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आज की हिंदी का एक नमूना हिंदी अख़बार से – यह हिंदी है कि हिंग्लिश ?

अक्टूबर 4, 2009

खुद को हिंदी अखबार होने का दावा करने वाले एक समाचारपत्र में कैसी हिंदी छपती है इसकी एक बानगी प्रस्तुत है ।
मैं बीच-बीच के अंशों को ‘इलिप्सिसों – ellipses’ के प्रयोग के साथ लिख रहा हूं । पूरा विवरण आप अधोलिखित वेबसाइट पते पर देख सकते हैं:-
http://www.bhaskar.com/2009/09/30/090930015246_lifestyle.html

हां तो आगे देखिए उक्त खबर के चुने कुछ शब्द/वाक्यांश:-

“बच्चों में झूठ बोलने की हैबिट को दूर करें [शीर्षक]
“Bhaskar News Wednesday, September 30, 2009 01:45 [IST]
“प्रजेंट टाइम में अधिकांश पेरेंट्स अपने चिल्ड्रन्स के झूठ बोलने की हैबिट से परेशान हैं। … सीखी हुई हैबिट है, जिस पर पेरेंट्स … इसे रोका या चैंज किया … साइकेट्रिस्ट डॉ. राकेश खंडेलवाल का। उन्होंने इस हैबिट को दूर करने के कुछ टिप्स बताए, जो पेरेंट्स के लिए मददगार साबित हो सकते हंै।
“1. बच्चों से ऐसे क्वैश्चन नहीं करना चाहिए, जिनके आंसर में झूठ बोलना … बच्चे को कलर का पैकेट दिलवाने के बाद … वह वॉल को चारों ओर … से रंग-बिरंगी कर देता है। उस टाइम … उसे कहें कि आज और कलर्स यूज करने की इजाजत नहीं है।
“2. … फैमिली आगे बढ़कर … नहीं करना चाहिए।
“3. … बच्चे फ्रैंड्स के सामने अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने और इमेज सुधारने … उनके रिलेशन में सभी ऑफिसर रैंक पर हैं। उनके कपड़े बहुत चीफ हैं। इसके लिए बच्चे को अकेले में कॉन्फिडेंस से समझाएं। उसे कहें कि उसकी ऑरिजनलिटी को दिखावे से ज्यादा पसंद किया जाएगा।
“4. पेरेंट्स की ओर से बच्चों के बिहेव पर टफ और सख्त नियंत्रण या बहुत ही फ्री एन्वायरमेंट बच्चे को झूठ बोलने को मोटिव करता है। इनके बीच का माहौल उपयुक्त रहेगा।
“5. … झूठा होने का लेबल नहीं लगाएं।
“6. बच्चे से फ्रैंडली रिश्ता बनाएं। …
“7. फ्री स्ट्रेस के माहौल …बच्चों में टफ और मुश्किल बात को कहने के सोशल कौशल का अभाव …”

जरा ग़ौर से देखें कि अंगरेजी के शब्दों की कितनी भरमार है इस पाठ्यांश में :-
प्रजेंट (मौजूदा, वर्तमान), टाइम (समय), पेरेंट्स (माता-पिता, मां-बाप), चिल्ड्रन्स (बच्चे), हैबिट (आदत), चैंज (बदलाव, तबदीली, परिवर्तन), साइकेट्रिस्ट (मनःचिकित्सक), टिप्स (गुर, नुस्ख़े), क्वैश्चन (सवाल, प्रश्न), आंसर (उत्तर, जवाब), कलर (रंग), पैकेट (डिब्बा), वॉल (दीवाल), यूज (प्रयोग, इस्तेमाल), फैमिली (परिवार), फ्रैंड्स(दोस्तों, मित्रों), इमेज (छबि), रिलेशन (संबंध, रिश्ते), ऑफिसर (अधिकारी), रैंक (स्तर या पद), चीफ (मुख्य; प्रसंगानुसार ‍‘चीप’ यानी ‘सस्ता’ शब्द रहा होगा), कॉन्फिडेंस (विश्वास, भरोसा), ऑरिजनलिटी (मौलिकता), बिहेव (व्यवहार, वर्ताव), टफ (सख्त, कठोर), फ्री (मुक्त, बेरोकटोक), एन्वायरमेंट (वातावरण, माहौल; पर्यावरण नहीं), मोटिव (प्रोत्साहन, प्रेरणा), लेबल (चिप्पी), स्ट्रेस (दबाव), और सोशल (सामाजिक) । (३१ शब्द)

इनमें से कुछ शब्द ऐसे हैं जो लंबे अर्से से हिंदीभाषी प्रयोग में ले रहे हैं और जिनसे आम आदमी भी सुपरिचित है, जैसे
टाइम, ऑफिसर, रैंक, फ्री, और लेबल ।
इन्हें हिंदी के प्रचलित शब्द मान लेना कदाचित्‌ व्यावहारिक लगता है । मुझे इसमें कुछ खास आपत्तिजनक नहीं लगता, पर उक्त समाचार में जिस प्रकार अंधाधुन्द अंग्रेजी के शब्द अमर्यादित तौर पर प्रयुक्त हुए हैं, और इसी प्रकार ‘हिंदी’ समाचार माध्यमों पर अक्सर जो देखने को मिलता है, उन्हें लेकर मेरे मस्तिष्क में कई विचार उठते रहे हैं:

1.
हिंदी बोलते समय, और अब तो हिंदी लिखने में भी, अपने देश के पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी शब्दों को जैसे बेरोकटोक इस्तेमाल करते हैं वह मुझे हिंदी के साथ किया जाने वाला एक भद्दा मजाक लगता है । क्या अंग्रेजी का किंचित् ज्ञान होने का यह अर्थ है कि हम जब चाहें, जहां चाहें, जितना चाहें, अंग्रेजी शब्द प्रयोग में लें ? क्या इस प्रकार का रवैया हम अंग्रेजी बोलते-लिखते समय भी अपनाते हैं ? क्या अपनी अंग्रेजी की शुद्धता के प्रति हम अत्यधिक सचेत नहीं रहते ? भूल से भी हम हिंदी या अन्य भाषाओं के शब्द अपनी अंग्रेजी में बोलते हैं कभी? क्या कोई कभी “डॉक्टर, आइ एम फ़ीलिंग सरदर्द” कहते हुए सुना जायेगा, ठीक वैसे ही जैसे हिंदी में “डॉक्टर, मुझे हेडेक्‌ हो रहा है” । भले ही हमें एक-दो सेकंड रुकना पड़ जाये उपयुक्त अंग्रेजी शब्द की तलाश में, लेकिन हिंदी शब्द अंग्रेजी में मिलाने से बचते रहेंगे ।

2.
एक कहावत है: “सावन के अंधे को हरा ही हरा दिखता है” । यह उक्ति हम हिंदीभाषियों पर भाषाई संदर्भ में पूर्णतः लागू होती है । हम कुछ अंग्रेजी सीख जाते हैं तो सोचने लगते हैं कि इस देश का हर दूसरा व्यक्ति भी हमारे बराबर की अंग्रेजी तो जानता ही है । इसलिये अंग्रेजी शब्दों के धड़्ल्ले से प्रयोग में हमें कहीं कोई ख़राबी नहीं दिखती । परंतु ऊपर लिखी सूची में कई शब्द ऐसे हैं जिनके बारे में राह चलते किसी पूछें तो वह अनभिज्ञता जताएगा । मेरा अनुमान है कि ये शब्द:
प्रजेंट, कॉन्फिडेंस, ऑरिजनलिटी, बिहेव, एन्वायरमेंट, मोटिव, स्ट्रेस, वॉल, यूज
बहुतों को नहीं मलूम होंगे । लेकिन स्कूल-कालेजों, दफ़्तरों आदि में अंग्रेजी में काम करने वाले भूल जाते हैं कि आम आदमी का इन शब्दों से परिचय हो इसकी संभावना कम ही है । दुर्भाग्य से हम सोचते हैं कि दूसरे को पर्याप्त अंग्रेजी नहीं आती है तो यह उसकी गलती है । इतनी भी अंग्रेजी नहीं सीख सका वह ! क्या उदार विचार है यह ! हर हिंदुस्तानी को अंग्रेजी आनी ही चाहिए, अव्वल दर्जे की । अगर यह रवैया अन्य प्रमुख देशों के बाशिंदों में नहीं दिखाई देता है तो वे हमसे पिछड़े हैं । यहां पर मैं बता दूं कि इन शब्दों:
allien (एलिअन), crucial (क्रूश्‌ल्‌), interpret (इंटप्रेट), miniature (मिनिअचर), native (नेतिव), prejudice (प्रेजुडिस)
और ऐसे ही अनेकों शब्दों से मैं सुपरिचित ही नहीं हूं बल्कि मैं इन्हें लेखन-वाचन में बखूबी इस्तेमाल कर सकता हूं । ऐसा मेरे साथ व्यावसायिक कारणों से हुआ है – विश्वविद्यालय में अध्ययन, अध्यापन एवं शोध कार्यों के कारण । पर ये मेरी जबान पर तब भी आयें जब मैं आम आदमी से बात करूं तो उसे उचित नहीं कहूंगा । इन शब्दों तथा इन जैसे शब्दों को मैं लोगों के मुख से सुनता रहता हूं और यह महसूस करता हूं कि ऐसा होना नहीं चाहिए, किंतु ऐसा हो रहा है और आगे भी होगा ।

शेष भाग आगामी कल (5 अक्टूबर) की पोस्ट में देखें । – योगेन्द्र जोशी

18 Responses to “आज की हिंदी का एक नमूना हिंदी अख़बार से – यह हिंदी है कि हिंग्लिश ?”

  1. संगीता पुरी Says:

    अधिक पढे लिखे लोगों की बातें नहीं कह सकती .. पर कम पढे लिखे लोग अधिक दिखावा करते हें .. मैने तो बहुत जगह पर देखा है .. मैं सूजन कहूं तो वे स्‍वेलिंग कहेंगे .. मैं बुखार कहूं तो वे फीवर कहेंगे .. अपने को पढा लिखा दिखाने के लिए गलत सलत अंग्रेजी भी बोलने की वे कोशिश भी करते हैं .. भगवान बचाए ऐसे अंग्रेजीभक्‍तों से !!


  2. कुछ महीनों पहले मैने भी इस विषय पर एक पोस्ट लिखी थी… यह हिन्दी का जाल स्थल है या अंग्रेजी का?
    http://nahar.wordpress.com/2008/04/08/wah-media


  3. कबाडा है यह कबाडा -न तो हिन्दी ,न ही अंगरेजी और नहीं हिंगलिश !


  4. बहुत कष्ट होता है कथित हिंदी समाचारपत्रों में देवनागरी इंग्लिश देख कर।

    संगीता जी की टिप्पणी से भी सहमत


  5. यह प्रवृत्ति अत्यन्त दुखद है। यह हिन्दी अखबारों की चेतना के अभाव की द्योतक है। अखबार वालों को बहुत बड़ी गलतफहमी हो चली है कि लोग इस तरह की भाषा को पसन्द करते हैं। वास्तविकता यह है कि सरल और सुबोध ( किन्तु हिन्दी शब्दों से भरपूर ) भाषा ही लोगों को अच्छी लगती है।


  6. इस प्रकार की “घटिया फ़फ़ूंद” फ़ैलाने में दैनिक भास्कर सबसे अव्वल है, आखिर “हिन्दी” का सबसे बड़ा अखबार जो है…🙂


  7. मैं आपके विचार से पूरी तरह से सहमत हूँ । हिन्दुस्तान दैनिक का भी यही हाल है । परन्तु इस रोग के निवारण के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है । ऐसे दैनिक पत्रों के सम्पादक से सीधे बात करके या सम्पादक के नाम पत्र के माध्यम से विरोध प्रकट करके बहुत कुछ किया जा सकता है ।


  8. नारायण जी, मुझे भले ही लोग गलत कहें‌ लेकिन मै साहित्यक तथा लेखकिय अभिव्यक्ति मे किसी भी भाषा की शुद्धता का पक्षधर हूँ। इस तरह के समाचार पत्र दोनो ही भाषाओं का नुकसान कर रहे हैं। इस लेख मे कहीं भी बच्चों‌ मे अपने अतीत, संस्कृति के बारे मे कुछ भी नही कहा गया है — यह दयनीय स्थिति है।


  9. पहले पत्रकारिता एक मिशन होता था.पत्रकार भी सिद्धांतवादी होते थे.अपने सिद्धांतों के साथ कभी समझॊता नहीं करते थे.आज की पत्रकारिता शुद्ध व्यवसायिकता हॆ.गला काट प्रतियोगिता के इस युग में बाजारवादी संस्कृति हावी हॆ.क्या छपेगा?क्या नहीं-यह कोई व्यक्ति नहीं बाजार तय करेगा.इसलिए आज के युग में-इसे न तो हिन्दी कह सकते हॆं ऒर न ही ’हिंग्लिश’.इसे बाजारु भाषा कहा जा सकता हॆ.

  10. narendra tomar Says:

    Hindi ki rozi roti kha rahe adhikansh patrakar na jane kiske dabab mein Hindi ko vikrit karne mein lage hein. Ye hi vo log hain jo har Hindi divas par sarkar ko koste hain ki voh kuch kar nahin rhi hai.
    Iske atirikt ham chahe kitne hi rastrapremi hone ka dhong kyon na karein ham Hindi valon ka angrezi prem sabse zyada vyavsaik gativiidhiyon mein dikhta hai.Ghor hindibhashi ilakon mein,jahan abadi vishal bahumat angrezi ko parh ,bol aur samajh nahin sakta hai,unke gali muhallon tak mein zyadatar dukano ke signboard angrezi mein dikhenge aur akhbaron ke sath roz aane vale parche bhi angrezi mein hi honge.
    kuch dinon pahle apne lekh , Angrezi ke saye mein hindi, mein Vishnu Nagar ne thik hi likha hai ki “…sachai yeh hai ki hindibhashi madhya varg ne hindi ka sath chor dia hai.” Aur isiliye ashchrya nahi ki dasek salon mein ham hindi ke ankon aur dino ke nam bhool jayege.Mahino ke hindi nam to ab kise yad hai.
    Au ant mein. Apni bat ko roman mein likhna meri majboori hai dyonki mein online hindi type karna nahin janta.


  11. नरेन्द्र जी, यदि आप गनू / लिनक्स का प्रयोग करते है, जैसा की मै करता हूँ‌, तो हिंदी या कोई भी अन्य भाषा मे टंकण करना बेहद आसान है। यदि दुर्भाग्य-वश आप विन्डोज का प्रयोग कर रहे है तो या तो पाबला जी का तरीका अपनायें या फ़िर यह वाला। http://hindi.kalkion.com/article/32


  12. @ संगीता जी की बात से पूर्णत: सहमत हूँ। हालाकि कोई भी भाषा अन्य भाषाओं से शब्द् ले कर ही समर्द्ध होती है। अन्गरेजी आज इसीलिये शक्तिशाली है क्योकि उसने अन्य भाषाओं से शब्दो को स्वयं‌ मे समाहित किया है। और यह कोई हिंदी बनाम अग्रेजी युद्ध नही है। बात है हीन भावना की — अग्रेजी के दो शब्द चस्पा कर दिये और शामिल हो गये ‘एलीट’ वर्ग मे। आप ही बतायें‌ इतने वर्षो तक अंगरेजों की गुलामी के बाद भी अगर कोई श्वेत दिख जाता है तो लोग साथ मे फ़ोटो खिचवाने के लिये ललाइत हो जाते है। तो जहाँ भाषा का विकास नये शब्द (मूल भाषा मे अनुपलब्ध) को स्वयं‌ मे समाहित करके होता है, सभ्यता का पतन अपनी भाषा को हीन समझ कर होता है। हिब्रू पुन: जीवित हो गयी, संस्कृत मर गयी। देखिये कहाँ है इस्रयल और कहाँ है हमारा भारत।

  13. vermadivyaa Says:

    manyavar me khud computer par hindi likh nahi pati chama kare. aapka uthaya vishaye mere pratidin aalochana ka vasheye raha hai. hame dhanyavad dena chahiye aise logo ka kee kaksekam voh hindi me likhne ki koshish to kar rahe hai kam se kam aaj ladkhada rahe hai kal sambhal kar chalne bhi lagenge shayad umeed par par duniya kayam hai.

  14. सत्यजीत Says:

    धोबी का कुत्ता न घर का, न घाट का. जो ऐसा कर रहे हैं वो अपने ही पैर में कुल्हाड़ी मार रहे हैं.
    देखते नहीं हैं, फिल्मी अभिनेता अंग्रेजी में ऐं-भें करते हैं मगर कौन अंग्रेज उन्हें पूछता है.

  15. Om shri Says:

    Hindi bhashaa ke pratibhashaali lekhak evan aalochak bhi apne lekho, samalochano athwa kavitaon me angreji bhashaa ke shabdon ka upyog kar kadachit yah pradarshit karna chaahte hain ki yadyapi ham hindi me likh rahe hain par ham parhe likhe hain arthat angreji jaante hain
    Aaj shikshit hona angrejivid hone ka paryay ban gaya hai.
    Iske sthan par sanskrit ke shabdon ka upyog kar apni bhasha ko adhik smridh, gouravshali evan sprihneey bana sakte hain.
    Apne gyan ko pradarshit karne ke liye madhyam ke saath vyabhichaar nahin karna chaahiye


  16. कुछ दिनों से ऐसे शब्दों पर ध्यान दिया जो अंग्रेजी के हैं और सामान्य पढ़े-लिखे(?) लोग जिन्हें प्रयोग करते हैं तब पता चला कि 5000 औसत शब्द अगर किसी ठीक-ठाक आदमी के द्वारा बोले जाते हैं तब 2500-3000 से अधिक शब्द वह अंग्रेजी का बोलने लगा है। अफ़सोस है कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ने के कारण बहुत से शब्द बोलते वक्त आ जाते हैं जो अंग्रेजी के हैं लेकिन उन पर लगाम लगाने की कोशिश हो रही है। लिखते वक्त ठीक है, वहाँ अंग्रेजी का दखल नहीं चलता है।


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