब), ऑरेंज (संतरा), टोमेटो (टमाटर), पोटैटो (आलू), …
7 – पारिवारिक रिश्तों के नामः मम्मी/पापा (माता/पिता) तो प्रायः हर हिंदीभाषी के जुबान पर बस चुके हैं (बुजुर्ग अपवाद होंगे!!) । अब कई लोग मॉम/डैड/डैडी पर भी उतर चुके हैं । इसके अलावा हजबैंड/वाइफ (पत्नी/पति), मदर-इन-लॉ/फादर-इन-लॉ (सास/ससुर), ग्रैंडमा/ग्रैंडपा (दादी/दादा), आदि रिश्तों के संकेत के तौर पर इस्तेमाल होते हैं ।

इसी प्रकार कई अन्य क्षेत्रों में भी हिंदी के बदले अंगरेजी शब्दों का प्रयोग हो रहा है ।

(2) मेट्रोहिंदी में उन अंगरेजी शब्दों से परहेज नहीं किया जाता है जो अंगरेजी का सामान्य ज्ञान रखने वाले को तक समझ में न आते हों; अंगरेजी न जानने वाले सामान्य हिंदीभाषी के लिए तो ‘काला अक्षर भेंस बराबर’ की ही स्थिति रहती है । लेकिन इस तथ्य की परवाह किसी वक्ता को नहीं रहती है । ऐसे शब्दों/ पदबंधों की सूची काफी लंबी होगी । इन उदाहरणों पर नजर डालें:

(3) औपचारिक बातचीत के अनेकों शब्द/पदबंध, यथा ‘थैंक् यू’ (धन्यवाद), एक्सक्यूज मी (माफ करें), वेरी गुड (शाबास), कांग्रैच्युलेशन्स (बधाई), हैप्पी बर्थडे (जन्मदिन मुबारक) …

(4) मेट्रोहिंदी में व्याकरणीय ढांचा मूलतः हिंदी का ही है, किंतु उस पर अंगरेजी के व्याकरण का असर साफ नजर आ जाता है । व्याकरण संबंधी विकृति कई रूपों में दिखाई देती है । प्रमुखतया अधोलिखित बिंदु ध्यान आकर्षित करते हैं:

1- अंगरेजी से लिए गये कई संज्ञाशब्दों के बहुवचन बहुधा अंगरेजी के नियमों के अनुसार चुने जाते हैं, न कि हिंदी के व्याकरण के अनुसार, जैसे फ्रेंड्स (न कि फ्रेंडों), ऑफिसेज्, यूनिवर्सिटीज्, …
2- हिंदी के कुछ संयोजक शब्द अंगरेजी के तुल्य शब्दों से विस्थापित होने लगे हैं । इनमें एंड (और) एवं बट् (लेकिन) मुख्य हैं ।
3- मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के विशेाणों/क्रियाविशेषणों का प्रयोग सामान्य हो चला है, जैसे ऑलरेडी (पहले ही), इन् फैक्ट (दरअसल), इक्जैक्ट्ली (ठीक, सही-सही), परफेक्ट्ली (परिपूर्णतः), …
4- गनीमत यह है कि हिंदी के सर्वनामों को अभी छेड़ा नहीं गया है । मैंने किसी के मुख इस प्रकार के वाक्य नहीं सुने हैं:
“माई स्कूल में स्पोर्ट्स कल होंगे ।”; “ही (वह) कॉलेज गया है ।” आदि ।

(5) महानगरीय हिंदी में अंगरेजी शब्दों के साथ ‘होना’, ‘करना’, ‘सकना’ जैसे सहायक क्रियाओं के प्रयोग के साथ उपयुक्त क्रियापदों की रचना आम बात हो चुकी है । दृष्टांत प्रस्तुत हैं:
कॉल किया था (बुलाया था), इरेज् कर दिया (मिटा दिया), स्पाइसेज् ऐड् करो (मसाले डालो), अटेंडेंस ले लो (उपस्थिति दर्ज करो), मॉर्निंग वाक् करिए (सुबह टहलिए), इत्यादि ।

(6) बात इतने पर समाप्त नहीं होती है । बताया जा चुका है कि मेट्रोहिंदी अभी लिखित पाठों में जगह नहीं पा सकी है । भले ही शहरी लोग इसे आम बोलचाल एवं टीवी-बहसों में बेझिझक इस्तेमाल करते हों, उनका लेखन-कार्य लगभग शुद्ध हिंदी/हिंदुस्तानी में ही हो रहा है । फिर भी टीवी एवं पत्र-पत्रिकाओं के विज्ञापनों/सूचनाओं में इसका खूब प्रयोग हो रहा है । जहां कहीं मेट्रोहिंदी में थोड़ा-बहुत लेखन हो रहा है, वहां देवनागरी के साथ-साथ लैटिन लिपि भी इस्तेमाल हो रही है । मतलब यह है कि मेट्रोहिंदी हिंदी के वर्णों एवं लैटिन के अल्फावेट को मिलाकर प्राप्त लिपि को स्वीकार करने लगी है । मात्र देवनागरी इस मिश्रभाषा के लिए अपर्याप्त समझी जाएगी । आपको ऐसे नारे/कथन/विज्ञापन देखने को मिल जाएंगे:

(7) और अंत में सबसे अधिक अहम बात यह है कि इस भाषा का प्रयोक्ता देश को भूलवश भी ‘भारत’ नहीं कहता; अपनी बात कहने में वह ‘इंडिया’ का ही नाम लेता है । आने वाले समय में इस भाषा के माहौल में पल रहे बच्चे यदि भारत का मतलब पूछने लगें तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा ।

अगली बार हिंदी के भविष्य पर अपनी राय । – योगेन्द्र जोशी

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