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कितनी भाषाएं सीख सकता है कोई?

नवम्बर 4, 2008

इंग्लैंड के लंदन महानगर से ‘न्यू साइंटिस्ट’ (http://www.newscientist.com/) नाम की एक वैज्ञानिक पत्रिका छपती है । साप्ताहिक स्तर की उस पत्रिका में विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों में निरंतर हो रही प्रगति की खबरें और संबंधित विस्तृत लेख छपते रहते हैं । पूरी पत्रिका वार्षिक शुल्क चुकाये जाने पर ही पढ़ी जा सकती है । उसका अंतरजाल पर ‘इलेक्ट्रानिक’ संस्करण भी उपलब्ध है, जिसका शुल्क उसके मुद्रित संस्करण से काफी कम है । पत्रिका में फिर भी कुछ जानकारी मुफ्त में देखने को मिल जाती है ।

अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह के उसके अंक में मुझे एक लेख पढ़ने को मिला, जिसका शीर्षक हैः ‘The outer limits of the human brain’ । लेख का विषय मानवीय मस्तिष्क की क्षमताओं की सोदाहरण चर्चा करना है । उसमें कहा गया है कि हमारी क्षमताएं सामान्यतः सीमित होती हैं, किंतु कभी-कभी कुछ गिने-चुने लोगों को प्रकृति से अभूतपूर्व मस्तिष्कीय क्षमता का वरदान मिल जाता है, जो उनके किसी एक या अन्य क्षेत्र में असामान्य उपलब्धि के रूप में हमें देखने को मिलता है । लेख में उच्चस्तरीय बुद्धि-लब्धि (High Intelligence Quotient), वैज्ञानिक प्रतिभा, शतायु होने पर भी अक्षुण्ण बौद्धिक क्षमता, कला, संगीत आदि की अद्वितीय मेधा, अद्भुत स्मरण शक्ति, रंगों, ध्वनियों, स्वादों आदि के अतिसूक्ष्म अंतर के ज्ञान की क्षमता जैसे विषयों की बातें की गयी हैं ।

उस सब के बारे में अधिक कुछ कहने का मेरा इरादा नहीं है । मेरी दिलचस्पी लेख के उस अंश में है जिसमें लोगों की भाषायी प्रतिभा की बातें कही गयी हैं । कहा गया है कि कुछ लोगों में एकाधिक भाषाएं सरलता से सीखने की प्रतिभा रहती है । लेकिन ऐसे जन बिरले ही होते हैं जो आधा दर्जन या अधिक भाषाएं जानते हों । उक्त लेख में लेबनानी मूल के ज़ियाद फ़ज़ह (Ziad Fazah) नामक व्यक्ति का जिक्र किया गया है जो यह दावा करता है कि वह पचास से अधिक भाषाएं पढ़, लिख तथा बोल सकता है (देखें ब्लॉग-पेज: अद्भुत-भाषाक्षमता) । सचमुच अविश्वनीय है, पर कुछ तो सच्चाई होगी ही उसके दावे में । वह कहता है कि वह किसी भी नयी भाषा को सीखने में अधिक वक्त नहीं लगाता है, बस मुश्किल से घंटा भर प्रतिदिन जिसमें भाषा के व्याकरण आदि का उध्ययन करना और रेडियो/टेलीविजन जैसे माध्यम से उच्चारण सीखना शामिल रहता है । उसका यह भी कहना है कि कोई दसएक भाषाएं तो उसकी जबान पर रहते हैं लेकिन वह हर नयी भाषा को कुछ ही दिनों में भूल जाता है, कदाचित् अभ्यास के अभाव में । उसके दावे के अनुसार उसका मस्तिष्क भाषाओं के सापेक्ष एक कैमरे की तरह कार्य करता है, अर्थात् एक बार कुछ सुना या लिखा देखा नहीं कि वह दिमाग में घर कर जाता है । अभी हाल ही में उसने करीबियाई द्वीपों की एक मिश्रितभाषा (Creole – क्रिओल) को कुछ ही दिनों में इस दक्षता के साथ सीख लिया कि वह टेलीविजन पर साक्षात्कार दे सके ।

ज़ियाद फ़ज़ह की इस क्षमता के बीज, उसके कथनानुसार, बचपन में तब पड़े थे जब उसका परिवार लेबनान के किसी बंदरगाह के पास रहता था, जहां वह संयोग से विविध भाषाभाषियों के संपर्क में आया और उनकी बोलियां समझने का प्रयास करता था । कालांतर में यही उसका शौक बन गया और उसने तरह-तरह की भाषाएं सीखना आरंभ कर दिया । संप्रति वह ब्राजील में बतौर एक भाषा शिक्षक के रूप में कार्यरत है ।

मैं समझता हूं कि ज़ियाद फ़ज़ह का मामला कुछ असामान्य और अतिविशिष्ट है । व्यवहार में ऐसे लोग कम ही देखने को मिलते हैं जिनका एक साथ कई भाषाओं पर अधिकार हो । मैंने सुना है कि पंडित राहुल सांकृत्यायन कई भाषाओं के जानकार थे । कहा जाता है कि हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. नरसिंहा राव भी तुलुगू, हिन्दी, मराठी, संस्कृत, अंग्रेजी, तथा स्पेनी के जानकार थे । मुझे कभी एक टीवी कार्यक्रम देखे का ध्यान आता है जिसमें बेंगलुरु की तीन-चार साल की एक लड़की दिखायी गयी थी, जो पारिवारिक पृष्ठभूमि तथा स्थानीय परिवेश के फलस्वरूप बंगाली, हिन्दी, संस्कृत, कन्नड़ तथा अंग्रेजी कमोबेश शुद्ध बोल पाने में समर्थ थी । वस्तुतः पढ़े-लिखे लोगों में दो भाषाओं का ज्ञान अपने ही देश में नहीं अपितु अन्यत्र भी आम बात है । अपने यहां तो तीन-तीन भाषाएं भी बहुत से लोग जानते हैं । किंतु चार या अधिक भाषाएं जानने वाले वास्तव में कम ही होंगे ।

इस संदर्भ में एक प्रश्न मेरे मन में उठता है । गिने-चुने मेधावी एवं प्रतिभाशाली व्यक्तियों को छोड़ दें, तो आम आदमी कितनी भाषाएं सीख सकता है ? मेरा खयाल है कि मिलती-जुलती भाषाएं सीखना आसान है, क्योंकि उसमें मेहनत तथा कोशिश अधिक नहीं करनी पड़ती है । इस प्रकार देखा जाये तो किसी हिन्दीभाषी के लिए नेपाली और मराठी सीखना सबसे सरल होना चाहिए, क्योंकि इनकी लिपि, व्याकरणीय ढांचा, शब्दोच्चारण तथा शब्दसंपदा में अंतर नहीं है या नाममात्र का है, अथवा विशेष समस्याकारक नहीं है । गुजराती, पंजाबी, बंगाली आदि भी हिन्दी के पर्याप्त निकट हैं । दक्षिण भारतीय भाषाएं कुछ दिक्कत पेश कर सकती हैं, विशेषतः शब्दसंपदा की दृष्टि से, लेकिन मेरा मानना है कि कन्नड़ और तत्पश्चात् तेलुगु एवं मलयालम, जिनमें संस्कृत शब्दों की उल्लेखनीय विद्यमानता है, अंग्रेजी समेत किसी भी यूरोपीय भाषा की तुलना में सरल पायी जायेंगी । वर्णमाला और स्वर-मात्रा की अवधारणा में ये संस्कृत से दूर नहीं हैं । तमिल में कुछ अधिक दिक्कतें हैं, यथा उसमें ख, घ जैसे महाप्राण कहलाने वाली ध्वनियों का अभाव है । फिर भी एक हिन्दीभाषी के लिए इन्हें सीखना किसी भी यूरोपीय भाषा से सरलतर सिद्ध होगा । अतः कोई हिंदुस्तानी दो-चार भाषा जानता हो तो बहुत आश्चर्य नहीं होगा ।

चूंकि हम हिंदुस्तानियों की भाषायी पृष्ठभूमि में अंग्रेजी का गंभीर प्रभाव है, अतः अंग्रेजी जानना आम बात है । अंग्रेजी के जानने वालों के लिए मिलती-जुलती अन्य यूरोपीय भाषाएं सीखना अपेक्षया सरल है, खास तौर पर इसलिए कि अधिकांश की लिपि रोमन (लैटिन) है । लेकिन अरबी मूल की हिब्रू अपेक्षाकृत कठिन है, क्योंकि इसकी लिपि (दांये से बायें) कुछ हद तक अलग प्रकार की है और उसमें स्वर घ्वनियों के लिए लिपिचिह्नों को अभाव है । शब्दसंग्रह तो कठिन होगा ही । इन सभी भाषाओं में वर्तनी और उच्चारण के बीच वह असंदिग्ध संबंध नहीं जो भारतीय भाषाओं की विशिष्टता है । उन्हें सीखने में वह भी एक अड़चन पैदा करती है । लेकिन कुछ कदम और दूर जाकर चीनी, जापानी भाषाओं पर ध्यान दें, तो पायेंगे कि हमारी भाषाओं से उनकी समता प्रायः नहीं है । इन भाषाओं में वर्णों की (स्वर-व्यंजन अक्षर) अवधारणा ही नहीं । जापानी तो ऊपर से नीचे लिखी जाने और अटपटी लग सकती है ।

ऐसी परस्पर साम्यहीन भाषाओं सीखकर दिखाना किसी बिरले के वश की ही बात हो सकती है । और सबसे अहम बात तो यह है कि किसी भाषा को सीखने के लिए आवश्यक संसाधनों के अलावा जो समय तथा श्रम की आवश्यकता होती है वह किसी के पास कहां से आयेगा ? आम आदमी के सामने तो जीवन-यापन के साधन जुटाने के अलावा तमाम अन्य कार्य होते हैं जिनकी अनदेखी संभव नहीं । अतः काम भर के लिए एक-दो भाषा वह सीख ले तो यही बड़ी उपलब्धि कही जायेगी । – योगेन्द्र

One Response to “कितनी भाषाएं सीख सकता है कोई?”

  1. himwant Says:

    अगर छोटी उमर मे यानी 2 वर्ष से 4 वर्ष के बीच बच्चे से मां अलग भाषा मे, पिता अलग भाषा मे, शिक्षीका अलग भाषा मे बातचीत करे तो बच्चा बडा हो कर तीनो भाषाएं बडे आराम से समझ और बोल सकेगा।

    भारत मे आज के 100 वर्षो बाद लगभग सारी भारतीय भाषाएं मिल कर एक हीं भाषा मे रुपांतरीत हो जाए तो अच्छा रहेगा। इसके लिए भाषाविज्ञो को सप्रयास भारतीय भाषाओ के बीच शब्दो का परस्पर आदान-प्रदान करवाना चाहिए। जैसे नदीयां सागर मे मिलती है, ठीक वैसे हीं।


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