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विवादित परिभाषाएं, तीन: भ्रष्टाचार, …

जनवरी 1, 2009

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विगत पोस्ट (२२ दिसंबर, २००८) के आगे ।
भ्रष्टाचार – भ्रष्टाचार भी उन तमाम शब्दों में से एक है जिसे हम आम जिंदगी में सुनते हैं । इस शब्द का सर्वाधिक प्रयोग राजनैतिक, शासकीय, प्रशासनिक एवं न्यायिक संदर्भों में किया जाता है । इस शब्द को जोर-शोर से इस्तेमाल करते हुए सत्तासीन राजनैतिक दलों का विरोध किया जाता है और उन्हें सत्ताच्युत करने के प्रयास किये जाते रहे हैं । किंतु भ्रष्टाचार क्या है इसकी समझ सब की अपनी अलग-अलग है । प्रायः सभी लोग इसकी परिभाषा करते समय इस बात के लिए सचेत रहते हैं कि कहीं कही जा रही बात उनके स्वयं के विरुद्ध तो नहीं निकल पड़ेगी । वे कोई न कोई तर्क खोज ही लेते हैं जिसके आधार पर वे खुद साफ-सुथरे नजर आयें । सैद्धांतिक स्तर पर भ्रष्टाचार की असंदिग्ध तथा स्पष्ट व्याख्या करना कदाचित् संभव है, परंतु व्यवहार में कम ही लोग उसे स्वीकारेंगे । परिभाषा को थोड़ा-बहुत लचीला बनाने की आवश्यकता सभी मानते हैं और इस लचीलेपन के साथ ही शब्द के अर्थ अक्सर बेमानी हो जाते हैं ।

यूं भ्रष्टाचार को सदाचार का विपरीतार्थी शब्द के रूप में देखा जा सकता है, और सदाचार को परिभाषित करना अपेक्षया सरल है । सच बोलना, दूसरों को धोखा न देना, अपने जिम्मे लिये गये कार्य को निष्ठापूर्वक संपन्न करना, यथासामर्थ्य जरूरतमंदों की सहायता करना, मृदु भाषण आदि जैसे सामाजिक व्यवहार के विभिन्न अंशों को सभी समाजों में सदाचार में गिना जाता है । परंतु यह आवश्यक नहीं है कि सदाचारसम्मत कार्य न किया जाना अनिवार्यतः भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आवे । उदाहरण के लिए किसी जरूरतमंद की मदद करना या न करना व्यक्ति के सामाजिक अधिकार का एक हिस्सा है और उसकी स्वेच्छा पर निर्भर करता है । उसके द्वारा मदद किया जाना अवश्य ही प्रशंसनीय कृत्य होगा, परंतु वैसा न करना निन्द्य नहीं होगा । अतः सदाचार का विलोम सदैव भ्रष्टाचार हो आवश्यक नहीं । वास्तव में पूरे मानव समाज में अनेकों ऐसे कर्म होते हैं जिन्हें निन्द्य, भ्रष्ट तथा त्याज्य समझा जाता है । उन कर्मों में लिप्त होना भ्रष्टाचार माना जाता है । नैतिकता का उल्लंघन भ्रष्ट आचरण कहा जाता है । किंतु नैतिकता की कोई सार्वत्रिक सर्वस्वीकार्य परिभाषा नहीं है । यथा कई लोगों की दृष्टि में अविवाहित स्त्री-पुरुष के बीच का प्रगाढ़ संबंध आपत्तिजनक नहीं माना जाता (विशेषतया पश्चिमी देशों में) । ऐसे संबंधों में संलिप्तता किसी की नजर में भ्रष्ट आचरण होगा तो किसी अन्य की नजर में नहीं ।

उक्त प्रकार की सैद्धांतिक विवेचना से भ्रष्टाचार की असंदिग्ध परिभाषा पर कदाचित् पहुंचा जा सकता है । किंतु यह सब व्यवहार में माने नहीं रखता है, क्योंकि हर व्यक्ति का इस शब्द के निहितार्थ के प्रति अपना निजी नजरिया होता है । अधिकांश लोगों के लिए भ्रष्टाचार का मतलब है घूस लेकर काम करना, सरकारी पैसे का दुरुपयोग करना, अपने नाते-रिश्तेदारों तथा मित्रों को नाजायज लाभ पहुंचाना, इत्यादि । ऐसे अवसरों पर भ्रष्टाचार साफ झलकता है और उससे कोई इंकार नहीं कर सकता है । लेकिन ऐसी भी अनेकों बातें हैं जिन्हें भ्रष्टाचरण समझा जाना चाहिये यह विचार तक लोगों के मन में नहीं उठता है । इसका एक स्पष्ट एवं निर्विवाद दृष्टांत है वकालत का पेशा । अदालती मामलों में हर अधिवक्ता अपने मुवक्किल के पक्ष में जिरह करता है और उसका बचाव करता है । यह तथ्य है कि वह मामले के सभी पहलुओं को समझने के बाद ही बहस में उतरता है । किसी भी मामले में दोनों विरोधी पक्षों के वकील एक साथ सही नहीं हो सकते हैं । अवश्य ही उनमें से एक अनुचित का साथ दे रहा होता है । तो क्या उनमें से किसी एक का कार्य भ्रष्टाचार की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए ?

अगला उदाहरण । कल्पना कीजिये कि एक राजनेता सरकार चलाता है और निजी तौर कोई गलत-सलत कार्य नहीं करता है, किंतु वह ऐसे जनप्रतिनिधियों को साथ लेकर राजकाज चलाता है, जिनकी छबि साफ-सुथरी न हो और जो आपराधिक आचरण के लिए जाने जाते हों, तो उस राजनेता के बारे क्या राय बनायी जाये ? तब क्या उसका आचरण भ्रष्टाचार से परे माना जायेगा ? यदि कोई कर्मचारी घूसखोरी जैसी हरकत नहीं करता, परंतु अपना काम निहायत सुस्ती से निबटाता है, जिस काम का निस्तारण एक दिन में हो सकता है उसे कई दिनों तक टाले रहता है, तब उसे भ्रष्ट नहीं कहा जाना चाहिए ? कोई अध्यापक दिखावटी तौर पर समय पर कक्षा में जाता है और पढ़ाने का नाटक भी कर लेता है, परंतु वास्तविकता में पूरे मनोयोग से अध्यापन की तैयारी न करके रस्म-अदायगी करता है, तो उसे ईमानदार माना जायेगा ? यदि किसी साक्षात्कार समिति का विशेषज्ञ सदस्य, जिसके इरादों को कानूनन चुनौती दे पाना संभव न हो, किसी एक आवेदक से जानबूझ कर सरल प्रश्न पूछे और उसे सफलता दिला दे और किसी अन्य से अपेक्षया कठिन प्रश्न पूछकर उसे असफल करवा दे, तो क्या वह पाकसाफ कहा जायेगा ? ऐसे कुछ मौकों पर संबंधित व्यक्ति का मन ही सत्य जानता है । उसकी बेईमानी का साक्षी उसके अतिरिक्त अन्य कोई और नहीं हो सकता है । तब उसके बारे में क्या राय बनायी जाये ? कहने का तात्पर्य है कि व्यवहार में हर मौके पर भ्रष्टाचार का आकलन कर पाना कठिन होता है ।

न्याय – मेरी दृष्टि में ‘न्याय’ एक भ्रामक शब्द है । विधि-व्यवस्था में तथाकथित न्याय देना न्यायालयों का कार्य है । मैं यह तो सहज रूप से स्वीकार कर सकता हूं कि किसी अपराधी को न्यायालय दंड दे सकता है, किंतु वह भुक्तभोगी को न्याय नहीं दिला सकता है । आम धारणा यह है कि अपराधी को दंडित करना ही भुक्तभोगी के प्रति न्याय है । किंतु गंभीरता से विचार करने पर अनुभव किया जा सकता है कि ऐसी धारणा मान्य नहीं हो सकती है । हो चुकी हानि की भरपायी भला कैसे कर सकते हैं आप ? यह तर्क दिया जाता है कि हो चुके नुकसान की भरपायी समुचित मात्रा में रुपये-पैसे से की जा सकती है । लेकिन क्या रुपया-पैसा उस अभाव की पूर्ति वस्तुतः कर सकता है जो भुक्तभोगी को पहुंचाये गये नुकसान से पैदा हुआ हो ? मैं उदाहरणों से अपने विचार स्पष्ट करता हूं । न्याय शब्द का प्रयोग लोग उस व्यक्ति के लिए भी प्रयोग में लेते हैं जो इस दुनिया में नहीं रहा । उससे संबद्ध मामले में न्यायालय जो भी निर्णय दे, स्वयं उस व्यक्ति के लिए वह नितांत बेमानी है । उस निर्णय से उसे क्या लाभ मिल सकता है या उसकी क्या हानि हो सकती है, जब वह इस धरती पर रहा ही नहीं ? न्यायालय के निर्णय का जो भी महत्त्व है वह केवल उनके लिए ही हो सकता है जो उसके पीछे इस संसार में रह जाते हैं । न्याय अथवा अन्याय, जो भी कहें, केवल उन्हीं के लिए अर्थ रखता है । फिर दिवंगत व्यक्ति को न्याय मिला जैसे कथन में न्याय के वास्तविक अर्थ क्या रह जाते हैं ?

गंभीरता से सोचने पर यह बात भी समझ में आ जाती है कि किसी व्यक्ति के हत्यारे को भले ही फांसी की सजा मिल जाये, उसके उत्तराधिकारियों को कोई लाभ मिले यह आवश्यक नहीं है । जिसे वे खो चुके हों उसे वापस पा नहीं सकते हैं । किसी बच्चे से उसके मां-बाप छिन जायें, किसी मां-बाप से उनके बेटा-बेटी छिन जायें, किसी स्त्री-पुरुष से उसका पति-पत्नी छिन जाये, तो हत्यारे को सजा देकर वे वापस तो नहीं आ सकते न ? तब फिर न्याय कैसा ? हां, अगर उन लोगों के मन में बदले की आग सुलग रही हो, तो वे न्यायिक निर्णय से कुछ तसल्ली महसूस कर सकते हैं । पर यह पर्याप्त नहीं होगा । कुछ व्यक्ति तो अपराधी को क्षमा भी कर देते हैं, किंतु यह फिर भी मानते हैं कि जो हो चुका उसकी भरपाई संभव नहीं । हां, यदि दिवंगत व्यक्ति परिजनों के भरण-पोषण का दायित्व संभाले हो और उसके चल बसने पर वे परिजन असहाय हो रहे हों, तब आप कह सकते हैं कि आर्थिक मुआवजा कुछ हद तक न्याय के निकट है, केवल थोड़ा-बहुत ही । परंतु ऐसा मुआवजा तब किस काम का जब परिजन सुसंपन्न हों और उन्हें रुपये-पैसे की कमी न हो ? वे तो यही चाहेंगे कि दिवंगत व्यक्ति उनके बीच लौट आवे, जो होने से रहा । तब फिर न्याय कैसा ?

वास्तव में इस प्रकार की स्थितियां ही हमारे जीवन में अधिक देखने को मिलती हैं । बहुत ही कम अवसर होते हैं जब भुक्तभोगी को हो चुके नुकसान की भरपायी पैसे से कर देना एक प्रकार से पर्याप्त हो । उदाहरणार्थ, जिस महिला के साथ दुष्कर्म हुआ हो उसके मन पर लगे आघात के घाव आप मिटा नहीं सकते; कदाचित् वे ताउम्र उसके साथ साये की भांति लगे रहें । आर्थिक मुआवजे की सार्थकता तब संदिग्ध रहती है । जिस निरपराध युवक-युवती को किशोरावस्था से युवावस्था में कदम रखते समय जेल जैसे स्थान में दिन बिताने पड़ें, उसके जीवन का सबसे अहम समय आप वापस कैसे लायेंगे ? किसी को आर्थिक मुआवजा सालों के विलंब से दिया जा रहो तो उसके साथ न्याय का क्या अर्थ रह जाता है ? और सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि हमारी पूरी प्रशासनिक एवं सामाजिक व्यवस्था ही ऐसी जटिल तथा अकुशल है कि तथाकथित न्याय भी न्याय कहे जाने योग्य नहीं रह जाता है । अंग्रेजी में कहावत है ‘जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड !, । फिर भी अधिकांश की दृष्टि में वही न्याय होता है, विशेषकर न्यायिक प्रक्रिया से जुड़े लोगों की दृष्टि में ।

कुल मिलाकर क्या न्याय है और क्या नहीं इस बात पर समाज में मतैक्य शायद ही देखने को मिले । मैं इस तथ्य को महत्त्व देना आवश्यक मानता हूं कि नियमों का उल्लंघन या अपराध करने वाले को दंडित किया जाना, किसी भुक्तभोगी, यदि कोई हो तो, के प्रति न्याय के रूप में नहीं देखा जा सकता है । दोनों में परस्पर संबंध तो है, किंतु पहले के होने में दूसरे का अनिवार्यतः होना नहीं कहा जा सकता । – योगेन्द्र

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3 Responses to “विवादित परिभाषाएं, तीन: भ्रष्टाचार, …”


  1. हमारे देश में रिश्वत देना और लेना अपराध है। भारत सरकार ने कभी एसा कोई सर्वे कराया- रिश्वत नही देने वाले परिवारों का क्या हॉल है। इन भ्रष्ट सरकारी कर्मचारियो ने उन ईमानदारी लोगो के साथ क्या किया है।
    http://humsubchorhain.blogspot.com/2010/10/…bhrashtachar.html


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