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‘इंडियन इंग्लिश’ और बलाघात (स्ट्रेस) एवं स्वरशैली (इंटोनेशन) के समुचित प्रयोग का अभाव

अगस्त 1, 2010

पिछली पोस्ट (24 जुलाई 2010) में मैंने इस बात का उल्लेख किया था कि अपने भारत में लोगों के अंग्रेजी उच्चारण में काफी असमानता देखने को मिलती है । अधिकांश लोग अपनी मातृभाषा की उच्चारण-शैली के अनुसार ही अंग्रेजी बोलते हैं । कइयों के लिए उनकी अपनी भाषा की ध्वनियों और अंग्रेजी की ध्वनियों में कोई अंतर ही नहीं होता । अंग्रेजी सिखने का मतलब अधिकतर यही लिया जाता है कि उसके व्याकरण से सुपरिचित हुआ जाए और उसके शब्दभंडार को अधिकाधिक बढ़ाया जाए । उच्चारण सीखने/सिखाने पर खास जोर नहीं रहता है । मेरी जानकारी के अनुसार स्कूल-कालेजों में छात्रों की उच्चारण संबंधी परीक्षा नहीं होती है । उन्हें सही लिखना आना चाहिए केवल यही जांचा जाता है । फलतः व्यक्ति-व्यक्ति के उच्चारण में भेद रहता है ।

उच्चारण संबंधी एक अनुभव

अंग्रेजी उच्चारण के दो अहम पहलुओं की चर्चा करने से पहले में अपने एक अनुभव का उल्लेख करना चाहता हूं । बात 35-40 साल पहले की है । तब मैं डाक्टरेट उपाधि के लिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधकार्य में कार्यरत था । इस उपाधि की अर्हता का एक अनिवार्य अंग यह था कि शोधार्थी किसी आधुनिक यूरोपी भाषा में प्रवीणता का प्रमाणपत्र अर्जित करे । तदनुसार मैं जर्मन भाषा सीख रहा था । सौभाग्य से हम छात्रों को आस्ट्रिया से आए हुए एक आगंतुक शिक्षक महोदय से पढ़ने का अवसर मिला । (आस्ट्रिया की भाषा जर्मन है ।) उन्होंने हमें जर्मन ध्वनियों की बारीकियां समझाई थीं । वांछित ध्वनि निकालने के लिए होंठों को कैसी आकृति देनी होगी, जीभ मुंह के अंदर किस स्थान पर स्थापित रहेगी, गले के स्वरतंतु प्रकंपित होंगे या नहीं, इत्यादि बातें उन्होंने स्पष्ट की थीं । तब मैंने जाना था कि जर्मन शब्द ‘ich’ (मैं) के ch का उच्चारण ‘श्’ नहीं होता । संबंधित घ्वनि न हिंदी में है और न ही अंग्रेजी में । इसी प्रकार जर्मन ‘उम्लाउटों’ (umlauts ä, ö तथा ü) की स्वरध्वनियां भी अंग्रेजी के किसी स्वर से मेल नहीं खाती हैं । हमें बताया गया था इन्हें उच्चारित करने के लिए होंठों को कुछ वैसे ही गोलाई देकर खोलना होता है जैसे सीटी की आवाज पैदा करने में किया जाता है । वस्तुतः इस प्रकार का अंतर हिंदी एवं अंग्रेजी के स्वर-व्यंजन ध्वनियों के साथ भी है, लेकिन उनको शायद ही कभी समझाया जाता है । अस्तु, अभी मैं बलाघात की बात पर आता हूं ।

अक्षर अथवा सिलेबल्
स्वर-व्यंजन ध्वनियां भाषा की प्राथमिक इकाइयां हैं जिनका स्वयं में कोई अर्थ नहीं होता । जिस मौलिक इकाई के साथ कोई अर्थ जोड़ा जाता है वह है शब्द जो इन ध्वनियों के चुने हुए संयोजन होते हैं । हर शब्द एक या अधिक ‘सिलेबल्’ (syllable) या अक्षर से बना रहता है । सिलेबल् वह न्यूनतम ध्वन्यात्मक इकाई है जो स्वर ध्वनि पर केंद्रित होती है । यह एक स्वतंत्र स्वर हो सकता है अथवा उसके आगे, पीछे, अथवा दोनों ओर एकल अथवा संयुक्त व्यंजन हो सकते हैं । हिंदी में सिलेबल् को सीधे-सीधे सरलता से पहचाना जा सकता है, जैसे अक्षर = अ+क्ष+र; स्पष्ट = स्पष्+ट । संयुक्ताक्षर की व्यंजन ध्वनियों में से अधिकांश को पूर्ववर्ती स्वर के साथ उच्चारित करना सहज लगता है । अंग्रेजी में सिलेबल् विभाजन सदैव बहुत स्पष्ट नहीं रहता । उदाहरणः a=a(ए), an=an (ऐन्), fact=fact (फैक्ट्) (monosyllabic words); under=un+der (अन्+डर्), figure=fi+gure (फि+गर्), rea+dy (रे+डी) (bisyllabic); technical= tech+ni+cal (टेक्+नि+कल्), technology = tech+no+lo+gy (टेक्+नॉ+लॉ+जी) । ध्यान दें कि सिलेबल् इस बात को स्पष्ट करते हैं कि शब्द टुकड़ों में विभक्त होकर कैसे उच्चारित होता है ।

टिप्पणीः
1. इस स्थल पर स्वर शब्द में शुद्ध स्वर ध्वनियां, यथा अ, आ, इ, ए आदि और संधिस्वर या डिफ्थॉंग, diphthong, जैसे ऐ, औ, दोनों शामिल हैं । वस्तुतः coil, out, pyre आदि में मौजूद स्वर ध्वनियां डिफ्थॉंग कहलाती हैं । ध्यान दें इनमें ऑय्, आव्, आय् जैसी ध्वनियां मौजूद हैं ।)
2. अंग्रेजी का र हमारे र से कुछ भिन्न है । स्वर के पूर्व यह स्पष्टतः उच्चारित होती है, अन्यथा इसका उच्चारण कुछ हद अ की भांति होता है, जैसे rare = रेअ, raring = रेअ+रिंग । ध्यान रहे कि इसमें एअ कि ध्वनि एक डिफ्थॉंग है, और एक ही सिलेबल् का द्योतक है ।
3. देवनागरी में लिखित उच्चारण पूरी तरह सही नहीं कहे जाएंगे, क्योंकि अंग्रेजी की कई ध्वनियां हमारी संस्कृत-हिंदी की ध्वनियों से पूर्णतः मेल नहीं खाती हैं ।

स्वराघात अथवा स्ट्रेस/एक्सेंट
हिंदी में स्वराघात का खास महत्त्व नहीं है । उसे वक्ता ही संभाषण-शैली का हिस्सा कहा जा सकता है । ऊपर दिए गए शब्द technology का एक ठेठ हिंदीभाषी ‘टेक् नॉ लॉ जी’ कहेगा । वह उसके चारों सिलेबलों को ध्वनि की समान तीव्रता (loudness) के साथ उच्चारित करेगा । लेकिन अंग्रेजी में यह उच्चारण अस्वीकार्य है । नियमों के अनुसार बोलते समय ‘नॉ’ पर जोर डाला जाएगा, जब कि अन्य सिलेबलों पर आवाज में उतना दम नहीं रहता है, कुछ ऐसे कि ‘नॉ’ तो साफ-साफ सुनाई दे, लेकिन टेक् आदि में उतना दम न दिखे । इतना ही नहीं, ‘लॉ’ की ध्वनि मात्र ‘ल’ सरीखी रह जाती है जिसमें स्वर ‘अ’ अतिअल्पकालिक रह जाता है, कुछ-कुछ ‘ल्’ के समान । अर्थात्
उक्त शब्द को ‘टेक् नॉ ल जी’, जो ‘टेक् नॉ ल् जी’ जैसा सुनाई पड़ेगा । यहां जोर वाले सिलेबल् को ‘बोल्ड’ टाइप से दर्शाया गया है ।

किसी सिलेबल् की ध्वनि-तीव्रता को बलाघात अथवा स्ट्रेस (stress) या एक्सेंट (accent) कहा गया । कुछ लंबे शब्दों में एक से अधिक सिलेबलों पर बलाघात रहता है किंतु असमान तीव्रता के साथ । प्रायः किसी एक पर अधिक जोर रहता है और दूसरे पर कम । ऐसे में पहले को प्राथमिक बलाघात (primary stress or acute accent) और दूसरे को द्वितीयक बलाघात (secondary stress or grave accent) कहा जाता है । इनको दर्शाने के लिए संबंधित सिलेबल् के ठीक पहले क्रमशः (´) तथा (`) प्रयोग में लिए जाते हैं । अन्य निरूपण भी मैंन देखे हैं जैसे (‘) तथा (,) । कहीं-कहीं कैपिटल अथवा बोल्डफेस लेटर्स भी विकल्पतः प्रयुक्त होते हैं । सेकंडरी स्ट्रेस का एक उदाहरण हैः counterfoil = ´coun+ter+`foil या ‘coun+ter+,foil (काव्‌न्‌+टर्+फॉय्‌ल्‌) । इस शब्द को बोलने में coun पर सर्वाधिक जोर रहता है, किंतु ter धीमा रहता है और foil उसकी अपेक्षा थोड़ा जोर से ।

सेकंडरी स्ट्रेस केवल लंबे शब्दों में ही देखने को मिलता है, लेकिन वह भी सदैव नहीं । दो अथवा अधिक सिलेबलों वाले शब्दों पर ही स्ट्रेस देखने को मिलता है, किंतु स्ट्रेस हो ही यह आवश्यक नहीं रहता । आम तौर पर किसी शब्द के एक ही सिलेबल् पर स्ट्रेस रहता है और वह प्राइमरी होता है ।

अंग्रेजी में बलाघात की काफी अहमियत है । यह शब्दों का अर्थ निर्धारित करता है । उदाहरण:
export = ‘ex+port (एक्स+पोर्ट) noun, ex+’port (एक्स+पोर्ट) verb; present = ‘pre+sent (प्रै+जंट) noun, pre+’sent (प्रि+जेंट) verb; record = ‘re+cord (रे+कॉर्ड) noun, re+’cord (रि+कॉर्ड) verb
। सामान्य नियम है कि संज्ञा शब्द के पहले और क्रियापद के दूसरे/अंतिम सिलेबल् पर बलाघात हो । (बोल्ड टाइप माने बलाघात ।)

स्वरशैली अथवा इंटोनेशन
प्रायः हर भाषा में स्वरशैली (intonation) का न्यूनाधिक महत्त्व देखने को मिलता है । स्वरशैली का संबंध बोलते वक्त ध्वनि के उतार-चढ़ाव से है, जैसा कि गायन-वादन में होता है । इसकी अहमियत को समझने के लिए स्टार-वार जैसी फिल्मों में रोबोटों द्वारा बोली जाने वाली संश्लिष्ट (synthetic) शैली पर गौर करें । यह एकदम सपाट और नीरस रहती है । लेकिन आम आदमी द्वारा बोले गये शब्दों का तारत्व (pitch) एक जैसा नहीं रहता है । उसकी आवाज कभी भारी तो कभी पतली होती है । संगीत में रुचि रखने वाले तारत्व से सुपरिचित रहते हैं । वे अच्छी तरह समझते हैं कि मंद्र से मध्य सप्तक की ओर बढ़ने पर तारत्व कैसे बदलता है । इस प्रकार के उतार-चढ़ाव की पहली अहमियत तो यह है कि बोली में एकरसता नहीं रहती । इसके अतिरिक्त इस उतार-चढ़ाव का महत्त्व भावाभिव्यक्ति को अधिक प्रभावी बनाता है । बोलने के लहजे से यह स्पष्ट होता है कि गदित वाक्य महज एक तथ्य का उद्घाटन है, अथवा उसमें कोई प्रश्न निहित है, अथवा उसके माध्यम से आश्चर्य या भय जैसे भाव व्यक्त किये जा रहे हैं । लिपिबद्ध कथनों में स्वरशैली नहीं व्यक्त रहती है । पाठक प्रसंग के आधार पर उसकी कल्पना मन में करता है । विराम चिह्नों के प्रयोग से स्थिति स्पष्ट होती है, किंतु पूरी तरह नहीं । सभी लोग इस स्वरशैली या इंटोनेशन को अनुभव से सीखते हैं । अंग्रेजी में इसे पर्याप्त महत्त्व मिला है और पुस्तकों/लेखों में उसकी चर्चा देखने को मिल जाती है ।

स्वरशैली को उदाहरणों से समझा जा सकता है । इस वाक्य पर ध्यान दें: I can’t believe it. यह वाक्य कहीं बीच में आवाज रोके बिना बोले गये इन सिलेबलों की शृंखला है (देवनागरी में व्यक्त निकटतम उच्चारण): ‘आई कांट बि-लीव् इट्’ (पांच सिलेबल्) । ध्वनि के बिना उतार-चढ़ाव के इनको एकसमान सुर में बोला जा सकता है । जैसा कि एक प्राथमिक दर्जे का रोबोट करता है । व्यवहार में उतार-चढ़ाव रहता है, जो इस पर निर्भर करता है कि आप किस पर जोर डालने के इच्छुक हैं । अगर कोई यह जताना चाहे कि अमुक बात पर लोग विश्वास करते हों तो करें लेकिन कम से कम वह ऐसा नहीं कर सकता है । तब ‘आइ’ पर जोर रहेगा । तब आइ किंचित् उच्च स्वर में बोलते हुए स्वर नीचे गिरता है, जैसा कि संगीतज्ञ सरगम के ग या म से स पर उतर आता है । दूसरी ओर यदि वह व्यक्ति अमुक बात पर विश्वास करने के समुचित कारण नहीं देखता, और विश्वास करना अपनी सामर्थ्य से बाहर पाता है, तो वह ‘कांट’ पर जोर डालेगा और आई को सामान्य तौर पर उच्चारित करते हुए आवाज कुछ उठाएगा फिर कांट बोलकर वापस अन्य सिलेबलों को सामान्य आवाज में बोलेगा । इस प्रकार के उतार-चढ़ाव को चित्र में दिखाया गया है । तीसरे दृष्टांत में (be)lieve पर जोर दिया गया है ।

उच्चारण में ध्वनि के उठने-गिरने को दर्शाने वाली रेखा को स्वरशैली समोच्च रेखा (intonation contour) कहा जाता है । आम तौर पर वाक्यों या वाक्यांशों को बोलते समय अंतिम सिलेबल् पर स्वर उतर आता है । लेकिन कभी-कभी इसका उल्टा भी होता है । अगले चित्र के प्रथम वाक्य में वक्ता का स्वर आंरभ में समान रहता है, किंतु अंतिम सिलेबल् (Am)rita पर पहुंचते हुए ऊपर उठ जाता है । उत्तरदाता का स्वर उच्च से आरंभ होकर नीचे उतरता है । किंतु अगले प्रश्न में what पर स्वर अनायास ऊंचा उठता है, फिर हल्का ऊंचा रहते हुए name पर उतर जाता है ।

हम हिंदुस्तानियों के अंग्रेजी संभाषण में स्ट्रेस एवं इंटोनेशन का प्रायः अभाव रहता है, अथवा ये स्थापित मानक के अनुसार न होकर हमारी सामान्य बोली से प्रभावित रहते हैं । लेकिन जिन्हें मानक उच्चारण सीखने के अवसर मिले हों, अथवा जो उस माहौल में रह चुके हों, उनकी अंग्रेजी अवश्य भिन्न रहती है । चूंकि देशवासियों को प्राप्त अवसरों, उनके अंग्रेजी-शिक्षण के स्रोतों, और मातृभाषाओं में गंभीर असमानता सदा से रही है, अतः इंडियन इंग्लिश में वैसी ही विविधता है जैसी देशवासियों में ।
योगेन्द्र जोशी

अंतरजाल के ये स्रोत इस विषय में उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं:
http://www.englishclub.com/pronunciation/word-stress-rules.htm
http://www.worldlingo.com/ma/enwiki/en/Secondary_stress
http://iteslj.org/Techniques/Celik-Intonation.html
http://home.cc.umanitoba.ca/~krussll/138/sec3/inton.htm

One Response to “‘इंडियन इंग्लिश’ और बलाघात (स्ट्रेस) एवं स्वरशैली (इंटोनेशन) के समुचित प्रयोग का अभाव”

  1. satnam kaur Says:

    balaghat ke five bhed hote hain 1 vakya 2 shabad 3 akshar 4 vakyansh


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