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शब्दों की विवादित परिभाषाएं

दिसम्बर 6, 2008

हाल में मैंने एक लेख लंदन (इंग्लैंड) से छपने वाली पत्रिका ‘नेचर’ (NATURE, Vol 455, 23 October 2008; वेबसाइट: nature.com) में पढ़ा, जिसका शीर्षक थाः ‘Disputed Definitions’ । यह लेख कुछ चुने हुए शब्दों/पदबंधों से संबंधित है, जिनका प्रयोग तकनीकी लेखन और शोध समीक्षा में खुलकर किया जाता है, परंतु जो स्पष्ट तथा असंदिग्ध रूप से परिभाषित नहीं लगते हैं ।

लेख के आरंभ में यह बताया गया है कि वैज्ञानिक जगत् में किसी विषय पर चर्चा करते समय परंपरानुसार वस्तुनिष्ठ भाषा प्रयोग में ली जाती है, ताकि जो बात कही/लिखी जा रही हो उसके अर्थ सुनने/पढ़ने वाले व्यक्ति को मंतव्य के अनुरूप ठीक-ठीक समझ में आवे । यह तभी संभव हो पाता है जब ऐसे शब्दों का प्रयोग किया जाये जो वैज्ञानिक दृष्टि से एकार्थी और स्पष्टतः परिभाषित हों । आम तौर पर प्रचलित शब्दों और वाक्य-संरचनाओं के साथ कोई समस्या नहीं रहती है । फिर भी यदाकदा कुछ ऐसे शब्द देखने को मिलते हैं जिनके अर्थ बहुत स्पष्ट नहीं रहते । ऐसा दावा उक्त लेख में किया गया है कि अलग-अलग लेखक उन्हें अलग-अलग अर्थों में इस्तेमाल करते हुए देखे जाते हैं । लेख चुनिंदा शब्दों के अर्थों के बारे में कई लेखकों के विचार पर आधारित है । लेख में जिन अंग्रेजी शब्दों को उदाहरण स्वरूप चुना गया है वे हैं:

Significant [adjective]
Consciousness
[noun]
Race
[noun]
Tipping point
[noun]
Complexity
[noun]
Stem cell
[noun]
Epigenetic
[adjective]
Paradigm shift
[noun]

लेख में तो इनमें से प्रत्येक के बारे में काफी विस्तार से बहुत कुछ स्पष्ट किया गया है । यहां पर मेरा मकसद उन सभी बातों को प्रस्तुत करना नहीं है । उल्लिखित प्रायः सभी शब्दों के निहितार्थों की विवेचना करने एवं समझने के लिए संबंधित विज्ञान विषय की सशक्त पृष्ठभूमि आवश्यक है ऐसा मेरा सोचना है, जो अधिकांश पाठकों के लिए व्यवहार में संभव नहीं है । मैं उस लेख के आधार पर इनमें से चुने हुए दो-एक के संभावित अर्थ और उनसे संबद्ध संदिग्धता का कारण अत्यंत संक्षेप में बताना चाहता हूं, ताकि इस बात की कुछ प्रतीति मिल सके कि विज्ञानियों के मध्य उनके समुचित प्रयोग में मतैक्य सदैव नहीं हो पाता है । तत्पश्चात् इस बात पर आना चाहता हूं कि रोजमर्रा के सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन में हम अनेकों ऐसे शब्द प्रयोग में लेते हैं जिनके बारे में तनिक भी यह नहीं सोचते कि सामने वाला व्यक्ति उनके वही अर्थ ले पा रहा है कि नहीं जो हमारे मन में है । अस्तु, पहले उपरिलिखित एक-दो शब्दों की चर्चा । याद दिला दूं कि उक्त शब्दों की बात वैज्ञानिक क्षेत्रों के संदर्भ में हो रही है । 

Significant (सार्थक). यह शब्द प्रमुखतया सांख्यिकी के क्षेत्र में प्रयुक्त होता है । अन्य वैज्ञानिक क्षेत्रों में इसका प्रयोग किसी घटना या निष्कर्ष के न्यूनाधिक महत्त्व को सांख्यिकीय दृष्टि से दर्शाने में किया जाता है । प्रश्न उठता है कि इस Significant के वास्तविक अर्थ क्या हैं ? कब कोई चीज सार्थक कही जा सकती है ? उदाहरण के लिए मान लें कि किसी देश के लोगों की आमदनी एक वर्ष में 5 प्रतिशत बढ़ जाती है तो क्या वह Significant वृद्धि कही जायेगी ? कुछ का उत्तर ‘हां’ और अन्य का ‘न’ होगा । वास्तव में हर व्यक्ति इस शब्द Significant की व्याख्या समाज की उस काल-विशेष पर आर्थिक एवं अन्य प्रकार की स्थितियों को ध्यान में रखकर करता है । उदाहरणार्थ यदि उस समय महंगाई लगभग स्थिर हो तो यह वृद्धि अच्छी-खासी मानी जायेगी, अन्यथा इसे संतोषप्रद नहीं समझा जायेगा । इतना ही नहीं, अगर खाद्यवस्तुओं के मूल्य तेजी से बढ़ रहे हों पर अन्य वस्तुओं के नहीं तो समाज के गरीब तबके के सापेक्ष उक्त वृद्धि अपर्याप्त कही जायेगी, जब कि संपन्न वर्ग के लिए अच्छी-खासी, क्योंकि उनकी आमदनी का अल्पांश ही खाद्यवस्तुओं पर खर्च होता है । गंभीरता से सोचने पर बात समझी जा सकती है । अतः Significant के अर्थ व्यक्ति तथा परिस्थिति सापेक्ष हो जाता है, न कि वस्तुनिष्ठ, जो कि वैज्ञानिक संप्रेषण की मूल आवश्यकता मानी जाती है । ऐसी स्थिति वैज्ञानिक अनुसंधान के मामलों में कभी-कभार पैदा हो जाती है कि लेखक के अनुसार उसके परिणाम का किसी पूर्ववर्ती परिणाम से अंतर Significant है । संबंधित समीक्षक कह सकता है कि ऐसा निष्कर्ष गलत है; कोई Significant अंतर नहीं है ।

Consciousness (चैतन्य). Consciousness आम बोलचाल में अक्सर सुनायी देने वाला शब्द है । वैज्ञानिक उसके सटीक अर्थ की स्थापना चाहता है । क्या होती है Consciousness ? अगर परिभाषा ही न मालूम हो तो कैसे निश्चित करेंगे कि किस जीव या वस्तु में Consciousness है और किस में नहीं । कोई कैसे यह निष्कर्ष निकाले कि आधुनिक कंप्यूटर में Consciousness नहीं होती है, तिलचट्टे या चूहे में वह नहीं होती है, या चिंपांजी में भी नहीं होती है, आदि ? चूंकि Consciousness की स्पष्ट तथा वस्तुनिष्ठ परिभाषा अभी तक वैज्ञानिकों के पास नहीं, अतः ऐसे प्रश्न अनुत्तरित ही रह जाते हैं । Consciousness की हमारी समझ वस्तुतः समय के साथ प्राप्त अनुभवों पर आधारित रहती है । आपमें चूंकि Consciousness है, अतः आप यह मान के चलता हैं कि आपके सदृश अन्य मनुष्यों में भी वह अवश्य है । कल्पना कीजिये कि एक मशीन तैयार की जाती है (सिद्धांततः यह संभव है !) जो हर प्रकार से, देखने-सुनने तथा व्यवहार आदि में, आम आदमी की तरह पेश आवे, तब क्या आप उसमें भी Consciousness होने की बात करेंगे ? सोचें । Consciousness वस्तुतः एक पहेली है; यह ऐसा शब्द है जिसे लोग अपने-अपने तरीके से समझते हैं, किंतु दूसरों को स्पष्ट बता नहीं सकते हैं ।

Race (नस्ल). नस्लवाद की बातें काफी आम हैं । लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से इसका स्पष्ट अर्थ नहीं है । व्यवहार में नस्लवाद का आधार मनुष्यों का बाहरी रूपरंग तथा शारीरिक ढांचा रहा है, यथा यूरोपीयों का त्वचा-वर्ण सामान्यतः गुलीबी-सफेद रहता है, जब कि चीनियों का कुछ पीलापन लिए हुए और अधिकांश अफ्रिकियों का काले के सन्निकट । सिर के बाल यूरोपियों के हल्के-भूरे कुछ सफेदी लिए, तो चीनियों के प्रायः गहरे भूरे या काले, जब कि अफ्रिकियों के काले, घुंघराले और बहुत छोटे । परंतु ये बाह्य चिह्न भी संबंधित क्षेत्र के प्रत्येक व्यक्ति पर लागू नहीं होते । जीवविज्ञानियों के मतानुसार विश्व के सभी मनुष्यों की ‘जीन’ स्तर पर एक ही संरचना है, और जो भी अंतर दिखायी देते हैं उनके पीछे का कारण भौगोलिक, ऐतिहासिक तथा विकास ही असमान रफ्तार रहे हैं । अलग-अलग परिस्थितियों में कुछ जीन सक्रिय होकर प्रभावी हो गये तो कुछ सुप्तावस्था में चले गये, परंतु वे भी कभी सक्रिय हो सकते हैं । भारतीयों में तो तज्जन्य विविधता तो एक ही परिवार में भी कभी-कभी दिख जाती है । अतः Race का कोई वस्तुनिष्ठ आधार नहीं है । फिर भी समाजशास्त्रियों की तरह वैज्ञानिक भी इस शब्द को प्रयोग में लेते आ रहे हैं, बिना इस पर ध्यान दिये कि अन्य लोग उनके मंतव्य को सही समझ पायेंगे कि नहीं ।

ये उदाहरण काफी हैं । अन्य शब्दों को मैं छोड़ रहा हूं । मैं अब अधोलिखित कुछएक चुनिंदा शब्दों की बात करता हूं, जिनके अर्थ वास्तव में क्या हैं यह मैं नहीं समझ पाता । मैं महसूस करता हूं कि लोग अपनी-अपनी सुविधा, राजनैतिक विचारधारा, एवं सामाजिक-धार्मिक पृष्ठभूमि के मद्देनजर इन शब्दों के तात्पर्य निकालते हैं । बहुधा लोगों में इनके अर्थों के प्रति मतैक्य नहीं दिखता है । ये शब्द हैं:

ईश्वर, अहिंसा, धर्म, धर्मनिरपेक्षता, नैतिकता, भ्रष्टाचार, न्याय, आतंकवाद, संन्यास, एवं विवाह (दस शब्द हिन्दी के) ।

इस प्रकार के और भी अनेकों शब्द सुझाये जा सकते हैं । उक्त श्ब्दों के संभावित तथा संदिग्ध अर्थों की चर्चा अगली पोस्ट में की जायेगी । – योगेन्द्र

One Response to “शब्दों की विवादित परिभाषाएं”

  1. Anunad Singh Says:

    बहुत महत्वपूर्ण विषय की ओर आपने ध्यान खींचा है।

    वस्तुत: परिभाषा करना, बहुत कठिन काम भी है। बहुत स्पष्ट दिखने वाले शब्दों के पीछे भी जब हाथ धोकर पड़ जाते हैं और गहराई से विचार करने लगते हैं तो अन्त में यही कहना पड़ता है कि अमुक चीज की सही-सही परिभाषा करना कठिन है। ‘विज्ञान’, कला, तकनीकी, लाभ, प्रगति, विकास, शिक्षा, बुद्धि, … आदि की परिभाषा पूर्णत: ‘शुद्ध’ रूप से नहीं हो सकती। यहाँ तक कि ‘जन्तु’ और ‘वनस्पति’ की सही-सही परिभाषा नही हो पाती; जीवित और निर्जीव की स्पष्ट परिभाषा करना कठिन है।

    कारण खोजना कठिन नहीं है। बात यह है कि ये सभी ‘चीजें’ गणित के पूर्णांकों (१, २, ३.. ) जैसे नहीं बदलतीं। बल्कि इनमें ‘सातत्य’ का गुण पाया जाता है। इस सातत्य के कारण कोई स्पष्ट सीमा-रेखा नहीं खींची जा सकती (जैसे विज्ञान क्या है और यह कब तकनीकी हो जाती है) वैसे ही जैसे प्रकाश का बारीकी से अध्ययन करने पर पता चलता है कि ‘सात’ ही रंग’ नहीं हैं – रंग अनन्त हैं। रंग, ‘एलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम’ एक सतत परिवर्तनशील वस्तु है न कि एकाएक (डिस्क्रीट) बदलने वाली चीज।

    भाषा क्या है और बोली क्या है?


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