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अपने छात्रों की अंग्रेजी के नमूने ऐसे भी होते हैं!

फ़रवरी 24, 2011

अपना एक पुराना शौक रहा है कि कहीं कोई दिलचस्प बात नजर आ गयी तो उसकी जानकारी को सहेजकर रख लूं । इस मामले में अखबार की कटिंग सहेजना सबसे आसान रहा है । अन्यथा संबंधित दस्तावेज की फोटोकापी करके काम चलाना विकल्प रहा है । इधर जब से स्कैनर और इलेक्ट्रानिक कैमरा जैसे साधन बटोर लिया हूं, दस्तावेजों की अंकीय (डिजिटल) कापी बनाकर कंप्यूटर पर सहेजना सुविधाजनक हो गया है ।

दो-तीन रोज पहले जब मैंने आलमारी में संजोये कागजपत्रों को उलटा-पुलटा तो कुछएक जीरॉक्स कागजात मिले । गौर से देखा तो पाया कि वे परीक्षार्थियों की उत्तर-पुस्तकाओं के कुछ चुने हुए अंशों की फोटोकापी हैं । याद आया कि उनमें से कुछ के उत्तरों से मैं इतना भावविभोर हुआ कि उनकी आंशिक प्रति बना ली । मेरे लिए यह बात अधिक दिलचस्प नहीं थी कि सवालों के उनमें प्रस्तुत उत्तर कितने सही या गलत रहे । मुझे तो उत्तरों के अंग्रेजी पाठ कहीं ज्यादा दिलचस्प लगे जो मेरी समझ से मीलों दूर थे । नमूने प्रस्तुत हैं, देखिए:

ये नमूने अंदाजन 15-16 साल पहले के होंगे । घटना की तारीखें ठीक-से अब याद नहीं, और वह बहुत माने भी नहीं रखती हैं । तब किसी समय मैंने अपने विश्वविद्यालय की बी.एससी. कक्षा के भौतिकी (फिजिक्स) के एक प्रश्नपत्र की उत्तर-पुस्तिकाओं का मूल्यांकन किया होगा इतना जरूर कह सकता हूं । उनमें से कुछ पुस्तिकाओं में प्रश्नों के उत्तरों को देखकर मेरा माथा जरूर ठनका होगा और मैंने कुछएक के कतिपय अंशों की फोटोकापी कर ली होगी ।

अलग-अलग पुस्तिकाओं के दिये गये मात्र दो-तीन पंक्तियों में क्या लिखा है यह समझने के लिए आपको भौतिकी का अध्येता होने अथवा ‘न्यूक्लियर फ्यूजन’, ‘जेनर डायोड’, ‘एक्स-रेज’ आदि से सुपरिचित होने की आवश्यकता नहीं है । आपको तो अपने अंग्रेजी के सीमित-असीमित ज्ञान के आधार पर यह देखना है कि जो लिखा है उसमें कुछ अर्थ आप ढूढ़ पा रहे हैं कि नहीं । मेरी तरह आपको भी हार माननी पड़ेगी ।

मेरे कुछ छात्रों की अंग्रेजी इसी स्तर की रही है । मेरे अनुमान से उनकी संख्या कम से कम 10% तो रही ही होगी । मैंने इस बारे में कभी सर्वेक्षण तो नहीं किया किंतु प्रयोगशाला में विषय संबंधी प्रश्नोत्तरों को सुनकर और अंग्रेजी को लेकर उनकी असहजता देखकर मुझे ऐसा ही लगा है । कुछ ने तो खुलकर कबूला भी है कि उन्हें अंग्रेजी से परेशानी होती है । निःसंदेह छात्रों में कुछएक की अंग्रेजी ठीक-ठाक भी मैंने पाई है । परंतु जिसे मैं उत्तम दर्जे की कहूं ऐसी अंग्रेजी केवल अपवाद रूप में ही मैंने देखी है, भले ही कई छात्र अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से पढ़कर क्यों न आए हों । दरअसल अब अंग्रेजी की स्कूली शिक्षा में व्याकरण पर जोर काफी कम रहता है, और नतीजन भाषा के इस पक्ष की मजबूती अपर्याप्त रहती है । जिन छात्रों का नमूना प्रस्तुत है उनका दुर्भाग्य यह रहा है कि वे कमजोर, गरीब, तथा अपेक्षया कम शिक्षित परिवारों से आते हैं, और अंग्रेजी भाषा की उनकी शैक्षिक नींव बहुत कमजोर रहती है । आरंभिक शिक्षा क्षेत्रीय भाषा-माध्यम से होने के कारण, अंग्रेजी सुधारने के अपर्याप्त संसाधनों/प्रयासों के कारण जब उन्हें स्नातक कक्षा में अनायास अंग्रेजी माध्यम से पठन-लेखन करना पड़ता है तो परेशानी शुरू हो जाती है । अंग्रेजी पुस्तकों को कुछ हद तक वे भले ही पढ़-समझ लें, अपनी जानकारी को अभिव्यक्त करने की उनकी क्षमता औसत से कहीं नीचे रहती है

मैंने इंटरनेट से जानकारी लेनी चाही कि अपने ‘महान्’ देश में कितने लोग ‘इंग्लिश स्पीकर्स’ हैं, तो विकीपीडिया ने 12% का आंकड़ा प्रदान किया । अन्य वेबसाइटों पर भी कुछ इसी प्रकार का आंकड़ा देखने को मिला । (उदाहरण के लिए यहां देखें ।) ध्यान दें यह आंकड़ा ‘स्पीकर्स’ यानी अंग्रेजी बोल सकने वालों की तादात का है । मतलब यह है कि हर 10-12 जनों में से एक व्यक्ति अंग्रेजी बोल सकता है । मुझे नहीं लगता है कि यह आंकड़ा सही है । पता नहीं किस आधार पर यह जानकारी प्रस्तुत की गयी है । इस विषय में मेरे अपने तर्क हैं ।

भारत में अंग्रेजी जनभाषा नहीं हैइसे लोग घर-परिवार में, अड़ोस-पड़ोस से, अथवा दोस्तों-परिचितों आदि से नहीं सीखते हैं । आम तौर पर बच्चे अंग्रेजी का ज्ञान स्कूलों की औपचारिक पढ़ाई से पाते हैं । वे रोमन लिपि में लिखना और अंग्रेजी में लिखित पाठ पढ़ना तो सीख जाते हैं, किंतु उनके अंग्रेजी में बोल पाने पर कोई जोर नहीं रहता है । उनकी लेखन क्षमता का मूल्यांकन अवश्य होता है । (कदाचित् तथाकथित अंग्रेजी स्कूलों में बहुत कुछ होता होगा, लेकिन तब भी स्कूलों से बाहर तो स्थानीय भाषा ही बच्चे सीखते हैं ।)

किसी भाषा के सीखने की चार स्पष्टतः भिन्न किंतु घनिष्ट तौर पर संबद्ध 4 चरण होते हैं: समझना (to understand), पढ़ना (to read), लिखना (to write), और बोलना (to speak) । औपचारिक पढ़ाई के माध्यम तथा पुस्तक-पत्रिकाओं से सीखी भाषा के मामले में ये चार चरण मेरे मत में इसी क्रम में कठिन से कठिनतर होते हैं । निरक्षर लोगों के मामले में पढ़ने और लिखने की बात नहीं की जा सकती है । उनकी भाषा अपने परिवेश से सीखी हुई होती है और सामान्यतः वह प्रचलित एवं जनभाषा होती है, या इतर भाषाभाषियों के संपर्क से सीखी गयी होती है । मेरी इस चर्चा के केंद्र में निरक्षर लोगों से अलग महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में पढ़ने-लिखने वाले छात्र हैं । उनके मामले में पढ़ पाना तथा उसे समझ पाना सबसे पहले होता है, और उसी के आधार पर वे आगे बढ़ पाते हैं । उसी के बाद वे लिखने-बोलने की बात सोच सकते हैं । पर्याप्त भाषा ज्ञान एवं अभ्यास के अभाव में उनके लिए लिख पाना आसान नहीं होता, और बोल पाना तो सर्वाधिक कठिन होता है, क्योंकि स्वतःस्फूर्त विचारों को बिना रुकावट के प्रवाह के साथ व्यक्त कर पाने के लिए पर्याप्त अभ्यास चाहिए, जो कम ही लोगों के लिए संभव होता है । लिख पाना अपेक्षया सरल होता है, क्योंकि उसके लिए प्रवाह की गति तेज एवं अबाधित हो यह आवश्यक नहीं । आपके पास रुक-रुककर और सोच-सोचकर लिखने का अवसर होता है, आवश्यकतानुसार विराम लेते हुए । यदि आप बोल सकते हैं तब लिख पाने में कठिनाई का सवाल ही नहीं उठता है

अगर यह माना जाए कि इस देश के 10-12% लोग अंग्रेजी बोल पाते हैं, जैसा विकीपीडिया जैसी जालस्थलों पर प्राप्य जानकारी बताती है, तो अवश्य ही इससे अधिक लोग अंग्रेजी लिख सकने में समर्थ होंगे । किंतु स्नातक (ग्रैजुएशन) कक्षा के छात्रों के साथ के अपने अनुभवों से मुझे नहीं लगता है कि देश में इतने अधिक लोग अंग्रेजी लिख पाते होंगे । महानगरीय जीवन जी रहे और कार्यालयों में अंग्रेजी में तैयार दस्तावेजों पर सिर खपा रहे लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि अंग्रेजी में लिख पाने वाला जनसमुदाय वाकई विशाल है । किंतु व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह शंका जरूर है कि रोजमर्रा के दस्तूरी कामकाज से हटकर किसी मुद्दे पर स्वतंत्र रूप से बोल पाना तो दूर कुछ लिख पाना भी अंग्रेजी जानने का दावा करने वाले अधिकतर लोगों के लिए शायद ही संभव हो । ऊपर दिये गये नमूने जैसी अंग्रेजी शायद अधिसंख्य लोगों की न हो, किंतु संतोषप्रद तथा स्तरीय लेखन-क्षमता बहुत कम लोगों के पास होगी देश में उनकी संख्या बमुश्किल 5-6 करोड़ भी शायद ही हो । – योगेन्द्र जोशी

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3 Responses to “अपने छात्रों की अंग्रेजी के नमूने ऐसे भी होते हैं!”


  1. बेहतर पोस्ट, अच्छी प्रस्तुति. बधाई!


    • जोशी जी!

      हिंदी तथा कुछ और भी ब्लॉग पर आपकी कुछ रचनाएं पढ़ीं। अच्छी लिखी हैं आपने। खास कर अंग्रेज़ी की दशा के बारे में लिखी गई रचना विश्लेषणात्म और तथ्यात्मक लगी। आप तो प्रोफ़ेसर लगते हैं। फिर उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी के कारण विद्यार्थियों को होने वाली कठिनाइयों के बारे में कुछ अनुभूत बातें लिखें।
      आपके बारे में कुछ ज़्यादा जानना चाहता हूं। ब्लॉग पर कुछ नहीं मिला। यदि संभव हों तो लिखें।


  2. हाँ, देखा बहुत अच्छी अंग्रेजी लिखी है छात्र ने। एक बार ऐसी संस्कृत और ऐसी हिंदी भी देख चुका हूँ। आपकी बात सही लगती है और 5-6 करोड़ का आँकड़ा भी शायद ही होगा।


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