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दक्षिण भारत यात्रा और हिंदी: छठा भाग, तिरुमल (तिरुपति) के कुछ अनुभव

मई 14, 2009

Tirumala Tirupati Devasthanam

श्री बेंकटेश्वर बालाजी के दर्शनार्थ मैं तिरुमल पहली बार नौ-दस वर्ष पहले गया था (देखें ब्लॉग ‘पेज’ प्रविष्टि बालाजी मंदिर, तिरुमल) । तब वहां ब्रह्मोत्सवम् की धूमधाम थी ।  यह उत्सव शारदीय नवरात्र (आश्विन मास – सामान्यतः अक्टूबर-नवंबर – के शुक्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तिथि तक का नौदिवसीय कालखंड) में आयोजित होता है । इस मौके पर यहां पर बेतहासा भीड़ रहती है और बालाजी के दर्शन दुर्लभ हो जाते हैं यदि आपने पूरी व्यवस्था अग्रिम तौर सुनिश्चित न कर रखी हो । मुझे ऐसा कुछ मालूम नहीं था । मेरी पत्नी तथा मैं अपराह्न में वहां पहुंचे थे । अगला पूरा दिन तिरुमल के नाम हमने रखा था और तीसरे दिन अपराह्न में हमारी वापसी यात्रा का आरक्षण था । वहां पहुंचने पर पता चला कि अगले पांच-छः दिन तक दर्शन-टिकट आरक्षित हो चुके थे । हमारी चिंता वहां ठहरने और दर्शन की व्यवस्था थी । हमारी तरह और भी कई लोग देश के विभिन्न कोनों से वहां पहुंचे थे । कोई बंगाल से, कोई महाराष्ट्र से और कोई सुदूर उत्तर भारत से । सर्वत्र अफरातफरी फैली थी और दुर्भाग्य से समुचित जानकारी कहीं ठीक-से मिल नहीं पा रही थी । पूरे परिसर में भीड़ थी, कोई कहीं बैठा है तो कहीं कोई लेटा है । सामान रखने के लिए लॉकर तथा रात्रिनिवास हेतु कमरों के लिए देवस्थानम् में लंबी-लंबी पंक्तियां लगी हुई थीं, और पता नहीं चल पा रहा था कि स्थिति वस्तुतः क्या है । ऐसे में सभी दर्शनार्थी परस्पर एक-दूसरे से जानकारी लेते और उसे बांट रहे थे । ब्रह्मोत्सवम् पर प्रज्वलित विद्युत्‌-बल्बों से निर्मित देवता की रेखाकृतियांब्रह्मोत्सवम् पर प्रज्वलित विद्युत्‌-बल्बों से निर्मित देवता की रेखाकृतियां

उस अवसर पर मैंने ध्यान दिया कि वहां पहुंचे तीर्थयात्रियों में अधिकांश ऐसे थे जो अंग्रेजी के आदी नहीं थे, या कहा जा सकता है कि उसके प्रयोग में सहजता नहीं अनुभव करते थे । यद्यपि वे सभी हिंदीभाषी रहे हों ऐसा नहीं, फिर भी परस्पर वार्तालाप में हिंदी का ही प्रयोग प्रमुखतया कर रहे थे । वे मूलतः अहिंदीभाषी थे और हिंदी में प्रवीण नहीं थे यह तथ्य उनके बोलने के लहजे और भाषाई अशुद्धता से साफ पता चल रहा था । तथापि सभी का हिंदी से बखूबी काम चल रहा था । ऐसी बात थी यात्रिकों के साथ, किंतु देवस्थानम् के कार्यालयों में अंग्रेजी ही मददगार सिद्ध हो रही थी यह कहना पड़ेगा । छपी हुई जानकारी तेलुगू तथा हिंदी में मिल रही थी, पर अंग्रेजी ही प्रचलन में मुख्यतः देखी जा सकती थी । परिसर में यत्रतत्र लगे सूचनापट्ट एवं मार्गदर्शक संकेत अंग्रेजी तथा तेलुगू में थे न कि हिंदी में भी । ऐसी बात देश में प्रायः सभी जगह है ।

उस समय हमारी चिंता किसी प्रकार देवदर्शन पाने की थी । रात्रि 11 बजे तक तो हमारी दौड़भाग चलती रही कि किसी प्रकार हजार-हजार रुपये मूल्य के विशेष सेवा के नाम पर ही टिकट मिल जायें तो ले लें । आखिर वाराणसी से पहुंचे हों और बिना दर्शन के लौटें यह विचार खिन्न करने वाला था । जब अंततः सभी कार्यालय बंद हो गये और अन्य यात्रिकों के मुख से जब सुना कि अगली प्रातः 5-6 बजे से टिकट मिलेंगे, जिसके लिए 4 बजे से ही लाइन लग जायेगी, तो हम रात्रि विश्राम के लिए एक अतिसामान्य लॉज में टिकने चले गये, जहां आम किराये की तुलना में 3-4 गुना देना पड़ा । लेकिन दूसरे दिन निराशा ही हाथ लगी । लोगों की सलाह पर दोपहर लगभग 12 बजे ‘मुफ्त’ दर्शन की करीब एक किमी लंबी पंक्ति में हम भी लग लिये । उठते-बैठते कछुवे की चाल से अंततः सायं 5-6 बजे हम उस हाल में दाखिल हो ही गये, जहां सभी दर्शनार्थियों को प्रतीक्षा करनी होती है ।

उसके बाद जितना कुछ निराशाप्रद घटित हुआ वह हम शायद ही कभी भूलें । उस सब का विस्तार से वर्णन करना मेरा इरादा नहीं । मेरा मकसद तो हिंदी को लेकर हुए अनुभवों का जिक्र करना है और जितना कुछ ऊपर कहा है वह समुचित पृष्ठभूमि का एहसास दिलाने के लिए आवश्यक समझकर कहा गया है । उस समय की अफरातफरी में हमने किससे क्या बातें कही होंगी कहना मुमकिन नहीं । किंतु मुझे बेंगलुरु से अपने बच्चे और पति के साथ पहुंची एक शिक्षित विवाहिता का ध्यान अवश्य आता है जो स्वयं हमारी तरह परेशान थी । मेरी पत्नी की उसके साथ संपन्न कुछ मिनटों की बातें अंग्रेजी-हिंदी की मिश्रित भाषा में हुई थीं । उसी रात जब हम सशुल्क दर्शन के टिकट की कोशिश में थे, एक बंगाली युवक के साथ संपन्न वार्तालाप की भी कुछ याद मुझे है । हमारी तरह वह युवक भी एक-दो दिन के कार्यक्रम पर अपने परिवार के साथ वहां पहुंचा था । वह भी यह जानकर हैरान-परेशान था कि भगवद्दर्शन पाना इतना आसान नहीं था । उसकी चिंता यह थी कि बिना दर्शन के लौटना अनिष्टकारी सिद्ध होगा । मैंने उसे अपनी ओर से समझाया कि वह स्वयं को दोषी नहीं समझे । परिस्थितियां ही ऐसी थीं और ब्रह्मोत्सवम् के समय दर्शन की कठिनाई का भान बहुतों कीे भांति उसे भी नहीं था । ऐसे में वह आराध्य देव का स्मरण करते हुए दुबारा आने का संकल्प लं । वस्तुतः तिरुपति की उस प्रथम यात्रा में हमने स्वयं भी ऐसा ही किया था; बिना दर्शन के गृहनगर लौट आये थे । बाद में हम दो बार बालाजी दर्शनार्थ जा चुके हैं, अधिक सुनियोजित तरीके से । हां तो उन बंगाली बंधु से हमारी बातें हिंदी में ही हुयीं, उनके विशिष्ट बंगाली लहजे के साथ । बाद में उन्होंने मुफ्त दर्शन किये या बैंरंग ही लौट आये यह मैं बता नहीं सकता ।

मैं कह चुका हूं कि दूसरे दिन हम निःशुल्क दर्शन की लाइन में लग लिये । सायंकाल प्रतीक्षा-हॉल में पहुंचने के बाद का अनुभव दिलचस्प रहा । ऐसे आठ-नौ हॉलों के दो अलग-अलग संकुल हैं परिसर में । दर्शनार्थियों को इन हॉलों में प्रतीक्षा करने हेतु ठहरा दिया जाता है । सीढ़ीनुमा फर्श वाले उन हॉलों में कोई बैठकर तो कोई लेटकर दर्शन हेतु अपनी बारी का इंतजार करता है । बाद में बारी-बारी से एक-एक हॉल के लोगों को दर्शन हेतु नये सिरे से पंक्तिबद्ध होना पड़ता है । पूरी प्रक्रिया लंबा समय लेती है और उबाऊ रहती है । वहां देवस्थानम् की ओर से चावल आदि खाने को बांटा जाता है और शौचादि के लिए हॉल से संबद्ध शौचागारों की व्यवस्था रहती है ।

प्रतीक्षा में समय बीतता जा रहा था । हमारे हॉल के एक दीवाल पर लगे टीवी पर्दे पर दर्शन का संभावित समय 11 बजे दिखायी दे रहा था । हम खुश थे कि अब नंबर आने ही वाला है । लेकिन जब वह समय बीत गया और उसके बाद भी 11 बजे के समय का प्रदर्शन पर्दे पर यथावत् होता रहा तो हम कुछ अधीर हो उठे । एक स्वयंसेवक से हमने दर्शन के समय के बारे निश्चित जानकारी लेनी चाही । पता चला कि दर्शन अगली रात्रि 11 बजे संभव होंगे । कोई 24 घंटे बाद ? हम तुरंत चौकन्ने हुए । दूसरे दिन अपराह्न के लिए तो हमारा वापसी रेलयात्रा का आरक्षण था, जिसे निरस्त करने का विचार हमें स्वीकार्य नहीं था । हमने उस स्वयंसेवक से हॉल से बाहर निकलने का रास्ता जानना चाहा । बाहर निकलना आसान नहीं था, क्योंकि सभी निकासद्वारों पर बाहर से ताले लगे थे, जो सामान्यतः दर्शन-काल आने पर ही खोले जाने थे । स्वयंसेवक को हमने अपनी परेशानी विस्तार से समझानी चाही । संयोग से छात्र-सा लगने वाला वह व्यक्ति न तो अंग्रेजी में और न ही हिंदी में समुचित तरीके से वार्तालाप करने में समर्थ था । हमें आश्वासन देते हुए वह एक अन्य स्वयंसेवक को पकड़ लाया जो हिंदी बोल सकता था । हमारी समस्या समझ चुकने पर उसने हॉल के एक द्वार पर जाकर बाहर संदेश भिजवाया । हम इंतजार करने लगे । कुछ मिनटों के बाद किसी ने ताला खोला, हमें बाहर निकाला, और दुबारा ताला यथावत् जड़ दिया । हमने उन स्वयंसेवकों तथा ईश्वर को धन्यवाद दिया और अपने ठहरने के कमरे में लौटे आये । दूसरे दिन निर्धारित योजनानुसार गृहनगर लौट आये ।

हिंदी के संदर्भ में जो बात मेरे अनुभव में आई वह है कि तिरुमल पहुंचने वाले लोगों में अधिकांश वे रहते हैं जिन्हें अंग्रेजी का ज्ञान अपर्याप्त अथवा नहीं होता है । ये प्रायः वे होते हैं जो कम संपन्न तथा कम शिक्षित होते हैं और क्षेत्रीय भाषाओं, मुख्यतः तेलुगू एवं तमिल, पर निर्भर करते हैं । दूसरे वे होते हैं जो दूर-दराज, मुख्यतः हिंदीभाषी क्षेत्रों, से आते हैं और अंग्रेजी न जानने या कम जानने के कारण हिंदी में वार्तालाप को वरीयता देते हैं, भले ही वह हिंदी त्रुटिपूर्ण हो । यही कारण है कि मैंने उस देवस्थान में अंग्रेजी की तुलना में हिंदी अधिक उपयोगी पायी । चायपान तथा जलपान की दुकानों पर कामचलाऊ हिंदी वहां के कर्मियों के साथ संपर्क में मदद करती है । – योगेन्द्र

Sreenivas Complex TTD

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