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विवादास्पद परिभाषाएं: ईश्वर, धर्म, …

दिसम्बर 11, 2008

पिछली पोस्ट (८ दिसंबर, २००८) में मैंने विज्ञान के क्षेत्र में प्रयुक्त उन कतिपय शब्दों का जिक्र किया था, जिनकी परिभाषा वैज्ञानिक दृष्टि से संदिग्ध मानी जायेगी । संदर्भगत लेख ने मुझे इस बात के लिए प्रेरित किया कि अपनी बोलचाल की भाषा, हिन्दी, के कुछएक उन शब्दों पर विचार करूं जो रोजमर्रा प्रयोग में लिये जाते हैं, किंतु जिनके असंदिग्ध तथा सर्वस्वीकार्य अर्थ क्या हैं, क्या होने चाहिए या क्या हो सकते हैं इस पर हम विचार नहीं करते हैं । उन शब्दों के अर्थ लोग अपनी-अपनी सुविधा, राजनैतिक विचारधारा, सांस्कृतिक-धार्मिक पृष्ठभूमि आदि के अनुरूप लगाते हैं । फलतः बोलने वाले के मंतव्य सुनने वाला ठीक-ठीक समझ नहीं पाता । बहुधा मतभेद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है । राजनीति और धर्म के मामले में ऐसे मतैक्य का अभाव प्रायः ही देखने को मिलता है । मैंने इस संदर्भ में इन प्रतिनिधि शब्दों को चुना हैः
ईश्वर, धर्म, धर्मनिरपेक्षता, अहिंसा, नैतिकता, भ्रष्टाचार, न्याय, आतंकवाद, संन्यास, एवं विवाह (दस शब्द) ।

हमारे दैनिक जीवन में इन शब्दों का महत्त्व निर्विवाद है । प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हम सभी इनका प्रयोग करते आ रहे हैं । ये सभी संज्ञापद हैं और अमूर्त भावों को व्यक्त करते हैं । अमूर्त होने के कारण इनकी ओर इशारा करके इतर जनों को समझा नहीं सकते कि देखो फलां शब्द इस वस्तु या तत्व को दर्शाता है । अमूर्त भाव हमारे मन में जन्म लेते हैं और वहीं उनकी प्रतीति हमें प्राप्त होती है । बोले गये शब्दों के माध्यम से उन्हें समग्रता में दूसरों को बता नहीं सकते । और यदि भाषायी क्षमता अपर्याप्त हो तो स्थिति अधिक जटिल हो जाती है । फलतः ये क्या भाव व्यक्त करते हैं यह स्पष्ट कर सकने में हम अक्सर असफल रहते हैं । इस श्रेणी का चयनित मेरा पहला शब्द है ईश्वर ।

आरंभ में ही मैं स्पष्ट कर दूं कि मेरी राय में उपर्युक्त किसी शब्द के अर्थ सिद्धांततः क्या होने चाहिए इसे महत्त्व नहीं देना चाहिए । वास्तविकता में उसके बाबत हम क्या देख रहे हैं, क्या महसूस करते हैं और लोग कैसे व्यवहार करते हैं आदि के आधार पर ही उसका अर्थ समझा जाना चाहिए । एक और बात, आप मेरे दृष्टिकोण से सहमत होंगे इसकी संभावना में अधिक नहीं देखता ।

ईश्वर – मुझे लगता है कि ईश्वर की अवधारणा पूर्णतः व्यक्तिसापेक्ष है । नास्तिक अथवा अनीश्वरवादियों की दृष्टि में ईश्वर एक कल्पनामात्र है, जिसका भ्रम आम आदमी ताउम्र पाले रहता है । उनके मत में ऐसी कल्पना की परिभाषा का कोई अर्थ नहीं है; जो जैसे चाहे वैसी कल्पना कर ले । किंतु आस्तिकों के लिए ईश्वर एक सर्वव्यापी, सर्वसमर्थ, चेतन शक्ति है, जो इस सृष्टि का रचयिता और उसका नियंता है । मोटे तौर पर सभी ऐसा ही मानेंगे, परंतु जब अधिक स्पष्ट रूप से परिभाषित करने की बात उठाई जाये तो उसके स्वरूप के बाबत लोगों की सोच में विविधता दिखने लगती है । भारतीय वैदिक दर्शन के मानने वाले ईश्वर को ऐसे परमात्मा के रूप में देखते हैं जो अजन्मा एवं अनश्वर है और जिसका अंश ही प्रत्येक जीवात्मा में विद्यमान है । वे कहेंगे कि जब जीवात्मा को अपने परमात्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त होता है तो उसका परमात्मा में विलय हो जाता है । अद्वैतवादियों की दृष्टि में परमात्मा ही अंतिम सत्ता है और यह सृष्टि उसकी अपनी माया शक्ति से उत्पन्न भ्रम है जो वह ‘एको९हं बहुस्याम’ के सिद्धांत के अनुसार दृश्य सृष्टि के रूप में स्वयं को प्रकट करता है । परंतु द्वैतवादी परमात्मा को पुरुष और उसके साथ विद्यमान प्रकृति को मिलाकर सृष्टि का अंतिम सत्य मानते हैं । उनका ईश्वर कुछ भिन्न है ! बौद्ध दर्शन में ईश्वर का कोई महत्त्व नहीं है, क्योंकि जीवधारी कर्मों का समुच्चयमात्र है । ज्ञान के प्रभाव से जब जीव के कर्मफल समाप्त हो जाते हैं तो वह शून्य में विलीन हो जाता है, अर्थात् उसका अस्तित्व मिट जाता है । इस मत के अनुसार जीव कंप्यूटर में ‘लोडेड’ उस साफ्टवेयर की तरह है जो बिजली ऑफ होने पर मिट जाता है । आम भारतीय की धारणा यह रहती है कि ईश्वर स्वयं को मूर्त रूप में प्रकट कर सकता है । वह हमारे कर्मों का साक्षी है और हमारे अव्छे-बुरे कृत्यों का फल नियत करता है । इस्लाम तथा ख्रिस्तीय मत में ईश्वर सृष्टिकर्ता शक्ति है, जिसने पहले भौतिक जगत् पश्चात् हमें रचा है सत्कर्म करने के लिए । हमारा आरंभ तो है किंतु अंत नहीं है । ईश्वर मृत्यु पश्चात् हमारे लिए स्वर्ग-नरक में स्थायी वास नियत करता है । अधिकांश जन मानते हैं कि ईश्वर को पूजा-प्रार्थना आदि से प्रसन्न किया जा सकता है । अन्य लोग यही कहेंगे कि ईश्वर ने सृष्टि के नियम बनाये हैं और वह उसके आगे हस्तक्षेप नहीं कर सकता । कुल मिलाकर कह पाना सरल नहीं के ईश्वर क्या है । कोई उसे ‘अल्लाह’ पुकारता है तो कोई ‘गॉड’ तथा अन्य ‘भगवान्’ आदि कहता है और अपने-अपने तरीके से सोचता है । उपनिषद् ‘नेति नेति’ कहकर चुप हो जाते हैं ।

धर्म – ‘ईश्वर’ की भांति धर्म शब्द की परिभाषा स्पष्ट नहीं है । हम धर्म की बात मौके-बेमौके करते रहते हैं, किंतु यह बताने में प्रायः असमर्थ रहते हैं कि धर्म के असल अर्थ क्या हैं । अधिकांश लोगों के लिए धर्म परंपरा से चले आ रहे कर्मकांडों का पर्याय है । एक हिंदू के लिए ईश्वर (जैसा भी वह कल्पना में हो !) में आस्था रखना, देव-मंदिर जाना, भगवद्भजन करना, प्रचलित पर्व-त्यौहार मनाना आदि है । एक मुस्लिम की दृष्टि में धर्म नियमित नमाज पढ़ना, स्वयं को अल्लाह के प्रति ‘समर्पित करना’ और ‘धर्म-पुस्तकों’ द्वारा सुझाये कृत्य करना है । कुछ ऐसा ही अन्य मतावलंबियों की समझ में रहता है । एक नास्तिक की दृष्टि में धर्म क्या है ? जब उसके लिए ईश्वर का अस्तित्व ही नहीं तब उस पर केंद्रित क्रियाकलापों की सार्थकता ही नहीं । उसके लिए धर्म संयत लौकिक व्यवहार के आगे कुछ नहीं ।

अंग्रेजी में धर्म का समानार्थी शब्द रिलीजन समझा जाता है । परंतु यह आपत्ति से परे नहीं है । पाश्चात्य जगत् में प्रचलित धार्मिक मान्यताएं धर्मपुस्तकों पर आधारित हैं, और उनमें जिन आचार-व्यवहारों का आदेश है उनके अनुसार चलना ही धर्म है । परंतु हिंदुओं के मामले में ऐसा नहीं है । और इसीलिए कई लोगों की राय में हिंदू धर्म नहीं जीवनशैली है, पूर्वतः स्थापित परंपराओं का संकलन है, एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें दूसरों के अहित की कीमत पर अपने हितों की पूर्ति की वर्जना है, आदि । उसमें एक प्रकार का लचीलापन है वैयक्तिक विचारों के लिए, यहां तक कि एक हिंदू अनीश्वरवादी भी हो सकता है । वस्तुतः हिंदुओं में विभिन्न मत हैं और कई लोग जैन, बौद्ध तथा सिख ‘धर्मों’ को हिंदुओं में प्रचलित मतों के रूप में देखते हैं । हरएक का अपना आध्यात्मिक दर्शन है । मेरी नजर में अंग्रेजी का उक्त शब्द (रिलीजन) मत, पंथ अथवा संप्रदाय को व्यक्त करता है ।

धर्म संस्कृत का ऐसा शब्द है जिसके अर्थ अत्यंत व्यापक हैं । (शब्दकोश इसकी व्याख्या कुछ इस प्रकार करते हैं: धर्म = धृ+मन्; ध्रियते लोकः अनेन, धरति लोकं वा ।) वस्तुतः धर्म शब्द का प्रयोग मनुष्यों से परे जीव-निर्जीव, समस्त सृष्टि, के लिए किया जाता रहा है । दो-एक शब्दों में कहें तो यह किसी वस्तु, जीव अथवा मनुष्य के गुणों या कर्तव्यों के अनुरूप व्यवहार करने के भाव की अभिव्यक्ति के लिए प्रयुक्त होता है, यथा अग्नि का धर्म है जलाना, ताप पैदा करना तथा प्रकाशित करना आदि जो प्रकृति-प्रदत्त एवं अपरिवर्तनीय है । कुछ ऐसा ही मनुष्येतर जीवों के लिए भी है । किंतु मनुष्य विवेकशील प्राणी है और उसे निर्णय लेने का गुण मिला है । वह उचित को छोड़ अनुचित व्यवहार भी कर सकता है, और इसी पर अंकुश लगाने हेतु विभिन्न समाजों में ‘आचार संहिताएं’ विकसित हुयी हैं, जिन्हें हम धर्मों के नाम से पुकारते हैं । लेकिन व्यवहार में हम देखते हैं कि ऐसी किसी आचार संहिता का उल्लंघन करने के बाद भी व्यक्ति किसी धर्म का अनुयायी कहलाने का अधिकारी बना रहता है । तब मुझे लगता है कि धर्म के स्पष्ट अर्थ व्यवहार में नहीं हैं । कौन हिंदू है, कौन मुस्लिम या ईसाई, इसे तय करने के सुस्पष्ट मापदंड हमारे पास नहीं हैं । आप कुछ भी करें, जन्मना जो हैं सो बने रहते हैं । आप कभी भी सुविधानुसार तथा स्वेच्छया धर्म बदल सकते हैं, गोया कि धर्म एक परिधान के माफिक हो । तब धर्म के अर्थ क्या रह गये ? मेरा मत है कि वास्तविक व्यवहार में धर्म लोगों की सामुदायिक पहचान भर बन के रह गया है ।

अगली पोस्ट में ‘धर्मनिरपेक्षता’ आदि अन्य शब्दों के साथ चर्चा जारी रहेगी । – योगेन्द्र

3 Responses to “विवादास्पद परिभाषाएं: ईश्वर, धर्म, …”


  1. शब्दों का प्रयोग व्यक्ति, काल, सन्दर्भ आदि को ध्यान रख कर किया जाता है अतः उन्हें पारिभाषित करने के कठिन कार्य में आप लगे हैं इसके लिए साधुवाद. ईश्वर, धर्म आदि को आप इस प्रक्रिया से अलग कर दें और केवल सामान्य रूप से प्रयुक्त होने वाले शब्दों तक ही सीमित हो लें. वेदों को ही समझ पाना एक जन्म में संभव प्रतीत नहीं होता. उसके बाद उपनिषद् है, पुराण हैं और कितनी ही व्याख्याएँ हैं.


  2. बहुत सारगर्भित आलेख हैं। आप लिखते और पोस्ट करते रहिए। पाठक भी आएँगे।

  3. raakesh Says:

    बहुत ही स्पष्ट और मन की बात जो तर्कसंगत भी है।


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