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विवादित परिभाषाएं, चार: आतंकवाद, …

जनवरी 14, 2009

विगत पोस्ट (२ जनवरी, २००९) के आगे । इस ब्लॉग पर प्रस्तुत मेरे लेख-शृंखला का उद्येश्य रहा है उन कुछ शब्दों की चर्चा करना, जिन्हें हम अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में सुनते और प्रयोग में लेते रहते हैं । चयनित शब्द केवल उदाहरण मात्र हैं । ऐसे अनेकों शब्द गिने जा सकते हैं जिनके अर्थ इतने स्पष्ट या असंदिग्ध नहीं होते हैं जितने हवा-पानी, देश-विदेश, मीठा-खट्टा या अंधकार-प्रकाश जैसे शब्दों के । मैं उन शब्दों की बात कर रहा हूं जिनके अर्थ श्रोता ठीक वही नहीं समझ रहा होता है जो वक्ता के मन में अपनी बात कहते समय रहती हैं । यह लेख शृंखला की अंतिम किश्त है । मैं स्वयं आश्वस्त नहीं हूं कि मेरी बातें पाठकगण ठीक वैसे ही समझ पा रहे होंगे जैसा कि मेरे मन में हैं । संभव है कि मैं कुछ कह रहा हूं और वे कुछ अलग ही समझ रहे हों !

आतंकवाद – ‘आतंकवाद’ आज राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनैतिक, प्रशासनिक तथा सामाजिक संदर्भों में प्रयुक्त आम चर्चा का शब्द बन चुका है । मुश्किल से चार दशक भी नहीं बीते होंगे जब से यह शब्द विशेष तथा सीमित अर्थों में इस्तेमाल होने लगा । लेकिन सबके लिए इसके एक ही अर्थ हों ऐसा कदाचित् नहीं है । क्या-क्या बातें आतंकवाद की श्रेणी में रखी जायें इस पर लोगों की एक राय होगी इसमें मुझे शंका है । इस शब्द के अर्थ क्या हों इसे समझने से पूर्व उचित होगा कि हम ‘आतंक’ शब्द के अर्थ पर विचार करें । हिन्दी शब्दकोश इसे यूं परिभाषित करते हैं: ‘रोग ज्वर, पीड़ा; भय, दहशत; मशीनीकृत शासन या सामाजिक अनुशासनों की क्रूरता से उत्पन्न स्थिति; दबदबा; संदेह; अनिश्चय; डंके का शब्द ।’ (बृहत् हिन्दी कोश, ज्ञानमंडल, वाराणसी) स्पष्ट है कि उक्त शब्द के अर्थ बहुत व्यापक हैं । वस्तुतः दिये गये अर्थ कमोबेश वही हैं जो शब्द के स्रोत संस्कृत भाषा में स्थापित हैं, जैसा कि संस्कृत-हिन्दी शब्दकोश (वामन शिवराम आप्टे, अशोक प्रकाशन, दिल्ली) में देखा जा सकता है । लेकिन ‘आतंकवाद’ में ये सभी संभावनाएं समाहित नहीं हैं, बल्कि इसके अर्थ बहुत सीमित या संकीर्ण हैं । उक्त हिन्दीकोश के अनुसार ‘आतंकवाद’ के मतलब हैं ‘राज्य या विरोधिवर्ग को दबाने के लिए भयोत्पादक उपायों का अवलंबन ।’ इस शब्द का समानार्थी अंग्रेजी शब्द है ‘टेररिज्म् (terrorism)’ जिसका अर्थ अंग्रेजीकोश में हूबहू तो मुझे नहीं मिला, किंतु वह लगभग समान समझा जा सकता है । Oxford Dictionary of Difficult Words के अनुसार Terrorism = ‘the use of violence and intimidation in the pursuit of political pursuits.’

स्पष्ट है कि इस शब्द के अर्थ से कहीं न कहीं राजनीति जुड़ी है । शब्दकोशों की परिभाषा से लगता यही है कि जब भी किसी व्यक्ति अथवा व्यक्तियों के समूह द्वारा दूसरों को विभिन्न तरीकों से भयभीत करके अपने राजनीतिक उद्येश्य की पूर्ति का प्रयास किया जाता है तो उसे आतंकवाद कहा जाना चाहिए । अपने देश में फैल रहे ‘नक्सलवाद’ को अवश्य ही आतंकवाद में गिना जाना चाहिए, क्योंकि इस हिंसात्मक आंदोलन के समर्थक ‘अन्यायकारी’ मौजूदा राजनैतिक व्यवस्था के विरोध में खड़े नजर आते हैं । इसी प्रकार असम राज्य के उल्फा आंदोलन को भी देख जाना चाहिए । अन्य देशों में जो भी ऐसी हिंसात्मक गतिविधियां चल रही हैं वे सभी आंतकवाद के दृष्टांत माने जाने चाहिए । किंतु जब भी समाचार माध्यम आंतकवाद की खबर देते हैं तो उनका इशारा तथाकथित ‘जेहादी मूवमेंट’ की ओर रहता है, जिसकी चपेट में अपना देश ही नहीं बल्कि दुनिया के तमाम देश हैं । नक्सली घटनाओं को उतना खुलकर आंतकवाद नहीं कहा जाता है जितना इस जेहादी आंदोलन को कहा जाता है, जब कि इसके सक्रिय कार्यकर्ता राजनीति की कम और ‘धर्म’ की अधिक बात करते हैं । उनका मानना है कि उनका धर्म (जिसकी समझ बड़े-बड़े विद्वानों को भी ठीक-से है इस बात पर शंका की जानी चाहिए) खतरे में है, और वे खुलकर कहते हैं कि जो भी देश इस खतरे के पीछे है उसकी जनता के विरुद्ध हिंसा करना उनका हथियार है ।

आतंकवाद के सर्वाधिक चर्चित उपर्युक्त उदाहरण से तो यही लगता है कि इसे केवल राजनीति से नहीं जोड़ा जाना चाहिए । बल्कि आतंकवाद शब्द का प्रयोग उन सभी हिंसात्मक गतिविधियों के लिए किया जाना चाहिए, जिसमें एक व्यक्ति या जनसमूह द्वारा दूसरों को भयग्रस्त करके अपने राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक अथवा धार्मिक लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास किया जाता हो । तदनुसार जब राज्य स्वयं अपनी शासित जनता पर अपने विचार डंडे (यानी पुलिस फोर्स) के बल पर थोपती है तो उसे भी आंतकवाद कहा जाना चाहिए । जब राजनेता अथवा बलशाली लोग अपने राजनैतिक या अन्य प्रकार की ताकत से लोगों को डरा-धमकाकर धन-उगाही करते हैं या उनसे तरह-तरह के लाभ लेते हैं तो वह भी अपने किस्म का आतंकवाद है । अवश्य ही कुछ लोग आंतकवाद के इतने व्यापक अर्थ से सहमत होंगे, किंतु सभी नहीं । कई जनों के लिए यह शब्द तथाकथित जेहादी आतंकवाद तक ही सीमित है । ऐसे में मुझे लगता है कि इस शब्द की सुनिश्चित् परिभाषा नहीं है ।

संन्यासी – मेरी दिलचस्पी इस शब्द में तब विशेषतया बढ़ी जब मैंने देखा कि अपने यहां की राजनीति में स्वयं को संन्यासी कहने वाले गरुआवस्त्रधारी नेताओं की भी पैठ है । उन्हें देख मैंने संन्यास और संन्यासी शब्दों के अर्थ जानने की कोशिश की । अगर शाब्दिक अर्थ पर ध्यान दें तो संन्यास का सीधा-सा अर्थ है छोड़ना अथवा त्यागना । जब कोई व्यक्ति किसी नौकरी-पेशे में व्यस्त रहता आया हो या राजनीति में दीर्घकाल तक सक्रिय रहा हो और फिर उस व्यस्तता या सक्रियता से मुक्त हो जाये तो अक्सर कहता है कि उसने अमुक कार्य से संन्यास ले लिया है । लंबे अरसे तक अपनायी गयी अभिरुचि जैसे संगीत, अभिनय आदि अथवा किसी आदत को त्याग दें तो भी संन्यास जैसे शब्द का प्रयोग किया जाता है । इन अवसरों पर संन्यास त्याग का समानार्थी होता है । परंतु इन स्थितियों में उस व्यक्ति को संन्यासी नहीं कहा जाता है । ऐसी किसी बात से स्वयं को विरत कर लेना संन्यासी कहलाने के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस शब्द के अर्थ कहीं अधिक गंभीर हैं और इसे एक सुस्पष्ट रुढ़ि अर्थ में स्थापित माना जाता है । वस्तुतः यह शब्द प्राचीन भारतीय वर्णाश्रम व्यवस्था से संबंध रखता है, जिसके अनुसार संन्यासी वह है जिसने समस्त सांसारिक संबंधों को त्यागने का संकल्प ले लिया हो और जो उस दिशा में अग्रसर हो रहा हो ।
इस संदर्भ में महाकाव्य महाभारत के मोक्षधर्म पर्व के २४५वें अध्याय में वर्णित संन्यास धर्म का उल्लेख किया जाना समीचीन होगा । छत्तीस श्लोकों वाले इस अध्याय में महर्षि व्यास अपने पुत्र शुकदेव मुनि को संन्यासी के धर्म का सविस्तार बखान करते हैं । उस लंबी चर्चा का यहां उल्लेख करना मैं आवश्यक नहीं समझता । फिर भी एक श्लोक पर मेरा विशेष ध्यान है और वह है:

कपालं वृक्षमूलानि कुचैलमसहायता ।
उपेक्षा सर्वभूतानामेतावद् भिक्षुलक्षणम्
।।७।।
जिसके अनुसार भिक्षार्थ कमंडलु रखना, वृक्षमूल पर शयन करना, असुन्दर वस्त्र धारण करना, किसी को साथ लेकर न रहना, सभी प्राणियों के प्रति उपेक्षा (विलगाव) का भाव रखना, आदि भिक्षु यानी संन्यासी के लक्षण हैं ।

उसी स्थल के कुछ चुने हुए अन्य कथन इस प्रकार हैं:
संन्यासी की विशेषता यह है कि वह ‘नैव पश्येन्न शृणुयादवाचं जातु कस्यचित्’ अर्थात् निन्दा करने वाले की ओर न तो देखे और न ही उसकी बातें सुने; ‘न क्रुद्ध्येन्न प्रहृष्येच्च मानितो९मानितश्च यः’ अर्थात् न तो सम्मानित होने पर हर्षित और न अपमानित होने पर क्रुद्ध होवे; ‘अहेरिव गणाद् भीतः सौहित्यान्नरकादिव’ अर्थात् वह जनसमुदाय से सर्प की तरह और सुस्वादु भोजन से नरक की भांति परहेज करता है; और ‘विमुक्तं सर्वसंज्ञेभ्यः मुनिमाकाशवत् स्थिरम्’ अर्थात् वह सभी आसक्तियों से विमुख मुनिवृत्ति के साथ आकाश की भांति स्थिर रहता है ।

उपर्युक्त बातें वास्तव में शास्त्रोक्त संन्यास धर्म का वर्णन है । प्राचीन भारतीय आध्यात्मिक मान्यताओं के अनुसार मनुष्य को चाहिए कि वह जीवन के सांध्यकाल को प्राप्त होते-होते परलोक प्रस्थान की तैयारी करे । इसी उद्येश्य से उसे इहलोक के समस्त बंधनों से स्वयं को मुक्त करने के प्रयास करने चाहिए । अपनी सभी सहज वृत्तियों को नियंत्रण करके सभी इच्छाओं-अपेक्षाओं को त्याग देना चाहिए । उपर्युक्त बातें स्पष्ट करती हैं कि कौन संन्यासी कहलाने का हकदार होता है । संन्यास आश्रम में पदार्पण के लिए गुरु-दीक्षा एक औपचारिकता भर है, किंतु दीक्षित होने और जोगिया या भगवा चोला पहन लेना संन्यासी होने का प्रमाण नहीं है । संन्यासी होने का भाव तो सोने-उठने, खाने-पीने, बोलने-चालने आदि सभी कर्मों में दिखना चाहिए ।

अब आइये आज की वास्तविकता पर । अपने समाज में स्वयंभू संन्यासियों की कभी नहीं है । और आम जन उनके द्वारा धारण किये गये ‘प्रतीकों’ के आधार पर उन्हें संन्यासी मान भी लेते हैं । लेकिन शास्त्रीय मान्यताओं की कसौटी पर शायद ही कोई चर्चित व्यक्ति संन्यासी कहे जाने योग्य मिले । उनकी जीवन-शैली, संपदा-संग्रह, और दूसरों पर वर्चस्व की उनकी लालसा आदि के क्या मतलब निकलते हैं यह समझ से परे नहीं है । असली संन्यासी तो खोजने पर भी मुश्किल से मिलेगा, वीआईपी बना हुआ तो हरगिज नहीं घूमेगा । तब क्या यह नहीं माना जाना चाहिये कि संन्यासी शब्द की उचित परिभाषा प्रचलन में नहीं है ?

विवाह – यह सवाल पूछा जा सकता है कि भला इस शब्द के अर्थ में अस्पष्टता की क्या बात है । मेरे मन में शंकाएं तब से उठने लगी हैं जब से स्त्री का स्त्री और पुरुष का पुरुष से ‘विवाह यानी marriage’ की बातें समाचार माध्यम पेश करने लगे । अभी तक होता यही था कि जब किसी युवती के विवाह की बात मेरे कान में पड़ती थी तब मेरी कल्पना में उसके वर के रूप में एक मर्द, सामान्यतः उसका लगभग हमउम्र, प्रकट होता था । ठीक इसके विपरीत युवती या महिला की छबि मन में उभरती थी किसी युवक के विवाह की चर्चा सुनने पर । अब लगता है कि स्थिति इतनी साफ नहीं रह गयी है । अब कन्या कन्या न रहकर एक मर्द हो सकता है और वर एक कमसिन लड़की । ऐसे बेहूदे ‘गठबंधन’ विवाह के पारंपरिक अर्थ के अनुरूप नहीं कहे जायेंगे, भले ही उन्हें कानूनी मान्यता मिल जाये ।

बात इतनी ही नहीं है । आजकल एक और रोग समाज में फैल रहा है और वह है ‘लिव-इन-रिलेशनशिप (live-in-relationship)’, जिसके अनुसार स्त्री-पुरुष का जोड़ा साथ-साथ रहता है, एक ही छत के नीचे ठीक पति-पत्नी की भांति । किंतु स्वयं को पति-पत्नी के तौर पर देखे या संबोधित किये जाने से उन्हें आपत्ति रहती है । वे एक-दूसरे के केवल दोस्त कहलाना चाहते हैं और चाहते हैं कि किसी भी प्रकार के वैवाहिक महत्त्व के कानूनी तथा सामाजिक बंधन से वे मुक्त रहें । दिलचस्प यह है कि इस संबंध के फलस्वरूप उनके ‘संतान’ भी हो सकती है, जिसको अब कानूनी हक भी प्राप्त हैं (जैसा मुझे मालूम है) । क्या उनके आपसी संबंध को भी विवाह कहा जाना चाहिए । मैं यह सवाल इसलिए पूछ रहा हूं कि विवाह की कोई एक नियत विधि सर्वत्र प्रचलित नहीं है । हिंदुओं में कोई जोड़ा अपेक्षया लंबी औपचारिकता वाली वैदिक विधि से इस बंधन को अपनाता है तो कोई मंदिर में जाकर परस्पर वचनबद्ध होकर ही रिश्ते को स्वीकारता है और कोई अन्य एतदर्थ स्थापित सरकारी कार्यालय में पंजीकरण का सहारा लेता है । अन्य समाजों में भी विवाह-कार्य में कुछ लचीलापन होगा ही ।

आम तौर पर कानून तथा समाज ऐसे स्थापित संबंधों को विवाह ही मानता है, जब तक कि कोई विवाद न खड़ा हो रहा हो । ध्यान देने लायक बात यह है कि विवाह का दस्तावेजी प्रमाण सर्वत्र अभी प्रचलित नहीं है, जिसे देखकर किसी जोड़े के विवाह के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कहा जा सके । और यह भी आवश्यक नहीं है किसी जोड़े के वैवाहिक रस्म का कोई साक्षी सदैव उपलब्ध हो । ऐसे अवसरों पर साथ-साथ रहने वाले जोड़े को विवाहित मानकर ही लोग चलते हैं, कोई छानबीन नहीं करते । कुछ भी हो, समलैंगिक सहवासन इस शब्द के पारंपरिक अर्थ के अनुसार बतौर विवाह नहीं कहा जा सकता है । अपने समाज के अंधविश्वासग्रस्त तबकों में कभी-कभी सुनने में आता है कि फलां का विवाह किसी पशु, पेड़ अथवा देवमूर्ति आदि से की गयी है । इन मौकों पर मानवेतर पक्ष के लिए वैवाहिक रस्म का कोई मतलब ही नहीं हो सकता, तब भी लोग ‘विवाह’ की बात करते हैं । कुछ लोग पूरी घटना को एक मजाक कहेंगे । इस प्रकार के दृष्टांत यही दर्शाते हैं कि उक्त शब्द की स्पष्ट व्याख्या व्यवहार में नहीं है । – योगेन्द्र

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