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‘इंडियन इंग्लिश’ में उच्चारण संबंधी एकरूपता का अभाव

जुलाई 24, 2010

विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों के मानव समाजों द्वारा विकसित प्राकृतिक भाषाएं (natural languages) मूलतः उच्चारित होने के लिए बनी हैं । (मैं यहां इशारों की भाषा अथवा आधुनिक युग की कंप्यूटर भाषाओं की बात नहीं कर रहा हूं ।) वे कब और कैसे विकसित हुई होंगी इसका कोई लेखा-जोखा न है और न ही हो सकता है । इतना निश्चित है कि मानवजाति ने कई सहस्राब्दियों पहले ही ध्वनियों का प्रयोग करते हुए परस्पर संदेश देने की कला, जिसे आदिम भाषा कहा जा सकता है, सीख ली होगी । बौद्धिक विकास के साथ उसकी भाषाई क्षमता बढ़ती गयी होगी । यह तो बहुत ही बाद की बात है कि मौखिक रूप से परस्पर कही गयी बातों अथवा संदेशों को भविष्य के लिए सुरक्षित रखने के लिए लिपियां भी विकसित हुईं । भाषाओं के लिपिबद्ध निरूपण के ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर पूर्ववर्ती मौखिक भाषाओं के बारे में कुछ भी नहीं कहा जा सकता है । इस विषय पर उपयोगी जानकारी यहां (http://www.trueorigin.org/language01.asp) उपलब्ध है ।

इतना कुछ कहने का मंतव्य यह है कि किसी भी भाषा की विशिष्टता मूलतः उसके उच्चारण में निहित रहती है । उसके ध्वनि-समुच्चय, व्याकरण, और शब्द-संपदा भाषा के गदित स्वरूप से संबंधित रहते हैं । लिपि किसी स्थाई माध्यम पर उसके अंकित निरूपण के लिए केवल साधन प्रदान करती हैं; वे उस भाषा की विशिष्टता का आधार नहीं होती हैं । लिपि बदल लेने पर भी भाषा वही रहती है । अवश्य ही लिपि का अपना महत्त्व है और बोली जा रही भाषा से उसका अतिघनिष्ठ संबंध रहता है । अंकित लिपि कैसे उच्चारित होगी इसके सुस्पष्ट तथा सामान्यतः स्थाई नियम स्थापित रहते हैं, ताकि संबद्ध भाषा सही-सही बोली जा सके । इसीलिए किसी भाषा के लिए नितांत नई लिपि स्वेच्छया नही अपनाई जा सकती है; आपको तब लिपि एवं उससे संबद्ध घ्वनियों के लिए नियम तय करने होंगे । कहने का तात्पर्य है कि भाषा की अपनी खासियत लिपि से नहीं नियत होती है । उसकी विशिष्टताओं को लिपि से परे हटकर समझा जाना चाहिए । दरअसल एक ही लिपि एक से अधिक भाषाओं के लिए प्रयुक्त हो सकती है, जैसे देवनागरी लिपि भारतीय और लैटिन लिपि यूरोपीय भाषाओं के लिए ।

अंग्रेजी कई देशों में जनभाषा के रूप में स्थापित है, जैसे ब्रिटेन (इसका उद्गम स्थान), संयुक्त राज्य अमेरिका, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, कनाडा आदि । उन देशों में प्रायः सभी इसी भाषा का प्रयोग करते हैं । अतः उनके बोलने में एकरूपता स्वाभाविक तौर पर देखने को मिलती है, भले ही वह दुनिया के अन्य अंग्रेजी भाषी क्षेत्रों से भिन्न हो । इसी आधार पर उन स्थानों के अंग्रेजी को विशिष्ट नाम दिया जाता है, यथा ब्रिटिश इंग्लिश, अमेरिकन इंग्लिश, इत्यादि । अंग्रेजी भारत में भी प्रचलित है, और इस आधार पर ‘इंडियन इंग्लिश’ का भी जिक्र सुनने को मिलता है । पर क्या इंडियन इंग्लिश जैसी कोई चीज वाकई में है ? मेरा उत्तर नहीं में है; क्यों इसी बात पर मेरी टिप्पणियां यहां प्रस्तुत हैं । इस संबंध में कुछ बातें मैं पहले ही अन्यत्र (3 जून 2010) कह चुका हूं ।

अंग्रेजी वस्तुतः अपने देश की जनभाषा नहीं है । यह तो १० फ़ीसदी से कम लोगों की द्वितीय भाषा है, जो विरल रूप से देश भर में सर्वत्र फैले हैं । इसे रोजमर्रा की जिंदगी में नियमित रूप से इस्तेमाल करने वाले लोग संख्या में नगण्य होंगे । शौकिया अथवा अंग्रेजी के प्रति अति लगाव के कारण इक्के-दुक्के जन अपने घरों में बोलते होंगे, किंतु आम तौर पर हर कोई अड़ोसी-पड़ोसियों, मित्र-परिचितों, कार्यालय के संगी-साथियों, दुकानदारों, रिक्शा-ऑटो वालों और राह चलते मिले अजनबियों आदि से स्थानीय भाषा में ही वार्तालाप करता है । फलतः सामान्य वार्तालाप में अंग्रेजी बोलने का न अभ्यास हो पाता है और न ही उसके उच्चारण की एकरूपता स्थापित हो पाती है । सच कहें तो अंग्रेजी अपने देश की दस्तावेजी भाषा है और लिखित जानकारी प्रायः सर्वत्र अंग्रेजी में रहती है । अतः हमारा अंग्रेजी ज्ञान मुख्यतः लिखित सामग्री तक सीमित रहता है । हम बोलते हैं स्थानीय भाषा में और लिखते हैं अंग्रेजी में । यहां तक कि कार्यालयों में भी कार्य संबंधी वार्तालाप अपनी रोज की भाषा में ही होता है । लेकिन जैसे ही दस्तावेज तैयार करने का काम हाथ में आता है, कलम से (आजकल कंप्यूटर पर) अंग्रेजी का प्रवाह आरंभ हो जाता है । अंग्रेजी बोल तब मुंह से अवश्य फूटते हैं जब कोई औपचारिक कार्य आरंभ होता है, जैसा बैठकों/गोष्ठियों में होता है । लोग परस्पर स्थानीय भाषा में बोलते मिलेंगे, किंतु जैसे ही औपचारिक कार्यवाही आरंभ होती है, सब अंग्रेजी के लिए तैयार हो जाते हैं । ऐसे अवसरों पर अंग्रेजी तभी बोली जाती है जब वार्ता में शामिल जन अलग-अलग भाषाएं बोलते हों । तब अंग्रेजी हमारी प्राथमिकता बन जाती है । याद रहे कि इतने भर से हमारे अंग्रेजी उच्चारण में समानता नहीं आती है ।

आम बातचीत में अंग्रेजी के प्रयुक्त न होने का सीधा अर्थ यह है कि हम इसे एक-दूसरे से नहीं सीखते है, बल्कि इसे किताबों से सीखते हैं, अपने स्कूलों से सीखते है, अथवा आजकल कुकुरमुत्तों की तरह उग आये ‘महीने भर में अंग्रेजी’ वाले संस्थानों से सीखते हैं । अन सब स्रोतों का परस्पर कोई संबंध नहीं रहता है, इसलिए सब जगह अपनी-अपनी अंग्रेजी होती है जो उन जनों पर निर्भर करती है जो उन स्थानों पर कार्यरत हों । ध्यान रहे किताबों से आप व्याकरण सीख सकते हैं और अपना शब्दज्ञान बढ़ा सकते हैं, किंतु उच्चारण नहीं सीख सकते जब तक कि उच्चारण की बारीकियों का सही-सही, आरंभिक एवं मौलिक ज्ञान अलग से अर्जित न कर चुके हों और शब्दकोशों की सहायता न लेते हों । आम देशवासी इतना परिश्रम नहीं कर पाता है, उसका तो कामचलाऊ अंग्रेजी सीखने में ही दम निकल जाता है । जहां तक स्कूलों या अन्य संस्थाओं का सवाल है, आपका अंग्रेजी उच्चारण उस व्यक्ति पर निर्भर करता है जो आपको पढ़ा रहा होता है । आपकी जबान पर वह उच्चारण स्थाई हो जाता है जो आप आरंभिक दौर में सीखते हैं । कितना अच्छा सीख पाऐंगे यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपको पढ़ाने वाला खुद कितना जानकार है । यदि यह स्पष्ट करे कि अंग्रेजी की ध्वनियां मुख से कैसे निकाली जाती हैं, इस बात को भी स्पष्ट करे कि वे हमारी अपनी ध्वनियों के समान अथवा उनसे अलग कैसे हैं, तो आपका उच्चारण बेहतर होगा । कदाचित् वह आपको ‘स्ट्रेस’ एवं ‘इंटोनेशन’ से भी परिचित कराए । ऐसा संभवतः उच्च स्तर के विद्यालयों होता होगा । आम तौर पर सही उच्चारण का तरीका सिखाया नहीं जाता है । शिक्षक/प्रशिक्षक बोलता है और आप उसकी नकल करते हैं । बारीकियों का कहीं सवाल ही नहीं उठता । यह भी एक तथ्य है कि हमारे विद्यालयों के अध्यापकों का भाषाई ज्ञान आम तौर पर दोयम दरजे का होता है । उच्चारण की बारीकियों से वे स्वयं परिचित हों इसकी संभावना कम रहती है ।

हमारी अंग्रेजी ब्रितानी अंग्रेजी पर आधारित है । अतः शब्द-संपदा और वर्तनी के नजरिये से हमारी अंग्रेजी उनसे मेल खाती है, किंतु उच्चारण हमारा अपना निजी होता है । सभी भारतीयों की अपनी-अपनी अंग्रेजी होती है जो इन बातों पर निर्भर करती है कि वे शहरों से आते हैं या देहात से, कि वे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़े हैं या सरकारी क्षेत्रीय भाषा के स्कूलों में, कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का अंग्रेजी से कोई नाता रहा है या नहीं, कि वे उच्चारित अंग्रेजी वाले रेडियो, टेलीविजन आदि के कार्यक्रमों में रुचि लेते हैं या नहीं, कि वे अच्छी अंग्रेजी के लिए प्रयत्नशील रहते हैं या उसके प्रति उदासीन, इत्यादि । कहने का अर्थ है कि उच्चारण की दृष्टि से ‘इंडियन इंग्लिश’ जैसी कोई चीज नजर नहीं आती है ।

इस सबके अलावा सही ‘स्ट्रेस’ तथा ‘इंटोनेशन’ का अभाव भी हमारी अंग्रेजी की एक विशिष्टता है । इनका जिक्र अगली पोस्ट में । – योगेन्द्र जोशी

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2 Responses to “‘इंडियन इंग्लिश’ में उच्चारण संबंधी एकरूपता का अभाव”


  1. आपकी अगली पोस्ट का इंतज़ार रहेगा


  2. वैसे संगणक में यानि कम्प्यूटर में साफ्टवेयरों में अब भाषा चुनने के लिए इंडियन इंग्लिश विकल्प मिलता है। और दूसरा कि हम भारतीय लोग ऐसे बहुत से वर्णों का उच्चारण कर पाते हैं, जो अन्य देशवाले नहीं करते जैसे – भारत को बारट(शायद, जैसा कि मुझे लगता है) कहा जाता है अंग्रेजी देशों में। हमारे देश में इसे भारत कोई भी कह सकता है। इस हिसाब से जिस अंग्रेजी में भ, घ आदि उन सारे वर्णों का उच्चारण किया जा सकता है जो नागरी वाले करते हैं और जिसका आधार, नियम सब ब्रिटिश अंग्रेजी हों, वही इंडियन अंग्रेजी हो सकती है।


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