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Macaulay’s Education Policy – Create a class of people English in taste, opinions, …

नवम्बर 16, 2009

1.
“We must do our best to form a class who may be interpreters between us and the millions whom we govern; a class of persons Indian in blood and colour, but English in taste, in opinions, words, and intellect.” (T.B. Macaulay, in support of his education policy as presented in 1835 to the then Governor-General, Willium Bentick.)
(हमारे तथा जिन पर हमारा शासन है ऐसे लाखों-करोड़ों जनों के बीच दूभाषिए का कार्य करने में समर्थ एक वर्ग तैयार करने के लिए हमें भरपूर कोशिश करनी है; उन लोगों का वर्ग जो खून एवं रंग/वर्ण में भारतीय हों, लेकिन रुचियों, धारणाओं, शब्दों एवं बुद्धि/विद्वत्ता में अंग्रेज हों । – टी.बी. मैकॉले, तत्कालीन गवर्नर-जनरल विलियम बेंटिक को 1835 में सौंपी गई अपनी शिक्षा नीति के समर्थन में ।)

2.
“… we created a separate caste of English scholars, who had no longer any sympathy, or very little sympathy with their countrymen;” (Prof. H.H. Wilson before the select committee of the house of Lords, 5th July, 1863.)
(… हमने अंग्रेज विद्वानों की एक जाति तैयार कर ली, जिसे अपने देशवासियों के प्रति नहीं के बराबर या अत्यल्प सहानुभूति है । – प्रोफेसर एच. एच. विल्सन, हाउस अव् लॉर्ड‍‌‌ज की चयनित समिति के समक्ष, 5 जुलाई, 1863 ।)

3.
“… I venture to hazard the opinion, that Lord Willium Bentinck’s double act for the encouragement and diffusion of the English language and English literature in the east …the grandest masterstroke of sound policy that has yet characterised the administration of the British Government in India.” (Dr Duff, in the Lords second report on Indian Territories, 1853, p 409.)
(… मैं यह मत व्यक्त करने का जोखिम उठा रहा हूं कि विलियम बैंटिक का पूरब में अंग्रेजी भाषा एवं अंग्रेजी साहित्य को बढ़ावा देने तथा फैलाने का दोहरा कार्य … ठोस नीति की चतुराई भरी शानदार तरकीब, जिसने भारत में ब्रिटिश राज को विशिष्टता प्रदान की है । – डा. डफ्, भारतीय राज्यक्षेत्र से संबंद्ध लॉर्डज की द्वितीय रिपोर्ट में, 1853 ।)

This information I have taken from an article that I wrote several years back for a Physics education periodical. When I was sorting out old news paper clippings, magazine atircles and other items of information that I had collected during the last more than two decades, I accidentlly came across the manuscript relating to the said article. The reference cited therein is: Sudarlal, Bharat Main Angreji Raj (in Hindi, with footnotes in English), Vol III, pp 1140-42 (Onkar Press, Allahabab, 1938) (यह जानकारी मैंने अपने एक लेख से ली है, जो मैंने वर्षों पहले भौतिकी-विषयक एक पत्रिका के लिए लिखा था । पिछले दो दशकों से अधिक के समय में समाचार-पत्रों की कतरनों, पत्रिकाओं के लेखों तथा अन्य जानकारीशुदा सामग्री की जब मैं छटनी कर रहा था, तब संयोग से उल्लिखित लेख की पांडुलिपि मेरे हाथ लगी । उक्त स्थल पर अंकित संदर्भ यूं है: सुंदरलाल, भारत में अंग्रेजी राज, हिंदी में, अंग्रेजी में पाद-टिप्पणियों के साथ, तृतीय खंड, पृष्ठ 1140-42; ओंकार प्रेस, इलाहाबाद, 1938 ।)

Let me add here this much: Late Pt. Sundarlal, a scholar of History, is reported to have gone to England for higher studies like so many other Indians of those times. During his stay there, he came accross various documents archived in the British libraries – documents pertaining to the British rule in India. Those documents aroused the patriotic rebellian in him, and eventually he turned into a freedom fighter. The first edition of his work was published in1929. Pt. Sundarlal was subsequently jailed for his `offence‘.

(कहा जाता है कि पंडित सुंदरलाल, इतिहास के एक विद्वान, उस काल के अन्य कई भरतीयों की भांति, उच्चाध्ययन के लिए इंग्लैंड गये थे । वहां के प्रवास के दौरान ब्रिटिश पुस्तकालयों में संग्रहीत विभिन्न दस्तावेज उनकी नजर में आये – दस्तावेज जो भारत में ब्रिटिश राज से संबंधित थे । उन दस्तावेजों ने उनके भीतर के विद्रोही को जगाने का काम किया, और अंत में वे एक स्वतंत्रता सेनानी बन बैठे । पं. सुंदरलाल को बाद में अपने ‘अपराध’ के लिए जेल जाना पड़ा ।)

I have no access to the full text of the speech Macaulay may have given in 1935. But I feel that the few words stated in the first paragraph above make it more than clear that he was sowing the seeds of a newer class of `Indians’, who were committed to help the British rule in this country, India. You may not like to use the words `brainwashing‘ in this context, but I definitely opine that something of that sort was there first in his mind and later in the minds of those who were in change of the rule on behalf of the British Royalty. And their scheme did work successfully, perhaps better than what they might have expected. The rulers succeeded in carving out of the Indian society a section of people, who could be regarded as brown Britishers born to Indian parents and physically brought up in the Indian society, but who were enthusiastically committed to the interests of the rulers and had quietly become supporters of the Rule in this country. – Yogendra Joshi (मैकॉले ने 1935 में जो भाषण दिया होगा उसके पाठ्य तक मेरी पहुंच नहीं है । किंतु मैं महसूस करता हूं कि वे कुछएक शब्द जो ऊपर के पहले अनुच्छेद में कहे गये हैं यह स्पष्ट कर देते हैं कि वह भारतीयों के एक नए वर्ग का बीजारोपण कर रहा था, जो ब्रिटिश राज को इस देश, भारत, में चलाने में सहायक हो । आप इस प्रसंग में मति-विपर्यास (ब्रेनवाशिंग) जैसे शब्द को प्रयोग में लेना नहीं चाहेंगे, लेकिन मेरा मत है कि अवश्य ही इसी प्रकार की कोई बात प्रथमतः उसके मन में और बाद में उनके मन में रही जिन्हें ब्रिटिश राजसत्ता की ओर से शासन का दायित्व मिला था । और उनकी योजना सफल भी रही, कदाचित् उनकी अपेक्षा से अधिक । वे शासक भारतीय समाज में से लोगों का एक वर्ग तरासने में सफल रहे जिन्हें भारतीय माता-पिता से जन्मे और भारतीय समाज में पले-बढ़े भूरे अंग्रेज कहा जा सकता है, लेकिन जो शासकों के हितो के प्रति समर्पित थे और उस राज के मूक समर्थक बन बैठे । – योगेन्द्र जोशी )

(टिप्पणीः हिंदीभाषियों के बीच अंग्रेजी शब्द brainwashing का प्रचलन आम बात है, और मेरे अनुमान से प्रायः सभी इसके अर्थ से परिचित हैं । मैंने हिंदी में इसके लिए ‘मति-विपर्यास’ चुना है; विपर्यास अर्थात् परिवर्तन या उलटफेर । इसके लिए उपयुक्त सामासिक शब्द क्या है या होना चाहिए यह मैं नहीं खोज पाया ।)

इस मुद्दे से जुड़े अथवा इस पर आधारित विचार आगामी आलेखों में प्रस्तुत किये जाएंगे । – योगेन्द्र जोशी

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2 Responses to “Macaulay’s Education Policy – Create a class of people English in taste, opinions, …”


  1. इस महत्वपूर्ण तथ्य से बहुत कम ही लोग अवगत हैं कि स्वयं लॉर्ड मेकॉले – जिनकी संस्तुति के आधार पर अंग्रेज़ी भाषा 1835 में देश में शिक्षा का माध्यम बनी – अंग्रेज़ी को भारत के लिए एक अस्थायी समाधान के रूप में देखते थे. उनकी मान्यता थी कि चूँकि “इस समय”, यानी 19 सदी के प्रारम्भ में, ज्ञान के विविध क्षेत्रों में अंग्रेज़ी (और फ्रांसीसी) भाषी ही सबसे बढ़े-चढ़े हैं, इसलिए जरूरी है कि भारत के योग्य वर्ग को अंग्रेज़ी पुस्तकों में निहित ज्ञान से परिचित कराया जाय ताकि बाद में वे उस ज्ञान को स्थानी भाषाओं में अनुवाद कर उसे जन-साधारण तक पहुँचा सकें:
    “To that class [Indian in blood… English in intellect…] we may leave it to refine the vernacular dialects of the country, to enrich those dialects with terms of science borrowed from Western nomenclature and to render them, by degrees, fit vehicles for the conveying of knowledge to the great mass of the population.” [परिच्छेद 34]
    मेकॉले ने इतिहास से दो उदाहरण दे कर अपना उद्देश्य स्पष्ठ किया था. पहला उदाहरण उनके अपने देश का ही था जहाँ 15वीं और 16वीं सदी में – अंग्रेज़ी के सशक्त होने से पहले – ग्रीस (यूनान) और रोम की भाषाएँ शिक्षा के लिए अपरिहार्य मानी गयीं थीं. दूसरा उदाहरण रूस का था जहाँ ज़ार पीटर ‘महान’ के शासनकाल में लोगों में पश्चिमी यूरोप के ज्ञान और वहाँ की भाषाओं – विशेषतः फ्रांसीसी – के प्रति विशेष लगाव जगा था और 120 वर्ष के अन्दर ही उन्होंने अपनी भाषा रूसी और अपनी संस्कृति को परिष्कृत कर लिया था.

    लगता है भारत का आज का शासक वर्ग जन-सामान्य के हित के प्रति उतना भी सजग नहीं है जितना पौने दो सौ वर्ष पहले ब्रितानी मेकॉले था. उसने जिस हल को अल्पकालिक माना था, उसे स्थायी बनाकर हम अपनी भाषाओं की सतत् उपेक्षा कर रहे हैं.

    [गर्भनाल पत्रिका के जनवरी 2009 अंक में छपा लेख देखें – “भारत की भीषण भाषा समस्या और उसके सम्भावित समाधान”]


  2. “I have traveled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native self-culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.”
    Anal Kumar (अनल कुमार) , TGT- Sanskrit, Kendriya Vidyalaya No.1, Patiala (PB)


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