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क्या है संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ का उच्चारण? कैसे लिखें इसे ‘रोमन’ में? – एक टिप्पणी

अगस्त 9, 2009

इधर कुछ दिनों पहले गूगल के ‘हिंदी समूह’ पर चर्चा चल पड़ी कि संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ को रोमन लिपि में सही-सही कैसे लिखा जाए । उसी से प्रेरित हो मैंने यह आलेख लिखा है ।

संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ को रोमन में लिखने की जब बात की जाती है तो दो प्रकार के उत्तर दिये जा सकते हैं । पहला यह कि विभिन्न भाषाभाषियों के बीच इसका जो भी उच्चारण प्रचलित हो उसी के अनुरूप उसे निरूपित किया जाये । आम तौर पर हिंदीभाषी इसे ‘ग्य’ बोलते हैं, जो अशुद्ध किंतु सर्वस्वीकृत है । तदनुसार इसे रोमन में gya लिखा जायेगा जैसा आम तौर पर देखने को मिलता है । दक्षिण भारत (jna) तथा महाराष्ट्र (dnya) में स्थिति कुछ भिन्न है ।

परंतु संस्कृत के अनुसार होना क्या चाहिए यदि इसका उत्तर दिया जाना हो तो किंचित् गंभीर विचारणा की आवश्यकता होगी । दुर्भाग्य से इसका सही उच्चारण संस्कृतज्ञों के मुख से भी मैंने सदैव नहीं सुना है । “यदि प्रचलन में जो आ चुका वही सही” का सिद्धांत मान लें तो फिर ‘ग्य’ ही ठीक है, अन्यथा नहीं ।

संस्कृत के बारे में मेरी धारणा है कि इसकी प्रचलित लिपि पूर्णतः ध्वन्यात्मक है । हर वर्ण अथवा उसके तुल्य चिह्न (यथा स्वर की मात्रा) तथा उससे संबद्ध ध्वनि के बीच असंदिग्ध एवं अनन्य संबंध रहता है । यदि कहीं अपवाद दिखता है तो वह वक्ता के त्रुटिपूर्ण उच्चारण के कारण होगा, न कि संस्कृत की किसी कमी या विशिष्टता के कारण । मेरी टिप्पणी इसी सिद्धांत पर आधारित है । (मेरी टिप्पणी वरदाचार्यरचित ‘लघुसिद्धांतकौमुदी’ और स्वतः अर्जित संस्कृत ज्ञान पर आधारित है । लघुसिद्धांतकौमुदी पाणिनीय व्याकरण पर संक्षिप्त तथा प्राथमिक स्तर की टीका-पुस्तक है । व्यक्तिगत स्तर पर मेरा प्रयास है कि संस्कृत की घ्वनियों को एक भौतिकीविद् यानी फिजिसिस्ट की दृष्टि से समझूं । प्रतिष्ठित संस्कृतज्ञ मेरी बात से असहमत हो सकते हैं इस बात का मुझे भान है ।)

मेरी जानकारी के अनुसार ‘ज्ञ’ केवल संस्कृत मूल के शब्दों/पदों में प्रयुक्त होता है । (यह बात स्वर वर्ण ‘ऋ’ एवं विसर्ग पर भी लागू होती है । स्वर ‘ऌ’ तो लुप्तप्राय है ।) मेरे अनुमान से ऐसे शब्द/पद शायद हैं ही नहीं, जिनमें ‘ञ’ स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त हो । यह वर्ण संयुक्ताक्षर के तौर पर जिनमें विद्यमान हो ऐसे पदों की संख्या भी मेरी जानकारी में बहुत कम है । उनमें भी अधिकतर वे पद हैं जिनमें प्रयुक्त संयुक्ताक्षर का आरंभिक वर्ण ‘ञ’ रहता है । उदाहरण: ‘अञ्चल’, ‘वाञ्छित’, ‘सञ्जय’, ‘झञ्झावात’ । हिंदी में अब ‘ञ’ के बदले अनुस्वार का प्रयोग होता है । तदनुसार हिंदी में पूर्वोक्त शब्द: ‘अंचल’, ‘वांछित’, ‘संजय’, ‘झंझावात’ लिखे जायेंगे । फलतः संस्कृत के नियमों के साथ संगति वाली वर्तनी देखने को नहीं मिलती है । (संस्कृत की स्थापित पद्धति के अनुसार इन पदों को अनुस्वार बिंदु के साथ लिखना अशुद्ध है!) मैं केवल ‘ज्ञ’ से परिचित हूं जिसमें ‘ञ’ संयुक्ताक्षर का द्वितीय व्यंजन (व्यञ्जन) है । पूर्वोक्त शब्दों के उच्चारण में हमारे मुख से च-छ-ज-झ के ठीक पहले अनुस्वार से व्यक्त अनुनासिक व्यंजन ‘ञ‌‍’ की ध्वनि निसृत होती है, जिसके प्रति हम कदाचित् सचेत नहीं रहते । अनुस्वार के प्रयोग के कारण हिंदी में ऐसे शब्द देखने को नहीं मिलते जिनमें ‘ञ’ स्पष्टतः लिखित हो । बहुतों को यह भी शायद मालूम न हो कि ‘ज्ञ’ वस्तुतः ‘ज’ एवं ‘ञ’ का संयुक्ताक्षर है । मुझे लगता है कि इन कारणों से ‘ज्ञ’ के उच्चारण के प्रति भ्रम व्याप्त है ।

ध्यान रहे कि संयुक्ताक्षर ज्ञ = ज्+ञ । ये दोनों संस्कृत व्यंजन वर्णमाला के ‘चवर्ग’ के क्रमशः तृतीय एवं पंचम वर्ण हैं । संस्कृत की खूबी यह है कि उसमें वर्णों का वर्ग-विभाजन उनके उच्चारण के ‘प्रयत्न’ (articulatory effort) के अनुरूप किया गया है । चवर्ग ‘स्पृष्ट – तालव्य’ कहलाता है, जिसका अर्थ यह है कि वर्ग के पांचों वर्णों के उच्चारण में मुख के भीतरी कोष्ठ की आकृति, मुख के भीतर जीभ की स्थिति, दांत-होंठ की भूमिका, आदि सब एक समान है और उनका मूल स्थान तालु है । उच्चारण में अंतर इन वर्णों के घोष/अघोष (voiced/voiceless), महाप्राण/अल्पप्राण (aspirated/inaspirated), एवं अनुनासिक/अननुनासिक- (nasal/non-nasal) होने के कारण है । वस्तुतः इन वर्णों के परस्पर भेद यूं लिखे जा सकते हैं (सभी तालव्य):
च – अघोष, अल्पप्राण (अननुनासिक )
छ –
अघोष, महाप्राण (अननुनासिक)
ज –
घोष, अल्पप्राण (अननुनासिक)
झ –
घोष, महाप्राण (अननुनासिक)
ञ –
घोष, अल्पप्राण, अनुनासिक
इस जानकारी के आधार पर यह समझना कठिन नहीं है कि ‘ञ’ के लिए हमें वही प्रयास करना पड़ता है जो ‘ज’ के उच्चारण में, अंतर केवल यह रहता है ‘ञ’ के मामले में स्वरतंतुओं (vocal chords) के साथ नासा गुहा (nasal cavity) में भी ध्वनिकंपन (अनुनादित?) होने लगते हैं । (वस्तुतः ऐसा सभी वर्गों के पंचम वर्ण तथा अनुस्वार के साथ होता है ।)

अनुनासिक अन्य वर्णों (ङ, ण, न तथा म) की भांति ‘ञ’ की अपनी विशिष्ट नासिक्य ध्वनि है, जो हिंदीभाषियों के ‘ग्य’ में है ही नहीं । यदि ‘ग्य’ के वदले ‘ग्यॅं’ (ग्य के ऊपर चंद्रबिंदु) प्रयुक्त होता तो भी कुछ बात होती । रोमन लिपि में विशेषक चिह्न (diacritical mark) के साथ ‘ञ्’ का निरूपण ñ और फोनेटिक निरूपण ɲ स्वीकारा गया है । (ङ्, ञ्, ण्, न्, म् = क्रमशः ṅ, ñ, ṇ, n, m विशेषकचिह्नित, एवं ŋ, ɲ, ɳ, n, m फोनेटिक ।)

उक्त जानकारी के अनुसार ज्ञ = ज्+ञ को विशेषक चिह्न के साथ रोमन में jña, एवं फोनेटिक लिपि में jɲa लिखा जाना चाहिए । संस्कृत की विशिष्टता ही यही है कि वर्तनी में जो वर्ण हों उच्चारण में वही विद्यमान रहें और उच्चारण में जो हो वही वर्तनी में दिखे । (वर्णों का उच्चारण सामान्यतः नहीं बदल सकता, किंतु यदि बदले तो फिर वर्तनी में भी संबंधित परिवर्तन दिखे । संधि के नियम परिवर्तन की अनुमति अथवा आदेश देते हैं । उदाहरणः जगत्+शरण्यम् = जगच्छरण्यम्, तद्+लीनः = तल्लीनः, यशस्+वर्धनः = यशोवर्धनः ।)

जानकारी होने के बावजूद मेरे मुख से ‘ज्ञ’ का सही उच्चारण नहीं निकल पाता है । पिछले पांच दशकों से ‘ग्य’ का जो उच्चारण जबान से चिपक चुका है उससे छुटकारा अभी भी नहीं मिल पा रहा है । वास्तव में गलत उच्चारण के आदी हो जाने के बाद सुधार करना सरल नहीं होता । और कोई सही उच्चारण बताने वाला ही न हो तो ?

प्रस्तुत विवेचना में स्पृष्ट, तालव्य, घोष/अघोष, महाप्राण/अल्पप्राण, अनुनासिक आदि तकनीकी शब्दों का प्रयोग किया गया है । संस्कृत भाषा में स्वर-व्यंजन वर्णों से संबद्ध ध्वनियों का बहुत बारीकी तथा वैज्ञानिक दृष्टि से वर्गीकरण किया गया है । इस वर्गीकरण की किंचित् विस्तार से चर्चा की जाए, तो संस्कृत की ध्वन्यात्मक विशिष्टता की प्रतीति हो सकती है । आगामी किसी पोस्ट में इस विषय की चर्चा करने का मेरा प्रयास रहेगा । – योगेन्द्र जोशी

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12 Responses to “क्या है संयुक्ताक्षर ‘ज्ञ’ का उच्चारण? कैसे लिखें इसे ‘रोमन’ में? – एक टिप्पणी”


  1. उफ़..बहुत ही ज्ञानवर्धक आलेख….शत-प्रतिशत सहमत…

    अब भाषा और लिपी-व्याकरण के साथ होता यह है कि उच्चारण पहले होता है, और लिपी बाद में आती है..जब लिखना शुरू होता है, तो व्याकरण तय की जाती है….यानि भाषाई शुद्धता बनाए रखने के लिए…

    पर इसका क्या करें कि भाषा बहता नीर है, नई जरूरतों के कारण नये-नये शब्द आते रहते हैं, दूसरी भाषाओं से सम्मिलन होता रहता है..
    उच्चारणों में भी कई कारणों से परिवर्तन होते हैं….

    अब सैद्धांतिक रूप से कितना भी तय कर लिया जाए, लोक तो अपनी बोल-चाल को ही अभ्यासवस महत्ता देगा…
    अब भाषा, लिपी को उसके अनुरूप होना हो तो होले…

  2. sharad kokas Says:

    सही उच्चारण तो यही है जो आपने बताया है लेकिन आदत वही है ,अत: एक व्यक्ति दो तरह से पुकारा जाता है ज्ञान जी जब जबलपुर मे रहते है तो gyaanranjan कहलाते है और बेटे के पास नागपुर जाते ही dnyaanranjan हो जाते है

  3. kalptaru Says:

    बहुत ही बढिया आलेख। वैसे कभी आपने बाबा रामदेव को सुना हो तो उनका उच्चारण भी बिल्कुल सटीक है – विज्ञान का – विज्यान आपका क्या कहना है।

    प्रत्युत्तर में टिप्पणी –
    मैंने बाबा रामदेव को कम ही सुना है, शायद गौर से नहीं । वे ‘ज्ञान’ का उच्चारण वस्तुतः क्या करते हैं मैंने ध्यान नहीं दिया है । मैं समझता हूं कि वे ‘ज्ञान’ कहते होंगे जो ‘ज्यान’ से बहुत मेल खाता है । इसे अभी मैं स्पष्ट नहीं कर सकता । भविष्य की पोस्टों का यह विषय रहेगा । इतना कहना काफी होगा कि ‘ज्ञान’ में अनुनासिक (नाक से निसृत ध्वनि) ‘न’ की मौजूदगी से ‘ज्ञान’ तथा ‘ज्यान’ के मध्य अंतर आसानी से अनुभव नहीं होता है । फर्क तब नजर आयेगा जब ‘अभिज्ञ’, ‘ज्ञाता’, ‘ज्ञापक’ जैसे शब्द बोले जा रहे हों जिनमें ‘ञा’ की नाक वाली ध्वनि है जो ‘अभिज्य’ आदि में नहीं है । वास्तव में ‘अभिज्ञ’ ‘अभिज्यॅं’ (चंद्रबिंदु देखें!) जैसा ही सुनाई देता है । वक्ता ठीक-ठीक जो बोल रहा हो उसकी बारीकी श्रोता को बहुधा पता नहीं चल पाती । – योगेन्द्र जोशी

  4. drsbg Says:

    वास्तव में देखा जाये तो यह “ग्य” अक्षर रिग्वेदिक सन्स्क्रत में प्रयोग नहीं हुआ है, रिग्वेद में ग्यान के लिये सदा धी,विद, जजान( ब्रह्म -जजान…),जनुषा,जनास,सुजान प्र्योग होता है, ग्यानी के लिये–धीरास,विप्राः, जातवेदा,जाग्रवांस आदि ,आजकल-जानी-मानी । यग्य के लिये-यज्न,यजन,हवामहे,यजाम्य्हं। आज्कल संस्क्रत में भी जानामि,जानाम्य,जानाभ्य प्रयोग होता है। यह ’ग्य’अक्षर यग्य के लिये ही प्रयोग में लया गया है अथर्व वेद में–यग्यो भुवनस्य नाभि-। क्योंकि यह ’ग्यं’ नहीं है बल्कि ’ग्य’ ही है अतः ज+च वर्ग वाला य़ं -नही। यह ज+य,के बाद सुधार करके ग+ य=ग्य किया गया होगा;( गय=प्राण,प्रत्येक क्रिया का प्राण,ग्यान। )

  5. पृथ्वी सिहँ Says:

    बहुत ज्यानवर्ध्दक लेख है 1


  6. बहुत उपयोगी और ज्ञानवर्धक … आभार


  7. हमारी गुजरातीमें ज्ञ का उच्चारण ग्न्य की तरह होता है ।

  8. मनीष कुमार जैन Says:

    बहुत ही ज्ञानवर्धक जानकारी आपने दी है।मैं भी हिन्दी भाषा का प्रेमी हूँ।इन शब्दो को लेकर मै भी काफी असमंजस मैं था कि सही उच्चारण क्या है।इस तरह के और भी लेख लिखे, मेरी तरफ से आप को सफल जीवन की शुभ कामनाएं।

  9. Drshn Says:

    Achha article hain woi mein sochu ye ञ letter use kiya kyon ni jata ty for info


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