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दक्षिण भारत यात्रा और हिंदीः चतुर्थ भाग, केरल और हिंदी

अप्रैल 14, 2009

मेरी अभी तक की दक्षिण भारत यात्राएं मुख्यतया तमिलनाडु के नगरों/पर्यटक स्थलों से संबंधित रही हैं । मैं त्रिवेंद्रम, मैसूर, बेंगलुरु, और तिरुपति भी हो आया हूं, किंतु केवल एक या दो बार । लेकिन चेन्नै जाना प्रायः हर बार हुआ है । सन् १९७३ की पहली से अभी हाल में संपन्न यात्रा तक हिंदी को लेकर मैंने वहां क्या अनुभव किया और क्या परिवर्तन देखे इसकी चर्चा मैंने पिछले चिट्ठों में की है । पहली यात्रा के समय एक केरलवासी के साथ चेन्नै (तब मद्रास) में हुयी बातचीत का जिक्र भी ९ फरवरी (२००९) की पिछ्ली पोस्ट में शामिल है ।

कोई चार-एक साल पहले वाराणसी से रेलयान द्वारा तिरुपति जाते समय भी मुझे केरल के दो जनों से वार्तालाप का अवसर मिला था । वे दोनों कोचीन विश्वविद्यालय (जैसा मुझे याद है) में बतौर अध्यापक कार्यरत थे और हिंदी विषय पर इलाहाबाद विश्वविद्यालय में आयोजित एक सम्मेलन में भाग लेकर लौट रहे थे । रेलगाड़ी में बैठे-बैठे बिताये उस दो-दिनी यात्रा में मेरी उनके साथ विभिन्न विषयों पर अच्छी-खासी बातचीत हुई थी जिसका पूरा विवरण मस्तिष्क-पटल पर अब नहीं रह गया है । फिर भी वार्तालाप के कुछ अंश याद हैं ।

उन विद्वज्जनों ने मुझे बताया कि केरल में हिंदी काफी लोकप्रिय है । उनका कहना था कि वहां माध्यमिक स्तर पर त्रिभाषा सूत्र के अनुसार पढ़ाई चल रही है, अतः हिंदी का कामचलाऊ ज्ञान अधिकांश छात्रों को हो जाता है । उन्होंने बताया कि उनके विश्वविद्यालय में एम.ए. के पाठ्यक्रम में केवल २० सीटें उपलब्ध हैं, किंतु उसमें प्रवेश के लिए प्रायः २०० प्रार्थनापत्र आ जाते हैं । पाठ्यक्रम की मांग अच्छी है और उनका विश्वविद्यालय अधिकांश छात्रों की मांग पूरी नहीं कर सकता है । वहां कुछ कालेजों में बी.ए. (हिंदी स्नातक) तक पढ़ाई संभव है, लेकिन स्नातकोत्तर की पढ़ाई केवल कुछ ही संस्थाओं में हो सकती है । उनके अनुसार कुछ छात्रों का हिंदी के प्रति रुचि का कारण नौकरी-पेशे में लाभ की संभावना रहा है । आजकल अनुवादकों की मांग भी देखने को मिल रही है । मलयालम और अंगरेजी के साथ हिंदी की जानकारी उपयोगी सिद्ध होती है ।

मेरा यह अनुमान है कि हिंदी सीखना तमिलभाषियों की तुलना में मलयालमभाषियों के लिए अपेक्षया अधिक सरल है । इसका कारण मेरी दृष्टि में यह है कि मलयालम में संस्कृत मूल के शब्दों की संख्या काफी है, कदाचित् हिंदी से भी अधिक । मेरी जानकारी के अनुसार दक्षिण की तीन भाषाओं, कन्नड़ (Kannad), तेलुगू (Telugu) तथा मलयालम (Malayalam), में संस्कृत मूल के शब्दों की संख्या अच्छी-खासी है । रोजमर्रा की सामान्य बोलचाल में प्रयुक्त इन भाषाओं के शब्द अवश्य ही सर्वथा भिन्न हैं, किंतु किसी विषय की गंभीर तथा विद्वत्तापूर्ण चर्चा या समीक्षा के लिए आवश्यक उन्नत दर्जे की अभिव्यक्ति में प्रयुक्त शब्द-संपदा काफी हद तक संस्कृत पर आधारित है । भाषाविद् इन तीनों तथा तमिल (Tamil) को सम्मिलित तौर पर द्रविड़ (Dravidian) भाषा कहते है और उनकी राय में ये संस्कृत से कमोबेश असंबद्ध हैं । उनके मत में संस्कृत का यूरोपीय भाषाओं (Indo-European) से कहीं अधिक निकटता का संबंध है । अवश्य ही उनका मत सुविचारित एवं गंभीर तर्कों पर आधारित होगा, किंतु मैं उनके मत हो स्वीकारने में हिचकिचाता हूं । मैंने जब इन दक्षिण भारतीय भाषाओं की लिपियों पर नजर दौड़ायी और देवनागरी से उनकी तुलना की तो मुझे आशा से कहीं अधिक समानता देखने को मिली । इस तुलना को मैंने ‘वर्णमाला’ (Alphabet, यहां क्लिक करें) नाम के ‘पेज’ में प्रस्तुत किया है । यद्यपि मैं इन भाषाओं के व्याकरण से अभी परिचित नहीं हो सका हूं, तथापि मुझे उम्मींद है कि उस दृष्टि से भी कुछ हद तक साम्य होगा, कदाचित् यूरोपीय भाषाओं से अधिक । कहने का तात्पर्य यह है कि लिप्यात्मक समानता भाषाएं सीखने में मदद करती है, और इसलिए कन्नड़, तेलुगू तथा मलयालम जानने वालों के लिए हिंदी सीखना अधिक कठिन नहीं होना चाहिए ।

रॉक मेमॉरिअल से कन्याकुमारी का पैनॉरॅमिक दृश्य रॉक मेमॉरिअल से कन्याकुमारी का पैनॉरॅमिक दृश्य

अस्तु, मेरा अनुमान है कि केरलवासी हिंदी में अपेक्षया अधिक रुचि रखते हैं, कारण भले ही कुछ भी हों । कन्याकुमारी की पिछली यात्रा के समय मैं आसपास के पर्यटक स्थलों को भी देखने गया था, जिनमें ‘रामनाथपुरम्’ का रामलिंगविलास राजमहल भी एक था । यह भवन कभी ट्रावनकोर के राजा का महल हुआ करता था और अब एक धरोहर-संग्रहालय है । इसे काष्ठ महल (Wooden Palace) के नाम से भी जाना जाता है । यह स्थान है तो तमिलनाडु राज्य में, परंतु महल तथा उसके परिसर पर केरल सरकार का प्रशासनिक नियंत्रण है । संग्रहालय के विभिन्न पहलुओं तथा वहां संगृहीत वस्तुओं के बारे में संक्षिप्त जानकारी आपको प्रायः मलयालम, हिंदी तथा अंग्रेजी, तीनों, भाषाओं में मिल जायेगी । मैंने पिछली पोस्ट में कहा था कि चेन्नै में अबस्थित केंद्र सरकार के संग्रहालय में लिखित हिंदी बमुश्किल देखने को मिलती है । केरल तथा तमिलनाडु में हिंदी के प्रति व्याप्त रवैये में अंतर देखने को मिलता है ।

रामलिंगविलास राजमहल, रामनाथपुरम, तमिलनाडुरामलिंगविलास राजमहल, रामनाथपुरम, तमिलनाडु

संदर्भगत क्षेत्र की यात्रा के समय मिले हिंदी से जुड़े हुए अनुभवों की शेष बातें अगली (अंतिम) पोस्ट में प्रस्तुत की जायेंगी । – योगेन्द्र

‘वुडन रूफ़ कार्विङ्‌’, रामलिंगविलास, रामनाथपुरम्‘वुडन रूफ़ कार्विङ्‌’, रामलिंगविलास, रामनाथपुरम्

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2 Responses to “दक्षिण भारत यात्रा और हिंदीः चतुर्थ भाग, केरल और हिंदी”


  1. अगर आम जनता के स्तर पर बात करें तो हिन्दी को लेकर पूरे भारत में कहीं कोई विरोध नहीं है. विरोध अगर है तो केवल राजनीतिक कारणों से. आम भारतीय, चाहे कहीं का भी हो, उसे किसी भाषा से कोई कष्ट नहीं है. ये अलग बात है कि जिस एकमात्र भाषा से उसे कष्ट है, वही अंग्रेजी उसके सिर बार-बार जबरिया लादी जा रही है.


  2. काफी रोचक. भारतीय लिपियों की तुलना देवनागरी से करने की अपेक्षा ब्राह्मी से करते तो अधिक समानताएं दिखेंगी. देवनागरी का अस्तित्व तो बाद में आया है.संभवतः तमिल, तेलुगु आदि पूर्व के हैं.


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