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मेट्रोहिंदीः कौन हैं इसके उपयोक्ता (यूजर्स)?

जुलाई 3, 2012

मेट्रोहिंदी

इस चिट्ठे की पिछली पोस्ट (22 जून) में हिंदी-अंगरेजी की एक मिश्रित भाषा की चर्चा आंरभ की गई है, जिसे मैं मेट्रोहिंदी कहता हूं । यह हमारे महानगरों में निरंतर विस्तार एवं लोकप्रियता पा रही भाषा है, जिसमें अंगरेजी के मिश्रण की मर्यादा क्या हो इस सवाल का कोई महत्त्व ही नहीं है । हिंदी में अंगरेजी का मिश्रण वक्ता की सुविधा और उसके हिंदी-अंगरेजी ज्ञान पर निर्भर करता है । इस वर्णसंकर भाषा को मैं नितांत नूतन भाषा के रूप में देखता हूं, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी से मिलती-जुलती होने के बावजूद उर्दू अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती है । कौन हैं जो मेट्रोहिंदी उपयोग में ले रहे हैं इसका उत्तर देने से पहले किस तरह के बोल हमें टेलीविजन चैनलों या अन्य अनेक मंचों पर अक्सर सुनने को मिलते हैं इनके दृष्टांत प्रस्तुत करता हूं:

(1) चिड़ियाघर में मां बेटे सेः “ये टाइगर नहीं, लेपर्ड है । डौन्च्यू रेमेंबर कि टाइगर के डार्क स्ट्राइप्स होती हैं, न कि डार्क स्पॉट्स ।”
(2) दो पर्यटकों के बीच संवादः “एक्सक्यूज मी, इस कैमरे से मेरा स्नैपशॉट ले देंगे?” … “या, श्युअर ।” … “थैंक्यू इंडीड ।”
(3) टीवी विज्ञापनः “… ये क्रीम रखे आपकी स्किन सॉफ्ट, स्मूथ, और फेअर ।”
(4) सिने-अभिनेताः “फिल्म में परफॉर्म करना चैलेंजिंग एंड एंजॉयेबल् टास्क था । मुझे एक रेबेलियन का रोल प्ले करना था जो … ।”
(5) नृत्य प्रतिस्पर्धा निर्णायकः “एक्सेलेंट परफॉर्मेन्स! आप दोनों के डांस मूवमेंट्स का सिंक्रोनाइजेशन काबिलेतारीफ था ।”
(6) ओलंपिक टीम प्रबंधकः “… इंडिया की परफॉर्मेन्स अच्छी रहेगी । वेटलिफ्टिंग, रैसलिंग, एंड बॉक्सिंग में हमारे प्लेयर्स जरूर मेडल जीतेंगे ।”
(7) समाचार वाचकः “… पीएम ने कहा कि हम अपने नेबरिंग कंट्रीज के साथ कॉर्डियल रिलेशन्स चाहते हैं । इसके लिए डिप्लोमैटिक लेवल पर जरूरी स्टेप्स लिए जा रहे हैं ।”
(8) टीवी समाचारः “… हाइवे पर पिल्ग्रिम्स से भरी बस का सीरियस एक्सिडेंट हो गया है । पंद्रह पैसें जर्स के डेथ की ऑफिशियल रिपोर्ट मिली है । सीरियस्ली इंज्यर्ड को पास के हॉस्पिटल्स में एड्मिट कराया गया है; शेष को फर्स्ट एड के बाद छोड़ दिया गया है ।”

मेट्रोहिंदीः अंगरेजी मोह से जन्मी भाषा

मेट्रोहिंदी ऐसी भाषा है जिसे आम हिंदीभाषी नहीं समझ सकता है, क्योंकि इसमें अंगरेजी के तमाम ऐसे शब्द शामिल रहते हैं जिनका ज्ञान उसे हो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती है । उसकी बातें आम हिंदीभाषी समझ भी पा रहा है या नहीं इस बात से मेट्रोहिंदी बोलने वाले को कोई सरोकार नहीं रहता है । उसके अपने वर्ग के लोग बातें समझ ले रहे होंगे यही पर्याप्त माना जाता है ।

वास्तव में यह उन लोगों की भाषा है जिन्हें प्राथमिक दर्जे की हिंदी आती है और जिनका अंगरेजी ज्ञान हिंदी की तुलना में बेहतर होता है । अपनी हिंदी को अधिक समृद्ध करने का विचार उन लोगों के मन में उपजता ही नहीं । हिंदी का उनकी शब्दसंग्रह या तो अपर्याप्त होती है या अभ्यास के अभाव के कारण उसके मुख से सही मौके पर सही शब्द निकल ही नहीं पाते हैं । इसके विपरीत अंगरेजी आधारित शिक्षा एवं व्यावसायिक कारणों से वह अंगरेजी के निरंतर अभ्यास का आदी होता है । भले ही वह धाराप्रवाह अंगरेजी न बोल पाता हो, अंगरेजी के शब्दों का मौके-बेमौके उसके मुख से निकलना थमता नहीं है ।

“गरीब की लुगाई सबकी भौजाई”

हिंदी के मामले में “गरीब की लुगाई सबकी भौजाई” की लोकोक्ति सटीक बैठती है । अपने समाज में ऐसे लोगों की अच्छीखासी संख्या है जिनका अंगरेजी के प्रति लगाव अद्वितीय है । उनकी धारणा है कि हिंदी में अंगरेजी के शब्दों को जहां-तहां ठूंस देना किसी भी हाल में अनुचित नहीं है । खुद हिंदी के तथाकथित पक्षधर भी यह कहते देखे जाते हैं कि ऐसा करने से हिंदी समृद्ध होती है । किंतु जब बात अंगरेजी की होती है तो ये ही लोग उसकी शुद्धता के प्रति सचेत रहते हैं । क्या मजाल कि हिंदी का एक शब्द भी भूल से उनकी अंगरेजी में सुनने को मिल जाए । आप किसी को यों बोलते हुए कभी – जी हां कभी भी, सपने में ही सही – सुन सकते हैं:
“द पीएम सेड, ‘वी वुड लाइक टु हैव मैत्रीपूर्ण संबंध विद अवर पड़ोसी कंट्रीज ।’”

अपने देश में अंगरेजी महज एक ‘और’ भाषा नहीं है, जैसे दुनिया की तमाम भाषाएं होती हैं । अंगरेजी को तो देश की प्रगति एवं उन्नति का मंत्र और सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार समझा जाता है । इसलिए देशज भाषाओं में पूरे गर्व के साथ इसका ‘तड़का लगाने’ की एक प्रथा अपने समाज में चल चुकी है । इसी ‘तड़के’ का फल है अपनी मेट्रोहिंदी ।

मेट्रोहिंदी के उपयोक्ता यानी ‘यूजर्स’

हिंदीभाषी क्षेत्र में कौन उर्दू बोलता है और कौन नहीं यह कह पाना कठिन है । उर्दूभाषी होने का दावा करने वाले भी मीरजा गालिब की उर्दू समझ ही लेंगे जरूरी नहीं है । अरबी-फारसी के अल्फाज कुछ ज्यादा ही हों और ‘जहां का नूर’ न कहकर ‘नूर-ए-जहां’ जैसे पदबंध इस्तेमाल हों तो उर्दू हो गयी । ठीक इसी प्रकार हिंदी में अंगरेजी ठूंसते जाइए, ‘एंड’, ‘इवन’, ‘ऑलरेडी’ जैसे अव्ययों का मुक्त हृदय से प्रयोग करिए तो हो गयी मेट्रोहिंदी । मोटे तौर पर कहूं तो ये लोग मेट्रोहिंदी बोलते हैं:

(1) ‘इंग्लिश-स्कूलों’ में शिक्षित – विद्यालयों जिनकी शिक्षा ‘इंग्लिश-मीडिया’ विद्यालयों में होती है, जहां अंगरेजी सीखने और उसीका शब्दसंग्रह बढ़ाने पर पूरा जोर रहता है । छात्रों के मन में यह भावना बिठा दी जाती है कि कामचलाऊ हिंदी पर्याप्त है ।

(2) अंगरेजी के व्यावसायिक प्रयोग वाले – अपने देश में लगभग सभी व्यावसायिक कार्य अंगरेजी में ही संपन्न होते हैं । इस कार्य के दौरान कर्मचारी अंगरेजी का ही अभ्यास पाते हैं । यही अंगरेजी उनके परस्पर बातचीत में घुस जाती है । वैज्ञानिक, चिकित्सक, अर्थशास्त्री, कानूनविद्, आदि सभी इस वर्ग में आते हैं ।

(3) अंगरेजी से प्रतिष्ठा के इच्छुक – अपने समाज में अंगरेजी प्रतिष्ठा की निशानी है । जिसे अंगरेजी आती है वह अंगरेजी शब्दों के माध्यम से अपना रुतबा कायम करना जरूरी समझता है । आम धारणा है कि अंगरेजी बोलने वाले को तवज्जू दी जाती है ।

(4) भाषाई हीनभावना से ग्रस्त – यही प्रतिष्ठा है जो अंगरेजी कम या नहीं जानने वालों की हीन भावना के रूप में दिखाई देती है । वे अपना अंगरेजी ज्ञान सुधारने की कोशिश के साथ-साथ मौके-बेमौके हिंदी में अंगरेजी ठूंसना जरूरी समझने लगते हैं । – योगेन्द्र जोशी

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