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विवादित परिभाषाएं, दो: धर्मनिरपेक्षता,…

दिसम्बर 22, 2008

विगत पोस्ट (११ दिसंबर, २००८) के आगे ।
धर्मनिरपेक्षता – राजनीति के क्षेत्र में यह शब्द बहुधा सुनने को मिलता है और उसी के परिप्रेक्ष में बुद्धिजीवी वर्ग भी इस पर चर्चाएं करता आया है । मैं समझता हूं कि अपने देश में इस शब्द की महत्ता हाल के वर्षों में बहुत बढ़ गयी है, और राजनेताओं के लिए यह जनसामान्य को भ्रमित करके अपना राजनीतिक स्वार्थ सिद्ध करने का एक अच्छा हथियार बन चुका है । मेरी समझ में हर कोई इस शब्द की व्याख्या सुविधानुसार और मनमाने तरीके से कर रहा है ।

क्या है धर्मनिरपेक्षता ? अपने देश में यह अंग्रेजी के ‘सेक्युलर’ (secular) के लिए हिन्दी का समानार्थी शब्द के तौर पर प्रयोग में लिया जा रहा है । शब्दकोष सेक्युलर के अर्थ यूं देते हैं: “1. denoting attitudes, activities, or other things that have no religious or spiritual basis; 2. not subject to or bound by religious rules; not belonging to or living in a monastic or other order.” (अभिवृत्तियां/रवैया, कर्म/कार्य, अथवा अन्य बातें जिनका आधार धार्मिक या आध्यात्मिक न हो; धार्मिक नियमों के अधीन या उनसे बंधा हुआ न हो; मठ-आवासीय या अन्य प्रकार के नियमों से असंबद्ध, अथवा तदनुरूप जीवनयापन से परे; संदर्भ: Oxford Dictionary of Difficult Words)”

स्पष्ट है कि उक्त शब्द की परिभाषा के अनुसार इसे उस व्यवस्था के लिए ही प्रयोग में लिया जा सकता है जो किसी धर्म की मान्यताओं पर आधारित न हो । यदि आप सामासिक शब्द ‘धर्मनिरपेक्षता’ के ‘निरपेक्ष’ पद के अर्थ पर गौर करें तो यही देखेंगे कि जब कोई कार्य, नियमन, व्यवहार आदि किसी व्यक्ति के धर्म को ध्यान में न रखते हुए किया जाये तभी उसे धर्मनिरपेक्ष कहा जा सकता है । ठीक इसके विपरीत, ‘सापेक्ष’ शब्द इस भाव को व्यक्त करता है कि हम इन कही गयी बातों के संदर्भ में व्यक्ति के धर्म को ध्यान में रखते हुए आचरण करते हैं । तब क्या हमारी शासकीय व्यवस्था ‘धर्मनिरपेक्ष’ कही जा सकती है ? धर्मनिरपेक्ष होने की शर्त ही यही है कि एक ऐसी आचार-संहिता हो जो किसी धर्मविशेष पर आधारित न हो और शासन किसी व्यक्ति के प्रति अपना व्यवहार उसके धर्म को संज्ञान में लेकर न करे । शासन की दृष्टि में सभी नागरिक समान होने चाहिए और उनके प्रति कानूनी दायित्व सदैव एक ही जैसा होना चाहिए । अपने देश में ऐसा है नहीं । तो क्या इस शब्द का सही अर्थ में प्रयोग में लिया जा रहा है ?

अपनी बात स्पष्ट करने के लिए मैं तीन स्पष्टतः भिन्न संभावनाओं की बात करता हूं । किसी व्यक्ति, व्यक्ति-समूह अथवा शासकीय व्यवस्था का व्यवहार एक नागरिक के प्रति पहला, अपनी-अपनी विभिन्न धार्मिकताओं पर आधारित हो सकता है, अथवा दूसरा, यह उस एकल धार्मिकता पर निर्भर हो सकता है जो शासकीय व्यवस्था हेतु सबके किए स्वीकारी जा चुकी हो, अथवा तीसरा, किसी भी धार्मिकता पर आधारित न होकर शासकीय प्रयोजन हेतु नियत सबके लिए समान नियमों पर निर्भर हो ।

पहली संभावना के लिए मैं बहुधर्मी (polyreligious) शब्द उपयुक्त समझता हूं और दूसरी को एकधर्मी या मात्र धार्मिक (unireligious or religious) कहना उचित होगा । इनमें से तीसरी संभावना ही मेरी दृष्टि में ‘धर्मनिरपेक्षता’ के अनुरूप मानी जा सकती है । परंतु ध्यान देने पर साफ नजर आता है कि अपने देश की स्थिति ‘सेक्युलर’ कहे जाने योग्य नहीं है, और इस शब्द का दुरुपयोग ही हो रहा है ।

उक्त प्रसंग में धर्म शब्द के अर्थ वह लिये गये हैं जो आम जनों की सोच में रहता है, अर्थात् व्यक्ति के नाम, परिवार आदि के आधार पर जो भी धार्मिक पहचान बने उसी के अनुसार उसका धर्म माना जाता है । उसका आचरण उसके घोषित धर्मानुसार वस्तुतः है या नहीं यह बेमानी रहता है ।

अहिंसा – वर्तमान समय में ‘अहिंसा’ शब्द अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अत्यधिक चर्चित शब्द है । लोग गांधीजी के अहिंसक आंदोलन से जोड़कर इसे देखते हैं और इसकी वकालत करते हैं । किंतु स्वयं इसकी परिभाषा स्पष्ट नहीं है । अलग-अलग व्यक्तियों और मतावलंबियों के लिए इसके अर्थ अलग-अलग देखने को मिलते हैं । हिंसा का अभाव अहिंसा है, लेकिन प्रश्न है कि हिंसा को कैसे परिभाषित किया जाये ? अधिकांश लोगों की दृष्टि में ‘हिंसा’ अंगे्रजी के ‘violence’ का पर्याय है । (violence = behaviour involving physical force, intended to hurt, damage, or kill. संदर्भ: Compact Oxford Reference Dictionary)

किंतु ध्यान दें कि प्राचीन भारतीय मनीषियों के मत में हिंसा तीन प्रकार की हो सकती हैः मनसा, वाचा एवं कर्मणा । विपरीत क्रम में बात करें तो कर्मणा हिंसा का तात्पर्य है दूसरे को कायिक तथा भौतिक स्तर पर नुकसान पहुंचाना, यथा चोट पहुंचाना, मार डालना या संपदा को नुकसान पहुंचाना । वाचा हिंसा की बात तब उठती है जब व्यक्ति दूसरे के प्रति ऐसे शब्दों का प्रयोग करे जो उसे मानसिक रूप से आहत करें, यथा किसी को अपशब्द बोलना या उसे बदनाम करना । और मनसा हिंसा का तात्पर्य है दूसरे के प्रति कुविचार मन में लाना, उसके बारे में अनिष्ट की कामना करना आदि । अंग्रेजी का ‘वायलेंस’ शब्द केवल दैहिक चोट-पटक जैसी घटना तक सीमित है जिसमें भौतिक प्रकृति का बल प्रयुक्त होता है । दूसरे को आर्थिक नुकसान पहुंचाना या उसे धोखा देना वायलेंस में नहीं गिना जाता है, लेकिन वस्तुओं की तोड़फोड़ करना हिंसात्मक कार्यवाही में शामिल कहा जाता है । इसके विपरीत हमारी पुरातन मान्यता में हिंसा कहीं अधिक व्यापक अर्थ रखती है । दूसरे को किसी भी प्रकार की हानि पहुंचाना या उसकी कल्पना करना भी हिंसा के दायरे में आ जाता है । अतः स्पष्ट है कि ‘अहिंसा’ का अर्थ कुछ लोगों के लिए वही होगा जो अंग्रेजी के nonviolence में निहित है, जब कि अन्य लोग उसे अधिक व्यापक अर्थ में लेंगे ।

अधिक महत्त्व की बात यह है कि लोगों की हिंसा संबंधी समझ उनकी पारिवारिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक पृष्ठभूमि पर गंभीर रूप से निर्भर करती है । उदाहरण के लिए एक रूढ़िवादी जैन मतावलंबी की राय में किसी भी जीव को कष्ट देना हिंसा है, भले ही वह दृष्टि में आ पा रहा हो या नहीं । हिंसा की इतनी कट्टर परिभाषा कदाचित् व्यावहारिक नहीं है और सर्वस्वीकार्य तो हरगिज नहीं । जो धार्मिक कर्मकांडों के लिए पशुवलि स्वीकारते हैं उनके मत में उस विशिष्ट कार्य में की जा रही हत्या हिंसा नहीं कही जानी चाहिये । और मांसाहार जिनका पारंपरिक भोजन रहा है अथवा जिनके धार्मिक दर्शन के अनुसार मानवेतर प्राणियों को ईश्वर ने मनुष्य के लिए भोग्य वस्तु के रूप में रचा है, उनकी दृष्टि में हिंसा के अर्थ कुछ भिन्न ही रहते हैं । आधुनिक वैज्ञानिक नजरिये से देखें तो जिन जीवों में चेतना ही न हो उनको कष्ट का अनुभव नहीं हो सकता, तदनुसार उनकी हिंसा का अर्थ ही नहीं है । आरंभिक अवस्था के गर्भस्थ भ्रूण तथा वनस्पति तथा उनके बीज इसी श्रेणी में माने जायेंगे । कुल मिलाकर हिंसा और अहिंसा के अर्थ व्यक्तिसापेक्ष पाये जाते हैं ।

नैतिकतानैतिकता (morality) भी पर्याप्त चर्चित शब्द है । दूसरों के कृत्यों को लेकर मौके-बेमौके नैतिकता की बात करना आम प्रचलन में है । किंतु क्या नैतिक है और क्या नहीं यह देश, काल और समाज पर निर्भर करता है । यूं माना तो यही जायेगा कि किसी समाज में जो कथन एवं कार्य अनुचित की श्रेणी रखे गये हों उनसे बचना ही नैतिकता है । किंतु क्या उचित है और क्या नहीं इसका निर्धारण कौन करेगा और किस आधार पर ? सभ्य कहे जाने वाले समाजों में कुछ बातें कमोबेश स्पष्ट रहती हैं; जैसे झूठ बोलना सभी समाजों में अनैतिक माना जाता है और इसी प्रकार दूसरों को धोखा देकर अपना काम निकालना । पारिवारिक जिम्मेदारी की जानबूझ कर अनदेखी करना भी अनैतिक माना जायेगा । लेकिन नीति कहती है कि कई अवसरों पर जानबूझ कर झूठ बोलना चाहिये यदि यह किसी के हित के विचार से किया जाना हो और उसमें किसी का अहित न हो रहा हो । जीवन में ऐसे मौके अक्सर आते हैं जब सच न बोल कर हम संभावित अनिष्ट से बचते हैं । तब हमारा रवैया अनैतिक कहा जाये या नहीं इस पर मतैक्य शायद न हो पाये ।

मैं यहां इस बात पर जोर देना चाहूंगा कि नैतिकता और वैधानिकता में परस्पर संगति हो यह आवश्यक नहीं । शासकीय नियम-कानून नैतिकता पर आधारित हों यह नहीं होता है, क्योंकि उनका निधारण शासन चलाने वाले अपनी सोच के अनुसार करते है और वे रातोंरात बदल सकते हैं, जब कि नैतिकता की बातें सामाजिक परंपराओं से जुड़ी रहती हैं और इस अर्थ में स्वतःस्फूर्त होती हैं कि किसी दिन बैठकर समाज के लोग नैतिकता के पुराने मापदंडों के स्थान पर नयों का स्थापना नहीं करते हैं । वस्तुतः नैतिकता की प्रचलित अवधारणा देश एवं काल के साथ शनैः-शनै बदलती रहती है ।

क्या नैतिक है क्या नहीं इस पर अलग-अलग समाजों में भिन्न-भिन्न मत हो सकते हैं; एक ही समाज के भीतर भी अलग-अलग समुदायों में भिन्न-भिन्न हो सकता है । वैयक्तिक स्तर पर विविधता आम बात है । कुछ प्रश्न हैं जिनके बारे में सुनिश्चित राय बना पाना सरल नहीं । दृष्टांत के तौर पर, यदि किसी विपन्न परिवार के बच्चे से श्रममूलक कार्य लिया जाये, भले ही उसे बदले में भरपूर भोजन और आर्थिक पारिश्रमिक दिया जाये, तो तब यह कृत्य अवैधानिक और दंडनीय होगा । किंतु क्या यह अनैतिक माना जायेेगा ? कुछ का उत्तर हां होगा । कई अन्य का उत्तर न में होगा, क्योंकि ऐसा करके कुछ हद तक परोपकार जो हो रहा होगा । इसी प्रकार यदि विवाह के मौके पर दोनों पक्ष स्वेच्छया और राजीखुशी दहेज का लेन-देन करें तो क्या उसे अनैतिक कहा जा सकता है ?

नैतिकता के अर्थ ढूढ़ पाना तब सबसे कठिन होता है जब स्त्री-पुरुष संबंधों की बात होती है । पाश्चात्य समाजों में अविवाहित स्त्री तथा पुरुष के अंतरंग दैहिक संबंधों पर समाज को आपत्ति नहीं रहती है । परंतु हमारे समाज में ये स्वीकार्य नहीं हैं । क्या ऐसे संबंध अनैतिक कहे जायेंगे ? आजकल लिव-इन रिलेशन (live-in relation) की बातें सुनने को मिलने लगी हैं । क्या उन्हें अनैतिक कहा जाये ? खुले विचारों के आधुनिक कहे जाने वाले लोगों के मत में यौन संबंध एक मानवीय आवश्यकता है और यदि दो पक्ष आपसी सहमति के तहत उसकी पूर्ति कर ले रहे हों तो इसमें अनुचित ही क्या है ।

वस्तुतः विचार करने पर ऐसी अनेक बातें सामने आ सकती हैं जिनको निर्विवाद रूप से नैतिक या अनैतिक कह पाना कठिन होगा । – योगेन्द्र

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