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इंटरनेट पर ‘वेब पतों’ की लैटिन लिपि से मुक्ति – समाचार

मई 9, 2010

बीबीसी की वेब-साइट (bbc.co.uk) पर एक समाचार पढ़ने को मिला कि अब इंटरनेट पर प्राप्य ‘वेब पतों’ के लिए लैटिन अक्षरों की अनिवार्यता पूरी तरह समाप्त कर दी गयी है । यह खबर सी-नेट की वेब साइट पर भी पढ़ने को मिली है ।

इसे ‘ऐतिहासिक’ घटना बताते हुए बीबीसी आगे सूचित करती है कि नई व्यवस्था को प्रयोग में लेने में सबसे आगे अरब मुल्क हैं, मुख्यतः मिस्र (Egypt), सउदी अरब (Saudi Arabia), एवं संयुक्त अरब अमीरात (United Arab Emirates), जिन्होंने अपने यहां के वेब साइटों को विशुद्ध अरबी भाषा में लिखने की ठान ली है । मिस्र सरकार का संचार मंत्रालय (Ministry of Communication) कदाचित् पहली संस्था है जिसने यह कदम उठाया है । बीबीसी ने इस नई व्यवस्था के बारे कुछ लोगों की प्रतिक्रियाएं भी अपनी ‘साइट’ पर उपलब्ध कराई हैं ।

उल्लेखनीय है कि कुछ समय पहले तक इंटरनेट (अंतरजाल) पर उपलब्ध पतों को लैटिन में लिखना अनिवार्य था । यूरोप से बाहर के अधिकांश देशों की भाषाओं की लिपियां लैटिन से सर्वथा भिन्न रही हैं । उनमें से अधिकतर देश ऐसे हैं जिनके देशवासियों का अंग्रेजी ज्ञान तो शून्यप्रायः है ही, लैटिन/रोमन लिपि से भी उनका परिचय संतोषप्रद नहीं रहा है । या यों कहिए कि लैटिन लिपि का प्रयोग उन्हें सुविधाजनक नहीं लगता । (अंग्रेजी भाषा तथा लैटिन लिपि के प्रति जो ‘लगाव या समर्पण’ भारत में देखने को मिलता है वैसा अन्यत्र शायद नहीं है ।) फलतः उन देशों ने कुछ वर्ष पहले कोशिश आरंभ की कि इंटरनेट पर लैटिनेतर लिपि में भी ‘वेब पते’ स्वीकार्य हों । चीन की भूमिका इस दिशा में प्रमुख रही है । इस उद्येश्य की प्राप्ति में उन देशों को अंततः सफलता मिल गयी । (संबंधित जानकारी के लिए यहां क्लिक करें ।)

वैश्विक स्तर पर ‘डोमेन’ नामों पर नियंत्रण रखने वाली संस्था (ICANN Internet Corporation for Assigned Names and Numbers) ने साल-एक पहले यह निर्णय लिया था कि किसी देश के ‘डोमेन’ नामों के अंतिम अंश के लिए लैटिन अक्षर ही यथावत् प्रयोग में लिए जायेंगे । ये अंश उस देश के द्योतक या ‘कंट्री कोड’ (country codes) के तौर पर प्रयुक्त होते हैं, जैसे भारत के लिए पद और चीन के लिए बद । नामों के केवल आरंभिक हिस्सों के लिए उस देश की लिपि लिखना संभव बनाया गया । लेकिन एक कदम आगे बढ़कर संस्था ने अब यह निर्णय ले लिया है कि पूरा नाम विश्व की किसी भी उस लिपि में चुना जा सकता है, जिसे उक्त संस्था द्वारा मान्यता दी गयी है । विश्व की प्रायः सभी प्रमुख लिपियां इस हेतु मान्य हैं और देवनागरी लिपि उनमें से एक है । आईसीएएनएन संस्था के ब्लाग पृष्ठ (http://blog.icann.org/) पर इस संदर्भ में उदाहरणों के माध्यम से समझाने की कोशिश की गई है कि कैसे लैटिनेतर लिपि का उपयोग वेब पतों के लिए किया जाएगा । आईसीएएनएन के अनुसार 20 से अधिक देशों ने इस आशय का आग्रह उससे किया था । उपर्युक्त अरब देशों के लिए आईसीएएनएन के अनुसार कंट्री कोड अब इस प्रकार होंगेः
मिस्रः مصر
सउदी अरबः السعودية
संयुक्त अरब अमीरातः امارات

अरबी लिपि का उदाहरण विशेष माने रखता है, क्योंकि उसके ‘अक्षर’ दायें से बांये की ओर लिखे जाते हैं, जो लैटिन लिपि से मेल नहीं खाती ।

लैटिनेतर लिपि में लिखित पते कितने त्रुटिहीन सिद्ध होंगे अभी निश्चित नहीं है । हो सकता है कि वे कहीं-कहीं उल्टे-सीधे परिणाम दें । इसके अतिरिक्त प्रयुक्त इंटरनेट ब्राउजर की भी संगति नई लिपि से बैठनी चाहिए । Internet Explorer, Mozilla Firefox, Google Chrome, Apple Safari, तथा Opera ब्राउजर लैटिन से भिन्न लिपि भी स्वीकार लेते हैं ।

पर ‘हिंदी विकीपीडिया’ की वेब साइट (http://उदाहरण.परीक्षा/मुख्य_पृष्ठ) का भी उदाहरण दिया गया है । मैंने Firefox की मदद से संबंधित जालपृष्ठ खोला तो यह परिणाम मिला (screen snapshot):

एपल कंपनी के Safari के साथ भी ठीक परिणाम मिले ।


लेकिन Opera ब्राउजर के साथ जालपृष्ठ तो सही खुलता है, परंतु उसके ‘एड्रेस बार’ में वेब पता सही लिपि में नहीं रह जाता है । इस प्रकार की कुछ समस्याएं कदाचित् ब्राउजरों के साथ आंरभ में रहें; कालांतर में उनका समाधान मिल ही जाएगा ।

बहरहाल ऐसा मालूम देता है कि इंटरनेट की दुनिया में लैटिन लिपि का वर्चस्व घट रहा है । शायद अंग्रेजी की अहमियत भी धीरे-धीरे कम होती जावे । जिस प्रकार विभिन्न भाषाओं के परस्पर अनुवाद की सुविधाएं विकसित हो रही हैं, उससे यही उम्मींद जगती है कि ‘ज्ञान तो केवल अंग्रेजी में ही उपलब्ध हो सकता है’ की धारणा विश्व स्तर पर टूटने लगेगी । यह बात अलग है कि अपने ‘महान्’ देश में यह धारणा प्रबलतर होती जावे । – योगेन्द्र जोशी

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2 Responses to “इंटरनेट पर ‘वेब पतों’ की लैटिन लिपि से मुक्ति – समाचार”


  1. शुक्र है कि विश्व में कुछ और देश भी हैं जो स्वाभिमानी हैं नहीं तो यहाँ के ‘ज्ञानी’ तो बिना सोचे-विचारे ‘फरमा’ देते कि लैटिन के सिवा किसी अन्य लिपि में पता लिखना असम्भव है। आखिर हम लोग सबसे अच्छे गुलाम जो थे ( ‘जेम् इन् द क्राउन’ )

    इस निर्णय का प्रभाव क्या होगा, अभी कहना मुश्किल है। हो सकता है कि ‘यूनिकोड’ की भाँति यह भी ‘चमत्कारी परिणाम’ दे।


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