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अतानु या अतनु? – रोमन लिपि और नामोच्चारण की समस्या

मई 11, 2011

बीते मार्च माह की 26 तारीख अहमदाबाद अवस्थित आई.आई.एम. (इंडियन इंस्टिट्यूट आफ् मैनेजमेंट, भारतीय प्रबंधन संस्थान) में दीक्षांत समारोह था । मुझे भी उस समारोह में बतौर अतिथि के उपस्थित होने का अवसर मिला था । उस आयोजन में देश के माननीय प्रधानमंत्री, डा. मनमोहन सिंह, एवं गुजरात राज्य के माननीय मुख्यमंत्री, श्री नरेंद्र मोदी, भी मौजूद थे और दोनों ने छात्र, शिक्षक एवं अतिथि समुदाय को संबोधित किया । जहां श्री मोदी ने अपने विचार अलिखित, स्वतःस्फूर्त एवं दमदार तरीके से पेश किये, वहीं डा. सिंह का संबोधन लिखित, महज औपचारिक, एवं नितांत निष्प्रेरक था । डा. सिंह के संबोधन के प्रति निराशाजनक प्रतिक्रिया मैंने कुछएक छात्रों के मुख से सुनीं ।

अस्तु, इस स्थल पर मेरा इरादा उस आयोजन की व्यवस्था, संबोधनोंउद्बोधनों आदि के बारे में चर्चा करने का नहीं है । नामोच्चारण की एक समस्या जो मैंने वहां देखी वह मेरे प्रस्तुत आलेख का विषय है । समारोह के दौरान जब छात्रों को अर्जित उपाधियां प्रदान की जा रही थीं, तब उनके नाम कितने सही उच्चारित हो रहे थे यह ठीकठीक बता पाना मेरे लिए संभव नहीं है । मैं एकएककर पुकारे जा रहे नामों को बहुत ध्यान से सुन भी नहीं रहा था । किंतु एक नाम, जिसने अनायास मेरा ध्यान खींचा वह था अतानु। असल नाम अतनुया अतनूहै, जो बंगाली समुदाय में पर्याप्त प्रचलित है, दोनों एकार्थी हैं, और मेरी समझ से इनका अर्थ तनुहीन’, ‘बिना देह का’, ‘अशरीरीअथवा अमूर्तहोना चाहिए । वस्तुतः संस्कृत में तनुस्’ (नपुंसक लिंग) तथा तनू’ (स्त्रीलिंग, दीर्घ ऊ की मात्रा) दोनों हैं । प्रचलित भाषाओं में तनुस्को तनु की भांति प्रयोग में लिया जाएगा । किसी पुरुष का नाम ह्रस्व उ के साथ लिखा जाना पारंपरानुरूप है ।

वस्तुतः उस छात्र का नामअतनु राय’ (या रॉय) था । उससे मेरा परिचय पहले ही हो चुका था, अपने बेटे के माध्यम से । संयोग से यह नाम मेरे लिए सुपरिचित था । कोई तीन दशक पहले ठीक इसी नाम का एक छात्र मेरे विश्वविद्यालय के चिकित्सा संस्थान में डाक्टरेटउपाधि के लिए अध्ययनरत हुआ करता था । मेरे पड़ोस में रहने के कारण उससे हमारा अच्छाखासा परिचय था । तब तक यह नाम मेरे लिए पूर्णतः नया और कभीसुनाहुआ था । उक्त दीक्षांत के अवसर पर संयोग से ठीक उसी नामजातिनाम के एक और छात्र से मेरा संक्षिप्त परिचय हो गया था । दीक्षांत आयोजन के पश्चात् मैंने उससे पूछा कि उसका नाम क्या सही पुकारा गया था । तब उसने बताया कि नाम तो अतनु ही है । इस नाम में की विशिष्ट बंगाली ध्वनि निहित है, किंतु अन्य भाषाभाषी अतनुके अनुरूप ही पुकारेंगे ।

उस अवसर पर मेरे जेहन में यह सवाल उठा कि उक्त नाम का सही उच्चरण न कर पाने का क्या कारण रहा होगा । संस्था से जुड़े किसी व्यक्ति से उत्तर पाने की कोशिश मेरे लिए संभव नहीं थी । मैंने स्वयं संभव तार्किक उत्तर सोचने का प्रयास किया । जो मैं समझ पाया वह यों हैः हमारे देश में भले ही घोषित राजभाषा हिंदी हो, लगभग सभी कामकाज अंग्रेजी में ही होते हैं, खास तौर पर शिक्षण संस्थाओं में इस्तेमाल होने वाली वाली छात्रछात्राओं की सूची तैयार करने में । आईआईएम जैसी संस्था में तो अंग्रेजी से इतर कुछ भी स्वीकार्य नहीं हो सकता है । रोमन लिपि की एक गंभीर कमी यह है कि इसमें लिखित किसी नाम का सहीसही उच्चारण क्या होगा यह कह पाना कठिन होता है । वस्तुतः हर उस लिपि के साथ ऐसी समस्या होती है, जो ध्वनिमूलक नहीं होती है । अंग्रेजों के यहां नामों की भरमार नहीं है । उस समाज में व्यक्तियों के नाम घूमफिर के वहीवही रहते हैं, अतः वहां के बाशिंदों के नामों की वर्तनी और उनके उच्चारण लोगों को कमोबेश मालूम रहते हैं ।

किंतु हमारे यहां, विशेषतः हिंदू समाज में नामों की विविधता उल्लेखनीय है । हाल के वर्षों में तो एक नया चलन देखने को मिल रहा है, जिसके अनुसार बच्चों के नाम खोजखोजकर ऐसे चुने जाने लगे हैं जो नितांत नये हों, कभी सुने न गये हों, और जिस नाम का दूसरा व्यक्ति ढूढ़ने पर भी न मिले । अपनी देशज लिपियों में इन्हें लिखने और उसके अनुसार उच्चारित करने में कोई परेशानी नहीं होती है । किंतु रोमन में व्यक्त किये जाने पर इन नामों को सहीसही पुकारना कठिन होता है, विशेषतः जब वे कभी पहले सुने ही न गये हों । अपने देश के कामकाज में रोमन लिपि को ऐसे नहीं ढाला गया है कि हमारी अलगअलग ध्वनियों को स्पष्टतः भिन्न रोमन लेटर/लेटर्ससे व्यक्त किया जा सके । आप अंग्रेजी `a’ को देखकर निश्चित तौर पर यह नहीं कह सकते कि वह की ध्वनि व्यक्त करता है या की । कुछ ऐसा ही `i’ के मामले में भी है । वस्तुतः ऐसे अनेकों उदाहरण दिये जा सकते हैं जिनके उच्चारण में संदिग्धता का सामना करना पड़ सकता है । क्या आप ऋतुएवं रितुको रोमन में स्पष्टतः भिन्न वर्तनी से व्यक्त कर सकते हैं ? रोमन में बुद्ध (बुद्धा?) एवं बुड्ढा में फर्क कर पाना कठिन है । इस प्रकार के अनेकों उदाहरण देखने को मिल जाएंगे । अवश्य ही विशेषक चिह्नों (diacritics) का प्रयोग का संभव है, किंतु आम लेखन में उनका प्रयोग कोई नहीं करता है, और न ही उनका प्रयोग सुविधाजनक होता है ।

लेकिन भारतीय जनमानस अंग्रेजी एवं उसकी लिपि रोमन (या लैटिन) के समक्ष इस कदर नतमस्तक है कि उसे वे अमृत तुल्य, जीवनरक्षक, तथा अपरिहार्य लगते हैं । उसके लिए भारतीय लिपियों का ध्वन्यात्मक होना कोई महत्त्व नहीं रखता है । अब तो सर्वत्र अंग्रेजी एवं रोमन का ही बोलबाला नजर आता है । हिंदी आम बोलचाल तक सीमित है वह भी अंग्रेजी शब्दों की भरमार के साथ और वह दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकी है । अतः पढ़ेलिखे भारतीयों बेहतर होगा इंडियनों कहना का एक वर्ग ऐसा उभर चुका है जिसका हिंदी एवं देवनागरी का ज्ञान अत्यल्प है और अपने अज्ञान पर उसे खेद नहीं बल्कि गर्व का अनुभव होता है । यह वर्ग देशज साहित्य से परहेज रखता है; वह आम तौर पर भारतीय लिपियों में निबद्ध समाचारपत्रोंपत्रिकाओं को नहीं पढ़ता है; उसके पुस्तकसंग्रह में शायद ही कोई देशी भाषा की पुस्तक देखने को मिले । इस वर्ग के लोगों का देशी भाषाओं के शब्दों पर आधारित नामों का ज्ञान अपर्याप्त होना कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी । मैं समझता हूं कि आई.आई.एम. जैसी संस्थाओं में बहुत कम लोग होंगे जो आजकल प्रचलन में लिए जा रहे अपारंपरिक एवं असामान्य नामों का ठीकठीक उच्चारण करने में समर्थ होंगे

मैंने ‘अतनु रॉयका उदाहरण पेश किया है । उस दीक्षांत समारोह से संबद्ध दीक्षीत छात्रों की सूची में मुझे ऐसे नाम लिखे हुए मिले जिनका उच्चारण क्या होगा यह मैं तय नहीं कर सका । कुछएक यों हैं:Ashtha Agarwalla (आस्था/अष्ठ अगरवाल्ला/अगरवाल/…), Aarthy Sridhar (आरती/आर्ती/आरथी/… श्रीधर/स्रीधर), Astha Modi (आस्था/अष्ठा मोदी), Anil Meena (अनिल मीणा/मीना), Mansi Chilalia (मानसी/मांसी चिललिया/चिलालिआ), Pritika Padhi (प्रीतिका पाढी/पाधी), V. M. Avinass Kumar (वी. एम. अविनाश/अविनास्स कुमार), Maneka Bhogale (मेनका/मनेका भोगले/भोगाले) हाल में मुझे अपने परिचितों के बच्चों के ये अपरिचित से नाम सुनने को मिलेः अरविंदाक्षाएवं आयुषी। पहला नाम रोमन में सहीसही कैसे लिखा जाना चाहिए Arvindaksha या Aravindaksha ? और दूसरे नाम की उचित वर्तनी क्या होनी चाहिए Ayushi या Ayushee ? जिसने इन नामों को पहले कभी सुना न हो और जिसे संस्कृत का थोड़ाबहुत ज्ञान न हो उसके लिए इनका सही उच्चारण संभवतः कठिन हो । लेकिन देवनागरी में लिखे होने पर यह समस्या नहीं रहती है, भले ही इन सार्थक नामों के अर्थ मालूम न हों । (अरविंदाक्ष = अरविंद + अक्ष; उससे स्त्रीलिंग में अरविंदाक्षा, कमल के समान नयन वाली । आयुषी संस्कृत के नपुंसक शब्द आयुस्’ = आयु से बना हुआ प्रतीत होता है स्त्रीत्व का बोध कराने के लिए । मैं कह नहीं सकता कि संस्कृतज्ञ इसे स्वीकार्य शब्द मानेंगे कि नहीं; आयुष्मान्, आयुष्मती अवश्य प्रचलित हैं ।)योगेन्द्र जोशी

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One Response to “अतानु या अतनु? – रोमन लिपि और नामोच्चारण की समस्या”


  1. संस्कृत का क्या। हिन्दी में भी भरद्वाज-भारद्वाज बाप-बेटे हैं।


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