Home

इंटरनेट संबंधी समाचार: वेब नामों में लैटिन लिपि की अनिवार्यता समाप्त

नवम्बर 2, 2009

अब आप इंटरनेट वेब साइटों (अंतरजाल स्थलों?) के पतों को लैटिन/रोमन लिपि के बदले विश्व की तमाम अन्य मान्य लिपियों में चुन सकते हैं । इस आशय का एक समाचार (क्लिक करें) मुझे इंग्लैंड से छपने वाली पत्रिका ‘न्यू साइंटिस्ट’ (http://www.newscientist.com/) से मिला है ।

New Scientistt News Clip

यहां पर मैं पत्रिका में छपे पूरे पाठ्य का उल्लेख नहीं कर रहा हूं, केवल कुछ बिंदुओं का सार लिख रहा हूं । उसके पश्चात् अपनी कुछएक टिप्पणियां । पत्रिका का आरंभिक अनुच्छेद इन शब्दों से आरंभ होता है:

आज इंटरनेट का भविष्य कुछ अधिक ही स्पष्ट हो गया है, जब इसकी नियामक संस्था, ICANN (Internet Corporation for Assigned Names and Numbers – http://www.icann.org/en/general/background.htm), ने लैटिन से भिन्न लिपि-चिह्नों में वेब पतों को लिखने को मान्यता प्रदान कर दी । संस्था के अध्यक्ष, पीटर डेन्गेट थ्रश (Peter Dengate Thrush), समझाते हैं, “अभी तक इंटरनेट पतों का अंतिम अंश लैटिन कैरेक्टरों, A to Z, तक सीमित था ।” उनका आशय था कि अभी तक चीनी वेब नामों का आंरभिक अंश भले ही चीनी कैरेक्टरों में लिखा जा सकता था, उनका अंतिम अंश अनिवार्यतः ‘.cn‘ आदि ही हो सकता था । लेकिन अब …

लेख में लिखा है कि 16 नवंबर से सभी देश अब अपना ‘कैरेक्टर’ समुच्चय पंजीकृत कराकर ‘इंटर्नैशनल डोमेन नेम’ (IDNs) चुन सकेंगे । आगे यह भी कि चीनी भाषा-लिपि की वेब साइट Sun0769 में प्रस्तुत पाठ्य का ‘गूगल’ अनुवाद दावा करता है कि अब ‘लैटिन’ का एकछत्र सामाज्य समाप्त हुआ । जो लोग अंग्रेजी तो दूर उसकी लिपि तक से अपरिचित हैं उनके लिए यह खबर राहत पहुंचाने वाली है यह कहना है चीन की सबसे बड़ी इंटरनेट सेवा प्रदाता कंपनी HiChina के वरिष्ठ परियोजना प्रबंधक वांग पेंग (Wang Peng) का । वेब पते का आरंभिक अंश http:// यथावत् बना रहेगा, यद्यपि आजकल इसका लिखा होना आवश्यक नहीं । इंटरनेट की मूल कार्यप्रणाली इस सब से बदलेगी नहीं, कुछ तकनीकी फेरबदल शायद कहीं करना पड़े ।

उक्त लेख में इस रोचक एवं अहम बात का जिक्र है कि आज के समय में चीन में इंटरनेट उपयोक्ताओं की संख्या विश्व में सर्वाधिक है – 33 करोड़ (अमेरिका की जनसंख्या, करीब 31 करोड़, से अधिक !)

वेब नामों में लैटिन लिपि की अनिवार्यता की समाप्ति की जानकारी मुझे गूगल के एक समूह (गूगल ग्रूप) के रास्ते श्री लोचन मखीजा महोदय से भी 4-5 दिन पहले मिली थी ।

चीन की भूमिका

लिपि संबंधी अनिवार्यता समाप्त करने की मांग चल रही है और देर-सबेर लैटिन का वर्चस्व समाप्त हो जायेगा इसका अंदाजा मुझे काफी पहले से था । वस्तुतः करीब तीन साल पहले मेरी नजर में एक लेख (http://www.icann.org/en/announcements/idn-tld-cdnc.pdf) आया था, जिसमें चीन के तत्संबंधी प्रयासों का जिक्र था ।

इसमें दो राय नहीं है कि लैटिन की अनिवार्यता समाप्त करने में चीन की भूमिका सर्वोपरि रही है । जैसा पहले कहा गया है चीन में इंटरनेट उपयोक्ताओं की संख्या सर्वाधिक ही नहीं है बल्कि एक प्रकार से आश्चर्यजनक भी है – 33 करोड़, पूरी जनसंख्या का लगभग 25 प्रतिशत । चीन में अंग्रेजी नहीं चलती है, कम से कम उस तरीके से और उस सीमा तक नहीं जैसे अपने देश तथा पूर्व में ब्रिटिश उपनिवेश रह चुके कई अन्य देशों में । यह बात अधिकांश हिंदुस्तानियों के गले नहीं उतर पाएगी कि वहां अंग्रेजी वास्तव में नहीं चलती । अंग्रेजी जानने वाले चीनियों की संख्या बहुत कम है; इंटरनेट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार करोड़ भर भी नहीं । जो जानते भी हैं उनकी अंग्रेजी कामचलाऊ ही कही जायेगी, अच्छी एवं प्रभावित करने वाली तो शायद ही देखने को मिले । 33 करोड़ की जनता तो अंग्रेजी अल्फाबेट से भी ठीक से परिचित नहीं । फिर इंटरनेट का उपयोग वे भला कैसे कर सकते हैं ? साफ जाहिर है कि वहां के लोग अंग्रेजी नहीं, बल्कि अपनी चीनी – असल में मैंडरिन – के माध्यम से ही इंटरनेट का प्रयोग कर रहे हैं । चीन ने इस बात को महत्त्व दिया कि उसके अधिकाधिक लोग इंटरनेट का भरपूर प्रयोग करें और इस कार्य में अंग्रेजी उनके लिए रोड़ा न बने । यहां तक कि वेब साइटों के नाम लैटिन में लिखने की बाध्यता से भी उसकी जनता मुक्त रहे यह चीन का लक्ष्य रहा है । कुछ भी हो यह मानता पड़ेगा कि आईसीएएनएन के प्रसंगगत निर्णय के पीछे चीन की भूमिका प्रमुख रही है । भारत या इंडिया का भी कुछ योगदान रहा होगा इसमें मुझे शंका है ।

इंडिया बनाम भारत बनाम चीन

बात जब भाषा और लिपि की हो रही हो तो इस बात का उल्लेख करना अनुचित नहीं होगा कि हम भारतीयों, या बेहतर होगा कहना इंडियन्ज, और चीनियों में गंभीर अंतर हैं । चीन के लोग कमोबेश अपनी भाषा/लिपि के प्रति गौरव रखते हैं और कोशिश करते हैं कि उनका कार्य यथासंभव अपनी भाषा/लिपि के माध्यम से हो । इसके विपरीत हममें भाषाई गौरव का अभाव है । अपनी भाषाओं के प्रयोग से यथासंभव बचें इसकी कोशिश हम अधिक करते हैं और अंग्रेजी के पक्ष में तमाम तर्क खोज लाते हैं । चीनी सरकार तथा वहां के तकनीकी विशेषज्ञ यह अच्छी तरह से समझते आये हैं कि वहां के लोग पहले अंग्रेजी सीखें और तत्पश्चात् वे कंप्यूटर पर बैठें ऐसा विचार करके चलना मूर्खतापूर्ण होगा । चीन की सोच यह रही है कि उसकी जनता को अंग्रेजी सीखने की जहमत ही न उठानी पड़े, बल्कि उन्हें कंप्यूटर तथा इंटरनेट सुविधा उनकी भाषा – मैंडरिन – में उपलब्ध कराई जाए । आज कंप्यूटरों के क्षेत्र में जो प्रगति हो चुकी है उसके कारण भाषाएं तथा उनकी लिपियां कोई समस्या नहीं रह गयी हैं । इस तथ्य के मद्देनजर चीन ने इंफर्मेशन टेक्नालॉजी का प्रयोग अपने लोगों के लिए अधिक किया है । अपने लोगों की जरूरतों को नजरअंदाज करके केवल पाश्चात्य देशों को निर्यात हेतु अंग्रेजी के माध्यम से सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में कार्य होवे यह चीन को स्वीकार्य नहीं रहा ऐसा मानना है मेरा । सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में वे हमसे पीछे दिखते हैं, पर मैं समझता हूं कि वस्तुतः ऐसा है नहीं । उनकी प्राथमिकता में उसके अपने लोग शामिल रहे हैं, जिसे अपनी भाषा/लिपि में इंटरनेट सेवा चाहिए । मेरा सोचना है कि इस नीति के कारण सॉफ्टवेयर के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय बाजार से लाभ कमाने में चीन हमारे देश से पीछे रहा है । लेकिन उस कमी की भरपाई उसने हार्डवेयर के क्षेत्र में अतुलनीय प्रगति करके की है । हमारे यहां तो हार्डवेयर क्षेत्र प्रायः गायब-सा है, और साफ्टवेयर अधिकांशतः निर्यात के लिए, देशवासियों और स्वदेशी भाषाओं के लिए बहुत कम । बहरहाल मैं तो ऐसा ही मानता हूं ।

वास्तव में हमारी स्थिति चीन के ठीक उल्टी है । अपने यहां सॉफ्टवेयर के क्षेत्र में हो रहा कार्य प्रमुखतया निर्यात के लिए रहा है और अंग्रेजी पर अपने यहां अत्यधिक जोर रहा है । यहां तक कहा जाता है कि अंग्रेजी के बल पर ही तो हम सूचना-क्षेत्र में अग्रणी और ‘धुरंधर’ होंगे । हमारी प्रथमिकता यह कभी नहीं रही कि हम स्वयं अपने देशवासियों के लिए ऐसे सॉफ्टवेयर विकसित करें कि हमारी अधिकांश जनता, जो अंग्रेजी नहीं जानती है, इंटरनेट का प्रयोग कारगर तरीके से कर सके । हमारे विशेषज्ञों का शायद ही कभी यह गंभीर प्रयास रहा हो कि अंग्रेजी में उपलब्ध जानकारी को वे अपने देशवासियों के समक्ष उनकी भाषा – जनभाषा – में प्रस्तुत करें, जैसा कि विश्व के सभी प्रमुख देशों में होता रहा है । सच पूछिए तो अपने नीति-निर्धारकों की भाषाई नीति ही दुर्भाग्यपूर्ण और खेदजनक रही है । वे इस बात पर जोर डालते रहे हैं कि समस्त ज्ञान अंग्रेजी में है, उसे पाना है तो हर व्यक्ति स्वयं अंग्रेजी सीखे । इसे वे ‘अंग्रेजी थोपना’ नहीं मानते हैं । इसके विपरीत चीन की नीति रही है कि हर चीनी को अंग्रेजी की जरूरत नहीं । जो ज्ञान अंग्रेजी में उपलब्ध है उसे अंग्रेजी जानने वाले विशषज्ञों द्वारा उनकी भाषा – मैंडरिन – में उनके सामने रखी जाएगी । अंग्रेजी सीखने का समय- तथा श्रम-साध्य कार्य हर व्यक्ति को करना पड़े ऐसी नीति चीन की नहीं रही है । इसी सिद्धांत को लेकर चीन चला है, और उसके प्रयास रहे हैं कि किसी चीनी को लैटिन लिपि का भी ज्ञान न हो तो भी वह बखूबी इंटरनेट का उपयोग कर सके । चीन उन देशों में अग्रणी रहा है जिन्होंने लैटिन लिपि की अनिवार्यता से मुक्त होने की पुरजोर कोशिश की और अंत में सफल भी हो गया । मेरा अनुमान है कि भारत या इंडिया का इस प्रयास में कोई योगदान नहीं रहा ।

वेब साइट नाम और भारतीय लिपियां

इंटरनेट वेब साइटों के नाम और उन पर प्रस्तुत पाठ्य सामग्री का लैटिनेतर लिपियों में उपलब्ध होना अवश्य ही उन उपयोक्ताओं के लिए लाभप्रद है जो उक्त लिपि और अंग्रेजी से सुपरिचित नहीं हैं । अब सवाल उठता है कि आईसीएएनएन का निर्णय अपने देश के संदर्भ में कोई अहमियत रखता है क्या ? इस तथ्य को नहीं झुठलाया जा सकता है कि अपने देश में समाज का अपेक्षया संपन्न वर्ग ही कंप्यूटरों और इंटरनेट तक पहुंच रखता है, और अपवादों को छोड़ दें तो, यह वह वर्ग है जो अंग्रेजी भाषा में अधिक दिलचस्पी रखता है और उसी को प्राथमिकता के साथ प्रयोग में लेने का आदी है । इस वर्ग के जो लोग अपनी नेमप्लेट (नामपट्ट) तक देवनागरी या अन्य भारतीय लिपियों में लिखने से परहेज रखते हैं वे क्या लैटिनेतर लिपि में वेेब नाम चुनना चाहेंगे ? अपने शहरों में दुकानों/कार्यालयों के नामपट्ट तक चयनित तौर पर अंग्रेजी में रहते हैं; ऐसे में भारतीय लिपियों की बात कौन करेगा ? उपभोक्ता वस्तुओं के नाम और उनके साथ संलग्न जानकारी तक भारतीय लिपियों में कम ही देखने को मिलती है । देवनागरी की स्थिति तो और भी दयनीय है । बाजार में हिंदी संगीत/गानों का कैसेट खरीदें, क्या उस पर देवनागरी में लिखा दिखता है कभी ? हिंदी फिल्मों की ‘कास्टिंग’ आदि का विवरण तक देवनागरी में देखने को नहीं मिलता, तब भला उसका प्रयोग इंटरनेट वेब नामों में कौन करेगा ।

अपने देश की प्रायः सभी, विशेषकर सरकारी, वेब साइटें मूलतः अंग्रेजी में बनी हैं। कम ही स्थल हैं जिनमें हिंदी/देवनागरी में जानकारी मिलेगी । उन साइटों का ढांचा भी अक्सर अंग्रेजी में ही रहता है, केवल पाठ्य हिंदी में देखने को मिलेगा । प्रयोग में लिए जा रहे ‘आइकॉन’ और ‘बटन’ पर लैटिन वर्ण ही झलकते हैं । चाहे बैंकीय लेन-देन हो या रेलवे आरक्षण, अथवा इंटरनेट पर सरकारी-गैरसरकारी फार्म भरना, सभी कुछ अंग्रेजी में रहता है । तब आईसीएएनएन का उक्त निर्णय भारत के संदर्भ में क्या कोई माने रखता है । शायद नहीं !

और बात खत्म करते-करते आंरभ में उल्लिखित वेब साइट Sun0769 के एक पेज की तस्वीर पेश कर दूं, यह दर्शाने के लिए कि लैटिनेतर लिपि के प्रयोग का क्या मतलब है ।

Chinese Site

आगे है ‘गूगल अनुवादक’ से प्राप्त वही पृष्ठ । मुझे लगता है कि गूगल अनुवादक हिंदी की तुलना में चीनी भाषा के लिए अधिक सफल है । इस मामले में भी वे हमसे आगे हैं ।

CHinese Site Google Translation

और अंत में यह देखिए तोक्यो विश्वविद्यालय का एक वेब पेज

Tokyo University Site Pge

क्या अपने देश में कोई विश्वविद्यालय है जिसकी वेब साइट पर भारतीय लिपि भी दिखती हो ? मेरी जानकारी में नहीं ! – योगेन्द्र जोशी

Advertisements

2 Responses to “इंटरनेट संबंधी समाचार: वेब नामों में लैटिन लिपि की अनिवार्यता समाप्त”

  1. amit Says:

    महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की वेब साइट हिंदी में है। http://www.hindivishwa.org/

    प्रत्युत्तर:
    धन्यवाद, अमित जी, कि महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय की वेब साइट हिंदी में है: http://www.hindivishwa.org/ । लेकिन उसके बाद ? उक्त साइट का लिंक “दूरस्थ शिक्षा केंद्र के अध्ययन केंद्र स्थापित करने हेतु विज्ञापन और आवेदन”
    (http://www.hindivishwa.org/pdf/dist/Advstdycentr.pdf) खोलिये । उपलब्ध जानकारी (आरंभिक विज्ञप्ति को छोड़) अंग्रेजी में है । यह भी न हो सका कि हिंदी एवं अंग्रेजी, दोनों, में हो । आगे क्या कहूं ? असली मुद्दा तो यह है कि कोई साइट है जिसका नाम देवनागरी लिपि में हो, भले ही वह आपको अंग्रेजी नाम वाली साइट पर भेज दे (रिडिरेक्ट करे) ? – योगेन्द्र जोशी


  2. लाजवाब लेख और जानकारी भरा। धन्यवाद इसके लिए। इसका इस्तेमाल करना चाहूंगा। कृपया ईमेल पते पर जवाब देने का कष्ट करें।


एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s

%d bloggers like this: