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मेट्रोहिंदीः क्या है हिंदी-अंगरेजी की इस मिश्रभाषा की खासियत

जुलाई 23, 2012

इस चिट्ठे की पिछली दो प्रविष्टियों, 22 जून तथा 3 जुलाई, में मैंने हिंदी एवं अंगरेजी के अमर्यादित मिश्रण से उत्पन्न ‘क्रिओल’ सदृश भाषा का जिक्र किया था जो तेजी से शहरी पढ़ेलिखे नागरिकों, विशेषतः छात्रों-युवाओं, के बोलचाल की आम भाषा बन रही है । इसे मैंने ‘मेट्रोहिंदी’ नाम दिया है । मेरी नजर में यह तेजी से फैल रही है और ‘शिक्षित’ हिंदीभाषी भारतीय समाज में अपनी जड़ें जमा रही है । यहां मैं उन क्षेत्रों का किंचित् विस्तार से उल्लेख कर रहा हूं जहां इसका प्रयोग सामान्य बात बनती जा रही है ।

मेट्रोहिंदी का प्रयोग
मेट्रोहिंदी अभी लेखन की भाषा नहीं है । अंगरेजी शिक्षित महानगर-निवासी व्यक्ति बोलचाल में तो इसका इस्तेमाल बेझिझक करता है, किंतु लिखते समय पर्याप्त कोशिश करता है कि उसकी भाषा यथासंभव पारंपरिक हिंदी या हिंदुस्तानी पर आधारित हो । अर्थात् उसमें प्रचलित हिंदी लफ्जों का प्रयोग हो और व्याकरणीय शुद्धता कमोबेश बनी रहे । परंतु हिंदी समाचार पत्र-पत्रिकाओं का मेट्रोहिंदी से परहेज घटता जा रहा है । फलस्वरूप अब ऐसे लेख भी पढ़ने को मिलने लगे हैं जो हिंदी में लिखित नहीं माने जा सकते । उन्हें हिंदी का कोई भी विद्वान नहीं समझ सकता जब तक कि उसने अंगरेजी का भी पर्याप्त ज्ञान अर्जित न कर लिया हो । दैनिक वार्तापत्र ‘अमर उजाला’ के एक लेख का छोटा हिस्सा उदाहरण के तौर पर प्रस्तुत है:

इस उदाहरण का “ड्रेसेज में ज्यादा कट्स, सिलुएट्स व फ्रील यूज ना करें” वाक्य किस हद तक हिंदी है यह आप खुद ही तय करें ।

मेट्रोहिंदी के लक्षण
मेरी नजर में मेट्रोहिंदी की खासियतें क्या हैं इनकी संक्षिप्त चर्चा मैं आगे कर रहा हूं । इस विषय की समीक्षा अभी मैंने गहराई से नहीं की है । चलते-चलाते मुझे जो सूझ पाया है वही मैं कहने जा रहा हूं ।

(1) मेट्रोहिंदी में अंगरेजी के कौन-से और कितने शब्द इस्तेमाल होने चाहिए इसका कोई नियम नहीं है ।
(2) इसमें अंगरेजी पदबंध (फ्रेज) भी धड़ल्ले से प्रयोग में लिए जा सकते हैं ।
(3) अंगरेजी के शब्दों के साथ ‘करना’, ‘सकना’, ‘होना’ के प्रयोग से इच्छित क्रियापद बनाए जाते हैं ।
(4) अंगरेजी के संयोजकों (कनेक्टिव) एवं क्रियाविशेषणों (एड्वर्व) के इस्तेमाल में कोई रोक नहीं रहती ।
(5) मेट्रोहिंदी की लिपि में भी लचीलापन देखने को मिल रहा है । आम तौर पर आप आप देवनागरी में लिखते हैं, किंतु चाहें तो सुविधानुसार रोमन लिपि भी यहां-वहां प्रयोग में ले सकते हैं ।

बानगी
नीचे के उदाहरण पर गौर करें:

प्रदर्शित पदबंध/वाक्यांश अपने हिंदी अखबार से चुने हैं मैंने । इसे हिंदी कहें या अंगरेजी ? दूसरा उदाहरण एक विज्ञापन का है:

साफ जाहिर है कि इनमें क्या कहा गया है इसे समझने के लिए हिंदी तथा अंगरेजी, दोनों, की जानकारी पाठक को होनी चाहिए । अंगरेजी न जानने वालों के समझ से परे हैं यह मेट्रोहिंदी ।

अगली पोस्ट में उपर्युक्त ‘खासियतों’ पर तनिक और प्रकाश डालते हुए हिंदी के उज्ज्वल/अंधकारमय भविष्य पर मैं अपनी टिप्पणी प्रस्तुत करूंगा । – योगेन्द्र जोशी

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