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दक्षिण भारत यात्रा और हिंदीः तृतीय भाग, बदलाव के संकेत

मार्च 31, 2009

पिछली पोस्ट (मार्च १, २००९) के आगे । मैं इस बात का जिक्र कर चुका हूं कि मेरी पहली दक्षिण-भारत यात्रा (१९७३) के दौरान हिंदी को लेकर हुआ अनुभव निराशाप्रद रहा उसके बाद मैं दूसरी बार १९८० में भी वहां गया था । तब स्थिति कुछ अनुकूल लगी थी । उसके बाद के लंबे अंतराल में पांच-छः बार उस क्षेत्र में जा चुका हूं । चार-पांच साल पहले की और फिर विगत फरवरी की यात्राएं कुछ हद तक आशाप्रद रहीं मैं ऐसा कह सकता हूं ।

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एक बात मैं आंरभ में ही स्पष्ट कर दूं कि हिंदी देश की राजभाषा घोषित होने के बावजूद दस्तावेजी भाषा नहीं बन सकी है । अवश्य ही इसका देश के कोने-कोने तक कुछ हद तक फैलाव हो रहा है, और यह भी कहा जा सकता है कि अधिकाधिक लोग इसे समझने लगे हैं और थोड़ा-बहुत, टूटी-फूटी ही सही, इसे बोलने भी लगे हैं । लेकिन लिखित रूप में इसे कम ही लोग इस्तेमाल में ले रहे हैं । और तो और खुद हिंदीभाषी भी लिखित हिंदी में नाममात्र की रुचि रखते हैं । इस माने में उनकी प्राथमिकता अंग्रेजी ही रहती आ रही है । अतः जब में हिंदी की किंचित् आशाप्रद स्थिति की बात करता हूं तो इसका मतलब मात्र यह है कि अब नये क्षेत्रों में भी बोलने-चालने के स्तर पर इसकी मौजूदगी देखी जा सकती है । दक्षिण भारत के कुछ शहरी इलाकों में हिंदी बोलकर आप कुछ हद तक काम चला सकते हैं । लेकिन लिखित तौर पर इसे आप शायद ही कहीं देखें । आपको हिंदी पत्र-पत्रिकाएं खोजने पर बमुश्किल ही मिलेंगे । केंद्र सरकार के उपक्रमों के नामपट्टों को छोड़ इक्के-दुक्के स्थलों पर लिखित हिंदी दिखेगी ।

लेकिन आपको अब वहां कामचलाऊ हिंदी बोलने-समझने वाले लोग अपने आसपास मिल जायेंगे, तमिलनाडु में कम तथा अन्यत्र ज्यादा । मैंने अपनी हालिया यात्रा में पाया कि चाहे चेन्नै हो या रामेश्वरम्, कन्याकुमारी या मदुरै (जहां-जहां मैं गया हूं), ऑटोरिक्शा वाले आपसे गंतव्य, किराया-भाड़ा आदि की बात हिंदी में करने को तैयार मिल जायेंगे । अंग्रेजी के बदले हिंदी उनकी पसंदगी रहती है ऐसा मेरा अनुमान है । चाय की दुकान पर आप हिंदी से काम चला सकते हैं । हो सकता है कि वह ‘चीनी’ न समझ पावे, लेकिन शक्कर अथवा शुगर कहकर काम चलेगा ही । होटलों में टिकना हो तो वहां आम तौर पर कोई न कोई कर्मचारी मिल ही जायेगा जो आपकी समस्या सुन सके और सुलझा सके । इस अर्थ में भोजनालयों में भी स्थिति संतोषप्रद मिलेगी । चेन्नै के टी.नगर (त्यागराय नगर) नाम के बाजार में अधिकांश दुकानों पर आप हिंदी के माध्यम से खरीदारी कर सकते हैं । मेरा खयाल है कि वहां कई इस्लाम-पंथियों की दुकानें हैं जो हिंदुस्तानी बोल लेते हैं । चेन्नै के रेलवे स्टेशनों पर नियुक्त कर्मचारी समुदाय में भी हिंदी के प्रति परहेज मुझे देखने को नहीं मिला । उनके चेहरे पर अवहेलना या नाखुशी का वह भाव मुझे अब कहीं नहीं दिखा जो १९७३ में मैंने अनुभव किया था । इन सभी मामलों में मैंने पाया कि रामेश्वरम् तथा कन्याकुमारी में स्थिति कहीं अधिक सुविधाजनक थी । कदाचित् इसका कारण यह होगा कि वे लगभग पूरी तरह पर्यटन स्थल हैं, जहां देश के विभिन्न कोनों से गैरतमिलभाषी लोगों का आना-जाना लगा रहता है, जिनके साथ भाषाई संपर्क हेतु कारगर माध्यम हिंदी ही सिद्ध होती है ।

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मेरे अनुभव में आये सर्वाधिक महत्त्व का तथ्य यह रहा कि चेन्नै के आधे दिन के बस द्वारा नगर-भ्रमण और उसके निकटवर्ती दर्शनीय स्थलों के पूरे दिन के भ्रमण में टूर-गाइडों ने हिंदी का ही प्रयोग किया न कि अंग्रेजी का । मैं समझता हूं कि दोनों ही मौकों पर वे ‘पब्लिक स्कूल’ में पढ़े युवाओं की तरह न तो धाराप्रवाह अंग्रेजी बोल सकता थे और न ही ऐसा करना उन्हें यात्रिकों के सुविधा के अनुरूप लगा होगा । एक बात दिलचस्प अवश्य रही । चेन्नै से कुछ दूर ‘डॉल्फिन’ पार्क नाम का एक पर्यटक स्थल है । वहां के अंतरंग जलकुंड (इंडोर वॉटरपूल) में कभी जलक्रीड़ा आदि के भांति-भांति के करतब दिखाने वाली दो डॉल्फिन मछलियां (वस्तुतः स्तनपायी जलजंतु) हुआ करती थीं, लेकिन कुछ सालों पहले ही वे चल बसीं । बाद में उनके स्थान पर दो ‘सील (सीलायन)’ जंतुओं (स्तनपायी) को रखा गया था । उनके करतब मैंने पहले कभी देखे थे । हाल की यात्रा में केवल एक ही वहां बचा रह गया था । खैर, मुद्दा उनके होने न होने का नहीं है । वहां पर मौजूदा सील के करतब दिखाने वाले सरकारी कर्मचारी ने दर्शनार्थियों के समक्ष अंग्रेजी में ही परिचय तथा अन्य बातें रखीं । फिर भी बीच-बीच में उसने हिंदी का प्रयोग किया ही । मतलब यह कि हिंदी को लेकर स्थिति दुराग्रह की नहीं थी ।

जैसा मैं कह चुका हूं, लिखित तौर पर हिंदी का प्रयोग बिरले स्थलों पर ही देश के भीतर हो रहा है । चेन्नै में केंद्रीय सरकार का एक बड़ा संग्रहालय है । वहां भी दर्शनार्थ रखी गयी वस्तुओं के साथ लिखित पाठ्य सामग्री प्रायः अंग्रेजी में ही और उसके बाद तमिल में उपलब्ध है । कहीं-कहीं भूले-भटके हिंदी में लिखा हुआ दिखा जरूर । तमिल में जानकारी का प्रस्तुत किया जाना  मेरी दृष्टि में आवश्यक है, क्योंकि तमिलभाषी ही तो वहां सर्वाधिक आते हैं । लेकिन केंद्र सरकार का उपक्रम होने के नाते राजभाषा में भी लिखा होता यह भाव मेरे मन में तब आया था ।

अभी इतना ही । अपने कुछ और अनुभवों के बारे में अगली पोस्ट में लिखूंगा मैं । – योगेन्द्र

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2 Responses to “दक्षिण भारत यात्रा और हिंदीः तृतीय भाग, बदलाव के संकेत”

  1. aweg Says:

    मौखिक हिंदी को लोकप्रिय बनाने में फिल्म तथा चोटे स्क्रीन की महत्वपूर्ण भूमिका है परन्तु लिखित हिन्दी अब भी लिखित अंग्रेज़ी के साथ संघर्ष कर रही है। यह राह कठिन है और मंज़िल अभी भी दूर है। कुछ आदत का कारनामा है तो कुछ मानसिकता की मीनागिरी है। इसके बावजूद भी विभिन्न स्तरों पर प्रयास जारी है और यही हिंदी का बल है।

    धीरेन्द्र सिंह.

  2. Annapurna Says:

    अच्छा चिट्ठा ! सबसे बड़ी बात यह है कि हिन्दी भाषा के साथ आप दक्षिण में बेगाने नहीं लगते।


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