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प्रवंचन एवं प्रवंचना जैसे शब्दयुग्म – संस्कृत में उपसर्गों एवं प्रत्ययों की भूमिका

अगस्त 27, 2009

चंद रोज पहले अंतरजाल पर ‘हिंदी समूह’ के किसी स्थल पर एक पाठक ने यह प्रश्न उठाया थाः
“प्रवचन एवं प्रवंचना से तो वह परिचित है, किंतु क्या प्रवंचन भी हिंदी का स्वीकार्य शब्द है ?”प्रश्न का संक्षिप्त उत्तर है हां । वास्तव में प्रवंचन तथा प्रवंचना, दोनों ही स्वीकार्य हैं और दोनों का अर्थ एक ही हैः छल-कपट या धोखा देने का भाव । किंतु व्यवहार में प्रवंचना का प्रयोग ही अधिकाशतः देखने को मिलता है । इन दोनों में लिंगभेद भी है, पहला नपुंसक लिंग है तो दूसरा स्त्रीलिंग । आत्म-प्रवचंना (self-deception) शब्द तो एक पर्याप्त प्रचलित शब्द है ।

संस्कृत में उक्त शब्दों के सदृश कई अन्य जोड़े भी हैं । कुछ चुने हुए शब्दयुग्मों की सूची मैं आगे प्रस्तुत कर रहा हूं:

(टिप्पणी– कोष्ठकों में दी गयी वैकल्पिक वर्तनी ही संस्कृत में मान्य है; अनुस्वार वाली हिंदी के लिए अनुमत है )
1. अन्वेषण, अन्वेषणा; 2. अर्चन, अर्चना 3. अर्हण, अर्हणा (सम्मान-अभिव्यक्ति); 4. अवमानन, अवमानना; 5. अशन, अशना (भोजन, भोजन करना); 6. आमंत्रण, आमंत्रणा (आमन्त्रण, आमन्त्रणा); 7. आराधन, आराधना; 8. उत्तेजन, उत्तेजना; 9. उद्घट्टन, उद्घट्टना (टकराना); 10. उद्घोषण, उद्घोषणा; 11. उपस्थापन, उपस्थापना (निकट रखना); 12. उपार्जन, उपार्जना; 13. उपासन, उपासना; 14. कल्पन, कल्पना; 15. क्षारण, क्षारणा (दोषारोपण, आरोप लगाना); 16. गणन, गणना; 17. गर्जन, गर्जना; 18. गवेषण, गवेषणा; 19. घटन, घटना; 20. घर्षण, घर्षणा; 21. घोषण, घोषणा; 22. चर्वण, चर्वणा (चबाना); 23. चिंतन, चिंतना (चिन्तन, चिन्तना); 24. चेतन, चेतना; 25. छलन, छलना (ठगना); 26. तर्जन, तर्जना (डाटना-फटकारना); 27. ताड़न, ताड़ना (ताडन, ताडना); 28 निराजन, निराजना (आरती, आरती करना); 29. निरूपण, निरूपणा (आकृति, व्यक्त करना); 30. परिकल्पन, परिकल्पना (रूप, रूप देना); 31. परिदेवन, परिदेवना (रोना-धोना); 32. पर्येषण, पर्येषणा (पूछताछ करना); 33. पालन, पालना; 34. प्रघर्षण, प्रघर्षणा (रगण, रगणना); 35. प्रदक्षिण, प्रदक्षिणा; 36. प्रवंचन, प्रवंचना (प्रवञ्चन, प्रवञ्चना) (धोखा देना); 37. प्रार्थन, प्रार्थना; 38. प्रेरण, प्रेरणा; 39. प्रोद्घोषण, प्रोद्घोषणा (ऐलान करना); 40. भर्त्सन, भर्त्सना; 41. भावन, भावना; 42. मंत्रण, मंत्रणा (मन्त्रण, मन्त्रणा); 43. मार्गण, मार्गणा (तलाश करना); 44. याचन, याचना; 45. यातन, यातना; 46. यापन, यापना; 47. योजन, योजना; 48. रोचन, रोचना (प्रकाशन, प्रकाशित करना); 49. लक्षण, लक्षणा (चिह्न); 50. लवण, लवणा (सलोना); 51. लांछन, लांछन (लाञ्छन, लाञ्छन); 52. वंचन, वंचना (वञ्चन, वञ्चना); 53. वर्णन, वर्णना; 54. वर्जन, वर्जना; 55. विगर्हण, विगर्हणा (निंदा); 56. विघट्टन, विघट्टना (टक्कर मारना); 57. विचारण, विचारणा; 58. विज्ञापन, विज्ञापना; 59. विडंबन, विडंबना (विडम्बन, विडम्बना); 60. विमर्दन, विमर्दना (कुचलना); 61. विवेचन, विवेचना; 62. वेदन, वेदना; 63. व्यंजन, व्यंजना (व्यञ्जन, व्यञ्जना ); 64. शुश्रूषण, शुश्रूषणा (सेवा, सेवा करना); 65. श्रवण, श्रवणा; 66. संकलन, संकलना (सङ्कलन, सङ्कलना); 67. संकीर्तन, संकीर्तना (सङ्कीर्तन, सङ्कीर्तना); 68. संघट्टन, संघट्टना (सङ्घट्टन, सङ्घट्टना) (टक्कर, टकराना); 69. संभावन, संभावना (सम्भावन, सम्भावना); 70. संवाहन, संवाहना (बोझा ढोना); 1. संवेदन, संवेदना; 72. संश्लेषण, संश्लेषणा (मिलाकर बांधना); 73. संस्थापन, संस्थापन; 74. सांत्वन, सांत्वना; 75. साधन, साधना; 76. सूचन, सूचना; 77. स्थापन, स्थापना; 78. हिंसन, हिंसना (चोट मारना); 79. हेलन, हेलना (अवहेलना करना)

चूंकि हिंदी में संस्कृत के शब्द सहज तौर पर स्वीकार कर लिये जाते हैं, अतः ये सभी शब्द स्वीकार्य कहे जाएंगे । यह एक तथ्य है कि किसी शब्दयुग्म के दोनों सदस्य व्यवहार में समान रूप से प्रयुक्त हों ऐसा नहीं होता । अज्ञात कारणों से कोई एक शब्द प्रायः पूरी तौर पर व्यवहार में आ जाता है और दूसरा अप्रयुक्त तथा अपरिचित-सा छूट जाता है । किंतु सैद्धांतिक रूप से वह संस्कृत में स्वीकार्य अवश्य रहता है ऐसा मेरा मत है । ये शब्द आए कहां से या कैसे बने इस पर यदि तनिक विचार किया जाए तो वस्तुस्थिति समझ में आ सकती है । इस संदर्भ में मैं इस स्थल पर उपसर्गों तथा प्रत्ययों की संक्षिप्त चर्चा करना चाहूंगा ।

आगे बढ़ने से पहले संस्कृत के एक नियम का उल्लेख कर लेना समीचीन होगा । संस्कृत पदों में अनुस्वार बिंदु का प्रयोग केवल ‘य’ से ‘ह’ तक के व्यंजनों के ठीक पूर्व किया जा सकता है, यथा संयम, संलग्न, संवेग, संशय आदि । किंतु किसी वर्गीय वर्ण (‘क’ से लेकर ‘म’ तक के कवर्ग, चवर्ग आदि के वर्ण) के पूर्व अनुस्वार नहीं प्रयुक्त होता बल्कि उसके स्थान पर संबंधित वर्ग का पांचवां वर्ण लिखा जाता है, जैसे अंक (हिंदी में) को संस्कृत में अङ्क लिखा जायेगा । इसी प्रकार भङ्गुर, कञ्चन, कण्टक, दन्द्व, लम्पट ही सही हैं । उक्त सूची में संस्कृत के इस नियम के अनुसार मान्य वर्तनी कोष्टक में दी गयी है ।

उपसर्ग (prefix) तथा प्रत्यय (suffix) – मेरी दृष्टि में संस्कृत प्रमुखतया क्रियाधातु-आधारित भाषा है, जिसका तात्पर्य यह है कि अधिकांश संज्ञा तथा विशेषण शब्दों को कतिपय नियमों के अधीन क्रियाधातुओं से प्राप्त किया जाता है । स्वयं नयी-नयी क्रियाधातुओं की रचना भी मूल धातुओं के पूर्व एक या अधिक उपसर्गों को जोड़ने से संभव है । व्याकरण पुस्तकों में निम्नलिखित 22 उपसर्गों का उल्लेख मिलता हैः
“अति, अधि, अनु, अपि, अभि, अव, आ, उत्, उप, दुर्, दुस्, नि, निर्, निस्, परा, परि, प्र, प्रति, वि, सम्, एवं सु”
(दुस् दुर् वस्तुतः एक ही उपसर्ग के दो भिन्न-भिन्न स्थितियों में प्रयोजनीय रूप हैं; और यही बात निर्, निस् के लिए भी है ।)

उपसर्गों के बारे में कहा जाता है “उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते । प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत् ।।”
(उपसर्ग से धातु का अर्थ बलपूर्वक अन्यत्र पहुंचा दिया जाता है, यानी उसका अर्थ बदल जाता है, जैसे प्रहार, आहार, संहार, विहार, परिहार, जो सभी मूल धातु ‘हृ’ = ले जाना, हरना, आदि से प्राप्य हैं । हृ से हार और फिर प्र + हार आदि ।)

धातुओं और संज्ञाशब्दों से वाक्यों में प्रयोजनीय पदों की प्राप्ति प्रत्ययों के माध्यम से होती है, जिनकी संख्या बहुत है । उनका यहां उल्लेख करना न तो संभव है, और न ही मुझमें वह विशेषज्ञता है कि व्यापक चर्चा कर सकूं । फिर भी अतिसंक्षिप्त परिचय देकर उनकी प्रतीति देने की कोशिश कर सकता हूं । पहले बता दूं कि (संस्कृत में), पद धातु/संज्ञाशब्द का वह बदला हुआ रूप है जो वाक्य में वांछित अर्थ ग्रहण करना है । उदाहरणर्थः ‘राम’ से रामः, रामौ, रामाः इत्यादि (सुबन्त प्रत्यय), और ‘गम्’ (जाना) से गच्छति, गच्छतः, गच्छन्ति इत्यादि (तिङन्त प्रत्यय) । इसी प्रकार ‘कृ’ (करना) से कृति, कार्य, कर्तव्य (कृदन्त प्रत्यय); और उपसर्ग भी प्रयोग में ले लें तो आकृति, अनुकृति, प्रकृति, विकृति इत्यादि । इसके अलावा ‘सुन्दर’ से सौन्दर्य, सुन्दरता इत्यादि (तद्धित प्रत्यय) । ‘आत्मज’ से आत्मजा और तपस्विन् (तपस्वी) से तपस्विनी इत्यादि (स्त्रीप्रत्यय) । व्याकरणवेत्ता प्रत्ययों को पांच वर्गों में बांटते हैं: तिङन्त तथा कृदन्त क्रियाधातुओं के लिए और सुबन्त, तद्धित एवं स्त्रीप्रत्यय संज्ञा/सर्वनाम/विशेषण शब्दों के लिए । उपसर्गों की तुलना में प्रत्ययों का विषय कहीं अधिक गंभीर और विस्तृत है ।

एक बात और । उपसर्ग धातु/शब्द के पहले यथावत् (अपरिवर्तित) जुड़ता है, जैसे अनु+वाद = अनुवाद, परि+वाद = परिवाद, प्रति+वाद = प्रतिवाद, वि+वाद = विवाद, एवं सम्+वाद = संवाद । किंतु प्रत्ययों के मामले में यह बात शब्दशः लागू नहीं होती है । मेरे मत में प्रत्ययों को धातु/शब्द के पश्चात् क्या जुड़ना है और वह कब क्या रूप लेगा इसका द्योतक समझा जाना चाहिए । उदाहरणर्थ: ‘तुमुन्’ एवं ‘क्तवा’ धातुओं के साथ प्रयोजनीय कृदन्त वर्ग के दो प्रत्यय हैं । पहला धातु से संबंधित क्रिया ‘करने के लिए’ (to perform that act) के भाव को दर्शाने हेतु प्रयोग में लिया जाता है, जैसे गम्+तुमुन् = गन्तुम् (जाने को, जाने के लिए = to go; सः गन्तुं इच्छति = He wants to go), ज्ञा+तुमुन् = ज्ञातुम् (जानने के लिए), पठ्+तुमुन् = पठितुम् (पढ़ने के लिए), पा+तुमुन् = पातुम् (पीने के लिए), आदि । दूसरा ‘क्त्वा’ किसी क्रिया के ‘हो चुकने, कर चुकने, या संपन्न हो जाने’ के भाव को व्यक्त करने में प्रयोग में लिया जाता है, जैसे गम्+क्त्वा = गत्वा (जाकर), ज्ञा+क्त्वा = ज्ञात्वा (जान लेने पर), पठ्+क्त्वा = पठित्वा (पढ़ चुकने पर), पा+क्त्वा = पीत्वा (पीकर), आदि ।

उक्त परिचय के बाद मैं वापस अन्वेषण, अन्वेषणा, आदि शब्दों पर लौटता हूं । मैं जितना समझ पाया हूं, प्रत्येक धातु से संबंधित क्रिया के ‘होने का भाव’ व्यक्त करने के लिए उपयुक्त शब्द की रचना सदैव संभव है । इस कार्य हेतु ‘ल्युट्’ कृदन्त प्रत्यय उपलब्ध है, जिसके प्रयोग के दो-चार उदाहरण ये हैं:
अर्च् + ल्युट् = अर्चन
पठ् + ल्युट् = पठन
युज् + ल्युट् = योजन
लाञ्छ् + ल्युट् = लाञ्छन
विद् + ल्युट् = वेदन
स्पष्ट है कि ल्युट् के योग से धातु के अंत में ‘अन’ जुड़ जाता है (अर्च् + अन = अर्चन) । किंतु स्थिति सदैव इतनी सरल नहीं रहती है । यदि धातु में हलन्त व्यंजन से पूर्व ‘इ’, ‘उ’, या ‘ऋ’ हो तो उसका क्रमशः ए, ओ या अर् हो जाता है, जैसे कृ + ल्युट् = करण । ध्यान दें कि कुछ दशाओं में ‘न’ का ‘ण’ हो जाता है (मूर्धन्य घ्वनियों की मौजूदगी में) । ल्युट् के प्रयोग के नियम बहुत सरल नहीं हैं ।

उक्त प्रकार से प्राप्त संज्ञाशब्द मूलतः नपुंसक लिंग में प्रयुक्त होते हैं । उनके साथ स्त्रीप्रत्यय ‘टाप्’ जोड़ने से सिद्धांततः स्त्रीलिंग में शब्द मिलता है, जैसे अर्चन से अर्चन + टाप् = अर्चना । इस प्रकार अनेकों शब्द बन सकते हैं, किंतु सभी शब्द संस्कृत भाषा में व्यवहारिक तौर पर स्थान बना नहीं पाते हैं । फलतः अधिकांश शब्द नपुंसक लिंग में ही प्रयुक्त होते हैं, तो कुछ केवल स्त्रीलिंग में, और कुछ दोनों ही में । कभी-कभी पुंलिंग में भी प्रयोग देखने को मिल जाता है जिसकी वर्तनी नपुंसक वाली ही रहती है । उदाहरण हैं तापनम्, तापनः; तारणम्, तारणः; पूरणम्, पूरणः । और विरले अवसरों पर तीनों लिंगों में शब्द का प्रयोग देखने को मिल सकता है, यथा श्रवणः, श्रवणम्, श्रवणा ।

इतना और बता देना आवश्यक है कि उसी वर्तनी का शब्द अलग-अलग लिंगों में प्रयुक्त होता है तो बहुधा उनके अर्थ एक जैसे नहीं रह जाते हैं । ऐसा अक्सर होता है कि शब्द रुढ़ि अर्थ पा जाते हैं और उनके व्यापक अर्थ खो जाते है । तदनुसार पूरणम् के अर्थ पूरा करना, भरना, संपन्न करना आदि लिए जाते हैं, जब कि पूरणः पुल या बांध के अर्थ में न कि पूरणम् के अर्थ में । – योगेन्द्र

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7 Responses to “प्रवंचन एवं प्रवंचना जैसे शब्दयुग्म – संस्कृत में उपसर्गों एवं प्रत्ययों की भूमिका”


  1. वाह! इस उत्तम लेख के लिए साधुवाद। काफ़ी अच्छी जानकारी मिली इस लेख के माध्यम से।

  2. Dr. Madhusudan Jhaveri Says:

    योगेंद्रजी अच्छा हुआ कि कुछ भाग्यवशात्‌ इस पन्नेपर आ गया। और पढकर और हि आनंदित हूं। मै सोचता हूं, कि एक समूह बनाया जाए, जिन्हे उपसर्ग, प्रत्यय, समास और संधिके (स्यात और भी कुछ हो), संस्कृतकी शब्द रचना शास्त्र(?)-के विषयमे कुछ ज्ञान हो। जिसके आधारपर पारिभाषिक शब्दोंकी रचना की जाए। मैने मेरी जानकारी और सीमित क्षमतामे कुछ काम करनेका प्रयत्न किया है। आपका नाम कहीं और पढा हुआ है। समूहके विषयमे आपके विचार जानना चाहूंगा।
    मधु झवेरी
    University of Massachusetts

  3. hnbhat Says:

    उक्त प्रकार से प्राप्त संज्ञाशब्द मूलतः नपुंसक लिंग में प्रयुक्त होते हैं । उनके साथ स्त्रीप्रत्यय ‘टाप्’ जोड़ने से सिद्धांततः स्त्रीलिंग में शब्द मिलता है, जैसे अर्चन से अर्चन + टाप् = अर्चना । इस प्रकार अनेकों शब्द बन सकते हैं, किंतु सभी शब्द संस्कृत भाषा में व्यवहारिक तौर पर स्थान बना नहीं पाते हैं । फलतः अधिकांश शब्द नपुंसक लिंग में ही प्रयुक्त होते हैं, तो कुछ केवल स्त्रीलिंग में, और कुछ दोनों ही में । कभी-कभी पुंलिंग में भी प्रयोग देखने को मिल जाता है जिसकी वर्तनी नपुंसक वाली ही रहती है । उदाहरण हैं तापनम्, तापनः; तारणम्, तारणः; पूरणम्, पूरणः । और विरले अवसरों पर तीनों लिंगों में शब्द का प्रयोग देखने को मिल सकता है, यथा श्रवणः, श्रवणम्, श्रवणा ।

    साधुवाद।

    उपरि लिखित के बारें मे कुछ और बताना जरूर समझा।

    उक्त प्रकार से प्राप्त संज्ञाशब्द मूलतः नपुंसक लिंग में प्रयुक्त होते हैं । उनके साथ स्त्रीप्रत्यय ‘टाप्’ जोड़ने से सिद्धांततः स्त्रीलिंग में शब्द मिलता है, जैसे अर्चन से अर्चन + टाप् = अर्चना ।

    ल्युट प्रत्यय से स्त्रीप्रत्यय टाप नहीं बनेगा संस्कृत व्याकरण के अनुसार, मगर आप ही नीचे लिखें है वर्तनी शब्द ऐसा ही, अर्चन शब्द अर्च धातु से बना। अर्चना शब्द दो प्रकार से बनेगा। एक ल्युट प्रत्यय से नपुंसक लिंग में निष्पन्न है जिन से स्त्रीलिंग अर्चनी बनेगा। दूसरा तो इसी धातु से णिजन्त होने के कारण स्त्रीलिंग में ही युच प्रत्यय से बनेगा जिस से अर्चना ठीक बैठेगा प्रयोग।
    ऐसा ही कई धातुओं से पुल्लिंग मे ल्यु प्रत्यय जुड्ने से नन्दनः तापनः जैसे निष्पन्न होते हैं जिन से भी नन्दना तापना इत्यादि स्त्रीलिंग में प्रयोग हो सकता है। यह तो संस्क्रुत व्याकरणानुसार। भाषान्तर में तो दूसरी ही व्यवस्था प्रयोग वश बनेगी। कहने का मतलब सब ल्युट प्रत्यय से ही स्त्रीलिंग पुंल्लिंग रूप नही किं तु व्युत्पत्ति वैचित्र्य से बनें है ये शब्द।

    प्रकृति-प्रत्यय विचार को बहुत धन्यवाद।

  4. अतुल कुमार रस्तोगी Says:

    योगेंद्रजी का लेख सीमित कलेवर में गूढ़ जानकारी देने वाला है। साथ ही, मधु झवेरी ने एक समूह बनाने का प्रस्ताव किया है, जो श्लाघनीय है। देवनागरी और संस्कृत की वैज्ञानिकता पर अब कोई संदेह या बहस अनावश्यक है और उससे जुड़ी शक्ति के आधार पर पारिभाषिक शब्दों की रचना की दिशा में डॉ. रघुवीर का शब्दकोश मील का पत्थर है। तथापि, आज के वेगवान् प्रौद्योगिकी-परिवर्तनशील एवं बाज़ार-चालित समाज में शब्दों की लोकप्रियता उनकी अर्थवाहिता एवं शब्द-रचना क्षमता के साथ-साथ (या कहें उससे अधिक) उनकी आक्षरिक संरचना, संवादिता, गेयता और काव्यमयता (ध्वनि एवं उच्चारण के प्रयत्न-लाघव के अनुरूप स्वर एवं व्यंजन के विन्यास) पर भी निर्भर होगी। हिन्दी में शब्दों की रचना के लिए इसका ध्यान रखा जाना बेहतर होगा, क्योंकि आज इस भागदौड़ के युग में हर आदमी की यह आदत बनती जा रही है कि कम से कम समय में कम से कम शब्दों में अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करे। इस स्वाभाविक प्रवृत्ति के फलस्वरूप ही संस्थाओं तथा संगठनों के लम्बे-लम्बे नाम संक्षिप्त होते जा रहे हैं। नई प्रकार की यह शब्दावली अंग्रेज़ी में ‘एक्रोनिम’ से अभिहित की जाती है। प्रत्येक काल में ऐसे शब्द बनते रहे हैं। हमें भी इस प्रक्रिया में ‘हिन्दी के विकासोन्मुख स्वरूप’ पर विशेष ध्यान रखना चाहिए। वैसे वैज्ञानिक व तकनीकी क्षेत्र की नई संकल्पनाओं का अनुवाद न कर उसे यथावत् या हिन्दी की प्रकृति के अनुरूप ढालना ही उचित है।

  5. Chandra shekhar pandey Says:

    कृपया मार्गदर्शन करें कि दुर्गत शब्द स्त्रीलिंग है पुल्लिंग है या नपुंसकलिंग है।

    • योगेन्द्र जोशी Says:

      प्रत्युत्तर श्री पांडे की जिज्ञासा पर

      दुर्गत शब्द तो विशेषण है जैसा मैं जानता हूं और विशेषण के शब्दरूप विशेष्य संज्ञा के अनूसार होते हैं। हां, दुर्गति जरूर संज्ञा है और मेरी जानकारी में स्त्रीलिंग है।


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